अध्याय 2 2ण्1 भूमिका 2ण्2 मात्राकों की अंतरार्ष्ट्रीय प्रणाली 2ण्3 लम्बाइर् का मापन 2ण्4 द्रव्यमान का मापन 2ण्5 समय का मापन 2ण्6 यथाथर्ता, यंत्रों की परिशु(ता एवं मापन में त्राुटि 2ण्7 साथर्क अंक 2ण्8 भौतिक राश्िायों की विमाएँ 2ण्9 विमीय सूत्रा एवं विमीय समीकरणें 2ण्10 विमीय विश्लेषण एवं इसके अनुप्रयोग सारांश अभ्यास अतिरिक्त अभ्यास मात्राक एवं मापन 2ण्1 भूमिका किसी भौतिक राश्िा का मापन, एक निश्िचत, आधरभूत, यादृच्िछक रूप से चुने गए मान्यताप्राप्त, संदभर् - मानक से इस राश्िा की तुलना करना है। यह संदभर् - मानक मात्राक कहलाता है। किसी भी भौतिक राश्िा की माप को मात्राक के आगे एक संख्या ;आंकिक संख्याद्ध लिखकर व्यक्त किया जाता है। यद्यपि हमारे द्वारा मापी जाने वाली भौतिक राश्िायों की संख्या बहुत अध्िक है, पिफर भी, हमें इन सब भौतिक राश्िायों को व्यक्त करने के लिए, मात्राकों की सीमित संख्या की ही आवश्यकता होती है, क्योंकि, ये राश्िायाँ एक दूसरे से परस्पर संबंध्ित हैं। मूल राश्िायों को व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त मात्राकों को मूल मात्राक कहते हैं। इनके अतिरिक्त अन्य सभी भौतिक राश्िायोें के मात्राकों को मूल मात्राकों के संयोजन द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। इस प्रकार प्राप्त किए गए व्युत्पन्न राश्िायों के मात्राकों को व्युत्पन्न मात्राक कहते हैं। मूल - मात्राकों और व्युत्पन्न मात्राकों के सम्पूणर् समुच्चय को मात्राकों की प्रणाली ;या प(तिद्ध कहते हैं। 2ण्2 मात्राकों की अंतरार्ष्ट्रीय प्रणाली बहुत वषो± तक मापन के लिए, विभ्िान्न देशों के वैज्ञानिक, अलग - अलग मापन प्रणालियों का उपयोग करते थे। अब से वुफछ समय - पूवर् तक ऐसी तीनप्रणालियाँ - ब्ळै प्रणाली, थ्च्ै ;या बि्रटिशद्ध प्रणाली एवं डज्ञै प्रणाली,प्रमुखता से प्रयोग में लाइर् जाती थीं।इन प्रणालियों में लम्बाइर्, द्रव्यमान एवं समय के मूल मात्राक क्रमशः इसप्रकार हैं: ऽ ब्ळै प्रणाली में, सेन्टीमीटर, ग्राम एवं सेवफन्ड। ऽ थ्च्ै प्रणाली में, पुफट, पाउन्ड एवं सेवफन्ड। ऽ डज्ञै प्रणाली में, मीटर, किलोग्राम एवं सेवफन्ड।आजकल अंतरार्ष्ट्रीय स्तर पर मान्य प्रणाली फ्सिस्टम इन्टरनेशनल डियूनिट्सय् है ;जो प्रेंफच भाषा में फ्मात्राकों की अंतरार्ष्ट्रीय प्रणालीय् कहना हैद्ध।इसे संकेताक्षर में ैप् लिखा जाता है। ैप् प्रतीकों, मात्राकों और उनके संकेताक्षरोंकी योजना 1971 में, मापतोल के महा सम्मेलन द्वारा विकसित कर, वैज्ञानिक,तकनीकी, औद्योगिक एवं व्यापारिक कायो± में अंतरार्ष्ट्रीय स्तर पर उपयोग हेतु अनुमोदित की गइर्। ैप् मात्राकों की 10 की घातों पर आधरित;दाश्िमकद्ध प्रवृफति के कारण, इस प्रणाली के अंतगर्त रूपांतरणअत्यंत सुगम एवं सुविधजनक है। हम इस पुस्तक में ैप् मात्राकों का ही प्रयोग करेंगे। ैप् में सात मूल मात्राक हैं, जो सारणी 2.1 में दिए गए हैं।इन सात मूल मात्राकों के अतिरिक्त दो पूरक मात्राक भी हैंजिनको हम इस प्रकार परिभाष्िात कर सकते हैं: ;पद्ध समतलीयकोण, कθ चित्रा 2ण्1;ंद्ध में दशार्ए अनुसार वृत्त के चाप कीलम्बाइर् के और इसकी त्रिाज्या त का अनुपात होता है। तथा ;पपद्ध घन - कोण, क Ω चित्रा 2ण्1;इद्ध में दशार्ए अनुसार शीषर् व् को केन्द्र की भांति प्रयुक्त करके उसके परितः नि£मत गोलीय पृष्ठके अपरोध्न क्षेत्रा क। तथा त्रिाज्या त के वगर् का अनुपात होताहै। समतलीय कोण का मात्राक रेडियन है जिसका प्रतीक तंक है एवं घन कोण का मात्राक स्टेरेडियन है जिसका प्रतीक ेत है। ;इद्ध चित्रा 2ण्1 ;ंद्ध समतलीय कोण कθ एवं ;इद्ध घन कोण ये दोनों ही विमाविहीन राश्िायाँ हैं। क Ω का आरेखीय विवरण सारणी 2ण्1 ैप् मूल राश्िायाँ एवं उनके मात्राक’ मूल राश्िा नाम प्रतीक मात्राक परिभाषा त्भ् लंबाइर् द्रव्यमान समय विद्युत धरा ऊष्मागतिक ताप पदाथर् की मात्रा ज्योति - तीव्रता मीटर किलोग्राम सेवंफड ऐम्िपयर केल्िवन मोल वैंफडेला उ ाह े । ज्ञ उवस बक प्रकाश द्वारा निवार्त में एक सेवंफड के 299ए 792ए 458 वें समय अंतरालमें तय किए गए पथ की लंबाइर् एक मीटर है । ;1983 से मान्यद्ध प्रंफास में पेरिस के पास सेवरिस में स्िथत अंतरार्ष्ट्रीय माप - तोल ब्यूरो में रखेकिलोग्राम के अंतरार्ष्ट्रीय आदि प्ररूप ;प्लेटिनम - इरिडियम मिश्रधतु से बनेसिलिंडरद्ध का द्रव्यमान एक किलोग्राम के बराबर है । ;1889 से मान्यद्ध एक सेवंफड वह अंतराल है जो सीजि़यम 133 परमाणु के निम्नतम ऊजार्स्तर के दो अतिसूक्ष्म स्तरों के मध्य संक्रमण के तदनुरूपी विकिरण के9,192,631,770 आवतर् कालों के बराबर है। ;1967 से मान्यद्ध एक ऐम्िपयर वह नियत विद्युत धरा है जो कि निवार्त में 1 मीटर की दूरीपर स्िथत दो सीध्े अनंत लंबाइर् वाले समानांतर एवं नगण्य वृत्तीय अनुप्रस्थकाट के चालकों में प्रवाहित होने पर, इन चालकों के बीच प्रति मीटर लंबाइर्पर 2 × 10 - 7 न्यूटन का बल उत्पन्न करती है । ;1948 से मान्यद्ध जल के त्रिाक - बिंदु के उफष्मागतिक ताप के 1ध्273ण्16 वें भाग को 1 केल्िवन कहते हैं। ;1967 से मान्यद्ध 1 मोल किसी निकाय में पदाथर् की वह मात्रा है जिसमें उतनी ही मूल सत्ताएं होती हैं जितनी 0ण्012 ाह काबर्न - 12 में परमाणुओं की संख्या होती है।;1971 से मान्यद्ध वैंफडेला, किसी दिशा में 540 þ 1012 भ््र आवृिा वाले ड्डोत की ज्योति - तीव्रता है जो उस दिशा में ;1/683द्ध वाट प्रति स्टेरेडियन की विकिरण तीव्रता का एकवणीर्य प्रकाश उत्सजिर्त करता है ;1979 से मान्यद्ध ’ इन परिभाषाओं में प्रयुक्त संख्याओं के मान, न तो याद रखने की आवश्यकता है, न परीक्षा में पूछे जाने की। ये यहाँ पर केवल इनकेमापन की यथाथर्ता की सीमा का संकेत देने के लिए दिए गए हैं। प्रौद्योगिकी के विकास के साथ मापन की तकनीकों में भी सुधरहोता है, परिणामस्वरूप, मापन अध्िक परिशु(ता से होता है। इस प्रगति के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए मूल मात्राकों कोसंशोध्ित किया जाता है। सारणी 2ण्2 सामान्य प्रयोग के लिए ैप् मात्राकों के अतिरिक्त वुफछ अन्य मात्राक मिनट उपद 60 े घंटा ी 60 उपद त्र 3600 े दिन क 24 ी त्र 86400 े वषर् ल 365ण्25 क त्र 3ण्156 þ 107 े डिग्री व 1व त्र ;πध्180द्ध तंक लिटर स् 1 कउ3 त्र 10 œ3 उ3 टन ज 103 ाह वैफरट ब 200 उह बार इंत 0ण्1 डच्ं त्र 105 च्ं क्यूरी ब्प 3ण्7 þ 1010 ेœ1 रोंजन त् 2ण्58 þ 10œ4 ब् ाहœ1 क्िवंटल ु 100 ाह बानर् इ 100 उि2 त्र 10œ28 उ2 आर ं 1 कंउ2 त्र 102 उ2 हेक्टार ीं 1 ीउ2 त्र 104 उ2 मानक वायुमंडलीय दाब ंजउ 101 325 च्ं त्र 1ण्013 þ 105 च्ं ध्यान दीजिए, मोल का उपयोग करते समय मूल सत्ताओं काविशेष रूप से उल्लेख किया जाना चाहिए। ये मूल सत्ताएँपरमाणु, अणु, आयन, इलेक्ट्राॅन, अन्य कोइर् कण अथवा इसीप्रकार के कणों का विश्िाष्ट समूह हो सकता है।हम ऐसी भौतिक राश्िायों के मात्राकों का भी उपयोग करतेहैं जिन्हें सात मूल राश्िायों से व्युत्पन्न किया जा सकता है;परिश्िाष्ट । 6द्ध। ैप् मूल मात्राकों के पदों में व्यक्त वुफछव्युत्पन्न मात्राक ;परिश्िाष्ट । 6ण्1द्ध में दिए गए हैं। वुफछ व्युत्पन्न ैप् मात्राकों को विश्िाष्ट नाम दिए गए हैं ;परिश्िाष्ट । 6ण्2द्धऔर वुफछ व्युत्पन्न ैप् मात्राक इन विश्िाष्ट नामों वाले व्युत्पन्नमात्राकों और सात मूल - मात्राकों के संयोजन से बनते हैं ;परिश्िाष्ट । 6ण्3द्ध। आपको तात्कालिक संदभर् तथा मागर्दशर्न प्रदान करनेके लिए इन मात्राकों को परिश्िाष्ट ;। 6ण्2द्ध एवं ;। 6ण्3द्ध में दिया गया है। सामान्य व्यवहार में आने वाले अन्य मात्राक सारणी2.2 में दिए गए हैं। ैप् मात्राकों के सामान्य गुणज और अपवतर्कों को व्यक्त करनेवाले उपसगर् और उनके प्रतीक परिश्िाष्ट ;।2द्ध में दिए गए हैं।भौतिक राश्िायों, रासायनिक तत्वों और नाभ्िाकों के संकेतों केउपयोग संबंध्ी सामान्य निदेर्श परिश्िाष्ट;।7द्ध मंे दिए गए हैं औरआपके मागर्दशर्न तथा तात्कालिक संदभर् के लिएैप् मात्राकों एवं अन्य मात्राकों संबंध्ी निदेर्श परिश्िाष्ट ;।8द्ध में दिए गए हैं। 2ण्3 लम्बाइर् का मापन लम्बाइर् मापन की वुफछ प्रत्यक्ष विध्ियों से आप पहले ही से परिचित हैं। उदाहरण के लिए, आप जानते हैं कि 10√3उ से 102उ तक की लम्बाइयाँ मीटर पैमाने का उपयोग करके ज्ञात की जाती हैं।10√4उ की लम्बाइर् को यथाथर्ता से मापने के लिएहम वनिर्यर वैफलिपसर् का उपयोग करते हैं। स्वू्रफ - गेज ;पेंचमापीद्धऔर गोलाइर्मापी ;स्पेफरोमीटरद्ध का उपयोग 10√5 उ तक की लम्बाइयों को मापने में किया जाता है। इन परिसरों से बाहर कीलम्बाइयों को मापने के लिए हमें वुफछ परोक्ष विध्ियों का सहारालेना होता है। 2ण्3ण्1 बड़ी दूरियों का मापन बहुत बड़ी दूरियाँ, जैसे किसी ग्रह अथवा तारे की पृथ्वी से दूरी, प्रत्यक्ष - रूप से किसी मीटर पैमाने की सहायता से ज्ञात नहीं की जा सकती है। ऐसी दशाओं में महत्वपूणर् विध्ि जिसे लम्बन - विध्ि कहते हैं, का उपयोग किया जाता है। जब आप किसी पेंसिल को अपने सामने पकड़ते हैं और पृष्ठभूमि ;माना दीवारद्ध के किसी विश्िाष्ट बिन्दु के सापेक्ष पेंसिल को पहले अपनी बायीं आँख । से ;दायीं आँख बंद रखते हुएद्ध देखते हैं, और पिफर दायीं आँख ठ से ;बायीं आँख बंद रखते हुएद्ध, तो आप पाते हैं, कि दीवार के उस बिन्दु के सापेक्ष पेंसिल की स्िथति परिव£तत होती प्रतीत होती है। इसे लम्बन कहा जाता है। दो प्रेक्षण बिन्दुओं ;। एवं ठद्ध के बीच की दूरी को आधरक कहा जाता है। इस उदाहरण में दोनों आँखों के बीच की दूरी आधरक है। लम्बन विध्ि द्वारा किसी दूरस्थ ग्रहै की दूरी क् ज्ञात करने के लिए, हम इसको, पृथ्वी पर दो विभ्िान्न स्िथतियों ;वेध् शालाओंद्ध । एवंठ से, एक ही समय पर देखते हैं। । एवं ठ के बीच की दूरी ।ठ त्र इ है। चित्रा 2.2 देख्िाए। इन दो स्िथतियों हल ;ंद्ध हमें ज्ञात है 3600 त्र 2π तंक से ग्रह की प्रेक्षण दिशाओं के बीच का कोण माप लिया जाता 10 त्र ;π ध्180द्ध तंक त्र 1ण्74510√2 तंक ;इद्ध 10 त्र 60′ त्र 1ण्74510√2 तंकहै। चित्रा 2.2 में θ द्वारा दशार्या गया यह कोण ∠।ैठ लम्बन 1′ त्र 2ण्90810√4 तंक ण् 2ण्9110√4 तंक कोण या लम्बनिक कोण कहलाता है। ;बद्ध 1′ त्र 60″ त्र 2ण्90810√4 तंक 1″ त्र 4ण्84710√4 तंक ण् 4ण्8510√6 तंकइ जक्योंकि, ग्रह की पृथ्वी से दूरी बहुत अध्िक है ढढ 1एक् जउदाहरण 2ण्2 एक व्यक्ित अपने पास की किसी मीनारकी अपने से दूरी का आकलन करना चाहता है। वहऔर, इसलिए, कोण θ बहुत ही छोटा है। ऐसी दशा में हम ।ठ को, केन्द्रै और त्रिाज्या क् वाले वृत्त का, लम्बाइर् इ का चाप मान सकते हैं। ∵ त्रिाज्या ।ै त्र ठैए ∴ ।ठ त्र इ त्र क् θ जहाँ θ रेडियन में है। इ अतः क्त्र ;2ण्1द्धθचित्रा 2ण्2 लम्बन विध्ि क् के निधर्रण के पश्चात् हम इसी विध्ि द्वारा ग्रह का आमाप अथवा कोणीय व्यास भी निधर्रित कर सकते हैं। यदि क ग्रह का व्यास और α उसका कोणीय आमाप ;क द्वारा पृथ्वी के किसी बिन्दु पर अंतरित कोणद्ध हो, तो α त्र कध्क् ;2ण्2द्ध कोणα को, पृथ्वी की उसी अवस्िथति से मापा जा सकता है। यह ग्रह के दो व्यासतः विपरीत ;व्यास के विपरीत सिरों पर मीनार ब् के सामने किसी बिन्दु। पर खड़ा होता है और ।ब् की सीध् में बहुत दूर स्िथत किसी बिन्दु व् को देखता है। पिफर वह,।ब् के लम्बवत् 100 उ दूर स्िथतबिन्दु ठ तक चलता है और वहाँ से व् एवं ब् को पिफर देखता है। क्योंकि व् बहुत अध्िक दूरी पर है, ठव् एवं ।व् की दिशाएँ व्यावहारिक रूप में एक ही हैं, लेकिन वह पाता है कि ब् की दृष्िट रेखा मूल दृष्िट रेखा केसापेक्षθ त्र 400 पर घूम गइर् है;θ को लम्बन कहा जाता हैद्ध। उसकी मूल स्िथति । से मीनार ब् की दूरी काआकलन कीजिए। चित्रा 2ण्3 हल दिया गया है, लम्बन कोण θ त्र400 चित्रा2ण्3 से, ।ठ त्र ।ब् जंद θ ।ब् त्र ।ठध्जंदθ त्र 100 उध्जंद 400 त्र 100 उध्0ण्8391 त्र 119 उ जस्िथतद्ध बिन्दुओं को दूरदशर्क द्वारा देखने पर प्राप्त दो दिशाओं के बीच बना कोण है। क्योंकिक् का मान ज्ञात है, अतः ग्रह के उदाहरण2ण्3 पृथ्वी के दो व्यासतः विपरीत बिन्दुओं।ऽ एवंठ से चन्द्रमा का प्रेक्षण किया गया। प्रेक्षण की दोव्यास क का मान समीकरण ;2.2द्ध की सहायता से ज्ञात किया दिशाओं के बीच, चन्द्रमा पर अंतरित कोण θ की माप जा सकता है। 1व 54′ है। पृथ्वी का व्यास लगभग1ण्276 × 107 उए है।जउदाहरण 2ण्1 ;ंद्ध 10 ;डिग्रीद्ध ;इद्ध 1′ ;1 आवर्फ मिनटद्ध पृथ्वी से चन्द्रमा की दूरी का अभ्िाकलन कीजिए। एवं ;बद्ध 1″ ;1आवर्फ सेवंफडद्ध के कोणों के मान रेडियन ′हल ज्ञात हैθ त्र 1°54 त्र 114 ′ में परिकलित कीजिए ;3600 त्र 2π तंकए 10त्र60′ एवं ′′ .6 द्धत्र;114 × 60द्ध ×; 4ण्85 ×10 तंक 1′ त्र 60 ″ लीजिएद्ध। त्र3ण्32 10 2तंक ऽ चूंकि 1ष् त्र 4ण्85 10 6तंक और इत्र ।ठ त्र1ण्276 × 107उ अतः समीकरण ;2.1द्ध के अनुसार पृथ्वी एवं चन्द्रमा के बीच की दूरी, क् त्र इध्θ 1ण्276 ×10 7 त्र 3ण्32 × 10.2 त्र 3ण्84 ×108 उ ऽ उदाहरण 2ण्4 सूयर् के कोणीय व्यास की माप 1920′′ है। पृथ्वी से सूयर् की दूरीक्ए 1ण्496 ग 1011 उ है। सूयर् का व्यास परिकलित कीजिए। हल सूयर् का कोणीय व्यासα त्र 1920ष् −619204ण्85 ×10तंकत्र× त्र 9ण्31 × 10−3तंक सूयर् का व्यास क त्र α क् दृ3 11 त्र;9ण्31 × 10 द्ध×;1ण्496 × 10 द्ध उ त्र 1ण्39 × 10 9उ ऽ 2ण्3ण्2 अति सूक्ष्म दूरियों का मापन: अणु का आकार अणु के व्यास;10√8 उ से10√10 उद्ध जैसी अत्यंत सूक्ष्म दूरियों के मापन के लिए हमें विश्िाष्ट विध्ियों का अनुसरण करना होता है। इनके लिए हम पेंचमापी जैसे मापक - यंत्रों का उपयोग नहीं कर सकते। यहाँ तक कि सूक्ष्मदशीर् की भी अपनी वुफछ सीमाएँ हैं। एक प्रकाशीय सूक्ष्मदशीर् द्वारा किसी निकाय की जाँच के लिए दृश्य - प्रकाश का उपयोग किया जाता है। प्रकाश के लक्षण तरंग जैसे होने के कारण, प्रकाशीय सूक्ष्मदशीर् को, अध्िक से अध्िक, प्रयुक्त प्रकाश के तरंगदैघ्यर् के बराबर विभेदन के लिए ही प्रयोग में लाया जा सकता है। ;इस विषय में विस्तृत विवेचन आपको कक्षा ग्प्प् की भौतिकी की पाठ्य पुस्तक में मिलेगाद्ध। दृश्य प्रकाश की तरंगदैघ्यर् का परिसर 4000 ऊ से 7000 ऊ है। ;1 ऊ त्र 10.10 उद्ध। अतः प्रकाशीय सूक्ष्मदशीर् इससे छोटे आकार के कणों का विभेदन नहीं कर सकता। दृश्य प्रकाश के स्थान पर हम, इलेक्ट्राॅन - पुंज का उपयोग कर सकते हैं। इलेक्ट्राॅन पुंजों को उचित रीति से अभ्िाकल्िपत वैद्युत एवं चुम्बकीय क्षेत्रों द्वारा पफोकसित किया जा सकता है। इस प्रकार के इलेक्ट्राॅन - सूक्ष्मदशीर् का विभेदन भी अंततः इसी तथ्य द्वारा सीमित होता है कि इलेक्ट्राॅन भी तरंगों की तरह व्यवहार कर सकते हैं ;इस विषय में विस्तार से आप कक्षा ग्प्प् में पढ़ंेगेद्ध। किसी इलेक्ट्राॅन की तरंगदैघ्यर्1 ऊ के अंश के बराबर कम हो सकती है। 0ण्6 ऊ विभेदन क्षमता तक के इलेक्ट्राॅन सूक्ष्मदशीर् विकसित किए जा चुके हैं। इनके द्वारा, लगभग, पदाथो± के अणुओं और परमाणुओं का विभेदन संभव हो गया है। हाल ही में विकसित सुरंगन सूक्ष्मद£शकी द्वारा भी 1ऊ से सूक्ष्मतर विभेदन प्राप्त कर लिया गया है। इनके द्वारा अब अणुओं की आमाप का आकलन संभव है। ओलीक अम्ल अणु के साइश का आकलन करने की एक सरल विध्ि नीचे दी गइर् है। ओलीक अम्ल एक साबुनी द्रव है जिसके अणु का साइश 10√9 उ कोटि का है। इस विध्ि का मूल आधर, जल के पृष्ठ पर ओलीक अम्ल की एक एकाण्िवक परत बनाना है। इसके लिए, पहले हम1 बउ3 ओलीक अम्ल को ऐल्कोहाॅल में घोल कर 20 बउ3 घोल बनाते हैं। इस घोल का 1 बउ3 लेकर ऐल्कोहाॅल में पुनः 20 बउ3 घोल बनाते हैं। अब इस घोल 1की सांद्रता बउ3 ओलीक अम्ल/ बउ3 घोल हुइर्। 20 20 इसके बाद एक बड़े नांद में पानी लेकर, उसके ऊपरलायकोपोडियम पाउडर छिड़क कर, लाइकोपोडियम पाउडरकी एक पतली पिफल्म जल के पृष्ठ के ऊपर बनाते हैं। पिफरओलीक अम्ल के पहले बनाए गए घोल की एक बूंद इसकेऊपर रखते हैं। ओलीक अम्ल की यह बूंद जल के पृष्ठ केऊपर लगभग वृत्ताकार, एक अणु मोटाइर् की पिफल्म के रूप मेंपैफल जाती है। इस प्रकार बनी तनु पिफल्म का व्यास माप करइसका क्षेत्रापफल । ज्ञात किया जा सकता है। माना कि हमने जलके पृष्ठ पर द बूंदें ओलीक अम्ल घोल की डालीं। यदि प्रारंभमें ही हम एक बूंद का अनुमानित आयतन ;ट बउ3द्ध ज्ञात कर लें, तो घोल की द बूंदों का आयतन त्र दट बउ3 इस घोल में विद्यमान ओलीक अम्ल का आयतन13दट बउ त्र 20 20 ओलीक अम्ल का यह घोल तेजी से जल के पृष्ठ पर पैफल कर ज मोटाइर् की पतली पिफल्म बना लेता है। यदि इस पिफल्म का क्षेत्रापफल। बउ2 है, तो पिफल्म की मोटाइर् पिफल्म का आयतन ज पिफल्म का क्षत्रे ापफल दट ज बउ ;2ण्3द्ध20 20 । यदि हम यह मान लें कि पिफल्म एक एकाण्िवक मोटाइर् की है तो श्जश् ओलीक अम्ल के अणु की आमाप अथवा व्यास बन जाता है। इस मोटाइर् का मान 10√9 उ की कोटि का आता है। जउदाहरण 2ण्5 यदि किसी नाभ्िाक का आमाप ;जो वास्तव में 10√15 से 10√14 उ के परिसर में हैद्ध बढ़ाकर एक तीक्ष्ण पिन की नोक ;10√5उ से 10√4उ के परिसर मेंद्ध के बराबर कर दिया जाए, तो परमाणु का लगभग आमाप क्या है? हल नाभ्िाक की आमाप10√15 उ से 10√14 उ के परिसर में है तीक्ष्ण पिन की नोक 10√5 उ से 10√4 उ के परिसर में ले सकते हैं। इस तरह, हमने नाभ्िाक की आमाप को 1010 गुणा बढ़ा दिया है। परमाणु का सामान्य आकार10√10 उ की कोटि का है। अतः उसी अनुपात में बढ़ाने पर इसकी आमाप 1उ होजाएगी। अतः किसी परमाणु में नाभ्िाक आमाप में उतना ही छोटाहै जितनी छोटी लगभग 1उ व्यास के गोले के केन्द्र पर रखे गए तीक्ष्ण पिन की नोक होती है। ऽ 2ण्3ण्3 लम्बाइयों का परिसर हमें विश्व में जो पिण्ड दिखाइर् देते हैं उन पिण्डों की आमापों में अंतर का एक विस्तृत परिसर है। जिसमें एक ओर 10√14 उ कोटि की आमाप का किसी परमाणु का सूक्ष्म नाभ्िाक है, तोदूसरी ओर 1026 उ कोटि की आमाप का दृश्यमान विश्व का परिसर है। सारणी 2.3 में इनमें से वुफछ पिण्डों की आमापों औरदूरियों की कोटि और परास दिए गए हैं।अत्यंत सूक्ष्म और बहुत बड़ी दूरियों के मापन के लिए हम लम्बाइर् के वुफछ विश्िाष्ट मात्राक भी प्रयोग में लाते हैं। ये हैं, 1 पफमीर् त्र 1 ित्र 10√15 उ 1 एंग्सट्रम त्र 1 ऊ त्र 10√10 उ 1 खगोलीय मात्राक 1 प्रकाश वषर्1 पारसेक त्र 1 ।न् ;सूयर् से पृथ्वी की औसत दूरीद्ध त्र 1ण्496 × 1011 उ त्र 1 सल त्र 9ण्46 × 1015 उ ;3 × 108 उ े√1 के वेग से प्रकाश द्वारा 1 सेवंफड में चली गइर् दूरी में1 वषर्द्ध त्र 3ण्08 × 1016 उ ;वह दूरी जिस पर पृथ्वी की कक्षा की औसत त्रिाज्या 1 आवर्फ सेकण्ड का कोण अंतरित करे, 1 पारसेक कहलाती है।द्ध 2ण्4 द्रव्यमान का मापन द्रव्यमान पदाथर् का एक आधरभूत गुण है। यह पिण्ड के ताप, दाब या दिव्फकाल में उसकी अवस्िथति पर निभर्र नहीं करता। द्रव्यमान का ैप् मात्राक किलोग्राम;ाहद्ध है। अंतरार्ष्ट्रीय माप - तोल ब्यूरो द्वारा दिए गए अंतरार्ष्ट्रीय मानक किलोग्राम के आदिप्ररूप विभ्िान्न देशों की बहुत सी प्रयोगशालाओं में उपलब्ध् हैं। भारत में इसे नयी दिल्ली स्िथत राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला ;छच्स्द्ध में रखा गया है। परमाणुओं और अणुओं के द्रव्यमानों के संबंध् में किलोग्रामएक सुविधजनक मात्राक नहीं है। अतः अणुओं, परमाणुओं केद्रव्यमान व्यक्त करने के लिए द्रव्यमान के एक महत्वपूणर्मानक मात्राक, जिसे एकीवृफत परमाणु संहति मात्राक ;नद्ध कहते हैंए का प्रयोग करते हैं, जिसकी स्थापना परमाणुओं केद्रव्यमानों को इस प्रकार, व्यक्त करने के लिए की गइर् है: 1 एकीवृफत परमाणु संहति मात्राक त्र 1न 12 त्र इलेक्ट्राॅनों सहित, काबर्न - समस्थानिक ; ब्द्ध के एक6 परमाणु के द्रव्यमान का ;1ध्12द्ध वां भाग10√27त्र 1ण्66 ाह सामान्य वस्तुओं के द्रव्यमान मापन के लिए हम उसी तरह की सामान्य तुला का उपयोग करते हैं जैसी परचून की दुकान में पाइर्जाती है। विश्व में पाए जाने वाले विशाल पिण्डों जैसे ग्रहों, तारोंआदि के द्रव्यमान ज्ञात करने के लिए हम न्यूटन के गुरुत्वाकषर्णके नियम का उपयोग करते हैं ;देख्िाए अध्याय 8द्ध। अति सूक्ष्मकणों, जैसे परमाणुओं, अवपरमाणुक कणों आदि के लघुद्रव्यमानों के मापन के लिए हम द्रव्यमान - स्पेक्ट्रमलेखी काप्रयोग करते हैं, जिसमें, एकसमान विद्युत एवं चुम्बकीय क्षेत्रा मेंगतिमान, आवेश्िात कणों के प्रक्षेप - पथ की त्रिाज्या उस कण केद्रव्यमान के अनुक्रमानुपाती होती है। 2ण्4ण्1 द्रव्यमानों के परास विश्व में हम जो पिण्ड देखते हैं, उनके द्रव्यमानों में अंतर काएक अत्यंत विस्तृत परिसर है। एक ओर इलेक्ट्राॅन जैसा सूक्ष्म कणहै जिसका द्रव्यमान10.30 ाह कोटि का है, तो दूसरी ओर लगभग 1055 ाह का ज्ञात विश्व है। सारणी ;2.4द्ध में विभ्िान्न द्रव्यमानोंके कोटि और परास दिए गए हैं। सारणी 2ण्4 द्रव्यमानों के परिसर एवं कोटि इलेक्ट्राॅन 10œ30 प्रोटाॅन 10œ27 यूरेनियम परमाणु 10œ25 लाल रुध्िर कोश्िाका 10œ13 ध्ूल - कण 10œ9 वषार् की बूंद 10œ6 मच्छर 10œ5 अंगूर 10œ3 मानव 102 आटोमोबाइल 103 बोइंग 747 वायुयान 108 चंद्रमा 1023 पृथ्वी 1025 सूयर् 1030 आकाशगंगा मंदाकिनी 1041 पे्रक्षणीय विश्व 1055 2ण्5 समय का मापन किसी भी समय - अंतराल को मापने के लिए हमें घड़ी कीआवश्यकता होती है। अब हम समय - मापन हेतु समय कापरमाण्वीय मानक प्रयोग करते हैं जो सीिायम परमाणु मेंउत्पन्न आवतर् कम्पनों पर आधरित है। यही राष्ट्रीय मानक केरूप में प्रयुक्त सीिायम घड़ी, जिसे परमाणु घड़ी भी कहते हैं,का आधर है। ऐसे मानक अनेक प्रयोगशालाओं में उपलब्ध् हैं।सीिायम परमाणु घड़ी में एक सेवफन्ड, सीिायम - 133 परमाणुके निम्नतम ऊजार् स्तर के दो अतिसूक्ष्म स्तरों के मध्य संक्रमणके तदनुरूपी विकिरणों के9ए192ए631ए770 कम्पनों के लिएआवश्यक है। इस सीिायम परमाणु घड़ी की समय दर को,सीिायम परमाणु के कम्पन ठीक उसी प्रकार नियंत्रिात करते हैंजैसे संतुलन चक्र के कम्पन सामान्य कलाइर् घड़ी को अथवाछोटे क्वाट्र्श िस्टल के कम्पन किसी क्वाट्र्श कलाइर् घड़ीको करते हैं।सीिायम परमाणु घडि़याँ अत्यंत यथाथर् होती हैं। सि(ान्ततःवे एक सुबाह्य मानक उपलब्ध् कराती हैं। चार सीिायम परमाणुघडि़यों के माध्यम से, समय - अंतराल के राष्ट्रीय मानक‘सेवफन्ड’ का अनुरक्षण किया जाता है। समय के भारतीय मानकके अनुरक्षण के लिए नयी दिल्ली की राष्ट्रीय भौतिकीप्रयोगशाला में एक सीिायम घड़ी लगाइर् गइर् है।हमारे देश में, सभी भौतिक मानकों ;जिनमें समय औरआवृिा आदि के मानक भी शामिल हैंद्ध के अनुरक्षण औरसुधर का दायित्व छच्स् का है। ध्यान दें कि भारतीय मानकसमय ;प्ैज्द्धए इन चार घडि़यों के समुच्चय से जुड़ा है। दक्षसीिायम परमाणु घडि़याँ इतनी अध्िक यथाथर् हैं कि इनके द्वारासमय बोध् में अनिश्िचतता क्र 1 × 10√13ए अथार्त् 1013 सेवफन्ड में एक सेवफन्ड से भी कम की त्राुटि होने की रहती है। ये एक वषर् में3 माइक्रो सेवंफड से ज्यादा इध्र - उध्र नहीं होती। समय मापनकी इस आश्चयर्जनक यथाथर्ता को ध्यान में रखकर ही लम्बाइर् के ैप्मात्राक को प्रकाश द्वारा ;1ध्299ए 792ए 458द्ध सेवंफड में चलितदूरी के रूप में व्यक्त किया गया है ;सारणी 2.1द्ध।विश्व में होने वाली घटनाओं के समय - अंतरालों में अंतर कापरिसर बहुत व्यापक है। सारणी 2.5, वुफछ प्रारूपिक समय - अंतरालोंके परास और कोटि दशार्ती है।सारणी 2.3 एवं 2.5 में दशार्यी गइर् संख्याओं में आश्चयर्जनकअनुरूपता है। इनका ध्यानपूवर्क अवलोकन करने पर आप देखसकते हैं कि हमारे विश्व में विशालतम और लघुतम पिण्डों कीलम्बाइयों का अनुपात लगभग1041 है तथा यह भी कम रुचिकरनहीं है कि विश्व की घटनाओं से संब( सबसे बड़े और सबसेछोटे समय - अंतरालों का अनुपात भी 1041 ही है। यह संख्या 1041ए सारणी 2.4 में पिफर से प्रकट होती है, जिसमें वुफछ पिण्डोंके प्रारूपिक द्रव्यमानों को सूचीब( किया गया है। हमारे विश्वके विशालतम एवं लघुतम पिण्डों के द्रव्यमानों का अनुपातलगभग;1041द्ध2 है। क्या इन विशाल संख्याओं की यह आश्चयर्जनक,अनुरूपता मात्रा संयोग है? सारणी 2ण्5 समय अंतरालों का परास एवं कोटि 10œ24किसी अत्यध्िक अस्थायी कण का जीवन काल 10œ22प्रकाश द्वारा नाभ्िाकीय दूरी को तय करने में लगा समय 10œ19ग्.किरणों का आवतर्काल 10œ15परमाण्वीय वंफपनों का आवतर्काल 10œ15प्रकाश तरंग का आवतर्काल किसी परमाणु की उत्तेजित अवस्था का जीवन काल 10œ8 10œ6रेडियो तरंग का आवतर्काल 10œ3ध्वनि तरंग का आवतर्काल 10œ1आंख के झपकने में लगा समय मानव हृदय की क्रमिक ध्ड़कनों के बीच का समय 100 प्रकाश के चंद्रमा से पृथ्वी तक आने में लगा समय 100 प्रकाश के सूयर् से पृथ्वी तक आने में लगा समय 102 किसी उपग्रह का आवतर्काल 104 पृथ्वी का घूणर्नकाल 105 चंद्रमा का घूणर्न एवं परिक्रमण काल 106 पृथ्वी का परिक्रमण काल 107 प्रकाश का समीपी तारे से पृथ्वी तक आने में लगा समय 108 मानव का औसत जीवन काल 109 1011मिड्ड के पिरामिडों की आयु 1015डाइनोसाॅर के विलुप्त होने के बाद बीता समय 1017विश्व की आयु 2ण्6 यथाथर्ता, यंत्रों की परिशु(ता एवं मापन में त्राुटि सामान्यतः, मापन में आइर् त्राुटियों को मुख्य रूप से निम्नलिख्िातदो श्रेण्िायों में वगीर्वृफत किया जा सकता है: ;ंद्ध क्रमब( त्राुटियाँमापन, समस्त प्रायोगिक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का मूलाधर है।एवं;इद्ध यादृच्िछक त्राुटियाँ।किसी भी मापन - यंत्रा के सभी मापन के परिणामों में वुफछ नक्रमब( त्राुटियाँवुफछ अनिश्िचतता रहती ही है। यह अनिश्िचतता ही त्राुटिकहलाती है। प्रत्येक परिकलित राश्िा, जो मापित मानों परक्रमब( त्राुटियाँ वे त्राुटियाँ हैं जो किसी एक दिशा ध्नात्मक याआधरित होती है, में भी वुफछ त्राुटि होती है। यहाँ हम दोपिफर )णात्मक में प्रवृत्त होती हैं। क्रमब( त्राुटियों के वुफछ स्रोततकनीकी शब्दों: यथाथर्ता और परिशु(ता में प्रभेद करेंगे। निम्नलिख्िात हैं: किसी माप की यथाथर्ता वह मान है जो हमें यह बताता है किकिसी राश्िा का मापित मान, उसके वास्तविक मान के कितनानिकट है जबकि परिशु(ता यह बताती है कि वह राश्िा किसविभेदन या सीमा तक मापी गइर् है। मापन की यथाथर्ता कइर् कारकों पर निभर्र कर सकती हैजिनमें मापक यंत्रों का विभेदन या सीमा भी सम्िमलित है।उदाहरण के लिए, माना कि किसी लम्बाइर् का वास्तविक मान 3ण्678 बउ है। एक प्रयोग में 0ण्1 बउविभेदन का मापक - यंत्रा प्रयोग करके इसका मान 3ण्5 बउ मापा गया, जबकि, दूसरेप्रयोग में अध्िक विभेदन वाला ;माना 0ण्01 बउद्ध मापक यंत्राप्रयोग करके उसी लंबाइर् को 3ण्38 बउ मापा गया। यहाँ पहलामाप अध्िक यथाथर् है ;क्योंकि वास्तविक मान के निकट हैद्धपरन्तु कम परिशु( है ;क्योंकि इसका विभेदन केवल 0ण्1 बउ है।द्ध जबकि, दूसरा माप कम यथाथर् परन्तु अध्िक परिशु( है।अतः मापन में त्राुटियों के कारण हर माप एक सन्िनकट माप है। ;ंद्ध यंत्रागत त्राुटियाकारण होती हैं। उदाहरणाथर्, हो सकता है कि किसीतापमापी का अंशांकन ठीक न हुआ हो ;परिणामस्वरूप यह ैज्च् पर जल का क्वथनांक 100 °ब् के स्थान पर 104 °ब् पढ़ता होद्धऋ किसी व£नयर वैफलिपसर् में दोनोंजबड़े मिलाने पर व£नयर पैमाने का शून्य चिह्न मुख्यपैमाने के शून्य चिह्न के संपाती न हांे, या किसी साधरणपैमाने का एक सिरा घ्िासा हुआ हो। ;इद्ध प्रायोगिक तकनीक या कायर्विध्ि में अपूणर्ता: मानव शरीर का ताप ज्ञात करने के लिए यदि आप तापमापी कोबगल में लगाकर ताप ज्ञात करेंगे तो यह ताप शरीर केवास्तविक ताप से सदैव ही वुफछ कम आएगा। प्रयोग के दौरान बाह्य परिस्िथतियाँ ;ताप, दाब, वायु वेग, आद्रर्ता ँः ये त्राुटियाँ मापक यंत्रा की अपूणर्अभ्िाकल्पना, त्राुटिपूणर् अंशांकन या शून्यांक - त्राुटि आदि केआदि में परिवतर्नद्ध मापन में क्रमब( त्राुटियाँ प्रस्तुत कर सकती हैं। ;बद्ध व्यक्ितगत त्राुटियाँ: ये त्राुटियाँ, प्रेक्षक के किसी पूवार्ग्रह,उपकरण के समंजन में रह गइर् कमी या प्रेक्षण लेते समयप्रेक्षक द्वारा उचित सावधनियाँ न बरतने आदि के कारणहोती हैं। उदाहरण के लिए, प्रकाशीय मंच पर सुइर् कीस्िथति का पैमाने पर पाठ्यांक लेते समय यदि आप स्वभावके कारण अपना सिर सदैव सही स्िथति से थोड़ा दाईं ओररखेंगे, तो पाठन में लम्बन के कारण त्राुटि आ जाएगी। सुध्री हुइर् प्रायोगिकी तकनीकों के उपयोग, प्रयोग के लिएअपेक्षावृफत अच्छे मापन यंत्रों का चयन एवं यथासंभव व्यक्ितगतपूवार्ग्रहों को दूर करके क्रमब( त्राुटियों को कम किया जासकता है। किसी भी दी गइर् व्यवस्था के लिए, इन त्राुटियों कावुफछ निश्िचत सीमाओं तक आकलन किया जा सकता है औरपाठ्यांकों को तदनुसार संशोध्ित किया जा सकता है। यादृच्िछक त्राुटियाँ मापन में अनियमित रूप से होने वाली त्राुटियों को यादृच्िछक त्राुटियाँ कहते हैं और इसलिए ये चिह्न और परिमाण मेंयादृच्िछक हैं। यादृच्िछक त्राुटियाँ, प्रायोगिक अवस्थाओं ;ताप,वोल्टता प्रदाय, प्रयोग व्यवस्था के यांत्रिाक कम्पन आदिद्ध मेंहोने वाले यादृच्िछक तथा अननुमेय उतार - चढ़ाव के कारण तथापाठ्यांक के समय पे्रक्षक द्वारा की गइर् ;पूवार्ग्रह रहितद्धव्यक्ितगत त्राुटियों आदि के कारण होती हैं। उदाहरण के लिए,कोइर् व्यक्ित एक ही प्रेक्षण को बार - बार दोहराये तो संभव है किहर बार उसका पाठ्यांक भ्िान्न हो। अल्पतमांक त्राुटि किसी मापक यंत्रा द्वारा मापा जा सकने वाला छोटे से छोटा मान उस मापक यंत्रा का अल्पतमांक कहलाता है। किसी मापक यंत्रा द्वारा लिए गए सभी पाठ्यांक या मापित मान उसके अल्पतमांक तक ही सही होते हैं। अल्पतमांक त्राुटि एक ऐसी त्राुटि होती है जो मापक यंत्रा के विभेदन से संब( होती है। उदाहरण के लिए, किसी व£नयर वैफलिपसर् का अल्पतमांक 0ण्01 बउ हैऋ किसी गोलाइर्मापी काअल्पतमांक 0ण्001 बउ हो सकता है। अल्पतमांक त्राुटि को यादृच्िछक त्राुटियों की श्रेणी में एक सीमित परिमाण तक हीरखा जा सकता हैऋ यह त्राुटि क्रमब( और यादृच्िछक दोनों ही के साथ होती है। यदि हम लंबाइर् मापने के लिए मीटर स्केलका उपयोग करते हैं तो मीटर स्केल में अंकन 1 उउ अंतराल पर होता है।अध्िक परिशु( मापन यंत्रों के प्रयोग करके, प्रायोगिक तकनीकों में सुधर, आदि के द्वारा, हम अल्पतमांक त्राुटि को कम कर सकते हैं। प्रेक्षणों को कइर् बार दोहराने पर प्राप्त सभी प्रेक्षणों के मानों का औसत प्राप्त होता है। यह माध्य मान मापित राश्िा के वास्तविक मान के अत्यध्िक निकट होगा। 2ण्6ण्1 निरपेक्ष त्राुटि, आपेक्ष्िाक त्राुटि एवं प्रतिशत त्राुटि ;ंद्ध माना कि किसी राश्िा के कइर् मापनों के मान ंए ं2ए ंण्ण्ण्ण्ए ं हैं। प्रायोगिक परिस्िथतियों में, इस राश्िा का3द सवार्ध्िक संभव मान, इन सभी मानों के समांतर माध्य कोमाना जा सकता है। ं त्र ;ं़ं़ं़ण्ण्ण़्ं द्ध ध् द ;2ण्4द्धमाध्य123दद ं ंध्दया, माध्य प ;2ण्5द्ध प1 क्योंकि जैसा पहले स्पष्ट किया जा चुका है कि यह माननायुक्ितसंगत है कि किसी राश्िा की व्यष्िटगत माप उस राश्िाके वास्तविक मान से उतनी ही अध्िआकलित हो सकती है,जितनी उसके अवआकलित होने की संभावना होती है।राश्िा के व्यष्िटगत और वास्तविक माप के बीच केअंतर के परिमाण को मापन की निरपेक्ष त्राुटि कहते हैं।इसको द्यΔं द्य द्वारा नि£दष्ट किया जाता है। क्योंकि, हमेंकिसी राश्िा का वास्तविक मान ज्ञात करने की कोइर् विध्िपता नहीं है, इसलिए हम समांतर माध्य को ही राश्िा कावास्तविक मान स्वीकार कर लेते हैं। तब हमारी व्यष्िटगतमाप में वास्तविक माप से निरपेक्ष त्राुटियाँ इस प्रकार हैं, Δं त्र ं √ ं11माध्यए Δं त्र ं√ ं22माध्यए ण्ण्ण्ण् ण्ण्ण्ण् ण्ण्ण्ण् ण्ण्ण्ण् ण्ण्ण्ण् ण्ण्ण्ण् Δं त्र ं √ ंददमाध्य ऊपर परिकलित Δं का मान वुफछ प्रकरणों के लिएध्नात्मक हो सकता है जबकि दूसरे वुफछ अन्य प्रकरणों केलिए यह )णात्मक हो सकता है। परन्तु निरपेक्ष त्राुटि द्यΔंद्य सदैव ही ध्नात्मक होगी। ;इद्ध भौतिक राश्िा की निरपेक्ष त्राुटियों के परिमाणों के समांतरमाध्य को भौतिक राश्िां के मान की अंतिम या माध्य निरपेक्षत्राुटि कहा जाता है। इसको Δंसे निरूपित करते हैं।अतः, माध्य Δं त्र ;द्यΔं द्य़द्यΔं द्य़द्यΔं द्य़ण्ण्ण़् द्यΔं द्यद्धध्दमाध्य123द;2ण्6द्ध द त्र ∑ द्यΔंपद्यध्द ;2ण्7द्ध त्रप1 यदि हम कोइर् एकल माप लें, तो हमें इसका मान ं क्र Δंके परिसर में कहीं प्राप्त होगा।माध्यमाध्य अथार्त् ं त्र ं क्र Δंमाध्यया, माध्य जउदाहरण2ण्7 हम एक सरल लोलक का दोलन - काल ज्ञात करते हैं। प्रयोग के क्रमिक मापनों में लिए गएं √ Δं≤ ं ≤ ं ़ Δं ;2ण्8द्धमाध्यमाध्य माध्यमाध्यपाठ्यांक हैं: 2ण्63 ेए 2ण्56 ेए 2ण्42 ेए 2ण्71े एवंइसका अथर् यह हुआ कि भौतिक राश्िा की किसी मापं का 2ण्80 े । निरपेक्ष त्राुटि, सापेक्ष त्राुटि एवं प्रतिशत त्राुटिमान ;ं़ Δंद्ध तथा ;ं− Δंद्ध के बीच होने कीमाध्यमाध्यमाध्यमाध्यसंभावना है। ;बद्ध निरपेक्ष त्राुटि के स्थान पर, हम प्रायः आपेक्ष्िाक त्राुटि या प्रतिशत त्राुटि ;δंद्ध का प्रयोग करते हैं। आपेक्ष्िाक त्राुटि, परिकलित कीजिए। हल लोलक का औसत दोलन काल,; 2ण्63 ़ 2ण्56 ़ 2ण्42 ़ 2ण्71 ़द्ध2ण्80 े ज् त्र मापित राश्िा की माध्य निरपेक्ष त्राुटि Δंमाध्य एवं इसके माध्य मान ंमाध्यका अनुपात है। आपेक्ष्िाक त्राुटि त्र Δंध्ं;2ण्9द्धमाध्यमाध्य जब आपेक्ष्िाक त्राुटि को प्रतिशत में व्यक्त करते हैं, तो इसे प्रतिशत त्राुटि कहा जाता है। अतः प्रतिशत त्राुटि, δं त्र ;Δंध्ंद्ध 100ः ;2ण्10द्धमाध्यमाध्यआइये, अब हम एक उदाहरण पर विचार करते हैं। 5 13ण्12 त्र े 5त्र 2ण्624 े त्र 2ण्62 े क्योंकि, सभी काल 0ण्01 े के विभेदन तक मापे गए हैं, इसलिए समय की सभी मापें दूसरे दशमलव स्थान तक हैं। इस औसत काल को भी दूसरे दशमलव स्थान तक लिखना उचित है। मापन में त्राुटियाँ हैं: 2ण्63 े √ 2ण्62 े त्र 0ण्01 े 2ण्56 े √ 2ण्62 े त्र √ 0ण्06 े 2ण्42 े √ 2ण्62 े त्र √ 0ण्20 े 2ण्71 े √ 2ण्62 े त्र 0ण्09 े 2ण्80 े √ 2ण्62 े त्र 0ण्18 े जउदाहरण 2ण्6 राष्ट्रीय प्रयोगशाला में स्िथत एक मानक घड़ी से तुलना करके दो घडि़यों की जाँच की जा रही है। मानक घड़ी जब दोपहर के 12रू00रू00 का समय दशार्ती है, तो इन दो घडि़यों के पाठ्यांक इस प्रकार हैं: घड़ी 1 घड़ी 2 सोमवार 12रू00रू05 10रू15रू06 मंगलवार 12रू01रू15 10रू14रू59 बुध्वार 11रू59रू08 10रू15रू18 ध्यान दीजिए, त्राुटियों के भी वही मात्राक हैं जो मापी जाने वाली राश्िायों के हैं। बृहस्पतिवार 12रू01रू50 10रू15रू07 सभी निरपेक्ष त्राुटियों का समांतर माध्य ;समांतर माध्य के शुक्रवार 11रू59रू15 10रू14रू53 शनिवार 12रू01रू30 10रू15रू24 रविवार 12रू01रू19 10रू15रू11 यदि आप कोइर् ऐसा प्रयोग कर रहे हों जिसके लिए आपकोपरिशु( समय अंतराल मापन की आवश्यकता है, तो इनमेंसे आप किस घड़ी को वरीयता देंगे? क्यों? हल सात दिन के घड़ी 1 के प्रेक्षणों में अंतर का परिसर 162े है जबकि घड़ी 2 में यह परिसर 31े का है। घड़ी 1द्वारा लिए गए समय के पाठ्यांक, घड़ी 2 द्वारा लिए गए समयके पाठ्यांकों की तुलना में, मानक समय के अध्िक निकट है।महत्वपूणर् बात यह है कि घड़ी की शून्यांक त्राुटि, परिशु( कायर्के लिए उतनी महत्वपूणर् नहीं है जितना इसके समय में होनेवाला परिवतर्न है, क्योंकि, शून्यांक त्राुटि को तो कभी भी सरलता से दूर किया जा सकता है। अतः घड़ी 1 की तुलना में घड़ी 2 को वरीयता दी जाएगी। ऽ लिए हम केवल परिमाण लेते हैंद्ध हैं: ΔΤ त्र ख्;0ण्01़ 0ण्06़0ण्20़0ण्09़0ण्18द्धे,ध्5माध्यत्र 0ण्54 ेध्5त्र 0ण्11 े इसका अथर् है कि सरल लोलक का दोलन काल ;2ण्62 क्र 0ण्11द्ध ेहै। अथार्त् इसका मान ;2ण्62 ़ 0ण्11द्ध े एवं ;2ण्62 √ 0ण्11द्ध ेए अथवा 2ण्73 े एवं 2ण्51 े के बीच है। क्योंकि सभी निरपेक्ष त्राुटियों का समांतर माध्य 0ण्11 ेहै, अतः इस मान में सेवंफड के दसवें अंश में पहले से ही त्राुटि है। इसलिए दोलन काल का मान सेवंफड के सौवें भाग तक व्यक्त करने का कोइर् अथर् नहीं है। इसको व्यक्त करने का अध्िक सही ढंग इस प्रकार है: ज् त्र 2ण्6 क्र 0ण्1 े ध्यान दीजिए, अंतिम संख्यांक 6 विश्वसनीय नहीं है, क्योंकि यह 5 एवं 7 के बीच वुफछ भी हो सकता है। इस तथ्य को किसी रेखा की लंबाइर् आप वैफसे मापेंगे? आप कह सकते हैं, इस स्तर तवफ आने के बाद यह वैफसाअटपटा प्रश्न है? लेकिन जरा सोचिए कि यदि यह रेखासरल - रेखा न हो, तो? अपनी अभ्यास पुस्ितका में या श्याम - पटपर एक टेढ़ी - मेढ़ी रेखा खींचिए। ठीक है, इसकी लंबाइर्मापना भी कोइर् बहुत कठिन कायर् नहीं है। आप एक धगालेंगे, इसे रेखा के ऊपर सावधनीपूवर्क रखेंगे, पिफर धगे कोपैफला कर इसकी लंबाइर् माप लेंगे।अब कल्पना कीजिए कि आपको राष्ट्रीय राजमागर् की याकिसी नदी की, या दो रेलवे स्टेशनों के बीच रेल की पटरियोंकी, या दो राज्यों अथवा देशों के बीच की सीमा रेखा कीलंबाइर् मापनी है। तो इसके लिए, यदि आप 1उ या 100उ की रस्सी लें, इसे रेखा के अनुदिश रखें, बार - बार इसकी स्िथति बदल कर आगे ले जाएं, तो इसमें जो मानवीय श्रम, समय औरखचर् आएगा वह उपलब्िध् के अनुपात में बहुत अध्िक होगा।इसके अतिरिक्त इस महत्कायर् में त्राुटियाँ अवश्यमेव आ जाएंगी।इस सिलसिले मंेएक रोचक तथ्य आपको बताएँ। प्रफांस औरबेल्िजयम की उभयनिष्ठ अंतरार्ष्ट्रीय सीमा रेखा है। दोनों देशोंके राजकीय दस्तावेजों में दजर् उसकी लंबाइर् में बहुत अंतर है।एक कदम और आगे बढ़ें और समुद्र की तट रेखा अथार्त्वह रेखा जिस पर समुद्र और जमीन एक दूसरे से मिलते हैं,के बारे में विचार करें। इसकी तुलना में तो सड़कों और नदियोंमें कापफी हलके मोड़ होते हैं। इस सबके बावजूद, सभीदस्तावेजों में, जिनमें हमारी स्वूफल की पुस्तवेंफ भी शामिल हैं,गुजरात या आंध््रप्रदेश के समुद्र तट की लंबाइर् या दो राज्यों केबीच की सीमा रेखा की लंबाइर् आदि के बारे में सूचनाएं दजर्हैं। रेल के टिकटों पर स्टेशनों के साथ, उनके बीच की दूरीभी छपी रहती है। आपने सड़कों के किनारे - किनारे लगे मीलके पत्थर देखे होंगे। ये विभ्िान्न शहरों की दूरियाँ बताते हैं।आख्िार, यह सब किया वैफसे जाता है?आपको यह तय करना होता है कि किस सीमा तक त्राुटिसहन की जा सकती है और मापने के प्रक्रम पर अध्िकतमखचर् कितना करना है। अगर आपको कम त्राुटियाँ चाहिए तोइसके लिए उच्च तकनीकी और अध्िक खचर् की आवश्यकताहोगी। यह कहना पयार्प्त होगा कि इसके लिए कापफी उच्चस्तर की भौतिकी, गण्िात, अभ्िायांत्रिाकी और प्रौद्योगिकी कीआवश्यकता होगी। इसका संबंध् प्रेफक्टलों ;थ्तंबजंसेद्ध के क्षेत्रा से है जो सै(ांतिक भौतिकी में वुफछ समय से कापफीलोकपि्रय है। इस सबके बावजूद जो आंकड़े प्राप्त होते हैं उनपर कितना विश्वास किया जाए यह कहना कठिन होता हैजैसा प्रफांस और बेल्िजयम के दृष्टांत से स्पष्ट ही है। बात चलरही है तो आपको बता दें कि बेल्िजयम और प्रफांस की यहविसंगति, प्रेफक्टलों ;थ्तंबजंसेद्ध एवं केआॅस ;ब्ींवेद्ध विषय से संबंध्ित उच्च भौतिकी की एक पुस्तक के प्रथमइस उदाहरण में आपेक्ष्िाक त्राुटि अथवा प्रतिशत त्राुटि है - 01ण् δं त्र× 100 त्र 4ः ऽ 2ण्6 2ण्6ण्2 त्राुटियों का संयोजन यदि हम कोइर् ऐसा प्रयोग करें जिसमें कइर् माप सम्िमलित हों, तो हमें यह भी जानना चाहिए कि इन मापनों में त्राुटियाँ किस प्रकार संयोजित होती हैं। उदाहरण के लिए, किसी पदाथर् का घनत्व उसके द्रव्यमान और आयतन का अनुपात है। यदि हम किसी वस्तु के द्रव्यमान और उसकी आमापों या विमाओं के मापने में त्राुटि करते हैं तो हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि उस वस्तु के पदाथर् के घनत्व में भी त्राुटि आएगी। यह आकलन करने के लिए कि यह त्राुटि कितनी होगी हमें यह सीखना होगा कि विभ्िान्न गण्िातीय संियाओं में त्राुटियाँ किस प्रकार संयोजित होती हैं। इसके लिए हम निम्नलिख्िात कायर्विध्ि का अनुसरण करते हैं। ;ंद्ध किसी संकलन या व्यवकलन की त्राुटि मान लीजिए, कि दो भौतिक राश्िायों । एवंठ के मापित मान क्रमशः। क्र Δ।ए ठ क्र Δठ हैं। जहाँ, Δ। एवं Δठ क्रमशः इन राश्िायों की निरपेक्ष त्राुटियाँ हैं। हम संकलन र् त्र । ़ ठ में त्राुटि Δर् ज्ञात करना चाहते हैं। संकलित करने परर् ± Δर् त्र ;। क्र Δ।द्ध ़ ;ठ क्र Δठद्ध र् में अध्िकतम संभावित त्राुटि Δर् त्र Δ। ़ Δठ व्यकलित करने पर र् त्र । √ ठ के लिए हमें प्राप्त होता है र् क्र Δ र् त्र ;। क्र Δ।द्ध œ ;ठ क्र Δठद्ध त्र ;। √ ठद्ध ± Δ। क्र Δठ अथवा क्र Δर् त्र क्र Δ। क्र Δठ यहाँ पिफर अध्िकतम संभावित त्राुटि Δर् त्र Δ। क्र Δठ अतः, नियम यह है: जब दो राश्िायों को संकलित या व्यवकलित किया जाता है, तो अंतिम परिणाम में निरपेक्षत्राुटि उन राश्िायों की निरपेक्ष त्राुटियों के योग के बराबरहोती है। जउदाहरण2ण्8 किसी तापमापी द्वारा मापे गए दो पिण्डों के ताप क्रमशःज त्र 20 0ब् क्र 0ण्5 0ब् एवंज त्र 50 0ब् 12पृष्ठ पर प्रस्तुत की गइर् है। क्र 0ण्5 0ब् हैं। इन पिण्डों का तापान्तर और उसमें आइर् संकेत के रूप में हम इस प्रकार कहते हैं कि माप में दो साथर्क त्राुटि परिकलित कीजिए।अंक हैं। इस प्रकरण में दो साथर्क अंक 2 तथा 6 हैं जिनमें 2 हल ज′ त्र ज√ज त्र ;50 0ब्क्र0ण्5 0ब्द्ध√ ;200ब्क्र0ण्5 0ब्द्ध21विश्वसनीय है और 6 में त्राुटि संब( है। अनुभाग 2.7 में आप साथर्क अंकों के विषय में और विस्तार से सीखेंगे। ज′ त्र 30 0ब् क्र 1 0ब् ऽ ;इद्ध गुणनपफल या भागपफल की त्राुटि मान लीजिए, कि र् त्र ।ठ और । एवं ठ के मापित मान । क्र Δ। एवं ठ क्र Δठ हैं, तब, र् क्र Δर् त्र ;। क्र Δ।द्ध ;ठ क्र Δठद्धत्र ।ठ क्र ठ Δ। क्र । Δठ क्र Δ। Δठण् वाम पक्ष को र् से एवं दक्ष्िाण पक्ष को।ठ से भाग करने पर, 1क्र;Δर्ध्र्द्ध त्र 1 क्र ;Δ।ध्।द्ध क्र ;Δठध्ठद्ध क्र ;Δ।ध्।द्ध;Δठध्ठद्ध चूंकि Δ। एवं Δठ बहुत छोटे हैं उनके गुणनपफल को हम उपेक्षणीय मान सकते हैं। अतः अध्िकतम आपेक्ष्िाक त्राुटि Δर्ध् र् त्र ;Δ।ध्।द्ध ़ ;Δठध्ठद्ध आप यह आसानी से जाँच सकते हैं कि यह तथ्य भागपफल पर भी लागू होता है। अतः, नियम यह है रू जब दो राश्िायों को गुणा या भाग किया जाता है तो प्राप्त परिणाम में आपेक्ष्िाक त्राुटि, उन गुणकों अथवा भाजकों में आपेक्ष्िाक त्राुटियों का योग होती हैं। त्त् 200′ 12त् त्रत्र त्र 66ण्7 वीउत्1 ़त्23 11 1 त्ऱतब, ∵ से हमें प्राप्त होता है: ′ Δ ′त्रΔ 1 ़Δ 2 ′2 22 12 ′′2 Δत्1 ′2 Δत्2Δत् त्र;त् द्ध 2 ़;त् द्ध त्2त्12 ⎛ 66ण्7 ⎞2 ⎛ 66ण्7 ⎞2 त्र 3 ़ 4⎜⎟⎜⎟⎝ 100 ⎠⎝ 200 ⎠ त्र 1ण्8 अतः, त्′त्र 66ण्7 ±1ण्8 वीउ ;यहाँ साथर्क अंकों के नियमों को प्रमाण्िात करने की दृष्िट से त् का मान 2 के स्थान पर 1.8 के रूप में व्यक्त किया गया है। ऽ ;बद्ध मापित राश्िा की घातों के प्रकरण में त्राुटि जउदाहरण 2ण्9 प्रतिरोध् त् त्र टध्प्ए जहाँ ट त्र मान लीजिए र् त्र ।2ए ;100 क्र 5द्धट एवंप् त्र ;10 क्र 0ण्2द्ध। है।त् में प्रतिशत तब, त्राुटि ज्ञात कीजिए। Δर्ध्र् त्र ;Δ।ध्।द्ध ़ ;Δ।ध्।द्ध त्र 2 ;Δ।ध्।द्ध अतः ।2 में आपेक्ष्िाक त्राुटि, । में आपेक्ष्िाक त्राुटि की दो गुनी हल ट में प्रतिशत त्राुटि 5ः और प् में प्रतिशत त्राुटि 2ः है ∴ त् में वुफल प्रतिशत त्राुटि त्र 5ः ़ 2ः त्र 7ःण् ऽ हल ;ंद्ध श्रेणी क्रम संयोजन का तुल्य प्रतिरोध्, त् त्रत्1 ़ त्2 त्र ;100 क्र 3द्ध वीउ ़ ;200 क्र 4द्ध वीउ त्र 300 क्र 7 वीउण् ;इद्ध पाश्वर् क्रम संयोजन का तुल्य प्रतिरोध्, है।व्यापकीकरण करने पर,यदि र् त्र ।च ठुध्ब्त तो, Δर्ध्र् त्र च ;Δ।ध्।द्ध ़ ु ;Δठध्ठद्ध ़ त ;Δब्ध्ब्द्धण् ऽ अतः, नियम यह है रू किसी भौतिक राश्िा जिस पर ा घात चढ़ाइर् गइर् है, की आपेक्ष्िाक त्राुटि उस व्यष्िटगत राश्िा की आपेक्ष्िाक त्राुटि की ा गुनी होती है। उदाहरण2ण्11 यदि र् त्र ।4ठ1ध्3ध्ब्क्3ध्2 हो तो र् की आपेक्ष्िाक त्राुटि ज्ञात कीजिए। हल र् में आपेक्ष्िाक त्राुटि Δर्ध्र् त्र 4;Δ।ध्।द्ध ़;1ध्3द्ध ;Δठध्ठद्ध ़ ;Δब्ध्ब्द्ध ़ ;3ध्2द्ध ;Δक्ध्क्द्ध ऽ हल ह त्र 4π2स्ध्ज्2 ज Δज Δज् Δजयहाँ, ज् त्र और Δत्र ए अतः, त्रज् । यहाँ स् एवंद दज्ज ज दोनों के मापन की त्राुटियाँ अल्पतमांक त्राुटियाँ हैं। अतः ;Δहध्हद्ध त्र ;Δस्ध्स्द्ध ़ 2;Δज्ध्ज् द्ध0ण्1 ⎛1 ⎞़2 त्र0ण्027 त्र ⎜⎟20ण्0 ⎝90 ⎠ अतः ह के मापन में प्रतिशत त्राुटि 100 ;Δहध्हद्ध त्र 100;Δस्ध्स्द्ध ़ 2 × 100 ;Δज्ध्ज्द्ध त्र 3ः ऽ 2ण्7 साथर्क अंक जैसा कि ऊपर वणर्न किया जा चुका है, हर मापन में त्राुटियाँ सम्िमलित होती हैं। अतः मापन के परिणामों को इस प्रकार प्रस्तुत किया जाना चाहिए कि मापन की परिशु(ता स्पष्ट हो जाए। साधरणतः, मापन के परिणामों को एक संख्या के रूप में प्रस्तुत करते हैं जिसमें वह सभी अंक सम्िमलित होते हैं जो विश्वसनीय हैं, तथा वह प्रथम अंक भी सम्िमलित किया जाता है जो अनिश्िचत है। विश्वसनीय अंकों और पहले अनिश्िचत अंक को संख्या के साथर्क - अंक माना जाता है। यदि हम कहें कि किसी सरल लोलक का दोलन काल 1.62 े है, तो इसमें अंक 1 एवं 6 तो विश्वसनीय एवं निश्िचत हैं, जबकि अंक 2 अनिश्िचत हैऋ इस प्रकार मापित मान में 3 साथर्क अंक हैं। यदि मापन के बाद किसी वस्तु की लम्बाइर्, 287.5 बउ व्यक्त की जाए तो इसमें चार साथर्क अंक हैं, जिनमें 2, 8, 7 तो निश्िचत हैं परन्तु अंक 5 अनिश्िचत है। अतः राश्िा के मापन के परिणाम में साथर्क अंकों से अध्िक अंक लिखना अनावश्यक एवं भ्रामक होगा, क्योंकि, यह माप की परिशु(ता के विषय में गलत धरणा देगा। किसी संख्या में साथर्क अंकों की संख्या ज्ञात करने के नियम निम्नलिख्िात उदाहरणों द्वारा समझे जा सकते हैं। जैसा पहले वणर्न किया जा चुका है कि साथर्क अंक मापन की परिशु(ता इंगित करते हैं जो मापक यंत्रा के अल्पतमांक पर निभर्र करती है। किसी मापन में विभ्िान्न मात्राकों के परिवतर्न के चयन से साथर्क अंकों की संख्या परिव£तत नहीं होती। यह महत्वपूणर् टिप्पणी निम्नलिख्िात में से अध्िक प्रेक्षणों को स्पष्ट कर देती है: ;1द्ध उदाहरण के लिए, लम्बाइर् 2ण्308 बउ में चार साथर्क अंक हैं। परन्तु विभ्िान्न मात्राकों में इसी लम्बाइर् को हम 0ण्02308 उ या 23ण्08 उउ या 23080 μउ भी लिख सकते हैं। इन सभी संख्याओं में साथर्क अंकों की संख्या वही अथार्त चार ;अंक 2ए 3ए 0ए 8द्ध है। यह दशार्ता है कि साथर्क अंकों की संख्या निधर्रित करने में, दशमलव कहाँ लगा है इसका कोइर् महत्व नहीं होता। उपरोक्त उदाहरण से निम्नलिख्िात नियम प्राप्त होते हैं: ऽ सभी शून्येतर अंक साथर्क अंक होते हैं। ऽ यदि किसी संख्या में दशमलव बिन्दु है, तो उसकी स्िथति का ध्यान रखे बिना, किन्हीं दो शून्येतर अंकों के बीच के सभी शून्य साथर्क अंक होते हैं। ऽ यदि कोइर् संख्या 1 से छोटी है तो वे शून्य जो दशमलव के दाईं ओर पर प्रथम शून्येतर अंक के बाईं ओर हों, साथर्क अंक नहीं होते। ; 0ण्00 2308 में अधेरेखांकित शून्य साथर्क अंक नहीं हैंद्ध। ऽ ऐसी संख्या जिसमें दशमलव नहीं है के अंतिम अथवा अनुगामी शून्य साथर्क अंक नहीं होते। ;अतः 123 उ त्र 12300 बउ त्र 123000 उउ में तीन ही साथर्क अंक हैं, संख्या में अनुगामी शून्य साथर्क अंक नहीं हैंद्ध। तथापि, आप अगले प्रेक्षण पर भी ध्यान दे सकते हैं। ऽ एक ऐसी संख्या, जिसमें दशमलव बिन्दु हो, के अनुगामी शून्य साथर्क अंक होते हैं। ;संख्या 3ण्500 या 0ण्06900 में चार साथर्क अंक हैंद्ध। ;2द्ध अनुगामी शून्य साथर्क अंक हैं या नहीं इस विषय में भ्रांति हो सकती है। मान लीजिए किसी वस्तु की लम्बाइर् 4ण्700 उ लिखी गइर् है। इस प्रेक्षण से यह स्पष्ट है कि यहाँ शून्यों का उद्देश्य माप की परिशु(ता को बतलाना है अतः यहाँ सभी शून्य साथर्क अंक हैं। ;यदि ये साथर्क न होते तो इनको स्पष्ट रूप से लिखने की आवश्यकता न होती। तब सीध्े - सीध्े हम अपनी माप को4ण्7 उ लिख सकते थे।द्ध अब मान लीजिए हम अपना मात्राक बदल लेते हैं तो 4ण्700 उ त्र 470ण्0 बउ त्र 0ण्004700 ाउ त्र 4700 उउ क्योंकि, अंतिम संख्या में दो शून्य, बिना दशमलव वाली संख्या में अनुगामी शून्य हैं, अतः प्रेक्षण;1द्ध के अनुसार हम इस गलत निष्कषर् पर पहुँच सकते हैं कि इस संख्या में 2 साथर्क अंक हैं जबकि वास्तव में इसमें चार साथर्क अंक हैं, मात्रा मात्राकों के परिवतर्न से साथर्क अंकों की संख्या में परिवतर्न नहीं होता। ;3द्ध साथर्क अंकों के निधर्रण में इस प्रकार की संदिग्ध्ताको दूर करने के लिए सवोर्त्तम उपाय यह है कि प्रत्येक माप को वैज्ञानिक संकेत ;10 की घातों के रूप मेंद्ध मंे प्रस्तुत किया जाए। इस संकेत प(ति में प्रत्येक संख्या को ं 10इ के रूप में लिखा जाता है, जहाँ ंए 1 से10 के बीच की कोइर् संख्या है और इए 10 की कोइर् ध्नात्मक या )णात्मक घात है। संख्या की सन्िनकट अवधरणा बनाने के लिए हम इसका पूणा±कन कर सकते हैं, यानि ;ं ≤ 5द्ध होने पर इसे 1 और ;5ढं ≤10द्ध होने पर 10 मान सकते हैं। तब, इस संख्या को लगभग 10इ के रूप में व्यक्त कर सकते हैं जिसमें 10 की घात इ भौतिक राश्िा के परिमाण की कोटि कहलाती है। जब केवल एक अनुमान की आवश्यकता हो तो यह कहने से काम चलेगा कि राश्िा 10इ की कोटि की है। उदाहरण के लिए पृथ्वी का व्यास ;1ण्28107उद्धए 107उ की कोटि का है, इसके परिमाण की कोटि 7 है। हाइड्रोजन परमाणु का व्यास ;1ण्0610√10उद्धए 10√10उ की कोटि का है। इसके परिमाण की कोटि √10 है। अतः, पृथ्वी का व्यास, हाइड्रोजन परमाणु के व्यास से 17 परिमाण कोटि बड़ा है। प्रायः एक अंक के बाद दशमलव लगाने की प्रथा है। इससेऊपर प्रेक्षण;ंद्ध मंे उल्िलख्िात भ्रांति लुप्त हो जाता है: 4ण्700 उ त्र 4ण्700 102 बउ त्र 4ण्700 103 उउ त्र 4ण्700 10√3 ाउ यहाँ साथर्क अंकों की संख्या ज्ञात करने में 10 की घात असंगत है। तथापि, वैज्ञानिक संकेत में आधर संख्या के सभी शून्य साथर्क अंक होते हैं। इस प्रकरण में सभी संख्याओं में 4 साथर्क अंक हैं। इस प्रकार, वैज्ञानिक संकेत में आधर संख्या ं के अनुगामी शून्यों के बारे में कोइर् भ्रांति नहीं रह जाती। वे सदैव साथर्क अंक होते हैं। ;4द्ध किसी भी मापन के प्रस्तुतिकरण की वैज्ञानिक संकेत विध्ि एक आदशर् विध्ि है। परन्तु यदि यह विध्ि नहीं अपनायी जाती, तो हम पूवर्गामी उदाहरण मंे उल्िलख्िात नियमों का पालन करते हैं: ऽ एक से बड़ी, बिना दशमलव वाली संख्या के लिए, अनुगामी शून्य साथर्क - अंक नहीं हैं। ऽ दशमलव वाली संख्या के लिए अनुगामी शून्य साथर्क अंक हैं। ;5द्ध1 से छोटी संख्या में, पारस्परिक रूप से, दशमलव के बाईं ओर लिखा शून्य ;जैसे 0ण्1250द्ध कभी भी साथर्क अंक नहीं होता। तथापि, किसी माप में ऐसी संख्या के अंत में आने वाले शून्य साथर्क अंक होते हैं। ;6द्ध गुणक या विभाजी कारक जो न तो पूणा±कित संख्याएँ होती हैं और न ही किसी मापित मान को निरूपित करती हैं, यथाथर् होती हैं और उनमें अनन्त साथर्क - अंक होते हैं। उदाहरण के कलिए त त्र अथवा े त्र 2πत में गुणांक 2 एक यथाथर् संख्या है2 और इसे 2ण्0ए 2ण्00 या 2ण्0000ए जो भी आवश्यक हो लिखा जजा सकता है। इसी प्रकार, ज् त्र ए में द एक पूणा±क है।द 2ण्7ण्1 साथर्क अंकों से संबंध्ित अंकीय संियाओं ंके नियम किसी परिकलन का परिणाम, जिसमें राश्िायों के सन्िनकट मापेगए मान सम्िमलित हैं ;अथार्त् वे मान जिनमें साथर्क अंकों कीसंख्या सीमित हैद्ध व्यक्त करते समय, मूल रूप से मापे गएमानों की अनिश्िचतता भी प्रतिबिम्िबत होनी चाहिए। यहपरिणाम, उन मापित मानों से अध्िक यथाथर् नहीं हो सकता जिनपर यह आधरित है। अतः, व्यापक रूप से, किसी भी परिणाममें साथर्क अंकों की संख्या, उन मूल आंकड़ों से अध्िक नहींहो सकती जिनसे इसे प्राप्त किया गया है। इस प्रकार, यदिकिसी पिण्ड का मापित द्रव्यमान मान लीजिए 4ण्237 ह है;4 साथर्क अंकद्ध, और इसका मापित आयतन 2ण्51 बउ3 है,तो मात्रा अंकीय विभाजन द्वारा इसका घनत्व दशमलव के 11स्थानों तक1ण्68804780876 हध्बउ3 आता है। स्पष्टतः घनत्वके इस परिकलित मान को इतनी परिशु(ता के साथ लिखनापूणर्तः हास्यास्पद तथा असंगत होगा, क्योंकि जिन मापों पर यहमान आधरित है उनकी परिशु(ता कापफी कम है। साथर्क अंकोंके साथ अंकीय संियाओं के निम्नलिख्िात नियम यह सुनिश्िचतकरते हैं कि किसी परिकलन का अंतिम परिणाम उतनी हीपरिशु(ता के साथ दशार्या जाता है जो निवेश्िात मापित मानों कीपरिशु(ता के संगत हो: ;1द्ध संख्याओं को गुणा या भाग करने से प्राप्त परिणाम में केवल उतने ही साथर्क अंक रहने देना चाहिए जितने कि सबसे कम साथर्क अंकों वाली मूल संख्या में है। अतः उपरोक्त उदाहरण में घनत्व को तीन साथर्क अंकों तक ही लिखा जाना चाहिए, 4ण्237ह .3घनत्व 1ण्69 ह बउ 32ण्51 बउ इसी प्रकार, यदि दी गइर् प्रकाश की चाल 3ण्00 108 उ े.1 ;तीन साथर्क अंकद्ध और एक वषर् ;1 ल त्र 365ण्25 कद्ध में 3ण्1557 107 े ;पांच साथर्क अंकद्ध हों, तो एक प्रकाश वषर् में 9ण्47 1015 उ ;तीन साथर्क अंकद्ध होंगे। ;2द्ध संख्याओं के संकलन अथवा व्यवकलन से प्राप्त अंतिम परिणाम में दशमलव के बाद उतने ही साथर्क अंक रहने देने चाहिए जितने कि संकलित या व्यवकलित की जाने वाली किसी राश्िा में दशमलव के बाद कम से जिसके लिए, प्रायः 2ण्99792458 × 108 उध्े को सन्िनकट कम हैं। मान3 × 108 उध्े में पूणा±कित कर परिकलनों में उपयोग करते उदाहरणाथर्, संख्याओं 436ण्32 हए 227ण्2 ह एवं 0ण्301 ह हैं। अंत में ध्यान रख्िाये कि सूत्रों में उपयोग होने वाली यथाथर् का योग 663ण्821 ह है। दी गइर् संख्याओं में सबसे कम परिशु( ;227ण्2 हद्ध माप दशमलव के एक स्थान तक ही संख्याएं, जैसे ज् 2 स् में 2 π ए में साथर्क अंकों की हयथाथर् है। इसलिए, अंतिम परिणाम को 663ण्8 ह तक संख्या अत्यध्िक ;अनन्तद्ध है। π त्र 3ण्1415926ण्ण्ण्ण् का मानपूणा±कित कर दिया जाना चाहिए। बहुत अध्िक साथर्क अंकों तक ज्ञात है लेकिन आम मापितइसी प्रकार, लम्बाइयों में अंतर को निम्न प्रकार से व्यक्त कर राश्िायों में परिशुि के आधर पर π का मान 3ण्142 या 3ण्14सकते हैं, भी लेना तवर्फ सम्मत है।0ण्307 उ √ 0ण्304 उ त्र 0ण्003 उ त्र 3 10√3 उ ध्यान दीजिए, हमें नियम ;1द्ध जो गुणा और भाग के लिए लागू उदाहरण2ण्13 किसी घन की प्रत्येक भुजा की मापहोता है, उसे संकलन ;योगद्ध के उदाहरण में प्रयोग करके 7ण्203 उ है। उचित साथर्क अंकों तक घन का वुफलपरिणाम को 664 ह नहीं लिखना चाहिए और व्यवकलन के पृष्ठ क्षेत्रापफल एवं आयतन ज्ञात कीजिए।उदाहरण में 3ण्00 10√3 उ नहीं लिखना चाहिए। ये माप की परिशु(ता को उचित रूप से व्यक्त नहीं करते हैं। संकलन और हल मापी गइर् लम्बाइर् में साथर्क अंकों की संख्या 4 है। ऽ व्यवकलन के लिए यह नियम दशमलव स्थान के पदों में है। इसलिए, परिकलित क्षेत्रापफल एवं आयतन के मानों को भी 4 2ण्7ण्2 अनिश्िचत अंकों का पूणा±कन साथर्क अंकों तक पूणा±कित किया जाना चाहिए। घन का पृष्ठ क्षेत्रापफल त्र 6;7ण्203द्ध2 उ2जिन संख्याओं में एक से अध्िक अनिश्िचत अंक होते हैं, उनके त्र 311ण्299254 उ2अभ्िाकलन के परिणाम का पूणा±कन किया जाना चाहिए। त्र 311ण्3 उ2अध्िकांश प्रकरणों में, संख्याओं को उचित साथर्क अंकों तक पूणा±कित करने के नियम स्पष्ट ही हैं। संख्या 2ण्746 को तीन घन का आयतन त्र ;7ण्203द्ध3 उ3 साथर्क अंकों तक पूणा±कित करने पर 2ण्75 प्राप्त होता है, त्र 373ण्714754 उ3 त्र 373ण्7 उ3 जजबकि 2ण्743 के पूणा±कन से 2ण्74 मिलता है। परिपाटी के अनुसार नियम यह है कि यदि उपेक्षणीय अंक ;पूवोर्क्त संख्या में अधेरेखांकित अंकद्ध 5 से अध्िक है तो पूवर्वतीर् उदाहरण2ण्14 किसी पदाथर् के 5ण्74 ह का आयतन 1ण्2 बउ3अंक में एक की वृि कर दी जाती है, और यदि यह है। साथर्क अंकों को ध्यान में रखते हुए उपेक्षणीय अंक 5 से कम होता है, तो पूवर्वतीर् अंक इसका घनत्व व्यक्त कीजिए। अपरिव£तत रखा जाता है। लेकिन यदि संख्या 2ण्745 है, हल द्रव्यमान में 3 साथर्क अंक हैं, जबकि आयतन के मापितजिसमें उपेक्षणीय अंक 5 है, तो क्या होता है? यहाँ परिपाटी यह ऽ मान में केवल दो साथर्क अंक हैं। अतः घनत्व को केवल दोहै कि यदि पूवर्वतीर् अंक सम है तो उपेक्षणीय अंक को साथर्क अंकों तक व्यक्त किया जाना चाहिए।छोड़ दिया जाता है और यदि यह विषम है, तो पूवर्वतीर् अंक में 1 की वृि कर देते हैं। तब संख्या 2ण्745ए तीन 5ण्74 3घनत्वह बउ साथर्क अंकों तक पूणा±कन करने पर 2ण्74 हो जाती है। दूसरी 1ण्2 ओर, संख्या 2ण्735 तीन साथर्क अंकों तक पूणा±कित करने के त्र 4ण्8 ह बउ..3 ऽ पश्चात् 2ण्74 हो जाती है, क्योंकि पूवर्वतीर् अंक विषम है। 2ण्7ण्3 अंकगण्िातीय परिकलनों के परिणामों मेंकिसी भी उलझन वाले अथवा बहुपदी जटिल परिकलन में, अनिश्िचतता निधर्रित करने के नियममध्यवतीर् पदों में साथर्क अंकों से एक अंक अध्िक रहने देना चाहिए, जिसे परिकलन के अंत में उचित साथर्क अंकों तक अंकीय संियाओं में संख्याओं/ मापित राश्िायों में अनिश्िचतता पूणा±कित कर देना चाहिए। इसी प्रकार, एक संख्या जो कइर् या त्राुटि निधर्रित करने संबंध्ी नियमों को निम्नलिख्िात उदाहरणों साथर्क अंकों तक ज्ञात है, जैसे निवार्त में प्रकाश का वेग, के द्वारा समझा जा सकता है। ;1द्ध यदि किसी पतली, आयताकार शीट की लम्बाइर् और चैड़ाइर्, किसी मीटर पैमाने से मापने पर क्रमशः 16ण्2 बउ एवं 10ण्1 बउ हैं, तो यहाँ प्रत्येक माप में तीन साथर्क अंक हैं। इसका अथर् है कि लम्बाइर् को हम इस प्रकार लिख सकते हैं स त्र 16ण्2 क्र 0ण्1 बउत्र 16ण्2 बउ क्र 0ण्6:ण् इसी प्रकार, चैड़ाइर् को इस प्रकार लिखा जा सकता है इ त्र 10ण्1 क्र 0ण्1 बउत्र 10ण्1 बउ क्र 1: तब, त्राुटि संयोजन के नियम का उपयोग करने पर, दो ;या अध्िकद्ध प्रायोगिक मापों के गुणनपफल की त्राुटिसइ त्र 163ण्62 बउ2 ़ 1ण्6ःत्र 163ण्62 ़ 2ण्6 बउ2 इस उदाहरण के अनुसार हम अंतिम परिणाम को इस प्रकार लिखेंगे स इ त्र 164 ़ 3 बउ2 यहाँ, 3 बउ2 आयताकार शीट के क्षेत्रापफल के आकलन में की गइर् त्राुटि अथवा अनिश्िचतता है। ;2द्ध यदि किसी प्रायोगिक आंकड़े के समुच्चय में द साथर्क अंकों का उल्लेख है, तो आंकड़े के संयोजन से प्राप्तपरिणाम भी द साथर्क अंकों तक वैध् होगा। तथापि, यदि आंकड़े घटाये जाते हैं तो साथर्क अंकों की संख्या कम की जा सकती है। उदाहरणाथर्, 12ण्9 ह √ 7ण्06 ह दोनों तीन साथर्क अंकों तक विनि£दष्ट हैं, परन्तु इसे 5ण्84 ह के रूप मंे मूल्यांकित नहीं किया जा सकता है बल्िक केवल 5ण्8 ह लिखा जाएगा, क्योंकि संकलन या व्यवकलन में अनिश्िचतताएँ एक भ्िान्न प्रकार से संयोजित होती हैं। ;संकलित या व्यवकलित की जाने वाली संख्याओं में दशमलव के बाद कम से कम अंकों वाली संख्या न कि कम से कम साथर्क अंकों वाली संख्या निणर्य का आधर होती है।द्ध ;3द्ध किसी संख्या के मान में आपेक्ष्िाक त्राुटि, जो विनि£दष्ट साथर्क अंकों तक दी गइर् है, न केवल द पर, वरन, दी गइर् संख्या पर भी निभर्र करती है। उदाहरणाथर्, द्रव्यमान 1ण्02 ह के मापन में यथाथर्ता क्र 0ण्01 ह है, जबकि दूसरी माप 9ण्89 ह भी क्र 0ण्01 ह तक ही यथाथर् है। 1ण्02 में आपेक्ष्िाक त्राुटित्र ;क्र 0ण्01ध्1ण्02द्ध × 100: त्र क्र 1ः इसी प्रकार 9ण्89 ह में आपेक्ष्िाक त्राुटित्र ;क्र 0ण्01ध्9ण्89द्ध × 100: त्र क्र 0ण्1: अंत में, याद रख्िाए कि बहुपदीय अभ्िाकलन के मध्यवतीर्परिणाम को परिकलित करने में प्रत्येक माप को, अल्पतमपरिशु( माप से एक साथर्क अंक अध्िक रखना चाहिए। आंकड़ों के अनुसार इसे तवर्फसंगत करने के बाद ही इनकी अंकीय संियाएँ करना चाहिए अन्यथा पूणा±कन की त्राुटियाँ उत्पन्न हो जाएंगी। उदाहरणाथर्, 9ण्58 के व्युत्क्रम का तीन साथर्क अंकों तक पूणा±कन करने पर मान 0ण्104 है, परन्तु 0ण्104का व्युत्क्रम करने पर तीन साथर्क अंकों तक प्राप्त मान 9ण्62 है। पर यदि हमने 1ध्9ण्58 त्र 0ण्1044 लिखा होता तो उसके व्युत्क्रम को तीन साथर्क अंकों तक पूणा±कित करने पर हमें मूल मान9ण्58 प्राप्त होगा। उपरोक्त उदाहरण, जटिल बहुपदी परिकलन के मध्यवतीर् पदों में ;कम से कम परिशु( माप में अंकों की संख्या की अपेक्षाद्ध एक अतिरिक्त अंक रखने की धरणा को न्यायसंगत ठहराता है, जिससे कि संख्याओं की पूणा±कन प्रिया में अतिरिक्त त्राुटि से बचा जा सके। 2ण्8 भौतिक राश्िायों की विमाएँ किसी भौतिक राश्िा की प्रवृफति की व्याख्या उसकी विमाओं द्वारा की जाती है। व्युत्पन्न मात्राकों द्वारा व्यक्त होने वाली सभी भौतिक राश्िायाँ, सात मूल राश्िायों के संयोजन के पदों में प्रस्तुत की जा सकती हैं। इन मूल राश्िायों को हम भौतिक संसार की सात विमाएँ कह सकते हैं और इन्हें गुरु कोष्ठक के साथ नि£दष्ट किया जाता है। इस प्रकार, लम्बाइर् की विमा ख्स्,ए विद्युत धरा की ख्।,ए ऊष्मागतिकीय ताप की ख्ज्ञ,ए ज्योति तीव्रता की ख्बक,ए और पदाथर् की मात्रा की ख्उवस, है।किसी भौतिक राश्िा की विमाएँ उन घातों ;या घातांकोंद्ध को कहते हैं, जिन्हें उस राश्िा को व्यक्त करने के लिए मूल राश्िायों पर चढ़ाना पड़ता है। ध्यान दीजिए किसी राश्िा को गुरु कोष्ठक ख् , से घेरने का यह अथर् है कि हम उस राश्िा की विमा पर विचार कर रहे हैं। यांत्रिाकी में, सभी भौतिक राश्िायों को विमाओं ख्स्,ए ख्ड, और ख्ज्, के पदों में व्यक्त किया जा सकता है। उदाहरणाथर्,किसी वस्तु द्वारा घेरा गया आयतन उसकी लम्बाइर्, चैड़ाइर् औरऊँचाइर् अथवा तीन लम्बाइयों के गुणन द्वारा व्यक्त किया जाता है। इसलिए, आयतन का विमीय सूत्रा त्र ख्स्, ख्स्, ख्स्, त्र ख्स्,3 त्र ख्स्3,। क्योंकि, आयतन, द्रव्यमान और समय पर निभर्र नहीं करता, इसलिए यह कहा जाता है कि आयतन में द्रव्यमान की शून्य विमा, ख्ड°,ए समय की शून्य विमा ख्ज्°, तथा लम्बाइर् की 3 विमाएँ ख्स्3, हैं। इसी प्रकार, बल को द्रव्यमान और त्वरण के गुणनपफल के रूप में इस प्रकार व्यक्त कर सकते हैं, बल त्र द्रव्यमान त्वरण त्र द्रव्यमान ;लम्बाइर्द्धध्;समयद्ध2 बल की विमाएँ ख्ड, ख्स्,ध्ख्ज्,2 त्र ख्ड स् ज्√2, हैं। अतः बल में, द्रव्यमान की 1ए लम्बाइर् की 1 और समय की√2 विमाएँ हैं। यहाँ अन्य सभी मूल राश्िायों की विमाएँ शून्य हैं। ध्यान दीजिए, इस प्रकार के प्रस्तुतीकरण में परिमाणों पर विचार नहीं किया जाता। इसमें भौतिक राश्िायों के प्रकार की गुणता का समावेश होता है। इस प्रकार, इस संदभर् में वेग परिवतर्न, प्रारंभ्िाक वेग, औसत वेग, अंतिम वेग और चाल, ये सभी तुल्य राश्िायाँ हैं, क्योंकि ये सभी राश्िायाँ लम्बाइर्/समय के रूप में व्यक्त की जा सकती हैं और इनकी विमाएँ ख्स्,ध्ख्ज्, या ख्स् ज्√1, हैं। 2ण्9 विमीय सूत्रा एवं विमीय समीकरणें किसी दी हुइर् भौतिक राश्िा का विमीय सूत्रा वह व्यंजक है जो यह दशार्ता है कि किसी भौतिक राश्िा में किस मूल राश्िा की कितनी विमाएँ हैं। उदाहरणाथर्, आयतन का विमीय सूत्रा ख्ड° स्3 ज्°, और वेग या चाल का ख्ड° स् ज्.1, है। इसी प्रकार, ख्ड° स् ज्√2,ए त्वरण का तथा ख्ड स्√3 ज्°, द्रव्यमान घनत्व का विमीय सूत्रा है। किसी भौतिक राश्िा को उसके विमीय सूत्रा के बराबर लिखने पर प्राप्त समीकरण को उस राश्िा का विमीय समीकरण कहते हैं। अतः विमीय समीकरण वह समीकरण है जिसमें किसी भौतिक राश्िा को मूल राश्िायों और उनकी विमाओं के पदों में निरूपित किया जाता है। उदाहरण के लिए, आयतनख्ट,ए चालख्अ,ए बल ख्थ्, और द्रव्यमान घनत्वख्ρ, की विमीय समीकरण को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है: ख्ट, त्र ख्ड0 स्3 ज्0, ख्अ, त्र ख्ड0 स् ज्√1, ख्थ्, त्र ख्ड स् ज्√2, ख्ρ, त्र ख्ड स्√3 ज्0, भौतिक राश्िायों के बीच संबंध् निरूपित करने वाले समीकरण के आधर पर विमीय समीकरण, व्युत्पन्न की जा सकती है। विविध् प्रकार की बहुत सी भौतिक राश्िायों के विमीय सूत्रा, जिन्हें अन्य भौतिक राश्िायों के मध्य संबंधें को निरूपित करने वाले समीकरणों से व्युत्पन्न तथा मूल राश्िायों के पदों में व्यक्त किया गया है, आपके मागर्दशर्न एवं तात्कालिक संदभर् के लिए परिश्िाष्ट - 9 में दिए गए हैं। 2ण्10 विमीय विश्लेषण एवं इसके अनुप्रयोग विमाओं की संकल्पना की स्वीवृफति, जो भौतिक व्यवहार के वणर्न में मागर्दशर्न करती है, अपना एक आधरिक महत्व रखती है क्योंकि इसके अनुसार केवल वही भौतिक राश्िायाँ संकलित या व्यवकलित की जा सकती हैं जिनकी विमाएँ समान हैं। विमीय विश्लेषण का व्यापक ज्ञान, विभ्िान्न भौतिक राश्िायों के बीच संबंधें के निगमन में सहायता करता है और विभ्िान्नगण्िातीय व्यंजकों की व्युत्पिा, यथाथर्ता तथा विमीय संगतता की जाँच करने में सहायक है। जब दो या अध्िक भौतिक राश्िायों के परिमाणों को गुणा ;या भागद्ध किया जाता है, तो उनके मात्राकों के साथ उस प्रकार का व्यवहार किया जाना चाहिए जैसा हम सामान्य बीज - गण्िातीय प्रतीकों के साथ करते हैं। अंश और हर से सवर्सम मात्राकों को हम निरसित कर सकते हैं। यही बात भौतिक राश्िा की विमाओं के साथ भी लागू होती है। इसी प्रकार, किसी गण्िातीय समीकरण में पक्षों में प्रतीकों द्वारा निरूपित भौतिक राश्िायों की विमाएँ समान होनी चाहिए। 2ण्10ण्1 समीकरणों की विमीय संगति की जाँच भौतिक राश्िायों के परिमाण केवल तभी संकलित या व्यवकलित किए जा सकते हैं यदि उनकी विमाएँ समान हों। दूसरे शब्दों में, हम केवल एक ही प्रकार की राश्िायों का संकलन या व्यवकलन कर सकते हैं। अतः बल को वेग के साथ संकलितया ऊष्मा गतिक ताप में से विद्युत धरा को व्यवकलित नहीं किया जा सकता। इस सरल सि(ांत को विमाओं की समघातता सि(ांत कहते हैं और इसकी सहायता से किसी समीकरण की संशुि की जाँच कर सकते हैं। यदि किसी समीकरण के सभी पदों की विमाएँ समान नहीं हैं तो वह समीकरण गलत होती है। अतः यदि हम किसी पिण्ड की लम्बाइर् ;या दूरीद्ध के लिए व्यंजक व्युत्पन्न करें, तो चाहे उसमें सम्िमलित प्रतीक वुफछ भी हों, उनकी विमाओं को सरल करने पर अंत में प्रत्येक पद में लम्बाइर् की विमा ही शेष रहनी चाहिए। इसी प्रकार, यदि हम चाल के लिए समीकरण व्युत्पन्न करें, तो इसके दोनों पक्षों के पदों का विमीय - सूत्रा सरलीकरण के बाद ख्स् ज्√1, ही पाया जाना चाहिए। यदि किसी समीकरण की संशुि में संदेह हो तो उस समीकरण की संगति की प्राथमिक जांच के लिए मान्य प्रथा के अनुसार विमाओं का उपयोग किया जाता है। किन्तु, विमीय संगति किसी समीकरण के सही होने की गारंटी नहीं है। यह अविम राश्िायों या पफलनों की अनिश्िचतता सीमा तक अनिश्िचत होती है। त्रिाकोणमितीय, लघुगणकीय और चरघातांकी पफलनों जैसे विश्िाष्ट पफलनों के कोणांक अविम होने चाहिए। एक शु( संख्या, समान भौतिक राश्िायों का अनुपात, जैसे अनुपात के रूपदक्ष्िाण पक्ष की विमाएँमें कोण ;लम्बाइर्/लम्बाइर्द्ध, अनुपात के रूप में अपवतर्नांक ख्ड,ख्स् ज्√2, ख्स्, त्र ख्ड,ख्स्2 ज्√2,;निवार्त में प्रकाश का वेग/माध्यम में प्रकाश का वेगद्ध आदि की त्र ख्ड स्2 ज्√2, कोइर् विमाएँ नहीं होतीं।चूँकि, दोनों पक्षों की विमाएँ समान हैं, इसलिए यह समीकरणअब, हम निम्नलिख्िात समीकरण की विमीय संगति या विमीय दृष्िट से सही है। ऽ समांगता की जाँच कर सकते हैं गग अ00 ज ;1ध्2द्ध ं ज 2 जउदाहरण2ण्16 ऊजार् का ैप् मात्राक श्र त्र ाह उ2 े√2य जहाँ ग किसी कण अथवा पिण्ड द्वारा ज सेवंफड में चलित वहदूरी है, जो कण या पिण्ड समय ज त्र 0 पर स्िथति गसे0 प्रारंभ्िाक वेग असे आरम्भ करके तय करता है, और इसका0 गति की दिशा में एकसमान त्वरण ं रहता है।प्रत्येक पद के लिए विमीय समीकरण लिखने पर, ख्ग, त्र ख्स्, ख्ग , त्र ख्स्,0 ख्अ ज, त्र ख्स् ज्√1, ख्ज्,0त्र ख्स्,ख्1ध्2 ं ज2, त्र ख्स् ज्√2, ख्ज्2,त्र ख्स्, क्योंकि इस समीकरण के सभी पदों की विमाएँ समान ;लम्बाइर् कीद्ध हैं, इसलिए यह विमीय दृष्िट से संगत समीकरण है।यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है, कि विमीय संगति परीक्षण,मात्राकों की संगति से कम या अध्िक वुफछ नहीं बताता। लेकिन,इसका लाभ यह है कि हम मात्राकों के किसी विशेष चयन केलिए बाध्य नहीं हैं और न ही हमें मात्राकों के पारस्परिक गुणजोंया अपवतर्कों में रूपांतरण की चिन्ता करने की आवश्यकता है।यह बात भी हमें स्पष्ट करनी चाहिए कि यदि कोइर्समीकरण संगति परीक्षण में असपफल हो जाती है तो वहगलत सि( हो जाती है, परन्तु यदि वह परीक्षण में सपफलहो जाती है तो इससे वह सही सि( नहीं हो जाती। इस प्रकारकोइर् विमीय रूप से सही समीकरण आवश्यक रूप से यथाथर्;सहीद्ध समीकरण नहीं होती, जबकि विमीय रूप से गलत याअसंगत समीकरण गलत होनी चाहिए। है, चाल अ का उ े√1 और त्वरण ं का उ े√2 है।गतिज ऊजार् ;ाद्ध के लिए निम्नलिख्िात सूत्रों में आप किस - किस को विमीय दृष्िट से गलत बताएँगे? ;उ पिण्ड का द्रव्यमान हैद्ध। ;ंद्ध ज्ञ त्र उ2 अ3 ;इद्ध ज्ञ त्र;1ध्2द्धउअ2 ;बद्ध ज्ञ त्र उं ;कद्ध ज्ञ त्र;3ध्16द्धउअ2 ;मद्ध ज्ञ त्र ;1ध्2द्धउअ2 ़ उं हल प्रत्येक सही समीकरण में दोनों पक्षों का विमीय सूत्रा समान होना चाहिए। यह भी कि केवल समान विमाओं वाली राश्िायों का ही संकलन या व्यवकलन किया जा सकता है। दक्ष्िाण पक्ष की राश्िा की विमाएँ ;ंद्ध के लिए ख्ड2 स्3 ज्√3,य ;इद्ध तथा ;कद्ध के लिए ख्ड स्2 ज्√2,य ;बद्ध के लिए ख्ड स् ज्√2, है। समीकरण ;मद्ध के दक्ष्िाण पक्ष की राश्िा की कोइर् उचित विमाएँ नहीं हैं क्योंकि इसमें भ्िान्न विमाओं वाली दो राश्िायों को संकलित किया गया है। अब क्योंकि ज्ञ की विमाएँ ख्ड स्2 ज्√2, है, इसलिए सूत्रा;ंद्धए ;बद्ध एवं ;मद्ध विमीय रूप से संगत नहीं हैं। ध्यान दें, कि विमीय तको± से यह पता नहीं चलता कि;इद्ध व ;कद्ध में कौन सा सूत्रा सही है। इसके लिए गतिज ऊजार् की वास्तविकपरिभाषा को देखना पड़ेगा ;देखें अध्याय 6द्ध। गतिज ऊजार् के लिए सही सूत्रा ;इद्ध में दिया गया है। ऽ जउदाहरण 2ण्15 आइए निम्नलिख्िात समीकरण पर विचार करें 1उ अ2 त्र उ ही 2 यहाँ उ वस्तु का द्रव्यमान, अ इसका वेग है, ह गुरुत्वीय त्वरण और ी ऊँचाइर् है। जाँचिए कि क्या यह समीकरण विमीय दृष्िट से सही है। हल यहाँ वाम पक्ष की विमाएँ2ण्10ण्2 विभ्िान्न भौतिक राश्िायों के मध्य संबंध् व्युत्पन्न करना कभी - कभी विभ्िान्न भौतिक राश्िायों के बीच संबंध् व्युत्पन्न करने के लिए विमाओं की विध्ि का उपयोग किया जा सकता है। इसके लिए हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि एक भौतिक राश्िा किन - किन दूसरी भौतिक राश्िायों पर निभर्र करती है ;तीन भौतिक राश्िायों या एकघाततः स्वतंत्रा चरों तकद्ध। इसके लिए, हम दी गइर् राश्िा को निभर्र राश्िायों की विभ्िान्न घातों के गुणनपफल के रूप में लिखते हैं। आइये, एक उदाहरण द्वारा इसख्ड, ख्स् ज्√1 ,2 त्र ख्ड, ख् स्2 ज्√2, तथात्र ख्ड स्2 ज्√2, प्रिया को समझें। जउदाहरण 2ण्17 एक सरल लोलक पर विचार कीजिए, जिसमें गोलक को एक धगे से बाँध् कर लटकाया गया है और जो गुरुत्व बल के अध्ीन दोलन कर रहा है। मान लीजिए कि इस लोलक का दोलन काल इसकी लम्बाइर् ;सद्धए गोलक के द्रव्यमान ;उद्ध और गुरुत्वीय त्वरण ;हद्ध पर निभर्र करता है। विमाओं की विध्ि का उपयोग करके इसके दोलन - काल के लिए सूत्रा व्युत्पन्न कीजिए। हल दोलन काल ज् की, राश्िायों सए ह और उ पर निभर्रता को एक गुणनपफल के रूप में इस प्रकार लिखा जा सकता है: ज् त्र ा सग हल उ्र जहाँ, ा एक विमाहीन स्िथरांक है, एवं गए लए ्र घातांक हैं। दोनों ओर की राश्िायों के विमीय सूत्रा लिखने पर व व1 1 ग 1 .2 ल 1 ्रख्स्डज्,त्रख्स्,ख्स्ज् ,ख्ड, त्र स्ग़ल ज्√2ल ड्र दोनों ओर की विमाएँ समीवृफत करने पर ग ़ ल त्र 0य √2ल त्र 1य एवं्र त्र 0 11अतः ग त्र एल त्र दृए ्र त्र 0 22 ∴ ज् त्र ा स ह√ या ज् त्र ास ह ध्यान दीजिए, यहाँ स्िथरांक ा का मान विमीय विध्ि से ज्ञात नहीं किया जा सकता है। यहाँ इसका कोइर् अथर् नहीं है कि सूत्रा के दक्ष्िाण पक्ष को किसी संख्या से गुणा किया गया है, क्योंकि ऐसा करने से विमाएँ प्रभावित नहीं होतीं। सवास्तव में, ा त्र 2πए अतः ज् त्र 2π ह परस्पर संबंध्ित राश्िायों के बीच संबंध् व्युत्पन्न करने के लिए विमीय विश्लेषण कापफी उपयोगी है। तथापि विमाहीन स्िथरांकों के मान इस विध्ि द्वारा ज्ञात नहीं किए जा सकते। विमीय विध्ि द्वारा किसी समीकरण की केवल विमीय वैध्ता ही जांची जा सकती है, किसी समीकरण में विभ्िान्न भौतिक राश्िायों के बीच यथाथर् संबंध् नहीं जांचे जा सकते। यह समान विमा वाली राश्िायों में विभेद नहीं कर सकती। इस अध्याय के अंत में दिए गए कइर् अभ्यास प्रश्न, आपकी विमीय विश्लेषण की वुफशलता विकसित करने में सहायक होंगे। सारांश 1ण् भौतिक विज्ञान भौतिक राश्िायों के मापन पर आधारित एक परिमाणात्मक विज्ञान है । वुफछ भौतिक राश्िायांजैसे लंबाइर्, द्रव्यमान, समय, विद्युत धारा, ऊष्मागतिक ताप, पदाथर् की मात्रा और ज्योति - तीव्रता, मूल राश्िायों के रूप में चुनी गइर् हैं। 2ण् प्रत्येक मूल राश्िा किसी मूल मात्राक ;जैसे मीटर, किलोग्राम, सेकंड, ऐम्िपयर, केल्िवन, मोल और वैंफडेलाद्धके पद में परिभाष्िात है । मूल मात्राक स्वेच्छा से चयनित परंतु समुचित रूप से मानकीकृत निदेर्श मानक होते हैं । मूल राश्िायों के मात्राकों को मूल मात्राक कहते हैं। 3ण् मूल राश्िायों से व्युत्पन्न अन्य भौतिक राश्िायों को मूल मात्राकांें के संयोजन के रूप में व्यक्त कर सकते हैं, जिन्हें व्युत्पन्न मात्राक कहते हैं । मूल और व्युत्पन्न दोनों मात्राकों के पूणर् समुच्चय को, मात्राक प्रणाली कहते हैं । 4ण् सात मूल मात्राकों पर आधरित मात्राकों की अंतरार्ष्ट्रीय प्रणाली ;ैप्द्ध वतर्मान में अंतरार्ष्ट्रीय स्तर परस्वीकृत प्रणाली है । यह प्रणाली समस्त संसार में व्यापक रूप से प्रयोग मेें लाइर् जाती है । 5ण् मूल राश्िायों और व्युत्पन्न राश्िायों से प्राप्त सभी भौतिक मापों में ैप् मात्राकों का प्रयोग किया जाता है। वुफछ व्युत्पन्न मात्राकों को ैप् मात्राकों में विशेष नामों ;जैसे जूल, न्यूटन, वाट आदिद्ध से व्यक्त किया जाता है । 6ण् ैप् मात्राकों के सुपरिभाष्िात एवं अंतरार्ष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत मात्राक प्रतीक हैं ;जैसे मीटर के लिए उए किलोग्राम के लिए ाह, सेकंड के लिए े, ऐम्िपयर के लिए ।, न्यूटन के लिए छ, इत्यादिद्ध। 7ण् प्रायः छोटी एवं बड़ी राश्िायों की भौतिक मापों को वैज्ञानिक संकेत में 10 की घातों में व्यक्त किया जाता है। माप संकेतों तथा आंकिक अभ्िाकलनों की सरलता हेतु संख्याओं की परिशु(ता का संकेत करते हुए वैज्ञानिक संकेत एवं पूवर्लग्नों का प्रयोग किया जाता है । 8ण् भौतिक राश्िायों के संकेतन और ैप् मात्राकों के प्रतीकों, वुफछ अन्य मात्राकों, भौतिक राश्िायों और मापों को उचित रूप से व्यक्त करने हेतु पूवर्लग्न के लिए वुफछ सामान्य नियमों और निदेर्शों का पालन करना चाहिए । 9ण् किसी भी भौतिक राश्िा के अभ्िाकलन में उसके मात्राक की प्राप्ित हेतु संबंध् ;संबंधेंद्ध में सम्िमलित व्युत्पन्न राश्िायों के मात्राकों को वांछित मात्राकों की प्राप्ित तक बीजगण्िातीय राश्िायों की भांति समझना चाहिए । 10ण् भौतिक राश्िायों के मापन हेतु प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष वििायों का प्रयोग किया जा सकता है । मापित राश्िायों में परिणाम को व्यक्त करते समय मापक यंत्रों की यथाथर्ता ;ंबबनतंबलद्ध और परिशु(ता ;चतमबपेपवदद्धके साथ मापन में त्राुटियों को भी दशार्या जाना चाहिए । 11ण् मापित एवं अभ्िाकलित राश्िायों में केवल उचित साथर्क अंकों को ही रखा रहने देना चाहिए । किसी भी संख्या में साथर्क अंकों की संख्या का निधार्रण, उनके साथ अंकीय संियाओं को करने और अनिश्िचत अंकों का निकटन करने में इनके लिए बनाए गए नियमों का पालन करना चाहिए । 12ण् मूल राश्िायों की विमाओं और इन विमाओं का संयोजन भौतिक राश्िायों की प्रकृति का वणर्न करता है । समीकरणों की विमीय संगति की जांच और भौतिक राश्िायों में संबंध व्युत्पन्न करने में विमीय विश्लेषण का प्रयोग किया जा सकता है। कोइर् विमीय संगत समीकरण वास्तव में सही हो, यह आवश्यक नहीं है परंतु विमीय रूप से गलत या असंगत समीकरण गलतही होगी । अभ्यास टिप्पणी: संख्यात्मक उत्तरों को लिखते समय, साथर्क अंकों का ध्यान रख्िाये। 2ण्1 रिक्त स्थान भरिए ;ंद्ध किसी 1 बउ भुजा वाले घन का आयतन.........उ3 के बराबर है । ;इद्ध किसी 2 बउ त्रिाज्या व 10 बउ उंफचाइर् वाले सिलिंडर का पृष्ठ क्षेत्रापफल.........;उउद्ध2 के बराबर है। ;बद्ध कोइर् गाड़ी 18 ाउध्ीकी चाल से चल रही है तो यह स े में........उ चलती है । ;कद्ध सीसे का आपेक्ष्िाक घनत्व 11ण्3 है । इसका घनत्व.......ह बउ√3 या......ाह उ√3 है । 2ण्2 रिक्त स्थानों को मात्राकों के उचित परिवर्तन द्वारा भरिए ;ंद्ध 1 ाह उ2 े√2 त्रण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण् ह बउ2 े√2 ;इद्ध 1 उत्रण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्सल ;बद्ध 3ण्0 उ े√2 त्रण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण् ाउ ी√2 10√11 छउ2;कद्ध ळ त्र 6ण्67 ;ाहद्ध√2 त्रण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण् ;बउद्ध3 े√2 ह√1 2ण्3 उफष्मा या उफजार् का मात्राक वैफलोरी है और यह लगभग 4ण्2 श्र के बराबर है, जहां 1 श्र त्र 1 ाह उ2 े√2 । मान लीजिए कि हम मात्राकों की कोइर् ऐसी प्रणाली उपयोग करते हैं जिससे द्रव्यमान का मात्राक α ाह के बराबर है, लंबाइर् का मात्राक β उ के बराबर है, समय का मात्राक γ े के बराबर है । यह प्रदश्िर्ात कीजिए कि नए मात्राकों के पदों में वैफलोरी का परिमाण 4ण्2 α −1 β−2 γ 2 है । 2ण्4 इस कथन की स्पष्ट व्याख्या कीजिए: तुलना के मानक का विशेष उल्लेख किए बिना फ्किसी विमीय राश्िा को ‘बड़ा’ या ‘छोटा’ कहना अथर्हीन हैय् । इसे ध्यान में रखते हुए नीचे दिए गए कथनों को जहां कहीं भी आवश्यक हो, दूसरे शब्दों में व्यक्त कीजिएः ;ंद्ध परमाणु बहुत छोटे पिण्ड होते हैं । ;इद्ध जेट वायुयान अत्यिाक गति से चलता है । ;बद्ध बृहस्पति का द्रव्यमान बहुत ही अिाक है । ;कद्ध इस कमरे के अंदर वायु में अणुओं की संख्या बहुत अिाक है । ;मद्ध इलेक्ट्राॅन, प्रोटाॅन से बहुत भारी होता है । ;द्धि ध्वनि की गति प्रकाश की गति से बहुत ही कम होती है । 2ण्5 लंबाइर् का कोइर् ऐसा नया मात्राक चुना गया है जिसके अनुसार निवार्त में प्रकाश की चाल 1 है । लम्बाइर् के नए मात्राक के पदों में सूयर् तथा पृथ्वी के बीच की दूरी कितनी है, प्रकाश इस दूरी को तय करने में 8 उपद और 20 े लगाता है । 2ण्6 लंबाइर् मापने के लिए निम्नलिख्िात में से कौन - सा सबसे परिशु( यंत्रा है: ;ंद्ध एक वनिर्यर केलिपसर् जिसके वनिर्यर पैमाने पर 20 विभाजन हैं । ;इद्ध एक स्व्रूफगेज जिसका चूड़ी अंतराल 1 उउ और वृत्तीय पैमाने पर 100 विभाजन हैं । ;बद्ध कोइर् प्रकाश्िाक यंत्रा जो प्रकाश की तरंगदैघ्यर् की सीमा के अंदर लंबाइर् माप सकता है । 2.7 कोइर् छात्रा 100 आवध्र्न के एक सूक्ष्मदशीर् के द्वारा देखकर मनुष्य के बाल की मोटाइर् मापता है । वह 20 बार प्रेक्षण करता है और उसे ज्ञात होता है कि सूक्ष्मदशीर् के दृश्य क्षेत्रा में बाल की औसत मोटाइर् 3ण्5 उउ है । बाल की मोटाइर् का अनुमान क्या है? 2ण्8 निम्नलिख्िात के उत्तर दीजिए: ;ंद्ध आपको एक धागा और मीटर पैमाना दिया जाता है । आप धागे के व्यास का अनुमान किस प्रकार लगाएंगे ? ;इद्ध एक स्व्रूफगेज का चूड़ी अंतराल 1ण्0 उउ है और उसके वृत्तीय पैमाने पर 200 विभाजन हैं । क्या आप यह सोचते हैं कि वृत्तीय पैमाने पर विभाजनों की संख्या स्वेच्छा से बढ़ा देने पर स्व्रूफगेज की यथाथर्ता में वृि करना संभव है ? ;बद्ध वनिर्यर केलिपसर् द्वारा पीतल की किसी पतली छड़ का माध्य व्यास मापा जाना है । केवल 5 मापनों के समुच्चय की तुलना में व्यास के 100 मापनों के समुच्चय के द्वारा अध्िक विश्वसनीय अनुमान प्राप्त होने की संभावना क्यों है ? 2ण्9 किसी मकान का पफोटोग्रापफ 35 उउ स्लाइड पर 1ण्75 बउ2 क्षेत्रा घेरता है । स्लाइड को किसी स्क्रीन पर प्रक्षेपित किया जाता है और स्क्रीन पर मकान का क्षेत्रापफल 1ण्55 उ2 है । प्रक्षेपित्रा - परदा व्यवस्था का रेखीय आवधर्न क्या है ? 2ण्10 निम्नलिख्िात में साथर्क अंकों की संख्या लिख्िाए: ;ंद्ध 0ण्007 उ2 ;इद्ध 2ण्64 1024 ाह ;बद्ध 0ण्2370 ह बउ.3 ;कद्ध 6ण्320 श्र ;मद्ध 6ण्032 छ उ√2 ;द्धि 0ण्0006032 उ2 2ण्11 धातु की किसी आयताकार शीट की लंबाइर्, चैड़ाइर् व मोटाइर् क्रमशः 4ण्234 उए 1ण्005 उ व 2ण्01 बउ है । उचित साथर्क अंकों तक इस शीट का क्षेत्रापफल व आयतन ज्ञात कीजिए । 2ण्12 पंसारी की तुला द्वारा मापे गए डिब्बे का द्रव्यमान 2ण्300 ाह है । सोने के दो टुकड़े जिनका द्रव्यमान 20ण्15 ह व 20ण्17 ह है, डिब्बे में रखे जाते हैं । ;ंद्ध डिब्बे का वुफल द्रव्यमान कितना है, ;इद्ध उचित साथर्क अंकों तक टुकड़ों के द्रव्यमानों में कितना अंतर है ? 2ण्13 कोइर् भौतिक राश्िा च्ए चार प्रेक्षण - योग्य राश्िायों ंए इए ब तथा क से इस प्रकार संबिात है: 3 2च् ंइध् बक ंएइए ब तथा क के मापने मंे प्रतिशत त्राुटियां क्रमशः 1ःए 3ःए 4ःए तथा 2ःए हैं । राश्िा व् मंे प्रतिशत त्राुटि कितनी है ? यदि उपयुर्क्त संबंध् का उपयोग करके व् का परिकलित मान 3ण्763 आता है, तो आप परिणाम का किस मान तक निकटन करेंगे ? 2ण्14 किसी पुस्तक मंे, जिसमें छपाइर् की अनेक त्राुटियां हैं, आवतर् गति कर रहे किसी कण के विस्थापन के चार भ्िान्न सूत्रा दिए गए हैं: ;ंद्ध गढृेपद 1π ेण्ै ;इद्ध गढृेपद अे ;बद्ध गढश्ृण्ै;ेपद ेण्ृ ;कद्ध गढश्ृ 2 ;श्ेपद 1π ेण्ै’बवे 1π ेण्ै; ;ृ त्र कण का अध्िकतम विस्थापन, अ त्र कण की चाल, ै त्र गति का आवतर् कालद्ध । विमीय आधरों पर गलत सूत्रों को निकाल दीजिए । 2ण्15 भौतिकी का एक प्रसि( संबंध् किसी कण के ‘चल द्रव्यमान ;उवअपदह उंेेद्ध’ सए ‘विराम द्रव्यमान ;तमेज उंेेद्ध’ स0, इसकी चाल अए और प्रकाश की चाल इ के बीच है । ;यह संबंध् सबसे पहले अल्बटर् आइंस्टाइन के विशेष आपेक्ष्िाकता के सि(ांत के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुआ था।द्ध कोइर् छात्रा इस संबंध् को लगभग उ सही याद करता है लेकिन स्िथरांक इ को लगाना भूल जाता है । वह लिखता है: उ 0 ।;1 अ21ध्2 द्धअनुमान लगाइए कि इ कहां लगेगा । 2ण्16 परमाण्िवक पैमाने पर लंबाइर् का सुविधजनक मात्राक एंगस्ट्रम है और इसे ऊ रू1ऊ त्र 10√10 उ द्वारा नि£दष्ट किया जाता है । हाइड्रोजन के परमाणु का आमाप लगभग 0ण्5ऊ है । हाइड्रोजन परमाणुओं के एक मोल का उ3 में वुफल आण्िवक आयतन कितना होगा? 2ण्17 किसी आदशर् गैस का एक मोल ;ग्राम अणुकद्ध मानक ताप व दाब पर 22ण्4 स् आयतन ;ग्राम अणुक आयतनद्ध घेरता है । हाइड्रोजन के ग्राम अणुक आयतन तथा उसके एक मोल के परमाण्िवक आयतन का अनुपात क्या है? ;हाइड्रोजन के अणु की आमाप लगभग 1ऊ मानिएद्ध । यह अनुपात इतना अध्िक क्यों है? 2ण्18 इस सामान्य प्रेक्षण की स्पष्ट व्याख्या कीजिए: यदि आप तीव्र गति से गतिमान किसी रेलगाड़ी की ख्िाड़की से बाहर देखें तो समीप के पेड़, मकान आदि रेलगाड़ी की गति की विपरीत दिशा में तेजी से गति करते प्रतीत होते हैं, परन्तु दूरस्थ पिण्ड ;पहाडि़यां, चंद्रमा, तारे आदिद्ध स्िथर प्रतीत होते हैं । ;वास्तव में, क्योंकि आपको ज्ञात है कि आप चल रहे हैं, इसलिए, ये दूरस्थ वस्तुएं आपको अपने साथ चलती हुइर् प्रतीत होती हैंद्ध। 2ण्19 समीपी तारों की दूरियां ज्ञात करने के लिए अनुभाग 2ण्3ण्1 में दिए गए ‘लंबन’ के सि(ांत का प्रयोग किया जाता है । सूयर् के परितः अपनी कक्षा में छः महीनों के अंतराल पर पृथ्वी की अपनी, दो स्थानों को मिलानेवाली, आधार रेखा ।ठ है। अथार्त् आधार रेखा पृथ्वी की कक्षा के व्यास ≈ 3 1011उ के लगभग बराबर है । लेकिन, चूंकि निकटतम तारे भी इतने अध्िक दूर हैं कि इतनी लंबी आधार रेखा होने पर भी वे चाप के केवल 1ष् ;सेवंफड, चाप काद्ध की कोटि का लंबन प्रद£शत करते हैं । खगोलीय पैमाने पर लंबाइर् का सुविधाजनक मात्राक पारसेक है । यह किसी पिण्ड की वह दूरी है जो पृथ्वी से सूयर् तक की दूरी के बराबर आधार रेखाके दो विपरीत किनारों से चाप के 1ष् का लंबन प्रद£शत करती है । मीटरों में एक पारसेक कितना होताहै ? 2ण्20 हमारे सौर परिवार से निकटतम तारा 4ण्29 प्रकाश वषर् दूर है । पारसेक में यह दूरी कितनी है ? यह तारा;ऐल्पफा सेंटौरी नामकद्ध तब कितना लंबन प्रद£शत करेगा जब इसे सूयर् के परितः अपनी कक्षा में पृथ्वी केदो स्थानों से जो छः महीने के अन्तराल पर हैं, देखा जाएगा ? 2ण्21 भौतिक राश्िायों का परिशु( मापन विज्ञान की आवश्यकताएं हैं। उदाहरण के लिए, किसी शत्राु के लड़ावूफजहाज की चाल सुनिश्िचत करने के लिए बहुत ही छोटे समय - अंतरालों पर इसकी स्िथति का पता लगानेकी कोइर् यथाथर् वििा होनी चाहिए। द्वितीय विश्व यु( में रेडार की खोज के पीछे वास्तविक प्रयोजन यहीथा । आधुनिक विज्ञान के उन भ्िान्न उदाहरणों को सोचिए जिनमें लंबाइर्, समय, द्रव्यमान आदि के परिशु(मापन की आवश्यकता होती है । अन्य जिस किसी विषय में भी आप बता सकते हैं, परिशु(ता की मात्रात्मकधारणा दीजिए । 2ण्22 जिस प्रकार विज्ञान में परिशु( मापन आवश्यक है, उसी प्रकार अल्पविकसित विचारों तथा सामान्य प्रेक्षणोंको उपयोग करने वाली राश्िायों के स्थूल आकलन कर सकना भी उतना ही महत्त्वपूणर् है । उन उपायों कोसोचिए जिनके द्वारा आप निम्नलिख्िात का अनुमान लगा सकते हैं: ;जहां अनुमान लगाना कठिन है वहां राश्िाकी उपरिसीमा पता लगाने का प्रयास कीजिएद्ध। ;ंद्ध मानसून की अविा में भारत के उफपर वषार्धरी मेघों का वुफल द्रव्यमान । ;इद्ध किसी हाथी का द्रव्यमान । ;बद्ध किसी तूपफान की अविा में वायु की चाल । ;कद्ध आपके सिर के बालों की संख्या । ;मद्ध आपकी कक्षा के कमरे में वायु के अणुओं की संख्या । 2ण्23 सूयर् एक उफष्म प्लैश्मा ;आयनीकृत पदाथर्द्ध है जिसके आंतरिक क्रोड का ताप 107 ज्ञ से अिाक और बाह्यपृष्ठ का ताप लगभग 6000 ज्ञ है । इतने अिाक ताप पर कोइर् भी पदाथर् ठोस या तरल प्रावस्था में नहींरह सकता। आपको सूयर् का द्रव्यमान घनत्व किस परिसर में होने की आशा है ? क्या यह ठोसों, तरलों या गैसों के घनत्वों के परिसर में है ? क्या आपका अनुमान सही है, इसकी जांच आप निम्नलिख्िात आंकड़ों के आधार पर कर सकते हैं: सूयर् का द्रव्यमान त्र 2ण्0 1030 ाहय सूयर् की त्रिाज्या त्र 7ण्0 108 उ । 2ण्24 जब बृहस्पति ग्रह पृथ्वी से 8247 लाख किलोमीटर दूर होता है, तो इसके व्यास की कोणीय माप 35ण्72ष् का चाप है । बृहस्पति का व्यास परिकलित कीजिए । अतिरिक्त अभ्यास 2ण्25 वषार् के समय मंे कोइर् व्यक्ित चाल अ के साथ तेजी से चला जा रहा है । उसे अपने छाते को टेढ़ा करकेऊध्वर् के साथ θ कोण बनाना पड़ता है । कोइर् विद्याथीर् कोण θ व अ के बीच निम्नलिख्िात संबंध् व्युत्पन्नकरता है: जंद θ त्र अय और वह इस संबंध् के औचित्य की सीमा पता लगाता हैः जैसी कि आशा की जाती है यदि अ→ 0 तो θ → 0। ;हम यह मान रहे हैं कि तेज हवा नहीं चल रही है और किसी खड़े व्यक्ित के लिए वषार् ऊध्वार्ध्रतःपड़ रही हैद्ध । क्या आप सोचते हैं कि यह संबंध् सही हो सकता है? यदि ऐसा नहीं है तो सही संबंध् काअनुमान लगाइए । 2ण्26 यह दावा किया जाता है कि यदि बिना किसी बाध के 100 वषोर्ं तक दो सीजि़यम घडि़यों को चलने दियाजाए, तो उनके समयों में केवल 0ण्02 े का अंतर हो सकता है । मानक सीजि़यम घड़ी द्वारा 1 े के समय अंतराल को मापने मंे यथाथर्ता के लिए इसका क्या अभ्िाप्राय है? 2ण्27 एक सोडियम परमाणु का आमाप लगभग 2ण्5ऊ मानते हुए उसके माध्य द्रव्यमान घनत्व का अनुमान लगाइए।;सोडियम के परमाण्वीय द्रव्यमान तथा आवोगाद्रो संख्या के ज्ञात मान का प्रयोग कीजिए ।द्ध इस घनत्व कीिस्टलीय प्रावस्था मंे सोडियम के घनत्व 970 ाह उ√3 के साथ तुलना कीजिए । क्या इन दोनों घनत्वों केपरिमाण की कोटि समान है? यदि हां, तो क्यों? 2ण्28 नाभ्िाकीय पैमाने पर लंबाइर् का सुविधजनक मात्राक पफमीर् है: ;1 ित्र10√15उद्ध । नाभ्िाकीय आमाप लगभगनिम्नलिख्िात आनुभविक संबंध् का पालन करते हैं: ।1ध्3तत्रत0 जहां त नाभ्िाक की त्रिाज्या, । इसकी द्रव्यमान संख्या और त कोइर् स्िथरांक है जो लगभग 1ण्2 िके बराबर0है । यह प्रदश्िार्त कीजिए कि इस नियम का अथर् है कि विभ्िान्न नाभ्िाकों के लिए नाभ्िाकीय द्रव्यमान घनत्वलगभग स्िथर है । सोडियम नाभ्िाक के द्रव्यमान घनत्व का आकलन कीजिए । प्रश्न 2ण्27 मंे ज्ञात किए गए सोडियम परमाणु के माध्य द्रव्यमान घनत्व के साथ इसकी तुलना कीजिए । 2ण्29 लेसर ;स्।ैम्त्द्धए प्रकाश के अत्यिाक तीव्र, एकवणीर् तथा एकदिश किरण - पुंज का ड्डोत है । लेसर केइन गुणों का लंबी दूरियां मापने में उपयोग किया जाता है । लेसर को प्रकाश के ड्डोत के रूप में उपयोगकरते हुए पहले ही चंद्रमा की पृथ्वी से दूरी परिशु(ता के साथ ज्ञात की जा चुकी है । कोइर् लेसर प्रकाशकिरण - पुंज चंद्रमा के पृष्ठ से पराव£तत होकर 2ण्56 े में वापस आ जाता है । पृथ्वी के परितः चंद्रमा कीकक्षा की त्रिाज्या कितनी है ? 2ण्30 जल के नीचे वस्तुओं को ढूंढ़ने व उनके स्थान का पता लगाने के लिए सोनार ;ैव्छ।त्द्ध में पराश्रव्य तरंगोंका प्रयोग होता है । कोइर् पनडुब्बी सोनार से सुसज्िजत है । इसके द्वारा जनित अन्वेषी तरंग और शत्राु कीपनडुब्बी से पराव£तत इसकी प्रतिध्वनि की प्राप्ित के बीच काल विलंब 77ण्0 े है । शत्राु की पनडुब्बी कितनीदूर है ? ;जल में ध्वनि की चाल = 1450 उ े√1द्ध । 2ण्31 हमारे विश्व में आधुनिक खगोलविदों द्वारा खोजे गए सवार्िाक दूरस्थ पिण्ड इतनी दूर हैं कि उनके द्वाराउत्स£जत प्रकाश को पृथ्वी तक पहुंचने में अरबों वषर् लगते हैं । इन पिंडों ;जिन्हें क्वासर त्र्फनंेंत» कहाजाता हैद्ध के कइर् रहस्यमय लक्षण हैं जिनकी अभी तक संतोषजनक व्याख्या नहीं की जा सकी है । किसीऐसे क्वासर की ाउ में दूरी ज्ञात कीजिए जिससे उत्स£जत प्रकाश को हम तक पहुंचने में 300 करोड़ वषर्लगते हों । 2ण्32 यह एक विख्यात तथ्य है कि पूणर् सूयर्ग्रहण की अवध्ि में चंद्रमा की चिका सूयर् की चिका को पूरीतरह ढक लेती है । इस तथ्य और उदाहरण 2ण्3 और 2ण्4 से एकत्रा सूचनाओं के आधार पर चंद्रमा कालगभग व्यास ज्ञात कीजिए । 2ण्33 इस शताब्दी के एक महान भौतिकविद् ;पी.ए.एम. डिरैकद्ध प्रकृति के मूल स्िथरांकों ;नियतांकोंद्ध के आंकिकमानों के साथ क्रीड़ा में आनंद लेते थे । इससे उन्होंने एक बहुत ही रोचक प्रेक्षण किया । परमाण्वीय भौतिकीके मूल नियतंाकों ;जैसे इलेक्ट्राॅन का द्रव्यमान, प्रोटाॅन का द्रव्यमान तथा गुरुत्वीय नियतांक ळद्ध से उन्हें पतालगा कि वे एक ऐसी संख्या पर पहुंच गए हैं जिसकी विमा समय की विमा है । साथ ही, यह एक बहुतही बड़ी संख्या थी और इसका परिमाण विश्व की वतर्मान आकलित आयु ;्1500 करोड़ वषर्द्ध के करीब है । इस पुस्तक में दी गइर् मूल नियतांकों की सारणी के आधर पर यह देखने का प्रयास कीजिए कि क्याआप भी यह संख्या ;या और कोइर् अन्य रोचक संख्या जिसे आप सोच सकते हैंद्ध बना सकते हैं ? यदिविश्व की आयु तथा इस संख्या में समानता महत्वपूणर् है तो मूल नियतांकों की स्िथरता किस प्रकारप्रभावित होगी?

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अध्याय 2

मात्रक एवं मापन


2.1 भूमिका

2.2 मात्रकों की अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली

2.3 लम्बाई का मापन

2.4 द्रव्यमान का मापन

2.5 समय का मापन

2.6 यथार्थता, यंत्रों की परिशुद्धता एवं मापन में त्रुटि

2.7 सार्थक अंक

2.8 भौतिक राशियों की विमाएँ

2.9 विमीय सूत्र एवं विमीय समीकरणें

2.10 विमीय विश्लेषण एवं इसके अनुप्रयोग

सारांश

अभ्यास

अतिरिक्त अभ्यास 


2.1
भूमिका

किसी भौतिक राशि का मापन, एक निश्चित, आधारभूत, यादृच्छिक रूप से चुने गए मान्यताप्राप्त, संदर्भ-मानक से इस राशि की तुलना करना है। यह संदर्भ-मानक मात्रक कहलाता है। किसी भी भौतिक राशि की माप को मात्रक के आगे एक संख्या (आंकिक संख्या) लिखकर व्यक्त किया जाता है। यद्यपि हमारे द्वारा मापी जाने वाली भौतिक राशियों की संख्या बहुत अधिक है, फिर भी, हमें इन सब भौतिक राशियों को व्यक्त करने के लिए, मात्रकों की सीमित संख्या की ही आवश्यकता होती है, क्योंकि, ये राशियाँ एक दूसरे से परस्पर संबंधित हैं। मूल राशियों को व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त मात्रकों को मूल मात्रक कहते हैं। इनके अतिरिक्त अन्य सभी भौतिक राशियोें के मात्रकों को मूल मात्रकों के संयोजन द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। इस प्रकार प्राप्त किए गए व्युत्पन्न राशियों के मात्रकों को व्युत्पन्न मात्रक कहते हैं। मूल-मात्रकों और व्युत्पन्न मात्रकों के सम्पूर्ण समुच्चय को मात्रकों की प्रणाली (या पद्धति) कहते हैं।

2.2 मात्रकों की अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली

बहुत वर्षों तक मापन के लिए, विभिन्न देशों के वैज्ञानिक, अलग-अलग मापन प्रणालियों का उपयोग करते थे। अब से कुछ समय-पूर्व तक एेसी तीन प्रणालियाँ - CGS प्रणाली, FPS (या ब्रिटिश) प्रणाली एवं MKS प्रणाली, प्रमुखता से प्रयोग में लाई जाती थीं।

इन प्रणालियों में लम्बाई, द्रव्यमान एवं समय के मूल मात्रक क्रमशः इस प्रकार हैं:

CGS प्रणाली में, सेन्टीमीटर, ग्राम एवं सेकन्ड।

FPS प्रणाली में, फुट, पाउन्ड एवं सेकन्ड।

MKS प्रणाली में, मीटर, किलोग्राम एवं सेकन्ड।

आजकल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्य प्रणाली "सिस्टम इन्टरनेशनल डि यूनिट्स" है (जो फ्रेंच भाषा में "मात्रकों की अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली" कहना है)। इसे संकेताक्षर में SI लिखा जाता है। SI प्रतीकों, मात्रकों और उनके संकेताक्षरों की योजना 1971 में, मापतोल के महा सम्मेलन द्वारा विकसित कर, वैज्ञानिक, तकनीकी, औद्योगिक एवं व्यापारिक कार्यों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उपयोग हेतु अनुमोदित की गई। SI मात्रकों की 10 की घातों पर आधारित (दाश्मिक) प्रकृति के कारण, इस प्रणाली के अंतर्गत रूपांतरण अत्यंत सुगम एवं सुविधाजनक है। हम इस पुस्तक में SI मात्रकों का ही प्रयोग करेंगे।

1188.png

1240.png

चित्र 2.1 (a) समतलीय कोण dθ एवं (b) घन कोण 2207.png का आरेखीय विवरण


SI में सात मूल मात्रक हैं, जो सारणी 2.1 में दिए गए हैं। इन सात मूल मात्रकों के अतिरिक्त दो पूरक मात्रक भी हैं जिनको हम इस प्रकार परिभाषित कर सकते हैं: (i) समतलीय कोण, dθ चित्र 2.1(a) में दर्शाए अनुसार वृत्त के चाप की लम्बाई ds और इसकी त्रिज्या r का अनुपात होता है। तथा
(ii) घन-कोण, 1864.png चित्र 2.1(b) में दर्शाए अनुसार शीर्ष O को केन्द्र की भांति प्रयुक्त करके उसके परितः निर्मित गोलीय पृष्ठ के अपरोधन क्षेत्र dA तथा त्रिज्या r के वर्ग का अनुपात होता है। समतलीय कोण का मात्रक रेडियन है जिसका प्रतीक rad है एवं घन कोण का मात्रक स्टेरेडियन है जिसका प्रतीक sr है। ये दोनों ही विमाविहीन राशियाँ हैं।

 सारणी 2.1 SI मूल राशियाँ एवं उनके मात्रक*

tb11

* इन परिभाषाओं में प्रयुक्त संख्याओं के मान, न तो याद रखने की आवश्यकता है, न परीक्षा में पूछे जाने की। ये यहाँ पर केवल इनके मापन की यथार्थता की सीमा का संकेत देने के लिए दिए गए हैं। प्रौद्योगिकी के विकास के साथ मापन की तकनीकों में भी सुधार होता है, परिणामस्वरूप, मापन अधिक परिशुद्धता से होता है। इस प्रगति के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए मूल मात्रकों को संशोधित किया जाता है।

सारणी 2.2 सामान्य प्रयोग के लिए SI मात्रकों के अतिरिक्त कुछ अन्य मात्रक

ध्यान दीजिए, मोल का उपयोग करते समय मूल सत्ताओं का विशेष रूप से उल्लेख किया जाना चाहिए। ये मूल सत्ताएँ परमाणु, अणु, आयन, इलेक्ट्रॉन, अन्य कोई कण अथवा इसी प्रकार के कणों का विशिष्ट समूह हो सकता है।

हम एेसी भौतिक राशियों के मात्रकों का भी उपयोग करते हैं जिन्हें सात मूल राशियों से व्युत्पन्न किया जा सकता है (परिशिष्ट A 6)। SI मूल मात्रकों के पदों में व्यक्त कुछ व्युत्पन्न मात्रक (परिशिष्ट A 6.1) में दिए गए हैं। कुछ व्युत्पन्न SI मात्रकों को विशिष्ट नाम दिए गए हैं (परिशिष्ट A 6.2) और कुछ व्युत्पन्न SI मात्रक इन विशिष्ट नामों वाले व्युत्पन्न मात्रकों और सात मूल-मात्रकों के संयोजन से बनते हैं (परिशिष्ट A 6.3)। आपको तात्कालिक संदर्भ तथा मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए इन मात्रकों को परिशिष्ट (A 6.2) एवं (A 6.3) में दिया गया है। सामान्य व्यवहार में आने वाले अन्य मात्रक सारणी 2.2 में दिए गए हैं।

SI मात्रकों के सामान्य गुणज और अपवर्तकों को व्यक्त करने वाले उपसर्ग और उनके प्रतीक परिशिष्ट (A2) में दिए गए हैं। भौतिक राशियों, रासायनिक तत्वों और नाभिकों के संकेतों के उपयोग संबंधी सामान्य निर्देश परिशिष्ट (A7) में दिए गए हैं और आपके मार्गदर्शन तथा तात्कालिक संदर्भ के लिए SI मात्रकों एवं अन्य मात्रकों संबंधी निर्देश परिशिष्ट (A8) में दिए गए हैं।

2.3 लम्बाई का मापन

लम्बाई मापन की कुछ प्रत्यक्ष विधियों से आप पहले ही से परिचित हैं। उदाहरण के लिए, आप जानते हैं कि 10–3 m से 102 m तक की लम्बाइयाँ मीटर पैमाने का उपयोग करके ज्ञात की जाती हैं। 10–4 m की लम्बाई को यथार्थता से मापने के लिए हम वर्नियर कैलिपर्स का उपयोग करते हैं। स्क्रू-गेज (पेंचमापी) और गोलाईमापी (स्फेरोमीटर) का उपयोग 10–5 m तक की लम्बाइयों को मापने में किया जाता है। इन परिसरों से बाहर की लम्बाइयों को मापने के लिए हमें कुछ परोक्ष विधियों का सहारा लेना होता है।

2.3.1 बड़ी दूरियों का मापन

बहुत बड़ी दूरियाँ, जैसे किसी ग्रह अथवा तारे की पृथ्वी से दूरी, प्रत्यक्ष-रूप से किसी मीटर पैमाने की सहायता से ज्ञात नहीं की जा सकती है। एेसी दशाओं में महत्वपूर्ण विधि जिसे लम्बन-विधि कहते हैं, का उपयोग किया जाता है।

जब आप किसी पेंसिल को अपने सामने पकड़ते हैं और पृष्ठभूमि (माना दीवार) के किसी विशिष्ट बिन्दु के सापेक्ष पेंसिल को पहले अपनी बायीं आँख A से (दायीं आँख बंद रखते हुए) देखते हैं, और फिर दायीं आँख B से (बायीं आँख बंद रखते हुए), तो आप पाते हैं, कि दीवार के उस बिन्दु के सापेक्ष पेंसिल की स्थिति परिवर्तित होती प्रतीत होती है। इसे लम्बन कहा जाता है। दो प्रेक्षण बिन्दुओं (A एवं B) के बीच की दूरी को आधारक कहा जाता है। इस उदाहरण में दोनों आँखों के बीच की दूरी आधारक है।

लम्बन विधि द्वारा किसी दूरस्थ ग्रह S की दूरी D ज्ञात करने के लिए, हम इसको, पृथ्वी पर दो विभिन्न स्थितियों (वेधशालाओं) A एवं B से, एक ही समय पर देखते हैं। A एवं B के बीच की दूरी AB = b है। चित्र 2.2 देखिए। इन दो स्थितियों से ग्रह की प्रेक्षण दिशाओं के बीच का कोण माप लिया जाता है। चित्र 2.2 में θ द्वारा दर्शाया गया यह कोणASB लम्बन कोण या लम्बनिक कोण कहलाता है।

क्योंकि, ग्रह की पृथ्वी से दूरी बहुत अधिक है 1869.png और, इसलिए, कोण θ बहुत ही छोटा है। एेसी दशा में हम AB को, केन्द्र S और त्रिज्या D वाले वृत्त का, लम्बाई b का चाप मान सकते हैं। 1874.png त्रिज्या AS = BS, AB = b = D θ जहाँ θ रेडियन में है।

अतः 1879.png 


1368.png(2.1)

चित्र 2.2 लम्बन विधि 

D के निर्धारण के पश्चात् हम इसी विधि द्वारा ग्रह का आमाप अथवा कोणीय व्यास भी निर्धारित कर सकते हैं। यदि d ग्रह का व्यास और α उसका कोणीय आमाप (d द्वारा पृथ्वी के किसी बिन्दु पर अंतरित कोण) हो, तो 

α = d/D (2.2) 

कोण α को, पृथ्वी की उसी अवस्थिति से मापा जा सकता है। यह ग्रह के दो व्यासतः विपरीत (व्यास के विपरीत सिरों पर स्थित) बिन्दुओं को दूरदर्शक द्वारा देखने पर प्राप्त दो दिशाओं के बीच बना कोण है। क्योंकि D का मान ज्ञात है, अतः ग्रह के व्यास d का मान समीकरण (2.2) की सहायता से ज्ञात किया जा सकता है। 

उदाहरण 2.1 (a) 10 (डिग्री) (b) 1 (1 आर्क मिनट) एवं (c) 1″ (1आर्क सेकंड) के कोणों के मान रेडियन में परिकलित कीजिए (3600 = 2π rad, 10=60 एवं 1 = 60 ″ लीजिए)।

हल (a) हमें ज्ञात है 3600 = 2π rad

10 = (π /180) rad = 1.745×10–2 rad

(b) 10 = 60= 1.745×10–2 rad

1= 2.908×10–4 rad 1889.png 2.91×10–4 rad

(c) 1= 60= 2.908×10–4 rad

1= 4.847×10–4 rad 1894.png 4.85×10–6 rad t

उदाहरण 2.2 एक व्यक्ति अपने पास की किसी मीनार की अपने से दूरी का आकलन करना चाहता है। वह मीनार C के सामने किसी बिन्दु A पर खड़ा होता है और AC की सीध में बहुत दूर स्थित किसी बिन्दु O को देखता है। फिर वह, AC के लम्बवत् 100 m दूर स्थित बिन्दु B तक चलता है और वहाँ से O एवं C को फिर देखता है। क्यों कि O बहुत अधिक दूरी पर है, BO एवं AO की दिशाएँ व्यावहारिक रूप में एक ही हैं, लेकिन वह पाता है कि C की दृष्टि रेखा मूल दृष्टि रेखा के सापेक्ष θ = 400 पर घूम गई है (θ को लम्बन कहा जाता है)। उसकी मूल स्थिति A से मीनार C की दूरी का आकलन कीजिए।

 1383.png

चित्र 2.3

हल दिया गया है, लम्बन कोण θ =400

चित्र 2.3 से, AB = AC tan θ

AC = AB/tanθ = 100 m/tan 400

= 100 m/0.8391 = 119 m

उदाहरण 2.3 पृथ्वी के दो व्यासतः विपरीत बिन्दुओं A एवं B से चन्द्रमा का प्रेक्षण किया गया। प्रेक्षण की दो दिशाओं के बीच, चन्द्रमा पर अंतरित कोण θ की माप 1o 54′ है। पृथ्वी का व्यास लगभग 1.276 × 107 m, है। पृथ्वी से चन्द्रमा की दूरी का अभिकलन कीजिए।

हल ज्ञात है θ = 1° 54 = 114

1899.png rad

1904.png

चूंकि 1909.png

और 1914.png

अतः समीकरण (2.1) के अनुसार पृथ्वी एवं चन्द्रमा के बीच की दूरी, D = b/θ

1919.png

1924.png

उदाहरण 2.4 सूर्य के कोणीय व्यास की माप 1920′′ है। पृथ्वी से सूर्य की दूरी D, 1.496 x 1011 m है। सूर्य का व्यास परिकलित कीजिए।

हल सूर्य का कोणीय व्यास α

1929.png

1934.png

1939.png

सूर्य का व्यास

1944.png

1949.png

1954.png


2.3.2 अति सूक्ष्म दूरियों का मापन ः अणु का आकार

अणु के व्यास (10–8 m से 10–10 m) जैसी अत्यंत सूक्ष्म दूरियों के मापन के लिए हमें विशिष्ट विधियों का अनुसरण करना होता है। इनके लिए हम पेंचमापी जैसे मापक-यंत्रों का उपयोग नहीं कर सकते। यहाँ तक कि सूक्ष्मदर्शी की भी अपनी कुछ सीमाएँ हैं। एक प्रकाशीय सूक्ष्मदर्शी द्वारा किसी निकाय की जाँच के लिए दृश्य-प्रकाश का उपयोग किया जाता है। प्रकाश के लक्षण तरंग जैसे होने के कारण, प्रकाशीय सूक्ष्मदर्शी को, अधिक से अधिक, प्रयुक्त प्रकाश के तरंगदैर्घ्य के बराबर विभेदन के लिए ही प्रयोग में लाया जा सकता है। (इस विषय में विस्तृत विवेचन आपको कक्षा XII की भौतिकी की पाठ्य पुस्तक में मिलेगा)। दृश्य प्रकाश की तरंगदैर्घ्य का परिसर 4000 Å से 7000 Å है। (1 Å = 10-10 m)। अतः प्रकाशीय सूक्ष्मदर्शी इससे छोटे आकार के कणों का विभेदन नहीं कर सकता। दृश्य प्रकाश के स्थान पर हम, इलेक्ट्रॉन-पुंज का उपयोग कर सकते हैं। इलेक्ट्रॉन पुंजों को उचित रीति से अभिकल्पित वैद्युत एवं चुम्बकीय क्षेत्रों द्वारा फोकसित किया जा सकता है। इस प्रकार के इलेक्ट्रॉन-सूक्ष्मदर्शी का विभेदन भी अंततः इसी तथ्य द्वारा सीमित होता है कि इलेक्ट्रॉन भी तरंगों की तरह व्यवहार कर सकते हैं (इस विषय में विस्तार से आप कक्षा XII में पढ़ेंगे)। किसी इलेक्ट्रॉन की तरंगदैर्घ्य 1 Å के अंश के बराबर कम हो सकती है। 0.6 Å विभेदन क्षमता तक के इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी विकसित किए जा चुके हैं। इनके द्वारा, लगभग, पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं का विभेदन संभव हो गया है। हाल ही में विकसित सुरंगन सूक्ष्मदर्शिकी द्वारा भी से सूक्ष्मतर विभेदन प्राप्त कर लिया गया है। इनके द्वारा अब अणुओं की आमाप का आकलन संभव है।

ओलीक अम्ल अणु के साइज़ का आकलन करने की एक सरल विधि नीचे दी गई है। ओलीक अम्ल एक साबुनी द्रव है जिसके अणु का साइज़ 10–9 m कोटि का है।

इस विधि का मूल आधार, जल के पृष्ठ पर ओलीक अम्ल की एक एकाण्विक परत बनाना है।

इसके लिए, पहले हम 1 cm3 ओलीक अम्ल को एेल्कोहॉल में घोल कर 20 cm3 घोल बनाते हैं। इस घोल का 1 cm3 लेकर एेल्कोहॉल में पुनः 20 cm3 घोल बनाते हैं। अब इस घोल की सांद्रता 1959.pngओलीक अम्ल/ cm3 घोल हुई। इसके बाद एक बड़े नांद में पानी लेकर, उसके ऊपर लायकोपोडियम पाउडर छिड़क कर, लाइकोपोडियम पाउडर की एक पतली फिल्म जल के पृष्ठ के ऊपर बनाते हैं। फिर ओलीक अम्ल के पहले बनाए गए घोल की एक बूंद इसके ऊपर रखते हैं। ओलीक अम्ल की यह बूंद जल के पृष्ठ के ऊपर लगभग वृत्ताकार, एक अणु मोटाई की फिल्म के रूप में फैल जाती है। इस प्रकार बनी तनु फिल्म का व्यास माप कर इसका क्षेत्रफल A ज्ञात किया जा सकता है। माना कि हमने जल के पृष्ठ पर n बूंदें ओलीक अम्ल घोल की डालीं। यदि प्रारंभ में ही हम एक बूंद का अनुमानित आयतन (V cm3) ज्ञात कर लें,

तो घोल की n बूंदों का आयतन

= nV cm3

इस घोल में विद्यमान ओलीक अम्ल का आयतन

= 1964.png

ओलीक अम्ल का यह घोल तेजी से जल के पृष्ठ पर फैल कर t मोटाई की पतली फिल्म बना लेता है। यदि इस फिल्म का क्षेत्रफल A cm2 है, तो फिल्म की मोटाई

t

t1979.png (2.3)

यदि हम यह मान लें कि फिल्म एक एकाण्विक मोटाई की है तो 't' ओलीक अम्ल के अणु की आमाप अथवा व्यास बन जाता है। इस मोटाई का मान 10–9 m की कोटि का आता है।

उदाहरण 2.5 यदि किसी नाभिक का आमाप (जो वास्तव में 10–15 से 10–14 m के परिसर में है) बढ़ाकर एक तीक्ष्ण पिन की नोक (10–5m से 10–4m के परिसर में) के बराबर कर दिया जाए, तो परमाणु का लगभग आमाप क्या है?

हल नाभिक की आमाप 10–15 m से 10–14 m के परिसर में है तीक्ष्ण पिन की नोक 10–5 m से 10–4 m के परिसर में ले सकते हैं। इस तरह, हमने नाभिक की आमाप को 1010 गुणा बढ़ा दिया है। परमाणु का सामान्य आकार 10–10 m की कोटि का है। अतः उसी अनुपात में बढ़ाने पर इसकी आमाप 1m हो जाएगी। अतः किसी परमाणु में नाभिक आमाप में उतना ही छोटा है जितनी छोटी लगभग 1m व्यास के गोले के केन्द्र पर रखे गए तीक्ष्ण पिन की नोक होती है। t

2.3.3 लम्बाइयों का परिसर

हमें विश्व में जो पिण्ड दिखाई देते हैं उन पिण्डों की आमापों में अंतर का एक विस्तृत परिसर है। जिसमें एक ओर 10–14 m कोटि की आमाप का किसी परमाणु का सूक्ष्म नाभिक है, तो दूसरी ओर 1026 m कोटि की आमाप का दृश्यमान विश्व का परिसर है। सारणी 2.3 में इनमें से कुछ पिण्डों की आमापों और दूरियों की कोटि और परास दिए गए हैं।

सारणी 2.3 लंबाइयों के परिसर एवं कोटि

ty

अत्यंत सूक्ष्म और बहुत बड़ी दूरियों के मापन के लिए हम लम्बाई के कुछ विशिष्ट मात्रक भी प्रयोग में लाते हैं। ये हैं,

1 फर्मी = 1 f = 10–15 m

1 एंग्सट्रम = 1 Å = 10–10 m

1 खगोलीय मात्रक = 1 AU (सूर्य से पृथ्वी की औसत दूरी)

= 1.496 × 1011 m

1 प्रकाश वर्ष = 1 ly = 9.46 × 1015 m

(3 × 108 m s–1 के वेग से प्रकाश

द्वारा 1 सेकंड में चली गई दूरी में 1 वर्ष)

1 पारसेक = 3.08 × 1016 m

(वह दूरी जिस पर पृथ्वी की कक्षा की औसत त्रिज्या 1 आर्क सेकण्ड का कोण अंतरित करे, 1 पारसेक कहलाती है।)

2.4 द्रव्यमान का मापन

द्रव्यमान पदार्थ का एक आधारभूत गुण है। यह पिण्ड के ताप, दाब या दिक्काल में उसकी अवस्थिति पर निर्भर नहीं करता। द्रव्यमान का SI मात्रक किलोग्राम (kg) है। अंतर्राष्ट्रीय माप-तोल ब्यूरो द्वारा दिए गए अंतर्राष्ट्रीय मानक किलोग्राम के आदिप्ररूप विभिन्न देशों की बहुत सी प्रयोगशालाओं में उपलब्ध हैं। भारत में इसे नयी दिल्ली स्थित राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला (NPL) में रखा गया है।

परमाणुओं और अणुओं के द्रव्यमानों के संबंध में किलोग्राम एक सुविधाजनक मात्रक नहीं है। अतः अणुओं, परमाणुओं के द्रव्यमान व्यक्त करने के लिए द्रव्यमान के एक महत्वपूर्ण मानक मात्रक, जिसे एकीकृत परमाणु संहति मात्रक (u) कहते हैं, का प्रयोग करते हैं, जिसकी स्थापना परमाणुओं के द्रव्यमानों को इस प्रकार, व्यक्त करने के लिए की गई है:

1 एकीकृत परमाणु संहति मात्रक = 1u

= इलेक्ट्रॉनों सहित, कार्बन-समस्थानिक 1984.png के एक परमाणु के द्रव्यमान का (1/12) वां भाग

= 1.66 × 10–27 kg

सामान्य वस्तुओं के द्रव्यमान मापन के लिए हम उसी तरह की सामान्य तुला का उपयोग करते हैं जैसी परचून की दुकान में पाई जाती है। विश्व में पाए जाने वाले विशाल पिण्डों जैसे ग्रहों, तारों आदि के द्रव्यमान ज्ञात करने के लिए हम न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियम का उपयोग करते हैं (देखिए अध्याय 8)। अति सूक्ष्म कणों, जैसे परमाणुओं, अवपरमाणुक कणों आदि के लघु द्रव्यमानों के मापन के लिए हम द्रव्यमान-स्पेक्ट्रमलेखी का प्रयोग करते हैं, जिसमें, एकसमान विद्युत एवं चुम्बकीय क्षेत्र में गतिमान, आवेशित कणों के प्रक्षेप-पथ की त्रिज्या उस कण के द्रव्यमान के अनुक्रमानुपाती होती है।

2.4.1 द्रव्यमानों के परास

विश्व में हम जो पिण्ड देखते हैं, उनके द्रव्यमानों में अंतर का एक अत्यंत विस्तृत परिसर है। एक ओर इलेक्ट्रॉन जैसा सूक्ष्म कण है जिसका द्रव्यमान 10-30 kg कोटि का है, तो दूसरी ओर लगभग 1055 kg का ज्ञात विश्व है। सारणी (2.4) में विभिन्न द्रव्यमानों के कोटि और परास दिए गए हैं।

 jyu

2.5 समय का मापन

किसी भी समय-अंतराल को मापने के लिए हमें घड़ी की आवश्यकता होती है। अब हम समय-मापन हेतु समय का परमाण्वीय मानक प्रयोग करते हैं जो सीज़ियम परमाणु में उत्पन्न आवर्त कम्पनों पर आधारित है। यही राष्ट्रीय मानक के रूप में प्रयुक्त सीज़ियम घड़ी, जिसे परमाणु घड़ी भी कहते हैं, का आधार है। एेसे मानक अनेक प्रयोगशालाओं में उपलब्ध हैं। सीज़ियम परमाणु घड़ी में एक सेकन्ड, सीज़ियम-133 परमाणु के निम्नतम ऊर्जा स्तर के दो अतिसूक्ष्म स्तरों के मध्य संक्रमण के तदनुरूपी विकिरणों के 9,192,631,770 कम्पनों के लिए आवश्यक है। इस सीज़ियम परमाणु घड़ी की समय दर को, सीज़ियम परमाणु के कम्पन ठीक उसी प्रकार नियंत्रित करते हैं जैसे संतुलन चक्र के कम्पन सामान्य कलाई घड़ी को अथवा छोटे क्वार्टज़ क्रिस्टल के कम्पन किसी क्वार्टज़ कलाई घड़ी को करते हैं।

सीज़ियम परमाणु घड़ियाँ अत्यंत यथार्थ होती हैं। सिद्धान्ततः वे एक सुबाह्य मानक उपलब्ध कराती हैं। चार सीज़ियम परमाणु घड़ियों के माध्यम से, समय-अंतराल के राष्ट्रीय मानक ‘सेकन्ड’ का अनुरक्षण किया जाता है। समय के भारतीय मानक के अनुरक्षण के लिए नयी दिल्ली की राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला में एक सीज़ियम घड़ी लगाई गई है।

हमारे देश में, सभी भौतिक मानकों (जिनमें समय और आवृत्ति आदि के मानक भी शामिल हैं) के अनुरक्षण और सुधार का दायित्व NPL का है। ध्यान दें कि भारतीय मानक समय (IST), इन चार घड़ियों के समुच्चय से जुड़ा है। दक्ष सीज़ियम परमाणु घड़ियाँ इतनी अधिक यथार्थ हैं कि इनके द्वारा समय बोध में अनिश्चितता ± 1 × 10–13, अर्थात् 1013 सेकन्ड में एक सेकन्ड से भी कम की त्रुटि होने की रहती है। ये एक वर्ष में 3 माइक्रो सेकंड से ज्यादा इधर-उधर नहीं होती। समय मापन की इस आश्चर्यजनक यथार्थता को ध्यान में रखकर ही लम्बाई के SI मात्रक को प्रकाश द्वारा (1/299, 792, 458) सेकंड में चलित दूरी के रूप में व्यक्त किया गया है (सारणी 2.1)।

विश्व में होने वाली घटनाओं के समय-अंतरालों में अंतर का परिसर बहुत व्यापक है। सारणी 2.5, कुछ प्रारूपिक समय-अंतरालों के परास और कोटि दर्शाती है।

सारणी 2.3 एवं 2.5 में दर्शायी गई संख्याओं में आश्चर्यजनक अनुरूपता है। इनका ध्यानपूर्वक अवलोकन करने पर आप देख सकते हैं कि हमारे विश्व में विशालतम और लघुतम पिण्डों की लम्बाइयों का अनुपात लगभग 1041 है तथा यह भी कम रुचिकर नहीं है कि विश्व की घटनाओं से संबद्ध सबसे बड़े और सबसे छोटे समय-अंतरालों का अनुपात भी 1041 ही है। यह संख्या 1041, सारणी 2.4 में फिर से प्रकट होती है, जिसमें कुछ पिण्डों के प्रारूपिक द्रव्यमानों को सूचीबद्ध किया गया है। हमारे विश्व के विशालतम एवं लघुतम पिण्डों के द्रव्यमानों का अनुपात लगभग (1041)2 है। क्या इन विशाल संख्याओं की यह आश्चर्यजनक, अनुरूपता मात्र संयोग है?

सारणी 2.5 समय अंतरालों का परास एवं कोटि

ki

2.6 यथार्थता, यंत्रों की परिशुद्धता एवं मापन में त्रुटि

मापन, समस्त प्रायोगिक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का मूलाधार है। किसी भी मापन-यंत्र के सभी मापन के परिणामों में कुछ न कुछ अनिश्चितता रहती ही है। यह अनिश्चितता ही त्रुटि कहलाती है। प्रत्येक परिकलित राशि, जो मापित मानों पर आधारित होती है, में भी कुछ त्रुटि होती है। यहाँ हम दो तकनीकी शब्दों: यथार्थता और परिशुद्धता में प्रभेद करेंगे। किसी माप की यथार्थता वह मान है जो हमें यह बताता है कि किसी राशि का मापित मान, उसके वास्तविक मान के कितना निकट है जबकि परिशुद्धता यह बताती है कि वह राशि किस विभेदन या सीमा तक मापी गई है।

मापन की यथार्थता कई कारकों पर निर्भर कर सकती है जिनमें मापक यंत्रों का विभेदन या सीमा भी सम्मिलित है। उदाहरण के लिए, माना कि किसी लम्बाई का वास्तविक मान 3.678 cm है। एक प्रयोग में 0.1 cm विभेदन का मापक-यंत्र प्रयोग करके इसका मान 3.5 cm मापा गया, जबकि, दूसरे प्रयोग में अधिक विभेदन वाला (माना 0.01 cm) मापक यंत्र प्रयोग करके उसी लंबाई को 3.38 cm मापा गया। यहाँ पहला माप अधिक यथार्थ है (क्योंकि वास्तविक मान के निकट है) परन्तु कम परिशुद्ध है (क्योंकि इसका विभेदन केवल 0.1 cm है।) जबकि, दूसरा माप कम यथार्थ परन्तु अधिक परिशुद्ध है। अतः मापन में त्रुटियों के कारण हर माप एक सन्निकट माप है। सामान्यतः, मापन में आई त्रुटियों को मुख्य रूप से निम्नलिखित दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है: (a) क्रमबद्ध त्रुटियाँ एवं (b) यादृच्छिक त्रुटियाँ।

क्रमबद्ध त्रुटियाँ

क्रमबद्ध त्रुटियाँ वे त्रुटियाँ हैं जो किसी एक दिशा धनात्मक या फिर ऋणात्मक में प्रवृत्त होती हैं। क्रमबद्ध त्रुटियों के कुछ स्रोत निम्नलिखित हैं:

(a) यंत्रगत त्रुटियाँ: ये त्रुटियाँ मापक यंत्र की अपूर्ण अभिकल्पना, त्रुटिपूर्ण अंशांकन या शून्यांक-त्रुटि आदि के कारण होती हैं। उदाहरणार्थ, हो सकता है कि किसी तापमापी का अंशांकन ठीक न हुआ हो (परिणामस्वरूप यह STP पर जल का क्वथनांक 100°C के स्थान पर 104°C पढ़ता हो); किसी वर्नियर कैलिपर्स में दोनों जबड़े मिलाने पर वर्नियर पैमाने का शून्य चिह्न मुख्य पैमाने के शून्य चिह्न के संपाती न हाें, या किसी साधारण पैमाने का एक सिरा घिसा हुआ हो।

(b)  प्रायोगिक तकनीक या कार्यविधि में अपूर्णता: मानव शरीर का ताप ज्ञात करने के लिए यदि आप तापमापी को बगल में लगाकर ताप ज्ञात करेंगे तो यह ताप शरीर के वास्तविक ताप से सदैव ही कुछ कम आएगा। प्रयोग के दौरान बाह्य परिस्थितियाँ (ताप, दाब, वायु वेग, आर्द्रता आदि में परिवर्तन) मापन में क्रमबद्ध त्रुटियाँ प्रस्तुत कर सकती हैं।

(c) व्यक्तिगत त्रुटियाँ: ये त्रुटियाँ, प्रेक्षक के किसी पूर्वाग्रह, उपकरण के समंजन में रह गई कमी या प्रेक्षण लेते समय प्रेक्षक द्वारा उचित सावधानियाँ न बरतने आदि के कारण होती हैं। उदाहरण के लिए, प्रकाशीय मंच पर सुई की स्थिति का पैमाने पर पाठ्यांक लेते समय यदि आप स्वभाव के कारण अपना सिर सदैव सही स्थिति से थोड़ा दाईं ओर रखेेंगे, तो पाठन में लम्बन के कारण त्रुटि आ जाएगी।

सुधरी हुई प्रायोगिकी तकनीकों के उपयोग, प्रयोग के लिए अपेक्षाकृत अच्छे मापन यंत्रों का चयन एवं यथासंभव व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों को दूर करके क्रमबद्ध त्रुटियों को कम किया जा सकता है। किसी भी दी गई व्यवस्था के लिए, इन त्रुटियों का कुछ निश्चित सीमाओं तक आकलन किया जा सकता है और पाठ्यांकों को तदनुसार संशोधित किया जा सकता है।

यादृच्छिक त्रुटियाँ

मापन में अनियमित रूप से होने वाली त्रुटियों को यादृच्छिक त्रुटियाँ कहते हैं और इसलिए ये चिह्न और परिमाण में यादृच्छिक हैं। यादृच्छिक त्रुटियाँ, प्रायोगिक अवस्थाओं (ताप, वोल्टता प्रदाय, प्रयोग व्यवस्था के यांत्रिक कम्पन आदि) में होने वाले यादृच्छिक तथा अननुमेय उतार-चढ़ाव के कारण तथा पाठ्यांक के समय प्रेक्षक द्वारा की गई (पूर्वाग्रह रहित) व्यक्तिगत त्रुटियों आदि के कारण होती हैं। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति एक ही प्रेक्षण को बार-बार दोहराये तो संभव है कि हर बार उसका पाठ्यांक भिन्न हो।

अल्पतमांक त्रुटि

किसी मापक यंत्र द्वारा मापा जा सकने वाला छोटे से छोटा मान उस मापक यंत्र का अल्पतमांक कहलाता है। किसी मापक यंत्र द्वारा लिए गए सभी पाठ्यांक या मापित मान उसके अल्पतमांक तक ही सही होते हैं।

अल्पतमांक त्रुटि एक एेसी त्रुटि होती है जो मापक यंत्र के विभेदन से संबद्ध होती है। उदाहरण के लिए, किसी वर्नियर कैलिपर्स का अल्पतमांक 0.01cm है; किसी गोलाईमापी का अल्पतमांक 0.001 cm हो सकता है। अल्पतमांक त्रुटि को यादृच्छिक त्रुटियों की श्रेणी में एक सीमित परिमाण तक ही रखा जा सकता है; यह त्रुटि क्रमबद्ध और यादृच्छिक दोनों ही के साथ होती है। यदि हम लंबाई मापने के लिए मीटर स्केल का उपयोग करते हैं तो मीटर स्केल में अंकन 1 mm अंतराल पर होता है।

अधिक परिशुद्ध मापन यंत्रों के प्रयोग करके, प्रायोगिक तकनीकों में सुधार, आदि के द्वारा, हम अल्पतमांक त्रुटि को कम कर सकते हैं। प्रेक्षणों को कई बार दोहराने पर प्राप्त सभी प्रेक्षणों के मानों का औसत प्राप्त होता है। यह माध्य मान मापित राशि के वास्तविक मान के अत्यधिक निकट होगा।

2.6.1 निरपेक्ष त्रुटि, आपेक्षिक त्रुटि एवं प्रतिशत त्रुटि

(a) माना कि किसी राशि के कई मापनों के मान a1, a2, a3...., an हैं। प्रायोगिक परिस्थितियों में, इस राशि का सर्वाधिक संभव मान, इन सभी मानों के समांतर माध्य को माना जा सकता है।

aमाध्य = (a1+a2+a3+...+an ) / n (2.4)

या,aमाध्य =   an (2.5)

क्योंकि जैसा पहले स्पष्ट किया जा चुका है कि यह मानना युक्तिसंगत है कि किसी राशि की व्यष्टिगत माप उस राशि के वास्तविक मान से उतनी ही अधिआकलित हो सकती है, जितनी उसके अवआकलित होने की संभावना होती है।

राशि के व्यष्टिगत और वास्तविक माप के बीच के अंतर के परिमाण को मापन की निरपेक्ष त्रुटि कहते हैं। इसको |∆a | द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है। क्योंकि, हमें किसी राशि का वास्तविक मान ज्ञात करने की कोई विधि पता नहीं है, इसलिए हम समांतर माध्य को ही राशि का वास्तविक मान स्वीकार कर लेते हैं। तब हमारी व्यष्टिगत माप में वास्तविक माप से निरपेक्ष त्रुटियाँ इस प्रकार हैं,

a1 = a1 aमाध्य,

a2 = a2 aमाध्य,

.... .... ....

.... .... ....

a n = an aमाध्य

ऊपर परिकलित a का मान कुछ प्रकरणों के लिए धनात्मक हो सकता है जबकि दूसरे कुछ अन्य प्रकरणों के लिए यह ऋणात्मक हो सकता है। परन्तु निरपेक्ष त्रुटि |a| सदैव ही धनात्मक होगी।

(b) भौतिक राशि की निरपेक्ष त्रुटियों के परिमाणों के समांतर माध्य को भौतिक राशि a के मान की अंतिम या माध्य निरपेक्ष त्रुटि कहा जाता है। इसको aमाध्य से निरूपित करते हैं।

अतः,

aमाध्य = (|a1|+|a2 |+|a3|+...+ |an|)/n (2.6)

=2000.png|ai|/n (2.7)

यदि हम कोई एकल माप लें, तो हमें इसका मान aमाध्य ± aमाध्य के परिसर में कहीं प्राप्त होगा।

अर्थात् a = aमाध्य ± aमाध्य

या,

aमाध्य aमाध्य a aमाध्य + aमाध्य (2.8)

इसका अर्थ यह हुआ कि भौतिक राशि की किसी माप a का मान (aमाध्य+aमाध्य) तथा (aमाध्य− ∆aमाध्य) के बीच होने की संभावना है।

(c) निरपेक्ष त्रुटि के स्थान पर, हम प्रायः आपेक्षिक त्रुटि या प्रतिशत त्रुटि (δa) का प्रयोग करते हैं। आपेक्षिक त्रुटि, मापित राशि की माध्य निरपेक्ष त्रुटि aमाध्य एवं इसके माध्य मान aमाध्य का अनुपात है।

आपेक्षिक त्रुटि = aमाध्य/aमाध्य (2.9)

जब आपेक्षिक त्रुटि को प्रतिशत में व्यक्त करते हैं, तो इसे प्रतिशत त्रुटि कहा जाता है।

अतः प्रतिशत त्रुटि, δa = (aमाध्य/aमाध्य) × 100% (2.10)

आइये, अब हम एक उदाहरण पर विचार करते हैं। 

उदाहरण 2.6 राष्ट्रीय प्रयोगशाला में स्थित एक मानक घड़ी से तुलना करके दो घड़ियों की जाँच की जा रही है। मानक घड़ी जब दोपहर के 12:00:00 का समय दर्शाती है, तो इन दो घड़ियों के पाठ्यांक इस प्रकार हैं:

               घड़ी 1        घड़ी 2

सोमवार   12:00:05     10:15:06

मंगलवार  12:01:15     10:14:59

बुधवार     11:59:08     10:15:18

बृहस्पतिवार 12:01:50   10:15:07

शुक्रवार      11:59:15    10:14:53

शनिवार      12:01:30    10:15:24 

रविवार       12:01:19    10:15:11

यदि आप कोई एेसा प्रयोग कर रहे हों जिसके लिए आपको परिशुद्ध समय अंतराल मापन की आवश्यकता है, तो इनमें से आप किस घड़ी को वरीयता देंगे? क्यों?

हल सात दिन के घड़ी 1 के प्रेक्षणों में अंतर का परिसर 162s है जबकि घड़ी 2 में यह परिसर 31s का है। घड़ी 1 द्वारा लिए गए समय के पाठ्यांक, घड़ी 2 द्वारा लिए गए समय के पाठ्यांकों की तुलना में, मानक समय के अधिक निकट है। महत्वपूर्ण बात यह है कि घड़ी की शून्यांक त्रुटि, परिशुद्ध कार्य के लिए उतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितना इसके समय में होने वाला परिवर्तन है, क्योंकि, शून्यांक त्रुटि को तो कभी भी सरलता से दूर किया जा सकता है। अतः घड़ी 1 की तुलना में घड़ी 2 को वरीयता दी जाएगी। t

उदाहरण 2.7 हम एक सरल लोलक का दोलन-काल ज्ञात करते हैं। प्रयोग के क्रमिक मापनों में लिए गए पाठ्यांक हैं: 2.63 s, 2.56 s, 2.42 s, 2.71s एवं 2.80 s । निरपेक्ष त्रुटि, सापेक्ष त्रुटि एवं प्रतिशत त्रुटि परिकलित कीजिए। 

हल लोलक का औसत दोलन काल,

2005.png

=2010.png

= 2.624 s

= 2.62 s

क्योंकि, सभी काल 0.01 s के विभेदन तक मापे गए हैं, इसलिए समय की सभी मापें दूसरे दशमलव स्थान तक हैं। इस औसत काल को भी दूसरे दशमलव स्थान तक लिखना उचित है।

मापन में त्रुटियाँ हैं:

2.63 s 2.62 s = 0.01 s

2.56 s 2.62 s = 0.06 s

2.42 s 2.62 s = 0.20 s

2.71 s 2.62 s = 0.09 s

2.80 s 2.62 s = 0.18 s

ध्यान दीजिए, त्रुटियों के भी वही मात्रक हैं जो मापी जाने वाली राशियों के हैं।

सभी निरपेक्ष त्रुटियों का समांतर माध्य (समांतर माध्य के लिए हम केवल परिमाण लेते हैं) हैं:

∆Τमाध्य = [(0.01+ 0.06+0.20+0.09+0.18)s]/5

= 0.54 s/5

= 0.11 s

इसका अर्थ है कि सरल लोलक का दोलन काल (2.62 ± 0.11) s है। अर्थात् इसका मान (2.62 + 0.11) s एवं (2.62 0.11) s, अथवा 2.73 s एवं 2.51 s के बीच है। क्योंकि सभी निरपेक्ष त्रुटियों का समांतर माध्य 0.11 s है, अतः इस मान में सेकंड के दसवें अंश में पहले से ही त्रुटि है। इसलिए दोलन काल का मान सेकंड के सौवें भाग तक व्यक्त करने का कोई अर्थ नहीं है। इसको व्यक्त करने का अधिक सही ढंग इस प्रकार है:

T = 2.6 ± 0.1 s

ध्यान दीजिए, अंतिम संख्यांक 6 विश्वसनीय नहीं है, क्योंकि यह 5 एवं 7 के बीच कुछ भी हो सकता है। इस तथ्य को संकेत के रूप में हम इस प्रकार कहते हैं कि माप में दो सार्थक अंक हैं। इस प्रकरण में दो सार्थक अंक 2 तथा 6 हैं जिनमें 2 विश्वसनीय है और 6 में त्रुटि संबद्ध है। अनुभाग 2.7 में आप सार्थक अंकों के विषय में और विस्तार से सीखेंगे।

इस उदाहरण में आपेक्षिक त्रुटि अथवा प्रतिशत त्रुटि है-

2020.png%

किसी रेखा की लंबाई आप कैसे मापेंगे?

प कह सकते हैं, इस स्तर तक आने के बाद यह कैसा अटपटा प्रश्न है? लेकिन जरा सोचिए कि यदि यह रेखा सरल-रेखा न हो, तो? अपनी अभ्यास पुस्तिका में या श्याम-पट पर एक टेढ़ी-मेढ़ी रेखा खींचिए। ठीक है, इसकी लंबाई मापना भी कोई बहुत कठिन कार्य नहीं है। आप एक धागा लेंगे, इसे रेखा के ऊपर सावधानीपूर्वक रखेंगे, फिर धागे को फैला कर इसकी लंबाई माप लेंगे।

अब कल्पना कीजिए कि आपको राष्ट्रीय राजमार्ग की या किसी नदी की, या दो रेलवे स्टेशनों के बीच रेल की पटरियों की, या दो राज्यों अथवा देशों के बीच की सीमा रेखा की लंबाई मापनी है। तो इसके लिए, यदि आप 1m या 100m की रस्सी लें, इसे रेखा के अनुदिश रखें, बार-बार इसकी स्थिति बदल कर आगे ले जाएं, तो इसमें जो मानवीय श्रम, समय और खर्च आएगा वह उपलब्धि के अनुपात में बहुत अधिक होगा। इसके अतिरिक्त इस महत्कार्य में त्रुटियाँ अवश्यमेव आ जाएंगी। इस सिलसिले में एक रोचक तथ्य आपको बताएँ। फ्रांस और बेल्जियम की उभयनिष्ठ अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा है। दोनों देशों के राजकीय दस्तावेजों में दर्ज उसकी लंबाई में बहुत अंतर है।

एक कदम और आगे बढ़ें और समुद्र की तट रेखा अर्थात् वह रेखा जिस पर समुद्र और जमीन एक दूसरे से मिलते हैं, के बारे में विचार करें। इसकी तुलना में तो सड़कों और नदियों में काफी हलके मोड़ होते हैं। इस सबके बावजूद, सभी दस्तावेजों में, जिनमें हमारी स्कूल की पुस्तकें भी शामिल हैं, गुजरात या आंध्रप्रदेश के समुद्र तट की लंबाई या दो राज्यों के बीच की सीमा रेखा की लंबाई आदि के बारे में सूचनाएं दर्ज हैं। रेल के टिकटों पर स्टेशनों के साथ, उनके बीच की दूरी भी छपी रहती है। आपने सड़कों के किनारे-किनारे लगे मील के पत्थर देखे होंगे। ये विभिन्न शहरों की दूरियाँ बताते हैं।आखिर, यह सब किया कैसे जाता है?

आपको यह तय करना होता है कि किस सीमा तक त्रुटि सहन की जा सकती है और मापने के प्रक्रम पर अधिकतम खर्च कितना करना है। अगर आपको कम त्रुटियाँ चाहिए तो इसके लिए उच्च तकनीकी और अधिक खर्च की आवश्यकता होगी। यह कहना पर्याप्त होगा कि इसके लिए काफी उच्च स्तर की भौतिकी, गणित, अभियांत्रिकी और प्रौद्योगिकी की आवश्यकता होगी। इसका संबंध फ्रेक्टलों(Fractals) के क्षेत्र से है जो सैद्धांतिक भौतिकी में कुछ समय से काफी लोकप्रिय है। इस सबके बावजूद जो आंकड़े प्राप्त होते हैं उन पर कितना विश्वास किया जाए यह कहना कठिन होता है जैसा फ्रांस और बेल्जियम के दृष्टांत से स्पष्ट ही है। बात चल रही है तो आपको बता दें कि बेल्जियम और फ्रांस की यह विसंगति, फ्रेक्टलों (Fractals) एवं केअॉस (Chaos) विषय से संबंधित उच्च भौतिकी की एक पुस्तक के प्रथम पृष्ठ पर प्रस्तुत की गई है। 

2.6.2 त्रुटियों का संयोजन

यदि हम कोई एेसा प्रयोग करें जिसमें कई माप सम्मिलित हों, तो हमें यह भी जानना चाहिए कि इन मापनों में त्रुटियाँ किस प्रकार संयोजित होती हैं। उदाहरण के लिए, किसी पदार्थ का घनत्व उसके द्रव्यमान और आयतन के अनुपात द्वारा प्राप्त किया जाता है। यदि हम किसी वस्तु के द्रव्यमान और उसकी आमापों या विमाओं के मापने में त्रुटि करते हैं तो हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि उस वस्तु के पदार्थ के घनत्व में भी त्रुटि आएगी। यह आकलन करने के लिए कि यह त्रुटि कितनी होगी हमें यह सीखना होगा कि विभिन्न गणितीय संक्रियाओं में त्रुटियाँ किस प्रकार संयोजित होती हैं। इसके लिए हम निम्नलिखित कार्यविधि का अनुसरण करते हैं।

(a) किसी संकलन या व्यवकलन की त्रुटि

मान लीजिए, कि दो भौतिक राशियों A एवं B के मापित मान क्रमशः A ± A, B ± B हैं। जहाँ, A एवं B क्रमशः इन राशियों की निरपेक्ष त्रुटियाँ हैं। हम संकलन Z = A + B में त्रुटि Z ज्ञात करना चाहते हैं। संकलित करने पर

Z ± ∆Z = (A ± A) + (B ± B)

Z में अधिकतम संभावित त्रुटि

Z = ∆A +B

व्यकलित करने पर Z = A B के लिए हमेें प्राप्त होता है

Z ± Z = (A ± A)(B ± B)

= (A B) ± A ± B

अथवा ± Z = ± A ± B

यहाँ फिर अधिकतम संभावित त्रुटि Z = A ± B

अतः, नियम यह है: जब दो राशियों को संकलित या व्यवकलित किया जाता है, तो अंतिम परिणाम में निरपेक्ष त्रुटि उन राशियों की निरपेक्ष त्रुटियों के योग के बराबर होती है।

उदाहरण 2.8 किसी तापमापी द्वारा मापे गए दो पिण्डों के ताप क्रमशः t1 = 20 0C ± 0.5 0C एवं t2 = 50 0C ± 0.5 0C हैं। इन पिण्डों का तापान्तर और उसमें आई त्रुटि परिकलित कीजिए।

हल t = t2t1 = (50 0C±0.5 0C)– (200C±0.5 0C)

t = 30 0C ± 1 0C t

(b) गुणनफल या भागफल की त्रुटि

मान लीजिए, कि Z = AB और A एवं B के मापित मान A ± A एवं B ± B हैं, तब,

Z ± Z = (A ±A) (B ±B)

= AB ± B A ± A B ±A B.

वाम पक्ष को Z से एवं दक्षिण पक्ष को AB से भाग करने पर,

1±(Z/Z) = 1 ± (A/A) ± (B/B) ± (A/A)(B/B)

चूंकि A एवं B बहुत छोटे हैं उनके गुणनफल को हम उपेक्षणीय मान सकते हैं।

अतः अधिकतम आपेक्षिक त्रुटि

Z/ Z = (A/A) + (B/B)

आप यह आसानी से जाँच सकते हैं कि यह तथ्य भागफल पर भी लागू होता है।

अतः, नियम यह है : जब दो राशियों को गुणा या भाग किया जाता है तो प्राप्त परिणाम में आपेक्षिक त्रुटि, उन गुणकों अथवा भाजकोें में आपेक्षिक त्रुटियों का योग होती हैं।

उदाहरण 2.9 प्रतिरोध R = V/I, जहाँ V = (100 ± 5)V एवं I = (10 ± 0.2)A है। R में प्रतिशत त्रुटि ज्ञात कीजिए। 

हल V में प्रतिशत त्रुटि 5% और I में प्रतिशत त्रुटि 2% है

R में कुल प्रतिशत त्रुटि = 5% + 2% = 7%. 

उदाहरण 2.10 R1 = 100±3 ओम व R2 = 200 ± 4 ओम के दो प्रतिरोधकों को (a) श्रेणी क्रम में, (b) पार्श्व क्रम में संयोजित किया गया है। (a) श्रेणी क्रम संयोजन तथा (b) पार्श्व क्रम संयोजन में तुल्य प्रतिरोध ज्ञात कीजिए। (a) के लिए संबंध R =R1 + R2 एवं (b) के लिए 2047.png तथा 2052.png का उपयोग कीजिए।

हल (a) श्रेणी क्रम संयोजन का तुल्य प्रतिरोध,

R =R1 + R2 = (100 ± 3) ohm + (200 ± 4) ohm

= 300 ± 7 ohm.

(b) पार्श्व क्रम संयोजन का तुल्य प्रतिरोध,

ka

(यहाँ सार्थक अंकों के नियमों को प्रमाणित करने की दृष्टि से 2072.png2077.png का मान 2 के स्थान पर 1.8 के रूप में व्यक्त किया गया है। t

(c) मापित राशि की घातों के प्रकरण में त्रुटि

मान लीजिए Z = A2,

तब,

Z/Z = (A/A) + (A/A) = 2 (A/A)

अतः A2 में आपेक्षिक त्रुटि, A में आपेक्षिक त्रुटि की दो गुनी है। व्यापकीकरण करने पर, यदि Z = Ap Bq/Cr

तो, Z/Z = p (A/A) + q (B/B) + r (C/C).

अतः, नियम यह है : किसी भौतिक राशि जिस पर k घात चढ़ाई गई है, की आपेक्षिक त्रुटि उस व्यष्टिगत राशि की आपेक्षिक त्रुटि की k गुनी होती है।

उदाहरण 2.11 यदि Z = A4B1/3/CD3/2 हो तो Z की आपेक्षिक त्रुटि ज्ञात कीजिए।

हल Z में आपेक्षिक त्रुटि Z/Z = 4(A/A) +(1/3) (B/B) + (C/C) + (3/2) (D/D) t

उदाहरण 2.12 किसी सरल लोलक का दोलनकाल 2077 होता है। यदि L का मापित मान 20.0 cm है जिसमें 1 mm तक की यथार्थता है और समय को 1s विभेदन वाली कलाई घड़ी से मापने पर यह पाया जाता है कि लोलक के 100 दोलनों का समय 90 s है तो यहाँ g के निर्धारित मान की यथार्थता क्या है? 

हल g = 4π2L/T2

यहाँ, T = t/n और 2094.png, अतः, 2105.png। यहाँ L एवं t दोनों के मापन की त्रुटियाँ अल्पतमांक त्रुटियाँ हैं।

अतः (g/g) = (L/L) + 2(T/T )

= 2110.png

अतः g के मापन में प्रतिशत त्रुटि

100 (g/g) = 100(L/L) + 2 × 100 (T/T)

= 3%

2.7 सार्थक अंक

जैसा कि ऊपर वर्णन किया जा चुका है, हर मापन में त्रुटियाँ सम्मिलित होती हैं। अतः मापन के परिणामों को इस प्रकार प्रस्तुत किया जाना चाहिए कि मापन की परिशुद्धता स्पष्ट हो जाए। साधारणतः, मापन के परिणामों को एक संख्या के रूप में प्रस्तुत करते हैं जिसमें वह सभी अंक सम्मिलित होते हैं जो विश्वसनीय हैं, तथा वह प्रथम अंक भी सम्मिलित किया जाता है जो अनिश्चित है। विश्वसनीय अंकों और पहले अनिश्चित अंक को संख्या के सार्थक-अंक माना जाता है। यदि हम कहें कि किसी सरल लोलक का दोलन काल 1.62 s है, तो इसमें अंक 1 एवं 6 तो विश्वसनीय एवं निश्चित हैं, जबकि अंक 2 अनिश्चित है; इस प्रकार मापित मान में 3 सार्थक अंक हैं। यदि मापन के बाद किसी वस्तु की लम्बाई, 287.5 cm व्यक्त की जाए तो इसमें चार सार्थक अंक हैं, जिनमें 2, 8, 7 तो निश्चित हैं परन्तु अंक 5 अनिश्चित है। अतः राशि के मापन के परिणाम में सार्थक अंकों से अधिक अंक लिखना अनावश्यक एवं भ्रामक होगा, क्योंकि, यह माप की परिशुद्धता के विषय में गलत धारणा देगा।

किसी संख्या में सार्थक अंकों की संख्या ज्ञात करने के नियम निम्नलिखित उदाहरणों द्वारा समझे जा सकते हैं। जैसा पहले वर्णन किया जा चुका है कि सार्थक अंक मापन की परिशुद्धता इंगित करते हैं जो मापक यंत्र के अल्पतमांक पर निर्भर करती है। किसी मापन में विभिन्न मात्रकों के परिवर्तन के चयन से सार्थक अंकों की संख्या परिवर्तित नहीं होती। यह महत्वपूर्ण टिप्पणी निम्नलिखित में से अधिक प्रेक्षणों को स्पष्ट कर देती है:

(1) उदाहरण के लिए, लम्बाई 2.308 cm में चार सार्थक अंक हैं। परन्तु विभिन्न मात्रकों में इसी लम्बाई को हम 0.02308 m या 23.08 mm या 23080 µm भी लिख सकते हैं।

इन सभी संख्याओं में सार्थक अंकों की संख्या वही अर्थात चार (अंक 2, 3, 0, 8) है। यह दर्शाता है कि सार्थक अंकों की संख्या निर्धारित करने में, दशमलव कहाँ लगा है इसका कोई महत्व नहीं होता। उपरोक्त उदाहरण से निम्नलिखित नियम प्राप्त होते हैं:

सभी शून्येतर अंक सार्थक अंक होते हैं।

यदि किसी संख्या में दशमलव बिन्दु है, तो उसकी स्थिति का ध्यान रखे बिना, किन्हीं दो शून्येतर अंकों के बीच के सभी शून्य सार्थक अंक होते हैं।

यदि कोई संख्या 1 से छोटी है तो वे शून्य जो दशमलव के दाईं ओर पर प्रथम शून्येतर अंक के बाईं ओर हों, सार्थक अंक नहीं होते। ( 0.00 2308 में अधोरेखांकित शून्य सार्थक अंक नहीं हैं)।

• एेसी संख्या जिसमें दशमलव नहीं है के अंतिम अथवा अनुगामी शून्य सार्थक अंक नहीं होते।

(अतः 123 m = 12300 cm = 123000 mm में तीन ही सार्थक अंक हैं, संख्या में अनुगामी शून्य सार्थक अंक नहीं हैं)। तथापि, आप अगले प्रेक्षण पर भी ध्यान दे सकते हैं।

• एक एेसी संख्या, जिसमें दशमलव बिन्दु हो, के अनुगामी शून्य सार्थक अंक होते हैं।

(संख्या 3.500 या 0.06900 में चार सार्थक अंक हैं)।

(2) अनुगामी शून्य सार्थक अंक हैं या नहीं इस विषय में भ्रांति हो सकती है। मान लीजिए किसी वस्तु की लम्बाई 4.700 m लिखी गई है। इस प्रेक्षण से यह स्पष्ट है कि यहाँ शून्यों का उद्देश्य माप की परिशुद्धता को बतलाना है अतः यहाँ सभी शून्य सार्थक अंक हैं। (यदि ये सार्थक न होते तो इनको स्पष्ट रूप से लिखने की आवश्यकता न होती। तब सीधे-सीधे हम अपनी माप को 4.7 m लिख सकते थे।) अब मान लीजिए हम अपना मात्रक बदल लेते हैं तो

4.700 m = 470.0 cm = 0.004700 km = 4700 mm

क्योंकि, अंतिम संख्या में दो शून्य, बिना दशमलव वाली संख्या में अनुगामी शून्य हैं, अतः प्रेक्षण (1) के अनुसार हम इस गलत निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि इस संख्या में 2 सार्थक अंक हैं जबकि वास्तव में इसमें चार सार्थक अंक हैं, मात्र मात्रकों के परिवर्तन से सार्थक अंकों की संख्या में परिवर्तन नहीं होता।

(3) सार्थक अंकों के निर्धारण में इस प्रकार की संदिग्धता को दूर करने के लिए सर्वोत्तम उपाय यह है कि प्रत्येक माप को वैज्ञानिक संकेत (10 की घातों के रूप में) में प्रस्तुत किया जाए। इस संकेत पद्धति में प्रत्येक संख्या को a × 10b के रूप में लिखा जाता है, जहाँ a, 1 से 10 के बीच की कोई संख्या है और b, 10 की कोई धनात्मक या ऋणात्मक घात है। संख्या की सन्निकट अवधारणा बनाने के लिए हम इसका पूर्णांकन कर सकते हैं, यानि (a 2120.png5) होने पर इसे 1 और (5<a2120.png10) होने पर 10 मान सकते हैं। तब, इस संख्या को लगभग 10b के रूप में व्यक्त कर सकते हैं जिसमें 10 की घात b भौतिक राशि के परिमाण की कोटि कहलाती है। जब केवल एक अनुमान की आवश्यकता हो तो यह कहने से काम चलेगा कि राशि 10b की कोटि की है। उदाहरण के लिए पृथ्वी का व्यास (1.28×107m), 107m की कोटि का है, इसके परिमाण की कोटि 7 है। हाइड्रोजन परमाणु का व्यास (1.06×10–10m), 10–10m की कोटि का है। इसके परिमाण की कोटि –10 है। अतः, पृथ्वी का व्यास, हाइड्रोजन परमाणु के व्यास से 17 परिमाण कोटि बड़ा है।

प्रायः एक अंक के बाद दशमलव लगाने की प्रथा है। इससे ऊपर प्रेक्षण (a) में उल्लिखित भ्रांति लुप्त हो जाता है:

4.700 m = 4.700 × 102 cm

= 4.700 × 103 mm = 4.700 × 10–3 km

यहाँ सार्थक अंकों की संख्या ज्ञात करने में 10 की घात असंगत है। तथापि, वैज्ञानिक संकेत में आधार संख्या के सभी शून्य सार्थक अंक होते हैं। इस प्रकरण में सभी संख्याओं में 4 सार्थक अंक हैं।

इस प्रकार, वैज्ञानिक संकेत में आधार संख्या a के अनुगामी शून्यों के बारे में कोई भ्रांति नहीं रह जाती। वे सदैव सार्थक अंक होते हैं।

(4) किसी भी मापन के प्रस्तुतिकरण की वैज्ञानिक संकेत विधि एक आदर्श विधि है। परन्तु यदि यह विधि नहीं अपनायी जाती, तो हम पूर्वगामी उदाहरण में उल्लिखित नियमों का पालन करते हैं:

एक से बड़ी, बिना दशमलव वाली संख्या के लिए, अनुगामी शून्य सार्थक-अंक नहीं हैं।

• दशमलव वाली संख्या के लिए अनुगामी शून्य सार्थक अंक हैं।

(5) 1 से छोटी संख्या में, पारस्परिक रूप से, दशमलव के बाईं ओर लिखा शून्य (जैसे 0.1250) कभी भी सार्थक अंक नहीं होता। तथापि, किसी माप में एेसी संख्या के अंत में आने वाले शून्य सार्थक अंक होते हैं।

(6) गुणक या विभाजी कारक जो न तो पूर्णांकित संख्याएँ होती हैं और न ही किसी मापित मान को निरूपित करती हैं, यथार्थ होती हैं और उनमें अनन्त सार्थक-अंक होते हैं। उदाहरण के लिए 2125.png अथवा s = 2πr में गुणांक 2 एक यथार्थ संख्या है और इसे 2.0, 2.00 या 2.0000, जो भी आवश्यक हो लिखा जा सकता है। इसी प्रकार, 2130.png, में n एक पूर्णांक है।

2.7.1 सार्थक अंकों से संबंधित अय संक्रियाओं ंके नियम

किसी परिकलन का परिणाम, जिसमें राशियों के सन्निकट मापे गए मान सम्मिलित हैं (अर्थात् वे मान जिनमें सार्थक अंकों की संख्या सीमित है) व्यक्त करते समय, मूल रूप से मापे गए मानों की अनिश्चितता भी प्रतिबिम्बित होनी चाहिए। यह परिणाम, उन मापित मानों से अधिक यथार्थ नहीं हो सकता जिन पर यह आधारित है। अतः, व्यापक रूप से, किसी भी परिणाम में सार्थक अंकों की संख्या, उन मूल आंकड़ों से अधिक नहीं हो सकती जिनसे इसे प्राप्त किया गया है। इस प्रकार, यदि किसी पिण्ड का मापित द्रव्यमान मान लीजिए 4.237 g है (4 सार्थक अंक), और इसका मापित आयतन 2.51 cm3 है, तो मात्र अंकीय विभाजन द्वारा इसका घनत्व दशमलव के 11 स्थानों तक 1.68804780876 g/cm3 आता है। स्पष्टतः घनत्व के इस परिकलित मान को इतनी परिशुद्धता के साथ लिखना पूर्णतः हास्यास्पद तथा असंगत होगा, क्योंकि जिन मापों पर यह मान आधारित है उनकी परिशुद्धता काफी कम है। सार्थक अंकों के साथ अंकीय संक्रियाओं के निम्नलिखित नियम यह सुनिश्चित करते हैं कि किसी परिकलन का अंतिम परिणाम उतनी ही परिशुद्धता के साथ दर्शाया जाता है जो निवेशित मापित मानों की परिशुद्धता के संगत हो:

(1) संख्याओं को गुणा या भाग करने से प्राप्त परिणाम में केवल उतने ही सार्थक अंक रहने देना चाहिए जितने कि सबसे कम सार्थक अंकों वाली मूल संख्या में है।

अतः उपरोक्त उदाहरण में घनत्व को तीन सार्थक अंकों तक ही लिखा जाना चाहिए,

kl

इसी प्रकार, यदि दी गई प्रकाश की चाल 3 × 108 m/s-1 (एक सार्थक अंक) और एक वर्ष (1 y = 365.25 d) में 3.1557×107 s (पांच सार्थक अंक) हों, तो एक प्रकाश वर्ष में 9.47×1015 m (तीन सार्थक अंक) होंगे।

(2) संख्याओं के संकलन अथवा व्यवकलन से प्राप्त अंतिम परिणाम में दशमलव के बाद उतने ही सार्थक अंक रहने देने चाहिए जितने कि संकलित या व्यवकलित की जाने वाली किसी राशि में दशमलव के बाद कम से कम हैं।

उदाहरणार्थ, संख्याओं 436.32 g, 227.2 g एवं 0.301 g का योग 663.821 g है। दी गई संख्याओं में सबसे कम परिशुद्ध (227.2 g) माप दशमलव के एक स्थान तक ही यथार्थ है। इसलिए, अंतिम परिणाम को 663.8 g तक पूर्णांकित कर दिया जाना चाहिए।

इसी प्रकार, लम्बाइयों में अंतर को निम्न प्रकार से व्यक्त कर सकते हैं,

0.307 m 0.304 m = 0.003 m = 3 × 10–3 m

ध्यान दीजिए, हमें नियम (1) जो गुणा और भाग के लिए लागू होता है, उसे संकलन (योग) के उदाहरण में प्रयोग करके परिणाम को 664 g नहीं लिखना चाहिए और व्यवकलन के उदाहरण में 3.00 × 10–3 m नहीं लिखना चाहिए। ये माप की परिशुद्धता को उचित रूप से व्यक्त नहीं करते हैं। संकलन और व्यवकलन के लिए यह नियम दशमलव स्थान के पदों में है।

2.7.2 अनिश्चित अंकों का पूर्णांकन

जिन संख्याओं में एक से अधिक अनिश्चित अंक होते हैं, उनके अभिकलन के परिणाम का पूर्णांकन किया जाना चाहिए। अधिकांश प्रकरणों में, संख्याओं को उचित सार्थक अंकों तक पूर्णांकित करने के नियम स्पष्ट ही हैं। संख्या 2.746 को तीन सार्थक अंकों तक पूर्णांकित करने पर 2.75 प्राप्त होता है, जबकि 2.743 के पूर्णांकन से 2.74 मिलता है। परिपाटी के अनुसार नियम यह है कि यदि उपेक्षणीय अंक (पूर्वोक्त संख्या में अधोरेखांकित अंक) 5 से अधिक है तो पूर्ववर्ती अंक में एक की वृद्धि कर दी जाती है, और यदि यह उपेक्षणीय अंक 5 से कम होता है, तो पूर्ववर्ती अंक अपरिवर्तित रखा जाता है। लेकिन यदि संख्या 2.745 है, जिसमें उपेक्षणीय अंक 5 है, तो क्या होता है? यहाँ परिपाटी यह है कि यदि पूर्ववर्ती अंक सम है तो उपेक्षणीय अंक को छोड़ दिया जाता है और यदि यह विषम है, तो पूर्ववर्ती अंक में 1 की वृद्धि कर देते हैं। तब संख्या 2.745, तीन सार्थक अंकों तक पूर्णांकन करने पर 2.74 हो जाती है। दूसरी ओर, संख्या 2.735 तीन सार्थक अंकों तक पूर्णांकित करने के पश्चात् 2.74 हो जाती है, क्योंकि पूर्ववर्ती अंक विषम है।

किसी भी उलझन वाले अथवा बहुपदी जटिल परिकलन में, मध्यवर्ती पदों में सार्थक अंकों से एक अंक अधिक रहने देना चाहिए, जिसे परिकलन के अंत में उचित सार्थक अंकों तक पूर्णांकित कर देना चाहिए। इसी प्रकार, एक संख्या जो कई सार्थक अंकों तक ज्ञात है, जैसे निर्वात में प्रकाश का वेग, जिसके लिए, प्रायः 2.99792458 × 108 m/s को सन्निकट मान 3 × 108 m/s में पूर्णांकित कर परिकलनों में उपयोग करते हैं। अंत में ध्यान रखिये कि सूत्रों में उपयोग होने वाली यथार्थ संख्याएं, जैसे 2140.png में 2 π , में सार्थक अंकों की संख्या अत्यधिक (अनन्त) है। π = 3.1415926.... का मान बहुत अधिक सार्थक अंकों तक ज्ञात है लेकिन आम मापित राशियों में परिशुद्धि के आधार पर π का मान 3.142 या 3.14 भी लेना तर्क सम्मत है।

उदाहरण 2.13 किसी घन की प्रत्येक भुजा की माप 7.203 m है। उचित सार्थक अंकों तक घन का कुल पृष्ठ क्षेत्रफल एवं आयतन ज्ञात कीजिए। 

हल मापी गई लम्बाई में सार्थक अंकों की संख्या 4 है। इसलिए, परिकलित क्षेत्रफल एवं आयतन के मानों को भी 4 सार्थक अंकों तक पूर्णांकित किया जाना चाहिए।

घन का पृष्ठ क्षेत्रफल = 6(7.203)2 m2

= 311.299254 m2

= 311.3 m2

घन का आयतन = (7.203)3 m3

= 373.714754 m3

= 373.7 m3 

उदाहरण 2.14 किसी पदार्थ के 5.74 g का आयतन 1.2 cm3 है। सार्थक अंकों को ध्यान में रखते हुए इसका घनत्व व्यक्त कीजिए।

हल द्रव्यमान में 3 सार्थक अंक हैं, जबकि आयतन के मापित मान में केवल दो सार्थक अंक हैं। अतः घनत्व को केवल दो सार्थक अंकों तक व्यक्त किया जाना चाहिए।

574

= 4.8 g cm--3 

2.7.3 अंकगणितीय परिकलनों के परिणामों में अनिश्चितता निर्धारित करने के नियम

अंकीय संक्रियाओं में संख्याओं/ मापित राशियों में अनिश्चितता या त्रुटि निर्धारित करने संबंधी नियमों को निम्नलिखित उदाहरणों के द्वारा समझा जा सकता है।

(1) यदि किसी पतली, आयताकार शीट की लम्बाई और चौड़ाई, किसी मीटर पैमाने से मापने पर क्रमशः 16.2 cm एवं 10.1 cm हैं, तो यहाँ प्रत्येक माप में तीन सार्थक अंक हैं। इसका अर्थ है कि लम्बाई को हम इस प्रकार लिख सकते हैं

l = 16.2 ± 0.1 cm

= 16.2 cm ± 0.6 %.

इसी प्रकार, चौड़ाई को इस प्रकार लिखा जा सकता है

b = 10.1 ± 0.1 cm

= 10.1 cm ± 1 %

तब, त्रुटि संयोजन के नियम का उपयोग करने पर, दो (या अधिक) प्रायोगिक मापों के गुणनफल की त्रुटि

lb = 163.62 cm2 ± 1.6%

= 163.62 ± 2.6 cm2

इस उदाहरण के अनुसार हम अंतिम परिणाम को इस प्रकार लिखेंगे

l b = 164 ± 3 cm2

यहाँ, 3 cm2 आयताकार शीट के क्षेत्रफल के आकलन में की गई त्रुटि अथवा अनिश्चितता है।

(2) यदि किसी प्रायोगिक आंकड़े के समुच्चय में n सार्थक अंकों का उल्लेख है, तो आंकड़े के संयोजन से प्राप्त परिणाम भी n सार्थक अंकों तक वैध होगा।

तथापि, यदि आंकड़े घटाये जाते हैं तो सार्थक अंकों की संख्या कम की जा सकती है। उदाहरणार्थ, 12.9 g 7.06 g दोनों तीन सार्थक अंकों तक विनिर्दिष्ट हैं, परन्तु इसे 5.84 g के रूप में मूल्यांकित नहीं किया जा सकता है बल्कि केवल 5.8 g लिखा जाएगा, क्योंकि संकलन या व्यवकलन में अनिश्चितताएँ एक भिन्न प्रकार से संयोजित होती हैं। (संकलित या व्यवकलित की जाने वाली संख्याओं में दशमलव के बाद कम से कम अंकों वाली संख्या न कि कम से कम सार्थक अंकों वाली संख्या निर्णय का आधार होती है।)

(3) किसी संख्या के मान में आपेक्षिक त्रुटि, जो विनिर्दिष्ट सार्थक अंकों तक दी गई है, न केवल n पर, वरन, दी गई संख्या पर भी निर्भर करती है।

उदाहरणार्थ, द्रव्यमान 1.02 g के मापन में यथार्थता ± 0.01 g है, जबकि दूसरी माप 9.89 g भी ± 0.01 g तक ही यथार्थ है।

1.02 में आपेक्षिक त्रुटि

= 0.01/1.02) × 100 %

= ± 1%

इसी प्रकार 9.89 g में आपेक्षिक त्रुटि

= 0.01/9.89) × 100 %

= ± 0.1 %

अंत में, याद रखिए कि बहुपदीय अभिकलन के मध्यवर्ती परिणाम को परिकलित करने में प्रत्येक माप को, अल्पतम परिशुद्ध माप से एक सार्थक अंक अधिक रखना चाहिए। आंकड़ों के अनुसार इसे तर्कसंगत करने के बाद ही इनकी अंकीय संक्रियाएँ करना चाहिए अन्यथा पूर्णांकन की त्रुटियाँ उत्पन्न हो जाएंगी। उदाहरणार्थ, 9.58 के व्युत्क्रम का तीन सार्थक अंकों तक पूर्णांकन करने पर मान 0.104 है, परन्तु 0.104 का व्युत्क्रम करने पर तीन सार्थक अंकों तक प्राप्त मान 9.62 है। पर यदि हमने 1/9.58 = 0.1044 लिखा होता तो उसके व्युत्क्रम को तीन सार्थक अंकों तक पूर्णांकित करने पर हमें मूल मान 9.58 प्राप्त होगा।

उपरोक्त उदाहरण, जटिल बहुपदी परिकलन के मध्यवर्ती पदों में (कम से कम परिशुद्ध माप में अंकों की संख्या की अपेक्षा) एक अतिरिक्त अंक रखने की धारणा को न्यायसंगत ठहराता है, जिससे कि संख्याओं की पूर्णांकन प्रक्रिया में अतिरिक्त त्रुटि से बचा जा सके।

2.8 भौतिक राशियों की विमाएँ

किसी भौतिक राशि की प्रकृति की व्याख्या उसकी विमाओं द्वारा की जाती है। व्युत्पन्न मात्रकों द्वारा व्यक्त होने वाली सभी भौतिक राशियाँ, सात मूल राशियों के संयोजन के पदों में प्रस्तुत की जा सकती हैं। इन मूल राशियों को हम भौतिक संसार की सात विमाएँ कह सकते हैं और इन्हें गुरु कोष्ठक के साथ निर्दिष्ट किया जाता है। इस प्रकार, लम्बाई की विमा [L], विद्युत धारा की [A], ऊष्मागतिकीय ताप की [K], ज्योति तीव्रता की [cd], और पदार्थ की मात्रा की [mol] है। किसी भौतिक राशि की विमाएँ उन घातों (या घातांकों) को कहते हैं, जिन्हें उस राशि को व्यक्त करने के लिए मूल राशियों पर चढ़ाना पड़ता है। ध्यान दीजिए किसी राशि को गुरु कोष्ठक [ ] से घेरने का यह अर्थ है कि हम उस राशि की विमा पर विचार कर रहे हैं।

यांत्रिकी में, सभी भौतिक राशियों को विमाओं [L], [M] और [T] के पदों में व्यक्त किया जा सकता है। उदाहरणार्थ, किसी वस्तु द्वारा घेरा गया आयतन उसकी लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई अथवा तीन लम्बाइयों के गुणन द्वारा व्यक्त किया जाता है। इसलिए, आयतन का विमीय सूत्र = [L] × [L] × [L] = [L]3 = [L3]। क्योंकि, आयतन, द्रव्यमान और समय पर निर्भर नहीं करता, इसलिए यह कहा जाता है कि आयतन में द्रव्यमान की शून्य विमा, [M°], समय की शून्य विमा [T°] तथा लम्बाई की 3 विमाएँ [L3] हैं।

इसी प्रकार, बल को द्रव्यमान और त्वरण के गुणनफल के रूप में इस प्रकार व्यक्त कर सकते हैं,

बल = द्रव्यमान × त्वरण

= द्रव्यमान × (लम्बाई)/(समय)2

बल की विमाएँ [M] [L]/[T]2 = [M L T–2] हैं । अतः बल में, द्रव्यमान की 1, लम्बाई की 1 और समय की –2 विमाएँ हैं। यहाँ अन्य सभी मूल राशियों की विमाएँ शून्य हैं।

ध्यान दीजिए, इस प्रकार के प्रस्तुतीकरण में परिमाणों पर विचार नहीं किया जाता। इसमें भौतिक राशियों के प्रकार की गुणता का समावेश होता है। इस प्रकार, इस संदर्भ में वेग परिवर्तन, प्रारंभिक वेग, औसत वेग, अंतिम वेग और चाल, ये सभी तुल्य राशियाँ हैं, क्योंकि ये सभी राशियाँ लम्बाई/समय के रूप में व्यक्त की जा सकती हैं और इनकी विमाएँ [L]/[T] या [L T–1] हैं।

2.9 विमीय सूत्र एवं विमीय समीकरणें

किसी दी हुई भौतिक राशि का विमीय सूत्र वह व्यंजक है जो यह दर्शाता है कि किसी भौतिक राशि में किस मूल राशि की कितनी विमाएँ हैं। उदाहरणार्थ, आयतन का विमीय सूत्र [M° L3 T°] और वेग या चाल का [M° L T-1] है। इसी प्रकार, [M° L T–2], त्वरण का तथा [M L–3 T°] द्रव्यमान घनत्व का विमीय सूत्र है।

किसी भौतिक राशि को उसके विमीय सूत्र के बराबर लिखने पर प्राप्त समीकरण को उस राशि का विमीय समीकरण कहते हैं। अतः विमीय समीकरण वह समीकरण है जिसमें किसी भौतिक राशि को मूल राशियों और उनकी विमाओं के पदों में निरूपित किया जाता है। उदाहरण के लिए, आयतन [V], चाल [v], बल [F] और द्रव्यमान घनत्व [ρ] की विमीय समीकरण को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है:

[V] = [M0 L3 T0]

[v] = [M0 L T–1]

[F] = [M L T–2]

[ρ] = [M L–3 T0]

भौतिक राशियों के बीच संबंध निरूपित करने वाले समीकरण के आधार पर विमीय समीकरण, व्युत्पन्न की जा सकती है। विविध प्रकार की बहुत सी भौतिक राशियों के विमीय सूत्र, जिन्हें अन्य भौतिक राशियों के मध्य संबंधों को निरूपित करने वाले समीकरणों से व्युत्पन्न तथा मूल राशियों के पदों में व्यक्त किया गया है, आपके मार्गदर्शन एवं तात्कालिक संदर्भ के लिए परिशिष्ट-9 में दिए गए हैं।

2.10 विमीय विश्लेषण एवं इसके अनुप्रयोग

विमाओं की संकल्पना की स्वीकृति, जो भौतिक व्यवहार के वर्णन में मार्गदर्शन करती है, अपना एक आधारिक महत्व रखती है क्योंकि इसके अनुसार केवल वही भौतिक राशियाँ संकलित या व्यवकलित की जा सकती हैं जिनकी विमाएँ समान हैं। विमीय विश्लेषण का व्यापक ज्ञान, विभिन्न भौतिक राशियों के बीच संबंधों के निगमन में सहायता करता है और विभिन्न गणितीय व्यंजकों की व्युत्पत्ति, यथार्थता तथा विमीय संगतता की जाँच करने में सहायक है। जब दो या अधिक भौतिक राशियों के परिमाणों को गुणा (या भाग) किया जाता है, तो उनके मात्रकों के साथ उस प्रकार का व्यवहार किया जाना चाहिए जैसा हम सामान्य बीज-गणितीय प्रतीकों के साथ करते हैं। अंश और हर से सर्वसम मात्रकों को हम निरसित कर सकते हैं। यही बात भौतिक राशि की विमाओं के साथ भी लागू होती है। इसी प्रकार, किसी गणितीय समीकरण में पक्षों में प्रतीकों द्वारा निरूपित भौतिक राशियों की विमाएँ समान होनी चाहिए।

2.10.1 समीकरणों की विमीय संगति की जाँच

भौतिक राशियों के परिमाण केवल तभी संकलित या व्यवकलित किए जा सकते हैं यदि उनकी विमाएँ समान हों। दूसरे शब्दों में, हम केवल एक ही प्रकार की राशियों का संकलन या व्यवकलन कर सकते हैं। अतः बल को वेग के साथ संकलित या ऊष्मा गतिक ताप में से विद्युत धारा को व्यवकलित नहीं किया जा सकता। इस सरल सिद्धांत को विमाओं की समघातता सिद्धांत कहते हैं और इसकी सहायता से किसी समीकरण की संशुद्धि की जाँच कर सकते हैं। यदि किसी समीकरण के सभी पदों की विमाएँ समान नहीं हैं तो वह समीकरण गलत होती है। अतः यदि हम किसी पिण्ड की लम्बाई (या दूरी) के लिए व्यंजक व्युत्पन्न करें, तो चाहे उसमें सम्मिलित प्रतीक कुछ भी हों, उनकी विमाओं को सरल करने पर अंत में प्रत्येक पद में लम्बाई की विमा ही शेष रहनी चाहिए। इसी प्रकार, यदि हम चाल के लिए समीकरण व्युत्पन्न करें, तो इसके दोनों पक्षों के पदों का विमीय-सूत्र सरलीकरण के बाद [L T–1] ही पाया जाना चाहिए।

यदि किसी समीकरण की संशुद्धि में संदेह हो तो उस समीकरण की संगति की प्राथमिक जांच के लिए मान्य प्रथा के अनुसार विमाओं का उपयोग किया जाता है। किन्तु, विमीय संगति किसी समीकरण के सही होने की गारंटी नहीं है। यह अविम राशियों या फलनों की अनिश्चितता सीमा तक अनिश्चित होती है। त्रिकोणमितीय, लघुगणकीय और चरघातांकी फलनों जैसे विशिष्ट फलनों के कोणांक अविम होने चाहिए। एक शुद्ध संख्या, समान भौतिक राशियों का अनुपात, जैसे अनुपात के रूप में कोण (लम्बाई/लम्बाई), अनुपात के रूप में अपवर्तनांक (निर्वात में प्रकाश का वेग/माध्यम में प्रकाश का वेग) आदि की कोई विमाएँ नहीं होतीं।

अब, हम निम्नलिखित समीकरण की विमीय संगति या समांगता की जाँच कर सकते हैं

2150.png

जहाँ x किसी कण अथवा पिण्ड द्वारा t सेकंड में चलित वह दूरी है, जो कण या पिण्ड समय t = 0 पर स्थिति x0 से प्रारंभिक वेग v0 से आरम्भ करके तय करता है, और इसका गति की दिशा में एकसमान त्वरण a रहता है।

प्रत्येक पद के लिए विमीय समीकरण लिखने पर,

[x] = [L]

[x0 ] = [L]

[v0 t] = [L T–1] [T]

= [L]

[1/2 a t2] = [L T–2] [T2]

= [L]

क्योंकि इस समीकरण के सभी पदों की विमाएँ समान (लम्बाई की) हैं, इसलिए यह विमीय दृष्टि से संगत समीकरण है।

यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है, कि विमीय संगति परीक्षण, मात्रकों की संगति से कम या अधिक कुछ नहीं बताता। लेकिन, इसका लाभ यह है कि हम मात्रकों के किसी विशेष चयन के लिए बाध्य नहीं हैं और न ही हमें मात्रकों के पारस्परिक गुणजों या अपवर्तकों में रूपांतरण की चिन्ता करने की आवश्यकता है। यह बात भी हमें स्पष्ट करनी चाहिए कि यदि कोई समीकरण संगति परीक्षण में असफल हो जाती है तो वह गलत सिद्ध हो जाती है, परन्तु यदि वह परीक्षण में सफल हो जाती है तो इससे वह सही सिद्ध नहीं हो जाती। इस प्रकार कोई विमीय रूप से सही समीकरण आवश्यक रूप से यथार्थ (सही) समीकरण नहीं होती, जबकि विमीय रूप से गलत या असंगत समीकरण गलत होनी चाहिए।

उदाहरण 2.15 आइए निम्नलिखित समीकरण पर विचार करें

2156.png

यहाँ m वस्तु का द्रव्यमान, v इसका वेग है, g गुरुत्वीय त्वरण और h ऊँचाई है। जाँचिए कि क्या यह समीकरण विमीय दृष्टि से सही है। 

हल यहाँ वाम पक्ष की विमाएँ

[M] [L T–1 ]2 = [M] [ L2 T–2]

तथा = [M L2 T–2]

दक्षिण पक्ष की विमाएँ

[M][L T–2] [L] = [M][L2 T–2]

= [M L2 T–2]

चूँकि, दोनों पक्षों की विमाएँ समान हैं, इसलिए यह समीकरण विमीय दृष्टि से सही है। t

उदाहरण 2.16 ऊर्जा का SI मात्रक J = kg m2 s–2; है, चाल v का m s–1 और त्वरण a का m s–2 है। गतिज ऊर्जा (k) के लिए निम्नलिखित सूत्रों में आप किस-किस को विमीय दृष्टि से गलत बताएँगे? (m पिण्ड का द्रव्यमान है)।

(a) K = m2 v3

(b) K = (1/2)mv2

(c) K = ma

(d) K = (3/16)mv2

(e) K = (1/2)mv2 + ma

हल प्रत्येक सही समीकरण में दोनों पक्षों का विमीय सूत्र समान होना चाहिए। यह भी कि केवल समान विमाओं वाली राशियों का ही संकलन या व्यवकलन किया जा सकता है। दक्षिण पक्ष की राशि की विमाएँ (a) के लिए [M2 L3 T–3]; (b) तथा (d) के लिए [M L2 T–2]; (c) के लिए [M L T–2] है। समीकरण (e) के दक्षिण पक्ष की राशि की कोई उचित विमाएँ नहीं हैं क्योंकि इसमें भिन्न विमाओं वाली दो राशियों को संकलित किया गया है। अब क्योंकि K की विमाएँ [M L2 T–2] है, इसलिए सूत्र (a), (c) एवं (e) विमीय रूप से संगत नहीं हैं। ध्यान दें, कि विमीय तर्कों से यह पता नहीं चलता कि (b) (d) में कौन सा सूत्र सही है। इसके लिए गतिज ऊर्जा की वास्तविक परिभाषा को देखना पड़ेगा (देखें अध्याय 6)। गतिज ऊर्जा के लिए सही सूत्र (b) में दिया गया है। t

2.10.2 विभिन्न भौतिक राशियों के मध्य संबंध व्युत्पन्न करना

कभी-कभी विभिन्न भौतिक राशियों के बीच संबंध व्युत्पन्न करने के लिए विमाओं की विधि का उपयोग किया जा सकता है। इसके लिए हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि एक भौतिक राशि किन-किन दूसरी भौतिक राशियों पर निर्भर करती है (तीन भौतिक राशियों या एकघाततः स्वतंत्र चरों तक)। इसके लिए, हम दी गई राशि को निर्भर राशियों की विभिन्न घातों के गुणनफल के रूप में लिखते हैं। आइये, एक उदाहरण द्वारा इस प्रक्रिया को समझें।

उदाहरण 2.17 एक सरल लोलक पर विचार कीजिए, जिसमें गोलक को एक धागे से बाँध कर लटकाया गया है और जो गुरुत्व बल के अधीन दोलन कर रहा है। मान लीजिए कि इस लोलक का दोलन काल इसकी लम्बाई (l), गोलक के द्रव्यमान (m) और गुरुत्वीय त्वरण (g) पर निर्भर करता है। विमाओं की विधि का उपयोग करके इसके दोलन-काल के लिए सूत्र व्युत्पन्न कीजिए। 

हल दोलन काल T की, राशियों l, g और m पर निर्भरता को एक गुणनफल के रूप में इस प्रकार लिखा जा सकता है:

T = k lx gy mz

जहाँ, k एक विमाहीन स्थिरांक है, एवं x, y, z घातांक हैं।

दोनों ओर की राशियों के विमीय सूत्र लिखने पर

2172.png

= Lx+y T–2y Mz

दोनों ओर की विमाएँ समीकृत करने पर

x + y = 0; –2y = 1; एवं z = 0

अतः tyu

T = k l½ g½

या T 2177.png

ध्यान दीजिए, यहाँ स्थिरांक k का मान विमीय विधि से ज्ञात नहीं किया जा सकता है। यहाँ इसका कोई अर्थ नहीं है कि सूत्र के दक्षिण पक्ष को किसी संख्या से गुणा किया गया है, क्योंकि एेसा करने से विमाएँ प्रभावित नहीं होतीं।

वास्तव में, k = 2π, अतः T = 2182.png  

परस्पर संबंधित राशियों के बीच संबंध व्युत्पन्न करने के लिए विमीय विश्लेषण काफी उपयोगी है। तथापि विमाहीन स्थिरांकों के मान इस विधि द्वारा ज्ञात नहीं किए जा सकते। विमीय विधि द्वारा किसी समीकरण की केवल विमीय वैधता ही जांची जा सकती है, किसी समीकरण में विभिन्न भौतिक राशियों के बीच यथार्थ संबंध नहीं जांचे जा सकते। यह समान विमा वाली राशियों में विभेद नहीं कर सकती।

इस अध्याय के अंत में दिए गए कई अभ्यास प्रश्न, आपकी विमीय विश्लेषण की कुशलता विकसित करने में सहायक होंगे।

सारांश

1. भौतिक विज्ञान भौतिक राशियों के मापन पर आधारित एक परिमाणात्मक विज्ञान है । कुछ भौतिक राशियां जैसे लंबाई, द्रव्यमान, समय, विद्युत धारा, ऊष्मागतिक ताप, पदार्थ की मात्रा और ज्योति-तीव्रता, मूल राशियों के रूप में चुनी गई हैं।

2. प्रत्येक मूल राशि किसी मूल मात्रक (जैसे मीटर, किलोग्राम, सेकंड, एेम्पियर, केल्विन, मोल और कैंडेला) के पद में परिभाषित है । मूल मात्रक स्वेच्छा से चयनित परंतु समुचित रूप से मानकीकृत निर्देश मानक होते हैं । मूल राशियों के मात्रकों को मूल मात्रक कहते हैं।

3. मूल राशियों से व्युत्पन्न अन्य भौतिक राशियों को मूल मात्रकाें के संयोजन के रूप में व्यक्त कर सकते हैं, जिन्हें व्युत्पन्न मात्रक कहते हैं । मूल और व्युत्पन्न दोनों मात्रकों के पूर्ण समुच्चय को, मात्रक प्रणाली कहते हैं ।

4. सात मूल मात्रकों पर आधारित मात्रकों की अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली (SI) वर्तमान में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत प्रणाली है । यह प्रणाली समस्त संसार में व्यापक रूप से प्रयोग मेें लाई जाती है ।

5. मूल राशियों और व्युत्पन्न राशियों से प्राप्त सभी भौतिक मापों में SI मात्रकों का प्रयोग किया जाता है। कुछ व्युत्पन्न मात्रकों को SI मात्रकों में विशेष नामों (जैसे जूल, न्यूटन, वाट आदि) से व्यक्त किया जाता है ।

6. SI मात्रकों के सुपरिभाषित एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत मात्रक प्रतीक हैं (जैसे मीटर के लिए m, किलोग्राम के लिए kg, सेकंड के लिए s, एेम्पियर के लिए A, न्यूटन के लिए N, इत्यादि)।

7. प्रायः छोटी एवं बड़ी राशियों की भौतिक मापों को वैज्ञानिक संकेत में 10 की घातों में व्यक्त किया जाता है । माप संकेतों तथा आंकिक अभिकलनों की सरलता हेतु संख्याओं की परिशुद्धता का संकेत करते हुए वैज्ञानिक संकेत एवं पूर्वलग्नों का प्रयोग किया जाता है ।

8. भौतिक राशियों के संकेतन और SI मात्रकों के प्रतीकों, कुछ अन्य मात्रकों, भौतिक राशियों और मापों को उचित रूप से व्यक्त करने हेतु पूर्वलग्न के लिए कुछ सामान्य नियमों और निर्देशों का पालन करना चाहिए ।

9. किसी भी भौतिक राशि के अभिकलन में उसके मात्रक की प्राप्ति हेतु संबंध (संबंधों) में सम्मिलित व्युत्पन्न राशियों के मात्रकों को वांछित मात्रकों की प्राप्ति तक बीजगणितीय राशियों की भांति समझना चाहिए ।

10. भौतिक राशियों के मापन हेतु प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष विधियों का प्रयोग किया जा सकता है । मापित राशियों में परिणाम को व्यक्त करते समय मापक यंत्रों की यथार्थता (accuracy) और परिशुद्धता (precision)के साथ मापन में त्रुटियों को भी दर्शाया जाना चाहिए ।

11. मापित एवं अभिकलित राशियों में केवल उचित सार्थक अंकों को ही रखा रहने देना चाहिए । किसी भी संख्या में सार्थक अंकों की संख्या का निर्धारण, उनके साथ अंकीय संक्रियाओं को करने और अनिश्चित अंकों का निकटन करने में इनके लिए बनाए गए नियमों का पालन करना चाहिए ।

12. मूल राशियों की विमाओं और इन विमाओं का संयोजन भौतिक राशियों की प्रकृति का वर्णन करता है । समीकरणों की विमीय संगति की जांच और भौतिक राशियों में संबंध व्युत्पन्न करने में विमीय विश्लेषण का प्रयोग किया जा सकता है। कोई विमीय संगत समीकरण वास्तव में सही हो, यह आवश्यक नहीं है परंतु विमीय रूप से गलत या असंगत समीकरण गलत ही होगी । 

 

अभ्यास

टिप्पणी: संख्यात्मक उत्तरों को लिखते समय, सार्थक अंकों का ध्यान रखिये।

2.1 रिक्त स्थान भरिए

(a) किसी 1 cm भुजा वाले घन का आयतन.........m3 के बराबर है ।

(b) किसी 2 cm त्रिज्या व 10 cm ऊंचाई वाले सिलिंडर का पृष्ठ क्षेत्रफल.........(mm)2 के बराबर है।

(c) कोई गाड़ी 18 km/h की चाल से चल रही है तो यह l s में.........m चलती है ।

(d) सीसे का आपेक्षिक घनत्व 11.3 है । इसका घनत्व.......g cm–3 या......kg m–3 है ।

2.2 रिक्त स्थानों को मात्रकों के उचित परिर्वतन द्वारा भरिए

(a) 1 kg m2 s–2 =............ g cm2 s–2

(b) 1 m =................. ly

(c) 3.0 m s–2 =................. km h–2

(d) G = 6.67 × 10–11 Nm2 (kg)–2 =................. (cm)3 s–2 g–1

2.3 ऊष्मा (परागमन में ऊर्जा) का मात्रक कैलोरी है और यह लगभग 4.2 J के बराबर है, जहां 1 J = 1 kg m2 s–2। मान लीजिए कि हम मात्रकों की कोई एेसी प्रणाली उपयोग करते हैं जिससे द्रव्यमान का मात्रक α kg के बराबर है, लंबाई का मात्रक β m के बराबर है, समय का मात्रक γ s के बराबर है । यह प्रदर्शित कीजिए कि नए मात्रकों के पदों में कैलोरी का परिमाण 4.2 α−1 β−2 γ2 है ।

2.4 इस कथन की स्पष्ट व्याख्या कीजिए: तुलना के मानक का विशेष उल्लेख किए बिना "किसी विमीय राशि को ‘बड़ा’ या ‘छोटा’ कहना अर्थहीन है" । इसे ध्यान में रखते हुए नीचे दिए गए कथनों को जहां कहीं भी आवश्यक हो, दूसरे शब्दों में व्यक्त कीजिए:

(a) परमाणु बहुत छोटे पिण्ड होते हैं ।

(b) जेट वायुयान अत्यधिक गति से चलता है ।

(c) बृहस्पति का द्रव्यमान बहुत ही अधिक है ।

(d) इस कमरे के अंदर वायु में अणुओं की संख्या बहुत अधिक है ।

(e) इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन से बहुत भारी होता है ।

(f) ध्वनि की गति प्रकाश की गति से बहुत ही कम होती है ।

2.5 लंबाई का कोई एेसा नया मात्रक चुना गया है जिसके अनुसार निर्वात में प्रकाश की चाल 1 है । लम्बाई के नए मात्रक के पदों में सूर्य तथा पृथ्वी के बीच की दूरी कितनी है, प्रकाश इस दूरी को तय करने में 8 min और 20 s लगाता है ।

2.6 लंबाई मापने के लिए निम्नलिखित में से कौन-सा सबसे परिशुद्ध यंत्र है:

(a) एक वर्नियर केलिपर्स जिसके वर्नियर पैमाने पर 20 विभाजन हैं ।

(b) एक स्क्रूगेज जिसका चूड़ी अंतराल 1 mm और वृत्तीय पैमाने पर 100 विभाजन हैं ।

(c) कोई प्रकाशिक यंत्र जो प्रकाश की तरंगदैर्घ्य की सीमा के अंदर लंबाई माप सकता है ।

2.7 कोई छात्र 100 आवर्धन के एक सूक्ष्मदर्शी के द्वारा देखकर मनुष्य के बाल की मोटाई मापता है । वह 20 बार प्रेक्षण करता है और उसे ज्ञात होता है कि सूक्ष्मदर्शी के दृश्य क्षेत्र में बाल की औसत मोटाई 3.5 mm है । बाल की मोटाई का अनुमान क्या है?

2.8 निम्नलिखित के उत्तर दीजिए:

(a) आपको एक धागा और मीटर पैमाना दिया जाता है । आप धागे के व्यास का अनुमान किस प्रकार लगाएंगे ?

(b) एक स्क्रूगेज का चूड़ी अंतराल 1.0 mm है और उसके वृत्तीय पैमाने पर 200 विभाजन हैं । क्या आप यह सोचते हैं कि वृत्तीय पैमाने पर विभाजनों की संख्या स्वेच्छा से बढ़ा देने पर स्क्रूगेज की यथार्थता में वृद्धि करना संभव है ?

(c) वर्नियर केलिपर्स द्वारा पीतल की किसी पतली छड़ का माध्य व्यास मापा जाना है । केवल 5 मापनों के समुच्चय की तुलना में व्यास के 100 मापनों के समुच्चय के द्वारा अधिक विश्वसनीय अनुमान प्राप्त होने की संभावना क्यों है ?

2.9 किसी मकान का फोटोग्राफ 35 mm स्लाइड पर 1.75 cm2 क्षेत्र घेरता है । स्लाइड को किसी स्क्रीन पर प्रक्षेपित किया जाता है और स्क्रीन पर मकान का क्षेत्रफल 1.55 m2 है । प्रक्षेपित्र-परदा व्यवस्था का रेखीय आवर्धन क्या है ?

2.10 निम्नलिखित में सार्थक अंकों की संख्या लिखिए:

(a) 0.007 m2 (b) 2.64 × 1024 kg (c) 0.2370 g cm-3

(d) 6.320 J (e) 6.032 N m–2 (f) 0.0006032 m2

2.11 धातु की किसी आयताकार शीट की लंबाई, चौड़ाई व मोटाई क्रमशः 4.234 m, 1.005 m 2.01 cm है । उचित सार्थक अंकों तक इस शीट का क्षेत्रफल व आयतन ज्ञात कीजिए ।

2.12 पंसारी की तुला द्वारा मापे गए डिब्बे का द्रव्यमान 2.30 kg है । सोने के दो टुकड़े जिनका द्रव्यमान 20.15 g व 20.17 g है, डिब्बे में रखे जाते हैं । (a) डिब्बे का कुल द्रव्यमान कितना है, (b) उचित सार्थक अंकों तक टुकड़ों के द्रव्यमानों में कितना अंतर है ?

2.13 कोई भौतिक राशि P, चार प्रेक्षण-योग्य राशियों a, b, c तथा d से इस प्रकार संबधित है:

2187.png

a,b, c तथा d के मापने में प्रतिशत त्रुटियां क्रमशः 1%, 3%, 4%, तथा 2%, हैं । राशि P में प्रतिशत त्रुटि कितनी है ? यदि उपर्युक्त संबंध का उपयोग करके P का परिकलित मान 3.763 आता है, तो आप परिणाम का किस मान तक निकटन करेंगे ?

2.14 किसी पुस्तक में, जिसमें छपाई की अनेक त्रुटियां हैं, आवर्त गति कर रहे किसी कण के विस्थापन के चार भिन्न सूत्र दिए गए हैं:

(a) y = a sin 2π t/T (b) y = a sin vt

(c) y = (a/T) sin t/a (d) y = (a2192.png)(sin 2π t/T + cos 2π t/T)

(a = कण का अधिकतम विस्थापन, v = कण की चाल, T = गति का आवर्त काल) । विमीय आधारों पर गलत सूत्रों को निकाल दीजिए ।

2.15 भौतिकी का एक प्रसिद्ध संबंध किसी कण के ‘चल द्रव्यमान (moving mass)’ m, ‘विराम द्रव्यमान (rest mass)’ m0 , इसकी चाल v, और प्रकाश की चाल c के बीच है । (यह संबंध सबसे पहले अल्बर्ट आइंस्टाइन के विशेष आपेक्षिकता के सिद्धांत के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुआ था ।) कोई छात्र इस संबंध को लगभग सही याद करता है लेकिन स्थिरांक c को लगाना भूल जाता है । वह लिखता है: 2197.png। अनुमान लगाइए कि c कहां लगेगा ।

2.16 परमाण्विक पैमाने पर लंबाई का सुविधाजनक मात्रक एंगस्ट्रम है और इसे Å :1Å = 10–10 m द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है । हाइड्रोजन के परमाणु का आमाप लगभग 0.5Å है । हाइड्रोजन परमाणुओं के एक मोल का m3 में कुल आण्विक आयतन कितना होगा?

2.17 किसी आदर्श गैस का एक मोल (ग्राम अणुक) मानक ताप व दाब पर 22.4 L आयतन (ग्राम अणुक आयतन) घेरता है । हाइड्रोजन के ग्राम अणुक आयतन तथा उसके एक मोल के परमाण्विक आयतन का अनुपात क्या है? (हाइड्रोजन के अणु की आमाप लगभग मानिए) । यह अनुपात इतना अधिक क्यों है?

2.18 इस सामान्य प्रेक्षण की स्पष्ट व्याख्या कीजिए: यदि आप तीव्र गति से गतिमान किसी रेलगाड़ी की खिड़की से बाहर देखें तो समीप के पेड़, मकान आदि रेलगाड़ी की गति की विपरीत दिशा में तेजी से गति करते प्रतीत होते हैं, परन्तु दूरस्थ पिण्ड (पहाड़ियां, चंद्रमा, तारे आदि) स्थिर प्रतीत होते हैं । (वास्तव में, क्योंकि आपको ज्ञात है कि आप चल रहे हैं, इसलिए, ये दूरस्थ वस्तुएं आपको अपने साथ चलती हुई प्रतीत होती हैं)।

2.19 समीपी तारों की दूरियां ज्ञात करने के लिए अनुभाग 2.3.1 में दिए गए ‘लंबन’ के सिद्धांत का प्रयोग किया जाता है । सूर्य के परितः अपनी कक्षा में छः महीनों के अंतराल पर पृथ्वी की अपनी, दो स्थानों को मिलानेवाली, आधार रेखा AB है। अर्थात् आधार रेखा पृथ्वी की कक्षा के व्यास 3 × 1011m के लगभग बराबर है । लेकिन, चूंकि निकटतम तारे भी इतने अधिक दूर हैं कि इतनी लंबी आधार रेखा होने पर भी वे चाप के केवल 1" (सेकंड, चाप का) की कोटि का लंबन प्रदर्शित करते हैं । खगोलीय पैमाने पर लंबाई का सुविधाजनक मात्रक पारसेक है । यह किसी पिण्ड की वह दूरी है जो पृथ्वी से सूर्य तक की दूरी के बराबर आधार रेखा के दो विपरीत किनारों से चाप के 1" का लंबन प्रदर्शित करती है । मीटरों में एक पारसेक कितना होता है ?

2.20 हमारे सौर परिवार से निकटतम तारा 4.29 प्रकाश वर्ष दूर है । पारसेक में यह दूरी कितनी है ? यह तारा (एेल्फा सेंटौरी नामक) तब कितना लंबन प्रदर्शित करेगा जब इसे सूर्य के परितः अपनी कक्षा में पृथ्वी के दो स्थानों से जो छः महीने के अन्तराल पर हैं, देखा जाएगा ?

2.21 भौतिक राशियों का परिशुद्ध मापन विज्ञान की आवश्यकताएं हैं। उदाहरण के लिए, किसी शत्रु के लड़ाकू जहाज की चाल सुनिश्चित करने के लिए बहुत ही छोटे समय-अंतरालों पर इसकी स्थिति का पता लगाने की कोई यथार्थ विधि होनी चाहिए । द्वितीय विश्व युद्ध में रेडार की खोज के पीछे वास्तविक प्रयोजन यही था । आधुनिक विज्ञान के उन भिन्न उदाहरणों को सोचिए जिनमें लंबाई, समय, द्रव्यमान आदि के परिशुद्ध मापन की आवश्यकता होती है । अन्य जिस किसी विषय में भी आप बता सकते हैं, परिशुद्धता की मात्रात्मक धारणा दीजिए ।

2.22 जिस प्रकार विज्ञान में परिशुद्ध मापन आवश्यक है, उसी प्रकार अल्पविकसित विचारों तथा सामान्य प्रेक्षणों को उपयोग करने वाली राशियों के स्थूल आकलन कर सकना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है । उन उपायों को सोचिए जिनके द्वारा आप निम्नलिखित का अनुमान लगा सकते हैं: (जहां अनुमान लगाना कठिन है वहां राशि की उपरिसीमा पता लगाने का प्रयास कीजिए) ।

(a) मानसून की अवधि में भारत के ऊपर वर्षाधारी मेघों का कुल द्रव्यमान ।

(b) किसी हाथी का द्रव्यमान ।

(c) किसी तूफान की अवधि में वायु की चाल ।

(d) आपके सिर के बालों की संख्या ।

(e) आपकी कक्षा के कमरे में वायु के अणुओं की संख्या ।

2.23 सूर्य एक ऊष्म प्लैज़्मा (आयनीकृत पदार्थ) है जिसके आंतरिक क्रोड का ताप 107 K से अधिक और बाह्य पृष्ठ का ताप लगभग 6000 K है । इतने अधिक ताप पर कोई भी पदार्थ ठोस या तरल प्रावस्था में नहीं रह सकता। आपको सूर्य का द्रव्यमान घनत्व किस परिसर में होने की आशा है ? क्या यह ठोसों, तरलों या गैसों के घनत्वों के परिसर में है ? क्या आपका अनुमान सही है, इसकी जांच आप निम्नलिखित आंकड़ों के आधार पर कर सकते हैं: सूर्य का द्रव्यमान = 2.0 × 1030 kg; सूर्य की त्रिज्या = 7.0 × 108 m ।

2.24 जब बृहस्पति ग्रह पृथ्वी से 8247 लाख किलोमीटर दूर होता है, तो इसके व्यास की कोणीय माप 35.72" का चाप है । बृहस्पति का व्यास परिकलित कीजिए ।

अतिरिक्त अभ्यास

2.25 वर्षा के समय में कोई व्यक्ति चाल v के साथ तेजी से चला जा रहा है । उसे अपने छाते को टेढ़ा करके ऊर्ध्व के साथ θ कोण बनाना पड़ता है । कोई विद्यार्थी कोण θv के बीच निम्नलिखित संबंध व्युत्पन्न करता है:

tan θ = v;

और वह इस संबंध के औचित्य की सीमा पता लगाता हैः जैसी कि आशा की जाती है यदि v 0 तो
θ
0। (हम यह मान रहे हैं कि तेज हवा नहीं चल रही है और किसी खड़े व्यक्ति के लिए वर्षा ऊर्ध्वाधरतः पड़ रही है) । क्या आप सोचते हैं कि यह संबंध सही हो सकता है? यदि एेसा नहीं है तो सही संबंध का अनुमान लगाइए ।

2.26 यह दावा किया जाता है कि यदि बिना किसी बाधा के 100 वर्षों तक दो सीज़ियम घड़ियों को चलने दिया जाए, तो उनके समयों में केवल 0.02 s का अंतर हो सकता है । मानक सीज़ियम घड़ी द्वारा 1 s के समय अंतराल को मापने में यथार्थता के लिए इसका क्या अभिप्राय है?

2.27 एक सोडियम परमाणु का आमाप लगभग 2.5Å मानते हुए उसके माध्य द्रव्यमान घनत्व का अनुमान लगाइए। (सोडियम के परमाण्वीय द्रव्यमान तथा आवोगाद्रो संख्या के ज्ञात मान का प्रयोग कीजिए ।) इस घनत्व की क्रिस्टलीय प्रावस्था में सोडियम के घनत्व 970 kg m–3 के साथ तुलना कीजिए । क्या इन दोनों घनत्वों के परिमाण की कोटि समान है? यदि हां, तो क्यों?

2.28 नाभिकीय पैमाने पर लंबाई का सुविधाजनक मात्रक फर्मी है: (1 f =10–15m) । नाभिकीय आमाप लगभग निम्नलिखित आनुभविक संबंध का पालन करते हैं:

r=r0 A1/3

जहां r नाभिक की त्रिज्या, A इसकी द्रव्यमान संख्या और r0 कोई स्थिरांक है जो लगभग 1.2 f के बराबर है । यह प्रदर्शित कीजिए कि इस नियम का अर्थ है कि विभिन्न नाभिकों के लिए नाभिकीय द्रव्यमान घनत्व लगभग स्थिर है । सोडियम नाभिक के द्रव्यमान घनत्व का आकलन कीजिए । प्रश्न 2.27 में ज्ञात किए गए सोडियम परमाणु के माध्य द्रव्यमान घनत्व के साथ इसकी तुलना कीजिए ।

2.29 लेसर (LASER), प्रकाश के अत्यधिक तीव्र, एकवर्णी तथा एकदिश किरण-पुंज का स्रोत है । लेसर के इन गुणों का लंबी दूरियां मापने में उपयोग किया जाता है । लेसर को प्रकाश के स्रोत के रूप में उपयोग करते हुए पहले ही चंद्रमा की पृथ्वी से दूरी परिशुद्धता के साथ ज्ञात की जा चुकी है । कोई लेसर प्रकाश किरण-पुंज चंद्रमा के पृष्ठ से परावर्तित होकर 2.56 s में वापस आ जाता है । पृथ्वी के परितः चंद्रमा की कक्षा की त्रिज्या कितनी है ?

2.30 जल के नीचे वस्तुओं को ढूंढ़ने व उनके स्थान का पता लगाने के लिए सोनार (SONAR) में पराश्रव्य तरंगों का प्रयोग होता है । कोई पनडुब्बी सोनार से सुसज्जित है । इसके द्वारा जनित अन्वेषी तरंग और शत्रु की पनडुब्बी से परावर्तित इसकी प्रतिध्वनि की प्राप्ति के बीच काल विलंब 77.0 s है । शत्रु की पनडुब्बी कितनी दूर है ? (जल में ध्वनि की चाल = 1450 m s–1) ।

2.31 हमारे विश्व में आधुनिक खगोलविदों द्वारा खोजे गए सर्वाधिक दूरस्थ पिण्ड इतनी दूर हैं कि उनके द्वारा उत्सर्जित प्रकाश को पृथ्वी तक पहुंचने में अरबों वर्ष लगते हैं । इन पिंडों (जिन्हें क्वासर ‘Quasar’ कहा जाता है) के कई रहस्यमय लक्षण हैं जिनकी अभी तक संतोषजनक व्याख्या नहीं की जा सकी है । किसी एेसे क्वासर की km में दूरी ज्ञात कीजिए जिससे उत्सर्जित प्रकाश को हम तक पहुंचने में 300 करोड़ वर्ष लगते हों ।

2.32 यह एक विख्यात तथ्य है कि पूर्ण सूर्यग्रहण की अवधि में चंद्रमा की चक्रिका सूर्य की चक्रिका को पूरी तरह ढक लेती है । इस तथ्य और उदाहरण 2.3 और 2.4 से एकत्र सूचनाओं के आधार पर चंद्रमा का लगभग व्यास ज्ञात कीजिए ।

2.33 इस शताब्दी के एक महान भौतिकविद् (पी.ए.एम. डिरैक) प्रकृति के मूल स्थिरांकों (नियतांकों) के आंकिक मानों के साथ क्रीड़ा में आनंद लेते थे । इससे उन्होंने एक बहुत ही रोचक प्रेक्षण किया । परमाण्वीय भौतिकी के मूल नियतांकों (जैसे इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान, प्रोटॉन का द्रव्यमान तथा गुरुत्वीय नियतांक G) से उन्हें पता लगा कि वे एक एेसी संख्या पर पहुंच गए हैं जिसकी विमा समय की विमा है । साथ ही, यह एक बहुत ही बड़ी संख्या थी और इसका परिमाण विश्व की वर्तमान आकलित आयु (~1500 करोड़ वर्ष) के करीब है । इस पुस्तक में दी गई मूल नियतांकों की सारणी के आधार पर यह देखने का प्रयास कीजिए कि क्या आप भी यह संख्या (या और कोई अन्य रोचक संख्या जिसे आप सोच सकते हैं) बना सकते हैं ? यदि विश्व की आयु तथा इस संख्या में समानता महत्वपूर्ण है तो मूल नियतांकों की स्थिरता किस प्रकार प्रभावित होगी?

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