ओमप्रकाश वाल्मीकिओमप्रकाश वाल्मीकि का जन्म बरला, िाला मुशफ्ऱपफरनगर,़उत्तर प्रदेश में हुआ। उनका बचपन सामाजिक एवं आ£थक कठिनाइयों में बीता। पढ़ाइर् के दौरान उन्हें अनेक आ£थक, सामाजिक और मानसिक कष्ट झेलने पडे़। वाल्मीकि जी वुफछ समय तक महाराष्ट्र में रहे। वहाँ वे दलित लेखकों के संपवर्फ मंे आए और उनकी प्रेरणा से डाॅ. भीमराव अंबेडकर की रचनाओं का अध्ययन किया। इससे उनकी रचना - दृष्िट में बुनियादी परिवतर्न हुआ। आजकल वे देहरादून स्िथत आप्टो इलैक्ट्राॅनिक्स पैफक्टरी़;आॅ£डनेंस प़्ौफक्ट्रीश, भारत सरकारद्ध में एक अिाकारी के रूप में कायर्रत हैं। ¯हदी में दलित साहित्य के विकास में ओमप्रकाश वाल्मीकिकी महत्त्वपूणर् भूमिका है। उन्होंने अपने लेखन में जातीय अपमान और उत्पीड़न का जीवंत वणर्न किया है और भारतीय समाज के कइर् अनछुए पहलुओं को पाठक के समक्ष प्रस्तुत किया है। वे मानते हैं कि दलित ही दलित की पीड़ा को बेहतर ढंग से समझ सकता है और वही उस अनुभव की प्रामाण्िाक अभ्िाव्यक्ित कर सकता है। उन्होंने सृजनात्मक साहित्य के साथ - साथ आलोचनात्मक लेखन भी किया है। उनकी भाषा सहज, तथ्यपरक और आवेगमयी है। उसमें व्यंग्य का गहरा पुट भी दिखता है। नाटकों के अभ्िानय और निदेर्शन में भी उनकी रफचि है। अपनी आत्मकथा जूठन के कारण उन्हें ¯हदी साहित्य में पहचान और प्रतिष्ठा मिली। उन्हें सन् 1993 में डाॅ. अंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार और सन् 1995 में परिवेश सम्मान से अलंकृत किया जा चुका है। जूठन के अंग्रेशी संस्करण को न्यू इंडिया बुक पुरस्कार, 2004 प्रदान किया गया। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं μ सदियों का संताप, बस! बहुत हो चुका ;कविता संग्रहद्धऋ सलाम, घुसपैठिये ;कहानी संग्रहद्ध, दलित साहित्य का सौंदयर्शास्त्रा तथा जूठन ;आत्मकथाद्ध। पाठ्यपुस्तक में संकलित कहानी खानाबदोश में मशदूरी करके किसी तरह गुशर - बसर कर रहे मशदूर वगर् के शोषण और यातना को चित्रिात किया गया है। मशदूर वगर् यदि इर्मानदारी से मेहनत - मशदूरी करके इश्शत के साथ जीवन जीना चाहता है, तो सूबे स्िंाह जैसे समृ( और ताकतवर लोग उन्हें जीने नहीं देते। कहानी इस बात की ओर भी संकेत करती है कि मशदूर वगर् हमारे समाज की जातिवादी मानसिकता से नहीं उबर पाया है। कहानी में वास्तविकता उत्पन्न करने में इसके स्थानीय संवाद सहायक बने हैं। सुकिया के हाथ की पथी कच्ची ईंटें पकने के लिए भऋे में लगाइर् जा रही थीं। भऋेेे के गलियारे में झरोखेदार कच्ची ईंटों की दीवार देखकर सुकिया आत्िमक सुख से भर गया था। देखते - ही - देखते हशारों ईंटें भऋे के गलियारे में समा गइर् थीं। ईंटों के बीच खाली जगह में पत्थर का कोयला, लकड़ी, बुरादा, गन्ने की बाली भर दिए गए थे। असगर ठेकेदार ने अपनी निगरानी में हर चीश तरतीब से लगवाइर् थी। आग लगाने से पहले भऋा - मालिक मुखतार स्िंाह ने एक - एक चीश का मुआयना किया था। चैबीसों घंटे की ड्यूटी पर मशदूरों को लगाया गया था, जो मोरियों से भऋेेे में कोयला, बुरादा आदि डाल रहे थे। भऋे का सबसे खतरेवाला काम था मोरी पर काम करना। थोड़ी - सी असावधानी भी मौत का कारण बन सकती थी। भऋे की चिमनी धुआँ उगलने लगी थी। यह धुआँ मीलों दूर से दिखाइर् पड़ जाता था। हरे - भरे खेतों के बीच गहरे मटमैले रंग का यह भऋा एक धब्बे जैसा दिखाइर् पड़ता था। मानो और सुकिया महीनाभर पहले ही इस भऋे पर आए थे, दिहाड़ी मशदूरबनकर। हफ्ऱतेभर का काम देखकर असगर ठेकेदार ने सुकिया से कहा था कि साँचा ले लो और ईंट पाथने का काम शुरू करो। हशार ईंर्ट के रेट से अपनी मशदूरी लो। भऋे पर लगभग तीस मशदूर थे जो वहीं काम करते थे। भऋा - मालिक मुखतार स्िंाह और असगर ठेकेदार साँझ होते ही शहर लौट जाते थे। शहर से दूर, दिनभर की गहमा - गहमी के बाद यह भऋा अँधेरे की गोद में समा जाता था। एक कतार में बनी छोटी - छोटी झोंपडि़यों में टिमटिमाती ढिबरियाँ भी इस अँधेरे से लड़ नहीं पाती थीं। दड़बेनुमा झोंपडि़यों में झुककर घुसना पड़ता था। झुके - झुके ही बाहर आना होता था। भऋे का काम खत्म होते ही औरतें चूल्हा - चैका सँभाल लेती थीं। कहने भर के लिए चूल्हा - चैका था। ईंटों को जोड़कर बनाए चूल्हे में जलती लकडि़यों की चिट - पिट जैसे मन में पसरी दुश्िंचताओं और तकलीप़्ाफों की प्रतिध्वनियाँ थीं जहाँ सब वुफछ अनिश्िचत था। मानो अभी तक इस भऋे की ¯शदगी से तालमेल नहीं बैठा पाइर् थी। बस, सुकिया की िाद के सामने वह कमशोर पड़ गइर् थी। साँझ होते ही सारा माहौल भाँय - भाँय करने लगता था। दिनभर के थके - हारे मशदूर अपने - अपने दड़बों में घुस जाते थे। साँप - बिच्छू का डर लगा रहता था। जैसे समूचा जंगल झोंपड़ी के दरवाशे पर आकर खड़ा हो गया है। ऐसे माहौल में मानो का जी घबराने लगता था। लेकिन करे भी तो क्या, न जाने कितनी बार सुकिया से कहा था मानो ने, फ्अपने देस की सूखी रोटी भी परदेस के पकवानों से अच्छी होती है।य् सुकिया के मन में एक बात बैठ गइर् थी। नवर्फ की ¯शदगी से निकलना है तो वुफछ छोड़ना भी पड़ेगा। मानो की हर बात का एक ही जवाब था उसके पास बडे़ - बूढे़ कहा करे हैं कि आदमी की औकात घर से बाहर कदम रखणंे पे ही पता चले है। घर में तो चूहा भी सूरमा बणा रह। काँधे पर यो लंबा लऋ धरके चलणें वाले चैधरी सहर ;शहरद्ध में सरकारी अप़्ाफसरों के आग्गे सीध्धे खडे़ न हो सके हैं। बुइी बकरियों की तरह मिमियाएँ हैं...और गाँव में किसी गरीब वूफ आदमी भी न समझे हैं...’ सुकिया की इन बातों से मानो कमशोर पड़ जाती थी। इसीलिए गाँव - देहात छोड़कर वे दोनों एक दिन असगर ठेकेदार के साथ इस भऋे पर आ गए थे। पहले ही महीने में सुकिया ने वुफछ रफपये बचा लिए थे। कइर् - कइर् बार गिनकर तसल्ली कर ली थी। धोती की गाँठ में बाँधकर अंटी में खोंस लिए थे। रफपए देखकर मानो भी खुश हो गइर् थी। उसे लगने लगा था कि वह अपनी ¯शदगी के ढरेर् को बदल लेगा। सुकिया और मानो की ¯शदगी एक निश्िचत ढरेर् पर चलने लगी थी। दोनों मिलकर पहलेे तगारी बनाते, पिफर मानो तैयार मि‘ी लाकर देती। इस काम में उनके साथ एक तीसरा मशदूर भी आ गया था। नाम था जसदेव। छोटी उम्र का लड़का था। असगर ठेकेदार ने उसे भी उनके साथ काम पर लगा दिया था। इससे काम में गति आ गइर् थी। मानो भी अब पुफतीर् से साँचे में ईंटें डालने लगी थी, जिससे उनकी दिहाड़ी बढ़ गइर् थी। उस रोश मालिक मुखतार स्िंाह की जगह उनका बेटा सूबेस्िंाह भऋे पर आया था। मालिक वुफछ दिनों के लिए कहीं बाहर चले गए थे। उनकी गैरहािारी में सूबेस्िंाह का रौब - दाब भऋे का माहौल ही बदल देता था। इन दिनों में असगर ठेकेदार भीगीबिल्ली बन जाता था। दफ्ऱतर के बाहर एक अदर्ली की ड्यूटी लग जाती थी, जो वुफसीर् पर उकडन्ऩ् बैठकर दिनभर बीड़ी पीता था, आने - जानेवालों पर निगरानी रखता था। उसकी इजाशत के बगैर कोइर् अंदर नहीं जा सकता था। एक रोश सूबेस्िंाह की नशर किसनी पर पड़ गइर्। तीन महीने पहले ही किसनी और महेश भऋे पर आए थे। पाँच - छः महीने पहले ही दोनों की शादी हुइर् थी।सूबेस्िंाह ने उसे दफ्ऱतर की सेवा - टहल का काम दे दिया था। शुरू - शुरू में किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया था। लेकिन जब रोश ही गारे - मि‘ी का काम छोड़कर वह दफ्ऱतर में ही रहने लगी तो मशदूरों में पुफसपुफसाहटें शुरू हो गइर् थीं। तीसरे दिन सुबह जब मशदूर काम शुरू करने के लिए झोंपडि़यों से बाहर निकल रहे थे, किसनी हैंडपंप के नीचे खुले में बैठकर साबुन से रगड़ - रगड़कर नहा रही थी। भऋे पर साबुन किसी के पास नहीं था। साबुन और उससे उठते झाग पर सबकी नशर पड़ गइर् थी। लेकिन बोला कोइर् वुफछ भी नहीं था। सभी की आँखों में शंकाओं के गहरे काले बादल घ्िार आए थे। कानापूफसी हलके - हलके शुरू हो गइर् थी। महेश गुमसुम - सा अलग - अलग रहने लगा था। साँवले रंग की भरे - पूरे जिस्मकी किसनी का व्यवहार महेश के लिए दुःखदाइर् हो रहा था। वह दिन - भर दफ्ऱतरमें घुसी रहती थी। उसकी ख्िालख्िालाहटें दफ्ऱतर से बाहर तक सुनाइर् पड़ने लगी थीं। महेश ने उसे समझाने की कोश्िाश की थी। लेकिन वह जिस राह पर चल पड़ी थी वहाँ से लौटना मुश्िकल था। भऋे की ¯शदगी भी अजीब थी। गाँव - बस्ती का माहौल बन रहा था। झोंपड़ी के बाहर जलते चूल्हे और पकते खाने की महक से भऋे की नीरस ¯शदगी में वुफछ देर के लिए ही सही, ताशगी का अहसास होता था। श्यादातर लोग रोटी के साथ गुड़ या पिफर लाल मिचर् की चटनी ही खाते थे। दाल - सब्शी तो कभी - कभार ही बनती थी। शाम होते ही हैंडपंप पर भीड़ लग जाती थी। जिस्म पर चिपकी मि‘ी को जितना उतारने की कोश्िाश करते, वह और उतना ही भीतर उतर जाती थी। नस - नस में कच्ची मि‘ी की महक बस गइर् थी। इस महक से अलग भऋे का कोइर् अस्ितत्व नहीं था। किसनी और सूबेस्िंाह की कहानी अब काप़्ाफी आगे बढ़ गइर् थी। सूबेस्िंाह के अदर्ली ने महेश को शराब की लत डाल दी थी। शराब पीकर महेश झोंपड़ी में पड़ा रहता था। किसनी के पास एक ट्रांजिस्टर भी आ गया था। सुबह - शाम भऋे की खामोशी में ट्रांजिस्टर की आवाश गूँजने लगी थी। ट्रांजिस्टर वह इतने शोर से बजाती थी कि भऋे का वातावरण प्ि़ाफल्मी गानों की आवाश से गमक उठता था। शांत माहौल में संगीत - लहरियों ने खनक पैदा कर दी थी। कड़ी मेहनत और दिन - रात भऋे में जलती आग के बाद जब भऋा खुलता था तो मशदूर से लेकर मालिक तक की बेचैन साँसों को राहत मिलती थी। भऋे से पकी ईंटों को बाहर निकालने का काम शुरू हो गया था। लाल - लाल पक्की ईंटों को देखकर सुकिया और मानो की खुशी की इंतहा नहीं थी। खासकर मानो तो ईंटों को उलट - पुलटकर देख रही थी। खुद के हाथ की पथी ईंटों का रंग ही बदल गया था। उस दिन ईंटों को देखते - देखते ही मानो के मन में बिजली की तरह एक खयाल कौंधा था। इस खयाल के आते ही उसके भीतर जैसे एक साथ कइर् - कइर् भऋे जल रहे थे। उसने सुकिया से पूछा था, फ्एक घर में कितनी ईंटें लग जाती हैं?य् फ्बहुत...कइर् हशार...लोहा, सीमेंट, लकड़ी, रेत अलग से।य् उसके मन में खयाल उभरा था। उसे तत्काल कोइर् आधार नहीं मिल पा रहा था। वह बेचैन हो उठी थी। उसे खामोश देखकर सुकिया ने कहा, फ्चलो, काम शुरू करना है। जसदेव बाट देख रहा होगा।य् सुकिया के पीछे - पीछे अनमनी ही चल दी थी मानो, लेकिन उसके दिलो - दिमाग पर ईंटों का लाल रंग वुफछ ऐसे छा गया था कि वह उसी में उलझकर रह गइर् थी। झींगुरों की झिन - झिन और बीच - बीच में सियारों की आवाशें रात के सन्नाटे में स्याहपन घोल रही थीं। थके - हारे मशदूर नींद की गहरी खाइयों में लुढ़क गए थे। मानो के खयालों में अभी भी लाल - लाल ईंटें घूम रही थीं। इन ईंटों से बना हुआ एक छोटा - सा घर उसके शेहन में बस गया था। यह खयाल जिस श्िाद्दत से पुख्ता हुआ था, नींद उतनी ही दूर चली गइर् थी। दूर किसी बस्ती से हलके - हलके छनकर आती मुगेर् की बाँग, रात के आख्िारी पहर के अहसास के साथ ही मानो की पलवेंफ नींद से भारी होने लगी थीं। सुबह के शरूरी कामों से निबटकर जब सुकिया ने झोंपड़ी में झाँका तो वह हैरान रह गया था। इतनी देर तक मानो कभी नहीं सोती। वह परेशान हो गया था। गहरी नींद में सोइर् मानो का माथा उसने छूकर देखा, माथा ठंडा था। उसने राहत की साँस ली। मानो को जगाया, फ्इतना दिन चढ़ गया है....उठने का मन नहीं है?य् मानो अनमनी - सी उठी। वुफछ देर यूँ ही चुपचाप बैठी रही। मानो का इस तरह बैठना सुकिया को अखरने लगा था, फ्आज क्या बात है?...जी तो ठीक है?य् मानो अपने खयालों में गुम थी। मन की बात बाहर आने के लिए छटपटा रही थी। उसने सुकिया की ओर देखते हुए पूछा, फ्क्यों जी...क्या हम इन पक्की ईंटों पर घर नहीं बणा सके हैं?य् मानो की बात सुनकर सुकिया आश्चयर् से उसे ताकने लगा। कल की बात वह भूल चुका था। सुकिया ने गहरे अवसाद से भरकर कहा, फ्पक्की ईंटों का घरदो - चार रफपए में ना बणता है।...इत्ते ढेर - से नोट लगे हैं घर बणाने में। गाँठ में नहीं है पैसा, चले हाथी खरीदने।य्फ्महीनेभर में जो हमने इत्ती ईंटें बणा दी हैं...क्या अपणे लिए हम ईंटें ना बणा सके हैं।य् मानो ने मासूमियत से कहा। फ्यह भऋा मालिक का है। हम ईंटें उनके लिए बणाते हैं। हम तो मशदूर हैं। इन ईंटों पर अपणा कोइर् हक ना है।य् सुकिया ने अपने मन में उठते दबाव को महसूस किया। फ्इन ईंटों पर म्हारा कोइर् भी हक ना है...क्यूँ...य्, मानो ने ताज्जुब भरी कड़˜वाहट से कहा। उसके अंदर बवंडर मचल रहा था। वुफछ देर की खामोशी के बाद मानो बोली, फ्हर महीने वुफछ और बचत करें...श्यादा ईंटें बनाएँ...तब?... तब भी अपणा घर नहीं बणा सकते?य् अपने भीतर वुफलबुलाते सवालों को बाहर लाना चाहती थी मानो। फ्इतनी मशदूरी मिलती कहाँ है? पूरे महीने हाड़ - गोड़ तोड़ के भी कितने रफपए बचे! वुफल अस्सी। एक साल में एक हशार ईंटों के दाम अगर हमने बचा भी लिए तो घर बणाने लायक रफपया जोड़ते - जोड़ते उम्र निकल जागी। पेफर भी घर ना बण पावेगा।य् सुकिया ने दुखी मन से कहा। फ्अगर हम रात - दिन काम करें तो भी नहीं?य् मानो ने उत्साह में भरकर कहा। फ्बावली हो गइर् है क्या?...चल उठ...चल, काम पे जाणा है। टेम श्यादा हो रहा है। ठेकेदार आता ही होगा। आज पूरब की टाँग काटनी है लगार के लिए।य् सुकिया मानो के सवालों से घबरा गया था। उठकर बाहर जाने लगा। फ्वुफछ भी करो...तुम चाहो तो मैं रात - दिन काम करूँगी...मुझे एक पक्की ईंटों का घर चाहिए। अपने गाँव में...लाल - सुखर् ईंटों का घर।य् मानो के भीतर मन में हशार - हशार वसंत ख्िाल उठे थे। सुकिया और मानो को एक लक्ष्य मिल गया था। पक्की ईंटों का घर बनाना है...अपने ही हाथ की पकी ईंटों से। सुबह होते ही काम पर लग जाते हैं और शाम को भी अँधेरा होने तक जुटे रहते हैं। ठेकेदार असगर से लेकर मालिक तक उनके काम से खुश थे। सूबेस्िंाह किसनी को शहर भी लेकर जाने लगा था। किसनी के रंग - ढंग में बदलाव आ गया था। अब वह भऋे पर गारे - मि‘ी का काम नहीं करती थी। महेश रोश रात में शराब पीकर मन की भड़ास निकालता था। दिन में भी अपनी झोंपड़ी में पड़ा रहता था या इधर - उधर बैठा रहता था। किसनी कइर् - कइर् दिनों तक शहरसे लौटती नहीं थी। जब लौटती μ थकी, निढाल और मुरझाइर् हुइर्। कपड़ों - लत्तों की अब कमी नहीं थी। उस रोश सूबेस्िंाह ने भऋे पर आते ही असगर ठेकेदार से कहा था, फ्मानो कोदफ्ऱतर में बुलाओ, आज किसनी की तबीयत ठीक नहीं है।य् असगर ठेकेदार ने रोकना चाहा था, फ्छोटे बाबू मानो को...य् बात पूरी होने से पहले ही सूबेस्िंाह ने उसे पफटकार दिया था, फ्तुमसे जो कहा गया है, वही करो। राय देने की कोश्िाश मत करो। तुम इस भऋे पर मुंशी हो। मुंशी ही रहो, मालिक बनने की कोश्िाश करोगे तो अंजाम बुरा होगा।य् असगर ठेकेदार की घ्िाघ्घी बँध गइर् थी। वह चुपचाप मानो को बुलाने चल दिया था।असगर ठेकेदार ने आवाश देकर कहा था, फ्मानो, छोटे बाबू बुला रहे हैं दफ्ऱतर में।य् मानो ने सुकिया की ओर देखा। उसकी आँखों में भय से उत्पन्न कातरता थी। सुकिया भी इस बुलावे पर हड़बड़ा गया था। वह जानता था। मछली को पफँसाने के लिए जाल पंेफका जा रहा है। गुस्से और आक्रोश से नसें ख्िंाचने लगी थीं। जसदेव ने भी सुकिया की मनःस्िथति को भाँप लिया था। वह पुफतीर् से उठा। हाथ - पाँव पर लगी गीली मि‘ी छुड़ाते हुए बोला, फ्तुम यहीं ठहरो...मैं देखता हूँ। चलो चाचा।य् असगर के पीछे - पीछे चल दिया। असगर ठेकेदार जानता था कि सूबेस्िंाह शैतान है। लेकिन चुप रहना उसकी मजबूरी बन गइर् थी। ¯शदगी का खास हिस्सा उसने भऋे पर गुशारा था। भऋे से अलग उसका कोइर् वजूद ही नहीं था। असगर ठेकेदार के साथ जसदेव को आता देखकर सूबेस्िंाह बिपफर पड़ा था। फ्तुझे किसने बुलाया है?य् फ्जी...जो भी काम हो बताइए...मैं कर दूँगा।...य् जसदेव ने विनम्रता से कहा। फ्क्यों? तू उसका खसम है...या उसकी ;...पर चबीर् चढ़ गइर् हैद्ध।य् सूबेस्िंाह ने अपशब्दों का इस्तेमाल किया। फ्बाबू जी...आप किस तरह बोल रहे हैं...य् जसदेव के बात पूरी करने से पहले ही एक झन्नाटेदार थप्पड़ उसके गाल पर पड़ा। फ्साले...भऋे की आग में झोंक दूँगा...किसी को पता भी नहीं चलेगा। हंियाँ तक नहीं मिलेंगी राख से... समझा।य् सूबेस्िंाह ने उसे धकिया दिया। जसदेव गिर पड़ा था। जब तक वह सँभल पाता। लात - घँूसो से सूबेस्िंाह ने उसे अधमरा कर दिया था। चीख - पुकार सुनकर मशदूर उनकी ओर दौड़ पड़े थे। मशदूरों को एक साथ आता देखकर सूबेस्िंाह जीप में बैठ गया था। देखते - ही - देखते जीप शहर की ओर दौड़ गइर्थी। असगर ठेकेदार दफ्ऱतर में जा घुसा था। सुकिया और मानो जसदेव को उठाकर झांेपड़ी मंे ले गए थे। वह ददर् से कराह रहा था। मानो ने उसकी चोटों पर हल्दी लगा दी थी। सुकिया गुस्से में काँप रहा था। मानो के अवचेतन में असंख्य अँधेरे नाच रहे थे। वह किसनी नहीं बनना चाहती थी। इश्शत की ¯शदगी जीने की अदम्य लालसा उसमें भरी हुइर् थी। उसे एक घर चाहिए था μ पक्की ईंटों का, जहाँ वह अपनी गृहस्थी और परिवार के सपने देखती थी। समूचा दिन अदृश्य भय और दहशत में बीता था। जसदेव को हलका बुखार हो गया था। वह अपनी झोंपड़ी में पड़ा था। सुकिया उसके पास बैठा था। आज की घटना से मशदूर डर गए थे। उन्हें लग रहा था कि सूबेस्िंाह किसी भी वक्त लौटकर आ सकता है। शाम होते ही भऋे पर सन्नाटा छा गया था। सब अपने - अपने खोल में सिमट गए थे। बूढ़ा बिलसिया जो अकसर बाहर पेड़ के नीचे देर रात तक बैठा रहता था, आज शाम होते ही अपनी झोंपड़ी में जाकर लेट गया था। उसके खाँसने की आवाश भी आज वुफछ धीमी हो गइर् थी। किसनी की झोंपड़ी से ट्रांिास्टर की आवाश भी नहीं आ रही थी। बीच - बीच में हैंडपंप की खंच - खंच ध्वनि इस खामोशी में विघ्न डाल रही थी। पंप जसदेव की झोंपड़ी के ठीक सामने था। सभी को पानी के लिए इस पंप पर आना पड़ता था। भऋे पर दवा - दारू का कोइर् इंतशाम नहीं था। कटने - पफटने पर घाव पर मि‘ी लगा देना था। कपड़ा जलाकर राख भर देना ही दवाइर् की जगह काम आते थे। मानो ने अधूरे मन से चूल्हा जलाया था। रोटियाँ सेंककर सुकिया के सामने रख दी थी। सुकिया ने भी अनिच्छा से एक रोटी हलक के नीचे उतारी थी। उसकी भूख जैसे अचानक मर गइर् थी। मानो को लेकर उसकी ¯चता बढ़ गइर् थी। उसने निश्चय कर लिया था वह मानो को किसनी नहीं बनने देगा। मानो भी गुमसुम अपने आपसे ही लड़ रही थी। बार - बार उसे लग रहा था कि वह सुरक्ष्िात नहीं है। एक सवाल उसे खाए जा रहा थाμ क्या औरत होने की यही सशा है। वह जानती थी कि सुकिया ऐसा - वैसा वुफछ नहीं होने देगा। वह महेश की तरह नहीं है। भले ही यह भऋा छोड़ना पडे़। भऋा छोड़ने के खयाल से ही वह सिहर उठी। नहीं...भऋा नहीं छोड़ना है। उसने अपने आपको आश्वस्त किया, अभी तो पक्की ईंटों का घर बनाना है। मानो रोटियाँ लेकर बाहर जाने लगी तो सुकिया ने टोका, फ्कहाँ जा रही है?य् फ्जसदेव भूखा - प्यासा पड़ा है। उसे रो‘ी देणे जा रही हूँ।य् मानो ने सहज भाव से कहा। बामन तेरे हाथ की रो‘ी खावेगा।...अक्ल मारी गइर् तेरी,य् सुकिया ने उसे रोकना चाहा। फ्क्यों मेरे हाथ की रो‘ी में शहर लगा है?य् मानो ने सवाल किया। पल - भर रफककर बोली, फ्बामन नहीं भऋा मशदूर है वह...म्हारे जैसा।य् चारों तरप़्ाफ सन्नाटा था। जसदेव की झोंपड़ी में ढिबरी जल रही थी। मानो ने झोंपड़ी का दरवाशा ठेला फ्जी वैफसा है?य् भीतर जाते हुए मानो ने पूछा। जसदेव ने उठने की कोश्िाश की। उसके मुँह से ददर् की आह निकली। फ्कमबख्त कीड़े पड़के मरेगा। हाथ - पाँव टूट - टूटकर गिरेंगे...आदमी नहीं जंगली जिनावर है।य् मानो ने सूबेस्िंाह को कोसते हुए कहा। जसदेव चुपचाप उसे देख रहा था। फ्यह ले...रो‘ी खा ले। सुबे से भूखा है। दो कौर पेट में जाएँगे तो ताकत तो आवेगी बदन में,य् मानो ने रोटी और गुड़ उसके आगे रख दिया था। जसदेव वुफछ अनमना - सा हो गया था। भूख तो उसे लगी थी। लेकिन मन के भीतर कहीं हिचक थी। घर - परिवार से बाहर निकले श्यादा समय नहीं हुआ था। खुद वह वुफछ भी बना नहीं पाया था। शरीर का पोर - पोर टूट रहा था। फ्भूख नहीं है।य् जसदेव ने बहाना किया। फ्भूख नहीं है या कोइर् और बात है...य् मानो ने जैसे उसे रंगे हाथों पकड़ लिया था। फ्और क्या बात हो सकती है?...य् जसदेव ने सवाल किया। फ्तुम्हारे भइया कह रहे थे कि तुम बामन हो...इसीलिए मेरे हाथ की रोटी नहीं खाओगे। अगर यो बात है तो मैं शोर ना डालूँगी...थारी मजीर्...औरत हूँ...पास में कोइर् भूखा हो...तो रोटी का कौर गले से नीचे नहीं उतरता है।...पिफर तुम तो दिन - रात साथ काम करते हो..., मेरी खातिर पिटे...पिफर यह बामन म्हारे बीच कहाँ से आ गया...?य् मानो रफआँसी हो गइर् थी। उसका गला रफँध गया था। रोटी लेकर वापस लौटने के लिए मुड़ी। जसदेव में साहस नहीं था उसे रोक लेने के लिए। उनके बीच जुड़े तमाम सूत्रा जैसे अचानक बिखर गए थे। अपनी झोंपड़ी मंे आकर चुपचाप लेट गइर् थी मानो। बिना वुफछ खाए। दिन - भर की घटनाएँ उसके दिमाग में खलबली मचा रही थीं। जसदेव भूखा है, यह अहसास उसे परेशान कर रहा था। जसदेव को लेकर उसके मन में हलचल थी। उसे लग रहा थाμ जैसे जसदेव का साथ उन्हें ताकत दे रहा है। ऐसी ताकत जो सूबेस्िंाह से लड़ने में हौसला दे सकती है। दो से तीन होने का सुख मानो महसूस करने लगी थी। सुकिया भी चुपचाप लेटा हुआ था। उसकी भी नींद उड़ चुकी थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था, क्या करे, इन्हीं हालात में गाँव छोड़ा था। वे ही पिफर सामने खड़े थे। आख्िार जाएँ तो कहाँ? सूबेस्िंाह से पार पाना आसान नहीं था। सुनसान जगह है कभी भी हमला कर सकता है। या पिफर मानो को...विचार आते ही वह काँप गया था। उसने करवट बदली। मानो जाग रही थी। उसे अपनी ओर खींचकर सीने से चिपटा लिया था। जसदेव ने भी पूरी रात जागकर काटी थी। सूबेस्िंाह का गुस्सैल चेहरा बार - बार सामने आकर दहशत पैदा कर रहा था। उसे लगने लगा था कि जैसे वह अचानक किसी षड्यंत्रा में पफँस गया है। उसे यह अंदाशा नहीं था कि सूबेस्िंाह मारपीट करेगा। ऐसी कल्पना भी उसे नहीं थी। वह डर गया था। उसने तय कर लिया था, कि चाहे जो हो, वह इस पचड़े में नहीं पड़ेगा। सुबह होते ही वह असगर ठेकेदार से मिला था। असगर ही उसे शहर से अपने साथ लाया था। जसदेव ने असगर ठेकेदार से अपने मन की बात कही। ठेकेदार ने उसे समझाते हुए कहा था, फ्अपने काम से काम रखो। क्यों इन चमारों’ के चक्कर में पड़ते हो।य् जसदेव के बदले हुए व्यवहार को मानो ने ताड़ लिया था। लेकिन उसने कोइर् प्रतििया शाहिर नहीं की थी। वह सहजता से अपने काम में लगी थी। वह जानती थी कि उनके बीच एक प़्ाफासला आ गया है। लेकिन वह चुप थी। सूबेस्िंाह को भी लगने लगा था कि मानो को पुफसलाना आसान नहीं है। उसकी तमाम कोश्िाश निरथर्क साबित हुइर् थी। इसीलिए वह मानो और सुकिया को परेशान करने पर उतर आया था। उसने असगर ठेकेदार से भी कह दिया था कि उससे पूछे बगैर उन्हें मशदूरी का भुगतान न करे, न कोइर् रियायत ही बरते उनके साथ। मानो से वुफछ छुपा नहीं था। सूबेस्िंाह की हरकतों पर उसकी नशर थी। उसने अपने आप में निश्चय कर लिया था कि वह उसका मुकाबला करेगी। उठते - बैठते उसके मन में एक ही खयाल था। पक्की ईंटों का घर बनवाना है। लेकिन सूबेस्िंाह इस खयाल में बाधक बन रहा था। सुकिया और मानो दिन - रात काम में जुटे थे। पिफर भी हर महीने वे श्यादा वुफछ बचा नहीं पा रहे थे। पिछले दिनों उन्होंने दुगुनी ईंटें पाथी थीं। उनके उत्साह मंे कोइर् कमी नहीं थी। एक ही उद्देश्य थाμ पक्की ईंटों का घर बनाना है। इसीलिए सूबेस्िंाह की श्यादतियों को वे सहन कर रहे थे। लेकिन एक तड़प थी दोनों में, जो उन्हें सँभाले हुए थी। सूबेस्िंाह नित नए बहाने ढूँढ़ लेता था, उन्हें तंग करने के, एक शीत यु( जारी था उनके बीच, सुकिया से ईंट पाथने का साँचा वापस ले लिया गया था। उसे भऋे की मोरी का काम दे दिया था। मोरी का काम खतरनाक था। मानो डर गइर् थी। लेकिन सुकिया ने उसे हिम्मत बँधाइर् थी, फ्काम से क्यूँ डरना...।य् सुकिया का साँचा जसदेव को दे दिया गया था। साँचा मिलते ही जसदेव के रंग बदल गए थे। वह मानो पर हुवुफम चलाने लगा था। मानो चुपचाप काम में लगी रहती थी। ’ऐसे शब्दों का प्रयोग असंवैधनिक है। समाज के यथाथर् प्रति¯बबन के लिए लेखक कइर् बार ऐसे शब्दों का प्रयोग साहित्य में करते रहे हैं, ¯कतु इसे व्यवहार में नहीं लाया जाना चाहिए। फ्कल तड़के ईंट पाथनी है। ईंटें हटाकर जगह बना दे।य् जसदेव आदेश देकर अपनी झोंपड़ी की ओर चला गया था। मानो ने पाथी ईंटों को दीवार की शक्ल में लगा दिया था। कच्ची ईंटों को सुखाने के लिए दो, खड़ी दो आड़ी ईंटें रखकर जालीदार दीवार बना दी थी। ईंट पाथने की जगह खाली करके ही मानो लौटकर झोंपड़ी में गइर् थी। हैंडपंप पर भीड़ थी। सभी मशदूर काम खत्म करके हाथ - मुँह धोने के लिए आ गए थे। सुबह होने से पहले ही मानो उठ गइर् थी। उसे काम पर जाने की जल्दी थी। चारों तरपफ अँधेरा था। सुबह होने का वह इंतशार करना नहीं चाहती थी। उसने़जल्दी - जल्दी सुबह के काम निबटाए और ईंट पाथने के लिए निकल पड़ी थी। सूरज निकलने में अभी देर थी। जसदेव से पहले ही वह काम पर पहुँच जाती थी। इक्का - दुक्का मशदूर ही इधर - उधर दिखाइर् पड़ रहे थे। वह तेश कदमों से ईंट पाथने की शगह पर पहुँच गइर् थी। वहाँ का दृश्य देखकर अवाक रह गइर् थी। सारी ईंटें टूटी - पूफटी पड़ी थीं। जैसे किसी ने उन्हें बेददीर् से रौंद डाला था। ईंटों की दयनीय अवस्था देखकर उसकी चीख निकल गइर् थी। वह दहाड़ें मार - मारकर रोने लगी थी। आवाश सुनकर मशदूर इकऋा हो गए थे। जितने मुँह उतनी बातें, सब अपनी - अपनी अटकलें लगा रहे थे। रात में आँधी - तूपफान भी नहीं आया था। न ही किसी जंगली जानवर का ही यह काम हो़सकता है। कइर् लोेगों का कहना था, किसी ने जान - बूझकर ईंटें तोड़ी हैं। मानो का हृदय पफटा जा रहा था। टूटी - पूफटी ईंटों को देखकर वह बौरा गइर् थी। जैसे किसी ने उसके पक्की ईंटों के मकान को ही धराशाइर् कर दिया था। जसदेव काप़्ाफी देर बाद आया था। वह निरपेक्ष भाव से चुपचाप खड़ा था। जैसे इन टूटी - पूफटी ईंटों से उसका वुफछ लेना - देना ही न हो। सुकिया भी हो - हल्ला सुनकर मोरी का काम छोड़कर आया था। ईंटों की हालत देखकर उसका भी दिल बैठने लगा था। उसकी जैसे हिम्मत टूट गइर् थी। वह पफटी - पफटी आँखों से ईंटों को देख रहा था। सुकिया को देखते ही मानो और शोर - शोर से रोने लगी थी। सुकिया ने मानो की आँखों से बहते तेश अँधड़ों को देखा और उनकी किरकिराहट अपने अंतमर्न में महसूस की। सपनों के टूट जाने की आवाश उसके कानों को पफाड़ रही थी। असगर ठेकेदार ने साप़्ाफ कह दिया था। टूटी - पफूटी ईंटें हमारे किस काम की? इनकी मशदूरी हम नहीं देंगे। असगर ठेकेदार ने उनकी रही - सही उम्मीदों पर भी पानी पेफर दिया था। मानो ने सुकिया की ओर डबडबाइर् आँखों से देखा। सुकिया के चेहरे पर तूप़्ाफान में घर टूट जाने की पीड़ा छलछला आइर् थी। उसे लगने लगा था, जैसे तमाम लोग उसके ख्िालाप़्ाफ हैं। तरह - तरह की बाधाएँ उसके सामने खड़ी की जा रही हंै। वहाँ रफकना उसके लिए कठिन हो गया था। उसने मानो का हाथ पकड़ा, फ्चल! ये लोग म्हारा घर ना बणने देंगे।य् पक्की ईंटों के मकान का सपना उनकी पकड़ से पिफसलकर और दूर चला गया था। भऋे से उठते काले धुएँ ने आकाश तले एक काली चादर पैफला दी थी। सब वुफछ छोड़कर मानो और सुकिया चल पड़े थे। एक खानाबदोश की तरह, जिन्हें एक घर चाहिए था, रहने के लिए। पीछे छूट गए थे वुफछ बेतरतीब पल, पसीने के अक्स जो कभी इतिहास नहीं बन सवेंफगे। खानाबदोश ¯शदगी का एक पड़ाव था यह भट्टòा। सुकिया के पीछे - पीछे चल पड़ने से पहले मानो ने जसदेव की ओर देखा था। मानो को यकीन था, जसदेव उनका साथ देगा। लेकिन जसदेव को चुप देखकर उसका विश्वास टुकड़े - टुकड़े हो गया था। मानो के सीने में एक टीस उभरी थी। सदर् साँस में बदलकर मानो को छलनी कर गइर् थी। उसके होंठ पफड़पफड़ाए थे वुफछ कहने के लिए लेकिन शब्द घुटकर रह गए थे। सपनों के काँच उसकी आँख में किरकिरा रहे थे। वह भारी मन से सुकिया के पीछे - पीछे चल पड़ी थी, अगले पड़ाव की तलाश में, एक दिशाहीन यात्रा पर। ़ाफों की प्रतिध्वनियाँ थीं जहाँ सब वुफछ अनिश्िचत था।’μ यह वाक्य मानो की किस मनोस्िथति को उजागर करता है? 3.मानो अभी तक भऋे की ¯शदगी से तालमेल क्यों नहीं बैठा पाइर् थी? 4.‘खुद के हाथ पथी ईंटों का रंग ही बदल गया था। उस दिन ईंटों को देखते - देखते मानो के मन में बिजली की तरह एक खयाल कौंधा था।’ μ वह क्या खयाल था जो मानो के मन में बिजली की तरह कौंधा? इस संदभर् में सुकिया के साथ हुए उसके वातार्लाप को अपने शब्दों में लिख्िाए। 5.असगर ठेकेदार के साथ जसदेव को आता देखकर सूबे ¯सह क्यों बिपफर पड़ा और जसदेव को मारने का क्या कारण था? 6.‘सुकिया ने मानो की आँखों से बहते तेश अँधड़ों को देखा और उनकी किरकिराहट अपने अंतमर्न में महसूस की। सपनों के टूट जाने की आवाश उसके कानों को पफाड़ रही थी।’ μ प्रस्तुत पंक्ितयों का संदभर् बताते हुए आशय स्पष्ट कीजिए। 7.‘खानाबदोश’ कहानी में आज के समाज की किन - किन समस्याओं को रेखांकित किया गया है? इन समस्याओं के प्रति कहानीकार के दृष्िटकोण को स्पष्ट कीजिए। 8.‘चल! ये लोग म्हारा घर ना बणने देंगे।’ μ सुकिया के इस कथन के आधार पर कहानी की मूल संवेदना स्पष्ट कीजिए। 9.निम्नलिख्िात पंक्ितयों का आशय स्पष्ट कीजिए μ ;कद्ध अपने देस की सूखी रोटी भी परदेस के पकवानों से अच्छी होती है।;खद्ध इत्ते ढेर से नोट लगे हैं घर बणाने में। गाँठ में नहीं है पैसा, चले हाथी खरीदने। ;गद्ध उसे एक घर चाहिए था μ पक्की ईंटों का, जहाँ वह अपनी गृहस्थी और परिवार के सपने देखती थी। ;घद्ध पिफर तुम तो दिन - रात साथ काम करते हो...मेरी खातिर पिटे...पिफर यह बामन म्हारे बीच कहाँ से आ गया...?;घद्ध सपनों के काँच उसकी आँख में किरकिरा रहे थे। 10.नीचे दिए गए गद्यांश की संदभर् सहित व्याख्या कीजिए μ भऋे से उठते काले धुएँ.........¯शदगी का एक पड़ाव था यह भऋा। योग्यता - विस्तार 1.अपने आसपास के क्षेत्रा में जाकर ईंटों के भऋे को देख्िाए तथा ईंटें बनाने एवं उन्हंे पकाने की प्रिया का वणर्न अपने शब्दों में कीजिए। 2.भऋा - मशदूरों की सामाजिक एवं आ£थक स्िथति पर एक रिपोटर् तैयार कीजिए। शब्दाथर् और टिप्पणी पाथना - साँचे की सहायता से या यों ही हाथों से थोप - पीटकर ईंट या उपला तैयार करना मुआयना - निरीक्षण दड़बा - मुगीर् इत्यादि को रखने के लिए बनाया गया छोटा घर अंटी - गाँठ, कमर के उफपर धेती की लपेट जिसका इस्तेमाल रुपये - पैसे रखने के लिए होता है श्िाद्दत से - तीव्रता से अंजाम - परिणाम

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