अध्याय 4 4.1 भूमिका 4.2 अदिश एवं सदिश 4.3 सदिशों की वास्तविक संख्या से गुणा 4.4 सदिशों का संकलन व व्यवकलन - ग्रापफी विध्ि 4.5 सदिशों का वियोजन 4.6 सदिशों का योग - विश्लेषणात्मकविध्ि 4.7 किसी समतल में गति 4.8 किसी समतल में एकसमान त्वरण सेगति 4.9 दो विमाओं में आपेक्ष्िाक वेग 4.10 प्रक्षेप्य गति 4.11 एकसमान वृत्तीय गति सारांश विचारणीय विषय अभ्यास अतिरिक्त अभ्यास समतल में गति 4.1 भूमिका पिछले अध्याय में हमने स्िथति, विस्थापन, वेग एवं त्वरण की धारणाओं कोविकसित किया था, जिनकी किसी वस्तु की सरल रेखीय गति का वणर्न करने के लिए आवश्यकता पड़ती है । क्योंकि एकविमीय गति में मात्रा दो ही दिशाएँसंभव हैं, इसलिए इन राश्िायों के दिशात्मक पक्ष को $ और - चिÉों से व्यक्तकर सकते हैं । परंतु जब हम वस्तुओं की गति का द्विविमीय ;एक समतलद्ध या त्रिाविमीय ;दिव्फस्थानद्ध वणर्न करना चाहते हैं, तब हमें उपयुर्क्त भौतिक राश्िायोंका अध्ययन करने के लिए सदिशों की आवश्यकता पड़ती है । अतएव सवर्प्रथम हम सदिशों की भाषा ;अथार्त सदिशों के गुणों एवं उन्हें उपयोग में लाने की वििायाँद्ध सीखेंगे । सदिश क्या है ? सदिशों को वैफसे जोड़ा, घटाया या गुणा कियाजाता है ? सदिशों को किसी वास्तविक संख्या से गुणा करें तो हमें क्या परिणाम मिलेगा ? यह सब हम इसलिए सीखेंगे जिससे किसी समतल में वस्तु के वेग एवंत्वरण को परिभाष्िात करने के लिए हम सदिशों का उपयोग कर सवेंफ । इसके बाद हम किसी समतल में वस्तु की गति पर परिचचार् करेंगे । किसी समतल में गति के सरल उदाहरण के रूप में हम एकसमान त्वरित गति का अध्ययन करेंगे तथाएक प्रक्षेप्य की गति के विषय में विस्तार से पढे़ंगे । वृत्तीय गति से हम भलीभाँतिपरिचित हैं जिसका हमारे दैनिक जीवन में विशेष महत्त्व है । हम एकसमान वृत्तीयगति की वुफछ विस्तार से चचार् करेंगे । हम इस अध्याय में जिन समीकरणों को प्राप्त करेंगे उन्हें आसानी से त्रिाविमीय गति के लिए विस्तारित किया जा सकता है । 4.2 अदिश एवं सदिश हम भौतिक राश्िायों को अदिशों एवं सदिशों में वगीर्कृत करते हैं । दोनों में मूलअंतर यह है कि सदिश के साथ दिशा को संब( करते हैं वहीं अदिश के साथ ऐसा नहीं करते । एक अदिश राश्िा वह राश्िा है जिसमें मात्रा परिमाण होता है । इसे केवल एक संख्या एवं उचित मात्राक द्वारा पूणर् रूप से व्यक्त किया जा सकताहै । इसके उदाहरण हैं: दो बिंदुओं के बीच की दूरी, किसी वस्तु की संहति ;द्रव्यमानद्ध, किसी वस्तु का तापक्रम, तथा वह समय जिस परकोइर् घटना घटती है । अदिशों के जोड़ में वही नियम लागू होते हैं जो सामान्यतया बीजगण्िात में । अदिशों को हम ठीक वैसे ही जोड़ सकते हैं, घटा सकते हैं, गुणा या भाग कर सकते हैं जैसा कि हम सामान्य संख्याओं के साथ करते हैं’ । उदाहरण के लिए, यदि किसी आयत की लंबाइर् औरचैड़ाइर् क्रमशः 1.0 उ तथा 0.5 उ है तो उसकी परिमाप चारों भुजाओं के योग, 1ण्0 उ ़ 0ण्5 उ ़ 1ण्0 उ ़ 0ण्5 उ त्र 3ण्0 उ होगा। हर भुजा की लंबाइर् एक अदिश है तथा परिमापभी एक अदिश है । हम एक दूसरे उदाहरण पर विचार करेंगे: यदि किसी एक दिन का अिाकतम एवं न्यूनतम ताप क्रमशः 35.6 °ब् तथा 24.2 °ब् है तो इन दोनों का अंतर 11.4 °ब् होगा । इसी प्रकार यदि एल्युमिनियम के किसी एकसमान ठोस घन की भुजा 10 बउ है और उसका द्रव्यमान 2ण्7 ाह है तोउसका आयतन 10√3 उ3 ;एक अदिशद्ध होगा तथा घनत्व 2ण्7103 ाहध्उ3 भी एक अदिश है । एक सदिश राश्िा वह राश्िा है जिसमें परिमाण तथा दिशा दोनों होते हैं तथा वह योग संबंधी त्रिाभुज के नियम अथवा समानान्तर चतुभुर्ज के योग संबंधी नियम का पालन करती है । इस प्रकार, एक सदिश को उसके परिमाण की संख्या तथा दिशा द्वारा व्यक्त करते हैं । वुफछ भौतिक राश्िायाँ जिन्हें सदिशोंद्वारा व्यक्त करते हैं, वे हैं विस्थापन, वेग, त्वरण तथा बल । सदिश को व्यक्त करने के लिए इस पुस्तक में हम मोटे अक्षरों का प्रयोग करेंगे । जैसे कि वेग सदिश को व्यक्त करनेके लिए अ चिÉ का प्रयोग करेंगे । परंतु हाथ से लिखते समय क्योंकि मोटे अक्षरों का लिखना थोड़ा मुश्िकल होता है, इसलिएएक सदिश को अक्षर के उफपर तीर लगाकर व्यक्त करते हैं, जैसे→ अ । इस प्रकार अ तथा → अ दोनों ही वेग सदिश को व्यक्त करते हैं । किसी सदिश के परिमाण को प्रायः हम उसका ‘परम मान’कहते हैं और उसे द्यअद्य त्र अ द्वारा व्यक्त करते हैं । इस प्रकार एक सदिश को हम मोटे अक्षर यथा । या ंए चए ुए तए ण्ण्ण्ण्ण् गए ल से व्यक्त करते हैं जबकि इनके परिमाणों को क्रमशः हम । या ंए चए ुए तए ण्ण्ण्ण् गए ल द्वारा व्यक्त करते हैं । 4.2.1 स्िथति एवं विस्थापन सदिश किसी समतल में गतिमान वस्तु की स्िथति व्यक्त करने के लिए हम सुविधानुसार किसी बिंदु व् को मूल बिंदु के रूप में चुनतेहैं । कल्पना कीजिए कि दो भ्िान्न - भ्िान्न समयों ज और जश् पर वस्तु की स्िथति क्रमशः च् और च्श् है ;चित्रा 4ण्1ंद्ध । हम च् को व् से एक सरल रेखा से जोड़ देते हैं । इस प्रकार व्च् समय ज पर वस्तु की स्िथति सदिश होगी । इस रेखा के सिरे पर एकतीर का निशान लगा देते हैं । इसे किसी चिÉ ;मान लीजिएद्ध त से निरूपित करते हैं, अथार्त् व्च् त्र त । इसी प्रकार बिंदु च्श् को एक दूसरे स्िथति सदिश व्च्श् यानी तश् से निरूपित करते हैं। सदिश त की लंबाइर् उसके परिमाण को निरूपित करती है तथासदिश की दिशा वह होगी जिसके अनुदिश च् ;बिंदु व् से देखने परद्ध स्िथत होगा । यदि वस्तु च् से चलकर च्श् पर पहुंच जाती है तो सदिश च्च्श् ;जिसकी पुच्छ च् पर तथा शीषर् च्श् पर हैद्ध¯बदु च् ;समय जद्ध से च्श् ;समय जश्द्ध तक गति के संगत विस्थापन सदिश कहलाता है । चित्रा 4ण्1 ;ंद्ध स्िथति तथा विस्थापन सदिश, ;इद्ध विस्थापन सदिश च्फ तथा गति के भ्िान्न - भ्िान्न मागर् । यहाँ यह बात महत्वपूणर् है कि ‘विस्थापन सदिश’ को एक सरल रेखा से व्यक्त करते हैं जो वस्तु की अंतिम स्िथति कोउसकी प्रारम्िभक स्िथति से जोड़ती है तथा यह उस वास्तविक पथ पर निभर्र नहीं करता जो वस्तु द्वारा बिंदुओं के मध्य चला जाता है । उदाहरणस्वरूप, जैसा कि चित्रा 4ण्1इ में दिखाया गयाहै, प्रारम्िभक स्िथति च् तथा अंतिम स्िथति फ के मध्य विस्थापन सदिश च्फ यद्यपि वही है परंतु दोनों स्िथतियों के बीच चली गइर्दूरियां जैसे च्।ठब्फए च्क्फ तथा च्ठम्थ्फ अलग - अलग हैं । इसी प्रकार, किन्हीं दो बिंदुओं के मध्य विस्थापन सदिश का परिमाण या तो गतिमान वस्तु की पथ - लंबाइर् से कम होताहै या उसके बराबर होता है। पिछले अध्याय में भी एक सरल रेखा के अनुदिश गतिमान वस्तु के लिए इस तथ्य को भलीभांतिसमझाया गया था । 4.2.2 सदिशों की समता दो सदिशों । तथा ठ को केवल तभी बराबर कहा जा सकताहै जब उनके परिमाण बराबर हों तथा उनकी दिशा समान हो’’ । चित्रा 4ण्2;ंद्ध में दो समान सदिशों । तथा ठ को दशार्या गया है । हम इनकी समानता की परख आसानी से कर सकते हैं । ठ को स्वयं के समांतर ख्िासकाइये ताकि उसकी पुच्छ फ सदिश । की पुच्छ व् के संपाती हो जाए । पिफर क्योंकि उनकेशीषर् ै एवं च् भी संपाती हैं अतः दोनोें सदिश बराबर कहलाएंगे । सामान्यतया इस समानता को । त्र ठ के रूप में लिखते हैं । इस ’ केवल समान मात्राक वाली राश्िायों का जोड़ व घटाना साथर्क होता है । जबकि आप भ्िान्न मात्राकों वाले अदिशों का गुणा या भाग कर सकतेहैं। ’’ हमारे अध्ययन में सदिशों की स्िथतियां निधार्रित नहीं हैं । इसलिए जब एक सदिश को स्वयं के समांतर विस्थापित करते हैं तो सदिश अपरिवतिर्त रहता है । इस प्रकार के सदिशों को हम ‘मुक्त सदिश’ कहते हैं । हालंाकि वुफछ भौतिक उपयोगों में सदिश की स्िथति या उसकी िया रेखामहत्त्वपूणर् होती है । ऐसे सदिशों को हम ‘स्थानगत सदिश’ कहते हैं। चित्रा 4ण्2 ;ंद्ध दो समान सदिश । तथा ठए ;इद्ध दो सदिश ।श् व ठश् असमान हैं यद्यपि उनकी लंबाइयाँ वही हैं । बात की ओर ध्यान दीजिए कि चित्रा 4ण्2;इद्ध में यद्यपि सदिशों ।श् तथा ठश् के परिमाण समान हैं पिफर भी दोनों सदिश समान नहीं हैं क्योंकि उनकी दिशायें अलग - अलग हैं । यदि हम ठश् को उसके ही समांतर ख्िासकाएं जिससे उसकी पुच्छ फश्ए ।श् की पुच्छ व्श् से संपाती हो जाए तो भी ठश् का शीषर् ैश्ए ।श् के शीषर् च्श् का संपाती नहीं होगा । 4.3 सदिशों की वास्तविक संख्या से गुणा यदि एक सदिश । को किसी धनात्मक संख्या λ से गुणा करेंतो हमें एक सदिश ही मिलता है जिसका परिमाण सदिश । के परिमाण का λ गुना हो जाता है तथा जिसकी दिशा वही है जो । की है । इस गुणनपफल को हम λ। से लिखते हैं । द्यλ। द्यत्रλ द्य। द्य यदि λझ 0 उदाहरणस्वरूप, यदि । को 2 से गुणा किया जाए, तो परिणामीसदिश 2। होगा ;चित्रा 4ण्3ंद्ध जिसकी दिशा । की दिशा होगी तथा परिमाण द्य ।द्य का दोगुना होगा । सदिश । को यदि एक ट्टणात्मक संख्या λ से गुणा करें तो सदिश λΑप्राप्त होता हैजिसकी दिशा । की दिशा के विपरीत है और जिसका परिमाण द्य ।द्य का - λ गुना होता है ।यदि किसी सदिश । को ट्टणात्मक संख्याओं - 1 व - 1.5 से गुणा करें तो परिणामी सदिश चित्रा 4.3;इद्ध जैसे होंगे । चित्रा 4.3 ;ंद्ध सदिश । तथा उसे धनात्मक संख्या दो से गुणा करने पर प्राप्त परिणामी सदिश, ;इद्ध सदिश । तथा उसे ट्टणात्मक संख्याओं - 1 तथा - 1.5 से गुणा करने पर प्राप्त परिणामी सदिश । भौतिकी में जिस घटक λ द्वारा सदिश । को गुणा किया जाता है वह कोइर् अदिश हो सकता है जिसकी स्वयं की विमाएँहोती हैं । अतएव λΑ की विमाएँ λ व । की विमाओं के गुणनपफल के बराबर होंगी । उदाहरणस्वरूप, यदि हम किसीअचर वेग सदिश को किसी ;समयद्ध अंतराल से गुणा करें तो हमें एक विस्थापन सदिश प्राप्त होगा । 4.4 सदिशों का संकलन व व्यवकलन: ग्रापफी वििा जैसा कि खण्ड 4.2 में बतलाया जा चुका है कि सदिश योग के त्रिाभुज नियम या समान्तर चतुभुर्ज के योग के नियम का पालनकरते हैं । अब हम ग्रापफी वििा द्वारा योग के इस नियम को समझाएंगे । हम चित्रा 4ण्4 ;ंद्ध में दशार्ए अनुसार किसी समतल में स्िथत दो सदिशों । तथा ठ पर विचार करते हैं । इन सदिशोंको व्यक्त करने वाली रेखा - खण्डों की लंबाइयाँ सदिशों के परिमाण के समानुपाती हैं । योग । ़ ठ प्राप्त करने के लिए चित्रा 4.4;इद्ध के अनुसार हम सदिश ठ इस प्रकार रखते हैं कि उसकी पुच्छ सदिश । के शीषर् पर हो । पिफर हम । की पुच्छ चित्रा 4.4 ;ंद्ध सदिश । तथा ठए ;इद्ध सदिशों । व ठ का ग्रापफी वििा द्वारा जोड़ना, ;बद्ध सदिशों ठ व । का ग्रापफी वििा द्वारा जोड़ना, ;कद्ध सदिशों के जोड़ से संबंिात साहचयर् नियम का प्रदशर्न । को ठ के सिरे से जोड़ देते हैं । यह रेखा व्फ परिणामी सदिश त् को व्यक्त करती है जो सदिशों । तथा ठ का योग है। क्योंकिसदिशों के जोड़ने की इस वििा में सदिशों में से किसी एक के शीषर् को दूसरे की पुच्छ से जोड़ते हैं, इसलिए इस ग्रापफी वििा को शीषर् व पुच्छ वििा के नाम से जाना जाता है । दोनों सदिशतथा उनका परिणामी सदिश किसी त्रिाभुज की तीन भुजाएं बनाते हैं । इसलिए इस वििा को सदिश योग के त्रिाभुज नियम भी कहते हैं । यदि हम ठ़। का परिणामी सदिश प्राप्त करें तो भीहमें वही सदिश त् प्राप्त होता है ;चित्रा 4ण्4बद्ध। इस प्रकारसदिशों का योग ‘क्रम विनिमेय’ ;सदिशों के जोड़ने में यदि उनका क्रम बदल दें तो भी परिणामी सदिश नहीं बदलताद्ध है । । ़ ठ त्र ठ ़ । ;4ण्1द्ध सदिशों का योग साहचयर् नियम का भी पालन करता है जैसा किचित्रा 4ण्4 ;कद्ध में दशार्या गया है । सदिशों । व ठ को पहले जोड़कर और पिफर सदिश ब् को जोड़ने पर जो परिणाम प्राप्तहोता है वह वही है जो सदिशों ठ और ब् को पहले जोड़कर पिफर । को जोड़ने पर मिलता है, अथार्त् ;। ़ ठद्ध ़ ब् त्र । ़ ;ठ ़ ब्द्ध ;4ण्2द्ध दो समान और विपरीत सदिशों को जोड़ने पर क्या परिणाममिलता है ? हम दो सदिशों । और √। जिन्हें चित्रा 4ण्3;इद्ध में दिखलाया है, पर विचार करते हैं । इनका योग । ़ ;√।द्ध है।क्योंकि दो सदिशों का परिमाण वही है किन्तु दिशा विपरीत है,इसलिए परिणामी सदिश का परिमाण शून्य होगा और इसे 0 से व्यक्त करते हैं। । √ । त्र 0 द्य0द्य त्र 0 ;4ण्3द्ध 0 को हम शून्य सदिश कहते हैं । क्योंकि शून्य सदिश कापरिमाण शून्य होता है, इसलिए इसकी दिशा का निधार्रण नहीं किया जा सकता है । दरअसल जब हम एक सदिश । को संख्या शून्य से गुणा करते हैं तो भी परिणामस्वरूप हमें एकसदिश ही मिलेगा किन्तु उसका परिमाण शून्य होगा । व् सदिश के मुख्य गुण निम्न हैंः । ़ 0 त्र । λ 0 त्र 0 0 । त्र 0 ;4.4द्ध शून्य सदिश का भौतिक अथर् क्या है ? जैसाकि चित्रा 4ण्1;ंद्ध मंे दिखाया गया है हम किसी समतल में स्िथति एवं विस्थापनसदिशों पर विचार करते हैं । मान लीजिए कि किसी क्षण ज परकोइर् वस्तु च् पर है । वह च्श् तक जाकर पुनः च् पर वापस आजाती है । इस स्िथति में वस्तु का विस्थापन क्या होगा ? चूंकिप्रारंभ्िाक एवं अंतिम स्िथतियां संपाती हो जाती हैं, इसलिएविस्थापन फ्शून्य सदिशय् होगा ।सदिशों का व्यवकलन सदिशों के योग के रूप में भी परिभाष्िात किया जा सकता है । दो सदिशों । व ठ के अंतरको हम दो सदिशों । व √ठ के योग के रूप में निम्न प्रकारसे व्यक्त करते हैं: । √ ठ त्र । ़ ;√ठद्ध ;4ण्5द्ध इसे चित्रा 4.5 में दशार्या गया है । सदिश √ठ को सदिश । में जोड़कर त् त्र ;। √ ठद्ध प्राप्त होता है । तुलना के लिए इसी चित्रा2 में सदिश त् त्र । ़ ठ को भी दिखाया गया है । समान्तर1चतुभुर्ज वििा को प्रयुक्त करके भी हम दो सदिशों का योग ज्ञातकर सकते हैं । मान लीजिए हमारे पास दो सदिश । व ठ हैं।इन सदिशों को जोड़ने के लिए उनकी पुच्छ को एक उभयनिष्ठमूल बिंदु व् पर लाते हैं जैसा चित्रा 4ण्6;ंद्ध में दिखाया गया है।पिफर हम । के शीषर् से ठ के समांतर एक रेखा खींचते हैं और ठ के शीषर् से । के समांतर एक दूसरी रेखा खींचकर समांतरचतुभुर्ज व्फैच् पूरा करते हैं । जिस बिंदु पर यह दोनों रेखाएंएक दूसरे को काटती हैं, उसे मूल बिंदु व् से जोड़ देते हैं।परिणामी सदिश त् की दिशा समान्तर चतुभुर्ज के मूल बिंदु व् से कटान बिंदु ै की ओर खींचे गए विकणर् व्ै के अनुदिशहोगी ख्चित्रा 4ण्6 ;इद्ध,। चित्रा 4ण्6 ;बद्ध में सदिशों । व ठ का परिणामी निकालने के लिए त्रिाभुज नियम का उपयोग दिखायागया है । दोनों चित्रों से स्पष्ट है कि दोनों वििायों से एक हीपरिणाम निकलता है । इस प्रकार दोनों वििायाँ समतुल्य हैं। चित्रा 4ण्5 ;ंद्ध दो सदिश । व ठए œठ को भी दिखाया गया है । ;इद्ध सदिश । से सदिश ठ का घटाना - परिणाम त्2 है । तुलना के लिएसदिशों । व ठ का योग त्1 भी दिखलाया गया है । चित्रा 4ण्6 ;ंद्ध एक ही उभयनिष्ठ बिंदु वाले दो सदिश । व ठ परए;इद्ध समान्तर चतुभुर्ज वििा द्वारा ।़ठ योग प्राप्त करना, ;बद्ध दो सदिशों को जोड़ने की समान्तर चतुभुर्ज वििा त्रिाभुज वििा के समतुल्य है । ¯ उदाहरण 4.1 किसी दिन वषार् 35 उ ेœ1 की चाल से उफध्वार्धर नीचे की ओर हो रही है । वुफछ देर बाद हवा 12 उ ेœ1 की चाल से पूवर् से पश्िचम दिशा की ओर चलने लगती है । बस स्टाप पर खड़े किसी लड़के को अपना छाता किस दिशा में करना चाहिए ? चित्रा 4ण्7 हल: वषार् एवं हवा के वेगों को सदिशों अ तथा अ से चित्रातू4.7 में दशार्या गया है। इनकी दिशाएं प्रश्न के अनुसार प्रदश्िर्ात की गइर् हैं । सदिशों के योग के नियम के अनुसार अ तथा अ तू का परिणामी त् चित्रा में खींचा गया है । त् का परिमाण होगा - 22 22 −1 −1त् त्र अ ़ अ त्र 35 ़12 उ े त्र 37 उ ेतू उफध्वार्धर से त् की दिशा θ होगी - अू 12 जंद θत्र त्र त्र 0ण्343 अत 35 या θ त्र जंद√1 ;0ण्343द्ध त्र 19° अतएव लड़के को अपना छाता उफध्वार्धर तल में उफध्वार्धर से 19° का कोण बनाते हुए पूवर् दिशा की ओर रखना चाहिए । ° 4.5 सदिशों का वियोजन मान लीजिए कि ं व इ किसी समतल में भ्िान्न दिशाओं वाले दो शून्येतर ;शून्य नहींद्ध सदिश हैं तथा । इसी समतल में कोइर्अन्य सदिश है । ;चित्रा 4.8द्ध तब । को दो सदिशों के योग के रूप में वियोजित किया जा सकता है । एक सदिश ं के किसी वास्तविक संख्या के गुणनपफल के रूप में और इसी प्रकार दूसरा सदिश इ के गुणनपफल के रूप में है । ऐसा करने के लिए पहले । खींचिए जिसका पुच्छ व् तथा शीषर् च् है । पिफर व् से ं के समांतर एक सरल रेखा खींचिए तथा च् से एक सरल रेखा इ के समांतर खींचिए । मान लीजिए वे एक दूसरे को फ पर काटती हैं । तब, । त्र व्च् त्र व्फ ़ फच् ;4ण्6द्ध परंतु क्योंकि व्फए ं के समांतर है तथा फ च्ए इ के समांतर है इसलिए व्फत्रλ ं तथा फच्त्रμइ ;4ण्7द्ध जहां λ तथा μ कोइर् वास्तविक संख्याएँ हैं । चित्रा 4.8 ;ंद्ध दो अरैख्िाक सदिश ं व इए ;इद्ध सदिश । का ं व इ के पदों में वियोजन । अतः ।त्रλं़μ इ ;4ण्8द्ध हम कह सकते हैं कि । को ं व इ के अनुदिश दो सदिश - घटकों क्रमशः λं तथा μ इ में वियोजित कर दिया गया है । इस वििा का उपयोग करके हम किसी सदिश को उसी समतल के दो सदिश - घटकों में वियोजित कर सकते हैं । एकांकपरिमाण के सदिशों की सहायता से समकोण्िाक निदेर्शांक निकाय के अनुदिश किसी सदिश का वियोजन सुविधाजनक होता है ।ऐसे सदिशों को एकांक सदिश कहते हैं जिस पर अब हम परिचचार् करेंगे ।एकांक सदिश: एकांक सदिश वह सदिश होता है जिसकापरिमाण एक हो तथा जो किसी विशेष दिशा के अनुदिश हो ।न तो इसकी कोइर् विमा होती है और न ही कोइर् मात्राक । मात्रादिशा व्यक्त करने के लिए इसका उपयोग होता है । चित्रा 4ण्9ं में प्रदश्िर्ात एक ‘आयतीय निदेर्शांक निकाय’ की गए ल तथा ्र अक्षों के अनुदिश एकांक सदिशों को हम क्रमशः पÛएरÛतथा ाÛ द्वारा व्यक्त करते हैं । क्योंकि ये सभी एकांक सदिश हैं, इसलिए ÛÛ Ûद्यप द्यत्रद्यर द्यत्रद्या द्यत्र 1 ;4ण्9द्ध ये एकांक सदिश एक दूसरे के लंबवत् हैं । दूसरे सदिशोंसे इनकी अलग पहचान के लिए हमने इस पुस्तक में मोटे टाइप पए रए ा के उफपर एक वैफप ;‘द्ध लगा दिया है । क्यांेकि इसअध्याय में हम केवल द्विविमीय गति का ही अध्ययन कर रहेहैं अतः हमें केवल दो एकांक सदिशों की आवश्यकता होगी ।यदि किसी एकांक सदिश दÛको एक अदिश λ से गुणाकरें तो परिणामी एक सदिश λ दÛहोगा । सामान्यतया किसीसदिश । को निम्न प्रकार से व्यक्त कर सकते हैं:। त्र द्यद्यÛ ;4ण्10द्ध।द यहाँ । के अनुदिश दÛएकांक सदिश है । हम किसी सदिश । को एकांक सदिशों पÛतथा Ûर के पदों में वियोजित कर सकते हैं । मान लीजिए कि चित्रा ;4ण्9इद्ध के अनुसार सदिश । समतल ग.ल में स्िथत है । चित्रा 4ण्9;इद्ध के अनुसार । के शीषर् से हम निदेर्शांक अक्षों पर लंब खींचते हैं ।इससे हमें दो सदिश ।1 व ।2 इस प्रकार प्राप्त हैं कि ।1 ़ ।2 त्र । । क्योंकि ।1 एकांक सदिश पÛके समान्तर हैतथा ।2 एकांक सदिश Ûर के समान्तर है, अतः ।1 त्र ।ग पÛए ।2 त्र ।ल Ûर ;4ण्11द्ध यहाँ । तथा । वास्तविक संख्याएँ हैें ।गलइस प्रकार । त्र ।ग Ûप ़ ।ल Ûर ;4ण्12द्ध इसे चित्रा ;4ण्9बद्ध में दशार्या गया है । राश्िायों । व । को हमगल सदिश । के ग.व ल.घटक कहते हैं । यहाँ यह बात ध्यान देनेयोग्य है कि ।ग सदिश नहीं है, वरन् ।ग Ûप एक सदिश है । इसीप्रकार । Ûर एक सदिश है ।ल त्रिाकोणमिति का उपयोग करके । व । को । केगलपरिमाण तथा उसके द्वारा ग - अक्ष के साथ बनने वाले कोण θ के पदों में व्यक्त कर सकते हैं: । त्र । बवे θ ग।ल त्र । ेपद θ ;4ण्13द्ध समीकरण ;4.13द्ध से स्पष्ट है कि किसी सदिश का घटककोण θ पर निभर्र करता है तथा वह धनात्मक, ट्टणात्मक याशून्य हो सकता है ।किसी समतल में एक सदिश । को व्यक्त करने के लिएअब हमारे पास दो वििायाँ हैं:;पद्ध उसके परिमाण । तथा उसके द्वारा ग - अक्ष के साथ बनाएगए कोण θ द्वारा, अथवा;पपद्ध उसके घटकों ।ग तथा ।ल द्वारा ।यदि । तथा θ हमें ज्ञात हैं तो ।ग और ।ल का मान समीकरण ;4.13द्ध से ज्ञात किया जा सकता है । यदि । एवंग। ज्ञात हों तो । तथा θ का मान निम्न प्रकार से ज्ञात कियाल जा सकता है: । ।ग 2 ल 2़ । ।2 2 2 2 त्र ़बवे ेपद θ θ त्र ।2 अथवा । त्र । ।ग 2 ल 2़ ;4.14द्ध एवं जंद θ त्र । । ए ल ग θ जंद । । 1 ल ग त्र − ;4.15द्ध अभी तक इस वििा में हमने एक ;ग.लद्धसमतल मेंकिसी सदिश को उसके घटकों में वियोजित किया है किन्तु इसी चित्रा 4ण्9 ;ंद्ध एकांक सदिश पÛएरÛए ाÛअक्षों गए लए ्र के अनुदिश है, ;इद्ध किसी सदिश । को ग एवं ल अक्षों के अनुदिश घटकों ।1 तथा ।में वियोजित किया है, ;बद्ध ।तथा ।को Ûप तथा Ûर के पदों में व्यक्त किया है ।2 12 वििा द्वारा किसी सदिश । को तीन विमाओं में गए ल तथा ्र अक्षों के अनुदिश तीन घटकों में वियोजित किया जा सकता है ।यदि । व ग.ए ल.ए व ्र.अक्षों के मध्य कोण क्रमशःαए β तथा γ हो’ ;चित्रा 4ण्9कद्ध तो । त्र । बवे αए । त्र । बवे βए । त्र । बवे γ गल्र 4ण्16;ंद्ध ;कद्ध चित्रा 4ण्9;कद्ध सदिश । का गए ल एवं ्र .अक्षों के अनुदिश घटकों में वियोजन । सामान्य रूप से, ६६ ६ ;4ण्16इद्ध। । प । र । ा गल ्र सदिश । का परिमाण । ।2।2 ।2 ;4ण्16बद्धगल ्र होगा । एक स्िथति सदिश त को निम्नलिख्िात प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है: त त्र ग प ़ लर ़ ्र ा ;4ण्17द्ध यहां गए ल तथा ्र सदिश त के अक्षों ग.ए ल.ए ्र.के अनुदिशघटक हैं । 4.6 सदिशों का योग: विश्लेषणात्मक विध्ि यद्यपि सदिशों को जोड़ने की ग्रापफी विध्ि हमें सदिशों तथा उनकेपरिणामी सदिश को स्पष्ट रूप से समझने मंे सहायक होती है,परन्तु कभी - कभी यह विध्ि जटिल होती है और इसकी शु(ताभी सीमित होती है । भ्िान्न - भ्िान्न सदिशों को उनके संगत घटकोंको मिलाकर जोड़ना अध्िक आसान होता है। मान लीजिए किकिसी समतल मंे दो सदिश । तथा ठ हैं जिनके घटक क्रमशः । ए । तथा ठए ठहैं तोगल गल । त्र ।ग प ़ ।ल र ठ त्र ठग प ़ ठल र ;4ण्18द्ध मान लीजिए कि त् इनका योग है, तो त्त्र ।़ठ त्र; । प ़ । रद्ध़; ठ प ़ ठ रद्ध ;4ण्19द्धगल गल क्योंकि सदिश क्रमविनिमेय तथा साहचयर् नियमों का पालन करतेहैं, इसलिए समीकरण ;4.19द्ध मंे व्यक्त किए गए सदिशों कोनिम्न प्रकार से पुनः व्यवस्िथत कर सकते हैं: त् त्र; ।ग ़ ठग द्धप ़; ।ल ़ ठल द्ध र ;4ण्19ंद्ध क्योंकि त् त्र त्ग प ़ त्ल र ;4ण्20द्ध इसलिएत् त्र । ़ ठ ए त् त्र । ़ ठ ;4ण्21द्धगग गललल इस प्रकार परिणामी सदिश त् का प्रत्येक घटक सदिशों । और ठ के संगत घटकों के योग के बराबर होता है ।तीन विमाओं के लिए सदिशों । और ठ को हम निम्नप्रकार से व्यक्त करते हैं: । त्र । प ़ । र ़ । ागल्र ठ त्र ठ प ़ ठ र ़ ठ ागल्र त् त्र । ़ ठ त्र त् प ़ त् र ़ त् ागल्र जहाँ घटकों त्गए त्ल तथा त््र के मान निम्न प्रकार से हैंःत् त्र । ़ ठ गग गत् त्र । ़ ठ लल लत््र त्र ।्र ़ ठ्र ;4ण्22द्ध इस विध्ि को अनेक सदिशों वफो जोड़ने व घटाने के लिएउपयोग मंे ला सकते हैं । उदाहरणाथर्, यदि ंए इ तथा ब तीनों सदिश निम्न प्रकार से दिए गए हों: ं त्र ं प ़ ं र ़ ं ागल्र इ त्र इ प ़ इ र ़ इ ागल ्र ब त्र ब प ़ ब र ़ ब ा ;4ण्23ंद्धगल्र तो सदिश ज् त्र ं ़ इ √ ब के घटक निम्नलिख्िात होंगेः ज् त्र ं ़ इ √ ब गग गगज् त्र ं ़ इ √ ब लल ललज् त्र ं़ इ √ ब ;4ण्23इद्ध्र्र ्र्र ¯ उदाहरण 4.2 चित्रा 4.10 मंे दिखाए गए दो सदिशों । तथा ठ के बीच का कोण θ है । इनके परिणामी सदिश का परिमाण तथा दिशा उनके परिमाणों तथा θ के पद में निकालिए । ’ इस बात पर ध्यान दीजिए कि αए βए व γ कोण दिव्फस्थान मंे हैं । ये ऐसी दो रेखाओं के बीच के कोण हैं जो एक समतल मंे नहीं हैं । चित्रा 4ण्10 हल चित्रा 4.10 के अनुसार मान लीजिए कि व्च् तथा व्फ दो सदिशों । तथा ठ को व्यक्त करते हैं, जिनके बीच काकोण θ है । तब सदिश योग के समान्तर चतुर्भुज नियम द्वारा हमेंपरिणामी सदिश त् प्राप्त होगा जिसे चित्रा में व्ै द्वारा दिखायागया है । इस प्रकारत् त्र । ़ ठ चित्रा मंे ैछए व्च् के लंबवत् है तथा च्डए व्ै के लंबवत् है । ∴ व्ै2त्र व्छ2 ़ ैछ2 किन्तु व्छ त्र व्च् ़ च्छ त्र । ़ ठ बवे θ ैछ त्र ठ ेपद θ व्ै2 त्र ;।़ठ बवे θद्ध2 ़ ;ठ ेपद θद्ध2 अथवा त्2 त्र ।2 ़ ठ2 ़ 2।ठ बवे θ त् त्र ।2 ़ ठ2 ़ 2।ठ बवे θ ;4ण्24ंद्ध त्रिाभुज व्ैछ मंे, ैछ त्र व्ै ेपद α त्र त् ेपद α एवं त्रिाभुज च्ैछ मंे, ैछ त्र च्ै ेपद θ त्र ठ ेपद θ अतएव त् ेपद α त्र ठ ेपद θ अथवा त् त्र ठ ;4ण्24इद्धेपदθ ेपद α इसी प्रकार, च्ड त्र । ेपद α त्र ठ ेपद β ।ठ त्रअथवा ;4ण्24बद्धेपदβ ेपद α समीकरणों ;4ण्24इद्ध तथा ;4ण्24बद्ध से हमें प्राप्त होता है - त्। ठ त्रत्र ;4ण्24कद्धेपदθ ेपद β ेपद α समीकरण ;4ण्24कद्ध के द्वारा हम निम्नांकित सूत्रा प्राप्त करते हैं - ठ ेपद αत्र ेपद θ ;4ण्24मद्धत् यहाँ त् का मान समीकरण ;4ण्24ंद्ध मंे दिया गया है । ैछ ठ ेपद या, जंद ;4ण्24द्धिव्च्च्छ ।ठ बवे समीकरण ;4ण्24ंद्ध से परिणामी त् का परिमाण तथा समीकरण ;4ण्24मद्ध से इसकी दिशा मालूम की जा सकती है । समीकरण ;4ण्24ंद्ध को कोज्या - नियम तथा समीकरण ;4ण्24कद्ध को ज्या - नियम कहते हैं । फ् ऽ उदाहरण 4.3 एक मोटरबोट उत्तर दिशा की ओर 25 ाउध्ी के वेग से गतिमान है । इस क्षेत्रा मंे जल - धरा का वेग 10 ाउध्ी है । जल - धरा की दिशा दक्ष्िाण से पूवर् की ओर 60॰ पर है । मोटरबोट का परिणामी वेग निकालिए । हल चित्रा 4.11 मंे सदिश अमोटरबोट के वेग को तथा अ जलइ ब धरा के वेग को व्यक्त करते हैं । प्रश्न के अनुसार चित्रा में इनकीदिशायें दशार्इर् गइर् हैं । सदिश योग के समांतर चतुभर्ुज नियम के अनुसार प्राप्त परिणामी त् की दिशा चित्रा मंे दशार्इर् चित्रा 4ण्11 गइर् है । कोज्या - नियम का उपयोग करके हम त् का परिमाण निकाल सकते हैं । 22 ंत् त्र अ ़ अ ़ 2अअ बवे120 इब इब त्र 252 ़102 ़ 2 × 25 ×10;.1ध्2 द्ध≅ 22 ाउध्ी त् की दिशा ज्ञात करने के लिए हम ‘ज्या - नियम’ का उपयोग करते हैं - - त्अब अबत्र याए ेपद φत्र ेपद θ ेपदθ ेपद φ त् 10 × ेपद120 ं 10 3 त्र त्र≅ 0ण्397 21ण्8 2 × 21ण्8 φ≅ 23ण्4ं ऽ 4.7 किसी समतल मंे गति इस खण्ड में हम सदिशों का उपयोग कर दो या तीन विमाओं में गति का वणर्न करेंगे । 4.7.1 स्िथति सदिश तथा विस्थापन किसी समतल में स्िथत कण च् का ग.ल निदेर्शतंत्रा के मूल बिंदु के सापेक्ष स्िथति सदिश त ख्चित्रा ;4ण्12द्ध, को निम्नलिख्िात समीकरण से व्यक्त करते हैं: त त्र ग प‘ ़ ल र‘ यहाँ ग तथा ल अक्षों ग - तथा ल - के अनुदिश त के घटक हैं । इन्हें हम कण के निदर्ेशांक भी कह सकते हैं । मान लीजिए कि चित्रा ;4ण्12इद्ध के अनुसार कोइर् कण मोटी रेखासे व्यक्त वक्र के अनुदिश चलता है । किसी क्षण ज पर इसकीस्िथति च् है तथा दूसरे अन्य क्षण जश् पर इसकी स्िथति च्श् है । कण के विस्थापन को हम निम्नलिख्िात प्रकार से लिखेंगे, Δत त्र तश् √ त ;4ण्25द्ध इसकी दिशा च् से च्श् की ओर है । ;ंद्ध ;इद्ध चित्रा 4ण्12 ;ंद्ध स्िथति सदिश तए ;इद्ध विस्थापन Δत तथा कण का औसत वेग ऋअ समीकरण ;4ण्25द्ध को हम सदिशों के घटक के रूप मंेनिम्नंाकित प्रकार से व्यक्त करेंगे, Δत त्र; गश् प ़ लश् रद्ध−; ग प ़ ल रद्ध त्र पΔग ़ रΔ ल यहाँ Δग त्र ग ′ √ गए Δल त्र ल′ √ ल ;4ण्26द्ध वेग वस्तु के विस्थापन और संगत समय अंतराल के अनुपात को हम औसत वेग ;अद्ध कहते हैं, अतः ÛÛΔ त Δग प़Δ लर Δग ΔलÛÛअ त्रत्र त्र प ़ र ;4ण्27द्धΔज Δज Δज Δज क्तअथवा, अअग प६ अल र Δत क्योंकि अ त्र , इसलिए चित्रा ;4ण्12द्ध के अनुसार औसत वेगΔज की दिशा वही होगी, जो Δत की है । गतिमान वस्तु का वेग ;तात्क्षण्िाक वेगद्ध अति सूक्ष्म समयान्तराल ;Δज→0 की सीमा मंेद्धविस्थापन Δत का समय अन्तराल Δज से अनुपात है । इसे हम अ से व्यक्त करेंगे, अतः Δत कत अ त्र सपउ त्र ;4ण्28द्धΔज →0 Δज कज चित्रों 4ण्13;ंद्ध से लेकर 4ण्13;कद्ध की सहायता से इस सीमान्तप्रक्रम को आसानी से समझा जा सकता है । इन चित्रों मंे मोटी रेखा उस पथ को दशार्ती है जिस पर कोइर् वस्तु क्षण ज पर बिंदु च् से चलना प्रारम्भ करती है । वस्तु की स्िथति Δज ए Δज ए Δज ए123समयों के उपरांत क्रमशः च्ए च्ए च्ए से व्यक्त होती है । इन123समयों मंे कण का विस्थापन व्रफमशः Δत ए Δत ए Δत ए है । चित्रों123;ंद्धए ;इद्ध तथा ;बद्ध में क्रमशः घटते हुए Δज के मानों अथार्त् Δज ए1Δज ए Δज ए ;Δज झ Δज झ Δज द्ध के लिए कण के औसत वेग अ की 23123दिशा को दिखाया गया है । जैसे ही Δ ज →0 तो Δत→0 एवं Δत पथ की स्पशर् रेखा के अनुदिश हो जाता है ;चित्रा 4ण्13कद्ध। इस प्रकार पथ के किसी बिंदु पर वेग उस बिंदु पर खींची गइर् स्पशर् रेखा द्वारा व्यक्त होता है जिसकी दिशा वस्तु की गति के अनुदिश होती है। सुविधा के लिए अ वफो हम प्रायः घटक के रूप मंे निम्नलिख्िात प्रकार से व्यक्त करते हैं: कत अ त्र कज ⎛Δग Δल ⎞ त्र सपउ ⎜ प ़ र⎟ ;4ण्29द्धΔज →0⎝Δज Δज ⎠ Δग Δल त्र प सपउ ़ र सपउ Δज→ 0 Δज Δज →0 Δज चित्रा 4.13 जैसे ही समय अंतराल Δज शून्य की सीमा को स्पशर् कर लेता है, औसत वेग अ - वस्तु के वेग अ के बराबर हो जाता है । अ की दिशा किसी क्षण पथ पर स्पशर् रेखा के समांतर है। कग कलया, अपत्ऱ र त्र अ प़ अ रण्गलकज कज कग कलयहाँ अ त्र एअ त्र ;4ण्30ंद्धगलकज कज अतः यदि समय के पफलन के रूप में हमें निदेर्शांक ग और ल ज्ञात हैं तो हम उपरोक्त समीकरणों का उपयोग अ औरअ निकालनेगलमें कर सकते हैं । सदिश अ का परिमाण निम्नलिख्िात होगा, 22 अ त्र अग ़ अल ;4ण्30इद्ध तथा इसकी दिशा कोण θ द्वारा निम्न प्रकार से व्यक्त होगी: अ ⎛ अ ⎞ ल −1 लजंदθत्र ए θत्र जंद ⎜⎟ ⎜⎟ ;4ण्30बद्धअग ⎝ अग ⎠ चित्रा 4.14 वेग अ के घटक अए अ तथा कोण θ जो ग.अक्ष सेगलबनाता है । चित्रा में अग त्र अ बवे θए अल त्र अ ेपद θ त्वरण ऋग.ल समतल में गतिमान वस्तु का औसत त्वरण ;ंद्ध उसके वेग में परिवतर्न तथा संगत समय अंतराल Δज के अनुपात के बराबर होता है: प़ अ ΔΔअ Δ; अग लरद्धΔअ अलग ंत्रत्र त्र प़ र;4ण्31ंद्धΔज Δज Δज Δज अथवा ंत्र ंगप़ ंल रण् ;4ण्31इद्ध त्वरण;तात्क्षण्िाक त्वरणद्ध औसत त्वरण के सीमान्त मान के बराबर होता है जब समय अंतराल शून्य हो जाता है: Δ अ ंत्र सपउ ;4ण्32ंद्ध Δज → 0Δज क्योंकि Δअ त्र $पΔअ ़ $रΔअए इसलिएग लΔअ Δअल ंपसपउ ़ रत्र ग सपउ Δ ज → 0 Δज Δज → 0 Δ ज अथवा ं त्र $प ं ग ़ र$ंल ;4ण्32इद्ध कअ कअ गल गलजहाँ ं त्र ए ं त्र ;4ण्32बद्ध’ कज कज वेग की भाँति यहाँ भी वस्तु के पथ को प्रदश्िार्त करने वाले किसी आलेख में त्वरण की परिभाषा के लिए हम ग्रापफी विध्ि से सीमान्त प्रक्रम को समझ सकते हैं । इसे चित्रों ;4.15ंद्ध से ;4.15कद्ध तक में समझाया गया है । किसी क्षण ज पर कण की स्िथति बिंदु च् द्वारा दशार्इर् गइर् है । Δज1ए Δज2ए Δजए ;ΔजझΔजझΔजद्ध समय के3123बाद कण की स्िथति क्रमशः बिंदुओं च्ए च्ए च् द्वारा व्यक्त की123’ ग व ल के पदों में ंग तथा ंल को हम निम्न प्रकार से व्यक्त करते हैं: क ⎛ कग ⎞ क2 ग क ⎛ क ल ⎞ क2 लंग त्र⎜ ⎟त्र ए ंल त्र⎜ ⎟त्र कज कज 2कज कज 2⎝⎠ कज ⎝⎠ क ज चित्रा 4.15 तीन समय अंतरालों ;ंद्ध Δज1ए ;इद्ध Δज2ए ;बद्ध Δज3ए ;Δज1झΔज2त्वरण वस्तु के त्वरण के बराबर होता है । गइर् है । चित्रों ;4.15द्ध ंए इ और ब में इन सभी बिंदुओं च्ए च्ए च्ए च् पर वेग सदिशों को भी दिखाया गया है। प्रत्येक Δज 123के लिए सदिश योग के त्रिाभुज नियम का उपयोग करके Δअ का मान निकालते हैं । परिभाषा के अनुसार औसत त्वरण की दिशा वही है जो Δअ की होती है । हम देखते हैं कि जैसे - जैसे Δज का मान घटता जाता है वैसे - वैसे Δअ की दिशा भी बदलती जाती है और इसके परिणामस्वरूप त्वरण की भी दिशा बदलती है । अंततः Δज →0 सीमा में ;चित्रा 4.15कद्ध औसत त्वरण, तात्क्षण्िाक त्वरण के बराबर हो जाता है और इसकी दिशा चित्रा में दशार्ए अनुसार होती है । ध्यान दें कि एक विमा में वस्तु का वेग एवं त्वरण सदैव एक सरल रेखा में होते हैं ;वे या तो एक ही दिशा में होते हैं अथवा विपरीत दिशा मेंद्ध । परंतु दो या तीन विमाओं में गति के लिए वेग एवं त्वरण सदिशों के बीच 0॰ से 180॰ के बीच कोइर् भी कोण हो सकता है। ¯ उदाहरण 4.4 किसी कण की स्िथति त त्र 3ण्0 ज$प ़ 2ण्0 ज 2$र ़ 5ण्0 $ा है । जहां ज सेकंड में व्यक्त किया गया है । अन्य गुणकों केमात्राक इस प्रकार हैं कि त मीटर में व्यक्त हो जाएँ। ;ंद्ध कण का अ;जद्ध व ं;जद्ध ज्ञात कीजिएऋ ;इद्ध ज त्र 1ण्0 े पर अ;जद्ध का परिमाण व दिशा ज्ञात कीजिए ।कत कहल अ;जद्ध त्र त्र ;3ण्0 जप$़ 2ण्0 ज2$ऱ 5ण्0ा$द्धकज कज त्र 3ण्0 $प ़ 4ण्0 ज$र कअं;जद्ध त्र कज त्र 4ण्0 $र ं त्र 4ण्0 उ े√2 ल.दिशा में ज त्र 1ण्0 े पर अ त्र 3ण्0$प ़ 4ण्0$र झΔज3द्ध के लिए औसत त्वरण ं ;कद्धΔज→0 सीमा के अंतगर्त औसत 22 .1इसका परिमाण अत्र 3 4 5ण्0 उे है, तथा ⎛⎞अ − 4.1 ल 1 ⎛⎞ ° θत्र जंद त्रजंद ≅53इसकी दिशा ⎜⎟ ⎜⎟फ्अग ⎝⎠3⎝⎠ 4.8 किसी समतल में एकसमान त्वरण से गति मान लीजिए कि कोइर् वस्तु एक समतल ग.ल में एक समान त्वरण ं से गति कर रही है अथार्त् ं का मान नियत है । किसी समय अंतराल में औसत त्वरण इस स्िथर त्वरण के मान ं के बराबर होगा ं त्र ं । अब मान लीजिए किसी क्षण ज त्र 0 पर वस्तु का वेग अ तथा दूसरे अन्य क्षण ज पर उसका0वेग अ है । तब परिभाषा के अनुसार अ −अ0 अ −अ0 ं त्र त्र ज −0 ज अथवा अ त्र अ0 ़ ं ज ;4ण्33ंद्ध उपयर्ुक्त समीकरण को सदिशों के घटक के रूप में निम्नलिख्िात प्रकार से व्यक्त करते हैं - अ त्र अ़ंज ग0गग अल त्र अ0ल ़ ंलज ;4ण्33इद्ध अब हम देखंेगे कि समय के साथ स्िथति सदिश त किस प्रकारबदलता है । यहाँ एकविमीय गति के लिए बताइर् गइर् विध्ि का उपयोग करेंगे । मान लीजिए कि ज त्र 0 तथा ज त्र ज क्षणों परकण के स्िथति के सदिश क्रमशः त तथा त हैं तथा इन क्षणों0 पर कण के वेग अ तथा अ हैं । तब समय अंतराल ज √ 0 त्र ज0में कण का औसत वेग ;अ ़ अद्धध्2 तथा विस्थापन त √ त होगा । व 0क्योंकि विस्थापन औसत तथा समय अंतराल का गुणनपफल होता है, अथार्त् अअ अंज अ00 0 तत ज ज0 22 1 त्र अ0 ़ ंज2 2 अतएव, तत अत्ऱ ज ़ 1 ंज2 ;4ण्34ंद्ध00 2 यह बात आसानी से सत्यापित की जा सकती है कि समीकरण ;4.34ंद्धका अवकलन ककतज समीकरण ;4ण्33ंद्ध है तथा साथ ही ज त्र 0 क्षण पर त त्र त0 की शतर् को भी पूरी करता है । समीकरण;4ण्34ंद्ध को घटकों के रूप में निम्नलिख्िात प्रकार से व्यक्त कर सकते हैं: 1 ज2ग त्र ग ़ अज ़ ं0वग ग2 1 ल त्र ल ़ अज ़ ंज2 ;4ण्34इद्ध0वल ल2 समीकरण ;4ण्34इद्ध की सीध्ी व्याख्या यह है कि ग व ल दिशाओं में गतियाँ एक दूसरे पर निभर्र नहीं करती हैं । अथार्त्, किसी समतल ;दो विमाद्ध में गति को दो अलग - अलग समकालिक एकविमीय एकसमान त्वरित गतियों के रूप मेें समझ सकते हैं जो परस्पर लंबवत् दिशाओं के अनुदिश हों। यह महत्वपूणर् परिणाम है जो दो विमाओं में वस्तु की गति के विश्लेषण में उपयोगी होता है । यहाँ परिणाम त्रिाविमीय गति के लिए भी है । बहुत - सी भौतिक स्िथतियों में दो लंबवत् दिशाओं का चुनाव सुविधजनक होता है जैसा कि हम प्रक्षेप्य गति के लिए खण्ड ;4.10द्ध में देखेंगे । ¯ उदाहरण 4.5 ज त्र 0 क्षण पर कोइर् कण मूल बिंदु से 5.0$पउध्ेके वेग से चलना शुरू करता है । ग . ल समतल में उस पर एक ऐसा बल लगता है जो उसमें एकसमान त्वरण ;3ण्0$प ़ 2ण्0$रद्धउध्े2 उत्पन्न करता है । ;ंद्ध जिस क्षण पर कण का ग निदेर्शांक 84 उ हो उस क्षण उसका ल निदेर्शांक कितना होगा ? ;इद्ध इस क्षण कण की चाल क्या होगी? हल प्रश्नानुसार कण की स्िथति निम्नांकित समीकरण से व्यक्त होगी, 1 त;जद्ध त्र अ0 ज ़ ं ज2 2 त्र 5ण्0$प ज ़ 1 ;3ण्0$प ़ 2ण्0र$द्धज2 2 त्र ;5ण्0ज ़ 1ण्5ज2द्ध$प ़ 1ण्0ज2$र अतएव, ग;जद्ध त्र 5ण्0 ज ़ 1ण्5 ज2 ल;जद्ध त्र 1ण्0 ज2 जब ग;जद्ध त्र 84 उ तब ज त्र घ् ∴ 84 त्र 5ण्0 ज ़ 1ण्5 ज2 हल करने पर ज त्र 6ण्0 े पर ल त्र 1ण्0;6द्ध2 त्र 36ण्0 उ कत ६६अ 5ण्0 3ण्0ज प2ण्0ज रकज ज त्र 6 े के लिए, अ त्र 23ण्0$प ़ 12ण्0$र 22 1अ 23 12 26 उ े फ्अतः कण की चाल, 4.9 दो विमाओं में आपेक्ष्िाक वेग खण्ड 3.7 में किसी सरल रेखा के अनुदिश जिस आपेक्ष्िाक वेगकी धरणा से हम परिचित हुए हैं, उसे किसी समतल में या त्रिाविमीय गति के लिए आसानी से विस्तारित कर सकते हैं ।माना कि दो वस्तुएँ । व ठ वेगों अ तथा अ से गतिमान हैं।ठ;प्रत्येक गति किसी सामान्य निदेर्श तंत्रा जैसे ध्रती के सापेक्ष हैद्ध।अतः वस्तु । का ठ के सापेक्ष वेग: अत्र अ√ अ ;4ण्35ंद्ध।ठ। ठ होगा । इसी प्रकार, वस्तु ठ का । के सापेक्ष वेग निम्न होगा: अ त्र अ √ अ ठ। ठ । अतएव, अत्र √ अ ;4ण्35इद्ध।ठठ। तथा द्यअ द्य त्र द्यअ द्य ;4ण्35बद्ध।ठठ।¯ उदाहरण 4.6: उफध्वार्ध्र दिशा में 35 उ े√1 की चाल से वषार् हो रही है । कोइर् महिला पूवर् से पश्िचम दिशा में 12 उ े√1 की चाल से साइकिल चला रही है । वषार् से बचने के लिए उसे छाता किस दिशा में लगाना चाहिए ? हल चित्रा 4.16 में अ वषार् के वेग को तथा अ महिला द्वारात इचलाइर् जा रही साइकिल के वेग को व्यक्त करते हैं । ये दोनोंवेग ध्रती के सापेक्ष हैं । क्योंकि महिला साइकिल चला रही हैइसलिए वषार् के जिस वेग का उसे आभास होगा वह साइकिलके सापेक्ष वषार् का वेग होगा । अथार्त् अ त्र अ .अतइतइ चित्रा 4.16 के अनुसार यह सापेक्ष वेग सदिश उफध्वार्ध्र से θ कोण बनाएगा जिसका मान जंद θत्र अइ त्र 12 त्र 0ण्343 अ 35त होगा । अथार्त् θ ≅ 190 चित्रा 4.16 अतः महिला को अपना छाता उफध्वार्ध्र दिशा से 190 का कोण बनाते हुए पश्िचम की ओर रखना चाहिए । आप इस प्रश्न तथा उदाहरण4.1 वेतरपरध्यान दीजिए।फअंउदाहरण 4.1 में बालक को दो वेगों के परिणामी ;सदिश योगद्ध का आभास होता है जबकि इस उदाहरण में महिला को साइकिल के सापेक्ष वषार् के वेग ;दोनों वेगांेके सदिश अंतरद्ध का आभास होता है । फ् 4.10 प्रक्षेप्य गति इससे पहले खण्ड में हमने जो विचार विकसित किए हैं, उदाहरणस्वरूप उनका उपयोग हम प्रक्षेप्य की गति के अध्ययन के लिए करेंगे । जब कोइर् वस्तु उछालने के बाद उड़ान में हो या प्रक्षेपित की गइर् हो तो उसे प्रक्षेप्य कहते हैं । ऐसा प्रक्षेप्य पुफटबाॅल, िकेट की बाॅल, बेस - बाॅल या अन्य कोइर् भी वस्तु हो सकती है । किसी प्रक्षेप्य की गति को दो अलग - अलग समकालिक गतियों के घटक के परिणाम के रूप में लिया जा सकता है । इनमें से एक घटक बिना किसी त्वरण के क्षैतिज दिशा में होता है तथा दूसरा गुरुत्वीय बल के कारण एकसमान त्वरण से उफध्वार्ध्र दिशा में होता है । सवर्प्रथम गैलीलियो ने अपने लेख डायलाॅग आन दि गे्रट वल्डर् सिस्टम्स ;1632द्ध में प्रक्षेप्य गति के क्षैतिज एवं उफध्वार्ध्रघटकों की स्वतंत्रा प्रकृति का उल्लेख किया था । इस अध्ययन में हम यह मानेंगे कि प्रक्षेप्य की गति पर वायु का प्रतिरोध् नगण्य प्रभाव डालता है । माना कि प्रक्षेप्य को ऐसी दिशा की ओर अ वेग से पेंफका गया है जो ग.अक्ष से0;चित्रा 4.17 के अनुसारद्ध θकोण बनाता है ।0 पेंफकी गइर् वस्तु को प्रक्षेपित करने के बाद उस पर गुरुत्व के कारणलगने वाले त्वरण की दिशा नीचे की ओर होती है: ं त्र √ह$र अथार्त् ंग त्र 0ए तथा ंल त्र √ह ;4ण्36द्ध चित्रा 4.17 अवेग से θकोण पर प्रक्षेपित किसी वस्तु की गति ।00 प्रारंम्िभक वेग अ के घटक निम्न प्रकार होंगे:0 अवग त्र अ0 बवे θ0 अवल त्र अ0 ेपद θ0 ;4ण्37द्ध यदि चित्रा 4.17 के अनुसार वस्तु की प्रारंभ्िाक स्िथति निदेर्श तंत्राके मूल बिंदु पर हो, तो ग0 त्र 0ए ल0 त्र 0 इस प्रकार समीकरण ;4.34इद्ध को निम्न प्रकार से लिखेंगे: ग त्र अज त्र ;अ बवे θ द्धज वग 0 0तथा, ल त्र ;अ ेपद θ द्ध ज √ 1 हज2 ;4ण्38द्ध0 02 समीकरण ;4.33इद्ध का उपयोग करके किसी समय ज के लिए वेग के घटकों को नीचे लिखे गए समीकरणों से व्यक्त करेंगे: अ त्र अ त्र अबवे θगवग0 0 अल त्र अ0 ेपद θ0 √ हज ;4ण्39द्ध समीकरण ;4.38द्ध से हमें किसी क्षण ज पर प्रारंभ्िाक वेग अ0 तथा प्रक्षेप्य कोण θ के पदों में प्रक्षेप्य के निदेर्शांक ग.और0 ल.प्राप्त हो जाएँगे । इस बात पर ध्यान दीजिए कि ग व ल दिशाओं के परस्पर लंबवत् होने के चुनाव से प्रक्षेप्य गति के विश्लेषण में पयार्प्त सरलता हो गइर् है । वेग के दो घटकों में से एक ग.घटक गति की पूरी अवध्ि में स्िथर रहता है जबकि दूसरा ल.घटक इस प्रकार परिवतिर्त होता है मानो प्रक्षेप्य स्वतंत्रातापूवर्क नीचे गिर रहा हो । चित्रा 4.18 में विभ्िान्न क्षणों के लिए इसे आलेखी विध्ि से दशार्या गया है । ध्यान दीजिए कि अध्िकतम उँफचाइर् वाले बिंदु के लिए अ त्र 0 तथा ल−1 अलθत्र जंद त्र 0 अग प्रक्षेपक के पथ का समीकरण प्रक्षेप्य द्वारा चले गए पथ की आकृति क्या होती है ? इसके लिए हमें पथ का समीकरण निकालना होगा । समीकरण ;4.38द्ध मेंदिए गए ग व ल व्यंजकों से ज को विलुप्त करने से निम्नलिख्िात समीकरण प्राप्त होता है: ह लत्र;जंद θवद्ध ग− ग 2 2 ;4ण्40द्ध2;अबवेθद्धवव यह प्रक्षेप्य के पथ का समीकरण है और इसे चित्रा 4.18 में दिखायागया है । क्योंकि हए θ तथा अ अचर हैं, समीकरण ;4.40द्ध00को निम्न प्रकार से व्यक्त कर सकते हैं: ल त्र ंग ़ इग2 इसमें ं तथा इ नियतांक हैं । यह एक परवलय का समीकरण है, अथार्त् प्रक्षेप्य का पथ परवलयिक होता है । चित्रा 4.18 प्रक्षेप्य का पथ परवलयाकार होता है । अध्िकतम उँफचाइर् का समय प्रक्षेप्य अध्िकतम उँफचाइर् तक पहँुचने के लिए कितना समय लेताहै? मान लीजिए कि यह समय जउ है । क्योंकि इस बिंदु पर अ ल त्र 0 इसलिए समीकरण ;4.39द्ध से हम ज का मान निकाल सकतेउ हैं: अ ल त्र अ0 ेपद θ0 √ हजउ त्र 0 अथवा जउ त्र अव ेपदθ व ध्ह ;4ण्41ंद्ध प्रक्षेप्य की उड़ान की अवध्ि में लगा वुफल समय ज् हमिसमीकरण ;4.38द्ध में ल त्र 0 रखकर निकाल लेते हैं । इसलिए, ज् ित्र 2 ;अव ेपद θ व द्धध्ह ;4ण्41इद्ध ज् को प्रक्षेप्य का उड्डयन काल कहते हैं । यह ध्यान देने कीिबात है कि ज् त्र 2ज । पथ की सममिति से हम ऐसे ही परिणामउि की आशा करते हैं । प्रक्षेप्य की अध्िकतम उँफचाइर् समीकरण ;4.38द्ध में जत्र ज रखकर प्रक्षेप्य द्वारा प्राप्त अध्िकतमउ उँफचाइर् ी की गणना की जा सकती है ।उ ⎛ ⎞⎛ ⎞अ ेपदθ हअेपदθ 2 0 0 0 0 लीत्र उ त्र;अ0ेपदθ 0द्ध⎜⎜ ⎟⎟− ⎜⎜ ⎟⎟⎝ ह ⎠ 2⎝ ह ⎠ 2; अेपदθद्धया ी त्र 0 0 ;4ण्42द्धउ 2हप्रक्षेप्य का क्षैतिज परासप्रारंभ्िाक स्िथति ;ग त्र ल त्र 0द्ध से चलकर उस स्िथति तक जब ल त्र 0 हो प्रक्षेप्य द्वारा चली गइर् दूरी को क्षैतिज परास, त्ए कहतेहैं। क्षैतिज परास उड्डयन काल ज् में चली गइर् दूरी है । इसलिए,िपरास त् होगा: त् त्र ;अ0बवे θ0द्ध;ज्द्धित्र;अ बवे θ द्ध ;2 अ ेपद θ द्धध्हवववव2 अ ेपद 2θ00 त्रअथवा त् ;4ण्43द्ध ह समीकरण ;4.43द्ध से स्पष्ट है कि किसी प्रक्षेप्य के वेग अलिए त् अध्िकतम तब होगा जब θ त्र 450 क्योंकि0 0ेपद 900 त्र 1 ;जो ेपद 2θ का अध्िकतम मान हैद्ध । इस प्रकार0अध्िकतम क्षैतिज परास होगा 2 अ0त्उ त्र ;4ण्43ंद्ध ह ¯ उदाहरण 4.7: गैलीलियो ने अपनी पुस्तक फ्टू न्यू साइंसेशय् में कहा है कि फ्उन उन्नयनों के लिए जिनके मान 45॰ से बराबर मात्रा द्वारा अध्िक या कम हैं, क्षैतिज परास बराबर होते हैंय् । इस कथन को सि( कीजिए । हल यदि कोइर् प्रक्षेप्य θकोण पर प्रांरभ्िाक वेग असे पेंफका0 0 जाए, तो उसका परास अ2 ेपद2 त् 00 होगा।हअब कोणों ;450 $ αद्ध तथा ;450 - αद्ध के लिए 2θ का मान क्रमशः ;900 $ 2αद्ध तथा ;900 - 2αद्ध होगा ।ेपद;900 ़ 2αद्ध तथा ेपद;900 √ 2αद्ध दोनों का मान समान अथार्त् बवे 2α होता है । अतः उन उन्नयनों के लिए जिनके मान 450 से बराबर मात्रा द्वारा कम या अध्िक हैं, क्षैतिज परास बराबर होते हैं । फ् ¯उदाहरण 4.8: एक पैदल यात्राी किसी खड़ी चट्टðान केकोने पर खड़ा है । चट्टðान जमीन से 490 उ उंफची है । वह एक पत्थर को क्षैतिज दिशा में15 उ े√1 की आरंभ्िाकचाल से पेंफकता है । वायु के प्रतिरोध् को नगण्य मानते हुए यह ज्ञात कीजिए कि पत्थर को जमीन तक पहुँचने मेंकितना समय लगा तथा जमीन से टकराते समय उसकीचाल कितनी थी? ;ह त्र 9ण्8 उ े√2द्ध। हल हम खड़ी चट्टðान के कोने को ग.तथा ल.अक्ष का मूलबिंदु तथा पत्थर पेंफके जाने के समय को ज त्र 0 मानेंगे । ग.अक्षकी ध्नात्मक दिशा आरंभ्िाक वेग के अनुदिश तथा ल.अक्ष कीध्नात्मक दिशा उफध्वार्ध्र उफपर की ओर चुनते हैं । जैसा कि हम पहले कह चुके हैं कि गति के ग.व ल.घटक एक दूसरे पर निभर्रनहीं करते, इसलिए ग;जद्ध त्र ग0 ़ अवग ज ल;जद्ध त्र ल0 ़ अवल ज ़ ;1ध्2द्ध ंल ज2 यहाँ ग त्र लत्र 0ए अ त्र 0ए ं त्र √ह त्र √9ण्8 उ े.2 वव वलल अ त्र 15 उ े.1ण् वग पत्थर उस समय जमीन से टकराता है जब ल;जद्ध त्र √ 490 उ ∴ √ 490 उ त्र √ ;1ध्2द्ध ;9ण्8द्धज2 अथार्त् ज त्र 10 े वेग घटक अ त्र अ तथा अ त्र अ √हज होंगे ।ग वग ल वलअतः, जब पत्थर जमीन से टकराता है, तब अ त्र 15 उ े√1 वगअ त्र 0 √ 9ण्8 10 त्र √98 उ े√1 वलइसलिए पत्थर की चाल 22 22 −1अग ़ अल त्र 15 ़ 98 त्र99उ े होगी । फ् ¯ उदाहरण 4.9 रू क्षैतिज से उफपर की ओर 30॰ का कोण बनाते हुए एक िकेट गेंद 28 उ े√1 की चाल से पेंफकी जाती है । ;ंद्ध अध्िकतम उँफचाइर् की गणना कीजिए, ;इद्ध उसी स्तर पर वापस पहुँचने में लगे समय की गणना कीजिए, तथा ;बद्ध पेंफकने वाले बिंदु से उस बिंदु की दूरी जहाँ गेंद उसी स्तर पर पहुँची है, की गणना कीजिए । हल ;ंद्ध अध्िकतम उँफचाइर् ;अ0ेपद θ0द्ध2 ;28 ेपद 300द्ध2 ी त्र त्र उ उ2 ह 2;9ण्8द्ध त्र 10ण्0 उ होगी । ;इद्ध उसी ध्रातल पर वापस आने में लगा समय ज् त्र ;2 अ ेपद θ द्धध्ह त्र ;2 28 ेपद 30° द्धध्9ण्8िवव त्र 28ध्9ण्8 े त्र 2ण्9 े होगा । ;बद्ध पेंफकने वाले बिंदु से उस बिंदु की दूरी जहाँ गेंद उसी स्तर पर पहँुचती हैः 2 वअ ेपद2 व व 28 28 ेपद60त् 69 उ होगी।ह9ण्8 फ् वायु प्रतिरोध् की उपेक्षा करना - इस अभ्िाधरणा का वास्तविक अथर् क्या है? प्रक्षेप्य गति के विषय में बात करते समय, हमने कहा है, कि हमने यह मान रखा है, कि वायु के प्रतिरोध् का प्रक्षेप्य की गति पर कोइर् प्रभाव नहीं होता। आपको यह समझना चाहिए, कि इस कथन का वास्तविक अथर् क्या है? घषर्ण, श्यानता बल, वायु प्रतिरोध् ये सभी क्षयकारी बल हैं। गति का विरोध् करते ऐसे बलों की उपस्िथति केकारण गतिमान ¯पड की मूल ऊजार्, और परिणामतः इसके संवेग, में कमी आएगी। अतः अपने परवलयाकार पथ पर गतिमान कोइर् प्रक्षेप्य वायु प्रतिरोध् की उपस्िथति में निश्िचत रूप से, अपने आदशर् गमन - पथ से विचलित हो जाएगा। यह ध्रातल से उसी वेग से आकर नहीं टकराएगा जिससे यह पेंफका गया था। वायु प्रतिरोध् की अनुपस्िथति में वेग का ग.अवयव अचर रहता है और केवल ल.अवयव में ही सतत परिवतर्न होता है। तथापि, वायु प्रतिरोध् की उपस्िथति में, ये दोनों ही अवयव प्रभावित होंगे। इसका अथर् यह होगा कि प्रक्षेप्य का क्षैतिज परास समीकरण ;4ण्43द्ध द्वारा प्राप्त मान से कम होगा। अध्िकतम ऊँचाइर् भी समीकरण ;4ण्42द्ध द्वारा प्रागुक्त मान से कम होगी। तब, क्या आप अनुमान लगा सकते हैं, कि उंयन काल मंे क्या परिवतर्न होगा? वायु - प्रतिरोध् से बचना हो, तो हमें प्रयोग, निवार्त में, या बहुत कम दाब की स्िथति में करना होगा जो आसान कायर् नहीं है। जब हम ‘वायु प्रतिरोध् को नगण्य मान लीजिए’ जैसे वाक्यांशों का प्रयोग करते हैं, तो हम यह कहना चाहतेहैं, कि परास, ऊँचाइर् जैसे प्राचलों में, इसके कारण होने वाला परिवतर्न, वायुविहीन स्िथति में ज्ञात इनके मानों की तुलना में बहुत कम है। बिना वायु - प्रतिरोध् को विचार में लाए गणना करना आसान होता है बनिस्बत उस स्िथति के जब हम वायु प्रतिरोध् को गणना में लाते हैं। 4.11 एकसमान वृत्तीय गति जब कोइर् वस्तु एकसमान चाल से एक वृत्ताकार पथ पर चलती है, तो वस्तु की गति को एकसमान वृत्तीय गति कहते हैं । शब्द फ्एकसमानय् उस चाल के संदभर् में प्रयुक्त हुआ है जो वस्तु की गति की अवध्ि में एकसमान ;नियतद्ध रहती है । माना कि चित्रा 4.19 के अनुसार कोइर् वस्तु एकसमान चाल अ से त् त्रिाज्या वालेवृत्त के अनुदिश गतिमान है । क्योंकि वस्तु के वेग की दिशा में निरन्तर परिवतर्न हो रहा है, अतः उसमें त्वरण उत्पन्न हो रहा है। हमें त्वरण का परिमाण तथा उसकी दिशा ज्ञात करनी है । माना त व तश् तथाअ व अश्कण की स्िथति तथा गति सदिश हैं जब वह गति के दौरान क्रमशः बिंदुओं च् व च्श् पर है ;चित्रा 4.19ंद्ध । परिभाषा के अनुसार, किसी बिंदु पर कण का वेग उस बिंदु पर स्पशर् रेखा के अनुदिश गति की दिशा में होता है । चित्रा 4.19;ं1द्ध में वेग सदिशों अ व अश् को दिखाया गया है। चित्रा 4.19;ं2द्ध में सदिश योग के त्रिाभुज नियम का उपयोग करके Δअ निकाल लेते हैं । क्योंकि पथ वृत्तीय है, इसलिए चित्रा में, ज्यामिति से स्पष्ट है कि अए त के तथा अश्ए तश् के लंबवत् हैं । इसलिए, Δअए Δत के लंबवत् होगा । पुनः क्योंकि औसत त्वरण क्अंत्रक्अ के अनुदिश है, इसलिए ं भी Δत के लंबवत्Łक्ज łहोगा । अब यदि हम Δअ को उस रेखा पर रखें जो त व तश् के बीच के कोण को द्विभाजित करती है तो हम देखेंगे कि इसकीदिशा वृत्त के वेंफद्र की ओर होगी । इन्हीे राश्िायों को चित्रा 4ण्19;इद्ध में छोटे समय अंतराल के लिए दिखाया गया है । Δअए अतः ं की दिशा पुनः वेंफद्र की ओर होगी । चित्रा ;4.19बद्ध में Δज→0 है, इसलिए औसत त्वरण, तात्क्षण्िाक त्वरण के बराबर हो जाता है । इसकी दिशा वेंफद्र की ओर होती है’ । इस प्रकार, यह निष्कषर्निकलता है कि एकसमान वृत्तीय गति के लिए वस्तु के त्वरणकी दिशा वृत्त के वेंफद्र की ओर होती है । अब हम इस त्वरण का परिमाण निकालेंगे। परिभाषा के अनुसार, ं का परिमाण निम्नलिख्िात सूत्रा से व्यक्त होता है, द्यΔअ द्यद्यद्यसपउं त्र Δज→0 Δज मान लीजिए त व तश् के बीच का कोण Δθ है । क्योंकि वेग सदिश अ व अश् सदैव स्िथति सदिशों के लंबवत् होते हैं, इसलिए उनके बीच का कोण भी Δθ होगा । अतएव स्िथति सदिशों द्वारा निमिर्त त्रिाभुज ;Δब्च्च्श्द्ध तथा वेग सदिशों अए अश् व Δअ द्वारा निमिर्त त्रिाभुज ;Δळभ्प्द्ध समरूप हैं ;चित्रा 4.19ंद्ध । इस प्रकार एक त्रिाभुज के आधर की लंबाइर् व किनारे की भुजा की लंबाइर् का अनुपात दूसरे त्रिाभुज की तदनुरूप लंबाइयों के अनुपात के बराबर होगा, अथार्त् Δ अ Δ त त्र अ त् Δत Δअत्र अ त्या चित्रा 4.19 किसी वस्तु की एकसमान वृत्तीय गति के लिए वेग तथा त्वरण । चित्रा ;ंद्ध से ;बद्ध तक Δज घटता जाता है ;चित्रा ब में शून्य हो जाता हैद्ध । वृत्ताकार पथ के प्रत्येक बिंदु पर त्वरण वृत्त के वेंफद्र की ओर होता है । ∗Δज→0 सीमा में Δतए त के लंबवत् हो जाता है । इस सीमा में क्योंकि Δअ→0 होता है, पफलस्वरूप यह भी अ के लंबवत् होगा । अतः वृत्तीय पथ के प्रत्येक बिंदु पर त्वरण की दिशा वेंफद्र की ओर होती है। इसलिए, Δअ अΔत अ Δत ं त्र सपउ त्र सपउ त्र सपउ Δज → 0 Δज Δज→ 0त्Δज त् Δज→ 0 Δज यदि Δज छोटा है, तो Δθ भी छोटा होगा । ऐसी स्िथति में चाप च्च्श् को लगभग द्यΔतद्य के बराबर ले सकते हैं । अथार्त्, द्यΔतद्य ≅ अ Δज Δत सपउ त्र अया Δत ≅ अअथवा Δज 0ज→ΔΔज इस प्रकार, अभ्िावेंफद्र त्वरण ं का मान निम्नलिख्िात होगा,ब ⎛ अ⎞ ं त्र ⎜⎟ अ त्र अ2ध्त् ;4ण्44द्धब⎝ त्⎠ इस प्रकार किसी त् त्रिाज्या वाले वृत्तीय पथ के अनुदिश अ चालसे गतिमान वस्तु के त्वरण का परिमाण अ2ध्त् होता है जिसकीदिशा सदैव वृत्त के वेंफद्र की ओर होती है । इसी कारण इसप्रकार के त्वरण को अभ्िावेंफद्र त्वरण कहते हैं ;यह पद न्यूटनने सुझाया थाद्ध । अभ्िावेंफद्र त्वरण से संबंध्ित संपूणर् विश्लेषणात्मकलेख सवर्प्रथम 1673 में एक डच वैज्ञानिक िस्िचयान हाइगेन्स;1629 - 1695द्ध ने प्रकाश्िात करवाया था, किन्तु संभवतया न्यूटनको भी वुफछ वषो± पूवर् ही इसका ज्ञान हो चुका था । अभ्िावेंफद्रको अंग्रेजी में सेंट्रीपीटल कहते हैं जो एक ग्रीक शब्द है जिसकाअभ्िाप्राय वेंफद्र - अभ्िामुख ;वेंफद्र की ओरद्ध है । क्योंकि अ तथा त् दोनों अचर हैं इसलिए अभ्िावेंफद्र त्वरण का परिमाण भी अचरहोता है। परंतु दिशा बदलती रहती है और सदैव वेंफद्र की ओरहोती है। इस प्रकार निष्कषर् निकलता है कि अभ्िावेंफद्र त्वरणएकसमान सदिश नहीं होता है । किसी वस्तु के एकसमान वृत्तीय गति के वेग तथा त्वरणको हम एक दूसरे प्रकार से भी समझ सकते हैं । चित्रा 4.19 में दिखाए गए अनुसारΔज ;त्रजश्√जद्ध समय अंतराल में जब कण च् से च्श् पर पहुँच जाता है तो रेखा ब्च् कोण Δθ से घूम जाती है । Δθ को हम कोणीय दूरी कहते हैं । कोणीय वेग ω ;ग्रीक अक्षर‘ओमेगा’द्ध को हम कोणीय दूरी के समय परिवतर्न की दर केरूप में परिभाष्िात करते हैं । इस प्रकार, Δθ ωत्र ;4.45द्धΔज अब यदि Δज समय में कण द्वारा चली दूरी को Δे से व्यक्त करें ;अथार्त् च्च्श्त्रΔेद्ध तो, Δे अत्र Δज त्रकिंतु Δे त्र त्Δθ, इसलिए अत्Δθ त्र त् ω Δज अतः अ त्र ωत् ;4.46द्ध अभ्िावेंफद्र त्वरण को हम कोणीय चाल के रूप में भी व्यक्त कर सकते हैं । अथार्त्, 22 2 अ ω त् 2 ं त्रत्र त्रω त्ब त्त् या ंब त्रω 2 त् ;4.47द्ध वृत्त का एक चक्कर लगाने में वस्तु को जो समय लगता है उसे हम आवतर्काल ज् कहते हैं । एक सेवंफड में वस्तु जितने चक्करलगाती है, उसे हम वस्तु की आवृिा ν कहते हैं । परंतु इतने समय में वस्तु द्वारा चली गइर् दूरीे त्र 2πत् होती है,इसलिए अ त्र 2πत्ध्ज् त्र2πत्ν ;4.48द्ध इस प्रकार ω, अ तथा ं को हम आवृत्िा ν के पद में व्यक्त करब सकते हैं, अथार्त् ω त्र 2πν अ त्र 2πνत् ं त्र 4π2ν2त् ;4.49द्धब¯ उदाहरण 4.10: कोइर् कीड़ा एक वृत्तीय खाँचे मंे जिसकी त्रिाज्या 12बउ है, पँफस गया है । वह खँाचे केअनुदिश स्िथर चाल से चलता है और 100 सेवंफड में 7 चक्कर लगा लेता है। ;ंद्ध कीड़े की कोणीय चाल वरैख्िाक चाल कितनी होगी? ;इद्ध क्या त्वरण सदिश एक अचर सदिश है। इसका परिणाम कितना होगा? हल यह एकसमान वृत्तीय गति का एक उदाहरण है । यहाँ त् त्र 12 बउ है । कोणीय चाल ω का मान ω त्र 2πध्ज् त्र 2π 7ध्100 त्र 0ण्44 तंकध्े है तथा रैख्िाक चाल अ का मान अ त्र ω त् त्र 0ण्44 12 बउ त्र 5ण्3 बउ े√1 होगा । वृत्त के हर बिंदु पर वेग अ की दिशा उस बिंदु पर स्पशर्रेखा के अनुदिश होगी तथा त्वरण की दिशा वृत्त के वेंफद्र की ओर होगी । क्योंकि यह दिशा लगातार बदलती रहती है, इसलिए त्वरण एक अचर सदिश नहीं है । परंतु त्वरण का परिमाण अचर है, जिसका मान ं त्र ω2 त् त्र ;0ण्44 े√1द्ध2 ;12 बउद्ध त्र 2ण्3 बउ े√2 होगा। फ् सारांश 1.अदिश राश्िायाँ वे राश्िायाँ हैं जिनमेें केवल परिमाण होता है । दूरी, चाल, संहति ;द्रव्यमानद्ध तथा ताप अदिश राश्िायों के वुफछ उदाहरण हैं । 2.सदिश राश्िायाँ वे राश्िायाँ हैं जिनमेें परिमाण तथा दिशा दोनों होते हैं । विस्थापन, वेग तथा त्वरण आदि इस प्रकार की राश्िा के वुफछ उदाहरण हैं । ये राश्िायाँ सदिश बीजगण्िात के विश्िाष्ट नियमों का पालन करती हैं । 3.यदि किसी सदिश । को किसी वास्तविक संख्या λ से गुणा करें तो हमें एक दूसरा सदिश ठ प्राप्त होता है जिसका परिमाण । के परिमाण का λ गुना होता है । नए सदिश की दिशा या तो । के अनुदिश होती है या इसके विपरीत । दिशा इस बात पर निभर्र करती है कि λ धनात्मक है या )णात्मक । 4.दो सदिशों । व ठ को जोड़ने के लिए या तो शीषर् व पुच्छ की ग्रापफी वििा का या समान्तर चतुभुर्ज विध्ि का उपयोग करते हैं । 5.सदिश योग क्रम - विनिमेय नियम का पालन करता है - । ़ ठ त्र ठ ़ । साथ ही यह साहचयर् के नियम का भी पालन करता है अथार्त् ;। ़ ठद्ध ़ ब् त्र । ़ ;ठ ़ ब्द्ध 6.शून्य सदिश एक ऐसा सदिश होता है जिसका परिमाण शून्य होता है । क्योंकि परिमाण शून्य होता है इसलिए इसके साथ दिशा बतलाना आवश्यक नहीं है । इसके निम्नलिख्िात गुण होते हैं: । ़ 0 त्र । λ0 त्र 0 0। त्र 0 7.सदिश ठ को । से घटाने की िया को हम । व √ठ को जोड़ने के रूप में परिभाष्िात करते हैं - । √ ठ त्र । ़ ;√ठद्ध 8.किसी सदिश । को उसी समतल में स्िथत दो सदिशों ं तथा इ के अनुदिश दो घटक सदिशों में वियोजित कर सकते हैंः । त्र λं ़ μइ यहाँ λ व μ वास्तविक संख्याएँ हैं । 9.किसी सदिश । से संबंिात एकांक सदिश वह सदिश है जिसका परिमाण एक होता है और जिसकी दिशा सदिश । के। अनुदिश होती है । एकांक सदिश दÛ त्र द्य ।द्य एकांक सदिश पÛ ए रÛ ए ाÛ इकाइर् परिमाण वाले वे सदिश हैं जिनकी दिशाएँ दक्ष्िाणावतीर् निकाय की अक्षों क्रमशः ग.ए लव ्र.के अनुदिश होती हैं । 10.दो विमा के लिए सदिश । को हम निम्न प्रकार से व्यक्त करते हैं - । त्र । पÛ ़ । रÛ ग ल यहाँ ।ग तथा ।ल क्रमशः ग.ए ल.अक्षों के अनुदिश । के घटक हैं । यदि सदिश ।ए ग.अक्ष के साथ θ कोण बनाता है, तो ।ग त्र । बवे θए ।ल त्र । ेपद θ तथा । । । ।2 ।2ए जंद त्र ल ण् गल ।ग 11.विश्लेषणात्मक वििा से भी सदिशों को आसानी से जोड़ा जा सकता है । यदि ग.ल समतल में दो सदिशों । व ठ का योग त् हो, तो त् त्र त् पÛ ़ त् रÛ जहाँ त् त्र । ़ ठ तथा त् त्र । ़ ठ गल गगगललल 12.समतल में किसी वस्तु की स्िथति सदिश त को प्रायः निम्न प्रकार से व्यक्त करते हैं: त त्र ग प‘ ़ लर‘ स्िथति सदिशों त व तश् के बीच के विस्थापन को निम्न प्रकार से लिखते हैं: Δत त्र तश् √ त त्र ;गश् √ गद्ध प‘ ़ ;लश् √ लद्ध र‘ त्रΔग प‘ ़Δल र‘ 13141516Δतयदि कोइर् वस्तु समय अंतराल Δज में Δत से विस्थापित होती है तो उसका औसत वेग अत्रΔज होगा । किसी क्षण ज पर वस्तु का वेग उसके औसत वेग के सीमान्त मान के बराबर होता है जब Δज शून्य के सन्िनकट हो जाता है । अथार्त् Δत कत अ त्र सपउ त्र Δज→0 Δज कज इसे एकांक सदिशों के रूप मंे भी व्यक्त करते हैं: ‘ ‘‘ अ त्र अ प़ अ ऱअ ा ग ल ्र कग कल क्रजहाँ अग त्र एअल त्रएअ्र त्र कज कज कज जब किसी निदेर्शांक निकाय में कण की स्िथति को दशार्ते हैं, तो अ की दिशा कण के पथ के वक्र की उस बिंदु पर खींची गइर् स्पशर् रेखा के अनुदिश होती है । अश् −अ Δअयदि वस्तु का वेग Δज समय अंतराल मंे अ से अश् मंे बदल जाता है, तो उसका औसत त्वरण ं त्रत्र होगा ।Δज Δज Δअ कअजब Δज का सीमान्त मान शून्य हो जाता है तो किसी क्षण ज पर वस्तु का त्वरण ं त्र सपउत्र होगा । Δज→0 Δज कज घटक के पदों मंे इसे निम्न प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है: ं त्र ं प‘ ़ ं र‘ ़ ं ा‘ गल ्र यहाँ, कअ कअल कअ ंग त्र ग ए ंल त्र ए ं्र त्र ्र कज कज कज यदि एक वस्तु किसी समतल मंे एकसमान त्वरण ं त्र द्यं द्य त्र ं 2 ग ़ ं 2 ल से गतिमान है तथा क्षण जत्र0 पर उसका स्िथति1सदिश त है, तो किसी अन्य क्षण ज पर उसका स्िथति सदिश त त्र त ़ अ ज़ ंज 2 होगा तथा उसका वेग अ त्र अ़ ंज व00 02 होगा । यहाँ अ, ज त्र 0 क्षण पर वस्तु के वेग को व्यक्त करता है ।0घटक के रूप मंे 12गगअज ंज ववग ग2 1 ललअज ंज 2 ववल ल2 अ त्र अ ़ ंज ग0गग अ त्र अ ़ ंज ल0लल किसी समतल में एकसमान त्वरण की गति को दो अलग - अलग समकालिक एकविमीय व परस्पर लंबवत् गतियों के अध्यारोपण के रूप में मान सकते हैं । प्रक्षेपित होने के उपरांत जब कोइर् वस्तु उड़ान मंे होती है तो उसे प्रक्षेप्य कहते हैं । यदि ग - अक्ष से θ कोण पर वस्तु का0प्रारंभ्िाक वेग अ है तो ज क्षण के उपरांत प्रक्षेप्य के स्िथति एवं वेग संबंध्ी समीकरण निम्नवत् होंगे - 0ग त्र ;अ0बवे θ0द्ध ज ल त्र ;अ ेपद θद्ध ज− ;1ध्2द्ध हज2 0 0अ त्र अत्र अबवे θ0ग0ग 0अल त्र अ0 ेपद θ0 √हज प्रक्षेप्य का पथ परवलयिक होता है जिसका समीकरण 2 हगल जंद गदृ 02 होगा ।2 अव बवे व ;अ ेपद ु द्ध2ववप्रक्षेप्य की अध्िकतम ऊँचाइर् ी त्र ए तथाउ 2ह अ ेपदθ ज त्रववइस ऊँचाइर् तक पहुंचने मंे लगा समय उ होगा । ह प्रक्षेप्य द्वारा अपनी प्रारंभ्िाक स्िथति से उस स्िथति तक, जिसके लिए नीचे उतरते समय ल त्र 0 हो, चली गइर् क्षैतिज दूरी को प्रक्षेप्य का परास त् कहते हैं । 2अ अतः प्रक्षेप्य का परास त्व ेपद 2 होगा ।व ह 17.जब कोइर् वस्तु एकसमान चाल से एक वृत्तीय मागर् मंे चलती है तो इसे एकसमान वृत्तीय गति कहते हैं । यदि वस्तु की चाल अ हो तथा इसकी त्रिाज्या त् हो, तो अभ्िावेंफद्र त्वरण, ं त्र अ2ध्त् होगा तथा इसकी दिशा सदैव वृत्त के वेंफद्र कीब ओर होगी । कोणीय चाल ωकोणीय दूरी के समान परिवतर्न की दर होता है । रैख्िाक वेग अ त्र ωत् होगा तथा त्वरण ं त्र ω2त् होगा। बयदि वस्तु का आवतर्काल ज् तथा आवृिा ν हो, तो ωए न तथा ं के मान निम्नवत् होंगे ।बωत्र 2πνए अ त्र 2πνत्ए ं ब त्र 4π2ν 2त् स्िथति सदिश त ख्स्, उ सदिश । किसी अन्य चिह्न से भी इसे व्यक्त कर सकते हैं विस्थापन Δत ख्स्, उ ’’ वेग ;ंद्ध औसत अ - ख्स्ज्√1, उ े√1 त्र Δतध्Δज, सदिश ;इद्ध तात्क्षण्िाक अ त्र कअध्कज, सदिश त्वरण ;ंद्ध औसत - ृ ख्स्ज्√2, उ े√2 त्र Δअध्Δज, सदिश ;इद्ध तात्क्षण्िाक ं त्र कअध्कज, सदिश प्रक्षेप्य गति ;ंद्ध अध्िकतमऊंचाइर् मंे लगा समय ज उ ख्ज्, े 0 ेपद अ ह 0 ;इद्ध अध्िकतम ऊंचाइर् ी उ ख्स्, उ 0; ेपद 2 अ ह 2 0 द्ध ;बद्ध क्षैतिज परास त् ख्स्, उ 2 0अ ेपद 2 0 ह वृत्तीय गति ;ंद्ध कोणीय चाल ω ख्ज्√1, तंकध्े त्र Δθध्Δज त्र अध्त् ;इद्ध अभ्िावेंफद्र त्वरण ं ब ख्स्ज्√2, उ े√2 त्र अ2ध्त् विचारणीय विषय 1.किसी वस्तु द्वारा दो बिंदुओं के बीच की पथ - लंबाइर् सामान्यतया, विस्थापन के परिमाण के बराबर नहीं होती । विस्थापन केवल पथ के अंतिम बिंदुओं पर निभर्र करता है जबकि पथ - लंबाइर् ;जैसाकि नाम से ही स्पष्ट हैद्ध वास्तविक पथ पर निभर्र करती है । दोनों राश्िायां तभी बराबर होंगी जब वस्तु गति मागर् में अपनी दिशा नहीं बदलती । अन्य दूसरी परिस्िथतियों मंे पथ - लंबाइर् विस्थापन के परिमाण से अध्िक होती है । 2.उपरोक्त बिंदु 1 की दृष्िट से वस्तु की औसत चाल किसी दिए समय अंतराल मंे या तो उसके औसत वेग के परिमाण के बराबर होगी या उससे अध्िक होगी । दोनों बराबर तब होंगी जब पथ - लंबाइर् विस्थापन के परिमाण के बराबर हो । 3.सदिश समीकरण ;4ण्3ंद्ध तथा ;4ण्34ंद्ध अक्षों के चुनाव पर निभर्र नहीं करते हैं । निःसंदेह आप उन्हंे दो स्वतंत्रा अक्षों के अनुदिश वियोजित कर सकते हैं । 4.एकसमान त्वरण के लिए शु(गतिकी के समीकरण एकसमान वृत्तीय गति मंे लागू नहीं होते क्योंकि इसमें त्वरण का परिमाण तो स्िथर रहता है परंतु उसकी दिशा निरंतर बदलती रहती है । 5.यदि किसी वस्तु के दो वेग अ तथा अहों तो उनका परिणामी वेग अ त्रअ़ अहोगा । उपरोक्त सूत्रा तथा वस्तु 2 के12 12 सापेक्ष वस्तु का 1 के वेग अथार्त्ः अ त्र अ .अ के बीच भेद को भलीभंाति जानिए । यहां अ तथा अ किसी उभयनिष्ठ1212 12 निदेर्श तन्त्रा के सापेक्ष वस्तु की गतियां हैं । 6.वृत्तीय गति मंे किसी कण का परिणामी त्वरण वृत्त के वेंफद्र की ओर होता है यदि उसकी चाल एकसमान है । 7.किसी वस्तु की गति के मागर् की आवृफति केवल त्वरण से ही निधर्रित नहीं होती बल्िक वह गति की प्रारंभ्िाक दशाओं ;प्रारंभ्िाक स्िथति व प्रारंभ्िाक वेगद्ध पर भी निभर्र करती है । उदाहरणस्वरूप, एक ही गुरुत्वीय त्वरण से गतिमान किसी वस्तु का मागर् एक सरल रेखा भी हो सकता है या कोइर् परवलय भी, ऐसा प्रारंभ्िाक दशाओं पर निभर्र करेगा । अभ्यास 4.1 निम्नलिख्िात भौतिक राश्िायों में से बतलाइए कि कौन - सी सदिश हैं और कौन - सी अदिश: आयतन, द्रव्यमान, चाल, त्वरण, घनत्व, मोल संख्या, वेग, कोणीय आवृिा, विस्थापन, कोणीय वेग। 4.2 निम्नांकित सूची में से दो अदिश राश्िायों को छाँटिए - बल, कोणीय संवेग, कायर्, धरा, रैख्िाक संवेग, विद्युत क्षेत्रा, औसत वेग, चुंबकीय आघूणर्, आपेक्ष्िाक वेग। 4.3 निम्नलिख्िात सूची में से एकमात्रा सदिश राश्िा को छाँटिए - ताप, दाब, आवेग, समय, शक्ित, पूरी पथ - लंबाइर्, उफजार्, गुरुत्वीय विभव, घषर्ण गुणांक, आवेश। 4.4 कारण सहित बताइए कि अदिश तथा सदिश राश्िायों के साथ क्या निम्नलिख्िात बीजगण्िातीय संियाएँ अथर्पूणर् हैं? ;ंद्ध दो अदिशों को जोड़ना, ;इद्ध एक ही विमाओं के एक सदिश व एक अदिश को जोड़ना, ;बद्ध एक सदिश को एक अदिश से गुणा करना, ;कद्ध दो अदिशों का गुणन, ;मद्ध दो सदिशों को जोड़ना, ;द्धि एक सदिश के घटक को उसी सदिश से जोड़ना । 4.5 निम्नलिख्िात में से प्रत्येक कथन को ध्यानपूवर्क पढि़ए और कारण सहित बताइए कि यह सत्य है या असत्य: ;ंद्धकिसी सदिश का परिमाण सदैव एक अदिश होता है, ;इद्ध किसी सदिश का प्रत्येक घटक सदैव अदिश होता है, ;बद्धकिसी कण द्वारा चली गइर् पथ की वुफल लंबाइर् सदैव विस्थापन सदिश के परिमाण के बराबर होती है, ;कद्ध किसी कण की औसत चाल ;पथ तय करने में लगे समय द्वारा विभाजित वुफल पथ - लंबाइर्द्ध समय के समान - अंतराल में कण के औसत वेग के परिमाण से अध्िक या उसके बराबर होती है । ;मद्ध उन तीन सदिशों का योग जो एक समतल में नहीं हैं, कभी भी शून्य सदिश नहीं होता । 4.6 निम्नलिख्िात असमिकाओं की ज्यामिति या किसी अन्य विध्ि द्वारा स्थापना कीजिए: ;ंद्ध द्यं़इद्य ≤ द्यंद्य ़ द्यइद्य ;इद्ध द्यं़इद्य ≥ द्यद्यंद्य √ द्यइद्यद्य ;बद्ध द्यं√इद्य ≤ द्यंद्य ़ द्यइद्य ;कद्ध द्यं√इद्य ≥ द्यद्यंद्य √ द्यइद्यद्य इनमें समिका ;समताद्ध का चिÉ कब लागू होता है ? 4.7 दिया है ं ़ इ ़ ब ़ क त्र 0ए नीचे दिए गए कथनों में से कौन - सा सही है: फ ;ंद्ध ंए इए ब तथा क में से प्रत्येक शून्य सदिश है, ;इद्ध ;ं ़ बद्ध का परिमाण ;इ ़ कद्ध के परिमाण के बराबर है, ;बद्ध ं का परिमाण इए ब तथा क के परिमाणों के योग से कभी भी अध्िक नहीं हो सकता, ;कद्ध यदि ं तथा क संरेखीय नहीं हैं तो इ ़ ब अवश्य ही ं तथा क के समतल में होगा, और यह ं तथा क के अनुदिश होगा यदि वे संरेखीय हैं । 4.8 तीन लड़कियाँ 200 उ त्रिाज्या वाली वृत्तीय बपफीर्ली सतह पर स्केटिंग कर रही हैं । वे सतह के किनारे के बिंदु च् से स्केटिंग शुरू करती हैं तथा च् के व्यासीय विपरीत बिंदु फ पर विभ्िान्न पथों से होकर पहुँचती हैं जैसा कि चित्रा 4.20 में दिखाया गया है । प्रत्येक लड़की के विस्थापन सदिश का परिमाण कितना है ? किस लड़की के लिए यह वास्तव में स्केट किए गए पथ की लंबाइर् के बराबर है । 4.9 कोइर् साइकिल सवार किसी वृत्तीय पावंर्फ के वेंफद्र व् से चलना शुरू करता है तथा पावर्फ के किनारे च् पर पहुँचता है। पुनः वह पावर्फ की परिध्ि के अनुदिश साइकिल चलाता हुआ फव् के रास्ते ;जैसा चित्रा 4ण्21 में दिखाया गया हैद्ध वेंफद्र पर वापस आ जाता है । पावर्फ की त्रिाज्या 1 ाउ है । यदि पूरे चक्कर में 10 मिनट लगते हों तो साइकिल सवार का ;ंद्ध वुफल विस्थापन, ;इद्ध औसत वेग, तथा ;बद्ध औसत चाल क्या होगी? चित्रा 4.21 4.10 किसी खुले मैदान में कोइर् मोटर चालक एक ऐसा रास्ता अपनाता है जो प्रत्येक 500 उ के बाद उसके बाईं ओर 60॰ के कोण पर मुड़ जाता है। किसी दिए मोड़ से शुरू होकर मोटर चालक का तीसरे, छठे व आठवें मोड़ पर विस्थापन बताइए। प्रत्येक स्िथति में मोटर चालक द्वारा इन मोड़ों पर तय की गइर् वुफल पथ - लंबाइर् के साथ विस्थापन के परिमाण की तुलना कीजिए। 4.11 कोइर् यात्राी किसी नए शहर में आया है और वह स्टेशन से किसी सीध्ी सड़क पर स्िथत किसी होटल तक जो 10 ाउ दूर है, जाना चाहता है। कोइर् बेइर्मान टैक्सी चालक 23 ाउ के चक्करदार रास्ते से उसे ले जाता है और 28 मिनट में होटल में पहुँचता है। ;ंद्ध टैक्सी की औसत चाल, और ;इद्ध औसत वेग का परिमाण क्या होगा? क्या वे बराबर हैं? 4.12 वषार् का पानी 30 उ े√1 की चाल से उफध्वार्ध्र नीचे गिर रहा है। कोइर् महिला उत्तर से दक्ष्िाण की ओर 10 उ े√1 की चाल से साइकिल चला रही है। उसे अपना छाता किस दिशा में रखना चाहिए। 4.13 कोइर् व्यक्ित स्िथर पानी में 4ण्0 ाउध्ी की चाल से तैर सकता है । उसे 1ण्0 ाउ चैड़ी नदी को पार करने में कितना समय लगेगा यदि नदी 3ण्0 ाउध्ी की स्िथर चाल से बह रही हो और वह नदी के बहाव के लंब तैर रहा हो । जब वह नदी के दूसरे किनारे पहुँचता है तो वह नदी के बहाव की ओर कितनी दूर पहुँचेगा? 4.14 किसी बंदरगाह में 72 ाउध्ी की चाल से हवा चल रही है और बंदरगाह में खड़ी किसी नौका के उफपर लगा झंडा छ.म् दिशा में लहरा रहा है । यदि वह नौका उत्तर की ओर 51 ाउध्ी चाल से गति करना प्रारंभ कर दे तो नौका पर लगा झंडा किस दिशा में लहराएगा ? 4.15 किसी लंबे हाल की छत 25 उ उफंची है । वह अध्िकतम क्षैतिज दूरी कितनी होगी जिसमें 40 उ े√1 की चाल से पेंफकी गइर् कोइर् गेंद छत से टकराए बिना गुजर जाए ? 4.16 िकेट का कोइर् ख्िालाड़ी किसी गेंद को 100 उ की अध्िकतम क्षैतिज दूरी तक पेंफक सकता है । वह ख्िालाड़ी उसी गेंद को जमीन से उफपर कितनी उंफचाइर् तक पेंफक सकता है ? 4.17 80 बउ लंबे धगे के एक सिरे पर एक पत्थर बाँध गया है और इसे किसी एकसमान चाल के साथ किसी क्षैतिज वृत्त में घुमाया जाता है । यदि पत्थर 25 े में 14 चक्कर लगाता है तो पत्थर के त्वरण का परिमाण और उसकी दिशा क्या होगी ? 4.18 कोइर् वायुयान 900 ाउ ी√1 की एकसमान चाल से उड़ रहा है और 1ण्00 ाउ त्रिाज्या का कोइर् क्षैतिज लूप बनाता है । इसके अभ्िावेंफद्र त्वरण की गुरुत्वीय त्वरण के साथ तुलना कीजिए । 4.19 नीचे दिए गए कथनों को ध्यानपूवर्क पढि़ए और कारण देकर बताइए कि वे सत्य हैं या असत्य: ;ंद्ध वृत्तीय गति में किसी कण का नेट त्वरण हमेशा वृत्त की त्रिाज्या के अनुदिश वेंफद्र की ओर होता है । ;इद्ध किस बिंदु पर किसी कण का वेग सदिश सदैव उस बिंदु पर कण के पथ की स्पशर् रेखा के अनुदिश होता है। ;बद्ध किसी कण का एकसमान वृत्तीय गति में एक चक्र में लिया गया औसत त्वरण सदिश एक शून्य सदिश होता है। 4.20 किसी कण की स्िथति सदिश निम्नलिख्िात है: त त्र ; 3ण्0ज पÛ − 2ण्0ज 2Ûर ़ 4ण्0ाÛ द्धउ समय ज सेवंफड में है तथा सभी गुणकों के मात्राक इस प्रकार से हैं कि त में मीटर में व्यक्त हो जाए । ;ंद्धकण का अ तथा ं निकालिए, ;इद्ध ज त्र 2ण्0 े पर कण के वेग का परिमाण तथा दिशा कितनी होगी ? −14.21 कोइर् कण ज त्र 0 क्षण पर मूल बिंदु से 10 Ûरउे के वेग से चलना प्रांरभ करता है तथा ग.ल समतल में एकसमान त्वरण ;8ण्0 प‘ ़ 2ण्0 ‘रद्ध उ े.2 से गति करता है । ;ंद्ध किस क्षण कण का ग.निदेर्शांक 16 उ होगा ? इसी समय इसका ल.निदेर्शांक कितना होगा ? ;इद्ध इस क्षण कण की चाल कितनी होगी ? 4.22 पÛ व Ûर क्रमशः ग.व ल.अक्षों के अनुदिश एकांक सदिश हैं । सदिशों पÛ़ Ûर तथा पÛ−Ûर का परिमाण तथा दिशा क्या Û −Û ुकर सकते हैं, 4.23 किसी दिव्फस्थान पर एक स्वेच्छ गति के लिए निम्नलिख्िात संबंधंे में से कौन - सा सत्य है ? होगा ? सदिश । त्र2Ûप ़ 3Ûर के Ûप ़ Ûरव पर के दिशाओं वफ अनेदिश घटक निकालिए। ख् आप ग्रापफी विध्ि का उपयोग ;ंद्ध अ त्र ;1ध्2द्ध ;अ ;जद्ध ़ अ ;जद्धद्ध;इद्ध अ त्र ख्त;जद्ध .त;जद्ध , ध्;ज √ जद्धऔसत12औसत2121;बद्ध अ ;जद्ध त्र अ ;0द्ध ़ ं ज ;कद्ध त ;जद्ध त्र त ;0द्ध ़ अ ;0द्ध ज ़ ;1ध्2द्ध ं ज2 ;मद्ध ं त्रख् अ ;जद्ध .अ ;ज द्ध, ध्; ज √ जद्धऔसत2121यहाँ ‘औसत’ का आशय समय अंतराल ज व ज से संबंध्ित भौतिक राश्िा के औसत मान से है ।214.24 निम्नलिख्िात में से प्रत्येक कथन को ध्यानपूवर्क पढि़ए तथा कारण एवं उदाहरण सहित बताइए कि क्या यह सत्य है या असत्य: अदिश वह राश्िा है जो ;ंद्ध किसी प्रिया में संरक्ष्िात रहती है, ;इद्ध कभी ट्टणात्मक नहीं होती, ;बद्ध विमाहीन होती है, ;कद्ध किसी स्थान पर एक बिंदु से दूसरे बिंदु के बीच नहीं बदलती, ;मद्ध उन सभी दशर्कों के लिए एक ही मान रखती है चाहे अक्षों से उनके अभ्िाविन्यास भ्िान्न - भ्िान्न क्यों न हों । 4.25 कोइर् वायुयान पृथ्वी से 3400 उ की उफंचाइर् पर उड़ रहा है । यदि पृथ्वी पर किसी अवलोकन बिंदु पर वायुयान की 10ण्0 े की दूरी की स्िथतियां 30॰ का कोण बनाती हैं तो वायुमान की चाल क्या होगी ? अतिरिक्त अभ्यास 4.26 किसी सदिश में परिमाण व दिशा दोनों होते हैं। क्या दिव्फस्थान में इसकी कोइर् स्िथति होती है? क्या यह समय के साथ परिवतिर्त हो सकता है। क्या दिव्फस्थान में भ्िान्न स्थानों पर दो बराबर सदिशों ं व इ का समान भौतिक प्रभाव अवश्य पडे़गा? अपने उत्तर के समथर्न में उदाहरण दीजिए। 4.27 किसी सदिश में परिणाम व दिशा दोनों होते हैं। क्या इसका यह अथर् है कि कोइर् राश्िा जिसका परिमाण व दिशा हो, वह अवश्य ही सदिश होगी? किसी वस्तु के घूणर्न की व्याख्या घूणर्न - अक्ष की दिशा और अक्ष के परितः घूणर्न - कोण द्वारा की जा सकती है। क्या इसका यह अथर् है कि कोइर् भी घूणर्न एक सदिश है? 4.28 क्या आप निम्नलिख्िात के साथ कोइर् सदिश संब( कर सकते हैं: ;ंद्ध किसी लूप में मोड़ी गइर् तार की लंबाइर्, ;इद्ध किसी समतल क्षेत्रा, ;बद्ध किसी गोले के साथ? व्याख्या कीजिए। 4.29 कोइर् गोली क्षैतिज से 30॰ के कोण पर दागी गइर् है और वह ध्रातल पर 3ण्0 ाउ दूर गिरती है । इसके प्रक्षेप्य के कोण का समायोजन करके क्या 5ण्0 ाउ दूर स्िथत किसी लक्ष्य का भेद किया जा सकता है ? गोली की नालमुख चाल को नियत तथा वायु के प्रतिरोेध् को नगण्य मानिए । 4.30 कोइर् लड़ावूफ जहाज 1.5 ाउ की उफंचाइर् पर 720 ाउध्ी की चाल से क्षैतिज दिशा में उड़ रहा है और किसी वायुयान भेदी तोप के ठीक उफपर से गुजरता है । उफध्वार्ध्र से तोप की नाल का क्या कोण हो जिससे 600 उ े√1 की चाल से दागा गया गोला वायुमान पर वार कर सके । वायुयान के चालक को किस न्यूनतम उफंचाइर् पर जहाज को उड़ाना चाहिए जिससे गोला लगने से बच सके। ;ह त्र 10 उ े√2द्ध 4.31 एक साइकिल सवार 27 ाउध्ी की चाल से साइकिल चला रहा है। जैसे ही सड़क पर वह 80 उ त्रिाज्या के वृत्तीय मोड़ पर पहुंचता है, वह ब्रेक लगाता है और अपनी चाल को 0.5 उध्े की एकसमान दर से कम कर लेता है। वृत्तीय मोड़ पर साइकिल सवार के नेट त्वरण का परिमाण और उसकी दिशा निकालिए। 4.32 ;ंद्ध सि( कीजिए कि किसी प्रक्षेप्य के ग.अक्ष तथा उसके वेग के बीच के कोण को समय के पफलन के रूप में निम्न प्रकार से व्यक्त कर सकते हैं अ हज .1 0लजत्र जंद अवग .1 4ीउत्र जंद ;इद्ध सि( कीजिए कि मूल बिंदु से पेंफके गए प्रक्षेप्य कोण का मान होगा। यहाँ प्रयुक्त प्रतीकों केत्अथर् सामान्य हैं।

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अध्याय 4

मतल में गति

4.1 भूमिका

4.2 अदिश एवं सदिश

4.3 सदिशों की वास्तविक संख्या से गुणा

4.4 सदिशों का संकलन व व्यवकलन - ग्राफी विधि

4.5 सदिशों का वियोजन

4.6 सदिशों का योग - विश्लेषणात्मक विधि

4.7 किसी समतल में गति

4.8 किसी समतल में एकसमान त्वरण से गति

4.9 दो विमाओं में आपेक्षिक वेग

4.10 प्रक्षेप्य गति

4.11 एकसमान वृत्तीय गति

सारांश

विचारणीय विषय

अभ्यास

अतिरिक्त अभ्यास

 

4.1 भूमिका

पिछले अध्याय में हमने स्थिति, विस्थापन, वेग एवं त्वरण की धारणाओं को विकसित किया था, जिनकी किसी वस्तु की सरल रेखीय गति का वर्णन करने के लिए आवश्यकता पड़ती है । क्योंकि एकविमीय गति में मात्र दो ही दिशाएँ संभव हैं, इसलिए इन राशियों के दिशात्मक पक्ष को + और - चिह्नों से व्यक्त कर सकते हैं । परंतु जब हम वस्तुओं की गति का द्विविमीय (एक समतल) या त्रिविमीय (दिक्स्थान) वर्णन करना चाहते हैं, तब हमें उपर्युक्त भौतिक राशियों का अध्ययन करने के लिए सदिशों की आवश्यकता पड़ती है । अतएव सर्वप्रथम हम सदिशों की भाषा (अर्थात सदिशों के गुणों एवं उन्हें उपयोग में लाने की विधियाँ) सीखेंगे । सदिश क्या है ? सदिशों को कैसे जोड़ा, घटाया या गुणा किया जाता है ? सदिशों को किसी वास्तविक संख्या से गुणा करें तो हमें क्या परिणाम मिलेगा ? यह सब हम इसलिए सीखेंगे जिससे किसी समतल में वस्तु के वेग एवं त्वरण को परिभाषित करने के लिए हम सदिशों का उपयोग कर सकें । इसके बाद हम किसी समतल में वस्तु की गति पर परिचर्चा करेंगे । किसी समतल में गति के सरल उदाहरण के रूप में हम एकसमान त्वरित गति का अध्ययन करेंगे तथा एक प्रक्षेप्य की गति के विषय में विस्तार से पढ़ेंगे । वृत्तीय गति से हम भलीभाँति परिचित हैं जिसका हमारे दैनिक जीवन में विशेष महत्त्व है । हम एकसमान वृत्तीय गति की कुछ विस्तार से चर्चा करेंगे ।

हम इस अध्याय में जिन समीकरणों को प्राप्त करेंगे उन्हें आसानी से त्रिविमीय गति के लिए विस्तारित किया जा सकता है ।

4.2 अदिश एवं सदिश

हम भौतिक राशियों को अदिशों एवं सदिशों में वर्गीकृत करते हैं । दोनों में मूल अंतर यह है कि सदिश के साथ दिशा को संबद्ध करते हैं वहीं अदिश के साथ एेसा नहीं करते । एक अदिश राशि वह राशि है जिसमें मात्र परिमाण होता है । इसे केवल एक संख्या एवं उचित मात्रक द्वारा पूर्ण रूप से व्यक्त किया जा सकता है । इसके उदाहरण हैं: दो बिंदुओं के बीच की दूरी, किसी वस्तु की संहति (द्रव्यमान), किसी वस्तु का तापक्रम, तथा वह समय जिस पर कोई घटना घटती है । अदिशों के जोड़ में वही नियम लागू होते हैं जो सामान्यतया बीजगणित में । अदिशों को हम ठीक वैसे ही जोड़ सकते हैं, घटा सकते हैं, गुणा या भाग कर सकते हैं जैसा कि हम सामान्य संख्याओं के साथ करते हैं * । उदाहरण के लिए, यदि किसी आयत की लंबाई और चौड़ाई क्रमश:1.0 m तथा 0.5 m है तो उसकी परिमाप चारों भुजाओं के योग, 1.0 m + 0.5 m + 1.0 m + 0.5 m = 3.0 m होगा। हर भुजा की लंबाई एक अदिश है तथा परिमाप भी एक अदिश है । हम एक दूसरे उदाहरण पर विचार करेंगे: यदि किसी एक दिन का अधिकतम एवं न्यूनतम ताप क्रमश:35.6 °C तथा 24.2 °C है तो इन दोनों का अंतर 11.4 °C होगा । इसी प्रकार यदि एल्युमिनियम के किसी एकसमान ठोस घन की भुजा 10 cm है और उसका द्रव्यमान 2.7 kg है तो उसका आयतन 10–3 m3 (एक अदिश) होगा तथा घनत्व 2.7×103 kg/m3 भी एक अदिश है ।

एक सदिश राशि वह राशि है जिसमें परिमाण तथा दिशा दोनों होते हैं तथा वह योग संबंधी त्रिभुज के नियम अथवा समानान्तर चतुर्भुज के योग संबंधी नियम का पालन करती है । इस प्रकार, एक सदिश को उसके परिमाण की संख्या तथा दिशा द्वारा व्यक्त करते हैं । कुछ भौतिक राशियाँ जिन्हें सदिशों द्वारा व्यक्त करते हैं, वे हैं विस्थापन, वेग, त्वरण तथा बल ।

सदिश को व्यक्त करने के लिए इस पुस्तक में हम मोटे अक्षरों का प्रयोग करेंगे । जैसे कि वेग सदिश को व्यक्त करने के लिए v चिह्न का प्रयोग करेंगे । परंतु हाथ से लिखते समय क्योंकि मोटे अक्षरों का लिखना थोड़ा मुश्किल होता है, इसलिए एक सदिश को अक्षर के ऊपर तीर लगाकर व्यक्त करते हैं, जैसे v । इस प्रकार v तथा v दोनों ही वेग सदिश को व्यक्त करते हैं । किसी सदिश के परिमाण को प्राय:हम उसका ‘परम मान’ कहते हैं और उसे |v| = v द्वारा व्यक्त करते हैं । इस प्रकार एक सदिश को हम मोटे अक्षर यथा A या a, p, q, r, ..... x, y से व्यक्त करते हैं जबकि इनके परिमाणों को क्रमश:हम A या a, p, q, r, .... x, y द्वारा व्यक्त करते हैं ।

4.2.1 स्थिति एवं विस्थापन सदिश

किसी समतल में गतिमान वस्तु की स्थिति व्यक्त करने के लिए हम सुविधानुसार किसी बिंदु O को मूल बिंदु के रूप में चुनते हैं । कल्पना कीजिए कि दो भिन्न-भिन्न समयों t और t' पर वस्तु की स्थिति क्रमश:P और P' है (चित्र 4.1a) । हम P को O से एक सरल रेखा से जोड़ देते हैं । इस प्रकार OP समय t पर वस्तु की स्थिति सदिश होगी । इस रेखा के सिरे पर एक तीर का निशान लगा देते हैं । इसे किसी चिह्न (मान लीजिए) r से निरूपित करते हैं, अर्थात् OP = r । इसी प्रकार बिंदु P' को एक दूसरे स्थिति सदिश OP' यानी r' से निरूपित करते हैं। सदिश r की लंबाई उसके परिमाण को निरूपित करती है तथा सदिश की दिशा वह होगी जिसके अनुदिश P (बिंदु O से देखने पर) स्थित होगा । यदि वस्तु P से चलकर P' पर पहुंच जाती है तो सदिश PP' (जिसकी पुच्छ P पर तथा शीर्ष P' पर है) बिंदु P (समय t) से P' (समय t') तक गति के संगत विस्थापन सदिश कहलाता है ।

1394.png

चित्र 4.1 (a) स्थिति तथा विस्थापन सदिश, (b) विस्थापन सदिश PQ तथा गति के भिन्न-भिन्न मार्ग ।


हाँ यह बात महत्वपूर्ण है कि ‘विस्थापन सदिश’ को एक सरल रेखा से व्यक्त करते हैं जो वस्तु की अंतिम स्थिति को उसकी प्रारम्भिक स्थिति से जोड़ती है तथा यह उस वास्तविक पथ पर निर्भर नहीं करता जो वस्तु द्वारा बिंदुओं के मध्य चला जाता है । उदाहरणस्वरूप, जैसा कि चित्र 4.1b में दिखाया गया है, प्रारम्भिक स्थिति P तथा अंतिम स्थिति Q के मध्य विस्थापन सदिश PQ यद्यपि वही है परंतु दोनों स्थितियों के बीच चली गई दूरियां जैसे PABCQ, PDQ तथा PBEFQ अलग-अलग हैं । इसी प्रकार, किन्हीं दो बिंदुओं के मध्य विस्थापन सदिश का परिमाण या तो गतिमान वस्तु की पथ-लंबाई से कम होता है या उसके बराबर होता है। पिछले अध्याय में भी एक सरल रेखा के अनुदिश गतिमान वस्तु के लिए इस तथ्य को भलीभांति समझाया गया था ।

4.2.2 सदिशों की समता

दो सदिशों A तथा B को केवल तभी बराबर कहा जा सकता है जब उनके परिमाण बराबर हों तथा उनकी दिशा समान हो** ।

* केवल समान मात्रक वाली राशियों का जोड़ व घटाना सार्थक होता है । जबकि आप भिन्न मात्रकों वाले अदिशों का गुणा या भाग कर सकते हैं ।

** हमारे अध्ययन में सदिशों की स्थितियां निर्धारित नहीं हैं । इसलिए जब एक सदिश को स्वयं के समांतर विस्थापित करते हैं तो सदिश अपरिवर्तित रहता है । इस प्रकार के सदिशों को हम ‘मुक्त सदिश’ कहते हैं ।हालांकि कुछ भौतिक उपयोगों में सदिश की स्थिति या उसकी क्रिया रेखा महत्त्वपूर्ण होती है । एेसे सदिशों को हम ‘स्थानगत सदिश’ कहते हैं।

चित्र 4.2(a) में दो समान सदिशों A तथा B को दर्शाया गया है । हम इनकी समानता की परख आसानी से कर सकते हैं । B को स्वयं के समांतर खिसकाइये ताकि उसकी पुच्छ Q सदिश A की पुच्छ O के संपाती हो जाए । फिर क्योंकि उनके शीर्ष S एवं P भी संपाती हैं अत:दोनोें सदिश बराबर कहलाएंगे । सामान्यतया इस समानता को A = B के रूप में लिखते हैं । इस बात की ओर ध्यान दीजिए कि चित्र 4.2(b) में यद्यपि सदिशों A' तथा B' के परिमाण समान हैं फिर भी दोनों सदिश समान नहीं हैं क्योंकि उनकी दिशायें अलग-अलग हैं । यदि हम B' को उसके ही समांतर खिसकाएं जिससे उसकी पुच्छ Q', A' की पुच्छ O' से संपाती हो जाए तो भी B' का शीर्ष S', A' के शीर्ष P' का संपाती नहीं होगा ।

1471.png

चित्र 4.2 (a) दो समान सदिश A तथा B, (b) दो सदिश A' व B' असमान हैं यद्यपि उनकी लंबाइयाँ वही हैं ।


4.3 सदिशों की वास्तविक संख्या से गुणा

यदि एक सदिश A को किसी धनात्मक संख्या λ से गुणा करें तो हमें एक सदिश ही मिलता है जिसका परिमाण सदिश A के परिमाण का λ गुना हो जाता है तथा जिसकी दिशा वही है जो A की है । इस गुणनफल को हम λA से लिखते हैं ।

2095.pngयदि 2100.png

उदाहरणस्वरूप, यदि A को 2 से गुणा किया जाए, तो परिणामी सदिश 2A होगा (चित्र 4.3a) जिसकी दिशा A की दिशा होगी तथा परिमाण 2105.png का दोगुना होगा । सदिश A को यदि एक ऋणात्मक संख्या λ से गुणा करें तो एक अन्य सदिश प्राप्त होता है जिसकी दिशा A की दिशा के विपरीत है और जिसका परिमाण 2110.png का λ गुना होता है ।

यदि किसी सदिश A को ऋणात्मक संख्याओं -1 व -1.5 से गुणा करें तो परिणामी सदिश चित्र 4.3(b) जैसे होंगे ।

1491.png

चित्र 4.3 (a) सदिश A तथा उसे धनात्मक संख्या दो से गुणा करने पर प्राप्त परिणामी सदिश, (b) सदिश Aतथा उसे ऋणात्मक संख्याओं -1 तथा -1.5 से गुणा करने पर प्राप्त परिणामी सदिश ।


भौतिकी में जिस घटक λ द्वारा सदिश A को गुणा किया जाता है वह कोई अदिश हो सकता है जिसकी स्वयं की विमाएँ होती हैं । अतएव λΑ की विमाएँ λ व A की विमाओं के गुणनफल के बराबर होंगी । उदाहरणस्वरूप, यदि हम किसी अचर वेग सदिश को किसी (समय) अंतराल से गुणा करें तो हमें एक विस्थापन सदिश प्राप्त होगा ।

4.4 सदिशों का संकलन व व्यवकलन: ग्राफी विधि

जैसा कि खण्ड 4.2 में बतलाया जा चुका है कि सदिश योग के त्रिभुज नियम या समान्तर चतुर्भुज के योग के नियम का पालन करते हैं । अब हम ग्राफी विधि द्वारा योग के इस नियम को समझाएंगे । हम चित्र 4.4 (a) में दर्शाए अनुसार किसी समतल में स्थित दो सदिशों A तथा B पर विचार करते हैं । इन सदिशों को व्यक्त करने वाली रेखा-खण्डों की लंबाइयाँ सदिशों के परिमाण के समानुपाती हैं । योग A + B प्राप्त करने के लिए चित्र 4.4(b) के अनुसार हम सदिश B इस प्रकार रखते हैं कि उसकी पुच्छ सदिश A के शीर्ष पर हो । फिर हम A की पुच्छ को B के सिरे से जोड़ देते हैं । यह रेखा OQ परिणामी सदिश R को व्यक्त करती है जो सदिशों A तथा B का योग है। क्योंकि सदिशों के जोड़ने की इस विधि में सदिशों में से किसी एक के शीर्ष को दूसरे की पुच्छ से जोड़ते हैं, इसलिए इस ग्राफी विधि को शीर्ष व पुच्छ विधि के नाम से जाना जाता है । दोनों सदिश तथा उनका परिणामी सदिश किसी त्रिभुज की तीन भुजाएं बनाते हैं । इसलिए इस विधि को सदिश योग के त्रिभुज नियम भी कहते हैं । यदि हम B+A का परिणामी सदिश प्राप्त करें तो भी हमें वही सदिश R प्राप्त होता है (चित्र 4.4c)। इस प्रकार सदिशों का योग ‘क्रम विनिमेय’ (सदिशों के जोड़ने में यदि उनका क्रम बदल दें तो भी परिणामी सदिश नहीं बदलता) है ।

1520.png

चित्र 4.4 (a) सदिश A तथा B(b) सदिशों A व B का ग्राफी विधि द्वारा जोड़ना, (c) सदिशों B व A का ग्राफी विधि द्वारा जोड़ना, (d) सदिशों के जोड़ से संबंधित साहचर्य नियम का प्रदर्शन ।

A + B = B + A (4.1)

सदिशों का योग साहचर्य नियम का भी पालन करता है जैसा कि चित्र 4.4 (d) में दर्शाया गया है । सदिशों A व B को पहले जोड़कर और फिर सदिश C को जोड़ने पर जो परिणाम प्राप्त होता है वह वही है जो सदिशों B और C को पहले जोड़कर फिर A को जोड़ने पर मिलता है, अर्थात्

(A + B) + C = A + (B + C) (4.2)

दो समान और विपरीत सदिशों को जोड़ने पर क्या परिणाम मिलता है ? हम दो सदिशों A और A जिन्हें चित्र 4.3(b) में दिखलाया है, पर विचार करते हैं । इनका योग A + (–A) है। क्योंकि दो सदिशों का परिमाण वही है किन्तु दिशा विपरीत है, इसलिए परिणामी सदिश का परिमाण शून्य होगा और इसे 0 से व्यक्त करते हैं।

A A = 0 |0| = 0 (4.3)

0 को हम शून्य सदिश कहते हैं । क्योंकि शून्य सदिश का परिमाण शून्य होता है, इसलिए इसकी दिशा का निर्धारण नहीं किया जा सकता है । दरअसल जब हम एक सदिश A को संख्या शून्य से गुणा करते हैं तो भी परिणामस्वरूप हमें एक सदिश ही मिलेगा किन्तु उसका परिमाण शून्य होगा । O सदिश के मुख्य गुण निम्न हैं:

A + 0 = A

λ 0 = 0

0 A = 0 (4.4)

शून्य सदिश का भौतिक अर्थ क्या है ? जैसाकि चित्र 4.1(a) में दिखाया गया है हम किसी समतल में स्थिति एवं विस्थापन सदिशों पर विचार करते हैं । मान लीजिए कि किसी क्षण t पर कोई वस्तु P पर है । वह P' तक जाकर पुन:P पर वापस आ जाती है । इस स्थिति में वस्तु का विस्थापन क्या होगा ? चूंकि प्रारंभिक एवं अंतिम स्थितियां संपाती हो जाती हैं, इसलिए विस्थापन "शून्य सदिश" होगा ।

सदिशों का व्यवकलन सदिशों के योग के रूप में भी परिभाषित किया जा सकता है । दो सदिशों A व B के अंतर को हम दो सदिशों A व B के योग के रूप में निम्न प्रकार से व्यक्त करते हैं:

A B = A + (–B) (4.5)

इसे चित्र 4.5 में दर्शाया गया है । सदिश B को सदिश A में जोड़कर R2 = (A B) प्राप्त होता है । तुलना के लिए इसी चित्र में सदिश R1 = A + B को भी दिखाया गया है । समान्तर चतुर्भुज विधि को प्रयुक्त करके भी हम दो सदिशों का योग ज्ञात कर सकते हैं । मान लीजिए हमारे पास दो सदिश A व B हैं। इन सदिशों को जोड़ने के लिए उनकी पुच्छ को एक उभयनिष्ठ मूल बिंदु O पर लाते हैं जैसा चित्र 4.6(a) में दिखाया गया है। फिर हम A के शीर्ष से B के समांतर एक रेखा खींचते हैं और B के शीर्ष से A के समांतर एक दूसरी रेखा खींचकर समांतर चतुर्भुज OQSP पूरा करते हैं । जिस बिंदु पर यह दोनों रेखाएं एक दूसरे को काटती हैं, उसे मूल बिंदु O से जोड़ देते हैं। परिणामी सदिश R की दिशा समान्तर चतुर्भुज के मूल बिंदु O से कटान बिंदु S की ओर खींचे गए विकर्ण OS के अनुदिश होगी [चित्र 4.6 (b)]। चित्र 4.6 (c) में सदिशों A व B का परिणामी निकालने के लिए त्रिभुज नियम का उपयोग दिखाया गया है । दोनों चित्रों से स्पष्ट है कि दोनों विधियों से एक ही परिणाम निकलता है । इस प्रकार दोनों विधियाँ समतुल्य हैं।

1505.png

चित्र 4.5 (a) दो सदिश A व B, –B को भी दिखाया गया है । (b) सदिश A से सदिश B का घटाना-परिणामR2 है । तुलना के लिए सदिशों A व B का योग R1 भी दिखलाया गया है ।


1578.png

चित्र 4.6 (a) एक ही उभयनिष्ठ बिंदु वाले दो सदिश A व पर, (b) समान्तर चतुर्भुज विधि द्वारा A+B योग प्राप्त करना, (c) दो सदिशों को जोड़ने की समान्तर चतुर्भुज विधि त्रिभुज विधि के समतुल्य है ।


उदाहरण 4.1 किसी दिन वर्षा 35 ms-1 की चाल से ऊर्ध्वाधर नीचे की ओर हो रही है । कुछ देर बाद हवा
12 ms-1 की चाल से पूर्व से पश्चिम दिशा की ओरचलने लगती है । बस स्टाप पर खड़े किसी लड़के को
अपना छाता किस दिशा में करना चाहिए ?

हल: वर्षा एवं हवा के वेगों को सदिशों vr तथा vw से चित्र 4.7 में दर्शाया गया है। इनकी दिशाएं प्रश्न के अनुसार प्रदर्शित की गई हैं । सदिशों के योग के नियम के अनुसार vr तथा vw का परिणामी R चित्र में खींचा गया है । R का परिमाण होगा-

2115.png 

ऊर्ध्वाधर से R की दिशा θ होगी-

2120.png 

या θ = tan–1 (0.343) = 19°

अतएव लड़के को अपना छाता ऊर्ध्वाधर तल में ऊर्ध्वाधर से 19° का कोण बनाते हुए पूर्व दिशा की ओर रखना
चाहिए ।

4.5 सदिशों का वियोजन

मान लीजिए कि a व b किसी समतल में भिन्न दिशाओं वाले दो शून्येतर (शून्य नहीं) सदिश हैं तथा A इसी समतल में कोई अन्य सदिश है । (चित्र 4.8) तब A को दो सदिशों के योग के रूप में वियोजित किया जा सकता है । एक सदिश a के किसी वास्तविक संख्या के गुणनफल के रूप में और इसी प्रकार दूसरा सदिश b के गुणनफल के रूप में है । एेसा करने के लिए पहले A खींचिए जिसका पुच्छ O तथा शीर्ष P है । फिर O से a के समांतर एक सरल रेखा खींचिए तथा P से एक सरल रेखा b के समांतर खींचिए । मान लीजिए वे एक दूसरे को Q पर काटती हैं । तब,

A = OP = OQ + QP (4.6)

परंतु क्योंकि OQ, a के समांतर है तथा Q P, b के समांतर है इसलिए

oq (4.7)

जहां λ तथा µ कोई वास्तविक संख्याएँ हैं ।

1551.png

चित्र 4-8 (a) दो अरैखिक सदिश a व b, (b) सदिश A का a

व b के पदों में वियोजन ।

अत: 2130.png (4.8)

हम कह सकते हैं कि A को a व b के अनुदिश दो सदिश-घटकों क्रमश: λa तथा µb में वियोजित कर दिया गया है । इस विधि का उपयोग करके हम किसी सदिश को उसी समतल के दो सदिश-घटकों में वियोजित कर सकते हैं । एकांक परिमाण के सदिशों की सहायता से समकोणिक निर्देशांक निकाय के अनुदिश किसी सदिश का वियोजन सुविधाजनक होता है । एेसे सदिशों को एकांक सदिश कहते हैं जिस पर अब हम परिचर्चा करेंगे ।

एकांक सदिश: एकांक सदिश वह सदिश होता है जिसका परिमाण एक हो तथा जो किसी विशेष दिशा के अनुदिश हो । न तो इसकी कोई विमा होती है और न ही कोई मात्रक । मात्र दिशा व्यक्त करने के लिए इसका उपयोग होता है । चित्र 4.9a में प्रदर्शित एक ‘आयतीय निर्देशांक निकाय’ की x, y तथा z अक्षों के अनुदिश एकांक सदिशों को हम क्रमश:2135.pngतथा 2140.png द्वारा व्यक्त करते हैं । क्योंकि ये सभी एकांक सदिश हैं, इसलिए

2145.png (4.9)

ये एकांक सदिश एक दूसरे के लंबवत् हैं । दूसरे सदिशों से इनकी अलग पहचान के लिए हमने इस पुस्तक में मोटे टाइप i, j, k के ऊपर एक कैप (^) लगा दिया है । क्याेंकि इस अध्याय में हम केवल द्विविमीय गति का ही अध्ययन कर रहे हैं अत:हमें केवल दो एकांक सदिशों की आवश्यकता होगी ।

यदि किसी एकांक सदिश 2150.pngको एक अदिश λ से गुणा करें तो परिणामी एक सदिश λ2155.pngहोगा । सामान्यतया किसी सदिश A को निम्न प्रकार से व्यक्त कर सकते हैं:

2160.png (4.10)

1543.png

चित्र 4.9 (a) एकांक सदिश 3027.png,3032.png अक्षों x, y, z के अनुदिश है, (b) किसी सदिश A को x एवं y अक्षों के अनुदिश घटकों A1 तथा A2 में वियोजित किया है, (c) A1 तथा A2 को 3037.pngतथा 3042.pngके पदों में व्यक्त किया है ।

यहाँ A के अनुदिश 2165.png एकांक सदिश है ।

हम किसी सदिश A को एकांक सदिशों 2170.pngतथा 2175.pngके पदों में वियोजित कर सकते हैं । मान लीजिए कि चित्र (4.9b) के अनुसार सदिश A समतल x-y मेें स्थित है । चित्र 4.9(b) के अनुसार A के शीर्ष से हम निर्देशांक अक्षों पर लंब खींचते हैं । इससे हमें दो सदिश A1A2 इस प्रकार प्राप्त हैं कि A1 + A2 = A । क्योंकि A1 एकांक सदिश 2180.png के समान्तर है तथा A2 एकांक सदिश 2185.png के समान्तर है, अत:

A1 = Ax 2190.png, A2 = Ay 2196.png (4.11)

यहाँ Ax तथा Ay वास्तविक संख्याएँ हैें ।

इस प्रकार A = Ax 2201.png+ Ay 2206.png (4.12)

इसे चित्र (4.9c) में दर्शाया गया है । राशियों AxAy को हम सदिश A के x- व y- घटक कहते हैं । यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि Ax सदिश नहीं है, वरन् Ax 2211.pngएक सदिश है । इसी प्रकार Ay 2216.pngएक सदिश है ।

त्रिकोणमिति का उपयोग करके Ax व Ay को A के परिमाण तथा उसके द्वारा x-अक्ष के साथ बनने वाले कोण θ के पदों में व्यक्त कर सकते हैं:

Ax = A cos θ

Ay = A sin θ (4.13)

समीकरण (4.13) से स्पष्ट है कि किसी सदिश का घटक कोण θ पर निर्भर करता है तथा वह धनात्मक, ऋणात्मक या शून्य हो सकता है ।

किसी समतल में एक सदिश A को व्यक्त करने के लिए अब हमारे पास दो विधियाँ हैं:

(i) उसके परिमाण A तथा उसके द्वारा x-अक्ष के साथ बनाए गए कोण θ द्वारा, अथवा

(ii) उसके घटकों Ax तथा Ay द्वारा ।

यदि A तथा θ हमें ज्ञात हैं तो Ax और Ay का मान समीकरण (4.13) से ज्ञात किया जा सकता है । यदि Ax एवं Ay ज्ञात हों तो A तथा θ का मान निम्न प्रकार से ज्ञात किया जा सकता है:

2221.png = A2

अथवा 2226.png (4.14)

एवं 2231.png (4.15)

अभी तक इस विधि में हमने एक (x-y)समतल में किसी सदिश को उसके घटकों में वियोजित किया है किन्तु इसी विधि द्वारा किसी सदिश A को तीन विमाओं में x, y तथा z अक्षों के अनुदिश तीन घटकों में वियोजित किया जा सकता है । यदि A व x-, y-, व z- अक्षों के मध्य कोण क्रमश: α, β तथा γ हो* [चित्र 4.9 (d)] तो

Ax= A cos α, Ay= A cos β, Az = A cos γ 4.16(a)

1660.png

(d)

चित्र 4.9(d) सदिश A का x, y एवं z - अक्षों के अनुदिश घटकों में वियोजन ।

* इस बात पर ध्यान दीजिए कि α, β, व γ कोण दिक्स्थान में हैं । ये एेसी दो रेखाओं के बीच के कोण हैं जो एक समतल में नहीं हैं ।

सामान्य रूप से,

2236.png (4.16b)

सदिश A का परिमाण

2241.png (4.16c)

होगा ।

एक स्थिति सदिश r को निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है:

bv (4.17)

यहां x, y तथा z सदिश r के अक्षों x-, y-, z- के अनुदिश घटक हैं ।

4.6 सदिशों का योग :विश्लेषणात्मक विधि

यद्यपि सदिशों को जोड़ने की ग्राफी विधि हमें सदिशों तथा उनके परिणामी सदिश को स्पष्ट रूप से समझने में सहायक होती है, परन्तु कभी-कभी यह विधि जटिल होती है और इसकी शुद्धता भी सीमित होती है । भिन्न-भिन्न सदिशों को उनके संगत घटकों को मिलाकर जोड़ना अधिक आसान होता है। मान लीजिए कि किसी समतल में दो सदिश A तथा B हैं जिनके घटक क्रमश:Ax, Ay तथा Bx, By हैं तो

aj

bi (4.18)

मान लीजिए कि R इनका योग है, तो

R= A+B

aij (4.19)

क्योंकि सदिश क्रमविनिमेय तथा साहचर्य नियमों का पालन करते हैं, इसलिए समीकरण (4.19) में व्यक्त किए गए सदिशों को निम्न प्रकार से पुन:व्यवस्थित कर सकते हैं:

rdx

इस प्रकार परिणामी सदिश R का प्रत्येक घटक सदिशों A और B के संगत घटकों के योग के बराबर होता है ।

तीन विमाओं के लिए सदिशों A और B को हम निम्न प्रकार से व्यक्त करते हैं:

abr

जहाँ घटकों Rx, Ry तथा Rz के मान निम्न प्रकार से हैं:

Rx = Ax + Bx

Ry = Ay + By

Rz = Az + Bz (4.22)

इस विधि को अनेक सदिशों को जोड़ने व घटाने के लिए उपयोग में ला सकते हैं । उदाहरणार्थ, यदि a, b तथा c तीनों सदिश निम्न प्रकार से दिए गए हों:

aba

तो सदिश T = a + b c के घटक निम्नलिखित होंगे:

Tx = ax + bx cx

Ty = ay + by cy

Tz = az + bz cz (4.23b)

¯ उदाहरण 4.2 चित्र 4.10 में दिखाए गए दो सदिशों A तथा B के बीच का कोण θ है । इनके परिणामी सदिशका परिमाण तथा दिशा उनके परिमाणों तथा θ के पद में निकालिए ।


1681.png

चित्र 4.10

हल चित्र 4.10 के अनुसार मान लीजिए कि OP तथा OQ दो सदिशों A तथा B को व्यक्त करते हैं, जिनके बीच का कोण θ है । तब सदिश योग के समान्तर चर्तुभुज नियम द्वारा हमें परिणामी सदिश R प्राप्त होगा जिसे चित्र में OS द्वारा दिखाया गया है । इस प्रकार
R = A + B

चित्र में SN, OP के लंबवत् है तथा PM, OS के लंबवत् है ।

OS2= ON2 + SN2

किन्तु ON = OP + PN = A + B cos θ

SN = B sin θ

OS2 = (A+B cos θ)2 + (B sin θ)2

अथवा R2 = A2 + B2 + 2AB cos θ

2308.png (4.24a)

त्रिभुज OSN में, SN = OS sin α = R sin α

एवं त्रिभुज PSN में, SN = PS sin θ = B sin θ

अतएव R sin α = B sin θ

अथवा 2316.png (4.24b)

इसी प्रकार, PM = A sin α = B sin β

अथवा 2324.png (4.24c)

समीकरणों (4.24b) तथा (4.24c) से हमें प्राप्त होता है-

2334.png (4.24d)

समीकरण (4.24d) के द्वारा हम निम्नांकित सूत्र प्राप्त करते हैं-

2339.png (4.24e)

यहाँ R का मान समीकरण (4.24a) में दिया गया है ।

या, 2344.png (4.24f)

समीकरण (4.24a) से परिणामी R का परिमाण तथा समीकरण (4.24e) से इसकी दिशा मालूम की जा सकती है । समीकरण (4.24a) को कोज्या-नियम तथा समीकरण (4.24d) को ज्या-नियम कहते हैं ।

¯ उदाहरण 4.3 एक मोटरबोट उत्तर दिशा की ओर 25 km/h के वेग से गतिमान है । इस क्षेत्र में जल-धारा का वेग 10 km/h है । जल-धारा की दिशा दक्षिण से पूर्व की ओर 60॰ पर है । मोटरबोट का परिणामी वेग निकालिए ।

हल चित्र 4.11 में सदिश vb मोटरबोट के वेग को तथा vc जल धारा के वेग को व्यक्त करते हैं । प्रश्न के अनुसार चित्र में इनकी दिशायें दर्शाई गई हैं । सदिश योग के समांतर चतुर्भुज नियम के अनुसार प्राप्त परिणामी R की दिशा चित्र में दर्शाई गई है । कोज्या-नियम का उपयोग करके हम R का परिमाण निकाल सकते हैं ।

1631.png

चित्र 4.11

2349.png

2358.png

R की दिशा ज्ञात करने के लिए हम ‘ज्या-नियम’ का उपयोग करते हैं--

2371.png या, 2376.png

2381.png

2386.png


4
.7 किसी समतल में गति

इस खण्ड में हम सदिशों का उपयोग कर दो या तीन विमाओं में गति का वर्णन करेंगे ।

4.7.1 स्थिति सदिश तथा विस्थापन

किसी समतल में स्थित कण P का x-y निर्देशतंत्र के मूल बिंदु के सापेक्ष स्थिति सदिश r [चित्र (4.12)] को निम्नलिखित समीकरण से व्यक्त करते हैं:

rx

यहाँ x तथा y अक्षों x-तथा y- के अनुदिश r के घटक हैं । इन्हें हम कण के निर्देशांक भी कह सकते हैं ।

मान लीजिए कि चित्र (4.12b) के अनुसार कोई कण मोटी रेखा से व्यक्त वक्र के अनुदिश चलता है । किसी क्षण t पर इसकी स्थिति P है तथा दूसरे अन्य क्षण t' पर इसकी स्थिति P' है । कण के विस्थापन को हम निम्नलिखित प्रकार से लिखेंगे,

r = r' r (4.25)

इसकी दिशा P से P' की ओर है ।

1742.png

1751.png

चित्र 4.12 (a) स्थिति सदिश r, (b) विस्थापन r तथा कण का औसत वेगv


समीकरण
(4.25) को हम सदिशों के घटक के रूप में निम्नांकित प्रकार से व्यक्त करेंगे,
rxj
ij

यहाँ x = x x, y = y y (4.26)

वेग

वस्तु के विस्थापन और संगत समय अंतराल के अनुपात को हम औसत वेग (vd) कहते हैं, अत:

2406.png(4.27)

अथवा, 2411.png

क्योंकि 2416.png, इसलिए चित्र (4.12) के अनुसार औसत वेग की दिशा वही होगी, जो r की है ।

गतिमान वस्तु का वेग (तात्क्षणिक वेग) अति सूक्ष्म समयान्तराल (t→0 की सीमा में)विस्थापन r का समय अन्तराल t से अनुपात है । इसे हम v से व्यक्त करेंगे, अत:

2422.png (4.28)

चित्रों 4.13(a) से लेकर 4.13(d) की सहायता से इस सीमान्त प्रक्रम को आसानी से समझा जा सकता है । इन चित्रों में मोटी रेखा उस पथ को दर्शाती है जिस पर कोई वस्तु क्षण t पर बिंदु P से चलना प्रारम्भ करती है । वस्तु की स्थिति t1, t2, t3, समयों के उपरांत क्रमश:P1, P2,P3, से व्यक्त होती है । इन समयों में कण का विस्थापन क्रमश:r1, r2, r3, है । चित्रों (a), (b) तथा (c) में क्रमश:घटते हुए t के मानों अर्थात् t1, t2, t3, (t1> t2> t3) के लिए कण के औसत वेग 2434.png  की दिशा को दिखाया गया है । जैसे ही t →0 तोr→0 एवं r पथ की स्पर्श रेखा के अनुदिश हो जाता है (चित्र 4.13d)। इस प्रकार पथ के किसी बिंदु पर वेग उस बिंदु पर खींची गई स्पर्श रेखा द्वारा व्यक्त होता है जिसकी दिशा वस्तु की गति के अनुदिश होती है।


* xy के पदों में ax तथा ay को हम निम्न प्रकार से व्यक्त करते हैं:

3047.png


सुविधा के लिए v को हम प्राय:घटक के रूप में निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त करते हैं:

dr

abcd

चित्र 4.13 जैसे ही समय अंतराल ∆ t शून्य की सीमा को स्पर्श कर लेता है, औसत वेग -v वस्तु के वेग v के बराबर हो जाता है । v की दिशा किसी क्षण पथ पर स्पर्श रेखा के समांतर है।

ya

अत:यदि समय के फलन के रूप में हमें निर्देशांक x और y ज्ञात हैं तो हम उपरोक्त समीकरणों का उपयोग vx और vy निकालने में कर सकते हैं ।

सदिश v का परिमाण निम्नलिखित होगा,

2464 (4.30b)

तथा इसकी दिशा कोण θ द्वारा निम्न प्रकार से व्यक्त होगी:

2469.png (4.30c)

चित्र 4.14 में बिन्दु P पर किसी वेग सदिश v के लिए vx, vy तथा कोण θ को दर्शाया गया है ।

2474.png

चित्र 4.14 वेग v के घटक vx, vy तथा कोण θ जो x-अक्ष से बनाता है । चित्र में vx = v cosθ, vy = v sin θ

 त्वरण

x-y समतल में गतिमान वस्तु का औसत त्वरण (_a) उसके वेग में परिवर्तन तथा संगत समय अंतराल t के अनुपात के बराबर होता है:

av

त्वरण (तात्क्षणिक त्वरण) औसत त्वरण के सीमान्त मान के बराबर होता है जब समय अंतराल शून्य हो जाता है:

al

वेग की भाँति यहाँ भी वस्तु के पथ को प्रदर्शित करने वाले किसी आलेख में त्वरण की परिभाषा के लिए हम ग्राफी विधि से सीमान्त प्रक्रम को समझ सकते हैं । इसे चित्रों (4.15a) से (4.15d) तक में समझाया गया है । किसी क्षण t पर कण की स्थिति बिंदु P द्वारा दर्शाई गई है । t1, t2, t3, (t1>t2>t3) समय के बाद कण की स्थिति क्रमश:बिंदुओं P1, P2, P3 द्वारा व्यक्त की गई है । चित्रों (4.15) a, b और c में इन सभी बिंदुओं P, P1, P2, P3 पर वेग सदिशों को भी दिखाया गया है । प्रत्येक t के लिए सदिश योग के त्रिभुज नियम का उपयोग करके v का मान निकालते हैं । परिभाषा के अनुसार औसत त्वरण की दिशा वही है जो v की होती है । हम देखते हैं कि जैसे-जैसे t का मान घटता जाता है वैसे-वैसे v की दिशा भी बदलती जाती है और इसके परिणामस्वरूप त्वरण की भी दिशा बदलती है । अंतत:t 0 सीमा में [चित्र 4.15 (d)] औसत त्वरण, तात्क्षणिक त्वरण के बराबर हो जाता है और इसकी दिशा चित्र में दर्शाए अनुसार होती है ।

1852.png

चित्र 4.15 तीन समय अंतरालों (a) t1, (b) ∆t2, (c) t3, (t1>t2>t3) के लिए औसत त्वरण 3052.png (d) t0 सीमा के अंतर्गत औसत त्वरण वस्तु के त्वरण के बराबर होता है ।

ध्यान दें कि एक विमा में वस्तु का वेग एवं त्वरण सदैव एक सरल रेखा में होते हैं (वे या तो एक ही दिशा में होते हैं अथवा विपरीत दिशा में) । परंतु दो या तीन विमाओं में गति के लिए वेग एवं त्वरण सदिशों के बीच 0॰ से 180॰ के बीच कोई भी कोण हो सकता है।

¯ उदाहरण 4.4 किसी कण की स्थिति rk है । जहां t सेकंड में व्यक्त किया गया है । अन्य गुणकों के मात्रक इस प्रकार हैं कि r मीटर में व्यक्त हो जाएँ।  (a) कण का v(t) व a(t) ज्ञात कीजिए; (b) t = 1.0 s पर v(t) का परिमाण व दिशा ज्ञात कीजिए ।
jk

इसका परिमाण vm है, तथा

इसकी दिशा 2543.png °

4.8 किसी समतल में एकसमान त्वरण से गति

मान लीजिए कि कोई वस्तु एक समतल x-y में एक समान त्वरण a से गति कर रही है अर्थात् a का मान नियत है । किसी समय अंतराल में औसत त्वरण इस स्थिर त्वरण
के मान
2553.png के बराबर होगा 2553.png = a । अब मान लीजिए किसी क्षण t = 0 पर वस्तु का वेग v0 तथा दूसरे अन्य क्षण t पर उसका वेग v है ।

तब परिभाषा के अनुसार

2558.png

अथवा v = v0 + a t (4.33a)

उपर्युक्त समीकरण को सदिशों के घटक के रूप में निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त करते हैं-

vx = v0x+axt

vy = v0y + ayt (4.33b)

अब हम देखेंगे कि समय के साथ स्थिति सदिश r किस प्रकार बदलता है । यहाँ एकविमीय गति के लिए बताई गई विधि का उपयोग करेंगे । मान लीजिए कि t = 0 तथा t = t क्षणों पर कण के स्थिति के सदिश क्रमश:r0 तथा r हैं तथा इन क्षणों पर कण के वेग v0 तथा v हैं । तब समय अंतराल t 0 = t में कण का औसत वेग (vo + v)/2 तथा विस्थापन r r0 होगा । क्योंकि विस्थापन औसत तथा समय अंतराल का गुणनफल होता है,
अर्थात्

2563.png

= v0 + 2575.pngat2

अतएव,

2580.png (4.34a)

यह बात आसानी से सत्यापित की जा सकती है कि समीकरण (4.34a)का अवकलन 2586.png समीकरण (4.33a) है तथा साथ ही t = 0 क्षण पर r = r0 की शर्त को भी पूरी करता है । समीकरण (4.34a) को घटकों के रूप में निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त कर सकते हैं:

x = x0 + vox t + 2596.png ax t2

y = y0 + voy t + 2601.png ay t2 (4.34b)

समीकरण (4.34b) की सीधी व्याख्या यह है कि xy दिशाओं में गतियाँ एक दूसरे पर निर्भर नहीं करती हैं । अर्थात्, किसी समतल (दो विमा) में गति को दो अलग-अलग समकालिक एकविमीय एकसमान त्वरित गतियों के रूप मेें समझ सकते हैं जो परस्पर लंबवत् दिशाओं के अनुदिश हों। यह महत्वपूर्ण परिणाम है जो दो विमाओं में वस्तु की
गति के विश्लेषण में उपयोगी होता है । यहाँ परिणाम त्रिविमीय गति के लिए भी है । बहुत-सी भौतिक स्थितियों में दो लंबवत् दिशाओं का चुनाव सुविधाजनक होता है जैसा कि हम प्रक्षेप्य गति के लिए खण्ड (
4.10) में देखेंगे ।

¯ उदाहरण 4.5 t = 0 क्षण पर कोई कण मूल बिंदु से 5.0i m/s के वेग से चलना शुरू करता है । x - y समतल में उस पर एक एेसा बल लगता है जो उसमें एकसमान त्वरण (3.0i + 2.0j) m/s2 उत्पन्न करता है । (a) जिस क्षण पर कण का x निर्देशांक 84 m हो उस क्षण उसका y निर्देशांक कितना होगा ? (b) इस क्षण कण की चाल क्या होगी?

हल समीकरण (4.34 a) से r0= 0 पर प्रश्नानुसार कण की स्थिति निम्नांकित समीकरण से व्यक्त होगी,
r(t) = v0 t + 2606.pnga t2

51

52


4
.9 दो विमाओं में आपेक्षिक वेग

खण्ड 3.7 में किसी सरल रेखा के अनुदिश जिस आपेक्षिक वेग की धारणा से हम परिचित हुए हैं, उसे किसी समतल में या त्रिविमीय गति के लिए आसानी से विस्तारित कर सकते हैं । माना कि दो वस्तुएँ AB वेगों vA तथा vB से गतिमान हैं (प्रत्येक गति किसी सामान्य निर्देश तंत्र जैसे धरती के सापेक्ष है)। अत:वस्तु A का B के सापेक्ष वेग:

vAB= va vb (4.35a)

होगा । इसी प्रकार, वस्तु B का A के सापेक्ष वेग निम्न होगा:

vBA= vB vA

अतएव, vAB= vbA (4.35b)

तथा |vAB| = |vba| (4.35c)

¯ उदाहरण 4.6 : ऊर्ध्वाधर दिशा में 35 m s–1 की चाल से वर्षा हो रही है । कोई महिला पूर्व से पश्चिम दिशा में 12 m s–1 की चाल से साइकिल चला रही है । वर्षा से बचने के लिए उसे छाता किस दिशा में लगाना चाहिए ?

हल चित्र 4.16 में vr वर्षा के वेग को तथा vb महिला द्वारा चलाई जा रही साइकिल के वेग को व्यक्त करते हैं । ये दोनों वेग धरती के सापेक्ष हैं । क्योंकि महिला साइकिल चला रही है इसलिए वर्षा के जिस वेग का उसे आभास होगा वह साइकिल के सापेक्ष वर्षा का वेग होगा । अर्थात्

vrb = vr - vb

चित्र 4.16 के अनुसार यह सापेक्ष वेग सदिश ऊर्ध्वाधर से θ कोण बनाएगा जिसका मान

tan

होगा । अर्थात् θ ≅ 190 

1911.png

चित्र 4.16

अत:महिला को अपना छाता ऊर्ध्वाधर दिशा से 190 का कोण बनाते हुए पश्चिम की ओर रखना चाहिए ।

आप इस प्रश्न तथा उदाहरण 4.1 के अंतर पर ध्यान दीजिए । उदाहरण 4.1 में बालक को दो वेगों के परिणामी (सदिश योग) का आभास होता है जबकि इस उदाहरण में महिला को साइकिल के सापेक्ष वर्षा के वेग (दोनों वेगों के सदिश अंतर) का आभास होता है ।

4.10 प्रक्षेप्य गति

इससे पहले खण्ड में हमने जो विचार विकसित किए हैं, उदाहरणस्वरूप उनका उपयोग हम प्रक्षेप्य की गति के अध्ययन के लिए करेंगे । जब कोई वस्तु उछालने के बाद उड़ान में हो या प्रक्षेपित की गई हो तो उसे प्रक्षेप्य कहते हैं । एेसा प्रक्षेप्य फुटबॉल, क्रिकेट की बॉल, बेस-बॉल या अन्य कोई भी वस्तु हो सकती है । किसी प्रक्षेप्य की गति को दो अलग-अलग समकालिक गतियों के घटक के परिणाम के रूप में लिया जा सकता है । इनमें से एक घटक बिना किसी त्वरण के क्षैतिज दिशा में होता है तथा दूसरा गुरुत्वीय बल के कारण एकसमान त्वरण से ऊर्ध्वाधर दिशा में होता है ।

सर्वप्रथम गैलीलियो ने अपने लेख डायलॉग आन दि ग्रेट वर्ल्ड सिस्टम्स (1632) में प्रक्षेप्य गति के क्षैतिज एवं ऊर्ध्वाधर घटकों की स्वतंत्र प्रकृति का उल्लेख किया था ।

इस अध्ययन में हम यह मानेंगे कि प्रक्षेप्य की गति पर वायु का प्रतिरोध नगण्य प्रभाव डालता है । माना कि प्रक्षेप्य को एेसी दिशा की ओर v0 वेग से फेंका गया है जो x- अक्ष से (चित्र 4.17 के अनुसार) θ0 कोण बनाता है ।

फेंकी गई वस्तु को प्रक्षेपित करने के बाद उस पर गुरुत्व के कारण लगने वाले त्वरण की दिशा नीचे की ओर होती है:

gj

अर्थात् ax = 0, तथा ay = g (4.36) 

2626.png

चित्र 4.17 v0 वेग से θ0 कोण पर प्रक्षेपित किसी वस्तु की गति ।

प्रारंम्भिक वेग v0 के घटक निम्न प्रकार होंगे:

vox = v0 cos θ0

voy = v0 sin θ0 (4.37)

यदि चित्र 4.17 के अनुसार वस्तु की प्रारंभिक स्थिति निर्देश तंत्र के मूल बिंदु पर हो, तो

x0 = 0, y0 = 0

इस प्रकार समीकरण (4.34b) को निम्न प्रकार से लिखेंगे:

x = vox t = (v0cos θ0)t

तथा, y = (v0sin θ0) t  1/2 g t2 (4.38)

समीकरण (4.33b) का उपयोग करके किसी समय t के लिए वेग के घटकों को नीचे लिखे गए समीकरणों से व्यक्त करेंगे:

vx = vox = v0 cos θ0

vy = v0 sin θ0 g t (4.39)

समीकरण (4.38) से हमें किसी क्षण t पर प्रारंभिक वेग v0 तथा प्रक्षेप्य कोण θ0 के पदों में प्रक्षेप्य के निर्देशांक x- और y- प्राप्त हो जाएँगे । इस बात पर ध्यान दीजिए कि x व y दिशाओं के परस्पर लंबवत् होने के चुनाव से प्रक्षेप्य गति के विश्लेषण में पर्याप्त सरलता हो गई है । वेग के दो घटकों में से एक
x- घटक गति की पूरी अवधि में स्थिर रहता है जबकि दूसरा y- घटक इस प्रकार परिवर्तित होता है मानो प्रक्षेप्य स्वतंत्रतापूर्वक नीचे गिर रहा हो । चित्र 4.18 में विभिन्न क्षणों के लिए इसे आलेखी विधि से दर्शाया गया है । ध्यान दीजिए कि अधिकतम ऊँचाई वाले बिंदु के लिए vy = 0 तथा

2644.png 

प्रक्षेपक के पथ का समीकरण

प्रक्षेप्य द्वारा चले गए पथ की आकृति क्या होती है ? इसके लिए हमें पथ का समीकरण निकालना होगा । समीकरण (4.38) में दिए गए x व y व्यंजकों से t को विलुप्त करने से निम्नलिखित समीकरण प्राप्त होता है:

2654.png(4.40)

यह प्रक्षेप्य के पथ का समीकरण है और इसे चित्र 4.18 में दिखाया गया है । क्योंकि g, θ0 तथा v0 अचर हैं, समीकरण (4.40) को निम्न प्रकार से व्यक्त कर सकते हैं:

y = ax + bx2

इसमेें a तथा b नियतांक हैं । यह एक परवलय का समीकरण है, अर्थात् प्रक्षेप्य का पथ परवलयिक होता है ।

2659.png 

चित्र 4.18 प्रक्षेप्य का पथ परवलयाकार होता है ।

अधिकतम ऊँचाई का समय

प्रक्षेप्य अधिकतम ऊँचाई तक पहुँचने के लिए कितना समय लेता है? मान लीजिए कि यह समय tm है । क्योंकि इस बिंदु पर vy = 0 इसलिए समीकरण (4.39) से हम tm का मान निकाल सकते हैं:

vy = v0 sin θ0 gtm = 0

अथवा tm = vo sinθo /g (4.41a)

प्रक्षेप्य की उड़ान की अवधि में लगा कुल समय Tf हम समीकरण (4.38) में y = 0 रखकर निकाल लेते हैं । इसलिए,

Tf = 2 (vo sin θo )/g (4.41b)

Tf को प्रक्षेप्य का उड्डयन काल कहते हैं । यह ध्यान देने की बात है कि Tf = 2tm । पथ की सममिति से हम एेसे ही परिणाम की आशा करते हैं ।

प्रक्षेप्य की अधिकतम ऊँचाई

समीकरण (4.38) में t = tm रखकर प्रक्षेप्य द्वारा प्राप्त अधिकतम ऊँचाई hm की गणना की जा सकती है ।

2672.png 

या2677.png      (4.42)

प्रक्षेप्य का क्षैतिज परास

प्रारंभिक स्थिति (x = y = 0) से चलकर उस स्थिति तक जब y = 0 हो प्रक्षेप्य द्वारा चली गई दूरी को क्षैतिज परास, R, कहते हैं। क्षैतिज परास उड्डयन काल Tf में चली गई दूरी है । इसलिए, परास R होगा:

R = (v0cos θ0)(Tf)

=(vo cos θo) (2 vo sin θo)/g

अथवा 2692.png (4.43)

समीकरण (4.43) से स्पष्ट है कि किसी प्रक्षेप्य के वेग v0 लिए R अधिकतम तब होगा जब θ0 = 450 क्योंकि sin 900 = 1 (जो sin 2θ0 का अधिकतम मान है) । इस प्रकार अधिकतम क्षैतिज परास होगा

 2687.png    (4.43a)

¯ उदाहरण 4.7 :गैलीलियो ने अपनी पुस्तक "टू न्यू साइंसेज़" में कहा है कि "उन उन्नयनों के लिए जिनके मान 45॰ से बराबर मात्रा द्वारा अधिक या कम हैं, क्षैतिज परास बराबर होते हैं" । इस कथन को सिद्ध कीजिए ।

हल यदि कोई प्रक्षेप्य θ0 कोण पर प्रांरभिक वेग v0 से फेंका जाए, तो उसका परास

2682.png होगा।

अब कोणों (450 + α) तथा (450 - α) के लिए 2θ0 का मान क्रमश:(900 + 2α) तथा (900 - 2α) होगा । sin(900 + 2α) तथा sin(900 2α) दोनों का मान समान अर्थात् cos 2α होता है । अत:उन उन्नयनों के लिए जिनके मान 450 से बराबर मात्रा द्वारा कम या अधिक हैं, क्षैतिज परास बराबर होते हैं ।

¯ उदाहरण 4.8 : एक पैदल यात्री किसी खड़ी चट्टान के कोने पर खड़ा है । चट्टान जमीन से 490 m ऊंची है । वह एक पत्थर को क्षैतिज दिशा में 15 m s–1 की आरंभिक चाल से फेंकता है । वायु के प्रतिरोध को नगण्य मानते हुए यह ज्ञात कीजिए कि पत्थर को जमीन तक पहुँचने में कितना समय लगा तथा जमीन से टकराते समय उसकी चाल कितनी थी? (g = 9.8 m s–2)।

हल हम खड़ी चट्टान के कोने को x- तथा y- अक्ष का मूल बिंदु तथा पत्थर फेंके जाने के समय को t = 0 मानेंगे । x- अक्ष की धनात्मक दिशा आरंभिक वेग के अनुदिश तथा y-अक्ष की धनात्मक दिशा ऊर्ध्वाधर ऊपर की ओर चुनते हैं । जैसा कि हम पहले कह चुके हैं कि गति के x-y- घटक एक दूसरे पर निर्भर नहीं करते, इसलिए

x(t) = x0 + vox t

y(t) = y0 + voy t + (1/2) ay t2

यहाँ xo = yo = 0, voy = 0, ay = g = –9.8 m s-2

vox = 15 m s-1.

पत्थर उस समय जमीन से टकराता है जब y(t) = 490 m

490 m = (1/2) (9.8)t2

अर्थात् t = 10 s

वेग घटक vx = vox तथा vy = voy g t होंगे ।

अत:, जब पत्थर जमीन से टकराता है, तब

vox = 15 m s–1

voy = 0 9.8 × 10 = –98 m s–1

इसलिए पत्थर की चाल

2697.png होगी ।

¯ उदाहरण 4.9 : क्षैतिज से ऊपर की ओर 30॰ का कोण बनाते हुए एक क्रिकेट गेंद 28 m s–1 की चाल से फेंकी जाती है । (a) अधिकतम ऊँचाई की गणना कीजिए, (b) उसी स्तर पर वापस पहुँचने में लगे समय की गणना कीजिए, तथा (c) फेंकने वाले बिंदु से उस बिंदु की दूरी जहाँ गेंद उसी स्तर पर पहुँची है, की गणना कीजिए ।

हल (a) अधिकतम ऊँचाई

hs

= 10.0 m होगी ।

(b) उसी धरातल पर वापस आने में लगा समय

Tf = (2 vo sin θo )/g = (2 × 28 × sin 30° )/9.8 = 28/9.8 s = 2.9 s होगा ।

(c) फेंकने वाले बिंदु से उस बिंदु की दूरी जहाँ गेंद उसी स्तर पर पहुँचती है:

R= 2707.png होगी।


वायु प्रतिरोध की उपेक्षा करना - इस अभिधारणा का वास्तविक अर्थ क्या है?

प्रक्षेप्य गति के विषय में बात करते समय, हमने कहा है, कि हमने यह मान रखा है, कि वायु के प्रतिरोध का प्रक्षेप्य की गति पर कोई प्रभाव नहीं होता। आपको यह समझना चाहिए, कि इस कथन का वास्तविक अर्थ क्या है? घर्षण, श्यानता बल, वायु प्रतिरोध ये सभी क्षयकारी बल हैं। गति का विरोध करते एेसे बलों की उपस्थिति के कारण गतिमान पिंड की मूल ऊर्जा, और परिणामत:इसके संवेग, में कमी आएगी। अत:अपने परवलयाकार पथ पर गतिमान कोई प्रक्षेप्य वायु प्रतिरोध की उपस्थिति में निश्चित रूप से, अपने आदर्श गमन-पथ से विचलित हो जाएगा। यह धरातल से उसी वेग से आकर नहीं टकराएगा जिससे यह फेंका गया था। वायु प्रतिरोध की अनुपस्थिति में वेग का x-अवयव अचर रहता है और केवल y-अवयव में ही सतत परिवर्तन होता है। तथापि, वायु प्रतिरोध की उपस्थिति में, ये दोनों ही अवयव प्रभावित होंगे। इसका अर्थ यह होगा कि प्रक्षेप्य का क्षैतिज परास समीकरण (4.43) द्वारा प्राप्त मान से कम होगा। अधिकतम ऊँचाई भी समीकरण (4.42) द्वारा प्रागुक्त मान से कम होगी। तब, क्या आप अनुमान लगा सकते हैं, कि उड्डयन काल में क्या परिवर्तन होगा?

वायु-प्रतिरोध से बचना हो, तो हमें प्रयोग, निर्वात में, या बहुत कम दाब की स्थिति में करना होगा जो आसान कार्य नहीं है। जब हम ‘वायु प्रतिरोध को नगण्य मान लीजिए’ जैसे वाक्यांशों का प्रयोग करते हैं, तो हम यह कहना चाहते हैं, कि परास, ऊँचाई जैसे प्राचलों में, इसके कारण होने वाला परिवर्तन, वायुविहीन स्थिति में ज्ञात इनके मानों की तुलना में बहुत कम है। बिना वायु-प्रतिरोध को विचार में लाए गणना करना आसान होता है बनिस्बत उस स्थिति के जब हम वायु प्रतिरोध को गणना में लाते हैं।


4
.11 एकसमान वृत्तीय गति

जब कोई वस्तु एकसमान चाल से एक वृत्ताकार पथ पर चलती है, तो वस्तु की गति को एकसमान वृत्तीय गति कहते हैं । शब्द "एकसमान" उस चाल के संदर्भ में प्रयुक्त हुआ है जो वस्तु की गति की अवधि में एकसमान (नियत) रहती है । माना कि चित्र 4.19 के अनुसार कोई वस्तु एकसमान चाल v से R त्रिज्या वाले वृत्त के अनुदिश गतिमान है । क्योंकि वस्तु के वेग की दिशा में निरन्तर परिवर्तन हो रहा है, अत:उसमें त्वरण उत्पन्न हो रहा है। हमें त्वरण का परिमाण तथा उसकी दिशा ज्ञात करनी है ।

माना rr' तथा v व v' कण की स्थिति तथा गति सदिश हैं जब वह गति के दौरान क्रमश:बिंदुओं PP' पर है (चित्र 4.19a) । परिभाषा के अनुसार, किसी बिंदु पर कण का वेग उस बिंदु पर स्पर्श रेखा के अनुदिश गति की दिशा में होता है । चित्र 4.19(a1) में वेग सदिशों vv' को दिखाया गया है। चित्र 4.19(a2) में सदिश योग के त्रिभुज नियम का उपयोग करके v निकाल लेते हैं । क्योंकि पथ वृत्तीय है, इसलिए चित्र में, ज्यामिति से स्पष्ट है कि v, r के तथा v', r' के लंबवत् हैं । इसलिए, v, r के लंबवत् होगा । पुन:क्योंकि औसत त्वरण vt के अनुदिश है, इसलिए 2727.png भी r के लंबवत् होगा । अब यदि हम v को उस रेखा पर रखें जो r व r' के बीच के कोण को द्विभाजित करती है तो हम देखेंगे कि इसकी दिशा वृत्त के केंद्र की ओर होगी । इन्हीे राशियों को चित्र 4.19(b) में छोटे समय अंतराल के लिए दिखाया गया है । v, अत:2742.png की दिशा पुन:केंद्र की ओर होगी । चित्र (4.19c) में t0 है, इसलिए औसत त्वरण, तात्क्षणिक त्वरण के बराबर हो जाता है । इसकी दिशा केंद्र की ओर होती है* । इस प्रकार, यह निष्कर्ष निकलता है कि एकसमान वृत्तीय गति के लिए वस्तु के त्वरण की दिशा वृत्त के केंद्र की ओर होती है । अब हम इस त्वरण का परिमाण निकालेंगे।

1956.png

चित्र 4.19 किसी वस्तु की एकसमान वृत्तीय गति के लिए वेग तथा त्वरण । चित्र (aसे (cतक tघटता जाता है (चित्र c में शून्य हो जाता है) । वृत्ताकार पथ के प्रत्येक बिंदु पर त्वरण वृत्त के केंद्र की ओर होता है ।

परिभाषा के अनुसार, a का परिमाण निम्नलिखित सूत्र से व्यक्त होता है,

lima


t0 सीमा में rr के लंबवत् हो जाता है । इस सीमा में क्योंकि v 0 होता है, फलस्वरूप यह भी v के लंबवत् होगा । अत:वृत्तीय पथ के प्रत्येक बिंदु पर त्वरण की दिशा केंद्र की ओर होती है।


मान लीजिए r व r' के बीच का कोण ∆θ है । क्योंकि वेग सदिश vv' सदैव स्थिति सदिशों के लंबवत् होते हैं, इसलिए उनके बीच का कोण भी ∆θ होगा । अतएव स्थिति सदिशों द्वारा निर्मित त्रिभुज (CPP') तथा वेग सदिशों v, v' व v द्वारा निर्मित त्रिभुज (GHI) समरूप हैं (चित्र 4.19a) । इस प्रकार एक त्रिभुज के आधार की लंबाई व किनारे की भुजा की लंबाई का अनुपात दूसरे त्रिभुज की तदनुरूप लंबाइयों के अनुपात के बराबर होगा, अर्थात्

vr

या 2747.png

इसलिए,

2752.png

यदि t छोटा है, तो ∆θ भी छोटा होगा । एेसी स्थिति में चाप PP' को लगभग |r| के बराबर ले सकते हैं ।

अर्थात्, |r| v t

या 2757.png अथवा 2763.png

इस प्रकार, अभिकेंद्र त्वरण ac का मान निम्नलिखित होगा,

ac =2768.pngv = v2/R (4.44)

इस प्रकार किसी R त्रिज्या वाले वृत्तीय पथ के अनुदिश v चाल से गतिमान वस्तु के त्वरण का परिमाण v2/R होता है जिसकी दिशा सदैव वृत्त के केंद्र की ओर होती है । इसी कारण इस प्रकार के त्वरण को अभिकेंद्र त्वरण कहते हैं (यह पद न्यूटन ने सुझाया था) । अभिकेंद्र त्वरण से संबंधित संपूर्ण विश्लेषणात्मक लेख सर्वप्रथम 1673 में एक डच वैज्ञानिक क्रिस्चियान हाइगेन्स (1629-1695) ने प्रकाशित करवाया था, किन्तु संभवतया न्यूटन को भी कुछ वर्षों पूर्व ही इसका ज्ञान हो चुका था । अभिकेंद्र को अंग्रेजी में सेंट्रीपीटल कहते हैं जो एक ग्रीक शब्द है जिसका अभिप्राय केंद्र-अभिमुख (केंद्र की ओर) है । क्योंकि v तथा R दोनों अचर हैं इसलिए अभिकेंद्र त्वरण का परिमाण भी अचर होता है। परंतु दिशा बदलती रहती है और सदैव केंद्र की ओर होती है। इस प्रकार निष्कर्ष निकलता है कि अभिकेंद्र त्वरण एकसमान सदिश नहीं होता है ।

किसी वस्तु के एकसमान वृत्तीय गति के वेग तथा त्वरण को हम एक दूसरे प्रकार से भी समझ सकते हैं । चित्र 4.19 में दिखाए गए अनुसारt (=t't) समय अंतराल में जब कण P से P' पर पहुँच जाता है तो रेखा CP कोण ∆θ से घूम जाती है । ∆θ को हम कोणीय दूरी कहते हैं । कोणीय वेग ω (ग्रीक अक्षर ‘ओमेगा’) को हम कोणीय दूरी के समय परिवर्तन की दर के रूप में परिभाषित करते हैं । इस प्रकार,

2773.png (4.45)

अब यदि t समय में कण द्वारा चली दूरी को s से व्यक्त करें (अर्थात् PP'=s) तो,

2778.png 

किंतु s = R∆θ, इसलिए 2783.png

अत:v = ωR (4.46)

अभिकेंद्र त्वरण को हम कोणीय चाल के रूप में भी व्यक्त कर सकते हैं । अर्थात्,

2788.png 

या 2793.png (4.47)

वृत्त का एक चक्कर लगाने में वस्तु को जो समय लगता है उसे हम आवर्तकाल T कहते हैं । एक सेकंड में वस्तु जितने चक्कर लगाती है, उसे हम वस्तु की आवृत्ति ν कहते हैं ।
परंतु इतने समय में वस्तु द्वारा चली गई दूरी
s = 2πR होती है, इसलिए

v = 2πR/T = 2πRν (4.48)

इस प्रकार ω, v तथा ac को हम आवृति ν के पद में व्यक्त कर सकते हैं, अर्थात्

ω = 2πν

v = 2πνR

ac = 4π2ν2R (4.49)

¯ उदाहरण 4.10 : कोई कीड़ा एक वृत्तीय खाँचे में जिसकी त्रिज्या 12cm है, फँस गया है । वह खाँचे के अनुदिश स्थिर चाल से चलता है और 100 सेकंड में 7 चक्कर लगा लेता है। (a) कीड़े की कोणीय चाल व रैखिक चाल कितनी होगी? (b) क्या त्वरण सदिश एक अचर सदिश है। इसका परिणाम कितना होगा?

हल यह एकसमान वृत्तीय गति का एक उदाहरण है । यहाँ R = 12 cm है । कोणीय चाल ω का मान

ω = 2π/T = 2π × 7/100 = 0.44 rad/s

है तथा रैखिक चाल v का मान

v = ω R = 0.44 × 12 cm = 5.3 cm s–1

होगा । वृत्त के हर बिंदु पर वेग v की दिशा उस बिंदु पर स्पर्श रेखा के अनुदिश होगी तथा त्वरण की दिशा वृत्त के केंद्र की ओर होगी । क्योंकि यह दिशा लगातार बदलती रहती है, इसलिए त्वरण एक अचर सदिश नहीं है । परंतु त्वरण का परिमाण अचर है, जिसका मान

a = ω2 R = (0.44 s–1)2 (12 cm) = 2.3 cm s–2 होगा। 

सारांश

1. अदिश राशियाँ वे राशियाँ हैं जिनमेें केवल परिमाण होता है । दूरी, चाल, संहति (द्रव्यमान) तथा ताप अदिश राशियों के कुछ उदाहरण हैं ।

2. सदिश राशियाँ वे राशियाँ हैं जिनमेें परिमाण तथा दिशा दोनों होते हैं । विस्थापन, वेग तथा त्वरण आदि इस प्रकार की राशि के कुछ उदाहरण हैं । ये राशियाँ सदिश बीजगणित के विशिष्ट नियमों का पालन करती हैं ।

3. यदि किसी सदिश A को किसी वास्तविक संख्या λ से गुणा करें तो हमें एक दूसरा सदिश B प्राप्त होता है जिसका परिमाण A के परिमाण का λ गुना होता है । नए सदिश की दिशा या तो A के अनुदिश होती है या इसके विपरीत । दिशा इस बात पर निर्भर करती है कि λ धनात्मक है या ऋणात्मक ।

4. दो सदिशों AB को जोड़ने के लिए या तो शीर्ष व पुच्छ की ग्राफी विधि का या समान्तर चतुर्भुज विधि का उपयोग करते हैं ।

5. सदिश योग क्रम-विनिमेय नियम का पालन करता है-

A + B = B + A

साथ ही यह साहचर्य के नियम का भी पालन करता है अर्थात् (A + B) + C = A + (B + C)

6. शून्य सदिश एक एेसा सदिश होता है जिसका परिमाण शून्य होता है । क्योंकि परिमाण शून्य होता है इसलिए इसके साथ दिशा बतलाना आवश्यक नहीं है ।

इसके निम्नलिखित गुण होते हैं:

A + 0 = A

λ0 = 0

0A = 0

7. सदिश B को A से घटाने की क्रिया को हम A व –B को जोड़ने के रूप में परिभाषित करते हैं-

A B = A + (–B)

8. किसी सदिश A को उसी समतल में स्थित दो सदिशों a तथा b के अनुदिश दो घटक सदिशों में वियोजित कर सकते हैं:

A = λa + µb

यहाँ λ व µ वास्तविक संख्याएँ हैं ।

9. किसी सदिश A से संबंधित एकांक सदिश वह सदिश है जिसका परिमाण एक होता है और जिसकी दिशा सदिश A के अनुदिश होती है । एकांक सदिश 2798.png

एकांक सदिश 2819.png, 2824.png,2814.png इकाई परिमाण वाले वे सदिश हैं जिनकी दिशाएँ दक्षिणावर्ती निकाय की अक्षों क्रमश:x-, y-  z- के अनुदिश होती हैं ।

10. दो विमा के लिए सदिश A को हम निम्न प्रकार से व्यक्त करते हैं-

A = Ax 2834.png + Ay2824.png

यहाँ Ax तथा Ay क्रमश:x-, y-अक्षों के अनुदिश A के घटक हैं । यदि सदिश A, x-अक्ष के साथ θ कोण बनाता है, तो Ax = A cos θ, Ay = A sin θ तथा

2829.png 

11. विश्लेषणात्मक विधि से भी सदिशों को आसानी से जोड़ा जा सकता है । यदि x-y समतल में दो सदिशों A व B का योग R हो, तो

R = Rx2834.png + Ry2839.png जहाँ Rx = Ax + Bx तथा Ry = Ay + By

12. समतल में किसी वस्तु की स्थिति सदिश r को प्राय:निम्न प्रकार से व्यक्त करते हैं:

r = x i^ + yj^

स्थिति सदिशों r व r' के बीच के विस्थापन को निम्न प्रकार से लिखते हैं :

r = r' r

= (x' x) i^ + (y' y) j^

=x i^ +y j^

13. यदि कोई वस्तु समय अंतराल t में r से विस्थापित होती है तो उसका औसत वेग  2844.png होगा । किसी क्षण t पर वस्तु का वेग उसके औसत वेग के सीमान्त मान के बराबर होता है जब t शून्य के सन्निकट हो जाता है । अर्थात्

2849.png

इसे एकांक सदिशों के रूप में भी व्यक्त करते हैं:

v = vxi^+ vy j^+vz k^

जहाँ 2854.png

जब किसी निर्देशांक निकाय में कण की स्थिति को दर्शाते हैं, तो v की दिशा कण के पथ के वक्र की उस बिंदु पर खींची गई स्पर्श रेखा के अनुदिश होती है ।

14. यदि वस्तु का वेग t समय अंतराल में v से v' में बदल जाता है, तो उसका औसत त्वरण 2859.png होगा । जब t का सीमान्त मान शून्य हो जाता है तो किसी क्षण t पर वस्तु का त्वरण 2865.png  होगा ।

घटक के पदों में इसे निम्न प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है:

a = axi^+ ay j^ + az k^

यहाँ,
2870.png

15. यदि एक वस्तु किसी समतल में एकसमान त्वरण 2875.pngसे गतिमान है तथा क्षण t=0 पर उसका स्थिति सदिश ro है, तो किसी अन्य क्षण t पर उसका स्थिति सदिश 2880.png होगा तथा उसका वेग v = v0+ at होगा ।

यहाँ v0, t = 0 क्षण पर वस्तु के वेग को व्यक्त करता है ।

घटक के रूप में

2885.png

2890.png

vx = v0x + ax t

vy = v0y + ay t

किसी समतल में एकसमान त्वरण की गति को दो अलग-अलग समकालिक एकविमीय व परस्पर लंबवत् गतियों के अध्यारोपण के रूप में मान सकते हैं ।

16. प्रक्षेपित होने के उपरांत जब कोई वस्तु उड़ान में होती है तो उसे प्रक्षेप्य कहते हैं । यदि x-अक्ष से θ0 कोण पर वस्तु का प्रारंभिक वेग v0 है तो t क्षण के उपरांत प्रक्षेप्य के स्थिति एवं वेग संबंधी समीकरण निम्नवत् होंगे-

x = (v0cos θ0) t

y = (v0sin θ0) t (1/2) g t2

vx = v0x= v0cos θ0

vy = v0 sin θ0 gt

प्रक्षेप्य का पथ परवलयिक होता है जिसका समीकरण

2895.png होगा ।

प्रक्षेप्य की अधिकतम ऊँचाई 2900.png, तथा

इस ऊँचाई तक पहुंचने में लगा समय 2910.pngहोगा ।

प्रक्षेप्य द्वारा अपनी प्रारंभिक स्थिति से उस स्थिति तक, जिसके लिए नीचे उतरते समय y = 0 हो, चली गई क्षैतिज दूरी को प्रक्षेप्य का परास R कहते हैं ।

अत:प्रक्षेप्य का परास 2915.pngहोगा ।

17. जब कोई वस्तु एकसमान चाल से एक वृत्तीय मार्ग में चलती है तो इसे एकसमान वृत्तीय गति कहते हैं । यदि वस्तु की चाल v हो तथा इसकी त्रिज्या R हो, तो अभिकेंद्र त्वरण, ac= v2/R होगा तथा इसकी दिशा सदैव वृत्त के केंद्र की ओर होगी । कोणीय चाल  ω  कोणीय दूरी के समान परिवर्तन की दर होता है । रैखिक वेग v = ω  R होगा तथा त्वरण ac =ω2R होगा ।

यदि वस्तु का आवर्तकाल T तथा आवृत्ति ν हो, तो ,v तथा ac के मान निम्नवत् होंगे ।

ω= 2πν, v = 2πνR, ac =2ν2R

table

विचारणीय विषय

1. किसी वस्तु द्वारा दो बिंदुओं के बीच की पथ-लंबाई सामान्यतया, विस्थापन के परिमाण के बराबर नहीं होती । विस्थापन केवल पथ के अंतिम बिंदुओं पर निर्भर करता है जबकि पथ-लंबाई (जैसाकि नाम से ही स्पष्ट है) वास्तविक पथ पर निर्भर करती है । दोनों राशियां तभी बराबर होंगी जब वस्तु गति मार्ग में अपनी दिशा नहीं बदलती । अन्य दूसरी परिस्थितियों में पथ-लंबाई विस्थापन के परिमाण से अधिक होती है ।

2. उपरोक्त बिंदु 1 की दृष्टि से वस्तु की औसत चाल किसी दिए समय अंतराल में या तो उसके औसत वेग के परिमाण के बराबर होगी या उससे अधिक होगी । दोनों बराबर तब होंगी जब पथ-लंबाई विस्थापन के परिमाण के बराबर हो ।

3. सदिश समीकरण (4.3a) तथा (4.34a) अक्षों के चुनाव पर निर्भर नहीं करते हैं । नि:संदेह आप उन्हें दो स्वतंत्र अक्षों के अनुदिश वियोजित कर सकते हैं ।

4. एकसमान त्वरण के लिए शुद्धगतिकी के समीकरण एकसमान वृत्तीय गति में लागू नहीं होते क्योंकि इसमेें त्वरण का परिमाण तो स्थिर रहता है परंतु उसकी दिशा निरंतर बदलती रहती है ।

5. यदि किसी वस्तु के दो वेग v1 तथा v2 हों तो उनका परिणामी वेग v =v1+ v2 होगा । उपरोक्त सूत्र तथा वस्तु 2 के सापेक्ष वस्तु का 1 के वेग अर्थात्:v12 = v1- v2 के बीच भेद को भलीभांति जानिए । यहां v1तथा v2 किसी उभयनिष्ठ निर्देश तन्त्र के सापेक्ष वस्तु की गतियां हैं ।

6. वृत्तीय गति में किसी कण का परिणामी त्वरण वृत्त के केंद्र की ओर होता है यदि उसकी चाल एकसमान है ।

7. किसी वस्तु की गति के मार्ग की आकृति केवल त्वरण से ही निर्धारित नहीं होती बल्कि वह गति की प्रारंभिक दशाओं (प्रारंभिक स्थिति व प्रारंभिक वेग) पर भी निर्भर करती है । उदाहरणस्वरूप, एक ही गुरुत्वीय त्वरण से गतिमान किसी वस्तु का मार्ग एक सरल रेखा भी हो सकता है या कोई परवलय भी, एेसा प्रारंभिक दशाओं पर निर्भर करेगा ।

अभ्यास

4.1 निम्नलिखित भौतिक राशियों में से बतलाइए कि कौन-सी सदिश हैं और कौन-सी अदिश:

आयतन, द्रव्यमान, चाल, त्वरण, घनत्व, मोल संख्या, वेग, कोणीय आवृत्ति, विस्थापन, कोणीय वेग।

4.2 निम्नांकित सूची में से दो अदिश राशियों को छाँटिए-

बल, कोणीय संवेग, कार्य, धारा, रैखिक संवेग, विद्युत क्षेत्र, औसत वेग, चुंबकीय आघूर्ण, आपेक्षिक वेग।

4.3 निम्नलिखित सूची में से एकमात्र सदिश राशि को छाँटिए-

ताप, दाब, आवेग, समय, शक्ति, पूरी पथ-लंबाई, ऊर्जा, गुरुत्वीय विभव, घर्षण गुणांक, आवेश।

4.4 कारण सहित बताइए कि अदिश तथा सदिश राशियों के साथ क्या निम्नलिखित बीजगणितीय संक्रियाएँ अर्थपूर्ण हैं?

(a) दो अदिशों को जोड़ना, (b) एक ही विमाओं के एक सदिश व एक अदिश को जोड़ना, (c) एक सदिश को एक अदिश से गुणा करना, (d) दो अदिशों का गुणन, (e) दो सदिशों को जोड़ना, (f) एक सदिश के घटक को उसी सदिश से जोड़ना ।

4.5 निम्नलिखित में से प्रत्येक कथन को ध्यानपूर्वक पढ़िए और कारण सहित बताइए कि यह सत्य है या असत्य:
(a) किसी सदिश का परिमाण सदैव एक अदिश होता है, (b) किसी सदिश का प्रत्येक घटक सदैव अदिश होता है, (c) किसी कण द्वारा चली गई पथ की कुल लंबाई सदैव विस्थापन सदिश के परिमाण के बराबर होती है, (d) किसी कण की औसत चाल (पथ तय करने में लगे समय द्वारा विभाजित कुल पथ-लंबाई) समय के समान-अंतराल में कण के औसत वेग के परिमाण से अधिक या उसके बराबर होती है । (e) उन तीन सदिशों का योग जो एक समतल में नहीं हैं, कभी भी शून्य सदिश नहीं होता ।

4.6 निम्नलिखित असमिकाओं की ज्यामिति या किसी अन्य विधि द्वारा स्थापना कीजिए:

(a) |a+b| |a| + |b|

(b) |a+b| ||a| |b||

(c) |ab| |a| + |b|

(d) |ab| ||a| |b||

इनमें समिका (समता) का चिह्न कब लागू होता है ?

4.7 दिया है a + b + c + d = 0, नीचे दिए गए कथनों में से कौन-सा सही है :

(a) a, b, c तथा d में से प्रत्येक शून्य सदिश है,

(b) (a + c) का परिमाण (b + d) के परिमाण के बराबर है,

(c) a का परिमाण b, c तथा d के परिमाणों के योग से कभी भी अधिक नहीं हो सकता,

(d) यदि a तथा d संरेखीय नहीं हैं तो b + c अवश्य ही a तथा d के समतल में होगा, और यह a तथा d के अनुदिश होगा यदि वे संरेखीय हैं ।

4.8 तीन लड़कियाँ 200 m त्रिज्या वाली वृत्तीय बर्फीली सतह पर स्केटिंग कर रही हैं । वे सतह के किनारे के बिंदु P से स्केटिंग शुरू करती हैं तथा P के व्यासीय विपरीत बिंदु Q पर विभिन्न पथों से होकर पहुँचती हैं जैसा कि चित्र 4.20 में दिखाया गया है । प्रत्येक लड़की के विस्थापन सदिश का परिमाण कितना है ? किस लड़की के लिए यह वास्तव में स्केट किए गए पथ की लंबाई के बराबर है ।

2052.png

चित्र 4.20

4.9 कोई साइकिल सवार किसी वृत्तीय पार्कं के केंद्र O से चलना शुरू करता है तथा पार्क के किनारे P पर पहुँचता है। पुन:वह पार्क की परिधि के अनुदिश साइकिल चलाता हुआ QO के रास्ते (जैसा चित्र 4.21 में दिखाया गया है) केंद्र पर वापस आ जाता है । पार्क की त्रिज्या 1 km है । यदि पूरे चक्कर में 10 मिनट लगते हों तो साइकिल सवार का (a) कुल विस्थापन, (b) औसत वेग, तथा (c) औसत चाल क्या होगी?

2946.png 

चित्र 4.21

4.10 किसी खुले मैदान में कोई मोटर चालक एक एेसा रास्ता अपनाता है जो प्रत्येक 500 m के बाद उसके बाईं ओर 60॰ के कोण पर मुड़ जाता है। किसी दिए मोड़ से शुरू होकर मोटर चालक का तीसरे, छठे व आठवें मोड़ पर विस्थापन बताइए। प्रत्येक स्थिति में मोटर चालक द्वारा इन मोड़ों पर तय की गई कुल पथ-लंबाई के साथ विस्थापन के परिमाण की तुलना कीजिए।

4.11 कोई यात्री किसी नए शहर में आया है और वह स्टेशन से किसी सीधी सड़क पर स्थित किसी होटल तक जो 10 km दूर है, जाना चाहता है। कोई बेईमान टैक्सी चालक 23 km के चक्करदार रास्ते से उसे ले जाता है और 28 मिनट में होटल में पहुँचता है।

(a) टैक्सी की औसत चाल, और (b) औसत वेग का परिमाण क्या होगा? क्या वे बराबर हैं?

4.12 वर्षा का पानी 30 m s–1 की चाल से ऊर्ध्वाधर नीचे गिर रहा है। कोई महिला उत्तर से दक्षिण की ओर 10 m s–1 की चाल से साइकिल चला रही है। उसे अपना छाता किस दिशा में रखना चाहिए।

4.13 कोई व्यक्ति स्थिर पानी में 4.0 km/h की चाल से तैर सकता है । उसे 1.0 km चौड़ी नदी को पार करने में कितना समय लगेगा यदि नदी 3.0 km/h की स्थिर चाल से बह रही हो और वह नदी के बहाव के लंब तैर रहा हो । जब वह नदी के दूसरे किनारे पहुँचता है तो वह नदी के बहाव की ओर कितनी दूर पहुँचेगा?

4.14 किसी बंदरगाह में 72 km/h की चाल से हवा चल रही है और बंदरगाह में खड़ी किसी नौका के ऊपर लगा झंडा N-E दिशा में लहरा रहा है । यदि वह नौका उत्तर की ओर 51 km/h चाल से गति करना प्रारंभ कर दे तो नौका पर लगा झंडा किस दिशा में लहराएगा ?

4.15 किसी लंबे हाल की छत 25 m ऊंची है । वह अधिकतम क्षैतिज दूरी कितनी होगी जिसमें 40 m s–1 की चाल से फेंकी गई कोई गेंद छत से टकराए बिना गुजर जाए ?

4.16 क्रिकेट का कोई खिलाड़ी किसी गेंद को 100 m की अधिकतम क्षैतिज दूरी तक फेंक सकता है । वह खिलाड़ी उसी गेंद को जमीन से ऊपर कितनी ऊंचाई तक फेंक सकता है ?

4.17 80 cm लंबे धागे के एक सिरे पर एक पत्थर बाँधा गया है और इसे किसी एकसमान चाल के साथ किसी क्षैतिज वृत्त में घुमाया जाता है । यदि पत्थर 25 s में 14 चक्कर लगाता है तो पत्थर के त्वरण का परिमाण और उसकी दिशा क्या होगी ?

4.18 कोई वायुयान 900 km h–1 की एकसमान चाल से उड़ रहा है और 1.00 km त्रिज्या का कोई क्षैतिज लूप बनाता है । इसके अभिकेंद्र त्वरण की गुरुत्वीय त्वरण के साथ तुलना कीजिए ।

4.19 नीचे दिए गए कथनों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और कारण देकर बताइए कि वे सत्य हैं या असत्य:

(a) वृत्तीय गति में किसी कण का नेट त्वरण हमेशा वृत्त की त्रिज्या के अनुदिश केंद्र की ओर होता है ।

(b) किस बिंदु पर किसी कण का वेग सदिश सदैव उस बिंदु पर कण के पथ की स्पर्श रेखा के अनुदिश होता है।

(c) किसी कण का एकसमान वृत्तीय गति में एक चक्र में लिया गया औसत त्वरण सदिश एक शून्य सदिश होता है।

4.20 किसी कण की स्थिति सदिश निम्नलिखित है:

2957.png

समय t सेकंड में है तथा सभी गुणकों के मात्रक इस प्रकार से हैं कि r में मीटर में व्यक्त हो जाए ।

(a) कण का v तथा a निकालिए,

(b) t = 2.0 s पर कण के वेग का परिमाण तथा दिशा कितनी होगी ?

4.21 कोई कण t = 0 क्षण पर मूल बिंदु से 102972.pngms-1 के वेग से चलना प्रांरभ करता है तथा x-y समतल में एकसमान त्वरण (8.0 ^i + 2.0 ^j) m s-2 से गति करता है ।

(a) किस क्षण कण का x-निर्देशांक 16 m होगा ? इसी समय इसका y-निर्देशांक कितना होगा ?

(b) इस क्षण कण की चाल कितनी होगी ?

4.22 2803.pngव 2972.pngक्रमश:x- व y-अक्षों के अनुदिश एकांक सदिश हैं । सदिशों 2978.pngतथा 2983.png का परिमाण तथा दिशा क्या होगा ? सदिश 2988.png के 2993.pngव 2998.png के दिशाओं के अनुदिश घटक निकालिए। [ आप ग्राफी विधि का उपयोग कर सकते हैं ]

4.23 किसी दिक्स्थान पर एक स्वेच्छ गति के लिए निम्नलिखित संबंधाें में से कौन-सा सत्य है ?

(a) vऔसत = (1/2) (v (t1) + v (t2))

(b) v औसत = [r(t2) - r(t1) ] /(t2 t1)

(c) v (t) = v (0) + a t

(d) r (t) = r (0) + v (0) t + (1/2) a t2

(e) a औसत =[ v (t2) - v (t1 )] /( t2 t1)

यहाँ ‘औसत’ का आशय समय अंतराल t2 व t1 से संबंधित भौतिक राशि के औसत मान से है ।

4.24 निम्नलिखित में से प्रत्येक कथन को ध्यानपूर्वक पढ़िए तथा कारण एवं उदाहरण सहित बताइए कि क्या यह सत्य है या असत्य:

अदिश वह राशि है जो

(a) किसी प्रक्रिया में संरक्षित रहती है,

(b) कभी ऋणात्मक नहीं होती,

(c) विमाहीन होती है,

(d) किसी स्थान पर एक बिंदु से दूसरे बिंदु के बीच नहीं बदलती,

(e) उन सभी दर्शकों के लिए एक ही मान रखती है चाहे अक्षों से उनके अभिविन्यास भिन्न-भिन्न क्यों न हों ।

4.25 कोई वायुयान पृथ्वी से 3400 m की ऊंचाई पर उड़ रहा है । यदि पृथ्वी पर किसी अवलोकन बिंदु पर वायुयान की 10.0 s की दूरी की स्थितियां 30॰ का कोण बनाती हैं तो वायुमान की चाल क्या होगी ?

अतिरिक्त अभ्यास

4.26 किसी सदिश में परिमाण व दिशा दोनों होते हैं। क्या दिक्स्थान में इसकी कोई स्थिति होती है? क्या यह समय के साथ परिवर्तित हो सकता है। क्या दिक्स्थान में भिन्न स्थानों पर दो बराबर सदिशों a व b का समान भौतिक प्रभाव अवश्य पड़ेगा? अपने उत्तर के समर्थन में उदाहरण दीजिए।

4.27 किसी सदिश में परिणाम व दिशा दोनों होते हैं। क्या इसका यह अर्थ है कि कोई राशि जिसका परिमाण व दिशा हो, वह अवश्य ही सदिश होगी? किसी वस्तु के घूर्णन की व्याख्या घूर्णन-अक्ष की दिशा और अक्ष के परित:घूर्णन-कोण द्वारा की जा सकती है। क्या इसका यह अर्थ है कि कोई भी घूर्णन एक सदिश है?

4.28 क्या आप निम्नलिखित के साथ कोई सदिश संबद्ध कर सकते हैं: (a) किसी लूप में मोड़ी गई तार की लंबाई, (b) किसी समतल क्षेत्र, (c) किसी गोले के साथ? व्याख्या कीजिए।

4.29 कोई गोली क्षैतिज से 30॰ के कोण पर दागी गई है और वह धरातल पर 3.0 km दूर गिरती है । इसके प्रक्षेप्य के कोण का समायोजन करके क्या 5.0 km दूर स्थित किसी लक्ष्य का भेद किया जा सकता है ? गोली की नालमुख चाल को नियत तथा वायु के प्रतिरोेध को नगण्य मानिए ।

4.30 कोई लड़ाकू जहाज 1.5 km की ऊंचाई पर 720 km/h की चाल से क्षैतिज दिशा में उड़ रहा है और किसी वायुयान भेदी तोप के ठीक ऊपर से गुजरता है । ऊर्ध्वाधर से तोप की नाल का क्या कोण हो जिससे 600 m s–1 की चाल से दागा गया गोला वायुमान पर वार कर सके । वायुयान के चालक को किस न्यूनतम ऊंचाई पर जहाज को उड़ाना चाहिए जिससे गोला लगने से बच सके। (g = 10 m s–2)

4.31 एक साइकिल सवार 27 km/h की चाल से साइकिल चला रहा है। जैसे ही सड़क पर वह 80 m त्रिज्या के वृत्तीय मोड़ पर पहुंचता है, वह ब्रेक लगाता है और अपनी चाल को 0.5 m/s की एकसमान दर से कम कर लेता है। वृत्तीय मोड़ पर साइकिल सवार के नेट त्वरण का परिमाण और उसकी दिशा निकालिए।

4.32 (a) सिद्ध कीजिए कि किसी प्रक्षेप्य के x-अक्ष तथा उसके वेग के बीच के कोण को समय के फलन के रूप में निम्न प्रकार से व्यक्त कर सकते हैं

3003.png

(b) सिद्ध कीजिए कि मूल बिंदु से फेंके गए प्रक्षेप्य कोण का 3015.pngमान होगा। यहाँ प्रयुक्त प्रतीकों के अर्थ सामान्य हैं।

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