गजानन माधव मुक्ितबोध का जन्म श्योपुर कस्बा, ग्वालियर, मध्य प्रदेश में हुआ था। उनके पिता पुलिस विभाग में सब - इंस्पेक्टर थे। बार - बार पिता की बदली होते रहने के कारण मुक्ितबोध की पढ़ाइर् का क्रम टूटता - जुड़ता रहा, इसके बावजूद उन्होंने सन् 1954 में नागपुर विश्वविद्यालय से एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। पिता के व्यक्ितत्व के प्रभाव के कारण उनमें इर्मानदारी, न्यायपि्रयता और दृढ़ इच्छाशक्ित के गुण विकसित हुए। लंबे समय तक नया खून ;साप्ताहिकद्ध का संपादन करने के बाद उन्होंने दिग्िवजय महाविद्यालय, राजनाँदगाँव ;मध्य प्रदेशद्ध में अध्यापन कायर् किया। मुक्ितबोध का पूरा जीवन संघषो± और विरोधों से भरा रहा। उन्होंने माक्सर्वादी विचारधारा का अध्ययन किया, जिसका प्रभाव उनकी कविताओं पर दिखाइर् देता है। पहली बार उनकी कविताएँ सन् 1943 में अज्ञेय द्वारा संपादित तारसप्तक में छपीं। कविता के अतिरिक्त उन्होंने कहानी, उपन्यास, आलोचना आदि भी लिखी है जो कवि द्वारा लिखे गए गद्य का अद्भुत नमूना है। मुक्ितबोध् एक समथर् पत्राकार भी थे। उनकी ये विशेषताएँ अगली पीढ़ी को रचनात्मक उजार् देती रही हंै। मुक्ितबोध नयी कविता के प्रमुख कवि हैं। उनकी संवेदना और ज्ञान का दायरा अत्यंत व्यापक है। गहन विचारशीलता और विश्िाष्ट भाषा - श्िाल्प के कारण उनके साहित्य की एक अलग पहचान है। स्वतंत्रा भारत के मध्यवगर् की ¯शदगी की विडंबनाओं और विद्रूपताओं का चित्राण उनके साहित्य में है और साथ ही एक बेहतर मानवीय समाज - व्यवस्था के निमार्ण की आकांक्षा भी। मुक्ितबोध् के साहित्य की एक बड़ी विशेषता है आत्मालोचनकी प्रवृिा। मुक्ितबोध के काव्य - संग्रह हैं μ चाँद का मुँह टेढ़ा है तथा भूरी - भूरी खाक धूल। नए साहित्य का सौंदयर्शास्त्रा, गजानन माध्व मुक्ितबोध् ;सन् 1917 - 1964द्ध कामायनी: एक पुनविर्चार, एक साहित्ियक की डायरी आदि उनकी आलोचनात्मककृतियाँ हैं। छह खंडों में प्रकाश्िात मुक्ितबोध रचनावली में उनकी सारी रचनाएँ अब एक साथ उपलब्ध् हैं। यहाँ उनकी प्रसि( पुस्तक एक साहित्ियक की डायरी का एक अंश प्रस्तुत है। नए की जन्म वुंफडली: एक में लेखक ने व्यक्ित और समाज के बाहरी तथा आंतरिक परिवतर्न के पफलस्वरूप प्राप्त चेतना को ‘नए’ के संदभो± में देखने की कोश्िाश की है। लेखक का मानना है कि सांस्वृफतिक, धामिर्क, राजनीतिक और साहित्ियक परिवतर्न के पफलस्वरूप प्राप्त यथाथर् की वैज्ञानिक चेतना को ही ‘नया’ मानना चाहिए। लेखक का यह भी कहना है कि ‘संघषर् और विरोध’ के निष्कषर् को व्यावहारिकता में न जीने के कारण ही हम पुराने को तो छोड़ देते हैं, ¯वफतु ‘नए’ को वास्तविक रूप से अपना नहीं पातेे। मैं एक ऐसे व्यक्ित को जानता हूँ, जिसे ;क्षमा कीजिएद्ध मैं एक शमाने में बहुत बुिमान समझता था। मुझे उससे बहुत आशाएँ थीं कि वह आगे चलकर एक मेधावी, प्रतिभाशाली पुरफष निकलेगा। लोग समझते थे कि मैं उस व्यक्ित कोअनुचित महत्त्व दे रहा हूँ। मुझे लगता था कि वह व्यक्ित हमारी भारतीय परंपरा का एक विचित्रा परिणाम है। वह अपने विचारों को अिाक गंभीरतापूवर्क लेता था। वेउसके लिए धूप और हवा जैसे स्वाभाविक प्रावृफतिक तत्त्व थे। शायद इससे भी अिाक। दरअसल, उसके लिए न वे विचार थे, न अनुभूति। वे उसके मानसिक भूगोल के पहाड़, च‘ान, खाइयाँ, शमीन, नदियाँ, झरने, जंगल और रेगिस्तान थे। मुझे यह भान होता रहता कि वह व्यक्ित अपने को प्रकट करते समय, स्वयं की सभी इंदि्रयों से काम लेते हुए, एक आंतरिक यात्रा कर रहा है। वह अपने विचारों या भावों को केवल प्रकट ही नहीं करता था, बल्िक उन्हें स्पशर् करता था, सूँघता था, उनका आकार - प्रकार, रंग - रूप और गति बता सकता था, मानो उसके सामने वे प्रकट साक्षात और जीवंत हों। उसका दिमाग लोहे का एक श्िावंफजा था या सुनार की एक छोटी - सी चिमटी, जो बारीक - से - बारीक और बड़ी - से - बड़ी बात को सूक्ष्म रूप से और मशबूती से पकड़कर सामने रख देती है। लेकिन यह बात पुरानी हो गइर्। अब मुझे लगता है कि मैं भी बुिमान हो गयाहूँ। मुझे ऐसा लगता कि मेरे दोस्त की बुिमत्ता का कारण उसकी ¯शदगी ही श्यादा थी, न कि केवल मस्ितष्क - तंतुओं की हलचल। बारह वषो± बाद जब एकाएक मेरी उससे मुलाकात हुइर्, तब आनंद और आश्चयर् का कोइर् ठिकाना न रहा। आनंद से भी श्यादा आश्चयर्। नदियों की दो धाराओं के बीच इतने बड़े - बडे़ पहाड़ आ गए थे कि उन्होंने हमारी दिशाएँ भी बदल दी थीं। जब पिफर से मुलाकात हुइर् तो स्वभावतः हमारा ध्यान इन पहाड़ों की लंबाइर् - चैड़ाइर्, उफँचाइर् - नीचाइर् पर गया। बारह वषर् बाद, अब जो हम दो हो गए हैं, तो किस तरह? उसके बाल सपेफद हो गए थे। लेकिन यह कहना मुश्िकल था कि वह नौजवाऩनहीं है। यों कहिए की वह भूतपूवर् नौजवान था। मतलब यह कि प्रभाव उसके वतर्मान रंग - रूप का न होकर उसके भूतपूवर् रंग - रूप का होता था। मुझे वह प्रभाव अच्छा लगता। जी चाहता कि उसके बारे में रोमैंटिक कल्पना की जाए। लेकिन यह कहना मुश्िकल था कि उसकी सुंदरता उसके रूप की थी, या उसके माथे पर पड़ी हुइर् रेखाओं की। कम - से - कम मुझे तो वे लकीरें अच्छी लगतीं। खूबसूरत कागश सुंदर तो होता ही है, लेकिन यदि वह कोरा हुआ, और उसमें कोइर् ममर् - वचन लिखा हुआ न रहे तो, सौंदयर् में रहस्य ही क्या रहा? सौंदयर् में रहस्य न हो तो वह एक खूबसूरत चैखटा है।सामने पीपल का वृक्ष है। चाँदनी में उसके पत्ते चमचमाते काँप रहे हैं। चाँदनी और उसमें चित्रिात हुइर् छायाएँ हमारे मनोलोक को एक नइर् दिशा दे रही हैं। मुझे मालूम था कि मेरे मित्रा के लिए शैले की ‘ओड टु वैस्ट विंड’ उतनी ही दूर है जितना मेरे लिए ‘स्क्वेअर रूट आॅप़्ाफ माइनस वन’ लेकिन इसके बावजूद वे दूरियाँ हमारी पहचानी हुइर् थीं, और शायद इसीलिए वे पि्रय भी थीं। जब - जब मुझे दूरियों का भान होता है, तब मुझे अच्छा भी लगता है और बुरा भी। अच्छा इसलिए कि दूरी हमारी गति को एक चुनौती है और बुरा इसलिए कि मित्रों के बीच दूरी खटकती है। हम एक ही भाषा का उपयोग तो करते हैं लेकिन अभ्िाधाथर् एक होते हुए भी ध्वन्याथर् और व्यंग्याथर् अलग - अलग हो जाते हैं। यह दूरी के कारण है। दूरी पर विजय पाना मानव - स्वभाव है। वह एक साहस - रोमांस है। अब हमें एक - दूसरे को पिफर से खोजना - पाना है। एक तरह से मुझे खुशी भी थी कि मैं उसे कतइर् भूल गया था और उससे बहुत दूर निकल गया था। शायद यह आवश्यक भी था। नहीं तो मैं उससे आच्छन्न हो जाता। मेरी अपनी दृष्िट से वह असाधारण और असामान्य था। एक असाधारणता और क्रूरता भी उसमें थी। निदर्यता भी उसमें थी। वह अपनी एक धुन, अपने एक विचार या एक कायर् पर सबसे पहले खुद को, और उसके साथ लोगों को वुफबार्न कर सकता था। इस भीषण त्याग के कारण, उसके अपने आत्मीयों का उसके विरु( यु( होता, तो वह उसकी क्षति भी बरदाश्त कर लेता। उसकी ¯शदगी के इस बुनियादी तथ्य से मैंने हमेशा वैर किया। जब वह राजनीति में उतरा तो मैंने उसके घरवालों के सामने गरजकर यह आरोप लगाया कि वह उसका पलायन है, अपनाउत्तरदायित्व वहन न करने की प्रवृिा है। मैंने उससे यह भी कहा कि वह राजनीतिक व्यक्ित है ही नहीं। राजनीति के साथ जब वह साहित्य में उतरा तब मुझे वुफछ अच्छा लगा। लेकिन तब तक उसकी हालत बिगड़ चुकी थी। घर के विरोध और बाहर के विरोध से वह जजर्र हो गया था। लेकिन बेहद िाद्दी होने के सबब वह अड़ा रहा। और तब से हम एक दूसरे से दूर - दूर होते चले गए। लेकिन आज मैं यह सोचता हूँ कि सांसारिक समझौते से श्यादा विनाशक कोइर्चीश नहींμ खास तौर पर वहाँ, जहाँ किसी अच्छी महत्त्वपूणर् बात करने के मागर् में अपने या अपने जैसे लोग और पराए लोग आड़े आते हों। जितनी शबरदस्त उनकी बाधा होगी, उतनी ही कड़ी लड़ाइर् भी होगी, अथवा उतना ही निम्नतम समझौता होगा। इस भीषण संघषर् की हृदय भेदक प्रिया में से गुशरकर उस व्यक्ित का निजत्व वुफछ ऐंड़ा - वेंड़ा, वुफछ विचित्रा अवश्य हो गया था। ¯वफतु सबसे बड़ी बात यह थी कि उसकी बाशू सही थी। इसलिए वह असामान्य था। दूसरे शब्दों में, मैं सामान्य उसको समझता हूँ, जिसमें अपने भीतर के असामान्य के उग्र आदेश का पालन करने का मनोबल न हो। मैं अपने को ऐसा ही आदमी समझता हूँ। मैं मात्रा सामान्य हूँ ;मैं नामी - गिरामी हूँ, यह बात अलग हैद्ध। और चूँकि वह व्यक्ित हमेशा मेरे भीतर के असामान्य को उकसा देता था, इसीलिए अपने भीतर के उस उकसे हुए असामान्य की रोशनी में, मैं एक ओर स्वयं को हीन अनुभव करता, तो दूसरी ओर ठीक वही असामान्य मेरी कल्पना और भावना कोउत्तेजित करके मुझे, अपने से वृहत और व्यापक जो भी है, उसमें डुबो देताμ चाहे वह इंटीग्रल केलक्युलस हो, सुदूर नेब्यूला हो, या कोइर् ऐतिहासिक कांड हो, अथवा कोइर् दाशर्निक सि(ांत हो या विशाल सामाजिक लक्ष्य हो। इसलिए मैं अपने और अपने मित्रा के शरिए असामान्य के अंतःचरित्रा और सामान्य के दबाव को भली - भाँति जानता था। लेकिन मेरी गति और दृष्िट वुफछ और थी। जब मैं कोइर् काम करता, तो इसलिए कि उससे लोग खुश होते हैं। वह काम करता तो सिप़्ार्फ इसलिए कि एक बार कोइर् काम हाथ में लेने पर उसे अिाकारी ढंग से भली - भाँति कर ही डालना चाहिए। मेरी व्यावहारिक सामान्य बुि थी। उसकी कायर् - शक्ित, आत्मप्रकटीकरण की एक निद्व±द्व शैली। हम दोनों में दो ध्रुवों का भेद था। ¯शदगी में मैं सपफल हुआ, वह असपफल। प्रतिष्िठत, भद्र और यशस्वी मैं कहलाया। वह नामहीन और आकारहीन रह गया। लेकिन अपनी इस हालत की उसे कतइर् परवाह नहीं थी। इसका मुझे बहुत बुरालगता, क्योंकि वस्तुतः वह मेरी यशस्िवता को भी बड़ी सत्ता के रूप में स्वीकार न कर पाता। इतने वषो± बाद मेरी ¯शदगी में जब वह वापस आया, तो मुझे लगा कि यह उस उल्का पिंड की भाँति है जो सैकड़ों वषो± के अवकाश के बाद सूयर् के पास आकर एक चक्कर लगा लेता है, और पुनः अपने आकाशमागर् पर निकल जाता है। इस सुदूर यात्रा के उसके अनुभव की कीमत मैं जानता हूँ, भले ही किन्हीं अप्रत्याश्िात संघषोर्ं में टूट - पफूटकर, वह धूल बनता हुआ खरबों मील दूर के किसी अँधेरे शून्य में खो जाए। ¯वफतु आज उसने मुझसे कहा कि उसकी पूरी ¯शदगी भूल का एक नक्शा है। मैं उसके विषाद को समझ गया। वह ¯शदगी में छोटी - छोटी सपफलताएँ चाहता था। उसके पास तो सिप़्ार्फ एक भव्य असपफलता है ;यह मेरी टिप्पणी है, उसकी नहींद्ध मैंने सिपर्फ इतना ही जवाब दिया, फ्लेकिन नक्शा तो है! यहाँ तो न गलत का नक्शा ़है, न सही का!य् मैंने उसका दिल बँधाने की कोश्िाश की और मैं कर ही क्या सकता था! मनुष्य के लिए यह स्वाभाविक ही है कि वह थोड़ी - बहुत सांसारिक सपफलता की इच्छा रखे। किन्हीं असावधान क्षणों में ही, उसने मुझसे कहा कि वह स्वयं भूल का एक नक्शा है। वरना वह ऐसा नहीं कहता। लेकिन आज का शमाना वैफसा है, जबकि बुलबुल भी यह चाहती है कि वह उल्लू क्यों न हुइर्! चाँदनी में एक जादू होता है। लेकिन यह जादू अलग - अलग लोगों के लिए अलग - अलग है। न मालूम हमारी बात कहाँ से शुरू हुइर्। मैं डर - डरकर उससे बात करता जा रहा था। कहीं ऐसा न हो कि उसे जाने - अनजाने मुझसे कोइर् चोट पहुँचे क्योंकि उसने अपने विचारों के लिए खून बहाया है, ¯शदगी खत्म की है। इसीलिए मैं धीरे - धीरे उसकी बात सुनता जा रहा था। और जहाँ मतभेद व्यक्त करना हो वहाँमैं, अपनी आदत के अनुसार उत्तेजित होने के बजाय, मुसकराकर बात कह देता! मैंने उससे पूछा, फ्पिछले बीस वषो± की सबसे महान घटना कौन - सी है?य् एक मिनट तक उसने मेरी तरपफ देखा और पिफर छूटते ही कहा, फ्संयुक्त़परिवार का ”ास!य् मंै स्तब्ध हो गया। उसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखकर ख्िालख्िालाते हुए कहा, फ्और इस तथ्य का साहित्य से बहुत बड़ा संबंध है।य् चारों ओर चाँदनी की रहस्यमय मधुरता पैफली हुइर् थी। चारों ओर ठंडा एकांत पैफला हुआ था। मेरी अजीब मनोस्िथति हो गइर्। मैं अपने पड़ोसियों की ¯शदगियाँ ढँूढ़ने लगा, अपने परिचितों का जीवन तलाशने लगा। एक अनइच्िछत बेचैनी मुझमें पैफल गइर्। हाँ, यह सही है कि ¯शदगी और शमाना बदलता जा रहा था। ¯वफतु मैं परिवतर्न के परिणामों को देखने का आदी था, परिवतर्न की प्रिया को नहीं। एक बात कह दूँ μ आजकल की आवश्यकताओं के अनुसार मैं चित्राकला और नृत्यकला से लेकर मानववंश शास्त्रा तक, सबकी जानकारी रखता हूँ। इस संबंध में बहुतेरे दिलचस्प तथ्य मेरे दिलो दिमाग के पिछले पाॅकिट में रखे हुए हैं। इसलिए मुझसे कोइर् श्यादा गड़बड़ नहीं कर सकता। जब मेरे मित्रा ने एकदम संयुक्त परिवार की बात कही तो मैंने उसका इम्ितहान लेने की िाद करके उससे पूछा, फ्और इन वषो± में सबसे बड़ी भूल कौन सी हुइर्?य् एक मिनट के लिए वह चुप रहा, पिफर उसने जवाब दिया, फ्राजनीति के पास समाज - सुधार का कोइर् कायर्त्राफम न होना। साहित्य के पास सामाजिक सुधार का कोइर् कायर्क्रम न होना। सबने सोचा कि हम जनरल ;सामान्यद्ध बातें करके, सिपर्फ औऱएकमात्रा राजनीतिक या साहित्ियक आंदोलन के शरिए, वस्तुस्िथति में परिवतर्न कर सवेंफगे। पफलतः सामाजिक सुधार का कायर् केवल अप्रत्यक्ष प्रभावों को सौंप दिया गया...।य् फ्देखते नहीं हो, आशादी के मिलने के बाद जातिवाद का उदय क्यों हुआ - खासकर राजनीतिक संस्थाओं के भीतर!...सामाजिक सुधार का कायर् केवल अप्रत्यक्ष प्रभावों को सौंप देने के कारण ही साहित्य में भी गड़बड़ है।य् उसकी यह उक्ित मुझे बड़ी हास्यास्पद प्रतीत हुइर्। उसमें मुझे मूखर्ता के विशाल दृश्य दिखाइर् देने लगे। उसने अपनी बात को रबर μ जैसा तान दिया है μ ऐसा मुझे लगा। उसने अविश्वास से मेरी आँखों की तरपफ देखा। शायद यह सही है कि मैं उसे बेववूफप़्ाफ मान रहा हूँ। रात में, और वह भी चाँदनी रात में, सामने के सेमल के झाड़ पर बैठे हुए वुफछ कौवे चैंक पड़े। शायद किसी चमगादड़ ने वहाँ झपऋा मारा हो। वुफछ कौवे उड़े, पेड़ के आसपास वुफछ देर मँडराए और पिफर किसी डाल पर जाकर बैठ गए। लेकिन मेरा मित्रा तैश में था। उसने कहा, फ्समाज में वगर् हैं, श्रेण्िायाँ हैं। श्रेण्िायों में परिवार हंै। समाज की एक बुनियादी इकाइर् परिवार भी है। समाज की अच्छाइर् - बुराइर् परिवार के माध्यम से व्यक्त होती है। मनुष्य के चरित्रा का विकास परिवार में होता है। बच्चे पलते हैं, उन्हें सांस्वृफतिक श्िाक्षा मिलती है। वे अपनी सारी अच्छाइयाँ - बुराइयाँ वहाँ से लेते हैं। हमारे साहित्य तथा राजनीति के पास ऐसी कोइर् दृष्िट नहीं है जो परिवार को लागू हो...य् एक मिनट के लिए वह चुप रहा और पिफर आगे बढ़ता गया। फ्शमानेे के साथ, संयुक्त सामंती परिवार का ”ास हुआ। उन विचारों और संस्कारों के प्रति विद्रोह भी किया गया, जो सामंती परिवार में पाए जाते थे।य् फ्लेकिन उसके बाद क्या हुआ? लड़के बाहर राजनीति या साहित्य के मैदान में खेलते, और घर आकर वैसा ही सोचते या करते, जो सोचा या किया जाता रहा।समाज में, बाहर, पूँजी या धन की सत्ता से विद्रोह की बात की गइर्, लेकिन घर में नहीं। वह श्िाष्टता और शील के बाहर की बात थी। मतलब यह कि अन्यायपूणर् व्यवस्था को चुनौती घर में नहीं, घर के बाहर दी गइर्। घर का संघषर् कठिन था। उसमें भावनाओं की टकराहट उन्हीं से होती थी, जो अपने प्राण के अंश थे। इसीलिए न केवल उस संघषर् को टाल दिया गया, वरन एक अजीब ढंग का समझौता किया गया। यह हुआ! मैं कहता हूँ, यह हुआ! मानो इसे!य् मुझे लगा कि वह मुझे गाली दे रहा है! एक ठंडी लहर मेरे पूरे शरीर में दौड़ गइर्। पिफर भी चूँकि मुझे लगा कि उसकी बात अभी अधूरी ही है, इसलिए मैं चुप रहा। वह बोला, फ्इसलिए पुराने सामंती अवशेष बड़े मशे में हमारे परिवारों में पड़े हुए हैं। पुराने के प्रति और नए के प्रति इस प्रकार एक बहुत भयानक अवसरवादी दृष्िट अपनाइर् गइर् है। इसीलिए सिपर्फ एक सप्रश्नता है। प्रश्न है, वैज्ञानिक प(ति का़अवलंबन करके उत्तर खोज निकालने की न जल्दी है, न तबीयत है, न वुफछ। मैं मध्यवगीर्य श्िाक्ष्िात परिवारों की बात कर रहा हूँ।य् फ्जो पुराना है, अब वह लौटकर आ नहीं सकता। लेकिन नए ने पुराने का स्थान नहीं लिया। धमर् - भावना गइर्, लेकिन वैज्ञानिक बुि नहीं आइर्। धमर् ने हमारे जीवन के प्रत्येक पक्ष को अनुशासित किया था। वैज्ञानिक मानवीय दशर्न ने, वैज्ञानिक मानवीयदृष्िट ने, ध्मर् का स्थान नहीं लिया इसलिए केवल हम अपनी अंतःप्रवृिायों के यंत्रा से चालित हो उठे। उस व्यापक, उच्चतर, सवर्तोमुखी मानवीय अनुशासन की हादिर्क सिि के बिना हम ‘नया - नया’ चिल्ला तो उठे, लेकिन वह μ ‘नया’ क्या है μ हम नहीं जान सके! क्यों? मान - मूल्य, नया इंसान परिभाषाहीन और निराकार हो गए। वेदृढ़ और नया जीवन, नए व्यापक मानसिक सत्ता के अनुशासन का रूप धारण न कर सके। वे धमर् और दशर्न का स्थान न ले सके।य् से स्पष्ट कीजिए। 3.‘अभ्िाधाथर् एक होते हुए भी ध्वन्याथर् और व्यंग्याथर् अलग - अलग हो जाते हैं।’ दूरियों के संदभर् में इसका आशय स्पष्ट कीजिए। 4.सामान्य - असामान्य तथा साधारण - असाधारण के अंतर को व्यक्ित और लेखक के माध्यम से स्पष्ट कीजिए। 5.‘उसकी पूरी ¯शदगी भूल का एक नक्शा है।’ इस कथन द्वारा लेखक व्यक्ित के बारे में क्या कहना चाहता है? 6.पिछले बीस वषो± की सबसे महान घटना संयुक्त परिवार का ”ास है μ क्यों और वैफसे? 7.इन वषो± में सबसे बड़ी भूल है, ‘राजनीति के पास समाज - सुधार का कोइर् कायर्क्रम न होना’ μ इस संदभर् में आप अपने विचार लिख्िाए। 8.‘अन्यायपूणर् व्यवस्था को चुनौती घर में नहीं, घर के बाहर दी गइर्।’ μ इससे लेखक का क्या अभ्िाप्राय है? 9.‘जो पुराना है, अब वह लौटकर आ नहीं सकता। लेकिन नए ने पुराने का स्थान नहीं लिया।’ इस नए और पुराने के अंतद्व±द्व को स्पष्ट कीजिए। 10.निम्नलिख्िात गद्यांशों की व्याख्या कीजिएμ ;कद्ध इस भीषण संघषर् की हृदय भेदक.............इसलिए वह असामान्य था। ;खद्ध लड़के बाहर राजनीति या साहित्य के मैदान में घर के बाहर दी गइर्। ;गद्ध इसलिए पुराने सामंती अवशेष बड़े मशेश्िाक्ष्िात परिवारों की बात कर रहा हँू। ;घद्ध मान - मूल्य, नया इंसान.............वे धमर् और दशर्न का स्थान न ले सके। 11.निम्नलिख्िात पंक्ितयों का आशय स्पष्ट कीजिएμ ;कद्ध सांसारिक समझौते से श्यादा विनाशक कोइर् चीश नहीं। ;खद्ध बुलबुल भी यह चाहती है कि वह उल्लू क्यों न हुइर्! ;गद्ध मैं परिवतर्न के परिणामों को देखने का आदी था, परिवतर्न की प्रिया को नहीं। ;घद्ध जो पुराना है, अब वह लौटकर आ नहीं सकता। योग्यता - विस्तार 1.‘विकास की ओर बढ़ते चरण और बिखरते मानव - मूल्य’ विषय पर कक्षा में परिचचार् कीजिए। 2.‘आधुनिकता की इस दौड़ में हमने क्या खोया है और क्या पाया है?’ μ अपने विद्यालय की पत्रिाका के लिए इस विषय पर अध्यापकों का साक्षात्कार लीजिए। 3.‘सौंदयर् में रहस्य न हो तो वह एक खूबसूरत चैखटा है।’ लेखक के इस वाक्य को वेंफद्र - जकड़ - मस्ितष्क की श्िाराएँ μ ऐसी कल्पना जिनमें प्रेम और रोमांच हो - अंग्रेशी कवि शैले की रचना स्क्वेअर रूट आॅप़्ाफ माइनस वन - गण्िात का एक सूत्रा अभ्िाधाथर् - शब्द का सामान्य अथर्, तीन शब्द शक्ितयों’में से एक का बोध करानेवाली ’शब्द शक्ितयाँ अभ्िाधा - शब्दों की वह शक्ित जिससे उनके नियत अथर् ही निकलते हैं। कोइर् शब्द सुनते ही उसकेअथर् का जो बोध होता है वह इसी शक्ित के द्वारा होता है। इसे वाच्याथर् भी कहते हैं।लक्षणा - शब्द की वह शक्ित जो मुख्य अथर् के बाध्ित होने पर किसी विशेष प्रायोजन के लिएमुख्य अथर् से संब( किसी लक्ष्याथर् का बोध कराती है।व्यंजना - शब्द की वह शक्ित जिससे वाच्याथर् और लक्ष्याथर् ;अथार्त अभ्िाधा और लक्षणा - शक्ितसे निकलने वाले अथो±द्ध के अतिरिक्त ध्वनि के रूप में कुछ विशेष अथर् निकलता है। ध्वन्याथर् - वह अथर् जिसका बोध व्यंजना शब्द शक्ित से होता है व्यंग्याथर् - किसी शब्द या वाक्य का उसके साधारण अथर् से भ्िान्न, वह अथर् जो उसकी व्यंजना शक्ित से निकलता है, जैसे यदि हम किसी से व्यंग्यपूवर्क कहें - आपनेहम पर बहुत कृपा की, तो इसका व्यंग्याथर् होगा कि आपने हमारे साथ बहुत अनुचित व्यवहार किया। आच्छन्न - छिपा हुआ, ढँका हुआ हृदयभेदक प्रिया - हृदय को भीतर तक प्रभावित करनेवाली िया निजत्व - स्वयं का, अपनी विशेषता ऐंड़ा - वेंड़ा - टेढ़ा - मेढ़ा इंटीग्रल ;अंगे्रशी शब्दद्ध - अभ्िान्न आत्मप्रकटीकरण - अपने मन की वास्तविकता प्रकट करना, मन की बात कहना यशस्िवता - प्रतिष्ठा, अत्यिाक यश, प्रसिि उल्कापिंड - ऐसे पत्थरनुमा टुकड़े जो अंतरिक्ष से पृथ्वी के वायुुमंडल में प्रवेश करते हैं अप्रत्याश्िात - अनसोचा, जिसकी आशा न हो, उम्मीद न हो खरब - भारतीय गणना में सौ अरब की संख्या वस्तुस्िथति - वास्तविक स्िथति सप्रश्नता - प्रश्न के साथ, जिसके साथ प्रश्न जुड़ा हुआ हो सवर्तोमुखी - सभी ओर से, सभी दिशाओं में

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