अमरकांत का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया िाले के नगरा गाँव में हुआ। उनका मूल नाम श्रीराम वमार् है, उनकी आरंभ्िाक श्िाक्षा बलिया में हुइर्। तत्पश्चात् उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए. की डिग्री प्राप्त की। साहित्य - सृजन में उनकी बचपन से ही रुचि थी, किशोरावस्था तक आते - आते उन्होंने कहानी - लेखन प्रारंभ कर दिया था। अमरकांत ने अपने साहित्ियक जीवन की शुरुआत पत्राकारिता से की। सबसे पहले उन्होंने आगरा से प्रकाश्िात होनेवाले दैनिक पत्रा सैनिक के संपादकीय विभाग मंे कायर् करना आरंभ किया और यहीं वे प्रगतिशील लेखक संघ से भी जुडे़। इसके अतिरिक्त उन्होंने दैनिक अमृत पत्रिाका तथा दैनिक भारत के संपादकीय विभागों में भी काम किया। वुफछ समय तक वे कहानी पत्रिाका के संपादन से भी जुड़े रहे। अमरकांत नयी कहानी आंदोलन के एक प्रमुख कहानीकार हंै। उन्होंने अपनी कहानियों में शहरी और ग्रामीण जीवन का यथाथर् चित्राण किया है। वे मुख्यतः मध्यवगर् के जीवन की वास्तविकता और विसंगतियों को व्यक्त करनेवाले कहानीकार हैं। वतर्मान समाज में व्याप्त अमानवीयता, हृदयहीनता, पाखंड, आडंबर आदि को उन्होंने अपनी कहानियों का विषय बनाया है। आज के सामाजिक जीवन और उसके अनुभवों को अमरकांत ने यथाथर्वादी ढंग से अभ्िाव्यक्त किया है। उनकी शैली की सहजता और भाषा की सजीवता पाठकों को आकष्िार्त करती है। आंचलिक मुहावरों और शब्दों के प्रयोग से उनकी कहानियों में जीवंतता आती है। अमरकांत की कहानियों के श्िाल्प में पाठकों को चमत्वृफत करने का प्रयास नहीं है। वे जीवन की कथा उसी ढंग से कहते हैं, जिस ढंग से जीवन चलता है। अमरकांत की मुख्य रचनाएँ हैं μ ¯शदगी और जोंक, देश के लोग, मौत का नगर, मित्रा - मिलन, वुफहासा ;कहानी अमरकांत ;सन् 1925द्ध संग्रहद्धऋ सूखा पत्ता, ग्राम सेविका, काले उजले दिन, सुखजीवी, बीच की दीवार, इन्हीं हथ्िायारों से ;उपन्यासद्ध। अमरकांत ने बाल - साहित्य भी लिखा है। इस पुस्तक के लिए उनकी कहानी दोपहर का भोजन ली गइर् ह।ैदोपहर का भोजन गरीबी से जूझ रहे एक निम्न मध्यवगीर्य परिवार की कहानी है।इस कहानी में समाज में व्याप्त गरीबी को चिित किया गया है। मुंशीजी के पूरे परिवार का संघषर् भावी उम्मीदों पर टिका हुआ है। सि(ेश्वरी गरीबी के अहसास को मुखर नहीं होने देती और उसकी आँच से अपने परिवार को बचाए रखती है। श्िाल्प की सादगीऔर सहज संकेतों के माध्यम से कथा को प्रस्तुत करने की कला का उत्कृष्ट रूप इस कहानी में देखने को मिलता है। दोपहर का भोजन सि(ेश्वरी ने खाना बनाने के बाद चूल्हे को बुझा दिया और दोनों घुटनों के बीच सिर रखकर शायद पैर की उँगलियाँ या शमीन पर चलते चींटे - चींटियों को देखने लगी। अचानक उसे मालूम हुआ कि बहुत देर से उसे प्यास लगी है। वह मतवाले की तरह उठी और गगरे से लोटा - भर पानी लेकर गट - गट चढ़ा गइर्। खाली पानी उसके कलेजे में लग गया और वह ‘हाय राम!’ कहकर वहीं शमीन पर लेट गइर्। लगभग आधे घंटे तक वहीं उसी तरह पड़ी रहने के बाद उसके जी में जी आया। वह बैठ गइर्, आँखों को मल - मलकर इधर - उधर देखा और पिफर उसकी दृष्िट ओसारे में अध - टूटे खटोले पर सोये अपने छः वषीर्य लड़के प्रमोद पर जम गइर्। लड़का नंग - धडं़ग पड़ा था। उसके गले तथा छाती की हंियाँ सापफ दिखाइर् देती थीं।़उसके हाथ - पैर बासी ककडि़यों की तरह सूखे तथा बेजान पड़े थे और उसका पेट हँडिया की तरह पूफला हुआ था। उसका मुँह खुला हुआ था और उस पर अनगिनत मक्िखयाँ उड़ रही थीं। वह उठी, बच्चे के मुँह पर अपना एक पफटा, गंदा ब्लाउश डाल दिया और एक - आध मिनट सुन्न खड़ी रहने के बाद बाहर दरवाशे पर जाकर किवाड़ की आड़ से गली निहारने लगी। बारह बज चुके थे। धूप अत्यंत तेश थी और कभी - कभी एक - दो व्यक्ित सिर पर तौलिया या गमछा रखे हुए या मशबूती से छाता ताने हुए पुफतीर् के साथ लपकते हुए सामने से गुशर जाते। दस - पंद्रह मिनट तक वह उसी तरह खड़ी रही, पिफर उसके चेहरे पर व्यग्रता पैफल गइर् और उसने आसमान तथा कड़ी धूप की ओर ¯चता से देखा। एक - दो क्षण बाद जब उसने सिर को किवाड़ से काप़्ाफी आगे बढ़कर गली के छोर की तरपफ़निहारा, तो उसका बड़ा लड़का रामचंद्र धीरे - धीरे घर की ओर सरकता नशर आया। उसने पुफतीर् से एक लोटा पानी ओसारे की चैकी के पास नीचे रख दिया और चैके में जाकर खाने के स्थान को जल्दी - जल्दी पानी से लीपने - पोतने लगी। वहाँ पीढ़ा रखकर उसने सिर को दरवाशे की ओर घुमाया ही था कि रामचंद्र ने अंदर कदम रखा। रामचंद्र आकर धम - से चैकी पर बैठ गया और पिफर वहीं बेजान - सा लेट गया। उसका मुँह लाल तथा चढ़ा हुआ था। उसके बाल अस्त - व्यस्त थे और उसके पफटे - पुराने जूतों पर गदर् जमी हुइर् थी। सि(ेश्वरी की पहले हिम्मत नहीं हुइर् कि उसके पास जाए और वह वहीं से भयभीत हिरनी की भाँति सिर उचका - घुमाकर बेटे को व्यग्रता से निहारती रही। ¯वफतु लगभग दस मिनट बीतने के पश्चात् भी जब रामचंद्र नहीं उठा, तो वहघबरा गइर्। पास जाकर पुकारा, ‘बड़वूफ, बड़वूफ!’ लेकिन उसके वुफछ उत्तर न देने पर डर गइर् और लड़के की नाक के पास हाथ रख दिया। साँस ठीक से चल रही थी। पिफर सिर पर हाथ रखकर देखा, बुखार नहीं था। हाथ के स्पशर् से रामचंद्र ने आँखें खोलीं। पहले उसने माँ की ओर सुस्त नशरों से देखा, पिफर झट से उठ बैठा। जूते निकालने और नीचे रखे लोटे के जल से हाथ - पैर धोने के बाद वह यंत्रा की तरह चैकी पर आकर बैठ गया। सि(ेश्वरी ने डरते - डरते पूछा, ‘खाना तैयार है, यहीं लाउँफ क्या?’ रामचंद्र ने उठते हुए प्रश्न किया, ‘बाबू जी खा चुके?’सि(ेश्वरी ने चैके की ओर भागते हुए उत्तर दिया, ‘आते ही होंगे।’ रामचंद्र पीढ़े पर बैठ गया। उसकी उम्र लगभग इक्कीस वषर् थी। लंबा, दुबला - पतला, गोरा रंग, बड़ी - बड़ी आँखें तथा होंठों पर झुरिर्याँ। वह एक स्थानीयदैनिक समाचार - पत्रा के दफ्ऱतर में अपनी तबीयत से प्रूप़्ाफ - रीडरी का काम सीखता था। पिछले साल ही उसने इंटर पास किया था। सि(ेश्वरी ने खाने की थाली लाकर सामने रख दी और पास ही बैठकर पंखा करने लगी। रामचंद्र ने खाने की ओर दाशर्निक की भाँति देखा। वुफल दो रोटियाँ, भर कटोरा पनियाइर् दाल और चने की तली तरकारी। रामचंद्र ने रोटी के प्रथम टुकड़े को निगलते हुए पूछा, ‘मोहन कहाँ है? बड़ी कड़ी धूप हो रही है।’ मोहन सि(ेश्वरी का मँझला लड़का था। उसकी उम्र अऋारह वषर् थी और वह इस साल हाइर् स्वूफल का प्राइवेट इम्ितहान देने की तैयारी कर रहा था। वह न मालूम कब से घर से गायब था और सि(ेश्वरी को स्वयं पता नहीं था कि वह कहाँ गया है। ¯वफतु सच बोलने की उसकी तबीयत नहीं हुइर् और उसने झूठ - मूठ कहा, ‘किसी लड़के के यहाँ पढ़ने गया है, आता ही होगा। दिमाग उसका बड़ा तेश है और उसकी तबीयत चैबीसों घंटे पढ़ने में ही लगी रहती है। हमेशा उसी की बात करता रहता है।’ रामचंद्र ने वुफछ नहीं कहा। एक टुकड़ा मुँह में रखकर भरा गिलास पानी पी गया, पिफर खाने में लग गया। वह काप़्ाफी छोटे - छोटे टुकड़े तोड़कर उन्हें धीरे - धीरे चबा रहा था। सि(ेश्वरी भय तथा आतंक से अपने बेटे को एकटक निहार रही थी। वुफछ क्षण बीतने के बाद डरते - डरते उसने पूछा, ‘वहाँ वुफछ हुआ क्या?’ रामचंद्र ने अपनी बड़ी - बड़ी भावहीन आँखों से अपनी माँ को देखा, पिफर नीचा सिर करके वुफछ रुखाइर् से बोला, ‘समय आने पर सब ठीक हो जाएगा।’सि(ेश्वरी चुप रही। धूप और तेश हो गइर् थी। छोटे आँगन के ऊपर आसमान में बादल के एक - दो टुकडे़ पाल की नावों की तरह तैर रहे थे। बाहर की गली से गुशरते हुए खड़खडि़या इक्के की आवाश आ रही थी और खटोले पर सोए बालक की साँस का खर - खर शब्द सुनाइर् दे रहा था। रामचंद्र ने अचानक चुप्पी को भंग करते हुए पूछा, ‘प्रमोद खा चुका?’सि(ेश्वरी ने प्रमोद की ओर देखते हुुए उदास स्वर में उत्तर दिया, ‘हाँ, खा चुका।’ ‘रोया तो नहीं था?’ सि(ेश्वरी पिफर झूठ बोल गइर्, ‘आज तो सचमुच नहीं रोया। वह बड़ा हीहोश्िायार हो गया है। कहता था, बड़का भैया के यहाँ जाऊँगा। ऐसा लड़का...’ पर वह आगे वुफछ न बोल सकी, जैसे उसके गले में वुफछ अटक गया। कल प्रमोद ने रेवड़ी खाने की िाद पकड़ ली थी और उसके लिए डेढ़ घंटे तक रोने के बाद सोया था। रामचंद्र ने वुफछ आश्चयर् के साथ अपनी माँ की ओर देखा और पिफर सिर नीचा करके वुफछ तेशी से खाने लगा। थाली में जब रोटी का केवल एक टुकड़ा शेष रह गया, तो सि(ेश्वरी ने उठने का उपक्रम करते हुए प्रश्न किया, ‘एक रोटी और लाती हूंँ?’ रामचंद्र हाथ से मना करते हुए हड़बड़ाकर बोल पड़ा, ‘नहीं - नहीं, शरा भी नहीं। मेरा पेट पहले ही भर चुका है। मैं तो यह भी छोड़नेवाला हूँ। बस, अब नहीं।’ सि(ेश्वरी ने िाद की, ‘अच्छा, आधी ही सही।’ रामचंद्र बिगड़ उठा, ‘अिाक ख्िालाकर बीमार डालने की तबीयत है क्या? तुम लोग शरा भी नहीं सोचते हो। बस, अपनी िाद! भूख रहती तो क्या ले नहीं लेता?’ सि(ेश्वरी जहाँ की तहाँ बैठी ही रह गइर्। रामचंद्र ने थाली में बचे टुकड़े से हाथ खींच लिया और लोटे की ओर देखते हुए कहा, ‘माँ, पानी लाओ।’ सि(ेश्वरी लोटा लेकर पानी लेने चली गइर्। रामचंद्र ने कटोरे को उँगलियों से बजाया, पिफर हाथ को थाल में रख दिया। एक - दो क्षण बाद रोटी के टुकड़े को धीरे - से हाथ से उठाकर आँख से निहारा और अंत में इधर - उधर देखने के बाद टुकड़े को मुँह में इस सरलता से रख लिया, जैसे वह भोजन का ग्रास न होकर पान का बीड़ा हो। मँझला लड़का मोहन आते ही हाथ - पैर धोकर पीढ़े पर बैठ गया। वह वुफछ साँवला था और उसकी आँखें छोटी थीं। उसके चेहरे पर चेचक के दाग थे। वह अपने भाइर् ही की तरह दुबला - पतला था, ¯वफतु उतना लंबा न था। वह उम्र की अपेक्षा कहीं अिाक गंभीर और उदास दिखाइर् पड़ रहा था। सि(ेश्वरी ने उसके सामने थाली रखते हुए प्रश्न किया, ‘कहाँ रह गए थे बेटा? भैया पूछ रहा था।’ मोहन ने रोटी के एक बड़े ग्रास को निगलने की कोश्िाश करते हुए अस्वाभाविक मोटे स्वर में जवाब दिया, ‘कहीं तो नहीं गया था। यहीं पर था।’ सि(ेश्वरी वहीं बैठकर पंखा डुलाती हुइर् इस तरह बोली, जैसे स्वप्न में बड़बड़ा रही हो, ‘बड़का तुम्हारी बड़ी तारीप़्ाफ कर रहा था। कह रहा था, मोहन बड़ा दिमागी होगा, उसकी तबीयत चैबीसों घंटे पढ़ने में ही लगी रहती है।’ यह कहकर उसने अपने मँझले लड़के की ओर इस तरह देखा, जैसे उसने कोइर् चोरी की हो। मोहन अपनी माँ की ओर देखकर पफीकी हँसी हँस पड़ा और पिफर खाने में जुट गया। वह परोसी गइर् दो रोटियों में से एक रोटी, कटोरे की तीन - चैथाइर् दाल तथा अिाकांश तरकारी सापफ कर चुका था।़सि(ेश्वरी की समझ में नहीं आया कि वह क्या करे। इन दोनों लड़कों से उसे बहुत डर लगता था। अचानक उसकी आँखें भर आईं वह दूसरी ओर देखने लगी। थोड़ी देर बाद उसने मोहन की ओर मुँह पेफरा, तो लड़का लगभग खाना समाप्त कर चुका था। सि(ेश्वरी ने चैंकते हुए पूछा, ‘एक रोटी देती हूँ?’ मोहन ने रसोइर् की ओर रहस्यमय नेत्रों से देखा, पिफर सुस्त स्वर में बोला, ‘नहीं।’ सि(ेश्वरी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘नहीं, बेटा, मेरी कसम, थोड़ी ही ले लो। तुम्हारे भैया ने एक रोटी ली थी।’मोहन ने अपनी माँ को गौर से देखा, पिफर धीरे - धीरे इस तरह उत्तर दिया, जैसे कोइर् श्िाक्षक अपने श्िाष्य को समझाता है, ‘नहीं रे, बस। अव्वल तो अब भूख नहीं। पिफर रोटियाँ तूने ऐसी बनाइर् हैं कि खाइर् नहीं जातीं। न मालूम वैफसी लग रही हैं। खैर, अगर तू चाहती ही है, तो कटोरे में थोड़ी दाल दे दे। दाल बड़ी अच्छी बनी है।’ सि(ेश्वरी से वुफछ कहते न बना और उसने कटोरे को दाल से भर दिया। मोहन कटोरे को मुँह से लगाकर सुड़ - सुड़ पी ही रहा था कि मुंशी चंदि्रका प्रसाद जूतों को खस - खस घसीटते हुए आए और राम का नाम लेकर चैकी पर बैठ गए। सि(ेश्वरी ने माथे पर साड़ी को वुफछ नीचे ख्िासका लिया और मोहन दाल को एक साँस में पीकर तथा पानी के लोटे को हाथ में लेकर तेशी से बाहर चला गया। दो रोटियाँ, कटोरा - भर दाल तथा चने की तली तरकारी। मुंशी चंदि्रका प्रसाद पीढ़े पर पालथी मारकर बैठे रोटी के एक - एक ग्रास को इस तरह चुभला - चबा रहे थे, जैसे बूढ़ी गाय जुगाली करती है। उनकी उम्र पैंतालीस वषर् के लगभग थी, ¯वफतु पचास - पचपन के लगते थे। शरीर का चमड़ा झूलने लगा था, गंजी खोपड़ी आइर्ने़की भाँति चमक रही थी। गंदी धोती के ऊपर अपेक्षाकृत वुफछ सापफ बनियान तार - तार लटक रही थी। मंुशी जी ने कटोरे को हाथ में लेकर दाल को थोड़ा सुड़कते हुए पूछा, ‘बड़का दिखाइर् नहीं दे रहा!’ सि(ेश्वरी की समझ में नहीं आ रहा था कि उसके दिल में क्या हो गया है μ जैसे वुफछ काट रहा हो। पंखे को शरा और शोर से घुमाती हुइर् बोली, ‘अभी - अभी खाकर काम पर गया है। कह रहा था, वुफछ दिनों में नौकरी लग जाएगी। हमेशा ‘बाबू जी - बाबू जी’ किए रहता है।’ बोला, ‘बाबू जी देवता के समान हैं।’ मंुशी जी के चेहरे पर वुफछ चमक आइर्। शरमाते हुए पूछा, ‘ऐं, क्या कहता था कि बाबू जी देवता के समान हैं? बड़ा पागल है।’ सि(ेश्वरी पर जैसे नशा चढ़ गया था। उन्माद की रोगिणी की भाँति बड़बड़ाने लगी, ‘पागल नहीं है, बड़ा होश्िायार है। उस शमाने का कोइर् महात्मा है। मोहन तो उसकी बड़ी इश्शत करता है। आज कह रहा था कि भैया की शहर में बड़ी इश्शत होती है, पढ़ने - लिखनेवालों में बड़ा आदर होता है और बड़का तो छोटे भाइयों पर जान देता है। दुनिया में वह सब वुफछ सह सकता है, पर यह नहीं देख सकता कि उसके प्रमोद को वुफछ हो जाए।’ मुंशी जी दाल लगे हाथ को चाट रहे थे। उन्होंने सामने की ताक की ओर देखते हुए वुफछ हँसकर कहा, ‘बड़का का दिमाग तो खैर कापफी तेश है, वैसे लड़कपऩमें बड़ा नटखट भी था। हमेशा खेल - वूफद में लगा रहता था, लेकिन यह भी बात थी कि जो सबक मैं उसे याद करने को देता था, उसे बरार्क रखता था। असल तो यह है कि तीनों लड़के कापफी होश्िायार हैं। प्रमोद को कम समझती हो?’ μ यह़कहकर वह अचानक शोर से हँस पड़े। मुंशी जी डेढ़ रोटी खा चुकने के बाद एक ग्रास से यु( कर रहे थे। वुफछ कठिनाइर् होने पर एक गिलास पानी चढ़ा गए। पिफर खर - खर खाँसकर खाने लगे। पिफर चुप्पी छा गइर्। दूर से किसी आटे की चक्की की पुक - पुक आवाश सुनाइर् दे रही थी और पास के नीम के पेड़ पर बैठा कोइर् पंडूक लगातार बोल रहा था। सि(ेश्वरी की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहे। वह चाहती थी कि सभी चीशें ठीक से पूछ ले। सभी चीशें ठीक से जान ले और दुनिया की हर चीश पर पहले की तरह धड़ल्ले से बात करे। पर उसकी हिम्मत नहीं होती थी। उसके दिल में न जाने वैफसा भय समाया हुआ था। अब मुंशी जी इस तरह चुपचाप दुबके हुए खा रहे थे, जैसे पिछले दो दिनों से मौन व्रत धारण कर रखा हो और उसको कहीं जाकर आज शाम को तोड़नेवाले हों। सि(ेश्वरी से जैसे नहीं रहा गया। बोली, ‘मालूम होता है, अब बारिश नहीं होगी।’ म्ंाुशी जी ने एक क्षण के लिए इधर - उधर देखा, पिफर निविर्कार स्वर में राय दी, ‘मक्िखयाँ बहुत हो गइर् हैं।’ सि(ेश्वरी ने उत्सुकता प्रकट की, ‘पूफपफा जी बीमार हैं, कोइर् समाचार नहीं आया।’ म्ंाुशी जी ने चने के दानों की ओर इस दिलचस्पी से दृष्िटपात किया, जैसे उनसे बातचीत करनेवाले हों। पिफर सूचना दी, ‘गंगाशरण बाबू की लड़की की शादी तय हो गइर्। लड़का एम.ए. पास है।’ सि(ेश्वरी हठात चुप हो गइर्। मुंशी जी भी आगे कुछ नहीं बोले। उनका खाना समाप्त हो गया था और वे थाली में बचे - खुचे दानों को बंदर की तरह बीन रहे थे। सि(ेश्वरी ने पूछा, ‘बड़का की कसम, एक रोटी देती हूंँ। अभी बहुत - सी हैं।’ म्ंाुशी जी ने पत्नी की ओर अपराधी के समान तथा रसोइर् की ओर कनखी से देखा, तत्पश्चात किसी घुटे उस्ताद की भाँति बोले, ‘रोटी... रहने दो, पेट कापफी भऱचुका है। अन्न और नमकीन चीशों से तबीयत ऊब भी गइर् है। तुमने व्यथर् में कसम धरा दी। खैर, कसम रखने के लिए ले रहा हूंँ। गुड़ होगा क्या?’ सि(ेश्वरी ने बताया कि हँडिया में थोड़ा - सा गुड़ है। म्ंाुशी जी ने उत्साह के साथ कहा, ‘तो थोड़े गुड़ का ठंडा रस बनाओ, पीउँफगा। तुम्हारी कसम भी रह जाएगी, शायका भी बदल जाएगा, साथ - ही - साथ हाशमा भी दुरुस्त होगा। हाँ, रोटी खाते - खाते नाक में दम आ गया है।’ यह कहकर वे ठहाका मारकर हँस पड़े। म्ंाुशी जी के निबटने के पश्चात सि(ेश्वरी उनकी जूठी थाली लेकर चैके की शमीन पर बैठ गइर्। बटलोइर् की दाल को कटोरे में उँड़ेल दिया, पर वह पूरा भरा नहीं। छिपुली में थोड़ी - सी चने की तरकारी बची थी, उसे पास खींच लिया। रोटियों की थाली को भी उसने पास खींच लिया, उसमें केवल एक रोटी बची थी। मोटी, भद्दी और जली उस रोटी को वह जूठी थाली में रखने जा ही रही थी कि अचानक उसका ध्यान ओसारे में सोए प्रमोद की ओर आकष्िार्त हो गया। उसने लड़के को वुफछ देर तक एकटक देखा, पिफर रोटी को दो बराबर टुकड़ों में विभाजित कर दिया। एक टुकड़े को तो अलग रख दिया और दूसरे टुकड़े को अपनी जूठी थाली में रख लिया। तदुपरांत एक लोटा पानी लेकर खाने बैठ गइर्। उसने पहला ग्रास मुंँह में रखा और तब न मालूम कहाँ से उसकी आँखों से टपटप आँसू चूने लगे। सारा घर मक्िखयों से भनभन कर रहा था। आँगन की अलगनी पर एक गंदी साड़ी टँगी थी, जिसमें कइर् पैबंद लगे हुए थे। दोनों बड़े लड़कों का कहीं पता नहीं था। बाहर की कोठरी में म्ंाुशी जी औंधे मुंँह होकर निश्िंचतता के साथ सो रहे थे, जैसे डेढ़ महीने पूवर् मकान किराया नियंत्राण विभाग की क्लकीर् से उनकी छँटनी न हुइर् हो और शाम को उनको काम की तलाश में कहीं जाना न हो! 4.‘सि(ेश्वरी का एक दूसरे सदस्य के विषय में झूठ बोलना परिवार को जोड़ने का अनथक प्रयास था’ μ इस संबंध् में आप अपने विचार लिख्िाए। 5.‘अमरकांत आम बोलचाल की ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं जिससे कहानी की संवेदना पूरी तरह उभरकर आ जाती है।’ कहानी के आधर पर स्पष्ट कीजिए। 6.रामचंद्र, मोहन और मुंशी जी खाते समय रोटी न लेने के लिए बहाने करते हैं, उसमें वैफसी विवशता है? स्पष्ट कीजिए। 7.मंुशी जी तथा सि(ेश्वरी की असंब( बातें कहानी से वैफसे संब( हैं? लिख्िाए। 8.‘दोपहर का भोजन’ शीषर्क किन दृष्िटयों से पूणर्तया साथर्क है? 9.आपके अनुसार सि(ेश्वरी के झूठ सौ सत्यों से भारी वैफसे हैं? अपने शब्दों में उत्तर दीजिए। 10.आशय स्पष्ट कीजिए μ ;कद्ध वह मतवाले की तरह उठी और गगरे से लोटा भर पानी लेकर गट - गट चढ़ा गइर्। ;खद्ध यह कहकर उसने अपने मँझले लड़के की ओर इस तरह देखा, जैसे उसने कोइर् चोरी की हो। ;गद्ध मंुशी जी ने चने के दानों की ओर इस दिलचस्पी से दृष्िटपात किया, जैसे उनसेे बातचीत करनेवाले हों। योग्यता - विस्तार 1 अपने आस - पास मौजूद समान परिस्िथतियों वाले किसी विवश व्यक्ित अथवा विवशतापूणर् घटना का वणर्न अपने शब्दों में कीजिए। 2 ‘भूख और गरीबी में प्रायः ध्ैयर् और संयम नहीं टिक पाते हैं।’ इसके आलोक में सि(ेश्वरी के चरित्रा पर कक्षा में चचार् कीजिए। शब्दाथर् और टिप्पणी व्यग्रता बरार्क पंडूक कनखी ओसारा निविर्कार छिपुली अलगनी नाक में दम आना जी में जी आना μ व्यावुफलता, घबराया हुआ μ याद रखना, चमकता हुआ μ कबूतर की तरह का एक प्रसि( पक्षी μ आँख के कोने से μ बरामदा μ जिसमें कोइर् विकार या परिवतर्न न होता हो μ खाने का छोटा बतर्न μ कपड़े टाँगने के लिए बाँध्ी गइर् रस्सी μ परेशान होना μ चैन आ जाना

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