मृदा क्या आपने कभी उस सवार्िाक महत्त्वपूणर् कारक के बारे में सोचा है जो धरातल पर वृक्षोंए घासए पफसलों तथा जीवन के अनेक रूपों का पोषण करता है? क्या कोइर् मिट्टðी के बिना घास का एक तिनकाभी उगा सकता है? यद्यपि जलीय प्रकृति के पौधे और प्राणी जल में जीवित रहते हैं परंतु क्या वे जल के द्वारामिट्टðी से पोषक तत्त्व ग्रहण नहीं करते? आप अनुभव करसकते हैं कि मृदा भू - पपर्टी की सबसे महत्त्वपूणर् परत है। यह एक मूल्यवान संसाधन है। हमारा अिाकतर भोजन और वस्त्रा, मिट्टðी में उगने वाली भूमि - आधारित पफसलों से प्राप्त होता है। दैनिक आवश्यकताओं की पू£त के लिए हम जिस मिट्टðी पर निभर्र करते हैं उसका विकास हजारों वषो± में होता है। अपक्षय और क्रमण के विभ्िान्न कारक जनक सामग्री पर कायर् करके मृदा की एक पतली परत का निमार्ण करते हैं। मृदा शैल, मलवा और जैव सामग्री का सम्िमश्रण होती है जो पृथ्वी की सतह पर विकसित होते हैं। मृदा - निमार्ण को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं - उच्चावचए जनक सामग्रीए जलवायुए वनस्पति तथा अन्य जीव रूप और समय। इनके अतिरिक्त मानवीय ियाएँ भी पयार्प्त सीमा तक इसे प्रभावित करती हैं। मृदा के घटक खनिज कणए ह्यूमसए जल तथा वायु होते हैं। इनमें से प्रत्येक की वास्तविक मात्रा मृदा के प्रकार पर निभर्र करती है। वुफछ मृदाओं में, इनमें से एक या अिाक घटक कम मात्रा में होता है जबकि अन्य वुफछ मृदाओं में इन घटकों का संयोजन भ्िान्न प्रकार का पाया जाता है। क्या आपने वन महोत्सव मनाते समय अपने स्वूफल के मैदान में वृक्ष लगाने के लिए कभी गîक्का खोदा है? अध्याय क्या इस गîक्के में मिट्टðी की परतें समरूप थीं अथवा इस में शीषर् से तली तक मृदा के रंग अलग - अलग थे? यदि हम भूमि पर एक गîक्का खोदें और मृदा को देखें तो वहाँ हमें मृदा की तीन परतें दिखाइर् देती हैं, जिन्हेंसंस्तर कहा जाता है। ‘क’ संस्तर सबसे ऊपरी खंड होता है, जहाँ पौधों की वृि के लिए अनिवायर् जैव पदाथो± का खनिज पदाथर्ए पोषक तत्त्वों तथा जल से संयोग होता है। ‘ख’ संस्तर ‘क’ संस्तर तथा ‘ग’ संस्तर के बीच संक्रमणखंड होता है जिसे नीचे व ऊपर दोनों से पदाथर् प्राप्त होते हैं। इसमें वुफछ जैव पदाथर् होते हैं तथापि खनिज पदाथर् का अपक्षय स्पष्ट नजर आता है। ‘ग’ संस्तर की रचना ढीली जनक सामग्री से होता है। यह परत मृदा निमार्ण कीप्रिया में प्रथम अवस्था होती है और अंततः ऊपर की दो परतें इसी से बनती हंै। परतों की इस व्यवस्था को मृदा परिच्छेदिका कहा जाता है। इन तीन संस्तरों के नीचे एक चट्टðान होती है जिसे जनक चट्टðान अथवा आधारी चट्टðान कहा जाता है। मृदाए जिसका एक जटिल तथा भ्िान्नअस्ितत्त्व हैए सदैव मृदा वैज्ञानिकों को आक£षत करतीरही है। इसके महत्त्व को समझने के लिए आवश्यक है कि मृदा का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए। मृदा का वगीर्करण इसी लक्ष्य को प्राप्त करने का एक प्रयास है। मृदा का वगीर्करण भारत में भ्िान्न - भ्िान्न प्रकार के उच्चावचए भूआवृफतिए जलवायु परिमंडल तथा वनस्पतियाँ पाइर् जातीं हैं। इहांेंने भारत में अनेक प्रकार की मििðयों के विकास में योगदान दिया है। मृदा चित्रा 6.2: भारत: मृदा के प्रमुख प्रकार मृदा है तथा लौह - आॅक्साइड और पोटाश की अिाकता होतीहै। परिणामस्वरूप लैटेराइट मृदाएँ कृष्िा के लिए पयार्प्तउपजाऊ नहीं हैं। पफसलों के लिए उपजाऊ बनाने के लिए इन मृदाओं में खाद और उवर्रकों की भारी मात्रा डालनी पड़ती है। तमिलनाडुए आंध्र प्रदेश और केरल में काजू जैसे वृक्षों वाली पफसलों की खेती के लिए लाल लैटेराइट मृदाएँ अिाक उपयुक्त हंै। मकान बनाने के लिए लैटेराइट मृदाओं का प्रयोग ईंटें बनाने में किया जाता है। इन मृदाओं का विकास मुख्यरूप से प्रायद्वीपीय पठार के ऊँचे क्षेत्रों में हुआ है। लैटराइट मृदाएँ सामान्यतः कनार्टकए केरलए तमिलनाडुए मध्य प्रदेश तथा ओडिशा और असम के पहाड़ी क्षेत्रों में पाइर् जाती हैं। शुष्क मृदाएँ शुष्क मृदाओं का रंग लाल से लेकर किशमिशी तक होता है। ये सामान्यतः संरचना से बलुइर् और प्रवृफती से लवणीय होती हैं। वुफछ क्षेत्रों की मृदाओं में नमक कीमात्रा इतनी अिाक होती है कि इनके पानी को वाष्पीकृत करके नमक प्राप्त किया जाता है। शुष्क जलवायुए उच्च तापमान और तीव्रगति से वाष्पीकरण के कारण इन मृदाओं में नमी और ह्यूमस कम होते हैं। इनमें नाइट्रोजन अपयार्प्त और प्.ाफाॅस्प्.ोफट सामान्य मात्रा में होती है। नीचे की ओर चूने की मात्रा के बढ़ते जाने के कारण निचले संस्तरों में कंकड़ो की परतें पाइर् जाती हंै। मृदा के तली संस्तर में कंकड़ांे की परत के बनने के कारण पानी का रिसाव सीमित हो जाता है। इसलिए ¯सचाइर् किए जाने पर इन मृदाओं में पौधों की सतत् वृि के लिए नमी सदाउपलब्ध रहती है। ये मृदाएँ विश्िाष्ट शुष्क स्थलाकृति वाले पश्िचमी राजस्थान में अभ्िालक्षण्िाक रूप से विकसित हुइर् हैं। ये मृदाएँ अनुवर्र हैं क्योंकि इनमें ह्यूमस और जैव पदाथर् कम मात्रा में पाए जाते हंै। लवण मृदाएँ ऐसी मृदाओं को ऊसर मृदाएँ भी कहते हंै। लवण मृदाओं में सोडियमए पौटेश्िायम और मैग्नीश्िायम का अनुपात अिाक होता है। अतः ये अनुवर्र होती हंै और इनमें किसी भी प्रकार की वनस्पति नहीं उगती। मुख्य रूप से शुष्क जलवायु और खराब अपवाह के कारण इनमें लवणों की मात्रा बढ़ती जाती है। ये मृदाएँ शुष्क और अधर् - शुष्क तथा जलाक्रांत क्षेत्रों और अनूपों में पाइर् जाती हंै। इनकी संरचना बलुइर् से लेकर दुमटी तक होती है। इनमें नाइट्रोजन और चूने की कमी होती है। लवण मृदाओं का अिाकतर प्रसार पश्िचमी गुजरातए पूवीर् तट के डेल्टाओं और पश्िचमी बंगाल के संुदर वन क्षेत्रों में है। कच्छ के रन में दक्ष्िाणी - पश्िचमी मानसून के साथ नमकके कण आते हैं, जो एक पपड़ी के रूप में ऊपरी सतह पर जमा हो जाते हैं। डेल्टा प्रदेश में समुद्री जल के भर जाने से लवण मृदाओं के विकास को बढ़ावा मिलता है।अत्यिाक सिंचाइर् वाले गहन कृष्िा के क्षेत्रों में, विशेषरूप से हरित क्राँति वाले क्षेत्रों मे,ं उपजाऊ जलोढ़ मृदाएँ भी लवणीय होती जा रही हैं। शुष्क जलवायु वाली दशाओं में अत्यिाक सिंचाइर् केश्िाका िया को बढ़ावादेती है। इसके परिणामस्वरूप नमक ऊपर की ओर बढ़ताहै और मृदा की सबसे ऊपरी परत में नमक जमा हो जाता है। इस प्रकार के क्षेत्रों मेंए विशेष रूप में पंजाब और हरियाणा में मृदा की लवणता की समस्या से निबटने के लिए जिप्सम डालने की सलाह दी जाती है। पीटमय मृदाएँ ये मृदाएँ भारी वषार् और उच्च आद्रर्ता से युक्त उन क्षेत्रों में पाइर् जाती हैं जहाँ वनस्पति की वृि अच्छी हो। अतः इन क्षेत्रों में मृत जैव पदाथर् बड़ी मात्रा में इकट्टेò हो जाते

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