अध्याय 8 गुरुत्वाकषर्ण 8ण्1 भूमिका 8ण्2 केप्लर के नियम 8ण्3 गुरुत्वाकषर्ण का सावर्त्रिाक नियम 8ण्4 गुरुत्वीय नियतांक 8ण्5 पृथ्वी का गुरुत्वीय त्वरण 8ण्6 पृथ्वी के पृष्ठ के नीचे तथाऊपर गुरुत्वीय त्वरण 8ण्7 गुरुत्वीय स्िथतिज ऊजार् 8ण्8 पलायन चाल 8ण्9 भू उपग्रह 8ण्10 कक्षा में गतिशील उपग्रह कीऊजार् 8ण्11 तुल्यकाली तथा ध््रुवीय उपग्रह 8ण्12 भारहीनता सारांश विचारणीय विषय अभ्यास अतिरिक्त अभ्यास 8ण्1 भूमिका हम अपने आरंभ्िाक जीवन में ही, सभी पदाथो± के पृथ्वी की ओर आकष्िार्त होनेकी प्रकृति को जान लेते हैं। जो भी वस्तु ऊपर पेंफकी जाती है वह पृथ्वी कीओर गिरती है, पहाड़ से नीचे उतरने की तुलना में पहाड़ पर ऊपर जाने में कहींअिाक थकान होती है, ऊपर बादलों से वषार् की बूँदें पृथ्वी की ओर गिरती हैं, तथा अन्य ऐसी ही बहुत सी परिघटनाएँ हैं। इतिहास के अनुसार इटली के भौतिक विज्ञानी गैलीलियो ;1564 - 1642द्ध ने इस तथ्य को मान्यता प्रदान की कि सभी पिण्ड, चाहे उनके द्रव्यमान वुफछ भी हों, एकसमान त्वरण से पृथ्वी की ओर त्वरित होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने इस तथ्य का सावर्जनिक निदशर्न किया था। यह कहना, चाहे सत्य भी न हो, परंतु यह निश्िचत है कि उन्होंने आनत समतल पर लोटनी पिण्डों के साथ वुफछ प्रयोग करके गुरुत्वीय त्वरण का एक मान प्राप्त किया था, जो बाद में किए गए प्रयोगों द्वारा प्राप्त अध्िक यथाथर् मानों के कापफी निकट था। आद्य काल से ही बहुत से देशों में तारों, ग्रहों तथा उनकी गतियों के प्रेक्षण जैसी असंब( प्रतीत होने वाली परिघटनाएँ ध्यानाकषर्ण का विषय रही हैं। आद्य काल के प्रेक्षणों द्वारा आकाश में दिखाइर् देने वाले तारों की पहचान की गइर्, जिनकी स्िथति में सालोंसाल कोइर् परिवतर्न नहीं होता है। प्राचीन काल से देखे जाने वाले पिण्डों में वुफछ अध्िक रोचक पिण्ड भी देखे गए, जिन्हें ग्रह कहते हैं, और जो तारों की पृष्ठभूमि में नियमित गति करते प्रतीत होते हैं। ग्रहीय गतियों के सबसे प्राचीन प्रमाण्िात माॅडल को अब से लगभग 2000 वषर् पूवर् टाॅलमी ने प्रस्तावित किया था। यह ‘भूकेन्द्री’ माॅडल था, जिसके अनुसार सभी आकाशीय पिण्ड तारे, सूयर् तथा ग्रह पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं। इस माॅडल की धरणा केअनुसार आकाशीय पिण्डों की संभावित गति केवल वृत्तीय गति ही हो सकती थी। ग्रहों की प्रेक्ष्िात गतियों का वणर्न करने के लिए टाॅलमी ने गतियों के जिसविन्यास को प्रतिपादित किया वह बहुत जटिल था। इसके अनुसार ग्रहों को वृत्तोंमें परिक्रमा करने वाला तथा इन वृत्तों के केन्द्रों को स्वयं एक बड़े वृत्त में गतिशील बताया गया था। लगभग 400 वषर् के पश्चात भारतीय खगोलज्ञों ने भी इसी प्रकार के सि(ांत प्रतिपादित किए। तथापि, आयर्भट्टð ;5 वीं शताब्दी मेंद्ध ने पहले से ही अपने शोध् प्रबन्ध् में एक अध्िक परिष्कृत माॅडल का वणर्न किया था, जिसे सूयर् केन्द्री माॅडल कहते हैं जिसके अनुसार सूयर् को सभी ग्रहों की गतियों का केन्द्र माना गया है। एक हजार वषर् के पश्चात पोलैण्ड के एक इर्साइर् भ्िाक्षु, जिनका नाम निकोलस कोपरनिकस ;1473 - 1543द्ध था, ने एक पूणर् विकसित माॅडल प्रस्तावित किया जिसके अनुसारसभी ग्रह, केन्द्रीय स्थान पर स्िथत स्िथर सूयर्, के परितः वृत्तों में परिक्रमा करते हैं। गिरजाघर ने इस सि(ांत पर संदेह प्रकट किया। परन्तु इस सि(ांत के लब्ध् प्रतिष्िठत समथर्कों में एक गैलीलियो थे, जिनपर शासन के द्वारा, आस्था के विरु( होने के कारण, मुकदमा चलाया गया। लगभग गैलीलियो के ही काल में डेनमावर्फ के एक वुफलीन पुरुष टायको ब्रेह ;1546 - 1601द्ध ने अपना समस्त जीवन काल अपनी नंगी आंखों से सीध्े ही ग्रहों के प्रेक्षणों का अभ्िालेखन करने में लगा दिया। उनके द्वारा संकलित आँकड़ों का बाद में उसके सहायक जोहान्नेस केप्लर ;1571 - 1640द्ध द्वारा विश्लेषण किया गया। उन्होंने इन आँकड़ों को सार के रूप में तीनपरिष्कृत नियमों द्वारा प्रतिपादित किया, जिन्हें अब केप्लर के नियमों के नाम से जाना जाता है। ये नियम न्यूटन को ज्ञात थे। इन उत्वृफष्ट नियमों ने न्यूटन को अपना गुरुत्वाकषर्ण का सावर्त्रिाक नियम प्रस्तावित करके असाधरण वैज्ञानिकों की पंक्ित में शामिल होने योग्य बनाया। 8ण्2 केप्लर के नियम केप्लर के तीन नियमों का उल्लेख इस प्रकार किया जा सकता हैः 1ण् कक्षाओं का नियम: सभी ग्रह दीघर्वृत्तीय कक्षाओं में गति करते हैं तथा सूयर् इसकी, एक नाभ्िा पर स्िथत होता है ;चित्रा चित्रा 8ण्1;ंद्ध सूयर् के परितः किसी ग्रह द्वारा अनुरेख्िात दीघर्वृत्त। सूयर् का निकटतम बिन्दु च् तथा दूरस्थ बिन्दु । है। च् को उपसौर तथा । को अपसौर कहते हैं। अध्र् दीघर् अक्ष दूरी ।च् का आध है। यह नियम कोपरनिकस के माॅडल से हटकर था जिसकेअनुसार ग्रह केवल वृत्तीय कक्षाओं में ही गति कर सकते हैं।दीघर्वृत्त, जिसका वृत्त एक विश्िाष्ट प्रकरण होता है, एक बन्द वक्र होता है, जिसे बहुत सरलता से इस प्रकार खींचा जा सकता है: चित्रा 8ण्1;इद्ध एक दीघर्वृत खींचना। एक डोरी के दो सिरे थ्1 तथा थ्2 स्िथर हैं। पेंसिल की नोंक डोरी को तनी रखते हुए इन सिरों के परितः चलायी जाती है। दो बिन्दुओं थ्1 तथा थ्2 का चयन कीजिए। एक डोरी लेकर इसके सिरों को थ्1 तथा थ्2 पर पिनों द्वारा जडि़ए। पेंसिल की नोंक से डोरी को तानिए और पिफर डोरी को तनी हुइर् रखते हुए पेंसिल को चलाते हुए बन्द वक्र खींचिए ;चित्रा 8.1 ;इद्धद्ध इस प्रकार प्राप्त बन्द वक्र को दीघर्वृत्त कहते हैं। स्पष्ट है कि दीघर्वृत्त के किसी भी बिन्दु ज् पर थ्1 तथा थ्2 से दूरियों का योग अपरिवतिर्त ;नियतद्ध है। बिन्दु थ्1 तथा थ्2 दीघर्वृत्त की नाभ्िा कहलाती है। बिन्दु थ्1 तथा थ्2 को मिलाइए और इस रेखा को आगे बढ़ाइए जिससे यह दीघर्वृत्त को चित्रा 8ण्1 ;इद्ध में दशार्ए अनुसार बिन्दुओं च् तथा । पर प्रतिच्छेद करती है। रेखा च्। का मध्यबिन्दु दीघर्वृत्त का केन्द्र है तथा लम्बाइर् च्व् त्र ।व् दीघर्वृत्त का अध्र् दीघर् अक्ष कहलाती है। किसी वृत्त के लिए दोनों नाभ्िायाँ एक दूसरे में विलीन होकर एक हो जाती हैं तथा अधर् दीघर् अक्ष वृत्त की त्रिाज्या बन जाती है। 2ण् क्षेत्रापफलों का नियम: सूयर् से किसी ग्रह को मिलाने वाली रेखा समान समय अंतरालों में समान क्षेत्रापफल प्रसपर् करती है ;चित्रा 8.2द्ध। यह नियम इस प्रेक्षण से प्रकट होता है कि ग्रह उस समय ध्ीमी गति करते प्रतीत होते हैं जब वे सूयर् से अिाक दूरी पर होते हैं। सूयर् के निकट होने पर ग्रहों की गति अपेक्षाकृत तीव्र होती है। चित्रा 8ण्2 ग्रह च् सूयर् के परितः दीघर्वृत्तीय कक्षा में गति करता है। किसी छोटे समय अंतराल Δज में ग्रह द्वारा प्रस£पत क्षेत्रापफल Δ। को छायांकित क्षेत्रा द्वारा दशार्या गया है। 3ण् आवतर् कालों का नियम किसी ग्रह के परिक्रमण काल का वगर् उस ग्रह द्वाराअनुरेख्िात दीघर्वृत्त के अध्र् - दीघर् अक्ष के घन के अनुक्रमानुपाती होता है। नीचे दी गयी सारणी ;8.1द्ध में सूयर् के परितः आठ’ ग्रहों के सन्िनकट परिक्रमण - काल उनके अध्र् - दीघर् अक्षों के मानों सहित दशार्ए गए हैं सारणी 8.1 नीचे दिए गए ग्रहीय गतियों की माप के आँकड़े केप्लर के आवतर्कालों के नियम की पुष्िट करते हैं। ं ≡ अध्र् - दीघर् अक्ष 1010 उ के मात्राकों में ज् ≡ ग्रह का परिक्रमण - काल वषो± ;लद्ध में फ ≡ भागपफल ; ज्2 ध् ं 3 द्ध 10 .34 ल2 उ.3 मात्राकों में ग्रह ं ज् फ बुध् 5ण्79 0ण्24 2ण्95 शुक्र 10ण्8 0ण्615 3ण्00 पृथ्वी 15ण्0 1 2ण्96 मंगल 22ण्8 1ण्88 2ण्98 बृहस्पति 77ण्8 11ण्9 3ण्01 शनि 143 29ण्5 2ण्98 यूरेनस 287 84 2ण्98 नेप्ट्यून 450 165 2ण्99 प्लूटो’ 590 248 2ण्99 क्षेत्रापफलों के नियम को कोणीय संवेग संरक्षण का निष्कषर् माना जा सकता है जो सभी केन्द्रीय बलों के लिए मान्य है। किसी ग्रह पर लगने वाला केन्द्रीय बल, केन्द्रीय सूयर् तथा ग्रह को मिलाने वाले सदिश के अनुदिश कायर् करता है। मान ’पृष्ठ 186 पर बाॅक्स में दी गइर् जानकारी पर ध्यान दें। जोहान्नेस केप्लर ;1571 - 1630द्ध जमर्न मूल के वैज्ञानिक थे। उन्होंने टायको ब्रेह और उनके सहयोगियों द्वारा बहुत परिश्रमपूवर्क लिए गए पे्रक्षणों के आधर पर ग्रहों की गति के तीन नियमों का प्रतिपादन किया। केप्लर स्वयं ब्रेह के सहायक थे और उनको ग्रहों के तीन नियमों तक पहुँचने मंे 16 वषो± का लंबा समय लगा। वह पहले व्यक्ित थे जिन्होंने यह बताया कि दूरदशीर् में प्रवेश करने पर प्रकाश का क्या होता है, इसलिए, वह ज्यामितीय प्रकाश्िाकी के संस्थापक के रूप में भी जाने जाते हैं। लीजिए सूयर् मूल बिन्दु पर है और यह भी मानिए कि ग्रह की स्िथति तथा संवेग को क्रमशः त तथा च से दशार्या जाता है, तब उ द्रव्यमान के ग्रह द्वारा Δज समय में प्रस£पत क्षेत्रापफल Δ। ;चित्रा 8.2द्ध इस प्रकार व्यक्त किया जाता है । त्र ;त अΔजद्ध ;8ण्1द्ध अतः । ध्Δज त्र ;त चद्धध्उए ;चूँकि अ त्र चध्उद्ध त्र स् ध् ;2 उद्ध ;8ण्2द्ध यहाँअ वेग है तथा स् कोणीय संवेग है जो; तच द्ध के तुल्य है। किसी केन्द्रीय बल के लिए, जो त के अनुदिश निदेर्श्िात है, स् एक नियतांक होता है, जबकि ग्रह परिक्रमा कर रहा होता है। अतः अंतिम समीकरण के अनुसार । ध्Δज एक नियतंाक है। यही क्षेत्रापफलों का नियम है। गुरुत्वाकषर्ण का बल भी केन्द्रीय बल ही है और इसलिए क्षेत्रापफलों का नियम न्यूटन के नियमों के इसी लक्षण का पालन/अनुगमन करता है। उदाहरण 8ण्1 मान लीजिए किसी ग्रह की उपसौर च् पर ;चित्रा 8ण्1ंद्ध चाल अच् है, तथा सूयर् व ग्रह की दूरी ैच् त्र तच् है।क्ष्तच्ए अच्द्व तथा अपसौर पर इन राश्िायों के तदनुरूपी मान क्ष्त।ए अ।द्व में संबंध् स्थापित कीजिए। क्या ग्रह ठ।ब् तथा ब्च्ठ पथ तय करने में समान समय लेगा? हल कोणीय संवेग का परिमाण च् पर हैस् त्र उच तअचए क्योंकिचच निरीक्षण द्वारा यह ज्ञात होता है कि ततथा अपरस्पर लम्बवतचच ऽ केन्द्रीय बल हमें ज्ञात है, कि मूल बिन्दु के परितः किसी एकल कण के कोणीय संवेग में, समय के साथ होने वाले परिवतर्न की दर कसतथ् कज यदि उस पर लगे बल का आघूणर् तथ्शून्य हो, तो कण का कोणीय संवेग संरक्ष्िात रहता है, यह तभी होता है जब या तो थ् शून्य हो या बल त के अनुदिश हो। हम उन बलों की चचार् करेंगे जो दूसरी शतर् पूरी करते हैं। केन्द्रीय बल उन बलों के उदाहरण हैं जो यह शतर् पूरी करते हैं। केन्द्रीय बल, सदैव या तो एक नियत बिन्दु की ओर या इससे दूर दिशा में लगे होते हैं, यानि, नियत बिन्दु से बलारोपण बिन्दु के संगत स्िथति सदिश के अनुदिश होते हैं। ;देख्िाए चित्राद्ध। केन्द्रीय बल का परिमाण थ् , केवल नियत बिन्दु से बलारोपण बिन्दु की दूरी,तए के ऊपर निभर्र करता हैथ्त्रथ्;तद्ध। केन्द्रीय बल के तहत गति में कोणीय संवेग सदैव संरक्ष्िात रहता है। इससे दो महत्त्वपूणर् परिणाम सीध्े प्राप्त होते हैं: ;1द्ध केन्द्रीय बल के तहत किसी कण की गति सदैव एक समतल में सीमित रहती है। ;2द्ध बल के केन्द्र ;यानि नियत बिन्दुद्ध से, लिए गए कण के स्िथति सदिश का क्षेत्रापफलीय वेग अचर रहता है। दूसरे शब्दों में कहें तो केन्द्रीय बल के तहत गतिमान कण का स्िथति सदिश बराबर समय में बराबर क्षेत्रापफल बुहारता है।इन दोनों कथनों की उप्पिा की चेष्टा करें। आपके लिए शायद यह जानना जरूरी होगा कि क्षेत्रापफल वेग, क।ध्कज त्र क् त अ ेपद αण् उपरोक्त विवेचन का उपयोग हम सूयर् के आकषर्ण बल से इसके इदर् - गिदर् घूमते किसी ग्रह की गति के संदभर् में कर सकते हैं। सुविध के लिए हम सूयर् को इतना भारी मान सकते हैं कि इसकी स्िथति नियत रहे। ग्रह पर सूयर् का आकषर्ण बल सदैव सूयर् की दिशा में लगता है। यह बल शतर्थ् त्र थ्;तद्धए भी पूरी करता है, क्योंकि, थ् त्र ळ उउध्त2 जहाँ उएवं121 उक्रमशः ग्रह और सूयर् के द्रव्यमान हैं, और ळ गुरुत्वाकषर्ण का वैश्िवक अचरांक। अतः ऊपर दिए गए दोनों कथन,2 ;1द्ध एवं;2द्ध ग्रहों की गति के लिए लागू होते हैं। वास्तव में कथन ;2द्ध केप्लर का सुप्रसि( द्वितीय नियम है। ज्त केन्द्रीय बल के तहत, कण का गमन - पथ है। कण की किसी स्िथति च्ए पर बल व्च् के अनुदिश होता है। व् बल का केन्द्र है जिसे मूलबिन्दु ले लिया गया है। Δज समय में कण च् से च्′ तक चाप Δे त्र अ Δज के ऊपर चलता है। गमन पथ के बिन्दु च् पर खींची गइर् स्पशर् रेखा च्फ इस बिन्दु पर वेग की दिशा दशार्ती है। Δज समय में, तए वृत्तखण्ड च्व्च् ′ के क्षेत्रा से गुजरता है जो ≈;त ेपद αद्ध च्च्′ ध्2 त्र ;त अ ेपद ंद्ध Δजध्2द्ध है। हैं। इसी प्रकार, स्। त्र उत। अ।ण् तब कोणीय संवेग संरक्षण सेच उतअत्र उच च च च त। अ। अच त।अथवा अत।च चूँकि त। झ तचएअच झ अ। ण् दीघर्वृत्त तथा त्रिाज्या सदिशों ैठ एवं ैब् द्वारा घेरा गया क्षेत्रापफल ैठच्ब् की तुलना में अध्िक है ;चित्रा 8ण्1ंद्ध।केप्लरके दूसरे नियम के अनुसार, समान समय अंतरालों में समान क्षेत्रापफल प्रसपर् होते हैं। अतः ग्रह पथ ब्च्ठ को तय करने कीअपेक्षा पथ ठ।ब् को तय करने में अध्िक समय लेगा। ऽ 8ण्3 गुरुत्वाकषर्ण का सावर्त्रिाक नियम एक दंत कथा में लिखा है पेड़ से गिरते हुए सेब का प्रेक्षण करते हुए न्यूटन को गुरुत्वाकषर्ण के सावर्त्रिाक नियम तक पहुँचने कीप्रेरणा मिली जिससे केप्लर के नियमों तथा पाथ्िार्व गुरुत्वाकषर्ण के स्पष्टीकरण का मागर् प्रशस्त हुआ। न्यूटन ने अपने विवेक केआधर पर यह स्पष्ट अनुभव किया कि त् त्रिाज्या की कक्षा मेंउ परिक्रमा करने वाले चन्द्रमा पर पृथ्वी के गुरुत्व के कारण एकअभ्िाकेन्द्र त्वरण आरोपित होता है जिसका परिमाण ट 24π 2त्उं त्रत्र उ 2 ;8ण्3द्धत्उ ज् यहाँ ट चन्द्रमा की चाल है जो आवतर्काल ज् से इस प्रकार संबंध्ित है, ट 2त् ध्ज् । आवतर् काल ज् का मान लगभगउ 27ण्3 दिन है तथा उस समय तक त् का मान लगभगउ 3ण्84108उ ज्ञात हो चुका था। यदि हम इन संख्याओं कोसमीकरण ;8ण्3द्ध में प्रतिस्थापित करें, तो हमें ं का जो मान उ प्राप्त होता है, वह पृथ्वी के गुरुत्व बल के कारण उत्पन्न पृथ्वीके पृष्ठ पर गुरुत्वीय त्वरण ह के मान से कापफी कम होता है। यह स्पष्ट रूप से इस तथ्य को दशार्ता है कि पृथ्वी के गुरुत्वबल का मान दूरी के साथ घट जाता है। यदि हम यह मान लें कि पृथ्वी के कारण गुरुत्वाकषर्ण का मान पृथ्वी के केन्द्र से2दूरी के वगर् के व्युत्क्रमानुपाती होता है, तो हमें ंत् औरउउ हत् 2प्राप्त होगा;यहाँ त्पृथ्वी की त्रिाज्या हैद्ध, जिससे हमेंम् म् निम्नलिख्िात संबंध् प्राप्त होता है: त्2 हउत्र ण् 3600 ;8ण्4द्धंउ त्म् 2 जो ह ण् 9ण्8 उ े.2 तथा समीकरण ;8ण्3द्ध सें के मान केउ साथ मेल खाता है। इस प्रेक्षण ने न्यूटन को नीचे दिए गए गुरुत्वाकषर्ण के सावर्त्रिाक नियम को प्रतिपादित करने में मागर्दशर्न दिया रू फ्इस विश्व में प्रत्येक पिण्ड हर दूसरे पिण्ड को एक बल द्वारा आक£षत करता है जिसका परिमाण दोनों पिण्डों केद्रव्यमानों के गुणनपफल के अनुक्रमानुपाती तथा उनके बीच की दूरी के वगर् के व्युत्क्रमानुपाती होता है।य्यह उ(रण तत्वतः न्यूटन के प्रसि( शोध् प्रबन्ध् फ्प्रावृफतिक दशर्न के गण्िातीय सि(ांतय् ;डंजीमउंजपबंस च्तपदबपचसमे व िछंजनतंस च्ीपसवेवचीलद्ध जिसे संक्षेप में पि्रंसिपिया ;च्तपदबपचपंद्ध कहते हैं, से प्राप्त होता है। गण्िातीय रूप में न्यूटन के गुरुत्वाकषर्ण नियम को इस प्रकार कहा जा सकता है: किसी बिंदु द्रव्यमान उ पर किसी2 अन्य बिंदु द्रव्यमान उ के कारण बल थ् का परिमाण1 उउद्यद्य ळ 12थ् 2 ;8ण्5द्धत सदिश रूप में समीकरण ;8ण्5द्ध को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है उउ उउ12 12थ् ळ दृत दृळ त22तत उउ दृळ 132त त यहाँ ळ सावर्त्रिाक गुरुत्वीय नियतांक, त उसे उतक12 एकांक सदिश तथा त त्र त √ त है जैसा कि चित्रा 8ण्3 में दशार्या21 गया है। चित्रा 8ण्3 उके कारण उपर गुरुत्वीय बल त के अनुदिश21 है, यहाँ तए ;त√ तद्ध है।21गुरुत्वीय बल आकषीर् बल है, अथार्त् उपर उके21 कारण लगने वाला बल थ्ए √ त के अनुदिश है। न्यूटन के गति के तीसरे नियम के अनुसार, वास्तव में बिन्दु द्रव्यमान उपर1 उ के कारण बल√ थ् है। इस प्रकार उ पर उ के कारण2 12 लगने वाले गुरुत्वाकषर्ण बल थ्12 एवं उपर उके कारण21 लगने वाले बल थ्21 का परस्पर संबंध् है, त्र √थ्21थ्12समीकरण;8ण्5द्ध का अनुप्रयोग, अपने पास उपलब्ध् पिण्डों पर कर सकने से पूवर् हमें सावधन रहना होगा, क्योंकि यहनियम बिन्दु द्रव्यमानों से संबंध्ित है, जबकि हमें विस्तारित पिण्डों, जिनका परिमित आमाप होता है, पर विचार करना है।यदि हमारे पास बिन्दु द्रव्यमानों का कोइर् संचयन है, तो उनमें से किसी एक पर बल अन्य बिन्दु द्रव्यमानों के कारणगुरुत्वाकषर्ण बलों के सदिश योग के बराबर होता है जैसा कि चित्रा 8ण्4 में दशार्या गया है। चित्रा 8ण्4 बिन्दु द्रव्यमान उपर बिन्दु द्रव्यमानों उएउऔर1 23 उके द्वारा आरोपित वुफल गुरुत्वाकषर्ण बल इन द्रव्यमानों द्वारा4 उपर लगाए गए व्यष्िटगत बलों के सदिश योग के बराबर है।1 उपर वुफल बल है1 ळउउ ळउउ ळउउ2131 41थ्त21 त31 त41 1 22 2 2131 41तत त उदाहरण8ण्2 किसी समबाहु त्रिाभुज ।ठब् के प्रत्येक शीषर् पर उ ाह के तीन समान द्रव्यमान रखे हैं। ;ंद्ध इस त्रिाभुज के केन्द्रक ळ पर रखे 2उ ाह के द्रव्यमान पर कितना बल आरोपित हो रहा है? ;इद्ध यदि शीषर् । पर रखे द्रव्यमान को दो गुना कर दिया जाए, तो कितना बल आरोपित होगा?।ळ त्र ठळ त्र ब्ळ त्र 1उ लीजिए ;देख्िाए चित्रा8ण्5द्ध ऽ न्यूटन का ¯प्रसिपिया सन् 1619 तक केप्लर अपना तृतीय नियम प्रतिपादित कर चुके थे। उनमें अंत£नहित गुरुत्वाकषर्ण के सावर्त्रिाक नियम की घोषणा, 1687 में, इसके लगभग 70 वषर् बाद हुइर्, जब न्यूटन ने अपनी श्रेष्ठ वृफति ‘पिफलोसिपिफया नेचुरलिस ¯प्रसिपिया मैथेमेटिका’ जिसे आमतौर पर ‘¯प्रसिपिया’ कहा जाता है, प्रकाश्िात की। सन् 1685 के लगभग, एडमण्ड हेली ;जिनके नाम के आधर पर प्रसि( हेली ध्ूमकेतु का नाम रखा गया हैद्ध वैफम्िब्रज में न्यूटन से मिलने आए और उन्होंने प्रतिलोम वगर् नियम प्रभाव के तहत गतिमान किसी पिण्ड के गमन पथ कीप्रवृफति के बारे में पूछा। न्यूटन ने बिना झिझक तुरंत उत्तर दियाकि यह दीघर्वृत्ताकार होना चाहिए और बताया कि इस तथ्य का पता उन्होंने बहुत पहले 1665 में ही उस समय लगा लिया था जब उन्हें प्लेग पैफलने के कारण वैफम्िब्रज से वापस अपने पफामर् हाउस पर आकर रहना पड़ा था। दुभार्ग्य से न्यूटन ने अपने तत्संबंध्ी कागजात खो दिए थे। हेली ने न्यूटन को पुस्तक के रूप में उनकी धरणाओं को प्रस्तुत करने के लिए मना लिया और उसके प्रकाशन पर होने वाले वुफल खचर् को स्वयं वहन करने की सहमति दी। न्यूटन ने अतिमानवीय प्रयत्नों द्वारा 18 महीने के अल्पकाल में यह महान कायर् पूरा कर दिखाया। ¯प्रसिपिया, विश्िाष्ट वैज्ञानिक वृफति है और लैग्रेंजे के शब्दों में कहें तो, फ्मानवीय मस्ितष्क का सवर्श्रेष्ठ उत्पादन हैय्। भारतीय मूल के, नोबेल पुरस्कार विजेता खगोल - भौतिकीविद् डा. एस. चंद्रशेखर ने दस वषर् की मेहनत से ‘¯प्रसिपिया’ की टीका लिखी। उनकी पुस्तक, फ्आम आदमी के लिए ¯प्रसिपियाय् न्यूटन की विध्ियों के सौंदयर्, स्पष्टता एवं अदभुत संक्ष्िाप्तता को बहुत अच्छी तरह उभार कर प्रस्तुत करती है। हल ;ंद्ध ध्नात्मक ग.अक्ष तथा ळब् के बीच का कोण 30° है और इतना ही कोण )णात्मक ग.अक्ष तथा ळठ के बीच बनता है। सदिश संकेत प(ति में व्यष्िटगत बल इस प्रकार हैं ळउ 2उ ६थ्ळ। र1 ळउ 2उ ६६थ्प बवे 30 र ेपद 30 ळठ 1 ळउ 2उ ६६थ्ळब् प बवे 30 र ेपद 30 ण्1 अध्यारोपण सि(ांत तथा सदिश योग नियम के अनुसार ;2उद्ध पर परिणामी गुरुत्वाकषर्ण बल ल ग ठ उ उ चित्रा 8ण्5 तीन समान द्रव्यमान त्रिाभुज ।ठब् के तीन शीषो± पर स्िथत हैं। इसके वेंफद्रक ळ पर कोइर् द्रव्यमान 2उ रखा गया है। थ्त् त्र थ्ळ। ़ थ्ळठ ़ थ्ळब् थ्त् त्र 2ळउ 2६र ़ 2ळउ2 ;−६प बवे 30ο−६रेपद 30οद्ध 2 οο़ 2ळउ ; प६ बवे 30 − ६र ेपद 30 द्धत्र 0 विकल्प के रूप में, सममिति के आधर पर यह अपेक्षा की जा सकती है कि परिणामी बल शून्य होना चाहिए। ;इद्ध सममिति द्वारा बलों के ग.घटक एक दूसरे को निरस्त कर देते हैं तथा केवल ल.घटक ही बचे रहते हैं। 2६ 2६2६थ्त् त्र 4ळउ र − 2ळउ र त्र 2ळउ र ऽ किसी विस्तारित पिण्ड ;जैसे पृथ्वीद्ध तथा बिन्दु द्रव्यमान के बीच गुरुत्वाकषर्ण बल के लिए समीकरण ;8ण्5द्ध का सीध्े ही अनुप्रयोग नहीं किया जा सकता। विस्तारित पिण्ड का प्रत्येक बिन्दु द्रव्यमान दिए गए बिन्दु द्रव्यमान पर बल आरोपित करता है तथा इन सभी बलों की दिशा समान नहीं होती। हमें इन बलों का सदिश रीति द्वारा योग करना होता है ताकि विस्तारित पिण्ड के प्रत्येक बिन्दु द्रव्यमान के कारण आरोपित वुफल बल प्राप्त हो जाए। ऐसा हम आसानी से कलन ;वैफलवुफलसद्ध के उपयोग द्वारा कर सकते हैं। जब हम ऐसा करते हैं तो हमे दो विश्िाष्ट प्रकरणों में सरल परिणाम प्राप्त होते हैं ;1द्ध किसी एकसमान घनत्व के खोखले गोलीय खोल तथा खोल के बाहर स्िथत किसी बिन्दु द्रव्यमान के बीच आकषर्ण बल ठीक - ठाक उतना ही होता हैजैसा कि खोल के समस्त द्रव्यमान को उसके केन्द्रपर संकेन्िद्रत मान कर ज्ञात किया जाता है।गुणात्मक रूप से इसे इस प्रकार समझा जा सकता है।खोल के विभ्िान्न क्षेत्रों के कारण गुरुत्वीय बलों के,खोल के केन्द्र को बिन्दु द्रव्यमान से मिलाने वाली रेखाके अनुदिश तथा इसके लंबवत्, दोनों दिशाओं में घटकहोते हैं। खोल के सभी क्षेत्रों के बलों के घटकों का योगकरते समय इस रेखा के लंबवत् दिशा के घटक निरस्त हो जाते हैं तथा केवल खोल के केन्द्र से बिन्दु द्रव्यमानको मिलाने वाली रेखा के अनुदिश परिणामी बल बचारहता है। इस परिणामी बल का परिमाण भी ऊपर वणर्नकी गइर् विध्ि द्वारा ज्ञात किया जा सकता है। ;2द्ध एकसमान घनत्व के किसी खोखले गोले के कारणउसके भीतर स्िथत किसी बिन्दु द्रव्यमान पर आकषर्णबल शून्य होता है।गुणात्मक रूप में, हम पिफर से इस परिणाम को समझसकते हैं। गोलीय खोल के विभ्िान्न क्षेत्रा खोल के भीतर स्िथतबिन्दु द्रव्यमान को विभ्िान्न दिशाओं में आक£षत करते हैं। ये बल परस्पर एक दूसरे को पूणर्तः निरस्त कर देते हैं। 8ण्4 गुरुत्वीय नियतांक गुरुत्वाकषर्ण के सावर्त्रिाक नियम में प्रयुक्त गुरुत्वीय स्िथरांक ळ के मान को प्रायोगिक आधर पर ज्ञात किया जा सकता है तथाइस प्रकार के प्रयोग को सवर्प्रथम अंग्रेज वैज्ञानिक हेनरीवैफवेन्िडश ने 1798 में किया था। उनके द्वारा उपयोग किए गएउपकरण को व्यवस्था चित्रा 8ण्6 में दशार्या गया है। चित्रा 8ण्6 वैफवेन्िडश प्रयोग का योजनावत आरेखन। ैतथा ैदो1 2 विशाल गोले हैं ;छायांकित दशार्ए गए हैंद्ध जिन्हें । और ठ पर स्िथति द्रव्यमानों के दोनों ओर रखा जाता है। जबविशाल द्रव्यमानों ;बिन्दुकित वृत्तों द्वारा दशार्एद्ध को दूसरीओर ले जाते हैं, तो छड़ ।ठ थोड़ा घूणर्न करती है,क्योंकि अब बल आघूणर् की दिशा व्युत्क्रमित हो जातीहै। घूणर्न कोण को प्रयोगों द्वारा ज्ञात किया जा सकता है। छड़।ठ के दोनों सिरों पर दो छोटे सीसे के गोले जुड़े होते हैं। इस छड़ को एक पतले तार द्वारा किसी दृढ़ टेक से निलंबित किया जाता है। सीसे के दो विशाल गोलों को चित्रा में दशार्ए अनुसार छोटे गोलों के निकट परन्तु विपरीत दिशाओं में लाया जाता है। बड़े गोले चित्रा में दशार्ए अनुसार अपने निकट के छोटे गोलों को समान तथा विपरीत बलों से आक£षत करते हैं। छड़ पर कोइर् नेट बल नहीं लगता, परन्तु केवल एक बल आघूणर् कायर् करता है जो स्पष्ट रूप से छड़ की लम्बाइर् का थ्.गुना होता है, जबकि यहाँ थ् विशाल गोले तथा उसके निकट वाले छोटे गोले के बीच परस्पर आकषर्ण बल है। इस बल आघूणर् के कारण, निलंबन तार में तब तक ऐंठन आती है जब तक प्रत्यानयन बल आघूणर् गुरुत्वीय बल आघूणर् के बराबर नहीं होता। यदि निलंबन तार का व्यावतर्न कोण θ है, तो प्रत्यानयन बल आघूणर् θ के अनुक्रमानुपाती तथा के बराबर हुआ, यहाँ τ प्रत्यानयन बल युग्म प्रति एकांक व्यावतर्न कोण है। τ की माप अलग प्रयोग द्वारा की जा सकती है, जैसे कि ज्ञात बल आघूणर् का अनुप्रयोग करके तथा व्यावतर्न कोण मापकर। गोल गेदों के बीच गुरुत्वाकषर्ण बल उतना ही होता है जितना कि गेदों के द्रव्यमानों को उनके केन्द्रों पर संवेंफन्िद्रत मान कर ज्ञात किया जाता है। इस प्रकार यदि विशाल गोले तथा उसके निकट के छोटे गोले के केन्द्रों के बीच की दूरी क है, ड तथा उ इन गोलों के द्रव्यमान हैं, तो बड़े गोले तथा उसके निकट के छोटे गोले के बीच गुरुत्वाकषर्ण बल डउथ्ळक2 ;8ण्6द्ध यदि छड़ ।ठ की लम्बाइर् स् है, तो थ् के कारण उत्पन्न बल आघूणर् थ् तथा स् का गुणनपफल होगा। संतुलन के समय यह बल आघूणर् प्रत्यानयन बल आघूणर् के बराबर होता है। अतः डउळक2 स् ;8ण्7द्ध इस प्रकार θ का प्रेक्षण करके इस समीकरण की सहायता से ळ का मान परिकलित किया जा सकता है। वैफवेन्िडश प्रयोग के बाद ळ के मापन में परिष्करण हुए तथा अब ळ का प्रचलित मान इस प्रकार है ळ त्र 6ण्67ग10.11 छ उ2धह2 ;8ण्8द्ध 8ण्5 पृथ्वी का गुरुत्वीय त्वरण पृथ्वी को गोल होने के कारण बहुत से संकेन्द्री गोलीय खोलों का मिलकर बना माना जा सकता है जिनमें सबसे छोटा खोलकेन्द्र पर तथा सबसे बड़ा खोल इसके पृष्ठ पर है। पृथ्वी केबाहर का कोइर् भी बिन्दु स्पष्ट रूप से इन सभी खोलों के बाहरहुआ। इस प्रकार सभी खोल पृथ्वी के बाहर किसी बिन्दु पर इसप्रकार गुरुत्वाकषर्ण बल आरोपित करेंगे जैसे कि इन सभी खोलोंके द्रव्यमान पिछले अनुभाग में व£णत परिणाम के अनुसारउनके उभयनिष्ठ केन्द्र पर संकेन्िद्रत हैं। सभी खोलों केसंयोजन का वुफल द्रव्यमान पृथ्वी का ही द्रव्यमान हुआ। अतः, पृथ्वी के बाहर किसी बिन्दु पर, गुरुत्वाकषर्ण बल को यही मानकर ज्ञात किया जाता है कि पृथ्वी का समस्त द्रव्यमान उसके केन्द्र पर संकेन्िद्रत है। पृथ्वी के भीतर स्िथत बिन्दुओं के लिए स्िथति भ्िान्न होती है। इसे चित्रा8ण्7 में स्पष्ट किया गया है। पृथ्वी का पृष्ठ चित्रा 8ण्7 डम् पृथ्वी का द्रव्यमान तथा त्म् पृथ्वी की त्रिाज्या है, पृथ्वी के पृष्ठ के नीचे क गहराइर् पर स्िथत किसी खान में कोइर् द्रव्यमान उ रखा है। हम पृथ्वी को गोलतः सममित मानते हैं। पहले की ही भांति अब पिफर पृथ्वी को संकेन्द्री खोलों सेमिलकर बनी मानिए और यह विचार कीजिए कि पृथ्वी केकेन्द्र से त दूरी पर कोइर् द्रव्यमान उ रखा गया है। बिन्दु च्ए त त्रिाज्या के गोले के बाहर है। उन सभी खोलों के लिए जिनकीत्रिाज्या त से अध्िक है, बिन्दु च् उनके भीतर है। अतः पिछलेभाग में व£णत परिणाम के अनुसार ये सभी खोल च् पर रखेद्रव्यमानों पर कोइर् गुरुत्वाकषर्ण बल आरोपित नहीं करते। त्रिाज्या ≤ त के खोल मिलकरत त्रिाज्या का गोला नि£मत करते हैं तथाबिन्दु च् इस गोले के पृष्ठ पर स्िथत है। अतः त त्रिाज्या का यह छोटा गोला च् पर स्िथत द्रव्यमान उ पर इस प्रकारगुरुत्वाकषर्ण बल आरोपित करता है जैसे इसका समस्त द्रव्यमान ड इसके केन्द्र पर संकेन्िद्रत है। इस प्रकार च् पर स्िथततद्रव्यमान उ पर आरोपित बल का परिमाण ळउ ;ड द्धथ् त्र2 त ;8ण्9द्ध त हम यह मानते हैं कि समस्त पृथ्वी का घनत्व एकसमान 4πहै अतः इसका द्रव्यमान ड त्र त्3 ρ है। यहाँ त्म् पृथ्वीम्3 म् की त्रिाज्या तथा ρ इसका घनत्व है। इसके विपरीत त त्रिाज्या 4πρ 3के गोले का द्रव्यमान त होता है। इसलिए3 4 त 3 डत3 थ्ळउ ळउ म् 2 323 त त्म्त ळउ ड म् त3 ;8ण्10द्धत्म् यदि द्रव्यमानउ पृथ्वी के पृष्ठ पर स्िथत है, तो त त्र त्म् तथा समीकरण ;8ण्10द्ध से इस पर गुरुत्वाकषर्ण बल डउ थ्ळ म् 2 ;8ण्11द्धत्म् यहाँडतथा त्क्रमशः पृथ्वी का द्रव्यमान तथा त्रिाज्या है।म्म् द्रव्यमान उ द्वारा अनुभव किया जाने वाला त्वरण जिसे प्रायः प्रतीक ह द्वारा नि£दष्ट किया जाता है, न्यूटन के द्वितीय नियम द्वारा बल थ् से संबंध् थ् त्र उह द्वारा संबंध्ित होता है। इस प्रकार थ् ळड हम् 2 ;8ण्12द्धउ त्म् ह सहज ही मापन योग्य है। त्एक ज्ञात राश्िा है।म् वैफवेन्िडश - प्रयोग द्वारा अथवा दूसरी विध्ि से प्राप्त ळ की माप ह तथा त् के ज्ञान को सम्िमलित करने पर ड का आकलनम्म् समीकरण ;8ण्12द्ध की सहायता से किया जा सकता है। यही कारण है कि वैफवेन्िडश के बारे में एक प्रचलित कथन यह है कि फ्वैफवेन्िडश ने पृथ्वी को तोलाय्। 8ण्6 पृथ्वी के पृष्ठ के नीचे तथा ऊपर गुरुत्वीय त्वरण चित्रा में दशार्ए अनुसार पृथ्वी के पृष्ठ से ऊँचाइर् ी पर स्िथत किसी बिन्दु द्रव्यमानउ पर विचार कीजिए ;चित्रा 8ण्8;ंद्धद्ध। चित्रा 8ण्8;ंद्ध पृथ्वी के पृष्ठ से किसी ऊँचाइर् ी पर ह पृथ्वी की त्रिाज्या को त् द्वारा नि£दष्ट किया जाता है। चूंकिम् यह बिन्दु पृथ्वी से बाहर है, इसकी पृथ्वी के केन्द्र से दूरी ;त़्ी द्ध है। यदि बिन्दु द्रव्यमान उ पर बल के परिमाण कोम् थ् ;ीद्ध द्वारा नि£दष्ट किया गया है, तो समीकरण ;8ण्5द्ध से हमें निम्नलिख्िात संबंध् प्राप्त होता है ळड उ ;द्ध म्थ्ी 2 ;8ण्13द्ध;त्म् ीद्ध बिन्दु द्रव्यमान द्वारा अनुभव किया जाने वाला त्वरण थ्ी;द्धध्उ≡ ही;द्ध तथा इस प्रकार हमें प्राप्त होता है ;द्ध ळडम्थ्ी;द्धही 2 ;8ण्14द्धउ ;त्म् ीद्ध स्पष्ट रूप से यह मान पृथ्वी के पृष्ठ परह के मान से कम ळड हहै: 2 म् जबकि ी ढढ त् एहम समीकरण ;8ण्14द्ध केत्म् म् दक्ष्िाण पक्ष को इस प्रकार भी लिख सकते हैं रू ळड −;द्धत्रत्रह;़ ध् म्द्ध 2ही 1 ीत् त्2 म्;1़ीध्त्म् द्ध2 ी 1के लिएद्विपद व्यंजक का उपयोग करने पर त्म् 2ीही ह 1 ;8ण्15द्धत्म् इस प्रकार समीकरण ;8ण्15द्धसे हमें प्राप्त होता है कि कम ऊँचाइर् ी के लिए ह का मान गुणक ;1 2ध् ीत् द्धद्वाराम् अब हम पृथ्वी के पृष्ठ के नीचे गहराइर् क पर स्िथत किसी बिन्दु द्रव्यमान उ के विषय में विचार करते हैं। ऐसा होने पर चित्रा 8ण्8;इद्ध में दशार्ए अनुसार इस द्रव्यमान की पृथ्वी के केन्द्र त् − कद्धत्रिाज्या के छोटे गोले तथा क मोटाइर् के एकम्गोलीय खोल से मिलकर बनी मान सकते हैं। तब द्रव्यमान उ पर क मोटाइर् की बाह्य खोल के कारण आरोपित बल पिछले अनुभाग में व£णत परिणाम के कारण शून्य होगा। जहाँ तक √ क द्ध त्रिाज्या के छोटे गोले के कारण आरोपित बल का संबंध् है तो पिछले अनुभाग में व£णत परिणाम के अनुसार, इस छोटे गोले के कारण बल इस प्रकार लगेगा जैसे कि छोटे गोले का समस्त द्रव्यमान उसके केन्द्र पर संकेन्िद्रत है। यदि छोटे गोले का द्रव्यमान ड है, तोे ड ध् ड त्र ;त् √ क द्ध 3 ध् त्3 ; 8ण्16द्धे म् म् म् क्योंकि, किसी गोले का द्रव्यमान उसकी त्रिाज्या के घन के अनुक्रमानुपाती होता है। पृथ्वी का पृष्ठ डम् चित्रा 8ण्8 ;इद्ध किसी गहराइर् क पर ह इस प्रकरण में केवल ;त्म्√ कद्ध त्रिाज्या का छोटा गोला ही ह के लिए योगदान देता है। अतः बिन्दु द्रव्यमान पर आरोपित बल थ् ; क द्ध त्र ळ डे उ ध् ; त्म् √ क द्ध 2 ;8ण्17द्ध ऊपर से ड का मान प्रतिस्थापित करने पर, हमें प्राप्ते होता है थ् ; कद्ध त्र ळ डम् उ ; त्म् √ क द्ध ध् त्म् 3 ;8ण्18द्ध और इस प्रकार गहराइर् क पर गुरुत्वीय त्वरण, ;द्धथ्क ह;कद्ध त्र उ थ्क;द्ध ळडम्ह;द्धक ;त्कद्धअथार्त् उत्3 म् म् त्क हम् ह;1 ध्कत् द्धत्र म् ;8ण्19द्धत्म् इस प्रकार जैसे - जैसे हम पृथ्वी से नीचे अध्िक गहराइर् तक जाते हैं, गुरुत्वीय त्वरण का मान गुणक ;1 कत्ध्द्धद्वाराम् घटता जाता है। पृथ्वी के गुरुत्वीय त्वरण से संबंध्ित यह एक आश्चयर्जनक तथ्य है कि पृष्ठ पर इसका मान अध्िकतम हैतथा चाहे हम पृष्ठ से ऊपर जाएँ अथवा नीचे यह मान सदैव घटता है। 8ण्7 गुरुत्वीय स्िथतिज ऊजार् पहले हमने स्िथतिज ऊजार् की धरणा की चचार् किसी वस्तु कीदी हुइर् स्िथति पर उसमें संचित ऊजार् के रूप में दी थी। यदि किसी कण की स्िथति उस पर कायर्रत बल के कारणपरिव£तत हो जाती है तो उस कण की स्िथतिज ऊजार् में परिवतर्न आरोपित बल द्वारा उस कण पर किए गए कायर् के परिमाण के ठीक - ठीक बराबर होगा। जैसा कि हम पहले चचार् कर चुके हैं जिन बलों द्वारा किया गया कायर् चले गए पथों पर निभर्र नहीं करता, वे बल संरक्षी बल होते हैं तथा केवल ऐसे बलों के लिए ही किसी पिण्ड की स्िथतिज ऊजार् की कोइर् साथर्कता होती है। गुरुत्व बल एक संरक्षी बल है तथा हम किसी पिण्ड में इसबल के कारण उत्पन्न स्िथतिज ऊजार्, जिसे गुरुत्वीय स्िथतिजऊजार् कहते हैं, का परिकलन कर सकते हैं। पहले पृथ्वी के पृष्ठ के निकट के उन बिन्दुओं पर विचार कीजिए जिनकी पृष्ठ से दूरियाँ पृथ्वी की त्रिाज्या की तुलना में बहुत कम हैं। जैसा कि हम देख चुके हैं ऐसे प्रकरणों में गुरुत्वीय बल व्यावहारिक दृष्िट से नियत रहता है तथा यहउह होता है तथा इसकी दिशा पृथ्वी के केन्द्र की ओर होती है। यदि हम पृथ्वी के पृष्ठ से ी ऊँचाइर्1 पर स्िथत किसी बिन्दु तथा इसी बिन्दु के ठीकऊध्वार्ध्र ऊपर ीऊँचाइर् पर स्िथत किसी अन्य बिन्दु पर2 विचार करें तो उ द्रव्यमान के किसी कण को पहली स्िथति सेदूसरी स्िथति तक ऊपर उठाने में किया गया कायर्, जिसे ॅ12 द्वारा नि£दष्ट करते हैं, ॅ त्र बल विस्थापन12त्र उह ;ी2 √ ी1द्ध ण् ;8ण्20द्ध यदि हम पृथ्वी के पृष्ठ से ी ऊँचाइर् के बिन्दु से कोइर्स्िथतिज ऊजार् ॅ;ीद्ध संब( करें जो इस प्रकार है कि ॅ;ीद्ध त्र उह ी ़ ॅ ;8ण्21द्धव ;यहाँॅ त्र नियतांकद्ध यवतब यह स्पष्ट है कि ॅ12 त्र ॅ;ी2द्ध √ ॅ;ी1द्ध ;8ण्22द्ध कण को स्थानांतरित करने में किया गया कायर् ठीक इसकण की अंतिम तथा आरंभ्िाक स्िथतियों की स्िथतिज ऊजार्ओं के अंतर के बराबर है। ध्यान दीजिए कि समीकरण ;8.22द्ध मेंॅ निरस्त हो जाता है। समीकरण ;8.21द्ध में ी त्र 0 रखनेव पर हमें ॅ ; ी त्र 0 द्ध त्र ॅ प्राप्त होता है। ी त्र 0 का अथर् व यह है कि दोनों बिन्दु पृथ्वी के पृष्ठ पर स्िथत हैं। इस प्रकार ॅ कण की पृथ्वी के पृष्ठ पर स्िथतिज ऊजार् हुइर्।व यदि हम पृथ्वी के पृष्ठ से यादृच्िछक दूरियों के बिन्दुओं पर विचार करंे तो उपरोक्त परिणाम प्रामाण्िाक नहीं होते क्योंकि तब यह मान्यता कि गुरुत्वाकषर्ण बल उह अपरिव£तत रहता है वैध् नहीं है। तथापि, अपनी अब तक की चचार् के आधर पर हम जानते हैं कि पृथ्वी के बाहर के किसी बिन्दु पर स्िथत किसी कण पर लगे गुरुत्वीय बल की दिशा पृथ्वी के केन्द्र की ओर निदेश्िात होती है तथा इस बल का परिमाण है, ळड उ थ्त्र 2 म्;8ण्23द्धत यहाँड त्र पृथ्वी का द्रव्यमान, उ त्र कण का द्रव्यमान तथाम्त इस कण की पृथ्वी के केन्द्र से दूरी है। यदि हम किसी कण को त त्र तसे त त्र ततक ;जबकि त झ तद्ध ऊध्वार्ध्र पथ के12 21अनुदिश ऊपर उठाने में किए गए कायर् का परिकलन करें तो हमें समीकरण;8ण्20द्ध के स्थान पर यह संबंध् प्राप्त होता है त2 ळडउॅ12 2कत त1 त 11 ळडम् उ ;8ण्24द्ध 21तत इस प्रकार समीकरण;8ण्21द्ध के बजाय, हम किसी दूरी त पर स्िथतिज ऊजार् ॅ;तद्ध को इस प्रकार संब( कर सकते हैं रू ळड उ ॅत;द्धत्र− म् ़ॅ1ए ;8ण्25द्धत जो कि त झ त् के लिए वैध् है। अतः एक बार पिफर ॅ त्र ॅ;तद्ध √ ॅ;तद्ध । अंतिम1221समीकरण में त त्र रखने पर हमें ॅ;त त्र द्ध त्र ॅ प्राप्त 1होता है। इस प्रकार ॅअनन्त पर स्िथतिज ऊजार् हुइर्। हमें यह1 ध्यान देना चाहिए कि समीकरणों ;8ण्22द्ध तथा ;8ण्24द्ध के अनुसार केवल दो बिन्दुओं के बीच स्िथतिज ऊजार्ओं में अंतर की ही कोइर् निश्िचत साथर्कता है। हम प्रचलित मान्य परिपाटी के अनुसार ॅ को शून्य मान लेते हैं जिसके कारण किसी 1बिन्दु पर किसी कण को स्िथतिज ऊजार् उस कण को अनन्त से उस बिन्दु तक लाने में किए जाने वाले कायर् के ठीक बराबर होती है।हमने, किसी बिन्दु पर किसी कण की स्िथतिज ऊजार् का परिकलन उस कण पर लगे पृथ्वी के गुरुत्वीय बलों के कारण, जो कि कण के द्रव्यमान के अनुक्रमानुपाती होता है, किया है। पृथ्वी के गुरुत्वीय बल के कारण किसी बिन्दु पर गुरुत्वीय विभव की परिभाषा फ्उस बिन्दु पर किसी कण के एकांकद्रव्यमान की स्िथतिज ऊजार्य् के रूप में की जाती है। पूवर् विवेचन के आधर पर, हम जानते हैं कि उ एवं उ 21 द्रव्यमान के एक दूसरे से त दूरी पर रखे दो कणों की गुरुत्वीयस्िथतिज ऊजार् है, ट ळउउ 12 ;यदि हम त त्र पर ट त्र 0 लेंद्धत यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि कणों के किसी सभीवियुक्त निकाय की वुफल स्िथतिज ऊजार्, अवयवों/कणों केसभी संभावित युग्मों की ऊजार्ओं ;उपरोक्त समीकरण द्वारा परिकलितद्ध के योग के बराबर होती है। यह अध्यारोपण सि(ांत के एक अनुप्रयोग का उदाहरण है। जउदाहरण 8ण्3 स भुजा के किसी वगर् के शीषो± पर स्िथतचार कणों के निकाय की स्िथतिज ऊजार् ज्ञात कीजिए। वगर् के केन्द्र पर विभव भी ज्ञात कीजिए। उत्तर मान लीजिए प्रत्येक कण का द्रव्यमान उ है, तथा वगर् की भुजा स है। हमारे पास स दूरी वाले 4 द्रव्यमान युगल तथा 2 स दूरी वाले 2 द्रव्यमान युगल हैं। अतः निकाय की स्िथतिज ऊजार् चित्रा 8.9 22ळ उ ळउ ॅ; द्ध त 4 2 स 2 स 222 ळउ ⎛ 1 ⎞ ळउ त्र− ⎜2 ़ ⎟−5ण्41⎟त्र ⎜स स⎝ 2 ⎠ वगर् के केन्द्र ;त त्र 2 सध्2 द्ध पर गुरुत्वीय विभव, ळउन्;तद्ध त्र−4 2 स ऽ 8ण्8 पलायन चाल यदि हम अपने हाथों से किसी पत्थर को पेंफकते हैं, तो हम यह पाते हैं कि वह पिफर वापस पृथ्वी पर गिर जाता है। निस्संदेह मशीनों का उपयोग करके हम किसी पिण्ड को अध्िकाध्िक तीव्रता तथा प्रारंभ्िाक वेगों से शूट कर सकते हैं जिसके कारणपिण्ड अध्िकाध्िक ऊँचाइयों तक पहुँच जाते हैं। तब स्वाभाविक रूप से हमारे मस्ितष्क में यह विचार उत्पन्न होता है फ्क्या हमकिसी पिण्ड को इतने अध्िक आरंभ्िाक चाल से ऊपर पेंफक सकते हैं कि वह पिफर पृथ्वी पर वापस न गिरे?य् इस प्रश्न का उत्तर देने में ऊजार् संरक्षण नियम हमारी सहायता करता है। मान लीजिए पेंफका गया पिण्ड अनन्त तक पहुंचता है और वहाँ उसकी चाल टहै। किसी पिण्ड की ऊजार्िस्िथतिज तथा गतिज ऊजार्ओं का योग होती है। पहले की ही भांति ॅ पिण्ड की अनन्त पर गुरुत्वीय स्िथतिज ऊजार् को1 नि£दष्ट करता है। तब प्रक्षेप्य की अनन्त पर वुफल ऊजार् उट 2 म्;अनन्त द्ध ॅ12 ि;8ण्26द्ध यदि पिण्ड को पृथ्वी ;त्म् त्र पृथ्वी की त्रिाज्याद्ध के केन्द्र से ;ी ़ त् द्ध ऊँचाइर् पर स्िथत किसी बिन्दु से आरंभ में चालम्टसे पेंफका गया था, तो इस पिण्ड की आरंभ्िाक ऊजार् थीप ळउड 12 म्; ़ त् द्ध त्र उट दृ ़ ॅम्ी म्प 1 ;8ण्27द्ध2;ीत्म़् द्ध ऊजार् संरक्षण नियम के अनुसार समीकरण ;8ण्26द्ध तथा ;8ण्27द्ध बराबर होने चाहिए। अतः उट2 ळउड उट ि2 प दृ म् त्र ;8ण्28द्ध2; द्ध2ीत्म़् समीकरण ;8ण्28द्ध का दक्ष्िाण पक्ष एक ध्नात्मक राश्िा है जिसका न्यूनतम मान शून्य है, अतः वाम पक्ष भी ऐसा ही होना चाहिए। अतः कोइर् पिण्ड अनन्त तक पहुंच सकता है जब टप इतना हो कि उट2 ळउड प दृ म् ≥ 0 ;8ण्29द्ध2;ीत्म़्द्ध टका न्यूनतम मान उस प्रकरण के तदनुरूपी है जिसमेंप समीकरण ;8ण्29द्ध का वाम पक्ष शून्य के बराबर है। इस प्रकार, किसी पिण्ड को अनन्त तक पहुंचने के लिए ;अथार्त् पृथ्वी से पलायन के लिएद्ध आवश्यक न्यूनतम चाल इस संबंध् के तदनुरूपी होती है ळउड 12 म्उटप न्यून ;8ण्30द्ध2 ीत्म् यदि पिण्ड को पृथ्वी के पृष्ठ से छोड़ा जाता है, तो ी त्र 0 और हमें प्राप्त होता है 2ळडम्ट ;8ण्31द्धप न्यनू त्म् संबंध् ह त्र ळड ध्त्2 का उपयोग करने पर हमें निम्नम्म् मान प्राप्त होता है ट 2हत्म् ;8ण्32द्धप न्यनूसमीकरण ;8ण्32द्ध में ह औरत् के आंकिक मान रखने परम् हमें ;टद्ध≈11ण्2 ाउध्े प्राप्त होता है। उसे पलायन चालपन्यून कहते हैं। कभी - कभी लापरवाही मंे इसे हम पलायन वेग भी कह देते हैं। समीकरण ;8ण्32द्ध का उपयोग भली भांति समान रूप से चन्द्रमा से पेंफके जाने वाले पिण्डों के लिए भी किया जा सकता है, ऐसा करते समय हम ह के स्थान पर चन्द्रमा के पृष्ठ पर चन्द्रमा के गुरुत्वीय त्वरण तथा त्के स्थान पर चन्द्रमा कीम् त्रिाज्या का मान रखते हैं। इन दोनों ही राश्िायों के चन्द्रमा के लिए मान पृथ्वी पर इनके मानों से कम हैं तथा चन्द्रमा के लिए पलायन चाल का मान 2ण्3 ाउध्ेप्राप्त होता है। यह मान पृथ्वी की तुलना में लगभग 1ध्5 गुना है। यही कारण है कि चन्द्रमा पर कोइर् वातावरण नहीं है। यदि चन्द्रमा के पृष्ठ पर गैसीय अणु बनें, तो उनकी चाल इस पलायन चाल से अध्िक होगी तथा वे चन्द्रमा के गुरुत्वीय ¯खचाव के बाहर पलायन कर जाएंगे। जउदाहरण 8ण्4 समान त्रिाज्या त् परन्तु ड तथा 4 ड द्रव्यमान के दो एकसमान ठोस गोले इस प्रकार रखे हैं कि इनके केन्द्रों के बीच पृथकन ;चित्रा 8.10 में दशार्ए अनुसारद्ध 6 त् है। दोनों गोले स्िथर रखे गए हैं। उ द्रव्यमान के किसी प्रक्षेप्य को ड द्रव्यमान के गोले के पृष्ठ से 4ड द्रव्यमान के गोले के केन्द्र की ओर सीध्े प्रक्षेपित किया जाता है। प्रक्षेप्य की उस न्यूनतम चाल के लिए व्यंजक प्राप्त कीजिए जिससे पेंफके जाने पर वह दूसरे गोले के पृष्ठ पर पहुंच जाए। चित्रा 8ण्10 हल प्रक्षेप्य पर दो गोलों के परस्पर विरोध्ी गुरुत्वीय बल कायर् करते हैं। उदासीन बिन्दु छ ;चित्रा 8ण्10 देख्िाएद्ध की परिभाषा एक ऐसे बिन्दु ;स्िथतिद्ध के रूप में की जाती है जहाँ दो बल यथाथर्तः एक दूसरे को निरस्त करते हैं। यदि व्छ त्र त है, तो ळ डउ 4 ळ डउ त्र 2त ;6त्−तद्ध2 ;6त् √ तद्ध2 त्र 4त2 6त् √ त त्र क्र2त तत्र 2त् या √ 6त् इस उदाहरण में उदासीन बिन्दु त त्र √ 6त् हमसे संबंध्ित नहीं है। इस प्रकार, व्छ त्र त त्र 2त्। कण को उस चाल से प्रक्षेपित करना पयार्प्त है जो उसे छ तक पहुंचने योग्य बना दे। इसके पश्चात् वहाँ पहुंचने पर 4 ड द्रव्यमान के गोले का गुरुत्वीय बल कण को अपनी ओर खींचने के लिए पयार्प्त होगा। ड द्रव्यमान के गोले के पृष्ठ पर यांत्रिाक ऊजार् 1 ळडउ 4ळडउ2म् त्र उअ −−प 2 त् 5त् उदासीन बिन्दु छ पर कण की चाल शून्य मान की ओरप्रवृत्त होती है। अतः छ पर यांत्रिाक ऊजार् शु( रूप से स्िथतिजऊजार् होती है। अतः ळडउ 4ळडउम्छ त्र− − 2त् 4त् यांत्रिाक ऊजार् संरक्षण नियम के अनुसार 1 ळड 4ळड ळडळड2 −अ − त्र− − 2 त् 5त् 2त्त् अथवा 22ळड ⎛ 41⎞ अ त्र ⎜−⎟त् ⎝ 52⎠ 1ध्2⎛ 3ळड ⎞∴ अ त्र⎜⎟⎝ 5त् ⎠ यहाँ यह ध्यान देने का विषय है कि छ पर प्रक्षेप्य की चाल शून्य है, परन्तु जब यह 4 ड द्रव्यमान के गोले से टकरातातब इसकी चाल शून्येत्तर होती है। जिस चाल से प्रक्षेप्य 4ड द्रव्यमान के गोले से टकराता है, उसे ज्ञात करना छात्रों के अभ्यास के लिए छोड़ा जा रहा है। ऽ 8ण्9 भू उपग्रह भू उपग्रह वह पिण्ड है जो पृथ्वी के परितः परिक्रमण करते हैं। इनकी गतियां, ग्रहों की सूयर् के परितः गतियों के बहुत समान होती हैं, अतः केप्लर के ग्रहीय गति नियम इन पर भी समान रूप से लागू होते हैं। विशेष बात यह है कि इन उपग्रहों कीपृथ्वी के परितः कक्षाएं वृत्ताकार अथवा दीघर्वृत्ताकार है। पृथ्वी का एकमात्रा प्रावृफतिक उपग्रह चन्द्रमा है जिसकी लगभगवृत्ताकार कक्षा है और लगभग27ण्3 दिन का परिक्रमण काल है जो चन्द्रमा के अपनी अक्ष के परितः घूणर्न काल के लगभग समान है। वषर् 1957 के पश्चात् विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी में उन्नति के पफलस्वरूप भारत सहित कइर् देश दूर संचार, भू भौतिकी, मौसम विज्ञान के क्षेत्रा में व्यावहारिक उपयोगों के लिए मानव - नि£मत भू उपग्रहों को कक्षाओं में प्रमोचित करने योग्य बन गए हैं। अब हम पृथ्वी के केन्द्र से ;त् ़ ीद्ध दूरी पर स्िथत वृत्तीयम्कक्षा में गतिमान उपग्रह पर विचार करेंगे, यहाँ त् त्र पृथ्वी की म्त्रिाज्या है। यदि उपग्रह का द्रव्यमान उ तथा ट इसकी चाल है, तो इस कक्षा के लिए आवश्यक अभ्िाकेन्द्र बल उट 2 थ्;अभ्िाकेन्द्रद्ध त्र ;8ण्33द्ध;त्म् ीद्ध तथा यह बल कक्षा के केन्द्र की ओर निदेश्िात है। अभ्िाकेन्द्र बल गुरुत्वाकषर्ण बल द्वारा प्रदान किया जाता है, जिसका मान ळउ ड म् थ्;गुरुत्वाकषर्णद्ध त्र ;8ण्34द्ध;त्म् ीद्ध2 यहाँ डपृथ्वी का द्रव्यमान है।म् समीकरणों;8ण्33द्धतथा ;8ण्34द्ध के दक्ष्िाण पक्षों को समीवृफत तथा उ का निरसन करने पर हमें प्राप्त होता है 2 ळडम्ट ;8ण्35द्ध;त्म् ी द्ध इस प्रकारी के बढ़ने परट घटता है। समीकरण ;8ण्35द्ध के अनुसार जब ी त्र 0 है, तो उपग्रह की चाल ट है ट 2;ी 0द्ध ळड म् ध्त्म् हत्म् ;8ण्36द्ध यहाँ हमने संबंध् ह त्रळडम् ध्त् 2 का उपयोग किया है।म् प्रत्येक कक्षा में उपग्रह 2π;त़् ीद्ध दूरी चाल ट से तय करताम् है। अतः इसका आवतर्काल ज् है 2;त्म् ़ ीद्ध 2;π त् ़ ीद्ध3ध्2π म्ज् त्रत्र ;8ण्37द्धट ळडम् यहाँ हमने समीकरण ;8ण्35द्ध से ट का मान प्रतिस्थापित किया है। समीकरण ;8ण्37द्ध के दोनों पक्षों का वगर् करने पर हमें प्राप्त होता है ज् 2 त्र ा ; त् ़ ी द्ध3 ; जहाँ ा त्र 4 π2 ध् ळ डद्धएम् म्;8ण्38द्ध और यही केप्लर का आवतर्कालों का नियम है जिसका अनुप्रयोग पृथ्वी के परितः उपग्रहों की गतियों के लिए किया जाता है।उन भू उपग्रहों के लिए, जो पृथ्वी के पृष्ठ के अति निकट होते हैं, ी के मान को पृथ्वी की त्रिाज्या त्की तुलना मेंम् समीकरण ;8ण्38द्ध में नगण्य मान लेते हैं। अतः इस प्रकार के भू उपग्रहों के लिए ज् ही ज् होता है, यहाँ के अतिरिक्त सभी ग्रहों की कक्षाएं लगभग वृत्ताकार हैं।व ज् त्र 2π त् ध्ह ;8ण्39द्ध उदाहरण के लिए, हमारी पृथ्वी के अध्र् लघु अक्ष तथा अध्र्0 म् दीघर् अक्ष का अनुपात इध्ं त्र 0ण्99986 है।यदि हम समीकरण ;8.39द्ध में ह तथा त्के आंकिकम् मानों ;ह ण् 9ण्8 उे.2 तथा त्म् त्र 6400 ाउण्द्ध को प्रतिस्थापित उत्तर 8ण्6 पृथ्वी को तोलना रू आपको निम्नलिख्िातकरें, तो हमें प्राप्त होता है आंकड़े दिए गए हैंरू हत्र 9ण्81 उ े√2ए त्म् त्र 6ण्37×106उए पृथ्वी से चन्द्रमा की दूरी त् त्र 3ण्84×108 उ पृथ्वी के6ण्4 106 ज्2 े परितः चन्द्रमा के परिक्रमण का आवतर् काल त्र 27ण्3व 9ण्8 दिन। दो भ्िान्न विध्ियों द्वारा पृथ्वी का द्रव्यमान प्राप्तजो लगभग85 मिनट के बराबर हैं। कीजिए।उत्तर 8ण्5 मंगल ग्रह के पफोबोस तथा डेल्मोस नामक दोचन्द्रमा हैं। ;पद्ध यदि पफोबोस का आवतर्काल 7 घंटे ऽ 39 हल ;पद्ध पहली विध्ि: समीकरण ;8ण्12द्ध सेऽ 2मिनट तथा कक्षीय त्रिाज्या 9ण्4 ×103 ाउ है तो मंगल ह त्म्ड त्र का द्रव्यमान परिकलित कीजिए। ;पपद्ध यह मानते हुए किम्ळ पृथ्वी तथा मंगल सूयर् के परितः वृत्तीय कक्षाओं में26परिक्रमण कर रहे हैं तथा मंगल की कक्षा की त्रिाज्या9ण्81 ×; 6ण्37 × 10 द्धत्रपृथ्वी की कक्षा की त्रिाज्या की 1ण्52 गुनी है तो मंगल - वषर् .116ण्67 ×10 की अवध्ि दिनों में क्या है? त्र 5ण्97× 1024 ाह हल ;पद्ध यहाँ पर समीकरण ;8ण्38द्ध का उपयोग पृथ्वी के ;पपद्ध दूसरी विध्ि: चन्द्रमा पृथ्वी का उपग्रह है। केप्लर केद्रव्यमान डम् को मंगल के द्रव्यमान डसे प्रतिस्थापित करके आवतर्कालों के नियम की व्युत्पिा में;समीकरण ;8ण्38द्ध देख्िाएद्ध, उ करते हैं 24π2त्3 ज् त्र 2 ळडम् 2 4π 3ज् त्र त् 42 3ळड π त्उ त्रडम् ळज् 2 234π त् डत्र 3 24 उ ळज् 2 4 × 3ण्14 × 3ण्14 ×; 3ण्84द्ध×10 त्र .11 2 2 318 6ण्67 ×10 ×; 27ण्3 × 24 × 60 × 60द्ध4 ×; 3ण्14द्ध ×; 94ण् द्ध×10 त्र .11 2 त्र 6ण्02 ×1024 ाह6ण्67 × 10 ×;459 × 60 द्ध दोनों विध्ियों द्वारा लगभग समान उत्तर प्राप्त होते हैं, जिनमें2 3184×;3ण्14 द्ध ×;94ण्द्ध×10 1ः से भी कम का अंतर है। जड त्र उ 2 .56ण्67 ×; 4ण्59 × 6द्ध×10 त्र 6ण्48 × 1023 ाह उदाहरण 8ण्7 समीकरण ;8.38द्ध में स्िथरांक ा को ;पपद्ध केप्लर के आवतर्कालों के नियम का उपयोग करने पर 2दिनों तथा किलोमीटरों में व्यक्त कीजिए। ा त्र 10√13 ेज्2 त्3 उ√3 है। चन्द्रमा पृथ्वी से 3ण्84 × 105 ाउदूर है। चन्द्रमाड डैत्र 23 के परिक्रमण के आवतर्काल को दिनों में प्राप्त कीजिए।ज्त्म् म्ै यहाँ त्डै एवं त्म्ै क्रमशः मंगल - सूयर् तथा पृथ्वी - सूयर् के बीच हल हम जानते हैं किकी दूरियां हैं। ा त्र 10√13 √32ेउ∴ ज्ड त्र ;1ण्52द्ध3ध्2 × 365⎡ ⎤⎡⎤1 1त्र 684 दिन −13 2 त्र 10 ⎢ क ⎥⎢ ⎥ 2 33ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि बुध्, मंगल तथा प्लूटो’ ⎣⎢ ; 24 × 60 × 60 द्ध ⎥⎦ ⎢⎣;1 ध्1000 द्ध ाउ ⎥⎦ ’पृष्ठ 186 पर बाॅक्स में दी गइर् जानकारी पर ध्यान दें। त्र 1ण्33 ×10√14क2 ाउ√3 ऽ समीकरणों ;8ण्38द्ध तथा ा के दिए गए मान का उपयोग जउदाहरण 8ण्8 400 ाह द्रव्यमान का कोइर् उपग्रह पृथ्वीत्रिाज्या की वृत्तीय कक्षा में परिक्रमण करकरने पर चन्द्रमा के परिक्रमण का आवतर्काल ज्2 त्र ;1ण्33× 10.14द्ध;3ण्84 × 105द्ध3 के परित 2त्म् ज् त्र 27ण्3 क ऽ ध्यान दीजिए, यदि हम ;त्म़्ीद्ध को दीघर्वृत्त के अध्र् दीघर् अक्ष ;ंद्ध द्वारा प्रतिस्थापित करें तो समीकरण ;8ण्38द्ध को दीघर्वृत्तीय कक्षाओं पर भी लागू किया जा सकता है, तब पृथ्वीइस दीघर्वृत्त की एक नाभ्िा पर होगी। 8ण्10 कक्षा में गतिशील उपग्रह की ऊजार् समीकरण ;8ण्35द्ध का उपयोग करने पर वृत्ताकार कक्षा में चाल अ से गतिशील उपग्रह की गतिज ऊजार् 12 ण् उअ यज्ञम् 2 अ2 का मान समीकरण ;8.35द्ध से रखने पर त्र ळउडम् ए ;8ण्40द्ध2;त्म् ़ीद्ध ऐसा मानें कि अनन्त पर गुरुत्वीय स्िथतिज ऊजार् शून्य है तब पृथ्वी के केन्द्र से ;त़्ीद्ध दूरी पर उपग्रह की स्िथतिजऊजार् मळउडम् ण् त्र−च्म् ;8ण्41द्ध;त्म् ़ीद्ध ज्ञण्म् ध्नात्मक है जबकि च्ण्म् )णात्मक होती है। तथापि परिमाण में ज्ञण्म् त्र 1 2च्ण्म्ए अतः उपग्रह की वुफल ऊजार् रहा है। इसे 4त्म् की वृत्तीय कक्षा में स्थानांतरित करने केलिए आवश्यक ऊजार् परिकलित कीजिए। इसकी गतिजतथा स्िथतिज ऊजार् में कितने परिवतर्न होंगे? हल आरंभ में ळड उम्म् त्र−प 4 त्म् जबकि, अंत में ळड उम्म् त्र−ि8 त्म् वुफल ऊजार् में परिवतर्न Δम् त्र म् ि√ म्प ळड उ ⎛ळड ⎞उत्म् म्म्त्र त्र⎜⎟⎜2 ⎟8 त्त् 8म् ⎝ म् ⎠ हउत्म् 9ण्81×400×6ण्37×106 9Δम् त्रत्र त्र3ण्13 ×10 श्र 88 गतिज ऊजार् घट जाती है और यह Δम् की अनुहारक है, अथार्त् Δज्ञ त्र ज्ञ ि√ ज्ञप त्र √ 3ण्13 × 109 श्र । स्िथतिज ऊजार् में होने वाला परिवतर्न वुफल ऊजार् का दो गुना है, अथार्त् Δट त्र ट ि√ टप त्र √ 6ण्25 × 109 श्र ऽऽ 8ण्11 तुल्यकाली तथा ध््रुवीय उपग्रह ळउडम्त्र ण् ़ ण्म्ज्ञम् च्म्त्र− ;8ण्42द्ध2;त्म् ़ीद्ध इस प्रकार वृत्ताकार कक्षा में गतिशील किसी उपग्रह कीवुफल ऊजार् )णात्मक होती है, स्िथतिज ऊजार् का )णात्मकतथा परिमाण में ध्नात्मक गतिज ऊजार् का दो गुना होता है।जब किसी उपग्रह की कक्षा दीघर्वृत्तीय होती है तो उसकी ज्ञण्म् तथा च्ण्म् दोनों ही पथ के हर बिन्दु पर भ्िान्न होती हैं। वृत्तीय कक्षा के प्रकरण की भांति ही उपग्रह की वुफल ऊजार् नियत रहती है तथा यह )णात्मक होती है और यही हम अपेक्षाभी करते हैं क्योंकि जैसा हम पहले चचार् कर चुके हैं कि यदिवुफल ऊजार् ध्नात्मक अथवा शून्य हो तो पिण्ड अनन्त की ओरपलायन कर जाता है। उपग्रह सदैव पृथ्वी से परिमित दूरियों परपरिक्रमण करते हैं, अतः उनकी ऊजार्एँ ध्नात्मक अथवा शून्य नहीं हो सकतीं। यदि हम समीकरण ;8.37द्ध में ;त़् ीद्ध के मान में इस तरहम् समायोजन करें कि आवतर्कालज् का मान 24 घन्टे हो जाए, तोएक अत्यन्त रोचक परिघटना उत्पन्न हो जाती है। यदि वृत्तीयकक्षा पृथ्वी के विषुवत वृत्त के तल में है, तो इस प्रकार का उपग्रह, जिसका आवतर्काल पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूणर्न करने के आवतर्काल के बराबर हो, पृथ्वी के किसी बिन्दु से देखने पर स्िथर प्रतीत होगा। इस उद्देश्य के लिए परिकलन करने पर ;त् ़ ीद्ध का मान त् की तुलना में कापफी अध्िक आता है ः म्म् ⎛ज्ळडम् ⎞1ध् 32 त् ़त्र⎜म्ी 2 ⎟ ;8ण्43द्ध⎝ 4π⎠ ज् त्र 24 घन्टे के लिए, परिकलन करने पर, त़् ी त्र 35800 म् ाउए जो कि पृथ्वी की त्रिाज्या त् से कापफी अिाक है। वेम् अंतरिक्ष में भारत की छलाँग भारत ने 1975 में, निम्न कक्षा - उपग्रह आयर्भट्ट के प्रक्षेपण के साथ अंतरिक्ष युग में प्रवेश किया। कायर्क्रम के पहले वुफछ वषो± में प्रक्षेपण वाहन उस समय के सोवियत संघ द्वारा प्रदान किए गए थे। 1980 के प्रारंभ में, रोहिणी शृंखला के उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने के लिए देशज प्रक्षेपण वाहनों का उपयोग किया गया। ध््रुवीय उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने के कायर्क्रम 1980 वाले दशक के अंत में शुरू हुए। प्त्ै ;भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रहद्ध नामधरी उपग्रहों की शृंखला भी प्रक्षेपित की जा चुकी है और यह कायर्क्रम भविष्य में भी चलता रहने वाला है। ये उपग्रह, सवेर्क्षण, मौसम की भविष्यवाणी और अंतरिक्ष में किए जाने वाले प्रयोगों में इस्तेमाल किए जाते हैं। प्छै।ज् ;भारतीय राष्ट्रीय उपग्रहद्ध शृंखला के उपग्रह 1982 के शुरू में दूर संचार तथा मौसम की भविष्यवाणी के लिए लाए गए। प्छै।ज् शृंखला के लिए यूरोपीय प्रक्षेपण वाहन नियोजित किए गए। भारत ने अपनी तुल्यकाली उपग्रहों की क्षमता का परीक्षण 2001 में किया जब उसने एक प्रयोजिक दूर संचार उपग्रह ;ळै।ज्.1द्धअंतरिक्ष में भेजा। 1984 में राकेश शमार् पहले भारतीय अंतरिक्ष यात्राी बने। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधन संघटन ;प्ैत्व्द्ध एक बड़ा संघटन है जो बहुत से केन्द्र चलाता है। इसका प्रमुख प्रक्षेपण केन्द्र ;ैभ्।त्द्ध श्री हरिकोटा में है जो चेन्नइर् से 100ाउ दूर स्िथत है। राष्ट्रीय सुदूर संवेदन एजेन्सी ;छत्ै।द्ध हैदराबाद के निकट स्िथत है। अंतरिक्ष एवं समवगीर् विज्ञानों का उनका राष्ट्रीय शोध् केन्द्र, अहमदाबाद की भौतिकी शोध् प्रयोगशाला ;च्त्स्द्ध है। उपग्रह जो पृथ्वी के विषुवत वृत्त के तल ;अथार्त निरक्षीयसमतलद्ध में पृथ्वी के परितः वृत्तीय कक्षा में, ज् त्र 24 घन्टे के आवतर्काल से, परिक्रमण करते हैं, तुल्यकाली उपग्रह कहलाते हैं। स्पष्ट है कि क्योंकि पृथ्वी समान आवतर्काल से अपने अक्ष पर घूणर्न करती है अतः यह उपग्रह पृथ्वी के किसी भी बिन्दुसे स्िथर प्रतीत होगा। पृथ्वी के पृष्ठ से इतनी अिाक ऊँचाइर्तक ऊपर पेंफकने के लिए अत्यन्त शक्ितशाली राॅकेटों की आवश्यकता होती है। परन्तु, बहुत से व्यावहारिक अनुप्रयोगों को ध्यान में रखकर इनका प्रबन्ध् किया गया है।हम जानते हैं कि एक निश्िचत आवृिा से अध्िक आवृिा की विद्युत चुम्बकीय तरंगें आयनमंडल द्वारा परावतिर्त नहीं होतीं। रेडियो - प्रसारण में उपयोग होने वाली रेडियो तरंगें जिनकाआवृिा परिसर 2डभ् से 10डभ् है क्रांतिक आवृिा से कमर् र् है, इसलिए ये तरंगें आयनमंडल से परिवतिर्त हो जाती हैं। इस प्रकार किसी ऐन्टेना द्वारा किया गया रेडियो तरंग प्रसारण उन स्थानों पर भी ग्रहण किया जा सकता है जो बहुत दूर है तथा पृथ्वी की वक्रता के कारण जहाँ तरंगें सीध्े नहीं पहुँच पातीं। दूरदशर्न - प्रसारण अथवा अन्य प्रकार के संचार में उपयोग होनेवाली तरंगों की आवृिायाँ अत्यध्िक उच्च होती हैं, अतः इन्हें सीध्े ही दृष्िट - रेखा से बाहर ग्रहण नहीं किया जा सकता।प्रसारण केन्द्र के ऊपर स्थापित कोइर् तुल्यकाली उपग्रह जो स्िथर प्रतीत होता है, इन सिगनलों को ग्रहण करके उन्हें, पृथ्वी के बड़े क्षेत्रा पर वापस प्रसारित कर सकता है। भारत द्वारा अन्तरिक्ष में भेजा गया इनसैट उपग्रह समूह ऐसा ही तुल्यकाली उपग्रह समूह है जिसका विस्तृत उपयोग दूरसंचार के लिए भारत में किया जा रहा है। उपग्रह की अन्य श्रेणी को ध्ु्रवीय उपग्रह कहते हैं। ये निम्न तंुगता ;ी ≈ 500 से800 ाउद्धउपग्रह हैं। परन्तु ये पृथ्वीके ध््रुवों के परितः उत्तर दक्ष्िाण दिशा में गमन करते हैं जबकि पृथ्वी अपने अक्ष पर पश्िचम से पूवर् की ओर घूणर्न करती है। ;देख्िाए चित्रा 8ण्11द्ध। चूंकि इन उपग्रहों का आवतर्काल लगभग 100 मिनट होता है, अतः ये किसी भी अक्षांश से दिन में कइर् बार गुजरते हैं। तथापि, क्योंकि इन उपग्रहों की पृथ्वी के पृष्ठ से ऊँचाइर् ी लगभग 500.800 ाउहोती है, अतः इस पर लगे किसी वैफमरे द्वारा किसी एक कक्षा में केवल पृथ्वी की एक छोटी पट्टððी का ही दृश्य लिया जा सकता है। संलग्न पियों को अगली कक्षा में देखा जाता है। इस प्रकार प्रभावी रूप में पूरे एक दिन में पट्टððी दर पट्टी पूरी पृथ्वी का सवेर्क्षण किया जा सकता है। ये उपग्रह निकट से, अच्छे विभेदन के साथ, विषुवतीय तथा ध््रुवीय क्षेत्रों का सवेर्क्षण कर सकते हैं। इस प्रकार के उपग्रहों द्वारा एकत्रा सूचनाएँ सुदूर संवेदन, मौसम विज्ञान के साथ पृथ्वी के पयार्वरणीय अध्ययनों के लिए भी अत्यन्त उपयोगी हैं। 8ण्12 भारहीनता किसी पिण्ड का भार वह बल है जिससे पृथ्वी उसे अपने केन्द्र की और आकष्िार्त करती है। जब हम किसी पृष्ठ पर खड़े होते हैं तो हमें अपने भार का बोध् होता है क्योंकि वह पृष्ठ हमारे भार के विपरीत बल आरोपित करके हमें विराम की स्िथति में रखता है। यही सि(ान्त उस समय लागू होता है जब हम किसी स्िथर बिन्दु, जैसे छत से लटकी किसी कमानीदार तुला से किसी पिण्ड का भार मापते हैं। यदि गुरुत्व बल के विरु( पिण्ड पर कोइर् बल आरोपित न हो तो वह नीचे गिर जाएगा। कमानी भी यथाथर् रूप में पिण्ड पर इसी प्रकार बल आरोपित करती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पिण्ड के गुरुत्वीय ख्िांचाव के कारण कमानी नीचे की ओर वुफछ ख्िांच जाती है और क्रमसे ऊध्वार्ध्र ऊपर दिशा में कमानी पिण्ड पर एक बल आरोपित करती है। अब कल्पना कीजिए कि कमानीदार तुला का ऊपरी सिरा कमरे की छत से जुड़ कर स्िथर नहीं है। तब कमानी के दोनों सिरों के साथ - साथ पिण्ड भी सवर्सम त्वरण ह से गति करेंगे। इस स्िथति में कमानी में कोइर् ¯खचाव नहीं होगा तथा वह उस पिण्ड पर, जो गुरुत्व बल के कारण ह त्वरण से नीचे की ओर गतिशील है, कोइर् बल आरोपित नहीं करेगी। कमानीदार तुला का इस स्िथति में पाठ्यांक कमानी में कोइर् ख्िांचाव न होने के कारण शून्य होगा। यदि उस पिण्ड के रूप में कोइर् स्त्राी अथवा पुरुष है, तो वह इस स्िथति में अपने भार का अनुभव नहींकरेगी/ करेगा, क्योंकि उस पर ऊपर की दिशा में कोइर् बल नहीं लग रहा है। इस प्रकार, जब कोइर् पिण्ड स्वतंत्रातापूवर्क गिरता है, तो वह भारहीन होता है, तथा इस परिघटना को प्रायः भारहीनता की परिघटना कहते हैं। पृथ्वी के परितः परिक्रमण करने वाले किसी उपग्रह में, उपग्रह का हर छोटे से छोटा टुकड़ा तथा उसके भीतर की प्रत्येक वस्तु पृथ्वी के केन्द्र की ओर त्वरित गति से गतिशील है, तथा इस गति का त्वरण, यथाथर् रूप से, उस स्िथति में पृथ्वी के गुरुत्वीय त्वरण के बराबर है। अतः उपग्रह के भीतर की प्रत्येक वस्तु स्वतंत्रातापूवर्क गिरती है। यह ठीक ऐसा ही हैजैसा कि हम किसी ऊंचाइर् से पृथ्वी की ओर गिर रहे हों। अतः किसी उपग्रह के भीतर बैठे व्यक्ित किसी प्रकार के गुरुत्व बल का अनुभव नहीं करते। गुरुत्व बल हमें उध्वार्धर दिशा की परिभाषा का ज्ञान कराता है, अतः उपग्रह के भीतर बैठेव्यक्ितयों के लिए क्षैतिज अथवा ऊध्वार्धर दिशाओं का कोइर् महत्व नहीं होता, उनके लिए सभी दिशाएँ समान होती हैं। वायु में तैरते अंतरिक्षयात्रिायों के चित्रा ठीक इसी तथ्य को दशार्ते हैं। सारांश 1ण् न्यूटन का गुरुत्वाकषर्ण का सावर्त्रिाक नियम यह उल्लेख करता है कि दूरी त से पृथकन वाले उ1 तथा उ2 द्रव्यमान के किन्ही दो कणों के बीच लगे गुरुत्वीय आकषर्ण बल का परिमाण उउ1 2थ्ळत्र 2 त यहाँ ळ सावर्त्रिाक गुरुत्वीय स्िथरांक है जिसका मान 6ण्672 ×10√11 छउ2 ाह√2 है। 2ण् यदि हमें ड1ए ड2ए ड3 ह्ण्डद आदि बहुत से कणों के कारण उ द्रव्यमान के किसी कण पर लगे परिणामी गुरुत्वाकषर्ण बल को ज्ञात करना है, तो इसके लिए हम अध्यारोपण सि(ान्त का उपयोग करते हैं। मान लीजिए गुरुत्वाकषर्ण नियम द्वारा ड1ए ड2ए ह्ण्डमें प्रत्येक द्वारा उ पर आरोपित व्यष्िटगत बलथ्1ए थ्2ए ह्ण्थ्हैं। तब बलों के अध्यारोपण सि(ान्त के अनुसार प्रत्येक बल अन्य पिण्डों द्वारा प्रभावित हुए बिना स्वतंत्रातापूवर्क कायर् करता है। तब इनका परिणामी बल थ्त् सदिशों के योग द्वारा ज्ञात किया जाता है। द दण् द थ्त् त्र थ्1 ़ थ्2 ़ ह्ह् ़ थ्द त्र थ्प प 1 यहाँ प्रतीक त्र्Σ» संकलन को दशार्ता है। 3ण् केप्लर के ग्रहगति नियम यह स्पष्ट करते हैं कि ;ंद्ध सभी ग्रह दीघर्वृत्तीय कक्षाओं में गति करते हैं तथा सूयर् इस कक्षा की किसी एक नाभ्िा पर स्िथत होता है। ;इद्ध सूयर् से किसी ग्रह तक खींचा गया त्रिाज्य सदिश समान समय अन्तरालों में समान क्षेत्रापफल प्रसपर् करता है। यह इस तथ्य का पालन करता है कि ग्रहों पर लगने वाले गुरुत्वाकषर्ण बल केन्द्रीय हैं। अतः कोणीय संवेग अपरिव£तत रहता है। ;बद्ध किसी ग्रह के कक्षीय आवतर्काल का वगर् उसकी दीघर्वृत्तीय कक्षा के अध्र् दीघर् अक्ष के घन के अनुक्रमानुपाती होता है। सूयर् के परितः त् की वृत्ताकार कक्षा में परिक्रमण कर रहे ग्रह के आवतर्काल ज् तथा त्रिाज्या त् में यह संबंध् होता है 2 23⎛4π⎞ ज् त्र⎜ ⎟त्⎜⎟ळड⎝ े ⎠ यहाँ डे सूयर् का द्रव्यमान है। अध्िकांश ग्रहों की सूयर् के परितः लगभग वृत्तीय कक्षाएँ हैं। यदि त् का प्रतिस्थापन ग्रहकी दीघर्वृत्तीय कक्षा के अध्र् दीघर् अक्ष ं से कर दें तो उपरोक्त नियम दीघर्वृत्तीय कक्षाओं पर समान रूप से लागू होता है। 4ण् गुरुत्वीय त्वरण ;ंद्ध पृथ्वी के पृष्ठ से ी ऊँचाइर् पर ळडम्ह;ी द्ध त्र 2;त्म् ़ी द्धळड ⎛ 2ी ⎞म्≈⎜ 1 −⎟ 2 ी ढढ त्म्त्त्म् ⎝ म् ⎠ 2ी ळ ड म्यहाही;द्ध 01 0 ँ ह ह 2त् त्म्म् ;इद्ध पृथ्वी के पृष्ठ के नीचे क गहराइर् पर ळड ⎛ क ⎞⎛ क ⎞;द्धत्र ⎜− ⎟त्रह;द्ध0 ⎜ 1 −⎟ हक म् 1 म् 2⎝ म् ⎠⎝ म् ⎠त्त् त् 5ण् गुरुत्वाकषर्ण बल संरक्षी बल है। इसलिए किसी स्िथतिज ऊजार् पफलन को परिभाष्िात किया जा सकता है। त पृथकन के किन्ही दो कणों से संब( गुरुत्वीय स्िथतिज ऊजार् ळउ उ1 2ट त्र− त यहाँत → ∞ पर ट को शून्य माना। कणों के किसी निकाय की वुफल स्िथतिज ऊजार् उन कणों के सभी युगलों की ऊजार्ओंका योग होता है जिसमें प्रत्येक युगल का निरूपण ऊपर व्यक्त सूत्रा के पदों में किया जाता है। इसका निधर्रण अध्यारोपण के सि(ान्त के अनुगमन द्वारा किया गया है। 6ण् यदि किसी वियुक्त निकाय में उ द्रव्यमान का कोइर् कण किसी भारी पिण्ड, जिसका द्रव्यमान ड है, के निकट अ चालसे गतिमान है, तो उस कण की वुफल यांत्रिाक ऊजार् 1 ळड उम् त्र उअ2− 2 त अथार्त् वुफल यांत्रिाक ऊजार् गतिज तथा स्िथतिज ऊजार्ओं का योग है। वुफल ऊजार् गति का स्िथरांक होती है। 7ण् यदि ड के परितः ं त्रिाज्या की कक्षा में उ गतिशील है, जबकि ड झझ उए तो निकाय की वुफल ऊजार् ळडउम् त्र− 2ं यह उपरोक्त बिन्दु 5 में दी गयी स्िथतिज ऊजार् में यादृच्िछक स्िथरांक के चयन के अनुसार है। किसी भी परिब( निकाय, अथार्त्, ऐसा निकाय जिसमें कक्षा बन्द हो जैसे दीघर्वृत्तीय कक्षा, की वुफल ऊजार् ट्टणात्मक होती है। गतिज तथा स्िथतिजऊजार्एँ हैं ळडउज्ञ त्र 2ं ळडउट त्र− ं 8ण् पृथ्वी के पृष्ठ से पलायन चाल 2 ळडम्अ त्र म त्र 2हत्म्त्म् इसका मान 11ण्2 ाउ े√1 है। 9ण् यदि कोइर् कण किसी एकसमान गोलीय खोल अथवा गोलीय सममित भीतरी द्रव्यमान वितरण के ठोस गोले के बाहर है, तो गोला कण को इस प्रकार आकष्िार्त करता है जैसे कि उस गोले अथवा खोल का समस्त द्रव्यमान उसके केन्द्र पर संकेन्िद्रत हो। 10ण्यदि कोइर् कण किसी एकसमान गोलीय खोल के भीतर है, तो उस कण पर लगा गुरुत्वीय बल शून्य है। यदि कोइर् कण किसी संभागी ठोस गोले के भीतर है, तो कण पर लगा बल गोले के केन्द्र की ओर होता है। यह बल कण के अंतस्थ गोलीय द्रव्यमान द्वारा आरोपित किया जाता है। 11ण्तुल्यकाली ;भू तुल्यकालिक संचारद्ध उपग्रह विषुवतीय तल ;निरक्षीय समतलद्ध में, वृत्तीय कक्षा में, पृथ्वी के केन्द्र से लगभग 4ण्22 104 ाउ दूरी पर गति करते हैं। विचारणीय विषय 1ण् किसी पिण्ड की किसी अन्य पिण्ड के गुरुत्वीय प्रभाव के अन्तगर्त गति का अध्ययन करते समय निम्नलिख्िात राश्िायाँ संरक्ष्िात रहती हैं: ;ंद्ध कोणीय संवेग, ;इद्ध वुफल यांत्रिाक ऊजार् रैख्िाक संवेग का संरक्षण नहीं होता। 2ण् कोणीय संवेग संरक्षण केप्लर के द्वितीय नियम की ओर उन्मुख कराता है। तथापि यह गुरुत्वाकषर्ण के व्युत्क्रम वगर् नियम के लिए विश्िाष्ट नहीं है। यह किसी भी केन्द्रीय बल पर लागू होता है। 3ण् केप्लर के तीसरे नियम, ज्2 त्र ज्ञै त्3 में स्िथरांक ज्ञै वृत्तीय कक्षाओं में गति करने वाले प्रत्येक ग्रह के लिए समान होता है। यह ग्रहों के अनुसार परिवतिर्त नहीं होता। पृथ्वी की परिक्रमा करने वाले उपग्रहों पर भी यही टिप्पणी लागू होती है। ख्;समीकरण ;8.38द्ध, 4ण् अन्तरिक्ष उपग्रहों में अन्तरिक्ष यात्राी भारहीनता अनुभव करते हैं। इसका कारण यह नहीं है कि अंतरिक्ष की उस अवस्िथति में गुरुत्वाकषर्ण बल कम है। वरन इसका कारण यह है कि अन्तरिक्ष यात्राी तथा उपग्रह दोनों ही पृथ्वी की ओर स्वंतत्रातापूवर्क गिरते हैं। 5ण् दूरी त् के पृथकन वाले दो बिन्दुओं से संबद्व गुरुत्वीय स्िथतिज ऊजार् ळउ उ21ट स्िथराकं त यहाँ स्िथरांक को वुफछ भी मान दिया जा सकता है। इसे शून्य मानना सरलतम चयन है। इस चयन के अनुसार ळउ उ21ट त इस चयन से यह अंतनिर्हित है कि जब त → ∞ है तो ट → 0 होता है। गुरुत्वीय ऊजार् के शून्य होने की अवस्िथति काचयन स्िथतिज ऊजार् में यादृच्िछक स्िथरांक के चयन के समान ही है। ध्यान दीजिए, इस स्िथरांक के चयन से गुरुत्वीय बल परिवतिर्त नहीं होता। 6ण् किसी पिण्ड की वुफल यांत्रिाक ऊजार् इसकी गतिज ऊजार् ;जो सदैव ध्नात्मक होती हैद्ध तथा स्िथतिज ऊजार् का योग होती है। अनन्त के सापेक्ष ;अथार्त्, यदि हम मान लें कि पिण्ड की अनन्त पर स्िथतिज ऊजार् शून्य हैद्ध, किसी पिण्ड की गुरुत्वीयस्िथतिज ऊजार् ट्टणात्मक होती है। किसी उपग्रह की वुफल ऊजार् ट्टणात्मक होती है। 7ण् स्िथतिज ऊजार् के लिए सामान्यतः दिखाइर् देने वाला व्यंजक उही, वास्तव में, ऊपर बिन्दु 6 के अन्तगर्त स्पष्ट किए अनुसारगुरुत्वीय स्िथतिज ऊजार्ओं के अन्तर का सन्िनकट मान होता है। 8ण् यद्यपि दो बिन्दुओं के बीच गुरुत्वाकषर्ण बल केन्द्रीय है, तथापि दो परिमित दृढ़ पिण्डों के बीच लगने वाले बल का इन दोनों द्रव्यमानों के केन्द्रों को मिलाने वाली रेखा के अनुदिश होना आवश्यक नहीं है। किसी गोलीय सममित पिण्ड के लिए उस पिण्ड से बाहर स्िथत किसी कण पर लगा बल इस प्रकार लगता है जैसे कि पिण्ड का समस्त द्रव्यमान उसके केन्द्र पर संकेन्िद्रत हो और इसीलिए यह बल केन्द्रीय होता है। 9ण् गोलीय खोल के भीतर किसी कण बिन्दु पर गुरुत्वीय बल शून्य होता है। तथापि ;किसी धत्िवक खोल के विपरीत, जो वैद्युत बलों से परिरक्षण करता हैद्ध यह खोल अपने से बाहर स्िथत दूसरे पिण्डों को गुरुत्वीय बलों के आरोपित होने से अपने भीतर स्िथत कणों का परिरक्षण नहीं करता। गुरुत्वीय परिरक्षण संभव नहीं है। अभ्यास 8ण्1 निम्नलिख्िात के उत्तर दीजिएः ;ंद्ध आप किसी आवेश का वैद्युत बलों से परिरक्षण उस आवेश को किसी खोखले चालक के भीतर रखकर कर सकते हैं। क्या आप किसी पिण्ड का परिरक्षण, निकट में रखे पदाथर् के गुरुत्वीय प्रभाव से, उसे खोखले गोले में रखकर अथवा किसी अन्य साध्नों द्वारा कर सकते हैं? ;इद्ध पृथ्वी के परितः परिक्रमण करने वाले छोटे अन्तरिक्षयान में बैठा कोइर् अन्तरिक्ष यात्राी गुरुत्व बल का संसूचन नहीं कर सकता। यदि पृथ्वी के परितः परिक्रमण करने वाला अन्तरिक्ष स्टेशन आकार में बड़ा है, तब क्या वह गुरुत्व बल के संसूचन की आशा कर सकता है? ;बद्ध यदि आप पृथ्वी पर सूयर् के कारण गुरुत्वीय बल की तुलना पृथ्वी पर चन्द्रमा के कारण गुरुत्व बल से करें, तो आप यह पाएंगे कि सूयर् का ख्िांचाव चन्द्रमा के ख्िाचाव की तुलना में अध्िक है ;इसकी जाँच आप स्वयं आगामी अभ्यासों में दिए गए आंकड़ों की सहायता से कर सकते हैं।द्ध तथापि चन्द्रमा के ख्िांचाव का ज्वारीय प्रभाव सूयर् के ज्वारीय प्रभाव से अध्िक है। क्यों? 8ण्2 सही विकल्प का चयन कीजिए: ;ंद्ध बढ़ती तुंगता के साथ गुरुत्वीय त्वरण बढ़ता/घटता है। ;इद्ध बढ़ती गहराइर् के साथ ;पृथ्वी को एकसमान घनत्व को गोला मानकरद्ध गुरुत्वीय त्वरण बढ़ता/घटता है। ;बद्ध गुरुत्चीय त्वरण पृथ्वी के द्रव्यमान/पिण्ड के द्रव्यमान पर निभर्र नहीं करता। ;कद्ध पृथ्वी के केन्द्र से त2 तथा त1 दूरियों के दो बिन्दुओं के बीच स्िथतिज ऊजार् - अन्तर के लिए सूत्रा √ळडउ;1ध्त2 √ 1ध्त1द्ध सूत्रा उह;त2 √ त1द्ध से अध्िक/कम यथाथर् है। 8ण्3 मान लीजिए एक ऐसा ग्रह है जो सूयर् के परितः पृथ्वी की तुलना में दो गुनी चाल से गति करता है, तब पृथ्वी की कक्षा की तुलना में इसका कक्षीय आमाप क्या है? 8ण्4 बृहस्पति के एक उपग्रह, आयो ;प्वद्ध, की कक्षीय अवध्ि 1.769 दिन तथा कक्षा की त्रिाज्या 4ण्22 × 108 उ है। यह दशार्इए कि बृहस्पति का द्रव्यमान सूयर् के द्रव्यमान का लगभग 1/1000 गुना है। 8ण्5 मान लीजिए कि हमारी आकाशगंगा में एक सौर द्रव्यमान के 2ण्5 × 1011 तारे हैं। मंदाकिनीय केन्द्र से 50ए000 सल दूरी पर स्िथत कोइर् तारा अपनी एक परिक्रमा पूरी करने में कितना समय लेगा? आकाशगंगा का व्यास 105 सल लीजिए। 8ण्6 सही विकल्प का चयन कीजिए: ;ंद्ध यदि स्िथतिज ऊजार् का शून्य अनन्त पर है, तो कक्षा में परिक्रमा करते किसी उपग्रह की वुफल ऊजार् इसकी गतिज/स्िथतिज ऊजार् का ट्टणात्मक है। ;इद्ध कक्षा में परिक्रमा करने वाले किसी उपग्रह को पृथ्वी के गुरुत्वीय प्रभाव से बाहर निकालने के लिए आवश्यकऊजार् समान ऊंचाइर् ;जितनी उपग्रह की हैद्ध के किसी स्िथर पिण्ड को पृथ्वी के प्रभाव से बाहर प्रक्षेपित करने केलिए आवश्यक ऊजार् से अध्िक/कम होती है। 8ण्7 क्या किसी पिण्ड की पृथ्वी से पलायन चाल;ंद्ध पिण्ड के द्रव्यमान, ;इद्ध प्रक्षेपण बिन्दु की अवस्िथति, ;बद्ध प्रक्षेपण की दिशा, ;कद्ध पिण्ड के प्रमोचन की अवस्िथति की ऊंचाइर् पर निभर्र करती है? 8ण्8 कोइर् ध्ूमकेतु सूयर् की परिक्रमा अत्यध्िक दीघर्वृत्तीय कक्षा में कर रहा है। क्या अपनी कक्षा में ध्ूमकेतु की शुरू से अन्त तक ;ंद्ध रैख्िाक चाल, ;इद्ध कोणीय चाल, ;बद्ध कोणीय संवेग, ;कद्ध गतिज ऊजार्, ;मद्ध स्िथतिज ऊजार् ;द्धि वुफल ऊजार् नियत रहती है। सूयर् के अति निकट आने पर ध्ूमकेतु के द्रव्यमान में ह्रास को नगण्य मानिये। 8ण्9 निम्नलिख्िात में से कौन से लक्षण अन्तरिक्ष में अन्तरिक्ष यात्राी के लिए दुखःदायी हो सकते हैं? ;ंद्ध पैरों में सूजन, ;इद्ध चेहरे पर सूजन, ;बद्ध सिरददर्, ;कद्ध दिव्फविन्यास समस्या। 8ण्10 एकसमान द्रव्यमान घनत्व की अध्र्गोलीय खोलों द्वारा परिभाष्िात ढोल के पृष्ठ के केन्द्र पर गुरुत्वीय तीव्रता की दिशा ख्देख्िाए चित्रा 8ण्10, ;पद्ध ंए ;पपद्ध इए ;पपपद्ध बए ;पअद्ध 0 में किस तीर द्वारा दशार्यी जाएगी? चित्राण् 8ण्10 8ण्11 उपरोक्त समस्या में किसी यादृच्िछक बिन्दु च् पर गुरुत्वीय तीव्रता किस तीर ;पद्ध कए ;पपद्ध मए ;पपपद्ध एि ;पअद्ध ह द्वारा व्यक्त की जाएगी? 8ण्12 पृथ्वी से किसी राॅकेट को सूयर् की ओर दागा गया है। पृथ्वी के केन्द्र से किस दूरी पर राॅकेट पर गुरुत्वाकषर्ण बल शून्य है? सूयर् का द्रव्यमान त्र 2×1030 ाहए पृथ्वी का द्रव्यमान त्र 6×1024 ाह। अन्य ग्रहों आदि के प्रभावों की उपेक्षा कीजिए ;कक्षीय त्रिाज्या त्र 1ण्5 × 1011 उद्ध। 8ण्13 आप सूयर् को वैफसे तोलेंगे, अथार्त् उसके द्रव्यमान का आकलन वैफसे करेंग? सूयर् के परितः पृथ्वी की कक्षा की औसत त्रिाज्या 1ण्5 × 108 ाउ है। 8ण्14 एक शनि वषर् एक पृथ्वी - वषर् का 29ण्5 गुना है। यदि पृथ्वी सूयर् से 1ण्5 × 108 ाउ दूरी पर है, तो शनि सूयर् से कितनी दूरी पर है? 8ण्15 पृथ्वी के पृष्ठ पर किसी वस्तु का भार 63 छ है। पृथ्वी की त्रिाज्या की आध्ी ऊंचाइर् पर पृथ्वी के कारण इस वस्तु पर गुरुत्वीय बल कितना है? 8ण्16 यह मानते हुए कि पृथ्वी एकसमान घनत्व का एक गोला है तथा इसके पृष्ठ पर किसी वस्तु का भार 250 छ है, यह ज्ञात कीजिए कि पृथ्वी के केन्द्र की ओर आध्ी दूरी पर इस वस्तु का भार क्या होगा? 8ण्17 पृथ्वी के पृष्ठ से उध्वार्ध्रतः ऊपर की ओर कोइर् राॅकेट 5 ाउ े.1 की चाल से दागा जाता है। पृथ्वी पर वापस लौटने से पूवर् यह राॅकेट पृथ्वी से कितनी दूरी तक जाएगा? पृथ्वी का द्रव्यमान त्र 6ण्0 × 1024 ाहय पृथ्वी की माध्य त्रिाज्या त्र 6ण्4 × 106 उ तथा ळ त्र 6ण्67 × 10√11 छ उ2ाह√2। 8ण्18 पृथ्वी के पृष्ठ पर किसी प्रक्षेप्य की पलायन चाल 11ण्2 ाउ े√1 है।किसी वस्तु को इस चाल की तीन गुनी चाल से प्रक्षेपित किया जाता है। पृथ्वी से अत्यध्िक दूर जाने पर इस वस्तु की चाल क्या होगी? सूयर् तथा अन्य ग्रहों की उपस्िथति की उपेक्षा कीजिए। 8ण्19 कोइर् उपग्रह पृथ्वी के पृष्ठ से 400 ाउ ऊंचाइर् पर पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है। इस उपग्रह को पृथ्वी के गुरुत्वीयप्रभाव से बाहर निकालने में कितनी ऊजार् खचर् होगी? उपग्रह का द्रव्यमान त्र 200 ाहय पृथ्वी का द्रव्यमान त्र 6ण्0×1024 ाहय पृथ्वी की त्रिाज्यात्र 6ण्4 × 106 उ तथा ळ त्र 6ण्67 × 10√11 छ उ2 ाह√2। 8ण्20 दो तारे, जिनमें प्रत्येक का द्रव्यमान सूयर् के द्रव्यमान ;2×1030 ाहद्ध के बराबर है, एक दूसरे की ओर सम्मुख टक्कर के लिए आ रहे हैं। जब वे 109 ाउ दूरी पर हैं तब इनकी चाल उपेक्षणीय हैं। ये तारे किस चाल से टकराएंगे? प्रत्येक तारे की त्रिाज्या 104 ाउ है।यह मानिए कि टकराने के पूवर् तक तारों में कोइर् विरूपण नहीं होता ;ळ के ज्ञात मान का उपयोग कीजिएद्ध। 8ण्21 दो भारी गोले जिनमें प्रत्येक का द्रव्यमान 100 ाह त्रिाज्या 0ण्10 उ है किसी क्षैतिज मेज पर एक दूसरे से 1ण्0 उ दूरी पर स्िथत हैं। दोनों गोलों के केन्द्रों को मिलाने वाली रेखा के मध्य बिन्दु पर गुरुत्वीय बल तथा विभव क्या है? क्या इस बिन्दु पर रखा कोइर् पिण्ड संतुलन में होगा? यदि हां, तो यह संतुलन स्थायी होगा अथवा अस्थायी? अतिरिक्त अभ्यास 8ण्22 जैसा कि आपने इस अध्याय में सीखा है कि कोइर् तुल्यकाली उपग्रह पृथ्वी के पृष्ठ से लगभग 36ए000 ाउ ऊंचाइर् पर पृथ्वी की परिक्रमा करता है। इस उपग्रह के निधर्रित स्थल पर पृथ्वी के गुरुत्व बल के कारण विभव क्या है? ;अनन्तपर स्िथतिज ऊजार् शून्य लीजिए।द्ध पृथ्वी का द्रव्यमान त्र 6ण्0×1024 ाहय पृथ्वी की त्रिाज्या त्र 6400 ाउण् 8ण्23 सूयर् के द्रव्यमान से 2ण्5 गुने द्रव्यमान का कोइर् तारा 12 ाउ आमाप से निपात होकर 1ण्2 परिक्रमण प्रति सेकण्ड से घूणर्न कर रहा है ;इसी प्रकार के संहत तारे को न्यूट्राॅन तारा कहते है। वुफछ प्रेक्ष्िात तारकीय पिण्ड, जिन्हें पल्सार कहते हैं, इसी श्रेणी में आते हैं।द्ध। इसके विषुवत् वृत्त पर रखा कोइर् पिण्ड, गुरुत्व बल के कारण, क्या इसके पृष्ठ से चिपका रहेगा? ;सूयर् का द्रव्यमान त्र 2 × 1030ाह द्ध 8ण्24 कोइर् अन्तरिक्षयान मंगल पर ठहरा हुआ है। इस अन्तरिक्षयान पर कितनी ऊजार् खचर् की जाए कि इसे सौरमण्डल से बाहर ध्केला जा सके। अन्तरिक्षयान का द्रव्यमान त्र 1000 ाहय सूयर् का द्रव्यमान त्र 2×1030 ाहय मंगल का द्रव्यमान त्र 6ण्4×1023 ाहय मंगल की त्रिाज्या त्र 3395 ाउय मंगल की कक्षा की त्रिाज्या त्र 2ण्28 ×108 ाउ तथा ळ त्र 6ण्67×10.11छ उ2 ाह√2। 8ण्25 किसी राकेट को मंगल के पृष्ठ से 2 ाउ े√1 की चाल से ऊध्वार्ध्र ऊपर दागा जाता है। यदि मंगल के वातावरणीय प्रतिरोध् के कारण इसकी 20ः आरंभ्िाक ऊजार् नष्ट हो जाती है, तो मंगल के पृष्ठ पर वापस लौटने से पूवर् यह राॅकेट मंगल से कितनी दूरी तक जाएगा? मंगल का द्रव्यमान त्र 6ण्4×1023 ाहय मंगल की त्रिाज्या त्र 3395 ाउ तथा ळ त्र 6ण्67×10.11 छ उ2 ाह√2।

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अध्याय 8

गुरुत्वाकर्षण


8.1 भूमिका

8.2 केप्लर के नियम

8.3 गुरुत्वाकर्षण का सार्वत्रिक नियम

8.4 गुरुत्वीय नियतांक

8.5 पृथ्वी का गुरुत्वीय त्वरण

8.6 पृथ्वी के पृष्ठ के नीचे तथा ऊपर गुरुत्वीय त्वरण

8.7 गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा

8.8 पलायन चाल

8.9 भू उपग्रह

8.10 कक्षा में गतिशील उपग्रह की ऊर्जा

8.11 तुल्यकाली तथा ध्रुवीय उपग्रह

8.12 भारहीनता

सारांश

विचारणीय विषय

अभ्यास

अतिरिक्त अभ्यास


8.1 भूमिका

हम अपने आरंभिक जीवन में ही, सभी पदार्थों के पृथ्वी की ओर आकर्षित होने की प्रकृति को जान लेते हैं। जो भी वस्तु ऊपर फेंकी जाती है वह पृथ्वी की ओर गिरती है, पहाड़ से नीचे उतरने की तुलना में पहाड़ पर ऊपर जाने में कहीं अधिक थकान होती है, ऊपर बादलों से वर्षा की बूँदें पृथ्वी की ओर गिरती हैं, तथा अन्य एेसी ही बहुत सी परिघटनाएँ हैं। इतिहास के अनुसार इटली के भौतिक विज्ञानी गैलीलियो (1564-1642) ने इस तथ्य को मान्यता प्रदान की कि सभी पिण्ड, चाहे उनके द्रव्यमान कुछ भी हों, एकसमान त्वरण से पृथ्वी की ओर त्वरित होते हैं। एेसा कहा जाता है कि उन्होंने इस तथ्य का सार्वजनिक निदर्शन किया था। यह कहना, चाहे सत्य भी न हो, परंतु यह निश्चित है कि उन्होंने आनत समतल पर लोटनी पिण्डों के साथ कुछ प्रयोग करके गुरुत्वीय त्वरण का एक मान प्राप्त किया था, जो बाद में किए गए प्रयोगों द्वारा प्राप्त अधिक यथार्थ मानों के काफी निकट था।

आद्य काल से ही बहुत से देशों में तारों, ग्रहों तथा उनकी गतियों के प्रेक्षण जैसी असंबद्ध प्रतीत होने वाली परिघटनाएँ ध्यानाकर्षण का विषय रही हैं। आद्य काल के प्रेक्षणों द्वारा आकाश में दिखाई देने वाले तारों की पहचान की गई, जिनकी स्थिति में सालोंसाल कोई परिवर्तन नहीं होता है। प्राचीन काल से देखे जाने वाले पिण्डों में कुछ अधिक रोचक पिण्ड भी देखे गए, जिन्हें ग्रह कहते हैं, और जो तारों की पृष्ठभूमि में नियमित गति करते प्रतीत होते हैं। ग्रहीय गतियों के सबसे प्राचीन प्रमाणित मॉडल को अब से लगभग 2000 वर्ष पूर्व टॉलमी ने प्रस्तावित किया था। यह ‘भूकेन्द्री’ मॉडल था, जिसके अनुसार सभी आकाशीय पिण्ड तारे, सूर्य तथा ग्रह पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं। इस मॉडल की धारणा के अनुसार आकाशीय पिण्डों की संभावित गति केवल वृत्तीय गति ही हो सकती थी। ग्रहों की प्रेक्षित गतियों का वर्णन करने के लिए टॉलमी ने गतियों के जिस विन्यास को प्रतिपादित किया वह बहुत जटिल था। इसके अनुसार ग्रहों को वृत्तों में परिक्रमा करने वाला तथा इन वृत्तों के केन्द्रों को स्वयं एक बड़े वृत्त में गतिशील बताया गया था। लगभग 400 वर्ष के पश्चात भारतीय खगोलज्ञों ने भी इसी प्रकार के सिद्धांत प्रतिपादित किए। तथापि, आर्यभट्ट (5 वीं शताब्दी में) ने पहले से ही अपने शोध प्रबन्ध में एक अधिक परिष्कृत मॉडल का वर्णन किया था, जिसे सूर्य केन्द्री मॉडल कहते हैं जिसके अनुसार सूर्य को सभी ग्रहों की गतियों का केन्द्र माना गया है। एक हजार वर्ष के पश्चात पोलैण्ड के एक ईसाई भिक्षु, जिनका नाम निकोलस कोपरनिकस (1473-1543) था, ने एक पूर्ण विकसित मॉडल प्रस्तावित किया जिसके अनुसार सभी ग्रह, केन्द्रीय स्थान पर स्थित स्थिर सूर्य, के परितः वृत्तों में परिक्रमा करते हैं। गिरजाघर ने इस सिद्धांत पर संदेह प्रकट किया। परन्तु इस सिद्धांत के लब्ध प्रतिष्ठित समर्थकों में एक गैलीलियो थे, जिनपर शासन के द्वारा, आस्था के विरुद्ध होने के कारण, मुकदमा चलाया गया।

लगभग गैलीलियो के ही काल में डेनमार्क के एक कुलीन पुरुष टायको ब्रेह (1546-1601) ने अपना समस्त जीवन काल अपनी नंगी आंखों से सीधे ही ग्रहों के प्रेक्षणों का अभिलेखन करने में लगा दिया। उनके द्वारा संकलित आँकड़ों का बाद में उसके सहायक जोहान्नेस केप्लर (1571-1640) द्वारा विश्लेषण किया गया। उन्होंने इन आँकड़ों को सार के रूप में तीन परिष्कृत नियमों द्वारा प्रतिपादित किया, जिन्हें अब केप्लर के नियमों के नाम से जाना जाता है। ये नियम न्यूटन को ज्ञात थे। इन उत्कृष्ट नियमों ने न्यूटन को अपना गुरुत्वाकर्षण का सार्वत्रिक नियम प्रस्तावित करके असाधारण वैज्ञानिकों की पंक्ति में शामिल होने योग्य बनाया।

8.2 केप्लर के नियम

केप्लर के तीन नियमों का उल्लेख इस प्रकार किया जा सकता हैः

1. कक्षाओं का नियम: सभी ग्रह दीर्घवृत्तीय कक्षाओं में गति करते हैं तथा सूर्य इसकी, एक नाभि पर स्थित होता है (चित्र 8.1a)।

1003.png

चित्र 8.1(a) सूर्य के परितः किसी ग्रह द्वारा अनुरेखित दीर्घवृत्त। सूर्य का निकटतम बिन्दु P तथा दूरस्थ बिन्दु A है। P को उपसौर तथा A को अपसौर कहते हैं। अर्ध दीर्घ अक्ष दूरी AP का आधा है।  

यह नियम कोपरनिकस के मॉडल से हटकर था जिसके अनुसार ग्रह केवल वृत्तीय कक्षाओं में ही गति कर सकते हैं। दीर्घवृत्त, जिसका वृत्त एक विशिष्ट प्रकरण होता है, एक बन्द वक्र होता है, जिसे बहुत सरलता से इस प्रकार खींचा जा सकता है:

1011.png 

चित्र 8.1(b) एक दीर्घवृत खींचना। एक डोरी के दो सिरे F1 तथा F2 स्थिर हैं। पेंसिल की नोंक डोरी को तनी रखते हुए इन सिरों के परितः चलायी जाती है।

दो बिन्दुओं F1 तथा F2 का चयन कीजिए। एक डोरी लेकर इसके सिरों को F1 तथा F2 पर पिनों द्वारा जड़िए। पेंसिल की नोंक से डोरी को तानिए और फिर डोरी को तनी हुई रखते हुए पेंसिल को चलाते हुए बन्द वक्र खींचिए (चित्र 8.1 (b)) इस प्रकार प्राप्त बन्द वक्र को दीर्घवृत्त कहते हैं। स्पष्ट है कि दीर्घवृत्त के किसी भी बिन्दु T पर F1 तथा F2 से दूरियों का योग अपरिवर्तित (नियत) है। बिन्दु F1 तथा F2 दीर्घवृत्त की नाभि कहलाती है। बिन्दु F1 तथा F2 को मिलाइए और इस रेखा को आगे बढ़ाइए जिससे यह दीर्घवृत्त को चित्र 8.1 (b) में दर्शाए अनुसार बिन्दुओं P तथा A पर प्रतिच्छेद करती है। रेखा PA का मध्यबिन्दु दीर्घवृत्त का केन्द्र है तथा लम्बाई PO = AO दीर्घवृत्त का अर्ध दीर्घ अक्ष कहलाती है। किसी वृत्त के लिए दोनों नाभियाँ एक दूसरे में विलीन होकर एक हो जाती हैं तथा अर्ध दीर्घ अक्ष वृत्त की त्रिज्या बन जाती है।

2. क्षेत्रफलों का नियम: सूर्य से किसी ग्रह को मिलाने वाली रेखा समान समय अंतरालों में समान क्षेत्रफल प्रसर्प करती है (चित्र 8.2)। यह नियम इस प्रेक्षण से प्रकट होता है कि ग्रह उस समय धीमी गति करते प्रतीत होते हैं जब वे सूर्य से अधिक दूरी पर होते हैं। सूर्य के निकट होने पर ग्रहों की गति अपेक्षाकृत तीव्र होती है।

1019.png

 चित्र 8.2 ग्रह P सूर्य के परितः दीर्घवृत्तीय कक्षा में गति करता है। किसी छोटे समय अंतराल t में ग्रह द्वारा प्रसर्पित क्षेत्रफल A को छायांकित क्षेत्र द्वारा दर्शाया गया है।

 

3. आवर्त कालों का नियम

किसी ग्रह के परिक्रमण काल का वर्ग उस ग्रह द्वारा अनुरेखित दीर्घवृत्त के अर्ध-दीर्घ अक्ष के घन के अनुक्रमानुपाती होता है।

नीचे दी गयी सारणी (8.1) में सूर्य के परितः आठ* ग्रहों के सन्निकट परिक्रमण-काल उनके अर्ध-दीर्घ अक्षों के मानों सहित दर्शाए गए हैं

सारणी 8.1

नीचे दिए गए ग्रहीय गतियों की माप के आँकड़े केप्लर के आवर्तकालों के नियम की पुष्टि करते हैं

a अर्ध-दीर्घ अक्ष 1010 m के मात्रकों में

T ग्रह का परिक्रमण-काल वर्षों (y) में

Q भागफल ( T2 / a 3 ) 10 -34 y2 m-3 मात्रकों में

at

*पृष्ठ 186 पर बॉक्स में दी गई जानकारी पर ध्यान दें। 

क्षेत्रफलों के नियम को कोणीय संवेग संरक्षण का निष्कर्ष माना जा सकता है जो सभी केन्द्रीय बलों के लिए मान्य है। किसी ग्रह पर लगने वाला केन्द्रीय बल, केन्द्रीय सूर्य तथा ग्रह को मिलाने वाले सदिश के अनुदिश कार्य करता है। मान लीजिए सूर्य मूल बिन्दु पर है और यह भी मानिए कि ग्रह की स्थिति तथा संवेग को क्रमशः r तथा 1576.png से दर्शाया जाता है, तब m द्रव्यमान के ग्रह द्वारा t समय में प्रसर्पित क्षेत्रफल A (चित्र 8.2) इस प्रकार व्यक्त किया जाता है

1581.png = ½ (r × vt) (8.1)

अतः

1586.png/t = ½ (r × p)/m, (चूँकि v = p/m)

= L / (2 m) (8.2)

जोहान्नेस केप्लर (1571- 1630)

john

जर्मन मूल के वैज्ञानिक थे। उन्होंने टायको ब्रेह और उनके सहयोगियों द्वारा बहुत परिश्रमपूर्वक लिए गए प्रेक्षणों के आधार पर ग्रहों की गति के तीन नियमों का प्रतिपादन किया। केप्लर स्वयं ब्रेह के सहायक थे और उनको ग्रहों के तीन नियमों तक पहुँचने में 16 वर्षों का लंबा समय लगा। वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने यह बताया कि दूरदर्शी में प्रवेश करने पर प्रकाश का क्या होता है, इसलिए, वह ज्यामितीय प्रकाशिकी के संस्थापक के रूप में भी जाने जाते हैं।

यहाँ v वेग है तथा L कोणीय संवेग है जो (r × p) के तुल्य है। किसी केन्द्रीय बल के लिए, जो r के अनुदिश निर्देशित है, L एक नियतांक होता है, जबकि ग्रह परिक्रमा कर रहा होता है। अतः अंतिम समीकरण के अनुसार 1591.png/t एक नियतांक है। यही क्षेत्रफलों का नियम है। गुरुत्वाकर्षण का बल भी केन्द्रीय बल ही है और इसलिए क्षेत्रफलों का नियम न्यूटन के नियमों के इसी लक्षण का पालन/अनुगमन करता है।

उदाहरण 8.1 मान लीजिए किसी ग्रह की उपसौर P पर (चित्र 8.1a) चाल vP है, तथा सूर्य व ग्रह की दूरी SP = rP है। {rP, vP} तथा अपसौर पर इन राशियों के तदनुरूपी मान {rA, vA} में संबंध स्थापित कीजिए। क्या ग्रह BAC तथा CPB पथ तय करने में समान समय लेगा?

केन्द्रीय बल 

हमें ज्ञात है, कि मूल बिन्दु के परितः किसी एकल कण के कोणीय संवेग में, समय के साथ होने वाले परिवर्तन की दर

2174.png

यदि उस पर लगे बल का आघूर्ण 2179.png शून्य हो, तो कण का कोणीय संवेग संरक्षित रहता है, यह तभी होता है जब या तो F शून्य हो या बल r के अनुदिश हो। हम उन बलों की चर्चा करेंगे जो दूसरी शर्त पूरी करते हैं। केन्द्रीय बल उन बलों के उदाहरण हैं जो यह शर्त पूरी करते हैं।

केन्द्रीय बल, सदैव या तो एक नियत बिन्दु की ओर या इससे दूर दिशा में लगे होते हैं, यानि, नियत बिन्दु से बलारोपण बिन्दु के संगत स्थिति सदिश के अनुदिश होते हैं। (देखिए चित्र)। केन्द्रीय बल का परिमाण F , केवल नियत बिन्दु से बलारोपण बिन्दु की दूरी, r, के ऊपर निर्भर करता है F=F(r)।

केन्द्रीय बल के तहत गति में कोणीय संवेग सदैव संरक्षित रहता है। इससे दोमहत्त्वपूर्ण परिणाम सीधे प्राप्त होते हैं:

(1) केन्द्रीय बल के तहत किसी कण की गति सदैव एक समतल में सीमित रहती है।

(2) बल के केन्द्र (यानि नियत बिन्दु) से, लिए गए कण के स्थिति सदिश का क्षेत्रफलीय वेग अचर रहता है। दूसरे शब्दों में कहें तो केन्द्रीय बल के तहतगतिमान कण का स्थिति सदिश बराबर समय में बराबर क्षेत्रफल बुहारता है।

इन दोनों कथनों की उप्पत्ति की चेष्टा करें। आपके लिए शायद यह जानना जरूरीहोगा कि क्षेत्रफल वेग, 
dA/dt = ½ r v sin α.

उपरोक्त विवेचन का उपयोग हम सूर्य के आकर्षण बल से इसके इर्द-गिर्द घूमते किसी ग्रह की गति के संदर्भ में कर सकते हैं। सुविधा के लिए हम सूर्य को इतना भारी मान सकते हैं कि इसकी स्थिति नियत रहे। ग्रह पर सूर्य का आकर्षण बलसदैव सूर्य की दिशा में लगता है। यह बल शर्त F = F(r), भी पूरी करता है, क्योंकि,F = G m1m2/r2 जहाँ m1 एवं m2 क्रमशः ग्रह और सूर्य के द्रव्यमान हैं, और Gगुरुत्वाकर्षण का वैश्विक अचरांक। अतः ऊपर दिए गए दोनों कथन, (1) एवं (2)ग्रहों की गति के लिए लागू होते हैं। वास्तव में कथन (2) केप्लर का सुप्रसिद्ध द्वितीय नियम है।

1077.png

Tr केन्द्रीय बल के तहत, कण का गमन-पथ है। कण की किसी स्थिति P, पर बलOP के अनुदिश होता है। O बल का केन्द्र है जिसे मूलबिन्दु ले लिया गया है। tसमय में कण P से 2184.png तक चाप s = v t के ऊपर चलता है। गमन पथ के बिन्दुP पर खींची गई स्पर्श रेखा PQ इस बिन्दु पर वेग की दिशा दर्शाती है। t समयमें, r, वृत्तखण्ड 2189.png के क्षेत्र से गुजरता है जो 

2194.png2199.png = (r v sin a) t/2) है।


हल कोणीय संवेग का परिमाण P पर है Lp = mp rp vp, क्योंकि निरीक्षण द्वारा यह ज्ञात होता है कि rp तथा vp परस्पर लम्बवत हैं। इसी प्रकार, LA = mp rA vA. तब कोणीय संवेग संरक्षण से

mp rp vp = mp rA vA

अथवा 1596.png

चूँकि rA > rp, vp > vA .

दीर्घवृत्त तथा त्रिज्या सदिशों SB एवं SC द्वारा घेरा गया क्षेत्रफल SBPC की तुलना में अधिक है (चित्र 8.1a)। केप्लर के दूसरे नियम के अनुसार, समान समय अंतरालों में समान क्षेत्रफल प्रसर्प होते हैं। अतः ग्रह पथ CPB को तय करने की अपेक्षा पथ BAC को तय करने में अधिक समय लेगा।

8.3 गुरुत्वाकर्षण का सार्वत्रिक नियम

एक दंत कथा में लिखा है पेड़ से गिरते हुए सेब का प्रेक्षण करते हुए न्यूटन को गुरुत्वाकर्षण के सार्वत्रिक नियम तक पहुँचने की प्रेरणा मिली जिससे केप्लर के नियमों तथा पार्थिव गुरुत्वाकर्षण के स्पष्टीकरण का मार्ग प्रशस्त हुआ। न्यूटन ने अपने विवेक के आधार पर यह स्पष्ट अनुभव किया कि Rm त्रिज्या की कक्षा में परिक्रमा करने वाले चन्द्रमा पर पृथ्वी के गुरुत्व के कारण एक अभिकेन्द्र त्वरण आरोपित होता है जिसका परिमाण

1601.png (8.3)

यहाँ V चन्द्रमा की चाल है जो आवर्तकाल T से इस प्रकार संबंधित है, 1606.png। आवर्त काल T का मान लगभग 27.3 दिन है तथा उस समय तक Rm का मान लगभग 3.84×10­8m ज्ञात हो चुका था। यदि हम इन संख्याओं को समीकरण (8.3) में प्रतिस्थापित करें, तो हमें am का जो मान प्राप्त होता है, वह पृथ्वी के गुरुत्व बल के कारण उत्पन्न पृथ्वी के पृष्ठ पर गुरुत्वीय त्वरण g के मान से काफी कम होता है। यह स्पष्ट रूप से इस तथ्य को दर्शाता है कि पृथ्वी के गुरुत्व बल का मान दूरी के साथ घट जाता है। यदि हम यह मान लें कि पृथ्वी के कारण गुरुत्वाकर्षण का मान पृथ्वी के केन्द्र से दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है, तो हमें 1611.pngऔर 1616.png प्राप्त होगा (यहाँ RE पृथ्वी की त्रिज्या है), जिससे हमें निम्नलिखित संबंध प्राप्त होता है:

1621.png1626.png 3600 (8.4)

जो g = 9.8 m s-2 तथा समीकरण (8.3) से am के मान के साथ मेल खाता है। इस प्रेक्षण ने न्यूटन को नीचे दिए गए गुरुत्वाकर्षण के सार्वत्रिक नियम को प्रतिपादित करने में मार्गदर्शन दिया :

"इस विश्व में प्रत्येक पिण्ड हर दूसरे पिण्ड को एक बल द्वारा आकर्षित करता है जिसका परिमाण दोनों पिण्डों के द्रव्यमानों के गुणनफल के अनुक्रमानुपाती तथा उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।"

यह उद्धरण तत्वतः न्यूटन के प्रसिद्ध शोध प्रबन्ध "प्राकृतिक दर्शन के गणितीय सिद्धांत" (Mathematical Principles of Natural Philosophy) जिसे संक्षेप में प्रिंसिपिया (Principia) कहते हैं, से प्राप्त होता है।

गणितीय रूप में न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम को इस प्रकार कहा जा सकता है: किसी बिंदु द्रव्यमान m2 पर किसी अन्य बिंदु द्रव्यमान m1 के कारण बल F का परिमाण

1636.png (8.5)

सदिश रूप में समीकरण (8.5) को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है

fg

यहाँ G सार्वत्रिक गुरुत्वीय नियतांक, r m1 से m2 तक एकांक सदिश तथा r = r2 r1 है जैसा कि चित्र 8.3 में दर्शाया गया है। 

1088.png 

 

चित्र 8.3 m2 के कारण m1 पर गुरुत्वीय बल r के अनुदिश है, यहाँ r, (r2 r1) है।

गुरुत्वीय बल आकर्षी बल है, अर्थात् m2 पर m1 के कारण लगने वाला बल F, r के अनुदिश है। न्यूटन के गति के तीसरे नियम के अनुसार, वास्तव में बिन्दु द्रव्यमान m1 पर m2 के कारण बल F है। इस प्रकार m1 पर m2 के कारण लगने वाले गुरुत्वाकर्षण बल F12 एवं m2 पर m1 के कारण लगने वाले बल F21 का परस्पर संबंध है,

F12 = F21

समीकरण (8.5) का अनुप्रयोग, अपने पास उपलब्ध पिण्डों पर कर सकने से पूर्व हमें सावधान रहना होगा, क्योंकि यह नियम बिन्दु द्रव्यमानों से संबंधित है, जबकि हमें विस्तारित पिण्डों, जिनका परिमित आमाप होता है, पर विचार करना है। यदि हमारे पास बिन्दु द्रव्यमानों का कोई संचयन है, तो उनमें से किसी एक पर बल अन्य बिन्दु द्रव्यमानों के कारण गुरुत्वाकर्षण बलों के सदिश योग के बराबर होता है जैसा कि चित्र 8.4 में दर्शाया गया है।

1137.png

 

चित्र 8.4 बिन्दु द्रव्यमान m1 पर बिन्दु द्रव्यमानों m2, m3 और m4 के द्वारा आरोपित कुल गुरुत्वाकर्षण बल इन द्रव्यमानों द्वारा m1 पर लगाए गए व्यष्टिगत बलों के सदिश योग के बराबर है।

 

m1 पर कुल बल है
fr

उदाहरण 8.2 किसी समबाहु त्रिभुज ABC के प्रत्येक शीर्ष पर m kg के तीन समान द्रव्यमान रखे हैं।

(a) इस त्रिभुज के केन्द्रक G पर रखे 2m kg के द्रव्यमान पर कितना बल आरोपित हो रहा है?

(b) यदि शीर्ष A पर रखे द्रव्यमान को दो गुना कर दिया जाए, तो कितना बल आरोपित होगा?

AG = BG = CG = 1m लीजिए (देखिए चित्र 8.5)

न्यूटन की प्रिंसिपिया

सन् 1619 तक केप्लर अपना तृतीय नियम प्रतिपादित कर चुके थे। उनमें अंतर्निहित गुरुत्वाकर्षण के सार्वत्रिक नियम की घोषणा, 1687 में, इसके लगभग 70 वर्ष बाद हुई, जब न्यूटन ने अपनी श्रेष्ठ कृति ‘फिलोसिफिया नेचुरलिस प्रिंसिपिया मैथेमेटिका’ जिसे आमतौर पर ‘प्रिंसिपिया’ कहा जाता है, प्रकाशित की।

सन् 1685 के लगभग, एडमण्ड हेली (जिनके नाम के आधार पर प्रसिद्ध हेलीधूमकेतु का नाम रखा गया है) कैम्ब्रिज में न्यूटन से मिलने आए और उन्होंने प्रतिलोम वर्ग नियम प्रभाव के तहत गतिमान किसी पिण्ड के गमन पथ की प्रकृति के बारे में पूछा। न्यूटन ने बिना झिझक तुरंत उत्तर दिया कि यह दीर्घवृत्ताकार होना चाहिए और बताया कि इस तथ्य का पता उन्होंने बहुत पहले 1665 में ही उस समय लगा लिया था जब उन्हें प्लेग फैलने के कारण कैम्ब्रिज से वापस अपने फार्म हाउस पर आकर रहना पड़ा था। दुर्भाग्य से न्यूटन ने अपने तत्संबंधी कागजात खो दिए थे। हेली ने न्यूटन को पुस्तक के रूप में उनकी धारणाओं को प्रस्तुत करने के लिए मना लिया और उसके प्रकाशन पर होने वाले कुल खर्च को स्वयं वहन करने की सहमति दी। न्यूटन ने अतिमानवीय प्रयत्नों द्वारा 18 महीने के अल्पकाल में यह महान कार्य पूरा कर दिखाया। प्रिंसिपिया, विशिष्ट वैज्ञानिक कृति है और लैग्रेंजे केशब्दों में कहें तो, "मानवीय मस्तिष्क का सर्वश्रेष्ठ उत्पादन है"। भारतीय मूल के, नोबेल पुरस्कार विजेता खगोल-भौतिकीविद् डा. एस. चंद्रशेखर ने दस वर्ष की मेहनत से ‘प्रिंसिपिया’ की टीका लिखी। उनकी पुस्तक, "आम आदमी के लिए प्रिंसिपिया" न्यूटन की विधियों के सौंदर्य, स्पष्टता एवं अदभुत संक्षिप्तता को बहुत अच्छी तरह उभार कर प्रस्तुत करती है।


हल (a) धनात्मक x-अक्ष तथा GC के बीच का कोण 30° है और इतना ही कोण ऋणात्मक x-अक्ष तथा GB के बीच बनता है। सदिश संकेत पद्धति में व्यष्टिगत बल इस प्रकार हैं

1671.png

1676.png

1682.png.

अध्यारोपण सिद्धांत तथा सदिश योग नियम के अनुसार (2m) पर परिणामी गुरुत्वाकर्षण बल

1125.png

चित्र 8.5 तीन समान द्रव्यमान त्रिभुज ABC के तीन शीर्षों पर स्थित हैं। इसके केंद्रक G पर कोई द्रव्यमान 2m रखा गया है।

jsim

विकल्प के रूप में, सममिति के आधार पर यह अपेक्षा की जा सकती है कि परिणामी बल शून्य होना चाहिए।

(b) यदि शीर्ष A पर द्रव्यमान 2m हो तो,

jg

किसी विस्तारित पिण्ड (जैसे पृथ्वी) तथा बिन्दु द्रव्यमान के बीच गुरुत्वाकर्षण बल के लिए समीकरण (8.5) का सीधे ही अनुप्रयोग नहीं किया जा सकता। विस्तारित पिण्ड का प्रत्येक बिन्दु द्रव्यमान दिए गए बिन्दु द्रव्यमान पर बल आरोपित करता है तथा इन सभी बलों की दिशा समान नहीं होती। हमें इन बलों का सदिश रीति द्वारा योग करना होता है ताकि विस्तारित पिण्ड के प्रत्येक बिन्दु द्रव्यमान के कारण आरोपित कुल बल प्राप्त हो जाए। एेसा हम आसानी से कलन (कैलकुलस) के उपयोग द्वारा कर सकते हैं। जब हम एेसा करते हैं तो हमे दो विशिष्ट प्रकरणों में सरल परिणाम प्राप्त होते हैं

(1) किसी एकसमान घनत्व के खोखले गोलीय खोल तथा खोल के बाहर स्थित किसी बिन्दु द्रव्यमान के बीच आकर्षण बल ठीक-ठाक उतना ही होता है जैसा कि खोल के समस्त द्रव्यमान को उसके केन्द्र पर संकेन्द्रित मान कर ज्ञात किया जाता है।

गुणात्मक रूप से इसे इस प्रकार समझा जा सकता है। खोल के विभिन्न क्षेत्रों के कारण गुरुत्वीय बलों के, खोल के केन्द्र को बिन्दु द्रव्यमान से मिलाने वाली रेखा के अनुदिश तथा इसके लंबवत्, दोनों दिशाओं में घटक होते हैं। खोल के सभी क्षेत्रों के बलों के घटकों का योग करते समय इस रेखा के लंबवत् दिशा के घटक निरस्त हो जाते हैं तथा केवल खोल के केन्द्र से बिन्दु द्रव्यमान को मिलाने वाली रेखा के अनुदिश परिणामी बल बचा रहता है। इस परिणामी बल का परिमाण भी ऊपर वर्णन की गई विधि द्वारा ज्ञात किया जा सकता है।

(2) एकसमान घनत्व के किसी खोखले गोले के कारण उसके भीतर स्थित किसी बिन्दु द्रव्यमान पर आकर्षण बल शून्य होता है।

गुणात्मक रूप में, हम फिर से इस परिणाम को समझ सकते हैं। गोलीय खोल के विभिन्न क्षेत्र खोल के भीतर स्थित बिन्दु द्रव्यमान को विभिन्न दिशाओं में आकर्षित करते हैं। ये बल परस्पर एक दूसरे को पूर्णतः निरस्त कर देते हैं।

8.4 गुरुत्वीय नियतांक

गुरुत्वाकर्षण के सार्वत्रिक नियम में प्रयुक्त गुरुत्वीय स्थिरांक G के मान को प्रायोगिक आधार पर ज्ञात किया जा सकता है तथा इस प्रकार के प्रयोग को सर्वप्रथम अंग्रेज वैज्ञानिक हेनरी कैवेन्डिश ने 1798 में किया था। उनके द्वारा उपयोग किए गए उपकरण को व्यवस्था चित्र 8.6 में दर्शाया गया है। 

1154.png

चित्र 8.6 कैवेन्डिश प्रयोग का योजनावत आरेखन। S1 तथा S2 दो विशाल गोले हैं (छायांकित दर्शाए गए हैं) जिन्हें A और B पर स्थिति द्रव्यमानों के दोनों ओर रखा जाता है। जब विशाल द्रव्यमानों (बिन्दुकित वृत्तों द्वारा दर्शाए) को दूसरी ओर ले जाते हैं, तो छड़ AB थोड़ा घूर्णन करती है, क्योंकि अब बल आघूर्ण की दिशा व्युत्क्रमित हो जाती है। घूर्णन कोण को प्रयोगों द्वारा ज्ञात किया जा सकता है।

छड़ AB के दोनों सिरों पर दो छोटे सीसे के गोले जुड़े होते हैं। इस छड़ को एक पतले तार द्वारा किसी दृढ़ टेक से निलंबित किया जाता है। सीसे के दो विशाल गोलों को चित्र में दर्शाए अनुसार छोटे गोलों के निकट परन्तु विपरीत दिशाओं में लाया जाता है। बड़े गोले चित्र में दर्शाए अनुसार अपने निकट के छोटे गोलों को समान तथा विपरीत बलों से आकर्षित करते हैं। छड़ पर कोई नेट बल नहीं लगता, परन्तु केवल एक बल आघूर्ण कार्य करता है जो स्पष्ट रूप से छड़ की लम्बाई का F-गुना होता है, जबकि यहाँ F विशाल गोले तथा उसके निकट वाले छोटे गोले के बीच परस्पर आकर्षण बल है। इस बल आघूर्ण के कारण, निलंबन तार में तब तक एेंठन आती है जब तक प्रत्यानयन बल आघूर्ण गुरुत्वीय बल आघूर्ण के बराबर नहीं होता। यदि निलंबन तार का व्यावर्तन कोण θ है, तो प्रत्यानयन बल आघूर्ण θ के अनुक्रमानुपाती तथा 1712.pngके बराबर हुआ, यहाँ 1717.pngप्रत्यानयन बल युग्म प्रति एकांक व्यावर्तन कोण है। 1722.png की माप अलग प्रयोग द्वारा की जा सकती है, जैसे कि ज्ञात बल आघूर्ण का अनुप्रयोग करके तथा व्यावर्तन कोण मापकर। गोल गेदों के बीच गुरुत्वाकर्षण बल उतना ही होता है जितना कि गेदों के द्रव्यमानों को उनके केन्द्रों पर संकेंन्द्रित मान कर ज्ञात किया जाता है। इस प्रकार यदि विशाल गोले तथा उसके निकट के छोटे गोले के केन्द्रों के बीच की दूरी d है, M तथा m इन गोलों के द्रव्यमान हैं, तो बड़े गोले तथा उसके निकट के छोटे गोले के बीच गुरुत्वाकर्षण बल

1727.png (8.6)

यदि छड़ AB की लम्बाई L है, तो F के कारण उत्पन्न बल आघूर्ण F तथा L का गुणनफल होगा। संतुलन के समय यह बल आघूर्ण प्रत्यानयन बल आघूर्ण के बराबर होता है। अतः

1733.png (8.7)

इस प्रकार θ का प्रेक्षण करके इस समीकरण की सहायता से G का मान परिकलित किया जा सकता है।

कैवेन्डिश प्रयोग के बाद G के मापन में परिष्करण हुए तथा अब G का प्रचलित मान इस प्रकार है

G = 6.67x10-11 N m2/kg2 (8.8)

8.5 पृथ्वी का गुरुत्वीय त्वरण

पृथ्वी को गोल होने के कारण बहुत से संकेन्द्री गोलीय खोलों का मिलकर बना माना जा सकता है जिनमें सबसे छोटा खोल केन्द्र पर तथा सबसे बड़ा खोल इसके पृष्ठ पर है। पृथ्वी के बाहर का कोई भी बिन्दु स्पष्ट रूप से इन सभी खोलों के बाहर हुआ। इस प्रकार सभी खोल पृथ्वी के बाहर किसी बिन्दु पर इस प्रकार गुरुत्वाकर्षण बल आरोपित करेंगे जैसे कि इन सभी खोलों के द्रव्यमान पिछले अनुभाग में वर्णित परिणाम के अनुसार उनके उभयनिष्ठ केन्द्र पर संकेन्द्रित हैं। सभी खोलों के संयोजन का कुल द्रव्यमान पृथ्वी का ही द्रव्यमान हुआ। अतः, पृथ्वी के बाहर किसी बिन्दु पर, गुरुत्वाकर्षण बल को यही मानकर ज्ञात किया जाता है कि पृथ्वी का समस्त द्रव्यमान उसके केन्द्र पर संकेन्द्रित है।

पृथ्वी के भीतर स्थित बिन्दुओं के लिए स्थिति भिन्न होती है। इसे चित्र 8.7 में स्पष्ट किया गया है।

1205.png

चित्र 8.7 ME पृथ्वी का द्रव्यमान तथा RE पृथ्वी की त्रिज्या है, पृथ्वी के पृष्ठ के नीचे d गहराई पर स्थित किसी खान में कोई द्रव्यमान m रखा है। हम पृथ्वी को गोलतः सममित मानते हैं।

पहले की ही भांति अब फिर पृथ्वी को संकेन्द्री खोलों से मिलकर बनी मानिए और यह विचार कीजिए कि पृथ्वी के केन्द्र से r दूरी पर कोई द्रव्यमान m रखा गया है। बिन्दु P, r त्रिज्या के गोले के बाहर है। उन सभी खोलों के लिए जिनकी त्रिज्या r से अधिक है, बिन्दु P उनके भीतर है। अतः पिछले भाग में वर्णित परिणाम के अनुसार ये सभी खोल P पर रखे द्रव्यमानों पर कोई गुरुत्वाकर्षण बल आरोपित नहीं करते। त्रिज्या 1738.pngr के खोल मिलकर r त्रिज्या का गोला निर्मित करते हैं तथा बिन्दु P इस गोले के पृष्ठ पर स्थित है। अतः r त्रिज्या का यह छोटा गोला P पर स्थित द्रव्यमान m पर इस प्रकार गुरुत्वाकर्षण बल आरोपित करता है जैसे इसका समस्त द्रव्यमान Mr इसके केन्द्र पर संकेन्द्रित है। इस प्रकार P पर स्थित द्रव्यमान m पर आरोपित बल का परिमाण

1743.png (8.9)

हम यह मानते हैं कि समस्त पृथ्वी का घनत्व एकसमान है अतः इसका द्रव्यमान 1748.pngρ है। यहाँ RE पृथ्वी की त्रिज्या तथा ρ इसका घनत्व है। इसके विपरीत r त्रिज्या के गोले का द्रव्यमान 1753.png होता है। इसलिए

1758.png

1771.png (8.10)

यदि द्रव्यमान m पृथ्वी के पृष्ठ पर स्थित है, तो r = RE तथा समीकरण (8.10) से इस पर गुरुत्वाकर्षण बल

1776.png (8.11)

यहाँ ME तथा RE क्रमशः पृथ्वी का द्रव्यमान तथा त्रिज्या है। द्रव्यमान m द्वारा अनुभव किया जाने वाला त्वरण जिसे प्रायः प्रतीक g द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है, न्यूटन के द्वितीय नियम द्वारा बल F से संबंध F = mg द्वारा संबंधित होता है। इस
प्रकार

1781.png (8.12)

g सहज ही मापन योग्य है। RE एक ज्ञात राशि है। कैवेन्डिश-प्रयोग द्वारा अथवा दूसरी विधि से प्राप्त G की माप g तथा RE के ज्ञान को सम्मिलित करने पर ME का आकलन समीकरण (8.12) की सहायता से किया जा सकता है। यही कारण है कि कैवेन्डिश के बारे में एक प्रचलित कथन यह है कि "कैवेन्डिश ने पृथ्वी को तोला"।

8.6 पृथ्वी के पृष्ठ के नीचे तथा ऊपर गुरुत्वीय त्वरण

चित्र में दर्शाए अनुसार पृथ्वी के पृष्ठ से ऊँचाई h पर स्थित किसी बिन्दु द्रव्यमान m पर विचार कीजिए (चित्र 8.8(a))।

1194.png

 

चित्र 8.8(a) पृथ्वी के पृष्ठ से किसी ऊँचाई h पर g

पृथ्वी की त्रिज्या को R E द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है। चूंकि यह बिन्दु पृथ्वी से बाहर है, इसकी पृथ्वी के केन्द्र से दूरी (RE + h ) है। यदि बिन्दु द्रव्यमान m पर बल के परिमाण को F (h) द्वारा निर्दिष्ट किया गया है, तो समीकरण (8.5) से हमें निम्नलिखित संबंध प्राप्त होता है

1786.png (8.13)

बिन्दु द्रव्यमान द्वारा अनुभव किया जाने वाला त्वरण 1792.pngतथा इस प्रकार हमें प्राप्त होता है

1797.png (8.14)

स्पष्ट रूप से यह मान पृथ्वी के पृष्ठ पर g के मान से कम है: 1802.png जबकि 1807.pngहम समीकरण (8.14) के दक्षिण पक्ष को इस प्रकार भी लिख सकते हैं :

1812.png

1817.png के लिए द्विपद व्यंजक का उपयोग करने पर

grh (8.15)

इस प्रकार समीकरण (8.15) से हमें प्राप्त होता है कि कम ऊँचाई h के लिए g का मान गुणक 1833.png द्वारा घटता है।

अब हम पृथ्वी के पृष्ठ के नीचे गहराई d पर स्थित किसी बिन्दु द्रव्यमान m के विषय मेें विचार करते हैं। एेसा होने पर चित्र 8.8(b) में दर्शाए अनुसार इस द्रव्यमान की पृथ्वी के केन्द्र से दूरी 1838.png त्रिज्या के छोटे गोले तथा d मोटाई के एक गोलीय खोल से मिलकर बनी मान सकते हैं। तब द्रव्यमान m पर d मोटाई की बाह्य खोल के कारण आरोपित बल पिछले अनुभाग में वर्णित परिणाम के कारण शून्य होगा। जहाँ तक (R E d ) त्रिज्या के छोटे गोले के कारण आरोपित बल का संबंध है तो पिछले अनुभाग में वर्णित परिणाम के अनुसार, इस छोटे गोले के कारण बल इस प्रकार लगेगा जैसे कि छोटे गोले का समस्त द्रव्यमान उसके केन्द्र पर संकेन्द्रित है। यदि छोटे गोले का द्रव्यमान Ms है, तो

Ms / ME = ( RE d ) 3 / RE 3 ( 8.16)

क्योंकि, किसी गोले का द्रव्यमान उसकी त्रिज्या के घन के अनुक्रमानुपाती होता है।

1250.png

चित्र 8.8 (b) किसी गहराई d पर g इस प्रकरण में केवल (RE d) त्रिज्या का छोटा गोला ही g के लिए योगदान देता है।


अतः बिन्दु द्रव्यमान पर आरोपित बल

F ( d ) = G Ms m / ( RE d ) 2 (8.17)

ऊपर से Ms का मान प्रतिस्थापित करने पर, हमें प्राप्त होता है

F ( d) = G ME m ( RE d ) / RE 3 (8.18)

और इस प्रकार गहराई d पर गुरुत्वीय त्वरण,

g(d) = 1843.png

अर्थात् 1849.png

= 1854.png (8.19)

इस प्रकार जैसे-जैसे हम पृथ्वी से नीचे अधिक गहराई तक जाते हैं, गुरुत्वीय त्वरण का मान गुणक 1859.pngद्वारा घटता जाता है। पृथ्वी के गुरुत्वीय त्वरण से संबंधित यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि पृष्ठ पर इसका मान अधिकतम है तथा चाहे हम पृष्ठ से ऊपर जाएँ अथवा नीचे यह मान सदैव घटता है।

8.7 गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा

पहले हमने स्थितिज ऊर्जा की धारणा की चर्चा किसी वस्तु की दी हुई स्थिति पर उसमें संचित ऊर्जा के रूप में दी थी। यदि किसी कण की स्थिति उस पर कार्यरत बल के कारण परिवर्तित हो जाती है तो उस कण की स्थितिज ऊर्जा में परिवर्तन आरोपित बल द्वारा उस कण पर किए गए कार्य के परिमाण के ठीक-ठीक बराबर होगा। जैसा कि हम पहले चर्चा कर चुके हैं जिन बलों द्वारा किया गया कार्य चले गए पथों पर निर्भर नहीं करता, वे बल संरक्षी बल होते हैं तथा केवल एेसे बलों के लिए ही किसी पिण्ड की स्थितिज ऊर्जा की कोई सार्थकता होती है।

गुरुत्व बल एक संरक्षी बल है तथा हम किसी पिण्ड में इस बल के कारण उत्पन्न स्थितिज ऊर्जा, जिसे गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा कहते हैं, का परिकलन कर सकते हैं। पहले पृथ्वी के पृष्ठ के निकट के उन बिन्दुओं पर विचार कीजिए जिनकी पृष्ठ से दूरियाँ पृथ्वी की त्रिज्या की तुलना में बहुत कम हैं। जैसा कि हम देख चुके हैं एेसे प्रकरणों में गुरुत्वीय बल व्यावहारिक दृष्टि से नियत रहता है तथा यह mg होता है तथा इसकी दिशा पृथ्वी के केन्द्र की ओर होती है। यदि हम पृथ्वी के पृष्ठ से h1 ऊँचाई पर स्थित किसी बिन्दु तथा इसी बिन्दु के ठीक ऊर्ध्वाधर ऊपर h2 ऊँचाई पर स्थित किसी अन्य बिन्दु पर विचार करें तो m द्रव्यमान के किसी कण को पहली स्थिति से दूसरी स्थिति तक ऊपर उठाने में किया गया कार्य, जिसे W12 द्वारा निर्दिष्ट करते हैं,

W12 = बल × विस्थापन

= mg (h2 h1) . (8.20)

यदि हम पृथ्वी के पृष्ठ से h ऊँचाई के बिन्दु से कोई स्थितिज ऊर्जा W(h) संबद्ध करें जो इस प्रकार है कि

W(h) = mg h + Wo (8.21)

(यहाँ Wo = नियतांक) ;

तब यह स्पष्ट है कि

W12 = W(h2) W(h1) (8.22)

कण को स्थानांतरित करने में किया गया कार्य ठीक इस कण की अंतिम तथा आरंभिक स्थितियों की स्थितिज ऊर्जाओं के अंतर के बराबर है। ध्यान दीजिए कि समीकरण (8.22) में Wo निरस्त हो जाता है। समीकरण (8.21) में h = 0 रखने पर हमें W ( h = 0 ) = Wo प्राप्त होता है। h = 0 का अर्थ यह है कि दोनों बिन्दु पृथ्वी के पृष्ठ पर स्थित हैं। इस प्रकार Wo कण की पृथ्वी के पृष्ठ पर स्थितिज ऊर्जा हुई।

यदि हम पृथ्वी के पृष्ठ से यादृच्छिक दूरियों के बिन्दुओं पर विचार करें तो उपरोक्त परिणाम प्रामाणिक नहीं होते क्योंकि तब यह मान्यता कि गुरुत्वाकर्षण बल mg अपरिवर्तित रहता है वैध नहीं है। तथापि, अपनी अब तक की चर्चा के आधार पर हम जानते हैं कि पृथ्वी के बाहर के किसी बिन्दु पर स्थित किसी कण पर लगे गुरुत्वीय बल की दिशा पृथ्वी के केन्द्र की ओर निदेशित होती है तथा इस बल का परिमाण है,

1864.png (8.23)

यहाँ ME = पृथ्वी का द्रव्यमान, m = कण का द्रव्यमान तथा r इस कण की पृथ्वी के केन्द्र से दूरी है। यदि हम किसी कण को r = r1 से r = r2 तक (जबकि r2 > r1) ऊर्ध्वाधर पथ के अनुदिश ऊपर उठाने में किए गए कार्य का परिकलन करें तो हमें समीकरण (8.20) के स्थान पर यह संबंध प्राप्त होता है

84

इस प्रकार समीकरण (8.21) के बजाय, हम किसी दूरी r पर स्थितिज ऊर्जा W(r) को इस प्रकार संबद्ध कर सकते हैं :

1893.png (8.25)

जो कि r > R के लिए वैध है।

अतः एक बार फिर W12 = W(r2) W(r1) । अंतिम समीकरण में r = 1898.png रखने पर हमें W(r = 1903.png) = W1 प्राप्त होता है। इस प्रकार W1 अनन्त पर स्थितिज ऊर्जा हुई। हमें यह ध्यान देना चाहिए कि समीकरणों (8.22) तथा (8.24) के अनुसार केवल दो बिन्दुओं के बीच स्थितिज ऊर्जाओं में अंतर की ही कोई निश्चित सार्थकता है। हम प्रचलित मान्य परिपाटी के अनुसार W1 को शून्य मान लेते हैं जिसके कारण किसी बिन्दु पर किसी कण को स्थितिज ऊर्जा उस कण को अनन्त से उस बिन्दु तक लाने में किए जाने वाले कार्य के ठीक बराबर होती है।

हमने, किसी बिन्दु पर किसी कण की स्थितिज ऊर्जा का परिकलन उस कण पर लगे पृथ्वी के गुरुत्वीय बलों के कारण, जो कि कण के द्रव्यमान के अनुक्रमानुपाती होता है, किया है। पृथ्वी के गुरुत्वीय बल के कारण किसी बिन्दु पर गुरुत्वीय विभव की परिभाषा "उस बिन्दु पर किसी कण के एकांक द्रव्यमान की स्थितिज ऊर्जा" के रूप में की जाती है।

पूर्व विवेचन के आधार पर, हम जानते हैं कि m1 एवं m2 द्रव्यमान के एक दूसरे से r दूरी पर रखे दो कणों की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा है,

V1908.png (यदि हम r = 1914.pngपर V = 0 लें)

यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि कणों के किसी सभी वियुक्त निकाय की कुल स्थितिज ऊर्जा, अवयवों/कणों के सभी संभावित युग्मों की ऊर्जाओं (उपरोक्त समीकरण द्वारा परिकलित) के योग के बराबर होती है। यह अध्यारोपण सिद्धांत के एक अनुप्रयोग का उदाहरण है।

उदाहरण 8.3 l भुजा के किसी वर्ग के शीर्षों पर स्थित चार कणों के निकाय की स्थितिज ऊर्जा ज्ञात कीजिए। वर्ग के केन्द्र पर विभव भी ज्ञात कीजिए।

उत्तर मान लीजिए प्रत्येक कण का द्रव्यमान m है, तथा वर्ग की भुजा l है। हमारे पास l दूरी वाले 4 द्रव्यमान युगल तथा 1919.pngl दूरी वाले 2 द्रव्यमान युगल हैं। अतः निकाय की स्थितिज ऊर्जा

1260.png

चित्र 8.9

1924.png

1929.png

वर्ग के केन्द्र 1934.png पर गुरुत्वीय विभव,

1939.png t

8.8 पलायन चाल

यदि हम अपने हाथों से किसी पत्थर को फेंकते हैं, तो हम यह पाते हैं कि वह फिर वापस पृथ्वी पर गिर जाता है। निस्संदेह मशीनों का उपयोग करके हम किसी पिण्ड को अधिकाधिक तीव्रता तथा प्रारंभिक वेगों से शूट कर सकते हैं जिसके कारण पिण्ड अधिकाधिक ऊँचाइयों तक पहुँच जाते हैं। तब स्वाभाविक रूप से हमारे मस्तिष्क में यह विचार उत्पन्न होता है "क्या हम किसी पिण्ड को इतने अधिक आरंभिक चाल से ऊपर फेंक सकते हैं कि वह फिर पृथ्वी पर वापस न गिरे?"

इस प्रश्न का उत्तर देने में ऊर्जा संरक्षण नियम हमारी सहायता करता है। मान लीजिए फेंका गया पिण्ड अनन्त तक पहुंचता है और वहाँ उसकी चाल Vf है। किसी पिण्ड की ऊर्जा स्थितिज तथा गतिज ऊर्जाओं का योग होती है। पहले की ही भांति W1 पिण्ड की अनन्त पर गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा को निर्दिष्ट करता है। तब प्रक्षेप्य की अनन्त पर कुल ऊर्जा

ant (8.26)

यदि पिण्ड को पृथ्वी (RE = पृथ्वी की त्रिज्या) के केन्द्र से (h + RE) ऊँचाई पर स्थित किसी बिन्दु से आरंभ में चाल
Vi से फेंका गया था, तो इस पिण्ड की आरंभिक ऊर्जा थी

1949.png (8.27)

ऊर्जा संरक्षण नियम के अनुसार समीकरण (8.26) तथा (8.27) बराबर होने चाहिए। अतः

1954.png (8.28)

समीकरण (8.28) का दक्षिण पक्ष एक धनात्मक राशि है जिसका न्यूनतम मान शून्य है, अतः वाम पक्ष भी एेसा ही होना चाहिए। अतः कोई पिण्ड अनन्त तक पहुंच सकता है जब Vi इतना हो कि

1959.png (8.29)

Vi का न्यूनतम मान उस प्रकरण के तदनुरूपी है जिसमें समीकरण (8.29) का वाम पक्ष शून्य के बराबर है। इस प्रकार, किसी पिण्ड को अनन्त तक पहुंचने के लिए (अर्थात् पृथ्वी से पलायन के लिए) आवश्यक न्यूनतम चाल इस संबंध के तदनुरूपी होती है

gre (8.30)

यदि पिण्ड को पृथ्वी के पृष्ठ से छोड़ा जाता है, तो h = 0 और हमें प्राप्त होता है

gre2 (8.31)

संबंध 1975.png का उपयोग करने पर हमें निम्न मान प्राप्त होता है

vr (8.32)

समीकरण (8.32) में g और RE के आंकिक मान रखने पर हमें (Vi)न्यून 11.2 km/s प्राप्त होता है। उसे पलायन चाल कहते हैं। कभी-कभी लापरवाही में इसे हम पलायन वेग भी कह देते हैं।

समीकरण (8.32) का उपयोग भली भांति समान रूप से चन्द्रमा से फेंके जाने वाले पिण्डों के लिए भी किया जा सकता है, एेसा करते समय हम g के स्थान पर चन्द्रमा के पृष्ठ पर चन्द्रमा के गुरुत्वीय त्वरण तथा RE के स्थान पर चन्द्रमा की त्रिज्या का मान रखते हैं। इन दोनों ही राशियों के चन्द्रमा के लिए मान पृथ्वी पर इनके मानों से कम हैं तथा चन्द्रमा के लिए पलायन चाल का मान 2.3 km/s प्राप्त होता है। यह मान पृथ्वी की तुलना में लगभग 1/5 गुना है। यही कारण है कि चन्द्रमा पर कोई वातावरण नहीं है। यदि चन्द्रमा के पृष्ठ पर गैसीय अणु बनें, तो उनकी चाल इस पलायन चाल से अधिक होगी तथा वे चन्द्रमा के गुरुत्वीय खिंचाव के बाहर पलायन कर जाएंगे। 

उदाहरण 8.4 समान त्रिज्या R परन्तु M तथा 4 M द्रव्यमान के दो एकसमान ठोस गोले इस प्रकार रखे हैं कि इनके केन्द्रों के बीच पृथकन (चित्र 8.10 में दर्शाए अनुसार) 6 R है। दोनों गोले स्थिर रखे गए हैं। m द्रव्यमान के किसी प्रक्षेप्य को M द्रव्यमान के गोले के पृष्ठ से 4M द्रव्यमान के गोले के केन्द्र की ओर सीधे प्रक्षेपित किया जाता है। प्रक्षेप्य की उस न्यूनतम चाल के लिए व्यंजक प्राप्त कीजिए जिससे फेंके जाने पर वह दूसरे गोले के पृष्ठ पर पहुंच जाए।

1306.png

चित्र 8.10

 

हल प्रक्षेप्य पर दो गोलों के परस्पर विरोधी गुरुत्वीय बल कार्य करते हैं। उदासीन बिन्दु N (चित्र 8.10 देखिए) की परिभाषा एक एेसे बिन्दु (स्थिति) के रूप में की जाती है जहाँ दो बल यथार्थतः एक दूसरे को निरस्त करते हैं। यदि ON = r है, तो

1985.png

(6R r)2 = 4r2

6R r = ±2r

r = 2R या 6R

इस उदाहरण में उदासीन बिन्दु r = 6R हमसे संबंधित नहीं है। इस प्रकार, ON = r = 2R। कण को उस चाल से प्रक्षेपित करना पर्याप्त है जो उसे N तक पहुंचने योग्य बना दे। इसके पश्चात् वहाँ पहुंचने पर 4 M द्रव्यमान के गोले का गुरुत्वीय बल कण को अपनी ओर खींचने के लिए पर्याप्त होगा। M द्रव्यमान के गोले के पृष्ठ पर यांत्रिक ऊर्जा

1990.png

उदासीन बिन्दु N पर कण की चाल शून्य मान की ओर प्रवृत्त होती है। अतः N पर यांत्रिक ऊर्जा शुद्ध रूप से स्थितिज ऊर्जा होती है। अतः

1995.png 

यांत्रिक ऊर्जा संरक्षण नियम के अनुसार

2000.png

अथवा 2005.png

\ 2010.png

यहाँ यह ध्यान देने का विषय है कि N पर प्रक्षेप्य की चाल शून्य है, परन्तु जब यह 4 M द्रव्यमान के गोले से टकराता तब इसकी चाल शून्येत्तर होती है। जिस चाल से प्रक्षेप्य 4M द्रव्यमान के गोले से टकराता है, उसे ज्ञात करना छात्रों के अभ्यास के लिए छोड़ा जा रहा है। t

8.9 भू उपग्रह

भू उपग्रह वह पिण्ड है जो पृथ्वी के परितः परिक्रमण करते हैं। इनकी गतियां, ग्रहों की सूर्य के परितः गतियों के बहुत समान होती हैं, अतः केप्लर के ग्रहीय गति नियम इन पर भी समान रूप से लागू होते हैं। विशेष बात यह है कि इन उपग्रहों की पृथ्वी के परितः कक्षाएं वृत्ताकार अथवा दीर्घवृत्ताकार है। पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह चन्द्रमा है जिसकी लगभग वृत्ताकार कक्षा है और लगभग 27.3 दिन का परिक्रमण काल है जो चन्द्रमा के अपनी अक्ष के परितः घूर्णन काल के लगभग समान है। वर्ष 1957 के पश्चात् विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी में उन्नति के फलस्वरूप भारत सहित कई देश दूर संचार, भू भौतिकी, मौसम विज्ञान के क्षेत्र में व्यावहारिक उपयोगों के लिए मानव-निर्मित भू उपग्रहों को कक्षाओं में प्रमोचित करने योग्य बन गए हैं।

अब हम पृथ्वी के केन्द्र से (RE + h) दूरी पर स्थित वृत्तीय कक्षा में गतिमान उपग्रह पर विचार करेंगे, यहाँ RE = पृथ्वी की त्रिज्या है। यदि उपग्रह का द्रव्यमान m तथा V इसकी चाल है, तो इस कक्षा के लिए आवश्यक अभिकेन्द्र बल

F(अभिकेन्द्र) = 2016.png (8.33)

तथा यह बल कक्षा के केन्द्र की ओर निदेशित है। अभिकेन्द्र बल गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा प्रदान किया जाता है, जिसका
मान

F(गुरुत्वाकर्षण) = 2021.png (8.34)

यहाँ ME पृथ्वी का द्रव्यमान है।

समीकरणों (8.33) तथा (8.34) के दक्षिण पक्षों को समीकृत तथा m का निरसन करने पर हमें प्राप्त होता है

2026.png (8.35)

इस प्रकार h के बढ़ने पर V घटता है। समीकरण (8.35) के अनुसार जब h = 0 है, तो उपग्रह की चाल V है

2031.png (8.36)

यहाँ हमने संबंध g =2036.pngका उपयोग किया है। प्रत्येक कक्षा में उपग्रह 2π(RE + h) दूरी चाल V से तय करता है। अतः इसका आवर्तकाल T है

2041.png (8.37)

यहाँ हमने समीकरण (8.35) से V का मान प्रतिस्थापित किया है। समीकरण (8.37) के दोनों पक्षों का वर्ग करने पर हमें प्राप्त होता है

T 2 = k ( RE + h )3 ( जहाँ k = 4 π2 / G ME), (8.38)

और यही केप्लर का आवर्तकालों का नियम है जिसका अनुप्रयोग पृथ्वी के परितः उपग्रहों की गतियों के लिए किया जाता है।

उन भू उपग्रहों के लिए, जो पृथ्वी के पृष्ठ के अति निकट होते हैं, h के मान को पृथ्वी की त्रिज्या RE की तुलना में समीकरण (8.38) में नगण्य मान लेते हैं। अतः इस प्रकार के भू उपग्रहों के लिए T ही  ,.iTo होता है, यहाँ

2046.png (8.39)

यदि हम समीकरण (8.39) में g तथा RE के आंकिक मानों (g 2051.png 9.8 ms-2 तथा RE = 6400 km.) को प्रतिस्थापित करें, तो हमें प्राप्त होता है

2056.png s

जो लगभग 85 मिनट के बराबर हैं।

उत्तर 8.5 मंगल ग्रह के फोबोस तथा डेल्मोस नामक दो चन्द्रमा हैं। (i) यदि फोबोस का आवर्तकाल 7 घंटे 39 मिनट तथा कक्षीय त्रिज्या 9.4 ×103 km है तो मंगल का द्रव्यमान परिकलित कीजिए। (ii) यह मानते हुए कि पृथ्वी तथा मंगल सूर्य के परितः वृत्तीय कक्षाओं में परिक्रमण कर रहे हैं तथा मंगल की कक्षा की त्रिज्या पृथ्वी की कक्षा की त्रिज्या की 1.52 गुनी है तो मंगल-वर्ष की अवधि दिनों में क्या है?

हल (i) यहाँ पर समीकरण (8.38) का उपयोग पृथ्वी के द्रव्यमान ME को मंगल के द्रव्यमान Mm से प्रतिस्थापित करके करते हैं

2061.png

2067.png

2072.png

2077.png

= 6.48 × 1023 kg

(ii) केप्लर के आवर्तकालों के नियम का उपयोग करने पर

2082.png 

यहाँ RMS एवं RES क्रमशः मंगल-सूर्य तथा पृथ्वी-सूर्य के बीच की दूरियां हैं।

TM = (1.52)3/2 × 365

= 684 दिन

ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि बुध, मंगल तथा प्लूटो* के अतिरिक्त सभी ग्रहों की कक्षाएं लगभग वृत्ताकार हैं। उदाहरण के लिए, हमारी पृथ्वी के अर्ध लघु अक्ष तथा अर्ध दीर्घ अक्ष का अनुपात b/a = 0.99986 है।

*पृष्ठ 186 पर बॉक्स में दी गई जानकारी पर ध्यान दें।

उत्तर 8.6 पृथ्वी को तोलना : आपको निम्नलिखित आंकड़े दिए गए हैं: g = 9.81 m s–2, RE = 6.37×106m, पृथ्वी से चन्द्रमा की दूरी R = 3.84×108 m पृथ्वी के परितः चन्द्रमा के परिक्रमण का आवर्त काल = 27.3 दिन। दो भिन्न विधियों द्वारा पृथ्वी का द्रव्यमान प्राप्त कीजिए। 

हल (i) पहली विधि: समीकरण (8.12) से

2087.png

2092.png 

= 5.97× 1024 kg

(ii) दूसरी विधि: चन्द्रमा पृथ्वी का उपग्रह है। केप्लर के आवर्तकालों के नियम की व्युत्पत्ति में (समीकरण (8.38) देखिए)]

2097.png

2102.png

2107.png

2112.png

दोनों विधियों द्वारा लगभग समान उत्तर प्राप्त होते हैं, जिनमें 1% से भी कम का अंतर है। t

उदाहरण 8.7 समीकरण (8.38) में स्थिरांक k को दिनों तथा किलोमीटरों में व्यक्त कीजिए। k = 10–13 s2 m–3 है। चन्द्रमा पृथ्वी से 3.84 × 105 km दूर है। चन्द्रमा के परिक्रमण के आवर्तकाल को दिनों में प्राप्त कीजिए।

हल हम जानते हैं कि

k = 10–13 s2 m–3

= 2118.png

= 1.33 ×10–14 d2 km–3

समीकरणों (8.38) तथा k के दिए गए मान का उपयोग करने पर चन्द्रमा के परिक्रमण का आवर्तकाल

T2 = (1.33 × 10-14)(3.84 × 105)3

T = 27.3 d

ध्यान दीजिए, यदि हम (RE+h) को दीर्घवृत्त के अर्ध दीर्घ अक्ष (a) द्वारा प्रतिस्थापित करें तो समीकरण (8.38) को दीर्घवृत्तीय कक्षाओं पर भी लागू किया जा सकता है, तब पृथ्वी इस दीर्घवृत्त की एक नाभि पर होगी।

8.10 कक्षा में गतिशील उपग्रह की ऊर्जा

समीकरण (8.35) का उपयोग करने पर वृत्ताकार कक्षा में चाल v से गतिशील उपग्रह की गतिज ऊर्जा

2123.png;

v2 का मान समीकरण (8.35) से रखने पर

2128.png, (8.40)

एेसा मानें कि अनन्त पर गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा शून्य है तब पृथ्वी के केन्द्र से (Re+h) दूरी पर उपग्रह की स्थितिज ऊर्जा

2133.png (8.41)

K.E धनात्मक है जबकि P.E ऋणात्मक होती है। तथापि परिमाण में K.E = 2138.png P.E, अतः उपग्रह की कुल ऊर्जा

2143.png (8.42)

इस प्रकार वृत्ताकार कक्षा में गतिशील किसी उपग्रह की कुल ऊर्जा ऋणात्मक होती है, स्थितिज ऊर्जा का ऋणात्मक तथा परिमाण में धनात्मक गतिज ऊर्जा का दो गुना होता है।

जब किसी उपग्रह की कक्षा दीर्घवृत्तीय होती है तो उसकी K.E तथा P.E दोनों ही पथ के हर बिन्दु पर भिन्न होती हैं। वृत्तीय कक्षा के प्रकरण की भांति ही उपग्रह की कुल ऊर्जा नियत रहती है तथा यह ऋणात्मक होती है और यही हम अपेक्षा भी करते हैं क्योंकि जैसा हम पहले चर्चा कर चुके हैं कि यदि कुल ऊर्जा धनात्मक अथवा शून्य हो तो पिण्ड अनन्त की ओर पलायन कर जाता है। उपग्रह सदैव पृथ्वी से परिमित दूरियों पर परिक्रमण करते हैं, अतः उनकी ऊर्जाएँ धनात्मक अथवा शून्य नहीं हो सकतीं।

उदाहरण 8.8 400 kg द्रव्यमान का कोई उपग्रह पृथ्वी के परित 2RE त्रिज्या की वृत्तीय कक्षा में परिक्रमण कर रहा है। इसे 4RE की वृत्तीय कक्षा में स्थानांतरित करने के लिए आवश्यक ऊर्जा परिकलित कीजिए। इसकी गतिज तथा स्थितिज ऊर्जा में कितने परिवर्तन होंगे? 

हल आरंभ में

2148.png

जबकि, अंत में

2153.png

कुल ऊर्जा में परिवर्तन

E = Ef Ei

2158.png

 mk

गतिज ऊर्जा घट जाती है और यह E की अनुहारक है, अर्थात् K = Kf Ki = 3.13 × 109 J

स्थितिज ऊर्जा में होने वाला परिवर्तन कुल ऊर्जा का दो गुना है, अर्थात्

V = Vf Vi = 6.25 × 109 J t

8.11 तुल्यकाली तथा ध्रुवीय उपग्रह

यदि हम समीकरण (8.37) में (RE+ h) के मान में इस तरह समायोजन करें कि आवर्तकाल T का मान 24 घन्टे हो जाए, तो एक अत्यन्त रोचक परिघटना उत्पन्न हो जाती है। यदि वृत्तीय कक्षा पृथ्वी के विषुवत वृत्त के तल में है, तो इस प्रकार का उपग्रह, जिसका आवर्तकाल पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूर्णन करने के आवर्तकाल के बराबर हो, पृथ्वी के किसी बिन्दु से देखने पर स्थिर प्रतीत होगा। इस उद्देश्य के लिए परिकलन करने पर (RE + h) का मान RE की तुलना में काफी अधिक आता है:

2169.png (8.43)

T = 24 घन्टे के लिए, परिकलन करने पर, RE+ h = 35800 km, जो कि पृथ्वी की त्रिज्या RE से काफी अधिक है। वे उपग्रह जो पृथ्वी के विषुवत वृत्त के तल (अर्थात निरक्षीय समतल) में पृथ्वी के परितः वृत्तीय कक्षा में, T = 24 घन्टे के आवर्तकाल से, परिक्रमण करते हैं, तुल्यकाली उपग्रह कहलाते हैं। स्पष्ट है कि क्योंकि पृथ्वी समान आवर्तकाल से अपने अक्ष पर घूर्णन करती है अतः यह उपग्रह पृथ्वी के किसी भी बिन्दु से स्थिर प्रतीत होगा। पृथ्वी के पृष्ठ से इतनी अधिक ऊँचाई तक ऊपर फेंकने के लिए अत्यन्त शक्तिशाली रॉकेटों की आवश्यकता होती है। परन्तु, बहुत से व्यावहारिक अनुप्रयोगों को ध्यान में रखकर इनका प्रबन्ध किया गया है।

अंतरिक्ष में भारत की छलाँग

सन् 1962 में भारत सरकार द्वारा भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति (INCOSPAR) के गठन के साथ भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम प्रारम्भ हुए। सन् 1969 में गठित भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने तत्कालीन INCOSPARका अधिक्रमण किया। इसरो ने देश के विकास में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी की भूमिका और महत्व को पहचानते हुए आम जनता के लिए अंतरिक्ष विज्ञान के उपयोग का ध्येय बनाए रखा है। भारत ने अपना पहला निम्न-कक्षा उपग्रह आर्यभट्ट 1975 में तत्कालीन सोवियत संघ के प्रमोचक रॉकेट द्वारा प्रक्षेपित किया। सन् 1979 में, रोहिणी शृंखला के उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने के साथ ही इसरो ने अपने मुख्य प्रक्षेपण स्थल सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र, श्रीहरिकोटा, आंध्र प्रदेश से देशज प्रमोचक रॉकेटों का उपयोग प्रारम्भ किया। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में अपनी अद्भुत सफलताओं से इसरो विश्व की छठी वृहत्तम अंतरिक्ष एजेंसी बन गई है। इसरोप्रसारण, संचार, मौसम पूर्वानुमान, आपदा प्रबंधन उपकरण, भौगोलिक सूचना प्रणाली, मानचित्र कला, नौवहन, टेलीचिकित्सा, समर्पित दूरस्थ शिक्षा संबधी उपग्रह आदि के लिए विशिष्ट उपग्रह उत्पादों और उपकरणों का विकास करती है। इन उपयोगों के संबंध में सम्पूर्ण आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए लागत प्रभावी एवम् विश्वसनीय ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचक प्रणाली (पी.एस.एल.वी.) का विकास 1990 के दशक के प्रारम्भ में हुआ। इन विशेषताओं के कारण पी.एस.एल.वी. विभिन्न देशों के उपग्रहों के लिए सबसे प्रिय वाहक बन गया है। इससे अंतराष्ट्रीय सहयोग में भी अभूर्तपूर्व रूप से वृद्धि हुई है। सन् 2001 में अधिक भारी और अधिक माँग वाले भूतुल्यकाली संचार उपग्रहों के लिए भूतुल्यकाली उपग्रह प्रमोचक रॉकेट (जी.एस.एल.वी.) को विकसित किया गया। भारत सरकार के अंतरिक्ष विभाग के तत्वाधान में सुदूर संवेदन, खगोलिकी और खगोल भौतिकी, वायुमंडलीय विज्ञान और अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्रों में विभिन्न अनुसंधान केन्द्र और स्वायत्त संस्थान कार्यरत हैं। वैज्ञानिक परियोजनाओं सहित चन्द्र (चन्द्रयान) तथा अंतरग्रहीय (मंगलयान) मिशनों की सफलताएँ इसरो की उल्लेखनीय उपलब्धियाँ है। इसरो के भविष्य के प्रयासों में समानव अंतरिक्ष उड़ान परियोजनाएँ, भारी वाहक प्रमोचकों,पुनरूपयोगी प्रमोचक रॉकेटों, सेमी-क्रायोजेनिक इंजन, एकल तथा द्वि-चरणी कक्षा (SSTO तथा TSTO) रॉकेटों, अंतरिक्ष उपयोगों के लिए सम्मिश्र सामग्री काविकास एवम् उपयोग इत्यादि शामिल हैं। 1984 में राकेश शर्मा सोवियत अंतरिक्षयान में जाने वाले प्रथम भारतीय अंतरिक्ष यात्री बने।

हम जानते हैं कि एक निश्चित आवृत्ति से अधिक आवृत्ति की विद्युत चुम्बकीय तरंगें आयनमंडल द्वारा परावर्तित नहीं होतीं। रेडियो-प्रसारण में उपयोग होने वाली रेडियो तरंगें जिनका आवृत्ति परिसर 2MHZ से 10MHZ है क्रांतिक आवृत्ति से कम है, इसलिए ये तरंगें आयनमंडल से परिवर्तित हो जाती हैं। इस प्रकार किसी एेन्टेना द्वारा किया गया रेडियो तरंग प्रसारण उन स्थानों पर भी ग्रहण किया जा सकता है जो बहुत दूर है तथा पृथ्वी की वक्रता के कारण जहाँ तरंगें सीधे नहीं पहुँच पातीं। दूरदर्शन-प्रसारण अथवा अन्य प्रकार के संचार में उपयोग होने वाली तरंगों की आवृत्तियाँ अत्यधिक उच्च होती हैं, अतः इन्हें सीधे ही दृष्टि-रेखा से बाहर ग्रहण नहीं किया जा सकता। प्रसारण केन्द्र के ऊपर स्थापित कोई तुल्यकाली उपग्रह जो स्थिर प्रतीत होता है, इन सिगनलों को ग्रहण करके उन्हें, पृथ्वी के बड़े क्षेत्र पर वापस प्रसारित कर सकता है। भारत द्वारा अन्तरिक्ष में भेजा गया इनसैट उपग्रह समूह एेसा ही तुल्यकाली उपग्रह समूह है जिसका विस्तृत उपयोग दूरसंचार के लिए भारत में किया जा रहा है।

chtr

उपग्रह की अन्य श्रेणी को ध्रुवीय उपग्रह कहते हैं। ये निम्न तुंगता (h 500 से 800 km) उपग्रह हैं। परन्तु ये पृथ्वी के ध्रुवों के परितः उत्तर दक्षिण दिशा में गमन करते हैं जबकि पृथ्वी अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूर्णन करती है। (देखिए चित्र 8.11)। चूंकि इन उपग्रहों का आवर्तकाल लगभग 100 मिनट होता है, अतः ये किसी भी अक्षांश से दिन में कई बार गुजरते हैं। तथापि, क्योंकि इन उपग्रहों की पृथ्वी के पृष्ठ से ऊँचाई h लगभग 500-800 km होती है, अतः इस पर लगे किसी कैमरे द्वारा किसी एक कक्षा में केवल पृथ्वी की एक छोटी पट्टी का ही दृश्य लिया जा सकता है। संलग्न पट्टियों को अगली कक्षा में देखा जाता है। इस प्रकार प्रभावी रूप में पूरे एक दिन में पट्टी दर पट्टी पूरी पृथ्वी का सर्वेक्षण किया जा सकता है। ये उपग्रह निकट से, अच्छे विभेदन के साथ, विषुवतीय तथा ध्रुवीय क्षेत्रों का सर्वेक्षण कर सकते हैं। इस प्रकार के उपग्रहों द्वारा एकत्र सूचनाएँ सुदूर संवेदन, मौसम विज्ञान के साथ पृथ्वी के पर्यावरणीय अध्ययनों के लिए भी अत्यन्त उपयोगी हैं।

8.12 भारहीनता

किसी पिण्ड का भार वह बल है जिससे पृथ्वी उसे अपने केन्द्र की और आकर्षित करती है। जब हम किसी पृष्ठ पर खड़े होते हैं तो हमें अपने भार का बोध होता है क्योंकि वह पृष्ठ हमारे भार के विपरीत बल आरोपित करके हमें विराम की स्थिति में रखता है। यही सिद्धान्त उस समय लागू होता है जब हम किसी स्थिर बिन्दु, जैसे छत से लटकी किसी कमानीदार तुला से किसी पिण्ड का भार मापते हैं। यदि गुरुत्व बल के विरुद्ध पिण्ड पर कोई बल आरोपित न हो तो वह नीचे गिर जाएगा। कमानी भी यथार्थ रूप में पिण्ड पर इसी प्रकार बल आरोपित करती है। एेसा इसलिए है क्योंकि पिण्ड के गुरुत्वीय खिंचाव के कारण कमानी नीचे की ओर कुछ खिंच जाती है और क्रम से ऊर्ध्वाधर ऊपर दिशा में कमानी पिण्ड पर एक बल आरोपित करती है।

अब कल्पना कीजिए कि कमानीदार तुला का ऊपरी सिरा कमरे की छत से जुड़ कर स्थिर नहीं है। तब कमानी के दोनों सिरों के साथ-साथ पिण्ड भी सर्वसम त्वरण g से गति करेंगे। इस स्थिति में कमानी में कोई खिंचाव नहीं होगा तथा वह उस पिण्ड पर, जो गुरुत्व बल के कारण g त्वरण से नीचे की ओर गतिशील है, कोई बल आरोपित नहीं करेगी। कमानीदार तुला का इस स्थिति में पाठ्यांक कमानी में कोई खिंचाव न होने के कारण शून्य होगा। यदि उस पिण्ड के रूप में कोई स्त्री अथवा पुरुष है, तो वह इस स्थिति में अपने भार का अनुभव नहीं करेगी/ करेगा, क्योंकि उस पर ऊपर की दिशा में कोई बल नहीं लग रहा है। इस प्रकार, जब कोई पिण्ड स्वतंत्रतापूर्वक गिरता है, तो वह भारहीन होता है, तथा इस परिघटना को प्रायः भारहीनता की परिघटना कहते हैं।

पृथ्वी के परितः परिक्रमण करने वाले किसी उपग्रह में, उपग्रह का हर छोटे से छोटा टुकड़ा तथा उसके भीतर की प्रत्येक वस्तु पृथ्वी के केन्द्र की ओर त्वरित गति से गतिशील है, तथा इस गति का त्वरण, यथार्थ रूप से, उस स्थिति में पृथ्वी के गुरुत्वीय त्वरण के बराबर है। अतः उपग्रह के भीतर की प्रत्येक वस्तु स्वतंत्रतापूर्वक गिरती है। यह ठीक एेसा ही है जैसा कि हम किसी ऊंचाई से पृथ्वी की ओर गिर रहे हों। अतः किसी उपग्रह के भीतर बैठे व्यक्ति किसी प्रकार के गुरुत्व बल का अनुभव नहीं करते। गुरुत्व बल हमें उर्ध्वाधर दिशा की परिभाषा का ज्ञान कराता है, अतः उपग्रह के भीतर बैठे व्यक्तियों के लिए क्षैतिज अथवा ऊर्ध्वाधर दिशाओं का कोई महत्व नहीं होता, उनके लिए सभी दिशाएँ समान होती हैं। वायु में तैरते अंतरिक्षयात्रियों के चित्र ठीक इसी तथ्य को दर्शाते हैं।

सारांश

1. न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का सार्वत्रिक नियम यह उल्लेख करता है कि दूरी r से पृथकन वाले m1 तथा m2 द्रव्यमान के किन्ही दो कणों के बीच लगे गुरुत्वीय आकर्षण बल का परिमाण

2204.png

यहाँ G सार्वत्रिक गुरुत्वीय स्थिरांक है जिसका मान 6.672 ×10–11 N m2 kg–2 है।

2. यदि हमें M1, M2, M3 ….Mn आदि बहुत से कणों के कारण m द्रव्यमान के किसी कण पर लगे परिणामी गुरुत्वाकर्षण बल को ज्ञात करना है, तो इसके लिए हम अध्यारोपण सिद्धान्त का उपयोग करते हैं। मान लीजिए गुरुत्वाकर्षण नियम द्वारा M1, M2, ….Mn में प्रत्येक द्वारा m पर आरोपित व्यष्टिगत बल F1, F2, ….Fn. हैं। तब बलों के अध्यारोपण सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक बल अन्य पिण्डों द्वारा प्रभावित हुए बिना स्वतंत्रतापूर्वक कार्य करता है। तब इनका परिणामी बल FR सदिशों के योग द्वारा ज्ञात किया जाता है।

fn

यहाँ प्रतीक Σ संकलन को दर्शाता है। 

3. केप्लर के ग्रहगति नियम यह स्पष्ट करते हैं कि

(a) सभी ग्रह दीर्घवृत्तीय कक्षाओं में गति करते हैं तथा सूर्य इस कक्षा की किसी एक नाभि पर स्थित होता है।

(b) सूर्य से किसी ग्रह तक खींचा गया त्रिज्य सदिश समान समय अन्तरालों में समान क्षेत्रफल प्रसर्प करता है। यह इस तथ्य का पालन करता है कि ग्रहों पर लगने वाले गुरुत्वाकर्षण बल केन्द्रीय हैं। अतः कोणीय संवेग अपरिवर्तित रहता है।

(c) किसी ग्रह के कक्षीय आवर्तकाल का वर्ग उसकी दीर्घवृत्तीय कक्षा के अर्ध दीर्घ अक्ष के घन के अनुक्रमानुपाती होता है।

सूर्य के परितः R की वृत्ताकार कक्षा में परिक्रमण कर रहे ग्रह के आवर्तकाल T तथा त्रिज्या R में यह संबंध होता है

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यहाँ Ms सूर्य का द्रव्यमान है। अधिकांश ग्रहों की सूर्य के परितः लगभग वृत्तीय कक्षाएँ हैं। यदि R का प्रतिस्थापन ग्रह की दीर्घवृत्तीय कक्षा के अर्ध दीर्घ अक्ष a से कर दें तो उपरोक्त नियम दीर्घवृत्तीय कक्षाओं पर समान रूप से लागू होता है।

4. गुरुत्वीय त्वरण

(a) पृथ्वी के पृष्ठ से h ऊँचाई पर

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gv

(b) पृथ्वी के पृष्ठ के नीचे d गहराई पर

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5. गुरुत्वाकर्षण बल संरक्षी बल है। इसलिए किसी स्थितिज ऊर्जा फलन को परिभाषित किया जा सकता है। r पृथकन के किन्ही दो कणों से संबद्ध गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा

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यहाँ r → ∞ पर V को शून्य माना। कणों के किसी निकाय की कुल स्थितिज ऊर्जा उन कणों के सभी युगलों की ऊर्जाओं का योग होता है जिसमें प्रत्येक युगल का निरूपण ऊपर व्यक्त सूत्र के पदों में किया जाता है। इसका निर्धारण अध्यारोपण के सिद्धान्त के अनुगमन द्वारा किया गया है।

6. यदि किसी वियुक्त निकाय में m द्रव्यमान का कोई कण किसी भारी पिण्ड, जिसका द्रव्यमान M है, के निकट v चाल से गतिमान है, तो उस कण की कुल यांत्रिक ऊर्जा

2263.png

अर्थात् कुल यांत्रिक ऊर्जा गतिज तथा स्थितिज ऊर्जाओं का योग है। कुल ऊर्जा गति का स्थिरांक होती है।

7. यदि M के परितः a त्रिज्या की कक्षा में m गतिशील है, जबकि M >> m, तो निकाय की कुल ऊर्जा

2268.png

यह उपरोक्त बिन्दु 5 में दी गयी स्थितिज ऊर्जा में यादृच्छिक स्थिरांक के चयन के अनुसार है। किसी भी परिबद्ध निकाय, अर्थात्, एेसा निकाय जिसमें कक्षा बन्द हो जैसे दीर्घवृत्तीय कक्षा, की कुल ऊर्जा ऋणात्मक होती है। गतिज तथा स्थितिज ऊर्जाएँ हैं

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2278.png

8. पृथ्वी के पृष्ठ से पलायन चाल

2283.png= 2288.png

इसका मान 11.2 km s–1 है।

9. यदि कोई कण किसी एकसमान गोलीय खोल अथवा गोलीय सममित भीतरी द्रव्यमान वितरण के ठोस गोले के बाहर है, तो गोला कण को इस प्रकार आकर्षित करता है जैसे कि उस गोले अथवा खोल का समस्त द्रव्यमान उसके केन्द्र पर संकेन्द्रित हो।

10. यदि कोई कण किसी एकसमान गोलीय खोल के भीतर है, तो उस कण पर लगा गुरुत्वीय बल शून्य है। यदि कोई कण किसी संभागी ठोस गोले के भीतर है, तो कण पर लगा बल गोले के केन्द्र की ओर होता है। यह बल कण के अंतस्थ गोलीय द्रव्यमान द्वारा आरोपित किया जाता है।

11. तुल्यकाली (भू तुल्यकालिक संचार) उपग्रह विषुवतीय तल (निरक्षीय समतल) में, वृत्तीय कक्षा में, पृथ्वी के केन्द्र से लगभग 4.22 × 104 km दूरी पर गति करते हैं।

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विचारणीय विषय

1. किसी पिण्ड की किसी अन्य पिण्ड के गुरुत्वीय प्रभाव के अन्तर्गत गति का अध्ययन करते समय निम्नलिखित राशियाँ संरक्षित रहती हैं:

(a) कोणीय संवेग,

(b) कुल यांत्रिक ऊर्जा

रैखिक संवेग का संरक्षण नहीं होता।

2. कोणीय संवेग संरक्षण केप्लर के द्वितीय नियम की ओर उन्मुख कराता है। तथापि यह गुरुत्वाकर्षण के व्युत्क्रम वर्ग नियम के लिए विशिष्ट नहीं है। यह किसी भी केन्द्रीय बल पर लागू होता है।

3. केप्लर के तीसरे नियम, T2 = KS R3 में स्थिरांक KS वृत्तीय कक्षाओं में गति करने वाले प्रत्येक ग्रह के लिए समान होता है। यह ग्रहों के अनुसार परिवर्तित नहीं होता। पृथ्वी की परिक्रमा करने वाले उपग्रहों पर भी यही टिप्पणी लागू होती है। [(समीकरण (8.38)]

4. अन्तरिक्ष उपग्रहों में अन्तरिक्ष यात्री भारहीनता अनुभव करते हैं। इसका कारण यह नहीं है कि अंतरिक्ष की उस अवस्थिति में गुरुत्वाकर्षण बल कम है। वरन इसका कारण यह है कि अन्तरिक्ष यात्री तथा उपग्रह दोनों ही पृथ्वी की ओर स्वंतत्रतापूर्वक गिरते हैं।

5. दूरी R के पृथकन वाले दो बिन्दुओं से संबद्व गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा

gm

यहाँ स्थिरांक को कुछ भी मान दिया जा सकता है। इसे शून्य मानना सरलतम चयन है। इस चयन के अनुसार

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इस चयन से यह अंतर्निहित है कि जब r → ∞ है तो V → 0 होता है। गुरुत्वीय ऊर्जा के शून्य होने की अवस्थिति का चयन स्थितिज ऊर्जा में यादृच्छिक स्थिरांक के चयन के समान ही है। ध्यान दीजिए, इस स्थिरांक के चयन से गुरुत्वीय बल परिवर्तित नहीं होता।

6. किसी पिण्ड की कुल यांत्रिक ऊर्जा इसकी गतिज ऊर्जा (जो सदैव धनात्मक होती है) तथा स्थितिज ऊर्जा का योग होती है। अनन्त के सापेक्ष (अर्थात्, यदि हम मान लें कि पिण्ड की अनन्त पर स्थितिज ऊर्जा शून्य है), किसी पिण्ड की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा ऋणात्मक होती है। किसी उपग्रह की कुल ऊर्जा ऋणात्मक होती है।

7. स्थितिज ऊर्जा के लिए सामान्यतः दिखाई देने वाला व्यंजक mgh, वास्तव में, ऊपर बिन्दु 6 के अन्तर्गत स्पष्ट किए अनुसार गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जाओं के अन्तर का सन्निकट मान होता है।

8. यद्यपि दो बिन्दुओं के बीच गुरुत्वाकर्षण बल केन्द्रीय है, तथापि दो परिमित दृढ़ पिण्डों के बीच लगने वाले बल का इन दोनों द्रव्यमानों के केन्द्रों को मिलाने वाली रेखा के अनुदिश होना आवश्यक नहीं है। किसी गोलीय सममित पिण्ड के लिए उस पिण्ड से बाहर स्थित किसी कण पर लगा बल इस प्रकार लगता है जैसे कि पिण्ड का समस्त द्रव्यमान उसके केन्द्र पर संकेन्द्रित हो और इसीलिए यह बल केन्द्रीय होता है।

9. गोलीय खोल के भीतर किसी कण बिन्दु पर गुरुत्वीय बल शून्य होता है। तथापि (किसी धात्विक खोल के विपरीत, जो वैद्युत बलों से परिरक्षण करता है) यह खोल अपने से बाहर स्थित दूसरे पिण्डों को गुरुत्वीय बलों के आरोपित होने से अपने भीतर स्थित कणों का परिरक्षण नहीं करता। गुरुत्वीय परिरक्षण संभव नहीं है।

 

अभ्यास

8.1 निम्नलिखित के उत्तर दीजिएः

(a) आप किसी आवेश का वैद्युत बलों से परिरक्षण उस आवेश को किसी खोखले चालक के भीतर रखकर कर सकते हैं। क्या आप किसी पिण्ड का परिरक्षण, निकट में रखे पदार्थ के गुरुत्वीय प्रभाव से, उसे खोखले गोले में रखकर अथवा किसी अन्य साधनों द्वारा कर सकते हैं?

(b) पृथ्वी के परितः परिक्रमण करने वाले छोटे अन्तरिक्षयान में बैठा कोई अन्तरिक्ष यात्री गुरुत्व बल का संसूचन नहीं कर सकता। यदि पृथ्वी के परितः परिक्रमण करने वाला अन्तरिक्ष स्टेशन आकार में बड़ा है, तब क्या वह गुरुत्व बल के संसूचन की आशा कर सकता है?

(c) यदि आप पृथ्वी पर सूर्य के कारण गुरुत्वीय बल की तुलना पृथ्वी पर चन्द्रमा के कारण गुरुत्व बल से करें, तो आप यह पाएंगे कि सूर्य का खिंचाव चन्द्रमा के खिचाव की तुलना में अधिक है (इसकी जाँच आप स्वयं आगामी अभ्यासों में दिए गए आंकड़ों की सहायता से कर सकते हैं।) तथापि चन्द्रमा के खिंचाव का ज्वारीय प्रभाव सूर्य के ज्वारीय प्रभाव से अधिक है। क्यों?

8.2 सही विकल्प का चयन कीजिए:

(a) बढ़ती तुंगता के साथ गुरुत्वीय त्वरण बढ़ता/घटता है।

(b) बढ़ती गहराई के साथ (पृथ्वी को एकसमान घनत्व को गोला मानकर) गुरुत्वीय त्वरण बढ़ता/घटता है।

(c) गुरुत्चीय त्वरण पृथ्वी के द्रव्यमान/पिण्ड के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता।

(d) पृथ्वी के केन्द्र से r2 तथा r1 दूरियों के दो बिन्दुओं के बीच स्थितिज ऊर्जा-अन्तर के लिए सूत्र
G Mm(1/r2 1/r1) सूत्र mg(r2 r1) से अधिक/कम यथार्थ है।

8.3 मान लीजिए एक एेसा ग्रह है जो सूर्य के परितः पृथ्वी की तुलना में दो गुनी चाल से गति करता है, तब पृथ्वी की कक्षा की तुलना में इसका कक्षीय आमाप क्या है?

8.4 बृहस्पति के एक उपग्रह, आयो (Io), की कक्षीय अवधि 1.769 दिन तथा कक्षा की त्रिज्या 4.22 × 108 m है। यह दर्शाइए कि बृहस्पति का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का लगभग 1/1000 गुना है।

8.5 मान लीजिए कि हमारी आकाशगंगा में एक सौर द्रव्यमान के 2.5 × 1011 तारे हैं। मंदाकिनीय केन्द्र से 50,000 ly दूरी पर स्थित कोई तारा अपनी एक परिक्रमा पूरी करने में कितना समय लेगा? आकाशगंगा का व्यास 105 ly लीजिए।

8.6 सही विकल्प का चयन कीजिए:

(a) यदि स्थितिज ऊर्जा का शून्य अनन्त पर है, तो कक्षा में परिक्रमा करते किसी उपग्रह की कुल ऊर्जा इसकी गतिज/स्थितिज ऊर्जा का ऋणात्मक है।

(b) कक्षा में परिक्रमा करने वाले किसी उपग्रह को पृथ्वी के गुरुत्वीय प्रभाव से बाहर निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा समान ऊंचाई (जितनी उपग्रह की है) के किसी स्थिर पिण्ड को पृथ्वी के प्रभाव से बाहर प्रक्षेपित करने के लिए आवश्यक ऊर्जा से अधिक/कम होती है।

 

8.7 क्या किसी पिण्ड की पृथ्वी से पलायन चाल (a) पिण्ड के द्रव्यमान, (b) प्रक्षेपण बिन्दु की अवस्थिति, (c) प्रक्षेपण की दिशा, (d) पिण्ड के प्रमोचन की अवस्थिति की ऊंचाई पर निर्भर करती है?

 

8.8 कोई धूमकेतु सूर्य की परिक्रमा अत्यधिक दीर्घवृत्तीय कक्षा में कर रहा है। क्या अपनी कक्षा में धूमकेतु की शुरू से अन्त तक (a) रैखिक चाल, (b) कोणीय चाल, (c) कोणीय संवेग, (d) गतिज ऊर्जा, (e) स्थितिज ऊर्जा (f) कुल ऊर्जा नियत रहती है। सूर्य के अति निकट आने पर धूमकेतु के द्रव्यमान में ह्रास को नगण्य मानिये।

8.9 निम्नलिखित में से कौन से लक्षण अन्तरिक्ष में अन्तरिक्ष यात्री के लिए दुखःदायी हो सकते हैं? (a) पैरों में सूजन,
(b) चेहरे पर सूजन, (c) सिरदर्द, (d) दिक्विन्यास समस्या।

8.10 एकसमान द्रव्यमान घनत्व की अर्धगोलीय खोलों द्वारा परिभाषित ढोल के पृष्ठ के केन्द्र पर गुरुत्वीय तीव्रता की दिशा [देखिए चित्र 8.10] (i) a, (ii) b,(iii)c, (iv) 0 में किस तीर द्वारा दर्शायी जाएगी?

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चित्र. 8.10

 

8.11 उपरोक्त समस्या में किसी यादृच्छिक बिन्दु P पर गुरुत्वीय तीव्रता किस तीर (i) d, (ii) e, (iii) f, (iv) g द्वारा व्यक्त की जाएगी?

8.12 पृथ्वी से किसी रॉकेट को सूर्य की ओर दागा गया है। पृथ्वी के केन्द्र से किस दूरी पर रॉकेट पर गुरुत्वाकर्षण बल शून्य है? सूर्य का द्रव्यमान = 2×1030 kg, पृथ्वी का द्रव्यमान = 6×1024 kg। अन्य ग्रहों आदि के प्रभावों की उपेक्षा कीजिए (कक्षीय त्रिज्या = 1.5 × 1011 m)।

8.13 आप सूर्य को कैसे तोलेंगे, अर्थात् उसके द्रव्यमान का आकलन कैसे करेंग? सूर्य के परितः पृथ्वी की कक्षा की औसत त्रिज्या 1.5 × 108 km है।

8.14 एक शनि वर्ष एक पृथ्वी-वर्ष का 29.5 गुना है। यदि पृथ्वी सूर्य से 1.5 × 108 km दूरी पर है, तो शनि सूर्य से कितनी दूरी पर है?

8.15 पृथ्वी के पृष्ठ पर किसी वस्तु का भार 63 N है। पृथ्वी की त्रिज्या की आधी ऊंचाई पर पृथ्वी के कारण इस वस्तु पर गुरुत्वीय बल कितना है?

8.16 यह मानते हुए कि पृथ्वी एकसमान घनत्व का एक गोला है तथा इसके पृष्ठ पर किसी वस्तु का भार 250 N है, यह ज्ञात कीजिए कि पृथ्वी के केन्द्र की ओर आधी दूरी पर इस वस्तु का भार क्या होगा?

8.17 पृथ्वी के पृष्ठ से उर्ध्वाधरतः ऊपर की ओर कोई रॉकेट 5 km s-1 की चाल से दागा जाता है। पृथ्वी पर वापस लौटने से पूर्व यह रॉकेट पृथ्वी से कितनी दूरी तक जाएगा? पृथ्वी का द्रव्यमान = 6.0 × 1024 kg; पृथ्वी की माध्य त्रिज्या = 6.4 × 106 m तथा G = 6.67 × 10–11 N m2 kg2

8.18 पृथ्वी के पृष्ठ पर किसी प्रक्षेप्य की पलायन चाल 11.2 km s–1 है। किसी वस्तु को इस चाल की तीन गुनी चाल से प्रक्षेपित किया जाता है। पृथ्वी से अत्यधिक दूर जाने पर इस वस्तु की चाल क्या होगी? सूर्य तथा अन्य ग्रहों की उपस्थिति की उपेक्षा कीजिए।

8.19 कोई उपग्रह पृथ्वी के पृष्ठ से 400 km ऊंचाई पर पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है। इस उपग्रह को पृथ्वी के गुरुत्वीय प्रभाव से बाहर निकालने में कितनी ऊर्जा खर्च होगी? उपग्रह का द्रव्यमान = 200 kg; पृथ्वी का द्रव्यमान = 6.0×1024 kg; पृथ्वी की त्रिज्या = 6.4 × 106 m तथा G = 6.67 × 10–11 N m2 kg2।

8.20 दो तारे, जिनमें प्रत्येक का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान (2×1030 kg) के बराबर है, एक दूसरे की ओर सम्मुख टक्कर के लिए आ रहे हैं। जब वे 109 km दूरी पर हैं तब इनकी चाल उपेक्षणीय हैं। ये तारे किस चाल से टकराएंगे? प्रत्येक तारे की त्रिज्या 104 km है। यह मानिए कि टकराने के पूर्व तक तारों में कोई विरूपण नहीं होता (G के ज्ञात मान का उपयोग कीजिए)।

8.21 दो भारी गोले जिनमें प्रत्येक का द्रव्यमान 100 kg त्रिज्या 0.10 m है किसी क्षैतिज मेज पर एक दूसरे से 1.0 m दूरी पर स्थित हैं। दोनों गोलों के केन्द्रों को मिलाने वाली रेखा के मध्य बिन्दु पर गुरुत्वीय बल तथा विभव क्या है? क्या इस बिन्दु पर रखा कोई पिण्ड संतुलन में होगा? यदि हां, तो यह संतुलन स्थायी होगा अथवा अस्थायी?

 

अतिरिक्त अभ्यास 

8.22 जैसा कि आपने इस अध्याय में सीखा है कि कोई तुल्यकाली उपग्रह पृथ्वी के पृष्ठ से लगभग 36,000 km ऊंचाई पर पृथ्वी की परिक्रमा करता है। इस उपग्रह के निर्धारित स्थल पर पृथ्वी के गुरुत्व बल के कारण विभव क्या है? (अनन्त पर स्थितिज ऊर्जा शून्य लीजिए।) पृथ्वी का द्रव्यमान = 6.0×1024 kg; पृथ्वी की त्रिज्या = 6400 km.

8.23 सूर्य के द्रव्यमान से 2.5 गुने द्रव्यमान का कोई तारा 12 km आमाप से निपात होकर 1.2 परिक्रमण प्रति सेकण्ड से घूर्णन कर रहा है (इसी प्रकार के संहत तारे को न्यूट्रॉन तारा कहते है। कुछ प्रेक्षित तारकीय पिण्ड, जिन्हें पल्सार कहते हैं, इसी श्रेणी में आते हैं।)। इसके विषुवत् वृत्त पर रखा कोई पिण्ड, गुरुत्व बल के कारण, क्या इसके पृष्ठ से चिपका रहेगा? (सूर्य का द्रव्यमान = 2 × 1030kg )

8.24 कोई अन्तरिक्षयान मंगल पर ठहरा हुआ है। इस अन्तरिक्षयान पर कितनी ऊर्जा खर्च की जाए कि इसे सौरमण्डल से बाहर धकेला जा सके। अन्तरिक्षयान का द्रव्यमान = 1000 kg; सूर्य का द्रव्यमान = 2×1030 kg; मंगल का द्रव्यमान = 6.4×1023 kg; मंगल की त्रिज्या = 3395 km; मंगल की कक्षा की त्रिज्या = 2.28 ×108 km तथा G = 6.67×10-11 N m2 kg–2।

8.25 किसी राकेट को मंगल के पृष्ठ से 2 km s–1 की चाल से ऊर्ध्वाधर ऊपर दागा जाता है। यदि मंगल के वातावरणीय प्रतिरोध के कारण इसकी 20% आरंभिक ऊर्जा नष्ट हो जाती है, तो मंगल के पृष्ठ पर वापस लौटने से पूर्व यह रॉकेट मंगल से कितनी दूरी तक जाएगा? मंगल का द्रव्यमान = 6.4×1023 kg; मंगल की त्रिज्या = 3395 km तथा G = 6.67×10-11 N m2 kg–2।


परिशिष्ट 8.1: भारतीय उपग्रहों की सूची

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भारत ने अभी तक 28 देशों के 239 विदेशी उपग्रहों को सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा, आंध्र प्रदेश से प्रमोचित किया है –
मई 26, 1999 (02); अक्टूबर 22, 2001 (02); जनवरी 10, 2007 (02); अप्रैल 23, 2007 (01); जनवरी 21, 2008 (01);
अप्रैल 28, 2008 (08); सितम्बर 23, 2009 (06); जुलाई 12, 2010 (03); जनवरी 12, 2011 (01); अप्रैल 20, 2011 (01);
सितम्बर 9, 2012 (02), फरवरी 25, 2013 (06); जून 30, 2014 (05); जुलाई 10, 2015 (05); सितम्बर 28, 2015 (06);
दिसम्बर 16, 2015 (06); जून 22, 2016 (17); सितम्बर 26, 2016 (05); फरवरी 15, 2017 (101) जो कि विश्व कीर्तिमान है; तथा जून 23, 2017 (29); सितम्बर 16, 2018 (02)।

विस्तृत जानकारी के लिए www.isro.gov.in देखें।

a कपूस्टीन यार मिसाइल और स्पेस कॉम्प्लेक्स, सोवियेत यूनियन (अब रूस) से प्रमोचित

b सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा, आंध्र प्रदेश से प्रमोचित

c सेंटर स्पाशियल गुयानासिस, कौरौ, फ्रेंच गुयाना) से प्रमोचित

c वायु सेना पूर्वी परीक्षण परिसर, फ्लोरिडा से प्रमोचित

d बैकनूर कोस्मोड्रोम, कज़ाख़िस्तान से प्रमोचित

 

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