अध्याय आप गमिर्यों में ज्यादा पानी पीते हैं। आपके गमिर्यों के वस्त्रा सदिर्यों के वस्त्रों से अलगहोते हैं। उत्तरी भारत में आप गमिर्यों में हल्केवस्त्रा और सदिर्यों में ऊनी वस्त्रा क्यों पहनते हैं? दक्ष्िाणीभारत में ऊनी वस्त्रों की शरूरत नहीं होती। उत्तर - पूवीर् राज्यों में पहाडि़यों को छोड़कर सदिर्याँ मृदु होती हैं। विभ्िान्न )तुओं में मौसम की दशाओं में भ्िान्नता पायीजाती है। यह भ्िान्नता मौसम के तत्त्वों ;तापमान, वायुदाब, पवनों की दिशा एवं गति, आद्रर्ता और वषर्ण इत्यादिद्ध में परिवतर्न से आती है। मौसम वायुमंडल की क्षण्िाक अवस्था है, जबकिजलवायु का तात्पयर् अपेक्षाकृत लंबे समय की मौसमी दशाओं के औसत से होता है। मौसम जल्दी - जल्दी बदलता है, जैसे कि एक दिन में या एक सप्ताह में, परंतु जलवायु में बदलाव 50 अथवा इससे भी अिाक वषो± में आता है। अपनी पहले की कक्षाओं में आप मानसून के बारे में पढ़ चुके हैं। आपको ‘मानसून’ शब्द का अथर् भी ज्ञात है। मानसून से अभ्िाप्राय ऐसी जलवायु से है, जिसमें )तु के अनुसार पवनों की दिशा में उत्क्रमण हो जाता है। भारत की जलवायु उष्ण मानसूनी है, जो दक्ष्िाणी एवं दक्ष्िाणी - पूवीर् एश्िाया में पायी जाती है। मानसून जलवायु में एकरूपता एवं विविधता मानसून पवनों की व्यवस्था भारत और दक्ष्िाण - पूवर् एश्िाया के बीच एकता को बल प्रदान करती है। मानसून जलवायु जलवायु की व्यापक एकता के इस दृिकोण से किसी को भी जलवायु की प्रादेश्िाक भ्िान्नताओं की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। यही भ्िान्नता भारत के विभ्िान्न प्रदेशों के मौसम और जलवायु को एक - दूसरे से अलग करती है। उदाहरण के लिए दक्ष्िाण में केरल तथा तमिलनाडु कीजलवायु उत्तर में उत्तर प्रदेश तथा बिहार की जलवायु से अलग है। पिफर भी इन सभी राज्यों की जलवायु मानसून प्रकार की है। भारत की जलवायु में अनेक प्रादेश्िाक भ्िान्नताएँ हैं जिन्हें पवनों के प्रतिरूप, तापक्रम और वषार्, )तुओं की लय तथा आद्रर्ता एवं शुष्कता की मात्रा में भ्िान्नता के रूप में देखा जा सकता है। इन प्रादेश्िाक विविधताओं का जलवायु के उपवगो± के रूप में वणर्न किया जा सकता है। आइए! अब हम तापमान, पवनों तथा वषार् की इन प्रादेश्िाक विविधताओं का शरा गौर से अवलोकन करें। गमिर्यों में पश्िचमी मरुस्थल में तापक्रम कइर् बार 55° सेल्िसयस को स्पशर् कर लेता है। जबकि सदिर्यों में लेह के आसपास तापमान - 45° सेल्िसयस तक गिर जाता है। राजस्थान के चुरू जिले में जून के महीने के किसी एक दिन का तापमान 50° सेल्िसयस अथवा इससे अिाक हो जाता है, जबकि उसी दिन अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले में तापमान मुश्िकल से 19° सेल्िसयस तक पहुँचता है। दिसंबर की किसी रात में जम्मू और कश्मीर के द्रास में रात का तापमान - 45° सेल्िसयस तक गिर जाता है, जबकि उसी रात को थ्िारुवनंथपुरम् अथवा चेन्नइर् में तापमान 20° सेल्िसयस या 22° सेल्ियसस रहता है। उपयुर्क्त उदाहरण पुि करते समुद्र तट से दूरीः लंबी तटीय रेखा के कारण भारत के विस्तृत तटीय प्रदेशों में समकारी जलवायु पायी जाती है। भारत के अंदरूनी भाग समुद्र के समकारी प्रभाव से वंचित रह जाते हैं। ऐसे क्षेत्रों में विषम जलवायु पायी जाती है। यही कारण है कि मुंबइर् तथा कोंकण तट के निवासी तापमान की विषमता और )तु परिवतर्न का अनुभव नहीं कर पाते। दूसरी ओर समुद्र तट से दूर देश के आंतरिक भागों में स्िथत दिल्ली, कानपुर और अमृतसर में मौसमी परिवतर्न पूरे जीवन को प्रभावित करते हैं। समुद्र तल से ऊँचाइर्: ऊँचाइर् के साथ तापमान घटता है। विरल वायु के कारण पवर्तीय प्रदेश मैदानों की तुलना में अिाक ठंडे होते हैं। उदाहरणतः आगरा और दाजिर्लिंग एक ही अक्षांश पर स्िथत हैं ¯कतु जनवरी में आगरा का तापमान 16° सेल्िसयस जबकि दा£जलिंग में यह 4° सेल्िसयस होता है। उच्चावचः भारत का भौतिक स्वरूप अथवा उच्चावच तापमान, वायुदाब, पवनों की गति एवं दिशा तथा ढाल की मात्रा और वितरण को प्रभावित करता है। उदाहरणतः जून और जुलाइर् के बीच पश्िचमी घाट तथा असम के पवनाभ्िामुखी ढाल अिाक वषार् प्राप्त करते हैं जबकि इसी दौरान पश्िचमी घाट के साथ लगा दक्ष्िाणी पठार पवनविमुखी स्िथति के कारण कम वषार् प्राप्त करता है। वायुदाब एवं पवनों से जुड़े कारक भारत की स्थानीय जलवायुओं में पायी जाने वाली विविधता को समझने के लिए निम्नलिख्िात तीन कारकों की िया - वििा को जानना आवश्यक है। ;पद्ध वायुदाब एवं पवनों का धरातल पर वितरण, ;पपद्ध भूमंडलीय मौसम को नियंत्रिात करने वाले कारकों एवं विभ्िान्न वायु संहतियों एवं जेट प्रवाह केअंतवार्ह द्वारा उत्पन्न ऊपरी वायुसंचरण और ;पपपद्ध शीतकाल में पश्िचमी विक्षोभों तथा दक्ष्िाण - पश्िचमी मानसून काल में उष्ण कटिबंधीय अवदाबों के भारत में अंतवर्हन के कारण उत्पन्न वषार् की अनुवूफल दशाएँ। भारत: भौतिक पयार्वरण उपयुर्क्त तीन कारकों की िया - वििा को शीत व ग्रीष्म )तु के संदभर् में अलग - अलग भली - भाँति समझा जा सकता है। शीत)तु में मौसम की ियावििा धरातलीय वायुदाब तथा पवनेंः शीत )तु में भारत का मौसम मध्य एवं पश्िचम एश्िाया में वायुदाब के वितरणसे प्रभावित होता है। इस समय हिमालय के उत्तर में तिब्बत पर उच्च वायुदाब वंेफद्र स्थापित हो जाता है। इस उच्च वायुदाब वेंफद्र के दक्ष्िाण में भारतीय उपमहाद्वीप की ओर निम्न स्तर पर धरातल के साथ - साथ पवनों का प्रवाह प्रारंभ हो जाता है। मध्य एश्िाया के उच्च वायुदाब वंेफद्र से बाहर की ओर चलने वाली धरातलीय पवनें भारत में शुष्क महाद्वीपीय पवनों के रूप में पहुुँचती हैं।ये महाद्वीपीय पवनें उत्तर - पश्िचमी भारत में व्यापारिक पवनों के संपवर्फ में आती हैं। लेकिन इस संपवर्फ क्षेत्रा की स्िथति स्थायी नहीं है। कइर् बार तो इसकी स्िथति ख्िासककर पूवर् में मध्य गंगा घाटी के ऊपर पहुँच जाती है।परिणामस्वरूप मध्य गंगा घाटी तक संपूणर् उत्तर - पश्िचमीतथा उत्तरी भारत इन शुष्क उत्तर - पश्िचमी पवनों के प्रभाव में आ जाता है। जलवायु भारत के जलवायु प्रदेश भारत की जलवायु मानसून प्रकार की है तथापि मौसमके तत्त्वों के मेल से अनेक क्षेत्राीय विभ्िान्नताएँ प्रदश्िार्त होती हंै। यही विभ्िान्नताएँ जलवायु के उप - प्रकारों में देखी जा सकती हैं। इसी आधर पर जलवायु प्रदेश पहचाने जा सकते हंै। एक जलवायु प्रदेश में जलवायवी दशाओं की समरूपता होती है, जो जलवायु के कारकों के संयुक्त प्रभाव से उत्पन्न होती है। तापमान और वषार्जलवायु के दो महत्त्वपूणर् तत्त्व हैं, जिन्हें जलवायु वगीर्करण की सभी प(तियों में निणार्यक माना जाता है। तथापि जलवायु का वगीर्करण एक जटिल प्रिया है। जलवायु के वगीर्करण की अनेक प(तियाँ हैं। कोपेन की प(ति पर आधारित भारत की जलवायु के प्रमुख प्रकारों का वणर्न अग्रलिख्िात है। कोपेन ने अपने जलवायु वगीर्करण का आधार तापमान तथा वषर्ण के मासिक मानों को रखा है। उन्होंने जलवायु के पाँच प्रकार माने हैं, जिनके नाम हंै: ;पद्ध उष्ण कटिबंधीय जलवायु, जहाँ सारा साल औसत मासिक तापमान 18° सेल्िसयस से अिाक रहता हैऋ ;पपद्ध शुष्क जलवायु, जहाँ तापमान की तुलना में वषर्ण बहुत कम होता है और इसलिए शुष्क है। शुष्कता कम होने पर यह अधर् - शुष्क मरुस्थल ;ैद्ध कहलाता हैऋ शुष्कता अिाक है तो यह मरुस्थल ;ॅद्ध होता है। ;पपपद्ध गमर् जलवायु, जहाँ सबसे ठंडे महीने का औसत तापमान 18° सेल्िसयस और - 3° सेल्िसयस के बीच रहता हैऋ ;पअद्ध हिम जलवायु, जहाँ सबसे गमर् महीने का औसत तापमान 10° सेल्िसयस से अिाक और सबसे ठंडे महीने का औसत तापमान - 3° सेल्िसयस से कम रहता हैऋ ;अद्ध बपफीर्ली जलवायु, जहाँ सबसे गमर् महीने का तापमान 10° सेल्िसयस से कम रहता है। कोपेन ने जलवायु प्रकारों को व्यक्त करने के लिएवणर् संकेतों का प्रयोग किया है, जैसा कि ऊपर बताया गया है। वषार् तथा तापमान के वितरण प्रतिरूप में मौसमी भ्िान्नता के आधार पर प्रत्येक प्रकार को उप - प्रकारों में बाँटा गया है। कोपेन ने अंग्रेजी के बड़े वणो± ै को अधर् - मरुस्थल के लिए और ॅ को मरुस्थल के लिए प्रयोग किया है। इसी प्रकार उप - विभागों को व्यक्त करने के लिए अंग्रेजी के निम्नलिख्िात छोटे वणो± का प्रयोग किया गया है। जैसे ि;पयार्प्त वषर्णद्धए उ ;शुष्क मानसून होते हुए भी वषार् वनद्ध, ू ;शुष्क शीत )तुद्धएी ;शुष्क और गमर्द्ध, ब ;चार महीनों से कम अविा में औसत तापमान 10ú सेल्िसयस से अिाकद्ध और ह ;गंगा का मैदानद्ध। इस प्रकार भारत को आठ जलवायु प्रदेशों में बाँटा जा सकता है ;सारणी 4.1, चित्रा 4.13द्ध। मानसून और भारत का आथ्िार्क जीवन ;पद्ध मानसून वह धुरी है जिस पर समस्त भारत का जीवन - चक्र घूमता हैए क्योंकि भारत की 64 प्रतिशत जनता भरण - पोषण के लिए खेती पर निभर्र करती है, जो मुख्यतः दक्ष्िाण - पश्िचमी मानसून पर आधारित है। ;पपद्ध हिमालयी प्रदेशों के अतिरिक्त शेष भारत में वषर् भर यथेष्ट गमीर् रहती हैए जिससे सारा साल खेती की जा सकती है। ;पपपद्ध मानसून जलवायु की क्षेत्राीय विभ्िान्नता नाना प्रकार की पफसलों को उगाने में सहायक है। ;पअद्ध वषार् की परिवतर्नीयता देश के वुफछ भागों में सूखा अथवा बाढ़ का कारण बनती है। ;अद्ध भारत में कृष्िा की समृि वषार् के सही समय पर आने तथा उसके पयार्प्त वितरित होने पर निभर्रकरती है। यदि वषार् नहीं होती तो कृष्िा पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ सिंचाइर् के साधन विकसित नहीं हैं। ;अपद्ध मानसून का अचानक प्रस्पफोट देश के व्यापक क्षेत्रों में मृदा अपरदन की समस्या उत्पन्न कर देता है। ;अपपद्ध उत्तर भारत में शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों द्वारा होने वाली शीतकालीन वषार् रबी की पफसलों के लिए अत्यंत लाभकारी सि( होती है। ;अपपपद्धभारत की जलवायु की क्षेत्राीय विभ्िान्नता भोजन, वस्त्रा और आवासों की विविधता में उजागर होती है।

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