र् हरिशंकर परसाइर् का जन्म जमानी गाँव, िाला होशंगाबाद, मध्य प्रदेश में हुआ था। उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से ¯हदी में एम.ए. किया। वुफछ वषा±े तक अध्यापन कायर् करने के पश्चात सन् 1947 से वे स्वतंत्रा लेखन में जुट गए। उन्होंने जबलपुर से वसुधा नामक साहित्ियक पत्रिाका निकाली। परसाइर् ने व्यंग्य विधा को साहित्ियक प्रतिष्ठा प्रदान की। उनके व्यंग्य - लेखों की उल्लेखनीय विशेषता यह है कि वे समाज मंे आइर् विसंगतियों, विडंबनाओं पर करारी चोट करते हुए ¯चतन और कमर् की प्रेरणा देते हैं। उनके व्यंग्य गुदगुदाते हुए पाठक को झकझोर देने में सक्षम हैं। भाषा - प्रयोग में परसाइर् को असाधारण वुफशलता प्राप्त है। वे प्रायः बोलचाल के शब्दों का प्रयोग सतवर्फता से करतेे हैं। कौन सा शब्द कब और वैफसा प्रभाव पैदा करेगा इसे वे बखूबी जानते थे। परसाइर् ने दो दजर्न से अिाक पुस्तकों की रचना की है, जिनमें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं μ हँसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन पिफरे ;कहानी - संग्रहद्धऋ रानी नागपफनी की कहानी, तट की खोज ;उपन्यासद्धऋ तब की बात और थी, भूत के पाँव पीछे, बेइर्मानी की परत, पगडंडियों का शमाना, सदाचार की तावीश, श्िाकायत मुझे भी है, और अंत में ;निबंध - संग्रहद्धऋ वैष्णव की पिफसलन, तिरछी रेखाएँ, ठिठुरता हुआ गणतंत्रा, विकलांग श्र(ा का दौर ;व्यंग्य - लेख संग्रहद्ध। उनका समग्र साहित्य परसाइर् रचनावली के रूप में छह भागों में प्रकाश्िात है। यहाँ संकलित रचना टाचर् बेचनेवाले में टाॅचर् के प्रतीक के माध्यम से परसाइर् ने आस्थाओं के बाशारीकरण और धमिर्क पाखंड पर प्रहार किया है। हरिशंकर परसाइर् ;सन् 1922 - 1995द्ध वह पहले चैराहों पर बिजली के टाचर् बेचा करता था। बीच में वुफछ दिन वह नहीं दिखा। कल पिफर दिखा। मगर इस बार उसने दाढ़ी बढ़ा ली थी और लंबा वुफरता पहन रखा था। मैंने पूछा, फ्कहाँ रहे? और यह दाढ़ी क्यों बढ़ा रखी है?य् उसने जवाब दिया, फ्बाहर गया था।य् दाढ़ीवाले सवाल का उसने जवाब यह दिया कि दाढ़ी पर हाथ पेफरने लगा। मैंने कहा, फ्आज तुम टाचर् नहीं बेच रहे हो?य् उसने कहा, फ्वह काम बंद कर दिया। अब तो आत्मा के भीतर टाचर् जल उठा है। ये ‘सूरजछाप’ टाचर् अब व्यथर् मालूम होते हैं।य् मैंने कहा, फ्तुम शायद संन्यास ले रहे हो। जिसकी आत्मा में प्रकाश पैफल जाता है, वह इसी तरह हरामखोरी पर उतर आता है। किससे दीक्षा ले आए?य् मेरी बात से उसे पीड़ा हुइर्। उसने कहा, फ्ऐसे कठोर वचन मत बोलिए। आत्मा सबकी एक है। मेरी आत्मा को चोट पहुँचाकर आप अपनी ही आत्मा को घायल कर रहे हैं।य् मैंने कहा, फ्यह सब तो ठीक है। मगर यह बताओ कि तुम एकाएक ऐसे वैफसे हो गए? क्या बीवी ने तुम्हें त्याग दिया? क्या उधार मिलना बंद हो गया? क्या साहूकारों ने श्यादा तंग करना शुरू कर दिया? क्या चोरी के मामले में पफँस गए हो? आख्िार बाहर का टाचर् भीतर आत्मा में वैफसे घुस गया?य् उसने कहा, फ्आपके सब अंदाश गलत हैं। ऐसा वुफछ नहीं हुआ। एक घटना हो गइर् है, जिसने जीवन बदल दिया। उसे मैं गुप्त रखना चाहता हूंँ। पर क्योंकि मैं आज ही यहाँ से दूर जा रहा हूंँ, इसलिए आपको सारा किस्सा सुना देता हूँ।य् उसने बयान शुरू किया μ पाँच साल पहले की बात है। मैं अपने एक दोस्त के साथ हताश एक जगह बैठा था। हमारे सामने आसमान को छूता हुआ एक सवाल खड़ा था। वह सवाल था μ ‘पैसा वैफसे पैदा करें?’ हम दोनों ने उस सवाल की एक - एक टाँग पकड़ी और उसे हटाने की कोश्िाश करने लगे। हमें पसीना आ गया, पर सवाल हिला भी नहीं। दोस्त ने कहा μ फ्यार, इस सवाल के पाँव शमीन में गहरे गड़े हैं। यह उखड़ेगा नहीं। इसे टाल जाएँ।य् हमने दूसरी तरपफ मुँह कर लिया। पर वह सवाल पिफर हमारे सामने आकर खड़ा़हो गया। तब मैंने कहा μ फ्यार, यह सवाल टलेगा नहीं। चलो, इसे हल ही कर दें। पैसा पैदा करने के लिए वुफछ काम - धंधा करें। हम इसी वक्त अलग - अलग दिशाओं में अपनी - अपनी किस्मत आशमाने निकल पडं़े। पाँच साल बाद ठीक इसी तारीख को इसी वक्त हम यहाँ मिलें।य् दोस्त ने कहा μ फ्यार, साथ ही क्यों न चलें?य् मैंने कहा μ फ्नहीं। किस्मत आशमानेवालों की जितनी पुरानी कथाएँ मैंने पढ़ी हैं, सबमें वे अलग - अलग दिशा में जाते हैं। साथ जाने में किस्मतों के टकराकर टूटने का डर रहता है।य् तो साहब, हम अलग - अलग चल पड़े। मैंने टाचर् बेचने का धंधा शुरू कर दिया। चैराहे पर या मैदान में लोगों को इकऋा कर लेता और बहुत नाटकीय ढंग से कहता μ फ्आजकल सब जगह अँधेरा छाया रहता है। रातें बेहद काली होती हैं। अपना ही हाथ नहीं सूझता। आदमी को रास्ता नहीं दिखता। वह भटक जाता है। उसके पाँव काँटों से बिंध जाते हैं, वह गिरता है और उसके घुटने लहूलुहान हो जाते हैं। उसके आसपास भयानक अँधेरा है। शेर और चीते चारों तरपफ घूम रहे हैं, साँप शमीन पर रेंग रहे हैं। अँधेरा सबको़निगल रहा है। अँधेरा घर में भी है। आदमी रात को पेशाब करने उठता है और साँप पर उसका पाँव पड़ जाता है। साँप उसे डँस लेता है और वह मर जाता है।य् आपने तो देखा ही है साहब, कि लोग मेरी बातें सुनकर वैफसे डर जाते थे। भर - दोपहर में वे अँधेरे के डर से काँपने लगते थे। आदमी को डराना कितना आसान है! लोग डर जाते, तब मैं कहता μ फ्भाइयों, यह सही है कि अँधेरा है, मगर प्रकाश भी है। वही प्रकाश मैं आपको देने आया हूँ। हमारी ‘सूरज छाप’ टाचर् में वह प्रकाश है, जो अंध्कार को दूर भगा देता है। इसी वक्त ‘सूरज छाप’ टाचर् खरीदो और अँधेरे को दूर करो। जिन भाइयों को चाहिए, हाथ उँफचा करें।य् साहब, मेरे टाचर् बिक जाते और मैं मशे में ¯शदगी गुशारने लगा। वायदे के मुताबिक ठीक पाँच साल बाद मैं उस जगह पहुँचा, जहाँ मुझे दोस्त से मिलना था। वहाँ दिन - भर मैंने उसकी राह देखी, वह नहीं आया। क्या हुआ? क्या वह भूल गया? या अब वह इस असार संसार में ही नहीं है? मैं उसे ढूँढ़ने निकल पड़ा। एक शाम जब मैं एक शहर की सड़क पर चला जा रहा था, मैंने देखा कि पास के मैदान में खूब रोशनी है और एक तरप़्ाफ मंच सजा है। लाउडस्पीकर लगे हैं। मैदान में हशारों नर - नारी श्र(ा से झुके बैठे हैं। मंच पर सुंदर रेशमी वस्त्रों से सजे एक भव्य पुरुष बैठे हैं। वे खूब पुष्ट हैं, सँवारी हुइर् लंबी दाढ़ी है और पीठ पर लहराते लंबे केश हैं। मैं भीड़ के एक कोने में जाकर बैठ गया। भव्य पुरुष प्ि़ाफल्मों के संत लग रहे थे। उन्होंने गुरु - गंभीर वाणी में प्रवचन शुरू किया। वे इस तरह बोल रहे थे जैसे आकाश के किसी कोने से कोइर् रहस्यमय संदेश उनके कान में सुनाइर् पड़ रहा है जिसे वे भाषण दे रहे हैं। वे कह रहे थे μ फ्मैं आज मनुष्य को एक घने अंधकार में देख रहा हूँ। उसके भीतर वुफछ बुझ गया है। यह युग ही अंधकारमय है। यह सवर्ग्राही अंध्कार संपूणर् विश्व को अपने उदर में छिपाए है। आज मनुष्य इस अंध्कार से घबरा उठा है। वह पथभ्रष्ट हो गया है। आज आत्मा में भी अंधकार है। अंतर की आँखें ज्योतिहीन हो गइर् हैं। वे उसे भेद नहीं पातीं। मानव - आत्मा अंधकार में घुटती है। मैं देख रहा हूँ, मनुष्य की आत्मा भय और पीड़ा से त्रास्त है।य् इसी तरह वे बोलते गए और लोग स्तब्ध सुनते गए। मुझे हँसी छूट रही थी। एक - दो बार दबाते - दबाते भी हँसी पूफट गइर् और पास के श्रोताओं ने मुझे डाँटा। भव्य पुरफष प्रवचन के अंत पर पहुँचते हुए कहने लगे μ फ्भाइयों और बहनांे, डरो मत। जहाँ अंध्कार है, वहीं प्रकाश है। अंधकार में प्रकाश की किरण है, जैसे प्रकाश में अंधकार की ¯वफचित कालिमा है। प्रकाश भी है। प्रकाश बाहर नहीं है, उसे अंतर में खोजो। अंतर में बुझी उस ज्योति को जगाओ। मैं तुम सबका उस ज्योति को जगाने के लिए आह्नान करता हूँ। मैं तुम्हारे भीतर वही शाश्वत ज्योति को जगाना चाहता हँू। हमारे ‘साधना मंदिर’ मंे आकर उस ज्योति को अपने भीतर जगाओ।य् साहब, अब तो मैं ख्िालख्िालाकर हँस पड़ा। पास के लोगों ने मुझे धक्का देकर भगा दिया। मैं मंच के पास जाकर खड़ा हो गया। भव्य पुरफष मंच से उतरकर कार पर चढ़ रहे थे। मैंने उन्हें ध्यान से पास से देखा। उनकी दाढ़ी बढ़ी हुइर् थी, इसलिए मैं थोड़ा झिझका। पर मेरी तो दाढ़ी नहीं थी। मैं तो उसी मौलिक रूप में था। उन्होंने मुझे पहचान लिया। बोले μ फ्अरे तुम!य् मैं पहचानकर बोलने ही वाला था कि उन्होंने मुझे हाथ पकड़कर कार में बिठा लिया। मैं पिफर वुफछ बोलने लगा तो उन्होंने कहा μ फ्बँगले तक कोइर् बातचीत नहीं होगी। वहीं ज्ञान - चचार् होगी।य् मुझे याद आ गया कि वहाँ ड्राइवर है। बँगले पर पहुँचकर मैंने उसका ठाठ देखा। उस वैभव को देखकर मैं थोड़ा झिझका, पर तुरंत ही मैंने अपने उस दोस्त से खुलकर बातें शुरू कर दीं। मैंने कहा μ फ्यार, तू तो बिलवुफल बदल गया।य् उसने गंभीरता से कहा μ फ्परिवतर्न जीवन का अनंत क्रम है।य् मैंने कहा μ फ्साले, पिफलासप़्ाफी मत बघार यह बता कि तूने इतनी दौलत वैफसे कमा ली पाँच सालों में?य् उसने पूछा μ फ्तुम इन सालों में क्या करते रहे?य् मैंने कहा μ फ्मैं तो घूम - घूमकर टाचर् बेचता रहा। सच बता, क्या तू भी टाचर् का व्यापारी है?य् उसने कहा μ फ्तुझे क्या ऐसा ही लगता है? क्यों लगता है?य् मैंने उसे बताया कि जो बातें मैं कहता हूँऋ वही तू कह रहा था मैं सीधे ढंग से कहता हूँ, तू उन्हीं बातों को रहस्यमय ढंग से कहता है। अँधेरे का डर दिखाकर लोगों को टाचर् बेचता हूँ। तू भी अभी लोगों को अँधेरे का डर दिखा रहा था, तू भी शरूर टाचर् बेचता है। उसने कहा μ फ्तुम मुझे नहीं जानते, मैं टाचर्र् क्यों बेचूगा! मैं साधु, दाशर्निक और संत कहलाता हूँ।य् मैंने कहा μ फ्तुम वुफछ भी कहलाओ, बेचते तुम टाचर् हो। तुम्हारे और मेरे प्रवचन एक जैसे हैं। चाहे कोइर् दाशर्निक बने, संत बने या साधु बने, अगर वह लोगों को अँधेरे का डर दिखाता है, तो शरूर अपनी वंफपनी का टाचर् बेचना चाहता है। तुम जैसे लोगों के लिए हमेशा ही अंध्कार छाया रहता है। बताओ, तुम्हारे जैसे किसी आदमी ने हशारों में कभी भी यह कहा है कि आज दुनिया में प्रकाश पैफला है? कभी नहीं कहा। क्यों? इसलिए कि उन्हें अपनी वंफपनी का टाचर् बेचना है। मैं खुद भर - दोपहर में लोगों से कहता हूँ कि अंध्कार छाया है। बता किस वंफपनी का टाचर् बेचता है?य् मेरी बातों ने उसे ठिकाने पर ला दिया था। उसने सहज ढंग से कहा μ फ्तेरी बात ठीक ही हैै। मेरी वंफपनी नयी नहीं है, सनातन है।य् मैंने पूछा μ फ्कहाँ है तेरी दुकान? नमूने के लिए एकाध टाचर् तो दिखा। ‘सूरज छाप’ टाचर् से बहुत श्यादा बिक्री है उसकी।य् उसने कहा μ फ्उस टाचर् की कोइर् दुकान बाशार में नहीं है। वह बहुत सूक्ष्म है। मगर कीमत उसकी बहुत मिल जाती है। तू एक - दो दिन रह, तो मैं तुझे सब समझा देता हूँ।य् फ्तो साहब मैं दो दिन उसके पास रहा। तीसरे दिन ‘सूरज छाप’ टाचर् की पेटी को नदी में पेंफककर नया काम शुरू कर दिया।य् वह अपनी दाढ़ी पर हाथ पेफरने लगा। बोला μ फ्बस, एक महीने की देर और है।य् मैंने पूछा μफ्तो अब कौन - सा धंधा करोगे?य् उसने कहा μ फ्धंधा वही करूँगा, यानी टाचर् बेचूँगा। बस वंफपनी बदल रहा हूँ।य् 3.पहला दोस्त मंच पर किस रूप में था और वह किस अँधेरे को दूर करने के लिए टाचर् बेच रहा था? 4.भव्य पुरुष ने कहा μ ‘जहाँ अंधकार है वहीं प्रकाश है’। इसका क्या तात्पयर् है? 5.भीतर के अंँधेरे की टाचर् बेचने और ‘सूरज छाप’ टाचर् बेचने के धंधे में क्या प़्ाफवर्फ है? पाठ के आधर पर बताइए। 6.‘सवाल के पाँव शमीन में गहरे गड़े हैं। यह उखड़ेगा नहीं।’ इस कथन में मुनष्य की किसप्रवृिा की ओर संकेत है और क्यों? 7.‘व्यंग्य विधा में भाषा सबसे धारदार है।’ परसाइर् जी की इस रचना को आधार बनाकर इस कथन के पक्ष में अपने विचार प्रकट कीजिए। 8.आशय स्पष्ट कीजिएμ ;कद्ध आजकल सब जगह अँधेरा छाया रहता है। रातें बेहद काली होती हैं। अपना ही हाथ नहीं सूझता। ;खद्ध प्रकाश बाहर नहीं है, उसे अंतर में खोजो। अंतर में बुझी उस ज्योति को जगाओ। ;गद्ध धंधा वही करूँ गा, यानी टाचर् बेचूँगा। बस वंफपनी बदल रहा हूँ। योग्यता - विस्तार 1.‘पैसा कमाने की लिप्सा ने आध्यात्िमकता को भी एक व्यापार बना दिया है।’ इस विषय पर कक्षा में परिचचार् कीजिए। 2.समाज में पैफले अंधविश्वासों का उल्लेख करते हुए एक लेख लिख्िाए। 3.एन.सी.इर्.आर.टी. द्वारा हरिशंकर परसाइर् पर बनाइर् गइर् प्िाफल्म देख्िाए।़विचारों से पुष्ट वाणी सबको ग्रहण करनेवाला, सबको समाहित करनेवाला पुकारना, बुलाना शाश्वत μ चिरंतन, हमेशा रहनेवाली सनातन μ सदैव रहनेवाला

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