प्रेमचंद का जन्म वाराणसी िाले के लमही ग्राम में हुआ था। उनका मूल नाम धनपतराय था। पे्रमचंद की प्रारंभ्िाक श्िाक्षा वाराणसी में हुइर्। मैटिªक के बाद वे अध्यापन करने लगे। स्वाध्याय के रूप में ही उन्होंने बी.ए. तक श्िाक्षा ग्रहण की। असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने सरकारी नौकरी से त्यागपत्रा दे दिया और पूरी तरह लेखन - कायर् के प्रति समपिर्त हो गए। प्रेमचंद ने अपने लेखन की शुरुआत पहले उदूर् में नवाबराय के नाम से की, बाद में ¯हदी में लिखने लगे। उन्होंने अपने साहित्य में किसानों, दलितों, नारियों की वेदना और वणर् - व्यवस्था की वुफरीतियों का मामिर्क चित्राण किया है। वे साहित्य को स्वांतः सुखाय न मानकर सामाजिक परिवतर्न का एक सशक्त माध्यम मानते थे। वे एक ऐसे साहित्यकार थे, जो समाज की वास्तविक स्िथति को पैनी दृष्िट से देखने की शक्ित रखते थे। उन्होंने समाज - सुधार और राष्ट्रीय - भावना से ओतप्रोत अनेक उपन्यासों एवं कहानियों की रचना की। कथा - संगठन, चरित्रा - चित्राण, कथोपकथन आदि की दृष्िट से उनकी रचनाएँ बेजोड़ हैं। उनकी भाषा बहुत सजीव, मुहावरेदार और बोलचाल के निकट है। ¯हदी भाषा को लोकपि्रय बनाने में उनका विशेष योगदान है।संस्कृत के प्रचलित शब्दों के साथ - साथ उदूर् की रवानी इसकी विशेषता है, जिसने ¯हदी कथा भाषा को नया आयाम दिया। उनकी प्रमुख वृफतियाँ हैं μ मानसरोवर ;आठ भागद्ध, गुप्तधन ;दो भागद्ध ;कहानी संग्रहद्धऋ निमर्ला, सेवासदन, पे्रमाश्रम, रंगभूमि, कमर्भूमि, गबन, गोदान ;उपन्यासद्धऋ कबर्ला, संग्राम, प्रेम की वेदी ;नाटकद्धऋ विविध प्रसंग ;तीन खंडों मंे, साहित्ियक और राजनीतिक निबंधों का संग्रहद्धऋ वुफछ विचार प्रेमचंद ;सन् 1880 - 1936द्ध ;साहित्ियक निबंधद्ध। उन्होंने माधुरी, हंस, मयार्दा, जागरण आदि पत्रिाकाओं का संपादन भी किया। इस पाठ्यपुस्तक में उनकी इर्दगाह कहानी दी गइर् है। ¯हदी में बाल - मनोविज्ञान से संबंध्ित कहानियाँ बहुत कम लिखी गइर् हैं। प्रेमचंद उन दुलर्भ कथाकारों में से हैं जिन्होंने पूरी प्रामाण्िाकता एवं तन्मयता के साथ बाल - जीवन को अपनी कहानियों में जगह दी है। उनकी कहानियाँ भारत की साझीसंस्कृति एवं ग्रामीण जीवन के विविध् रंगों से सराबोर हैं। इर्दगाह प्रेमचंद की इन्हीं विशेषताओं को अभ्िाव्यक्त करने वाली प्रतिनिध्ि कहानी है। इस कहानी में इर्द जैसे महत्त्वपूणर् त्योहार को आधर बनाकर ग्रामीण मुस्िलम जीवन का सुंदर चित्रा प्रस्तुत किया गया है। हामिद का चरित्रा हमें बताता है कि अभाव उम्र से पहले बच्चों में वैफसे बड़ांे जैसी समझदारी पैदा कर देता है। मेले में हामिद अपनी हर चाह पर संयम रखने में विजयी होता है। साथ ही रुस्तमे ¯हदचिमटे के माध्यम से प्रेमचंद ने श्रम के सौंदयर् एवं महत्त्व को भी उद्घाटित किया है। चित्रात्मक भाषा की दृष्िट से भी यह कहानी अनूठी है। इर्दगाह रमशान के पूरे तीस रोशों के बाद इर्द आइर् है। कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभात है। वृक्षों पर वुफछ अजीब हरियाली है, खेतों में वुफछ अजीब रौनक है, आसमान पर वुफछ अजीब लालिमा है। आज का सूयर् देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है मानो संसार को इर्द की बधाइर् दे रहा है। गाँव में कितनी हलचल है। इर्दगाह जाने की तैयारियाँ हो रही हैं। किसी के वुफरते में बटन नहीं है, पड़ोस के घर से सुइर् - तागा लेने दौड़ा जा रहा है। किसी के जूते कड़े हो गए हैं, उनमें तेल डालने के लिए तेली के घर भागा जाता है। जल्दी - जल्दी बैलों को सानी - पानी दे दें। इर्दगाह से लौटते - लौटते दोपहर हो जाएगा। तीन कोस का पैदल रास्ता, पिफर सैकड़ों आदमियों से मिलना - भेंटना, दोपहर के पहले लौटना असंभव है। लड़के सबसे श्यादा प्रसन्न हैं। किसी ने एक रोशा रखा है, वह भी दोपहर तक, किसी ने वह भी नहींऋ लेकिन इर्दगाह जाने की खुशी उनके हिस्से की चीश है। रोशे बड़े - बूढ़ों के लिए होंगे। इनके लिए तो इर्द है। रोश इर्द का नाम रटते थे आज वह आ गइर्। अब जल्दी पड़ी है कि लोग इर्दगाह क्यों नहीं चलते। इन्हें गृहस्थी की ¯चताओं से क्या प्रयोजन! सेवैयों के लिए दूध और शक्कर घर में है या नहीं, इनकी बला से, ये तो सेवैयाँ खाएँगे। वह क्या जानें कि अब्बाजान क्यों बदहवास चैधरी कायमअली के घर दौड़े जा रहे हैं। उन्हें क्या खबर कि चैधरी आज आँखें बदल लें, तो यह सारी इर्द मुहरर्म हो जाए। उनकी अपनी जेबों में तो वुफबेर का धन भरा हुआ है। बार - बार जेब से अपना खशाना निकालकर गिनते हैं और खुश होकर पिफर रख लेते हैं। महमूद गिनता है, एक - दो, दस - बारह! उसके पास बारह पैसे हैं। मोहसिन के पास एक, दो, तीन, आठ, नौ, पंद्रह पैसे हैं। इन्हीं अनगिनती पैसों में अनगिनती चीशें लाएँगे μ ख्िालौने, मिठाइयाँ, बिगुल, गेंद और जाने क्या - क्या! और सबसे श्यादा प्रसन्न है हामिद। वह चार - पाँच साल का गरीब - सूरत, दुबला - पतला लड़का, जिसका बाप गत वषर् हैशे की भेंट हो गया और माँ न जाने क्यों पीली होती - होती एक दिन मर गइर्। किसी को पता न चला, क्या बीमारी है। कहती तो कौन सुनने वाला था। दिल पर जो वुफछ बीतती थी, वह दिल में ही सहती थी और जब न सहा गया तो संसार से बिदा हो गइर्। अब हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है और उतना ही प्रसन्न है। उसके अब्बाजान रुपये कमाने गए हैं। बहुत - सी थैलियाँ लेकर आएँगे। अम्मीजान अल्लाह मियाँ के घर से उसके लिए बड़ी अच्छी - अच्छी चीशें लाने गइर् हैंऋ इसलिए हामिद प्रसन्न है। आशा तो बड़ी चीश है, और पिफर बच्चों की आशा! उनकी कल्पना तो राइर् का पवर्त बना लेती है। हामिद के पाँव में जूते नहीं हैं, सिर पर एक पुरानी - धुरानी टोपी है, जिसका गोटा काला पड़ गया है, पिफर भी वह प्रसन्न है। जब उसके अब्बाजान थैलियाँ और अम्मीजान नियामतें लेकर आएँगी, तो वह दिल के अरमान निकाल लेगा। तब देखेगा महमूद, मोहसिन, नूरे और सम्मी कहाँ से उतने पैसे निकालेंगे। अभागिन अमीना अपनी कोठरी में बैठी रो रही है। आज इर्द का दिन और उसके घर में दाना नहीं! आज आबिद होता तो क्या इसी तरह इर्द आती और चली जाती! इस अंधकार और निराशा में वह डूबी जा रही है। किसने बुलाया था इस निगोड़ी इर्द को? इस घर में उसका काम नहींऋ लेकिन हामिद! उसे किसी के मरने - जीने से क्या मतलब? उसके अंदर प्रकाश है, बाहरआशा। विपिा अपना सारा दलबल लेकर आए, हामिद की आनंद भरी चितवन उसका विध्वंस कर देगी। हामिद भीतर जाकर दादी से कहता है μ तुम डरना नहीं अम्माँ, मैं सबसे पहले आउफँगा। बिलवुफल न डरना। अमीना का दिल कचोट रहा है। गाँव के बच्चे अपने - अपने बाप के साथ जा रहे हैं। हामिद का बाप अमीना के सिवा और कौन है! उसे वैफसे अकेले मेले जाने दे? उस भीड़ - भाड़ में बच्चा कहीं खो जाए तो क्या हो? नहीं, अमीना उसे यों न जाने देगी। नन्हीं - सी जान! तीन कोस चलेगा वैफसे! पैर में छाले पड़ जाएँगे। जूते भी तो नहीं हंै। वह थोड़ी - थोड़ी दूर पर उसे गोद ले लेगीऋ लेकिन यहाँ सेवैयाँ कौन पकाएगा? पैसे होते तो लौटते - लौटते सब सामग्री जमा करके चटपट बना लेती। यहाँ तो घंटों चीशें जमा करते लगेंगे। माँगे ही का तो भरोसा ठहरा। उस दिन प़्ाफहीमन के कपड़े सिले थे। आठ आने पैसे मिले थे। उस अठन्नी को इर्मान की तरह बचाती चली आती थी इसी इर्द के लिए, लेकिन कल ग्वालन सिर पर सवार हो गइर् तो क्या करती! हामिद के लिए वुफछ नहीं है, तो दो पैसे का दूध तो चाहिए ही। अब तो वुफल दो आने पैसे बच रहे हैं। तीन पैसे हामिद की जेब में, पाँच अमीना के बटुवे में। यही तो बिसात है और इर्द का त्योहार, अल्लाह ही बेड़ा पार लगाए। धोबन और नाइन और मेहतरानी और चूडि़हारिन सभी तो आएँगी। सभी को सेवैयाँ चाहिए और थोड़ा किसी की आँखों नहीं लगता। किस - किस से मुँह चुराएगी। और मुँह क्यों चुराए? साल - भर का त्योहार है। िांदगी खैरियत से रहे, उनकी तकदीर भी तो उसी के साथ है। बच्चे को खुदा सलामत रखे, दिन भी कट जाएँगे। गाँव से मेला चला। और बच्चों के साथ हामिद भी जा रहा था। कभी सब - के - सब दौड़कर आगे निकल जाते। पिफर किसी पेड़ के नीचे खड़े होकर साथवालों का इंतशार करते। यह लोग क्यों इतना धीरे - धीरे चल रहे हैं! हामिद के पैरों में तो जैसे पर लग गए हैं। वह कभी थक सकता है! शहर का दामन आ गया। सड़क के दोनों ओर अमीरों के बगीचे हैं। पक्की चारदीवारी बनी हुइर् है। पेड़ों में आम और लीचियाँ लगी हुइर् हैं। कभी - कभी कोइर् लड़का वंफवफड़ी उठाकर आम पर निशाना लगाता है। माली अंदर से गाली देता हुआ निकलता है। लड़के वहाँ से एक पफला±ग पर हैं। खूब हँस रहे हैं। माली को वैफसा उल्लू बनाया है। बड़ी - बड़ी इमारतें आने लगीं। यह अदालत है, यह कालेज है, यह क्लब - घर है! इतने बड़े कालेज में कितने लड़के पढ़ते होंगे? सब लड़के नहीं हैं जी! बड़े - बड़े आदमी हैं, सच! उनकी बड़ी - बड़ी मूँछें हैं। इतने बड़े हो गए, अभी तक पढ़ने जाते हैं। न जाने कब तक पढ़ेंगे और क्या करेंगे इतना पढ़कर, हामिद के मदरसे में दो - तीन बड़े - बड़े लड़के हैं, बिलवुफल तीन कौड़ी के। रोश मार खाते हैं, काम से जी चुराने वाले। इस जगह भी उसी तरह के लोग होंगे और क्या। क्लब - घर में जादू होता है। सुना है, यहाँ मुदर्े की खोपडि़याँ दौड़ती हैं। और बड़े - बड़े तमाशे होते हैं, पर किसी को अंदर नहीं जाने देते। और यहाँ शाम को साहब लोग खेलते हैं। बड़े - बड़े आदमी खेलते हैं, मूँछों - दाढ़ीवाले। और मेमें भी खेलती हैं, सच! हमारी अम्माँ को वह दे दो, क्या नाम है, बैट, तो उसे पकड़ ही न सवेंफ। घुमाते ही लुढ़क जाएँ। महमूद ने कहा μ हमारी अम्मीजान का तो हाथ काँपने लगे, अल्ला कसम। मोहसिन बोला μ चलो, मनों आटा पीस डालती हैं। शरा - सा बैट पकड़ लेंगी, तो हाथ काँपने लगेंगे? सैकड़ों घड़े पानी रोश निकालती हैं। पाँच घड़े तो तेरी भैंस पी जाती है। किसी मेम को एक घड़ा पानी भरना पड़े तो आँखों तले अँधेरा आ जाए। महमूद μ लेकिन दौड़तीं तो नहीं, उछल - वूफद तो नहीं सकतीं। मोहसिन μ हाँ, उछल - वूफद नहीं सकतीं, लेकिन उस दिन मेरी गाय खुल गइर् थी और चैधरी के खेत में जा पड़ी थी, तो अम्माँ इतना तेश दौड़ीं कि मैं उन्हें न पा सका, सच। आगे चले। हलवाइयों की दूकानें शुरू हुईं। आज खूब सजी हुइर् थीं। इतनी मिठाइयाँ कौन खाता है? देखो न, एक - एक दूकान पर मनों होंगी। सुना है, रात को जिन्नात आकर खरीद ले जाते हैं। अब्बा कहते थे कि आधी रात को एक आदमी हर दूकान पर जाता है और जितना माल बचा होता है, वह तुलवा लेता है और सचमुच के रुपये देता है, बिलवुफल ऐसे ही रुपये। हामिद को यकीन न आया μ ऐसे रुपये जिन्नात को कहाँ से मिल जाएँगे? मोहसिन ने कहा μ जिन्नात को रुपये की क्या कमी? जिस खजाने में चाहें चले जाएँ। लोहे के दरवाशे तक उन्हंे नहीं रोक सकते जनाब, आप हैं किस पेफर में! हीरे जवाहरात तक उनके पास रहते हैं। जिससे खुश हो गए उसे टोकरों जवाहरात देदिए। अभी यहीं बैठे हैैं, पाँच मिनट में कलकत्ता पहुँच जाएँ। हामिद ने पिफर पूछा μ जिन्नात बहुत बड़े - बड़े होते होंगे? मोहसिन μ एक - एक आसमान के बराबर होता है जी। शमीन पर खड़ा हो जाए तो उसका सिर आसमान से जा लगे, मगर चाहे तो एक लोटे में घुस जाए। हामिद μ लोग उन्हें वैफसे खुश करते होंगे। कोइर् मुझे वह मंतर बता दे तो एक जिन्न को खुश कर लूँ। मोहसिन μ अब यह तो मैं नहीं जानता, लेकिन चैधरी साहब के काबू में बहुत से जिन्नात हैं। कोइर् चीश चोरी जाए, चैधरी साहब उसका पता लगा देंगे और चोर का नाम भी बता देंगे। जुमराती का बछवा उस दिन खो गया था। तीन दिन हैरान हुए, कहीं न मिला। तब झक मारकर चैधरी के पास गए। चैधरी ने तुरंत बता दिया, मवेशीखाने में है और वहीं मिला। जिन्नात आकर उन्हें सारे जहान की खबरें दे जाते हैं। अब उसकी समझ में आ गया कि चैधरी के पास क्यों इतना धन है, और क्यों उनका इतना सम्मान है। आगे चले। यह पुलिस लाइन है। यहीं सब कानिसटिबिल कवायद करते हैं। रैटन! प़्ाफाय पफो! रात को बेचारे घूम - घूमकर पहरा देते हैं, नहीं चोरियाँ हो जाएँ। मोहसिन ने प्रतिवाद किया μ यह कानिसटिबिल पहरा देते हैं! तभी तुम बहुत जानते हो। अजी हशरत, यही चोरी कराते हैं। शहर के जितने चोर - डावूफ हैं, सब इनसे मिले रहते हैं। रात को ये लोग चोरों से तो कहते हैं, चोरी करो और आप दूसरे मुहल्ले में जाकर ‘जागते रहो! जागते रहो!’ पुकारते हैं। जभी इन लोगों के पास इतने रुपये आते हैं। मेरे मामूँ एक थाने में कानिसटिबिल हैं। बीस रुपया महीना पाते हैंऋ लेकिन पचास रुपये घर भेजते हैं। अल्ला कसम! मैंने एक बार पूछा था कि मामूँ, आप इतने रुपये कहाँ से पाते हैं? हँसकर कहने लगे μ बेटा, अल्लाह देता है। पिफर आप ही बोले μ हम लोग चाहें तो एक दिन में लाखों मार लाएँ। हम तो इतना ही लेते हैं, जिसमें अपनी बदनामी न हो और नौकरी न चली जाए। हामिद ने पूछा μ यह लोग चोरी करवाते हैं, तो कोइर् इन्हें पकड़ता नहीं? मोहसिन उसकी नादानी पर दया दिखाकर बोला μ अरे पागल, इन्हें कौन पकड़ेगा? पकड़ने वाले तो यह लोग खुद हैंऋ लेकिन अल्लाह इन्हें सशा भी खूब देता है। हराम का माल हराम में जाता है। थोड़े ही दिन हुए मामूँ के घर में आग लग गइर्। सारी लेइर् पूँजी जल गइर्। एक बरतन तक न बचा। कइर् दिन पेड़ के नीचे सोए, अल्ला कसम, पेड़ के नीचे! पिफर न जाने कहाँ से एक सौ कशर् लाए तो बरतन - भाँड़े आए। हामिद μ एक सौ तो पचास से श्यादा होते हैं? ‘कहाँ पचास, कहाँ एक सौ। पचास एक थैली भर होता है। सौ तो दो थैलियों में भी न आए।’ अब बस्ती घनी होने लगी। इर्दगाह जानेवालों की टोलियाँ नशर आने लगीं। एक से एक भड़कीले वस्त्रा पहने हुए। कोइर् इक्के - ताँगे पर सवार, कोइर् मोटर पर, सभी इत्रा में बसे, सभी के दिलों में उमंग। ग्रामीणों का यह छोटा - सा दल, अपनी विपन्नता से बेखबर, संतोष और धैयर् में मगन चला जा रहा था। बच्चों के लिए नगर की सभी चीशें अनोखी थीं। जिस चीश की ओर ताकते, ताकते ही रह जाते और पीछे से बराबर हानर् की आवाश होने पर भी न चेतते। हामिद तो मोटर के नीचे जाते - जाते बचा। सहसा इर्दगाह नशर आया। उफपर इमली के घने वृक्षों की छाया है। नीचे पक्का प़्ाफशर् है, जिस पर जाजिम बिछा हुआ है। और रोशेदारों की पंक्ितयाँ एक के पीछे एक न जाने कहाँ तक चली गइर् हैं, पक्की जगत के नीचे तक, जहाँ जाजिम भी नहीं है। नए आनेवाले आकर पीछे की कतार में खड़े हो जाते हैं। आगे जगह नहीं है। यहाँ कोइर् धन और पद नहीं देखता। इस्लाम की निगाह में सब बराबर हैं। इन ग्रामीणों ने भी वजू किया और पिछली पंक्ित में खड़े हो गए। कितना सुंदर संचालन है, कितनी सुंदर व्यवस्था! लाखों सिर एक साथ सिजदे में झुक जाते हैं, पिफर सब - के - सब एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते हैं, और एक साथ घुटनोंके बल बैठ जाते हैं। कइर् बार यही िया होती है, जैसे बिजली की लाखों बिायाँ एक साथ प्रदीप्त हों और एक साथ बुझ जाएँ और यही क्रम चलता रहे। कितना अपूवर् दृश्य था, जिसकी सामूहिक ियाएँ, विस्तार और अनंतता हृदय को श्र(ा, गवर् और आत्मानंद से भर देती थीं, मानो भ्रातृत्व का एक सूत्रा इन समस्त आत्माओं को एक लड़ी में पिरोए हुए है। नमाश खत्म हो गइर् है। लोग आपस में गले मिल रहे हैं। तब मिठाइर् और ख्िालौने की दूकानों पर धावा होता है। ग्रामीणों का यह दल इस विषय में बालकों से कम उत्साही नहीं है। यह देखो, ¯हडोला है। एक पैसा देकर चढ़ जाओ। कभी आसमान पर जाते हुए मालूम होंगे, कभी शमीन पर गिरते हुए। यह चखीर् है, लकड़ी के हाथी, घोड़े, उँफट छड़ों से लटके हुए हैं। एक पैसा देकर बैठ जाओ और पच्चीस चक्करों का मशा लो। महमूद और मोहसिन और नूरे और सम्मी इन घोड़ों और उफँटों पर बैठते हैं। हामिद दूर खड़ा है। तीन ही पैसे तो उसके पास हंै। अपने कोष का एक तिहाइर् शरा - सा चक्कर खाने के लिए नहीं दे सकता। सब च£खयों से उतरते हैं। अब ख्िालौने लेंगे। इधर दूकानों की कतार लगी हुइर् है। तरह - तरह के ख्िालौने हैं μ सिपाही और गुजरिया, राजा और वकील, भ्िाश्ती और धोबिन और साधु। वाह! कितने सुंदर ख्िालौने हैं। अब बोला ही चाहते हैं। महमूद सिपाही लेता है, खाकी वदीर् और लाल पगड़ीवाला, वंफधे पर बंदूक रखे हुएऋ मालूम होता है अभी कवायद किए चला आ रहा है। मोहसिन को भ्िाश्ती पसंद आया। कमर झुकी हुइर् है, उफपर मशक रखे हुए है। मशक का मुँह एक हाथ से पकड़े हुए है। कितना प्रसन्न है। शायद कोइर् गीत गा रहा है। बस, मशक से पानीउड़ेला ही चाहता है। नूरे को वकील से पे्रम है। वैफसी विद्वत्ता है उसके मुख पर! काला चोगा, नीचे सप़्ोफद अचकन, अचकन के सामने की जेब में घड़ी, सुनहरी शंजीर, एक हाथ में कानून का पोथा लिए हुए। मालूम होता है, अभी किसी अदालत से जिरह या बहस किए चले आ रहे हैं। यह सब दो - दो पैसे के ख्िालौने हैं। हामिद के पास वुफल तीन पैसे हैं, इतने महँगे ख्िालौने वह वैफसे ले? ख्िालौना कहीं हाथ से छूट पड़े, तो चूर - चूर हो जाए, शरा पानी पड़े तो सारा रंग धुल जाए, ऐसे ख्िालौने लेकर वह क्या करेगा, किस काम के? मोहसिन कहता है μ मेरा भ्िाश्ती रोश पानी दे जाएगा, साँझ - सबेरे। महमूद μ और मेरा सिपाही घर का पहरा देगा। कोइर् चोर आएगा, तो प़्ाफौरन बंदूक पैफर कर देगा।़नूरे μ और मेरा वकील खूब मुकदमा लड़ेगा। सम्मी μ और मेरी धोबिन रोश कपड़े धोएगी। हामिद ख्िालौनों की निंदा करता है μ मि‘ी ही के तो हैं, गिरे तो चकनाचूर हो जाएँऋ लेकिन ललचाइर् हुइर् आँखों से ख्िालौनों को देख रहा है। और चाहता है कि शरा देर के लिए उन्हें हाथ में ले सकता। उसके हाथ अनायास ही लपकते हैंऋ लेकिन लड़के इतने त्यागी नहीं होते हैं, विशेषकर जब अभी नया शौक है। हामिद ललचाता रह जाता है। ख्िालौने के बाद मिठाइयाँ आती हैं। किसी ने रेवडि़याँ ली हैं, किसी ने गुलाब - जामुन, किसी ने सोहन हलवा। मशे से खा रहे हैं। हामिद बिरादरी से पृथक है। अभागे के पास तीन पैसे हैं। क्यों नहीं वुफछ लेकर खाता? ललचाइर् आँखों से सबकी ओर देखता है। मोहसिन कहता है μ हामिद, रेवड़ी ले जा, कितनी खुशबूदार है! हामिद को संदेह हुआ, यह केवल व्रूफर विनोद है, मोहसिन इतना उदार नहीं हैऋ लेकिन यह जानकर भी वह उसके पास जाता है। मोहसिन दोने से एक रेवड़ी निकालकर हामिद की ओर बढ़ाता है। हामिद हाथ पैफलाता है। मोहसिन रेवड़ी अपने मुँह में रख लेता है। महमूद, नूरे और सम्मी खूब तालियाँ बजा - बजाकर हँसते हंै। हामिद ख्िासिया जाता है। मोहसिन μ अच्छा, अबकी शरूर देंगे हामिद, अल्ला वफसम, ले जा। हामिद μ रखे रहो। क्या मेरे पास पैसे नहीं हैं? सम्मी μ तीन ही पैसे तो हैं। तीन पैसे में क्या - क्या लोगे? महमूद μ हमसे गुलाब - जामुन ले जाव हामिद। मोहसिन बदमाश है। हामिद μ मिठाइर् कौन बड़ी नेमत है। किताब में इसकी कितनी बुराइयाँ लिखी हैं। मोहसिन μ लेकिन दिल में कह रहे हांेगे कि मिले तो खा लें। अपने पैसे क्यों नहीं निकालते? महमूद μ हम समझते हैं, इसकी चालाकी। जब हमारे सारे पैसे खचर् हो जाएँगे, तो हमें ललचा - ललचाकर खाएगा। मिठाइयों के बाद वुफछ दूकानें लोहे की चीशों की, वुफछ गिलट और वुफछ नकली गहनों की। लड़कों के लिए यहाँ कोइर् आकषर्ण न था। वे सब आगे बढ़ जाते हैं। हामिद लोहे की दूकान पर रुक जाता है। कइर् चिमटे रखे हुए थे। उसे खयाल आया, दादी के पास चिमटा नहीं है। तवे से रोटियाँ उतारती हैं, तो हाथ जल जाता हैऋ अगर वह चिमटा ले जाकर दादी को दे दे, तो वह कितनी प्रसन्न होंगी! पिफर उनकी उँगलियाँ कभी न जलेंगी। घर में एक काम की चीश हो जाएगी। ख्िालौने से क्या प़्ाफायदा। व्यथर् में पैसे खराब होते हैं। शरा देर ही तो खुशी होती है। पिफर तो ख्िालौने को कोइर् आँख उठाकर नहीं देखता। या तो घर पहुँचते - पहुँचते टूट - पूफटकर बराबर हो जाएँगे। चिमटा कितने काम की चीश है। रोटियाँ तवे से उतार लो, चूल्हे में सेंक लो। कोइर् आग माँगने आए तो चटपट चूल्हे से आग निकालकर उसे दे दो। अम्माँ बेचारी को कहाँ प़्ाुफरसत है कि बाशार आएँ और इतने पैसे ही कहाँ मिलते हैं। रोश हाथ जला लेती हैं। हामिद के साथी आगे बढ़ गए हैं। सबील पर सब - के - सब शरबत पी रहे हैं। देखो, सब कितने लालची हैं! इतनी मिठाइयाँ लीं, मुझे किसी ने एक भी न दी। उस पर कहते हैं, मेरे साथ खेलो। मेरा यह काम करो। अब अगर किसी ने कोइर् काम करने को कहा, तो पूछूँगा। खाएँ मिठाइयाँ, आप मुँह सड़ेगा, पफोडे़ पुंफसियाँ निकलेंगी, आप ही शबान चटोरी हो जाएगी। तब घर से पैसे चुराएँगे और मार खाएँगे। किताब में झूठी बातें थोड़े ही लिखी हैं। मेरी शबान क्यों खराब होगी। अम्माँ चिमटा देखते ही दौड़कर मेरे हाथ से ले लेंगी और कहेंगी μ मेरा बच्चा अम्माँ के लिए चिमटा लाया है। हशारों दुआएँ देंगी। पिफर पड़ोस की औरतों को दिखाएँगी। सारे गाँव में चचार् होने लगेगी, हामिद चिमटा लाया है। कितना अच्छा लड़का है। इन लोगों के ख्िालौनों पर कौन इन्हें दुआएँ देगा? बड़ों की दुआएँ सीधे अल्लाह के दरबार में पहुँचती हैं और तुरंत सुनी जाती हैं। मेरे पास पैसे नहीं हैं। तभी तो मोहसिन औरमहमूद यों मिशाज दिखाते हैं। मैं भी इनसे मिशाज दिखाऊँगा। खेलें ख्िालौने और खाएँ मिठाइयाँ। मैं नहीं खेलता ख्िालौने, किसी का मिशाज क्यों सहूँ। मैं गरीब सही, किसी से वुफछ माँगने तो नहीं जाता। आख्िार अब्बाजान कभी - न - कभी आएँगे। अम्माँ भी आएँगी ही। पिफर इन लोगों से पूछूँगा, कितने ख्िालौने लोगे? एक - एक को टोकरियों ख्िालौने दूँ और दिखा दूँ कि दोस्तों के साथ इस तरह सलूक किया जाता है। यह नहीं कि एक पैसे की रेवडि़याँ लीं तो चिढ़ा - चिढ़ाकर खाने लगे। सब - के - सब हँसेंगे कि हामिद ने चिमटा लिया है। हँसें! मेरी बला से! उसने दूकानदार से पूछा μ यह चिमटा कितने का है? दूकानदार ने उसकी ओर देखा और कोइर् आदमी साथ न देखकर कहा μ तुम्हारे काम का नहीं है जी!‘बिकाऊ है कि नहीं?’‘बिकाऊ क्यों नहीं है। और यहाँ क्यों लाद लाए हैं?’ ‘तो बताते क्यों नहीं, वैफ पैसे का है?’ ‘छह पैसे लगेंगे।’ हामिद का दिल बैठ गया। ‘ठीक - ठीक बताओ!’ ‘ठीक - ठीक पाँच पैसे लगेंगे, लेना हो लो, नहीं चलते बनो।’ हामिद ने कलेजा मशबूत करके कहा μ तीन पैसे लोगे? यह कहता हुआ वह आगे बढ़ गया कि दूकानदार की घुड़कियाँ न सुने। लेकिन दूकानदार ने घुड़कियाँ नहीं दीं। बुलाकर चिमटा दे दिया। हामिद ने उसे इस तरह कंधे पर रखा, मानो बंदूक है और शान से अकड़ता हुआ संगियों के पास आया। शरा सुनें, सब - के - सब क्या - क्या आलोचनाएँ करते हैं। मोहसिन ने हँसकर कहा μ यह चिमटा क्यों लाया पगलेऋ इसे क्या करेगा? हामिद ने चिमटे को शमीन पर पटककर कहा μ शरा अपना भ्िाश्ती शमीन पर गिरा दो। सारी पसलियाँ चूर - चूर हो जाएँ बचा की। महमूद बोला μ तो यह चिमटा कोइर् ख्िालौना है? हामिद μ ख्िालौना क्यों नहीं है? अभी वंफधे पर रखा, बंदूक हो गइर्। हाथ में ले लिया, पफकीरों का चिमटा हो गया, चाहूँ तो इससे मजीरे का काम ले सकता हूँ। एक चिमटा जमा दूँ, तो तुम लोगों के सारे ख्िालौनों की जान निकल जाए। तुम्हारे ख्िालौने कितना ही शोर लगाएँ, मेरे चिमटे का बाल भी बाँका नहीं कर सकते। मेरा बहादुर शेर है μ चिमटा। सम्मी ने खँजरी ली थी। प्रभावित होकर बोला μ मेरी खँजरी से बदलोगे? दो आने की है। हामिद ने खँजरी की ओर उपेक्षा से देखा μ मेरा चिमटा चाहे तो तुम्हारे खँजरी का पेट पफाड़ डाले। बस एक चमड़े की झिल्ली लगा दी, ढब - ढब बोलने लगी। शरा - सा पानी लग जाए तो खतम हो जाए। मेरा बहादुर चिमटा आग में, पानी में, आँधी में, तूपफान में बराबर डटा खड़ा रहेगा।़चिमटे ने सभी को मोहित कर लिया, लेकिन अब पैसे किसके पास धरे हैं। पिफर मेले से दूर निकल आए हैं, नौ कब के बज गए, धूप तेश हो रही है। घर पहुँचने की जल्दी हो रही है। बाप से िाद भी करें, तो चिमटा नहीं मिल सकता। हामिद है बड़ा चालाक। इसीलिए बदमाश ने अपने पैसे बचा रखे थे। अब बालकों के दो दल हो गए हैं। मोहसिन, महमूद, सम्मी और नूरे एक तरप़्ाफ हैं, हामिद अकेला दूसरी तरप़्ाफ। शास्त्राथर् हो रहा है। सम्मी तो विधमीर् हो गया। दूसरे पक्ष से जा मिलाऋ लेकिन मोहसिन, महमूद और नूरे भी, हामिद से एक - एक, दो - दो साल बड़े होने पर भी हामिद के आघातों से आतंकित हो उठे हैं। उसके पास न्याय का बल है और नीति की शक्ित। एक ओर मि‘ी है, दूसरी ओर लोहा, जो इस वक्त अपने को प़्ाफौलाद कह रहा है। वह अजेय है, घातक है। अगर कोइर् शेर आ जाए, तो मियाँ भ्िाश्ती के छक्के छूट जाएँ, मियाँ सिपाही मि‘ी की बंदूक छोड़कर भागें, वकील साहब की नानी मर जाए, चोगे में मुँह छिपाकर शमीन पर लेट जाएँ। मगर यह चिमटा, यह बहादुर, यह रुस्तमे - ¯हद लपककर शेर की गरदन पर सवार हो जाएगा और उसकी आँखें निकाल लेगा। मोहसिन ने एड़ी - चोटी का शोर लगाकर कहा μ अच्छा, पानी तो नहीं भर सकता। हामिद ने चिमटे को सीधा खड़ा करके कहा μ भ्िाश्ती को एक डाँट बताएगा तो दौड़ा हुआ पानी लाकर उसके द्वार पर छिड़कने लगेगा। मोहसिन परास्त हो गयाऋ पर महमूद ने वुफमुक पहुँचाइर् μ अगर बचा पकड़ जाएँ तो अदालत में बँधे - बँधे पिफरेंगे। तब तो वकील साहब के पैरों पडे़ंगे। हामिद इस प्रबल तवर्फ का जवाब न दे सका। उसने पूछा μ हमें पकड़ने कौन आएगा? नूरे ने अकड़कर कहा μ यह सिपाही बंदूकवाला। हामिद ने मुँह चिढ़ाकर कहा μ यह बेचारे हम बहादुर रुस्तमे - ¯हद को पकड़ेंगे! अच्छा लाओ, अभी शरा वुफश्ती हो जाए। इसकी सूरत देखकर दूर से भागेंगे। पकड़ेंगे क्या बेचारे! मोहसिन को एक नइर् चोट सूझ गइर् μ तुम्हारे चिमटे का मुँह रोश आग में जलेगा। उसने समझा था कि हामिद लाजवाब हो जाएगाऋ लेकिन यह बात न हुइर्। हामिद ने तुरंत जवाब दिया μ आग में बहादुर ही वूफदते हैं जनाब, तुम्हारे यह वकील, सिपाही और भ्िाश्ती लेडियों की तरह घर में घुस जाएँगे। आग में वूफदना वह काम है, जो यह रुस्तमे - ¯हद ही कर सकता है। महमूद ने एक शोर लगाया μ वकील साहब वुफसीर् - मेश पर बैठेंगे, तुम्हारा चिमटा तो बावचीर्खाने में शमीन पर पड़ा रहेगा। इस तवर्फ ने सम्मी और नूरे को भी सजीव कर दिया। कितने ठिकाने की बात कही है पऋे ने। चिमटा बावचीर्खाने में पड़ा रहने के सिवा और क्या कर सकता है? हामिद को कोइर् पफड़कता हुआ जवाब न सूझा तो उसने धाँधली शुरू की μ मेरा चिमटा बाबचीर्खाने में नहीं रहेगा। वकील साहब वुफसीर् पर बैठेंगे, तो जाकर उन्हें शमीन पर पटक देगा और उनका कानून उनके पेट में डाल देगा। बात वुफछ बनी नहीं। खासी गाल - गलौज थीऋ लेकिन कानून को पेट में डालने वाली बात छा गइर्। ऐसी छा गइर् कि तीनों सूरमा मुँह ताकते रह गए, मानो कोइर् धेलचा कनकौआ किसी गंडेवाले कनकौए को काट गया हो। कानून मुँह से बाहर निकलने वाली चीश है। उसको पेट के अंदर डाल दिया जाना, बेतुकी - सी बात होने पर भी वुफछ नयापन रखती है। हामिद ने मैदान मार लिया। उसका चिमटा रुस्तमे - ¯हद है। अब इसमेंमोहसिन, महमूद, नूरे, सम्मी किसी को भी आपिा नहीं हो सकती। विजेता को हारने वालों से जो सत्कार मिलना स्वाभाविक है, वह हामिद को भी मिला। औरों ने तीन - तीन, चार - चार आने पैसे खचर् किए, पर कोइर् काम की चीश न ले सके। हामिद ने तीन पैसे में रंग जमा लिया। सच ही तो है, ख्िालौनों का क्या भरोसा? टूट - पूफट जाएँगे। हामिद का चिमटा तो बना रहेगा बरसों! संिा की शते± तय होने लगीं। मोहसिन ने कहा μ शरा अपना चिमटा दो हम भी देखें। तुम हमारा भ्िाश्ती लेकर देखो। महमूद और नूरे ने भी अपने - अपने ख्िालौने पेश किए।हामिद को इन शतो± के मानने में कोइर् आपिा न थी। चिमटा बारी - बारी से सबके हाथ में गयाऋ और उनके ख्िालौने बारी - बारी से हामिद के हाथ में आए। कितने खूबसूरत ख्िालौने हैं! हामिद ने हारने वालों के आँसू पोंछे μ मैं तुम्हें चिढ़ा रहा था, सच! यह चिमटा भला इन ख्िालौनों की क्या बराबरी करेगाऋ मालूम होता है, अब बोले, अब बोले। लेकिन मोहसिन की पाटीर् को इस दिलासे से संतोष नहीं होता। चिमटे का सिक्का खूब बैठ गया है। चिपका हुआ टिकट अब पानी से नहीं छूट रहा है। मोहसिन μ लेकिन इन ख्िालौनों के लिए कोइर् हमें दुआ तो न देगा? महमूद μ दुआ को लिए पिफरते हो। उलटे मार न पड़े। अम्माँ शरूर कहेंगी कि मेले में यही मि‘ी के ख्िालौने तुम्हें मिले? हामिद को स्वीकार करना पड़ा कि ख्िालौनों को देखकर किसी की माँ इतनी खुश न होगी, जितनी दादी चिमटे को देखकर होंगी। तीन पैसों ही में तो उसे सब वुफछ करना था और उन पैसों के इस उपयोग पर पछतावे की बिलवुफल शरूरत न थी। पिफर अब तो चिमटा रुस्तमे - ¯हद है और सभी ख्िालौनों का बादशाह! रास्ते में महमूद को भूख लगी। उसके बाप ने केले खाने को दिए। महमूद ने केवल हामिद को साझी बनाया। उसके अन्य मित्रा मुँह ताकते रह गए। यह उस चिमटे का प्रसाद था। ग्यारह बजे गाँव में हलचल मच गइर्। मेले वाले आ गए। मोहसिन की छोटी बहन ने दौड़कर भ्िाश्ती उसके हाथ से छीन लिया और मारे खुशी के जो उछली, तो मियाँ भ्िाश्ती नीचे आ रहे और सुरलोक सिधरे। इस पर भाइर् - बहन में मार - पीट हुइर्। दोनोंखूब रोए। उसकी अम्माँ यह शोर सुनकर बिगड़ी और दोनों को ऊपर से दो - दो चाँटे और लगाए। मियाँ नूरे के वकील का अंत उनके प्रतिष्ठानुवूफल इससे श्यादा गौरवमय हुआ। वकील शमीन पर या ताक पर तो नहीं बैठ सकता। उसकी मयार्दा का विचार तो करना ही होगा। दीवार में दो खूटियाँ गाड़ी गईं। उन पर लकड़ी का एक पटरा रखा गया। पटरे पर कागश का कालीन बिछाया गया। वकील साहब राजा भोज की भाँति ¯सहासन पर बिराजे। नूरे ने उन्हें पंखा झलना शुरू किया। अदालतों में खस की ट‘ियाँ और बिजली के पंखे रहते हैं। क्या यहाँ मामूली पंखा भी न हो! कानून की गरमी दिमाग पर चढ़ जाएगी कि नहीं। बाँस का पंखा आया और नूरे हवा करने लगे। मालूम नहीं, पंखे की हवा से, या पंखे की चोट से वकील साहब स्वगर्लोक से मृत्युलोक में आ रहे और उनका माटी का चोला माटी में मिल गया। पिफर बड़े शोर - शोर से मातम हुआ और वकील साहब की अस्िथ घूर पर डाल दी गइर्। अब रहा महमूद का सिपाही। उसे चटपट गाँव का पहरा देने का चाजर् मिल गयाऋ लेकिन पुलिस का सिपाही कोइर् साधारण व्यक्ित तो नहीं, जो अपने पैरों चले। वह पालकी पर चलेगा। एक टोकरी आइर्, उसमें वुफछ लाल रंग के पफटे - पुराने चिथड़े बिछाए गएऋ जिसमें सिपाही साहब आराम से लेटे। नूरे ने यह टोकरी उठाइर् और अपने द्वार का चक्कर लगाने लगे। उनके दोनों छोटे भाइर् सिपाही की तरपफ से़‘छोनेवाले, जागते लहो’ पुकारते चलते हैं। मगर रात तो अँधेरी होनी चाहिएऋ महमूद को ठोकर लग जाती है। टोकरी उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ती है और मियाँ सिपाही अपनी बंदूक लिए शमीन पर आ जाते हैं और उनकी एक टाँग में विकार आ जाता है। महमूद को आज ज्ञात हुआ कि वह अच्छा डाॅक्टर है। उसको ऐसा मरहम मिल गया है जिससे वह टूटी टाँग को आनन - पफानन जोड़ सकता है। केवल गूलर का दूध चाहिए। गूलर का दूध आता है। टाँग जोड़ दी जाती है लेकिन सिपाही को ज्यों ही खड़ा किया जाता है, टाँग जवाब दे देती है। शल्यिया असपफल हुइर्, तब उसकी दूसरी टाँग भी तोड़ दी जाती हैै। अब कम - से - कम एक जगह आराम से बैठ तो सकता है। एक टाँग से तो न चल सकता थाऋ न बैठ सकता था। अब वह सिपाही संन्यासी हो गया है। अपनी जगह पर बैठा - बैठा पहरा देता है। कभी - कभी देवता भी बन जाता है। उसके सिर का झालरदार साप़्ाफा खुरच दिया गया है। अब उसका जितना रूपांतर चाहो, कर सकते हो। कभी - कभी तो उससे बाट का काम भी लिया जाता है। अब मियाँ हामिद का हाल सुनिए। अमीना उसकी आवाश सुनते ही दौड़ी और उसे गोद में उठाकर प्यार करने लगी। सहसा उसके हाथ में चिमटा देखकर वह चैंकी। ‘यह चिमटा कहाँ था?’ ‘मैंने मोल लिया है।’ ‘वैफ पैसे में?’ ‘तीन पैसे दिए।’ अमीना ने छाती पीट ली। यह वैफसा बेसमझ लड़का है कि दोपहर हुआ, वुफछ खाया न पिया। लाया क्या, चिमटा! सारे मेले में तुझे और कोइर् चीश न मिली, जो यह लोहे का चिमटा उठा लाया? हामिद ने अपराधी - भाव से कहा μ तुम्हारी उँगलियाँ तवे से जल जाती थींऋ इसलिए मैंने उसे लिया। बुढि़या का क्रोध तुरंत स्नेह में बदल गया, और स्नेह भी वह नहीं, जो प्रगल्भ होता है और अपनी सारी कसक शब्दों में बिखेर देता है। यह मूक स्नेह था, खूब ठोस, रस और स्वाद से भरा हुआ। बच्चे में कितना त्याग, कितना सद्भाव और कितना विवेक है! दूसरों को ख्िालौने लेते और मिठाइर् खाते देखकर इसका मन कितना ललचाया होगा? इतना शब्त इससे हुआ वैफसे? वहाँ भी इसे अपनी बुढि़या दादी की याद बनी रही। अमीना का मन गद्गद हो गया। और अब एक बड़ी विचित्रा बात हुइर्। हामिद के इस चिमटे से भी विचित्रा। बच्चे हामिद ने बूढ़े हामिद का पाटर् खेला था। बुढि़या अमीना बालिका अमीना बन गइर्। वह रोने लगी। दामन पैफलाकर हामिद को दुआएँ देती जाती थी और आँसू की बड़ी - बड़ी बूँदें गिराती जाती थी। हामिद इसका रहस्य क्या समझता! 2.‘उसके अंदर प्रकाश है, बाहर आशा। विपिा अपना सारा दलबल लेकर आए, हामिद की आनंद भरी चितवन उसका विध्वंस कर देगी।’ μ इस कथन के आधर पर स्पष्ट कीजिए कि आशा का प्रकाश मनुष्य को विपरीत परिस्िथतियों में भी निरंतर आगे बढ़ने की प्ररेणा देता है। 3.‘उन्हें क्या खबर कि चैध्री आज आँखें बदल लें, तो यह सारी इर्द मुहरर्म हो जाए।’ μ इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए। 4.‘मानो भ्रातृत्व का एक सूत्रा इन समस्त आत्माओं को एक लड़ी में पिरोए हुए है।’ इस कथन के संदभर् में स्पष्ट कीजिए कि ‘ध्मर् तोड़ता नहीें जोड़ता है।’ 5.‘इर्दगाह’ कहानी के शीषर्क का औेचित्य सि( कीजिए। क्या इस कहानी को कोइर् अन्य शीषर्क दिया जा सकता है? 6.निम्नलिख्िात गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए - - ;कद्ध कइर् बार यही वि्रफया होती है ................आत्माओं को एक लड़ी में पिरोए हुए है। ;खद्ध बुढि़या का व्रफोध् ................स्वाद से भरा हुआ। 7.हामिद ने चिमटे की उपयोगिता को सि( करते हुए क्या - क्या तवर्फ दिए? 8.गाँव से शहर जानेवाले रास्ते के मध्य पड़नेवाले स्थलों का ऐसा वणर्न लेखक ने किया है मानो अँाखों के सामने चित्रा उपस्िथत हो रहा हो। अपने घर और विद्यालय के मध्य पड़नेवाले स्थानों का अपने शब्दों में वणर्न कीजिए। 9.‘बच्चे हामिद ने बूढे़ हामिद का पाटर् खेला था। बुढि़या अमीना बालिका अमीना बन गइर्।’ इस कथन में ‘बूढ़े हामिद’ और ‘बालिका अमीना’ से लेखक का क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए। 10.‘दामन पैफलाकर हामिद को दुआएँ देती जाती थी और आँसू की बड़ी - बड़ी बूँदें गिराती जाती थी। हामिद इसका रहस्य क्या समझता!’ μ लेखक के अनुसार हामिद अमीना की दुआओं और आँसुओं के रहस्य को क्यों नहीं समझ पाया? कहानी के आधर पर स्पष्ट कीजिए। 11.हामिद के चरित्रा की कोइर् तीन विशेषताएँ बताइए। 12.हामिद के अतिरिक्त इस कहानी के किस पात्रा ने आपको सवार्ध्िक प्रभावित किया और क्यों? 13.बच्चों में लालच एवं एक दूसरे से आगे निकल जाने की होड़ के साथ - साथ निश्छलता भी मौजूद होती है। कहानी से कोइर् दो प्रसंग चुनकर इस मत की पुष्िट कीजिए। 14.‘प्रेमचंद की भाषा बहुत सजीव, मुहावरेदार और बोलचाल के निकट है।’ कहानी के आधार पर इस कथन की साथर्कता स्पष्ट कीजिए। योग्यता - विस्तार 1.प्रेमचंद की कहानियों का संग्रह ‘मानसरोवर’ नाम से आठ भागों में प्रकाश्िात है। अपने पुस्तकालय से लेकर उसे पढि़ए। 2.इस कहानी में लोक प्रचलित मुहावरों की भरमार है, जैसे μ नानी मरना, छक्के छूटना आदि। इसमें आए मुहावरों की एक सूची तैयार कीजिए। शब्दाथर् और टिप्पणी बला - कष्ट, आपिा, बहुत कष्ट देनेवाली वस्तु बदहवास - घबराना, होश - हवास ठीक न होना निगोड़ी - अभागी, निराश्रय, जिसवफा कोइर् न हो चितवन - किसी की ओर देखने का ढंग, दृष्िट, कटाक्ष वशू - नमाश से पहले यथाविध्ि हाथ - पाँव और मुँह धेना सिजदा - माथा टेकना, खुदा के आगे सिर झुकाना ¯हडोला - झूला, पालना मशक - भेड़ या बकरी की खाल को सीकर बनाया हुआ थैला जिससे भ्िाश्ती पानी ढोते हैं अचकन - लंबा कलीदार अँगरखा जिसमें पहले गरेबाँ से कमर - प‘ी तक अधर्चंद्राकार बंद लगते थे और अब सीध्े बटन टँकते हैं नेमत - बहुत बढि़या शब्त - सहन करना दामन - पल्लू, आँचल

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