प्रावृफतिक वनस्पति क्या आप कभी पिकनिक के लिए जंगल गए हैं? अगर आप शहर में रहते हैं तो अवश्य ही पावर्फ गए होंगे और अगर गाँव में रहते हैं तो आमए अमरूद या नारियल के बगीचे में गए होंगे। आप प्रावृफतिक और मानव रोपित वनस्पति में वैफसे अंतर करते हैं, जो पौधा जंगल में प्रावृफतिक परिस्िथतियों में पफलता - पूफलता हैए वही पेड़ आपके बगीचे में मानव देख - रेख में उगाया जा सकता है। प्रावृफतिक वनस्पति से अभ्िाप्राय उसी पौधा समुदाय से है, जो लंबे समय तक बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के उगता है और इसकी विभ्िान्न प्रजातियाँ वहाँ पाइर् जाने वाली मिट्टðी और जलवायु परिस्िथतियों में यथासंभव स्वयं को ढाल लेती हैं। भारत में विभ्िान्न प्रकार की प्रावृफतिक वनस्पति पाइर् जाती है। हिमालय पवर्तों पर शीतोष्ण कटिबंधीय वनस्पति उगती हैऋ पश्िचमी घाट तथा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में उष्ण कटिबंधीय वषार् वन पाए जाते हैंऋ डेल्टा क्षेत्रों में उष्ण कटिबंधीय वन व मैंग्रोव तथा राजस्थान के मरुस्थलीय और अधर् - मरुस्थलीय क्षेत्रों में विभ्िान्न प्रकार की झाडि़याँए वैफक्टस और कांटेदार वनस्पति पाइर् जाती है। मिट्टðी और जलवायु में विभ्िान्नता के कारण भारत में वनस्पति में क्षेत्राीय विभ्िान्नताएँ पाइर् जाती हैं। प्रमुख वनस्पति प्रकार तथा जलवायु परिस्िथति के आधार पर भारतीय वनों को निम्न प्रकारों में बाँटा जा सकता है: वनों के प्रकार ;पद्ध उष्ण कटिबंधीय सदाबहार एवं अधर् - सदाबहार वन अध्याय ;पपद्ध उष्ण कटिबंधीय पणर्पाती वन ;पपपद्ध उष्ण कटिबंधीय काँटेदार वन ;पअद्ध पवर्तीय वन ;अद्ध वेलांचली व अनूप वन उष्ण कटिबंधीय सदाबहार एवं अधर् - सदाबहार वन ये वन पश्िचमी घाट की पश्िचमी ढाल परए उत्तर - पूवीर् क्षेत्रा की पहाडि़यों पर और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में पाए जाते हैं। ये उन उष्ण और आद्रर् प्रदेशों में पाए जाते हैं, जहाँ वा£षक वषार् 200 सेंटीमीटर से अिाक होती है और औसत वा£षक तापमान 22°सेल्िसयस से अिाक रहता है। उष्ण कटिबंधीय वन सघन और पतो± वाले होते हैंए जहाँ भूमि के नजदीक झाडि़याँ और बेलें होती हैंए इनके ऊपर छोटे कद वाले पेड़ और सबसे ऊपर लंबे पेड़ होते हैं। इन वनों में वृक्षों की लंबाइर् 60 मीटर या उससे भी अिाक हो सकती है। चूँकिए इन पेड़ों के पत्ते झड़नेए पूफल आने और पफल लगने का समय अलग - अलग हैए इसलिए ये वषर् भर हरे - भरे दिखाइर् देते हैं। इसमें पाइर् जाने वाले मुख्य वृक्ष प्रजातियाँ रोजवुडए महोगनीए ऐनी और एबनी हैं। चित्रा 5ण्1 रू सदाबहार वन भारत: भौतिक पयार्वरण इसमें मानव कल्याण की असीम संभावनाएँ निहित हैं। यद्यपि इस लक्ष्य को तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब हर व्यक्ित इसका महत्त्व समझे और अपना योगदान दे। यूनेस्को के ‘मानव और जीवमंडल योजना’ ;डंद ंदक ठपवेचीमतम च्तवहतंउउमद्ध के तहत भारत सरकार ने वनस्पति जात और प्राण्िा जात के संरक्षण के लिए महत्त्वपूणर् कदम उठाए हैं। प्रोजेक्ट टाइर्गर ;1973द्ध और प्रोजेक्ट एलीपेंफट ;1992द्ध जैसी विशेष योजनाएँ इन जातियों के संरक्षण और उनके आवास के बचाव के लिए चलायी जा रही हैं। इनमंे से प्रोजेक्ट टाइर्गर 1973 से चलाइर् जा रही है। इसका मुख्य उद्देश्य भारत में बाघों की जनसंख्या का स्तर बनाए रखना हैए जिससे वैज्ञानिकए सौन्दयार्त्मक सांस्वृफतिक और पारिस्िथतिक मूल्य बनाए रखे जा सवेंफ। इससे प्रावृफतिक धरोहर को भी संरक्षण मिलेगा जिसका लोगों को श्िाक्षा और मनोरंजन के रूप में पफायदा होगा। शुरू में यह योजना नौ बाघ निचयों ;आरक्ष्िात क्षेत्रोंद्ध में शुरू की गइर् थी और ये 16ए339 वगर् किलोमीटर पर पैफली थी। अब यह योजना 44 क्रोड बाघ निचयों में चल रही है और इनका क्षेत्रापफल 36ए988.28 वगर् किलोमीटर है और 17 राज्यों में व्याप्त है। देश में बाघों की संख्या 2006 में 1ए411 से बढ़कर 2010 में 1ए706 हो गइर्। चित्रा 5.7: अपने प्रावृफतिक आवास में हाथी यह योजना मुख्य रूप से बाघ वेंफदि्रत हैए परन्तु पिफर भी पारिस्िथतिक तंत्रा की स्िथरता पर जोर दिया जाता है। बाघों की संख्या का स्तर तभी ऊँचा रह सकता है जब पारिस्िथतिक तंत्रा के विभ्िान्न पोषण स्तरों और इसकी भोजन कड़ी को बनाए रखा जाए। इसके अलावा भारत सरकार द्वारा वुफछ और परियोजनाएँए जैसे - मगरमच्छ प्रजनन परियोजनाए हगुंल परियोजना और हिमालय कस्तूरी मृग परियोजना भी चलाइर् जा रही है। जीव मंडल निचय जीव मंडल निचय ;आरक्ष्िात क्षेत्राद्ध विशेष प्रकार के भौमिक और तटीय परिस्िथतिक तंत्रा हैं, जिन्हें यूनेस्को ;न्छम्ैब्व्द्ध के मानव और जीव मंडल प्रोग्राम ;ड।ठद्ध के अंतगर्त मान्यता प्राप्त है। जैसा कि आरेख 5.1 में दिखाया गया हैए जीव मंडल निचय के तीन मुख्य उद्देश्य हैं। भारत में 18 जीव मंडल निचय हैं ;परियोजना - 5.1द्ध। इनमें से 10 जीव मंडल निचय। यूनेस्को द्वारा जीव मंडल निचय विश्व नेटववर्फ पर मान्यता प्राप्त हैं। चित्रा 5.8: जीव मंडल निचय के उद्देश्य नीलगिरी जीव मंडल निचय इसकी स्थापना 1986 में हुइर् थी और यह भारत का पहला जीव मंडल निचय है। इस निचय में वायनाड वन्य जीवन सुरक्ष्िात क्षेत्राए नगरहोलए बांदीपुर और मदुमलाइर्ए निलंबूर का सारा वन से ढका ढालए ऊपरी नीलगिरी पठारए सायलेंट वैली और सिदुवानी पहाडि़याँ शामिल हैं। इस जीव मंडल निचय का वुफल क्षेत्रा 5ए520 वगर् किलोमीटर है। भारत: भौतिक पयार्वरण नीलगिरी जीव मंडल निचय में विभ्िान्न प्रकार के आवास और मानव िया द्वारा कम प्रभावित प्रावृफतिक वनस्पति व सूखी झाडि़याँए जैसे - शुष्क और आद्रर् पणर्पाती वनए अधर् - सदाबहार और आद्रर् सदाबहार वनए सदाबहार शोलासए घास के मैदान और दलदल शामिल हैं। यहाँ पर दो संकटापन्न प्राणी प्रजातियोंए नीलगिरी ताहर ;ज्ंीतद्ध और शेर जैसी दुम वाले बंदर की सबसे अिाक संख्या पाइर् जाती है। नीलगिरी निचय में हाथीए बाघए गौरए सांभर और चीतल जानवरों की दक्ष्िाण भारत में सबसे ज्यादा संख्या तथा वुफछ संकटापन्न और क्षेत्राीय विशेष पौधे पाए जाते हैं। इस क्षेत्रा में वुफछ ऐसी जनजातियों के आवास भी स्िथत हैं, जो पयार्वरण के साथ सामंजस्य करके रहने के लिए विख्यात हैं। इस जीव मंडल की स्थलावृफति उबड़ - खाबड़ है और समुद्र तल से ऊँचाइर् 250 मीटर से 2ए650 मीटर तक है। पश्िचम घाट में पाए जाने वाले 80 प्रतिशत पूफलदार पौधे इसी निचय में मिलते हैं। नंदा देवी जीव मंडल निचय नंदा देवी जीव मंडल निचय उत्तराखंड में स्िथत है, जिसमें चमोलीए अल्मोड़ाए पिथौरागढ़ और बागेश्वर जिलों के भाग शामिल हैं। यहाँ पर मुख्यतः शीतोष्ण कटिबंधीय वन पाए जाते हैं। यहाँ पाइर् जाने वाली प्रजातियों में सिल्वर वुड तथा लैटीपफोली जैसे ओरचिड और रोडोडेंड्राॅन शामिल हैं। उस जीव मंडल निचय में कइर् प्रकार के वन्य जीवए जैसे - हिम तंेदुआ ;ैदवू समवचंतकद्धए काला भालूए भूरा भालूए कस्तूरी मृगए हिम - मुगार्ए सुनहरा बाज और काला बाज पाए जाते हैं। तालिका 5.1: जीव मंडल निचयों की सूची क्र.जीव मंडल निचय का नाम एवं संवुफल भौगोलिक क्षेत्रा ;वगर् कि.मी. मेंद्ध 1ण् नीलगिरी ;5520द्ध 2ण् नंदा देवी ;5860.69द्ध 3ण् नोकरेक ;820द्ध 4ण् मानस ;2837द्ध 5ण् सुंदर वन ;9630द्ध 6ण् मÂार की खाड़ी ;10500द्ध 7ण् ग्रेट निकोबार ;885द्ध 8ण् सिमिलीपाल ;4374द्ध 9ण् डिब्रू - साइर्कोवा ;765द्ध 10ण् दिहांग - देबाँग ;5111.5द्ध 11ण् पंचमढ़ी ;4981.72द्ध 12ण् वंफचनजंुगा ;2619.92द्ध 13ण् अगस्त्यमलाइर् ;3500.36द्ध 14ण् अचनकमर - अमरकटंक ;3835.51द्ध 15ण् कच्छ ;12,454द्ध 16ण् ठंडा रेगिस्तान ;7770द्ध 17ण् शेष अचलम ;4755.997द्ध 18ण् पन्ना ;2998.98द्ध नामित तिथ्िा 01ण्08ण्1986 18ण्01ण्1988 01ण्09ण्1988 14ण्03ण्1989 29ण्03ण्1989 18ण्02ण्1989 06ण्01ण्1989 21ण्06ण्1994 28ण्07ण्1997 02ण्09ण्1998 03ण्03ण्1999 07ण्02ण्2000 12ण्11ण्2001 30ण्03ण्2005 29ण्01ण्2008 28ण्08ण्2009 20ण्09ण्2010 25ण्08ण्2011 स्िथति ;प्रांतद्ध वायनादए नगरहोलए बांदीपुरए मुदुमलाइर्ए निलंबूरए सायलेंट वैली और सिरुवली पहाडि़याँ ;तमिलनाडुए केरल और कनार्टकद्ध चमोलीए पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा जिलों के भाग ;उत्तराखंडद्ध गारो पहाडि़यों का हिस्सा ;मेघालयद्ध कोकराझारए बोगाइर् गाँवए बरपेटाए नलबाड़ी कामरूप व दारांग जिलों के हिस्से ;असमद्ध गंगा - ब्रह्मपुत्रा नदी तंत्रा का डेल्टा व इसका हिस्सा ;पश्िचम बंगालद्ध तमिलनाडु के उत्तर में रामेश्वरम द्वीप से दक्ष्िाण में कन्यावुफमारी तक विस्तृत मन्नार की खाड़ी का भारतीय भाग अंडमान - निकोबार के सुदूर दक्ष्िाणी द्वीप ;अंडमान निकोबार द्वीप समूहद्ध मयूरभंज जिले के भाग ;उड़ीसाद्ध डिब्रूगढ़ और तिनसुकिया जिलों के भाग ;असमद्ध अरुणाचल प्रदेश में सियाँग और देबाँग जिलों के भाग बेतूलए होशंगाबाद और छिंदवाड़ा जिलों के भाग ;मध्य प्रदेशद्ध उत्तर और पश्िचम सिक्िकम के भाग केरल में अगस्त्यथीमलाइर् पहाडि़याँ मध्य प्रदेश में अनुपुर और दिन दोरी जिलों के भाग और छत्तीसगढ़ में बिलासपुर जिले का भाग कच्छ का भाग, एवं गुजरात के राजकोट, सुंदर नगर तथा पाटन जिले पिन वैली नेशनल पावर्फ एवं प्रतिवेश, चंद्रताल तथा सारचूऋ एवं किब्बर वन्य प्राणी अभयवन, हिमाचल प्रदेश पूवीर् घाट में शेष अचलम की पहाडि़याँ तथा आंध््र प्रदेश में चितूर तथा कड्डप्पा िालों के भाग मध्य प्रदेश में पन्ना एवं छत्तरपुर िालों के भाग ’ मोटे अक्षरों में लिखे क्षेत्रों को यूनेस्को के बी.आर. वल्डर् नेटववर्फ में सम्िमलित किया गया है। ड्डोत: वाष्िार्क रिपोटर् 2013 - 14, पयार्वरण एवं वन मंत्रालय, भारत सरकार

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