स्थलावृफतिक मानचित्रा घाटी: यह दो पहाडि़यों या कटकों के बीच भूमि का निम्न क्षेत्रा है, जो एक नदी या हिमानी के पाश्वर् अपरदन के परिणामस्वरूप बनती है। ट आकार की घाटी न् आकार की घाटी भूगोल में प्रयोगात्मक कायर् भूगोल में प्रयोगात्मक कायर् होने वाले रूढ़ चिÉों तथा प्रतीकों को दशार्या जाता है। ये रूढ़ चिÉ एवं प्रतीक पूरे विश्व में स्वीवृफत हैं, कोइर् भी व्यक्ित विश्व में कहीं भी बिना उस देश की भाषा जाने भी इन मानचित्रों को पढ़ सकता है। सामान्यतः जिन शीषर्कों के अंतगर्त स्थलावृफतिक मानचित्रों की व्याख्या की जाती है, वे हैं: ;कद्ध उपांत सूचनाएँ ;खद्ध उच्चावच एवं अपवाह ;गद्ध भूमि उपयोग ;घद्ध यातायात तथा संचार के साधन ;घद्ध मानव बस्ितयाँ उपांत सूचनाएँ: मानचित्रा की सीमाओं पर लिखी गइर् सूचनाओं को उपांत सूचनाएँ कहते हैं। इसमें स्थलावृफतिक शीट संख्या, इसकी स्िथति, डिग्री एवं मिनट में इसका विस्तार, मापनी एवं सम्िमलित जिले, आदि की सूचनाएँ होती हैं। क्षेत्रा का उच्चावच: इसमें किसी क्षेत्रा के सामान्य स्थलावृफति का अध्ययन मैदानों, पठारों, पहाडि़यों या पवर्तों को उनके श्िाखरों, टीलों एवं ढाल की दिशा के साथ किया जाता है। इन आवृफतियों को निम्नलिख्िात वगो± के अंतगर्त पढ़ा जाता है: ऽ पहाड़ी: अवतल, उत्तल, सीध या मंद ढाल तथा आकार के साथ ऽ पठार: यह चैड़ा, संकरा, चपटा, तरंगित अथवा कटा - पफटा है या नहीं। ऽ मैदान: इसके प्रकार यानि, जलोढ़, हिमानी, कास्टर्, तटीय, कच्छ इत्यादि। ऽ पवर्त: सामान्य उफँचाइर्, श्िाखर, दरेर् इत्यादि। क्षेत्रा का अपवाह: महत्त्वपूणर् नदियाँ एवं उनकी सहायक नदियाँ तथा उनके द्वारा बनाए गए घाटियों के प्र्रकार एवं विस्तार। उनके द्वारा बनाए गए अपवाह तंत्रा, जैसे - द्रुमावृफतिक, अरीय, वलय, जालीनुमा एवं आंतरिक इत्यादि की व्याख्या की जाती है। भूमि उपयोग: इसमें विभ्िान्न प्रकारों से भूमि उपयोगों का विश्लेषण किया जा सकता है, जैसे - ऽ प्रावृफतिक वनस्पति एवं वन ;कौन - सा क्षेत्रा वनाच्छादित है, यह वन घना है या विरल तथा वन के वगर्, जैसे - यह संरक्ष्िात, वगीर्वृफत या अवगीर्वृफत हैद्ध। ऽ वृफष्िागत्, पफलोद्यान, बंजर भूमि, औद्योगिक इत्यादि। ऽ सुविधाएँ एवं सेवाएँ, जैसे - विद्यालय, महाविद्यालय, चिकित्सालय, पाकर्, हवाइर्अîेó, विद्युत उपवेंफद्र इत्यादि। यातायात एवं संचार: यातायात के साधनों के अंतगर्त राष्ट्रीय तथा राज्य महामागर्, जिला सड़वेंफ, रथ्या, उँफटों के रास्ते, पगडंडी, रेलवे, जल मागर्, मुख्य संचार साधन, डाकघर इत्यादि। बस्ितयाँ: निम्नलिख्िात शीषर्कों में बस्ितयों का अध्ययन किया जाता है - स्थलावृफतिक मानचित्रा ऽ ग्रामीण बस्ितयाँ: ग्रामीण बस्ितयों के प्रकार, जैसे - संहत, प्रकीणर्, रैख्िाक इत्यादि। ऽ नगरीय बस्ितयाँ: नगरीय बस्ितयों के प्रकार एवं उनके कायर्, जैसे - राजधानी नगर, प्रशासनिक नगर, धा£मक नगर, पत्तन नगर, पवर्त नगर इत्यादि। व्यवसाय: किसी क्षेत्रा के लोगों के सामान्य व्यवसाय को वहाँ के भूमि उपयोग तथा बस्ितयों के प्रकार के द्वारा पहचाना जा सकता है। उदाहरण के लिए, ग्रामीण क्षेत्रों में अिासंख्य लोगों का मुख्य व्यवसाय खेती होता है, आदिवासी क्षेत्रों में लकड़ी काटना एवं प्रारंभ्िाक खेती की अिाकता होती है तथा तटीय क्षेत्रों में मछली पकड़ने का कायर् किया जाता है। इसी प्रकार शहरों एवं नगरों में सेवाएँ तथा व्यापार लोगों का मुख्य पेशा है। मानचित्रा निवर्चन वििा मानचित्रा निवर्चन में उन कारकों का अध्ययन शामिल है, जो मानचित्रा पर दिखाए गए अनेक लक्षणों के बीच संबंधों को समझने में सहायता करते हैं। उदाहरण के लिए, स्थलावृफतिक मानचित्रों पर प्रावृफतिक वनस्पतियों के वितरण तथा वृफष्िा के अंतगर्त क्षेत्रों को भू - आवृफतियों एवं अपवाह तंत्रा की पृष्ठ भूमि में ठीक से समझ सकते हैं। इसी प्रकार बस्ितयों के वितरण को परिवहन के साधनों एवं स्थलावृफतियों के द्वारा पहचाना जा सकता है। निम्नलिख्िात चरण मानचित्रों की व्याख्या में सहायता प्रदान करेंगे: ऽ स्थलावृफतिक मानचित्रा में स्थलावृफतिक शीट सूचक संख्या के अनुसार भारत में इसकी अवस्िथति ज्ञात की जा सकती है। इससे बृहत एवं मध्यम स्तर वाले भू - आवृफतिक विभागों की भी सामान्य विशेषताओं की जानकारी मिलती है। मानचित्रा के मापनी तथा समोच्च अंतरालों को देख्िाए, जो आपको एक क्षेत्रा की सामान्य स्थलावृफति एवं उसके विस्तार को बताता है। ऽ ट्रे¯सग कागज पर निम्नलिख्िात लक्षणों को उतारिए: ;कद्ध मुख्य स्थलावृफतियाँ - समोच्च रेखाओं एवं भौगोलिक लक्षणों द्वारा दिखाए गए। ;खद्ध अपवाह एवं जलीय लक्षण - मुख्य नदी एवं उसकी महत्त्वपूणर् सहायक नदियाँ। ;गद्ध भूमि उपयोग, जैसे - वन, वृफष्िागत् भूमि, बेकार भूमि, पशु विहार, पावर्फ, विद्यालय इत्यादि। ;घद्ध बस्ितयाँ एवं परिवहन प्रतिरूप। ऽ प्रत्येक लक्षण के वितरण प्रतिरूप का वणर्न सबसे महत्त्वपूणर् पक्षों की ओर ध्यान आक£षत करते हुए अलग - अलग कीजिए। ऽ एक समय में मानचित्रों के एक जोड़े को अध्यारोपित करके, यदि किन्हीं दो प्रारूपों के बीच कोइर् संबंध है, तो उसे लिख्िाए। उदाहरण के लिए, अगर एक समोच्च मानचित्रा भूमि उपयोग से मिल जाता है, तो ढाल के डिग्री एवं उपयोग में आने वाली भूमि के बीच संबंध को बताएगा। एक ही क्षेत्रा के हवाइर् चित्रों तथा उपग्रही प्रति¯बबों की तुलना उस क्षेत्रा के स्थलावृफतिक मानचित्रा के द्वारा की जा सकती है।

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अध्याय 5


स्थलाकृतिक मानचित्र


आप जानते हैं कि मानचित्र एक महत्त्वपूर्ण भौगोलिक उपकरण है। आप यह भी जानते हैं कि मानचित्रों का वर्गीकरण उनकी मापनी एवं कार्यों के आधार पर होता है। अध्याय 1 में उल्लेखित स्थलाकृतिक मानचित्र भूगोलवेत्ताओं के लिए बहुत-ही अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। इस मानचित्र को आधार मानकर सभी मानचित्र बनाए जाते हैं।

स्थलाकृतिक मानचित्र, जिसे सामान्य उपयोग वाले मानचित्रों के नाम से भी जाना जाता है, को आपेक्षिक बृहत मापनी पर बनाया जाता है। इन मानचित्रों में महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक लक्षणों, जैसे- उच्चावच, वनस्पति, जलाशय, कृषिगत भूमि, बस्तियों एवं परिवहन तंत्र आदि को प्रदर्शित किया जाता है। ये मानचित्र सभी देशों की राष्ट्रीय मानचित्र संगठनों द्वारा तैयार एवं प्रकाशित किए जाते हैं। उदाहरण के लिए, भारतीय सर्वेक्षण विभाग, भारत में, पूरे देश के लिए स्थलाकृतिक मानचित्र तैयार करता है। स्थलाकृतिक मानचित्र विभिन्न मापनियों पर मानचित्र शृंखला के रूप में तैयार किए जाते हैं। इसलिए दी हुई शृंखला के सभी मानचित्रों में एक ही प्रकार के संदर्भ बिंदु, मापनी, प्रक्षेप, रूढ़ चिह्नों तथा रंगों का प्रयोग किया जाता है।

भारत में स्थलाकृतिक मानचित्र दो शृंखलाओं में तैयार किए जाते हैं - भारत एवं पड़ोसी देशों की शृंखला तथा विश्व के अंतर्राष्ट्रीय मानचित्रों की शृंखला।

भारत एवं उसके पड़ोसी देशों की शृंखला :

सन् 1937 में दिल्ली सर्वेक्षण सम्मेलन होने तक भारत एवं उसके पड़ोसी देशों की शृंखला वाले मानचित्रों का निर्माण भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा किया जाता था। उसके बाद, पड़ोसी देशों वाले मानचित्रों का निर्माण बंद कर दिया गया तथा भारत का सर्वेक्षण विभाग केवल विश्व के अंतरराष्ट्रीय मानचित्रों वाली शृंखला के विनिर्देशों के आधार पर भारत के स्थलाकृतिक मानचित्रों का निर्माण एवं प्रकाशन करने लगा। परंतु भारतीय सर्वेक्षण विभाग ने स्थलाकृतिक मानचित्रों के लिए नयी शृंखला के अंतर्गत छोड़ दी गई भारत और पड़ोसी देशों की शृंखला के संख्यात्मक प्रणाली और विन्यास को अभिधारण किया है।

भारत का स्थलाकृतिक मानचित्र 1:10,00,000, 1: 2,50,000, 1:1,25,000, 1:50,000 तथा 1:25,000 की मापनी पर तैयार किया जाता है, जिसमें अक्षांशीय एवं देशांतरीय मान क्रमश: 4° × 4°, 1° × 1°, 30' × 30', 15' × 15' तथा 5' × 7'30'' होते हैं। इनमें से प्रत्येक मानचित्र की संख्यात्मक प्रणाली को चित्र 5.1 में दिखाया गया है।


शब्दावली

अनुप्रस्थ परिच्छेद : किसी सरल रेखा पर ऊर्ध्वाधर कटी हुई भूमि का पार्श्वचित्र। इसे परिच्छेद अथवा परिच्छेदिका भी कहते हैं।

समोच्च रेखा: समुद्र तल से समान ऊँचाई पर स्थित बिंदुओं को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा। इसे समतल रेखा भी कहते हैं।

समोच्चरेखीय अंतराल: दो उत्तरोत्तर समोच्च रेखाओं के बीच का अंतर। इसे ऊर्ध्वाधर अंतराल भी कहते हैं। यह प्रायः अंग्रेज़ी के अक्षरों द्वारा लिखा जाता है। किसी भी मानचित्र पर प्राय: इसका मान स्थिर होता है।

स्थलाकृतिक मानचित्र: भू सतह के प्राकृतिक एवं मानवकृत ब्यौरों को प्रदर्शित करने वाला, बड़ी मापनी पर खींचा गया, एक छोटे क्षेत्र का मानचित्र। इस मानचित्र पर उच्चावच समोच्च रेखाओं द्वारा प्रकट किया जाता है।

हैश्यूर: मानचित्र पर समोच्च रेखाओं को लंबवत् काटती हुई महत्तम ढाल की दिशा में खींची गई छोटी सरल रेखाएँ। ये भूमि के ढाल में अंतरों का बोध भी कराती हैं।


विश्व की अंतरराष्ट्रीय मानचित्र शृंखला: विश्व की अंतरराष्ट्रीय मानचित्र शृंखला के अंतर्गत स्थलाकृतिक मानचित्र बृहत मापनी पर पूरे विश्व के लिए 1:10,00,000 अथवा 1:2,50,000 की मापनी पर मानकीकृत मानचित्र तैयार करने के लिए अभिकल्पित (डिज़ाईन) किए जाते हैं।

स्थलाकृतिक मानचित्र पठन: स्थलाकृतिक मानचित्रों का अध्ययन आसान होता है। इसके लिए पाठक को मानचित्रों पर दी गई निर्देशिका, रूढ़ चिह्न, प्रतीक एवं रंगों को जानना आवश्यक है। स्थलाकृतिक मानचित्रों पर दिए गए रूढ़ चिह्नों एवं संकेतों को चित्र 5.2 में दिखाया गया है।


चित्र 5.1: भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा प्रकाशित स्थलाकृतिक शीट का संदर्भ मानचित्र


डाकघर, थाना..........................................

सड़कें, पक्कीः महत्त्वानुसार, मील पत्थर..........................................

सड़कें, कच्चीः महत्त्वानुसार, पुल.............................................

रास्ता, लद्दू का, दर्रे सहित, पगडंडी, पुल सहित..........................................

नाले तल में मार्ग सहित, अनिश्चित, नहर...........................................

बाँध: चिना हुआ अथवा पत्थरों से पटा, मिट्टी से पटा, बंधिका..........................

नदी ः सूखी, धारा सहित, द्वीप और चट्टान सहित; ज्वारीय नदी.........................

दलदल: नद............................................

कूप: पक्का, कच्चा। सोता। तालाब: बारहमासी; अन्य.......................

पुश्ते: सड़क अथवा रेल की पटरी के..............................................

रेल की पटरीः चौड़ी लाइन, दोहरी; इकहरी स्टेशन सहित, निर्माणाधीन................

रेल की पटरी: अन्य लाइनें, दोहरी; इकहरी मील-पत्थर सहित, निर्माणाधीन......

हल्की रेलवे या ट्रामवे। तार। कटान सुरंग सहित ............................................

समोच्च-रेखाएँ, भृगु............................................

बालू के आकार (1) सपाट, (2) बालू के टिब्बे (पक्के), (3) बालू के टिब्बे (कच्चे)..

नगर अथवा गाँव: आबाद, उजाड़, गढ़............................................

झोपड़ियाँ: स्थाई, अस्थाई। मीनार। पुरातन अवशेष.......................................

मंदिर, छतरी, गिरजाघर, मस्ज़िद, ईदगाह, मकबरा, कब्रें..................................

प्रकाश स्तंभ। प्रकाशपोत। बोया: प्रकाशित, अप्रकाशित, लंगरगाह..............

खान, बेल, जाली पर चढ़ी, घास, झाड़...........................................

पनई ताड़, अन्य ताड़, शंकु जाति, बाँस, अन्य पेड़...........................................

सीमाः अंतर्राष्ट्रीय....................................

सीमा राज्यः सीमांकित, असीमांकित..................................

सीमा-ज़िलाः परगना, तहसील या ताल्लुक, वन..............................................

सीमा-स्तंभः सर्वेक्षित, अनुपलब्ध, गाँवों का त्रिसीमास्तंभ..................................

ऊँचाईः त्रिकोणीय, चांदे की बिंदु, सन्निकट......................................

तल चिह्न, ज्योडीय, तरशियरी, नहर, अन्य...........................................

डाकघर, तारघर, डाकतार घर, थाना...........................................

डाक या यात्री बंगला, निरीक्षण भवन, विश्राम गृह.............................................

सर्किट हाउस, पड़ाव...........................................

वन: आरक्षित, संरक्षित........................................




चित्र 5.2: रूढ़ चिह्न एवं प्रतीक



उच्चावच निरूपण विधियाँ

भूपृष्ठ समतल नहीं है तथा इसमें विभिन्न पर्वत, पहाड़ियाँ, पठार तथा मैदान हैं। भूपृष्ठ के उत्थान एवं अवनमन भौतिक लक्षणों या उच्चावच के रूप में जाने जाते हैं। इन लक्षणों को दर्शाने वाले मानचित्र को उच्चावच मानचित्र कहते हैं।

वर्षों से मानचित्रों पर उच्चावच लक्षण प्रदर्शित करने के लिए अनेक विधियों का उपयोग होता रहा है। ये विधियाँ हैं: हैश्यूर, पहाड़ी छायांकन, स्तर आभा, बेंच मार्क, स्थानिक ऊँचाई तथा समोच्च रेखाएँ। परंतु सभी स्थलाकृतिक मानचित्रों पर किसी क्षेत्र के उच्चावच को दिखाने के लिए समोच्च रेखा एवं स्थानिक ऊँचाइयों का सर्वाधिक उपयोग किया जाता है।


समोच्च रेखा

समोच्च रेखा माध्य समुद्र तल से समान ऊँचाई वाले बिंदुओं को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा होती है। वह मानचित्र, जो भू-आकृति को समोच्च रेखाओं द्वारा दर्शाता है, समोच्च रेखा मानचित्र कहलाता है। उच्चावच लक्षणों को समोच्च रेखा के द्वारा दर्शाना अत्यधिक उपयोगी एवं लोकप्रिय विधि है। मानचित्र पर समोच्च रेखाएँ एक क्षेत्र की स्थलाकृति को समझने की सबसे उपयोगी विधि है।

पहले स्थलाकृतिक मानचित्रों में समोच्च रेखाओं को खींचने के लिए धरातलीय सर्वेक्षण तथा तल-मापन विधि का उपयोग किया जाता था। लेकिन अब फ़ोटोग्राफ़ी के आविष्कार तथा वायव फ़ोटोग्राफ़ी से सर्वेक्षण तथा तल मापन एवं मानचित्रीकरण की पुरानी पद्धतियों का प्रयोग छोड़ दिया गया है। फलस्वरूप, स्थलाकृतिक मानचित्र बनाने के लिए इन फ़ोटोग्राफ़ का उपयोग होता है।

समोच्च रेखाएँ माध्य समुद्र तल के ऊपर विभिन्न ऊर्ध्वाधर अंतरालों (VI), जैसे- 20, 50, 100 मीटर पर खींची जाती हैं। इसे समोच्च रेखाओं का अंतराल कहा जाता है। दिए गए मानचित्र पर प्राय: यह नियत होता है। इसे सामान्यत: मीटर में व्यक्त किया जाता है। एक स्थान से दूसरे स्थान पर ढाल की प्रकृति के अनुसार दो समोच्च रेखाओं के बीच की क्षैतिजीय दूरी में अंतर होता है, जबकि उनके बीच का ऊर्ध्वाधर अंतराल अचल होता है। क्षैतिज दूरी, जिसे क्षैतिज तुल्यांक (HE) के नाम से भी जाना जाता है, मंद ढाल के लिए अधिक एवं तीव्र ढाल के लिए कम होती है।


समोच्च रेखाओं के कुछ मूल लक्षण:-

  • समोच्च रेखाएँ समान ऊँचाइयों वाले स्थान को दर्शाती हैं।
  • समोच्च रेखाएँ एवं उनकी आकृतियाँ स्थलाकृति के ढाल एवं ऊँचाई को दर्शाती हैं।
  • पास-पास खींची, अधिक घनी समोच्च रेखाएँ तीव्र ढाल को तथा दूर-दूर खींची हुई, कम घनी समोच्च रेखाएँ मंद ढाल को प्रदर्शित करती हैं।
  • दो या दो से अधिक समोच्च रेखाओं के एक-दूसरे से मिलने से ऊर्ध्वाधर वाली आकृतियाँ, जैसे- भृगु अथवा जलप्रपात प्रदर्शित होते हैं।
  • विभिन्न ऊँचाई वाली दो समोच्च रेखाएँ सामान्यतः एक-दूसरे को नहीं काटती हैं।

समोच्च रेखाओं एवं उनके अनुप्रस्थ परिच्छेद खींचना

हम जानते हैं कि सभी स्थलाकृतिक आकृतियों के ढाल अलग-अलग होते हैं। उदाहरण के लिए, एक समतल सतह का ढाल कम होता है तथा भृगु एवं महाखड्ड तीव्र ढाल वाले होते हैं। इसी प्रकार घाटियों एवं पर्वत शृंखलाओं में विभिन्न प्रकार की तीव्रता वाले ढाल होते हैं, जो खड़े ढाल से कम ढाल तक हो सकते हैं। इसलिए, ढालों को दर्शाने के कारण समोच्च रेखाओं के बीच का अंतर बहुत-ही अधिक महत्त्वपूर्ण होता है।


ढाल के प्रकार:

ढालों को मुख्यतः मंद, खड़ा, अवतल, उत्तल एवं तरंगित भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है। विभिन्न प्रकार के ढालों की समोच्च रेखा एक विशिष्ट अंतराल की पद्धति को दर्शाता है। ढाल को डिग्री या कोण में भी व्यक्त किया जाता है।


मंद ढाल:

जब किसी स्थलाकृति के ढाल की डिग्री या कोण बहुत कम होता है, तब ढाल मंद होता है। इस प्रकार की ढालों की समोच्च रेखाओं के बीच की दूरी बहुत अधिक होती है।


खड़ी ढाल:

जब किसी स्थलाकृति के ढाल का कोण अधिक होता है, तो इनकी समोच्च रेखाओं के बीच की आपसी दूरी बहुत कम होती है तथा ये खड़ी ढाल को इंगित करते हैं।





मंद ढाल
खड़ी ढाल

अवतल ढाल:

जब उच्चावच स्थलाकृति का निचला भाग मंद ढाल वाला एवं ऊपरी भाग खड़े ढाल वाला हो, तो उसे अवतल ढाल कहा जाता है। इस प्रकार के ढाल में समोच्च रेखाएँ निचले भाग में दूर-दूर तथा ऊपरी भाग में पास-पास होती हैं।


उत्तल ढाल:

अवतल ढाल के विपरीत, उत्तल ढाल का ऊपरी भाग मंद एवं निचला भाग खड़ा होता है। इसके परिणामस्वरूप ऊपरी भाग में समोच्च रेखाएँ दूर-दूर तथा निचले भाग मेें पास-पास होती हैं।






अवतल ढाल


उत्तल ढाल


स्थलाकृतियों के प्रकार


शंक्वाकार पहाड़ी

यह आसपास की भूमि से लगभग समान रूप से उठी होती है। एक शंक्वाकार, समान ढाल वाली पहाड़ी के लिए समोच्च रेखाएँ संकेंद्री एवं नियमित अंतराल पर होंगी।


पठार

एक विस्तृत चपटा उठा हुआ भूभाग, जिसकी ढाल अपेक्षाकृत पार्श्वों पर खड़ी होती है तथा जो आसपास के मैदान या समुद्र से ऊँची उठी होती है, पठार कहलाती है। पठारों को दर्शाने वाली समोच्च रेखाएँ सामान्यतः किनाराें पर पास-पास तथा भीतर की ओर दूर-दूर होती हैं।





शंक्वाकार पहाड़ी



पठार


घाटी:

यह दो पहाड़ियों या कटकों के बीच भूमि का निम्न क्षेत्र है, जो एक नदी या हिमानी के पार्श्व अपरदन के परिणामस्वरूप बनती है।


V आकार की घाटी

यह V अक्षर की तरह दिखाई देती है। V आकार की घाटी पर्वतीय क्षेत्रों में पायी जाती है। V आकार की घाटी का निचला भाग भीतरी समोच्च रेखाओं के द्वारा दिखाया जाता है, जो पास-पास स्थित होते हैं तथा जिनके समोच्च का मान कम होता है। बाहर की ओर स्थित समोच्च रेखाओं का मान एकसमान रूप से बढ़ता है।


U आकार की घाटी

ऊँचाई पर स्थित हिमानियों के पार्श्व अपरदन के कारण इस प्रकार की घाटी का निर्माण होता है। इसका निचला तल चौड़ा एवं चपटा तथा किनारे खड़े होते हैं, जिसके कारण इसका आकार U अक्षर के समान प्रतीत होता है। U आकार की घाटी के सबसे निचले हिस्से को सबसे भीतर स्थित समोच्च रेखाओं के द्वारा दर्शाया जाता है तथा इसके दोनों किनारों के बीच का अंतर अधिक होता है। बाहर की ओर स्थित दूसरी समोच्च रेखाओं के लिए एकसमान अंतराल के साथ समोच्च रेखाओं का मान बढ़ता जाता है।





V आकार की घाटी

U आकार की घाटी

महाखड्ड(गार्ज)

उच्च भागों में, जहाँ नदियों के द्वारा पार्श्व अपरदन की अपेक्षा ऊर्ध्वाधर अपरदन की क्रिया तीव्र होती है, वहाँ तंग घाटी का निर्माण होता है। ये गहरी तथा संकरी नदी घाटियाँ होती हैं, जिनके दोनों किनारों का ढाल बहुत तीव्र होता है। तंग घाटी को पास-पास स्थित समोच्च रेखाओं के द्वारा दर्शाया जाता है, जिसमें भीतरी समोच्च रेखाओं के बीच का अंतर बहुत कम होता है, जो इसके दोनों किनारे को दिखाता है।


पर्वतस्कंध

पर्वत शृंखलाओं से घाटी की ओर की झुकी हुई उत्तल ढाल वाली आकृति को स्पर या पर्वतस्कंध कहा जाता है। इसे V आकार की समोच्च रेखा के द्वारा दर्शाया जाता है, लेकिन विपरीत तरीके से। V के दोनों किनारे ऊँचाई वाले भाग को दिखाते हैं तथा इसकी चोटी निचले हिस्से को।





महाखड्ड(गार्ज)

पर्वतस्कंध


भृगु

यह अत्यधिक तीव्र ढाल या खड़े पार्श्वों वाली भू-आकृति है। मानचित्र पर भृगु की पहचान पास-पास बनी समोच्च रेखाओं से की जाती है, जो आपस में जुड़ी हुई प्रतीत होती हैं।

जलप्रपात

किसी नदी तल पर काफी ऊँचाई से पानी का अचानक ऊर्ध्वाधर गिरना जलप्रपात कहलाता है। कभी-कभी जलप्रपात सोपानी धारा के रूप में गिरता है, जिसे रैपिड कहा जाता है। मानचित्र पर नदी को पार करती हुई समोच्च रेखाओं के परस्पर मिल जाने से जलप्रपात को पहचाना जा सकता है तथा रैपिड को अपेक्षाकृत दूर स्थित समोच्च रेखाओं के द्वारा।





भृगु


जलप्रपात




अनुप्रस्थ परिच्छेद बनाने के चरण:

विभिन्न उच्चावच स्थलाकृतियों का उनके समोच्च रेखाओं से निम्नलिखित चरणों में अनुप्रस्थ परिच्छेद खींचा जा सकता है:

1. मानचित्र पर समोच्च रेखाओं को काटती हुई एक सीधी रेखा खींचें एवं उसे AB से व्यक्त करें।

2. सफेद कागज या ग्राफ पेपर की एक पट्टी लें तथा इसके किनारों को AB लाइन के साथ लगाकर रखें।

3. जहाँ-जहाँ AB रेखा को समोच्च रेखाएँ काटती हैं, उनकी स्थिति पर निशान लगाएँ।

4. एक उपयुक्त ऊर्ध्वाधर मापनी का चुनाव करें, जैसे- ½ सेंटीमीटर = 100 मीटर और एक-दूसरे के समांतर क्षैतिज रेखाएँ खींचें, जो कि लंबाई में AB के बराबर हों। इस प्रकार की रेखाओं की संख्या समोच्च रेखाओं की संख्या के बराबर या उससे अधिक होनी चाहिए।

5. समोच्च मानों के अनुसार अनुप्रस्थ परिच्छेदिका के ऊर्ध्वाधर को मानों से चिह्नित करें। संख्यात्मक मान का प्रारंभ समोच्च रेखा में दर्शाए गए सबसे कम मान से किया जा सकता है।

6. अब चिह्नित पेपर के किनारे को अनुप्रस्थ परिच्छेद की तल रेखा पर इस प्रकार रखें कि पेपर का AB मानचित्र के AB से मिला रहे तथा समोच्च बिंदुओं को चिह्नित करे।

7. AB रेखाओं से समोच्च रेखाओं को काटते हुए लंब रेखा खींचें।

8. परिच्छेद के आधार पर स्थित सभी रेखाओं पर चिह्नित बिंदुओं को मिला दें।


स्थलाकृतिक शीट पर सांस्कृतिक लक्षणों की पहचान

बस्तियाँ, भवन, रेलमार्ग एवं सड़क मार्ग रूढ़ चिन्हों, प्रतीकों एवं रंगों के द्वारा स्थलाकृतिक शीट पर दिखाए जाने वाले महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक लक्षण हैं। इन लक्षणों की अवस्थिति एवं उनका वितरण प्रारूप मानचित्र पर दर्शाए गए क्षेत्र को समझने में सहायता प्रदान करते हैं।


बस्तियों का वितरण

इसके वितरण को मानचित्र पर इनकी स्थिति, अवस्थिति, प्रारूप, संरक्षण तथा घनत्व द्वारा देख सकते हैं। बस्ती मानचित्र एवं समोच्च मानचित्रों की परस्पर तुलना के द्वारा बस्तियों के विभिन्न प्रकारों की प्रकृति एवं कारण को समझा जा सकता है।

मानचित्र पर चार प्रकार की ग्रामीण बस्तियों को पहचाना जा सकता हैः

(क) संहत

(ख) प्रकीर्ण

(ग) रैखिक

(घ) वृत्ताकार

इसी तरह नगर केंद्रों की भी पहचान की जा सकती है:

(क) चतुष्पथ नगर

(ख) नोडीय बिंदु

(ग) बाज़ार केंद्र

(घ) पहाड़ी नगर

(ङ) तटीय विश्राम स्थल केंद्र

(च) पत्तन

(छ) उपनगरीय गाँव अथवा अनुषंगी नगरों के साथ विनिर्माण केंद्र

(ज) राजधानी नगर

(झ) धार्मिक केंद्र

बस्तियों के चुनाव को निर्धारित करने वाले अनेक कारक होते हैं, जैसे:

(क) जल के स्रोत

(ख) भोजन की सुविधाएँ

(ग) उच्चावच की प्रकृति

(घ) व्यवसाय की प्रकृति एवं प्रकार

(ङ) रक्षा

मानव बस्तियों के स्थल का परीक्षण समोच्च रेखा एवं अपवाह तंत्र मानचित्र के संदर्भ में बहुत निकटता से करना चाहिए। बस्तियों का घनत्व खाद्य पदार्थों की पूर्ति से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित होता है। कभी-कभी ग्रामीण बस्तियों का संरेखण होता है, यानी ये नदी घाटी, सड़क, तटबंध, तटरेखा के साथ वितरित होती हैं। इन्हें रैखिक प्रारूप कहते हैं।

नगरीय बस्तियों में, एक चतुष्पथ नगर पंखे की आकृति का स्वरूप ग्रहण करता है, जिसमें मकान सड़कों के किनारे व्यवस्थित होते हैं, तथा मुख्य बाज़ार एवं नगर के केंद्र में चौराहे होते हैं। एक नोडीय नगर में सड़कें केंद्र से सभी दिशाओं में जाती हैं।


यातायात एवं संचार का प्रतिरूप

उपयोग में लाए जाने वाले यातायात के साधनों तथा परिवहन जाल के घनत्व का उच्चावच, जनसंख्या आकार तथा संसाधन विकास के प्रारूपों से घनिष्ठ संबंध होता है। ये रूढ़ि चिह्नों एवं प्रतीकों के द्वारा दर्शाए जाते हैं। मानचित्र पर दिखाए गए परिवहन तथा संचार के साधन हमें उस क्षेत्र के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं।


स्थलाकृतिक मानचित्रों का निर्वचन

स्थलाकृतिक मानचित्र को पढ़ने एवं समझने के लिए मानचित्रों की भाषा तथा दिशा का ज्ञान होना आवश्यक है। आपको पहले उत्तर रेखा एवं मापनी को देखना होगा तथा उसी के अनुसार अपने आप को ओरियन्ट करना होगा। विभिन्न स्थलाकृतियों के लिए उपयोग में लाए गए रूढ़ चिह्नों के बारे में जानकारी होना आवश्यक है। सभी स्थलाकृतिक शीट में मानचित्रों में इस्तेमाल होने वाले रूढ़ चिह्नों तथा प्रतीकों को दर्शाया जाता है। ये रूढ़ चिह्न एवं प्रतीक पूरे विश्व में स्वीकृत हैं, कोई भी व्यक्ति विश्व में कहीं भी बिना उस देश की भाषा जाने भी इन मानचित्रों को पढ़ सकता है।

सामान्यतः जिन शीर्षकों के अंतर्गत स्थलाकृतिक मानचित्रों की व्याख्या की जाती है, वे हैं (क) उपांत सूचनाएँ

(ख) उच्चावच एवं अपवाह

(ग) भूमि उपयोग

(घ) यातायात तथा संचार के साधन

(ङ) मानव बस्तियाँ

उपांत सूचनाएँ: मानचित्र की सीमाओं पर लिखी गई सूचनाओं को उपांत सूचनाएँ कहते हैं। इसमें स्थलाकृतिक शीट संख्या, इसकी स्थिति, डिग्री एवं मिनट में इसका विस्तार, मापनी एवं सम्मिलित जिले, आदि की सूचनाएँ होती हैं।

क्षेत्र का उच्चावच: इसमें किसी क्षेत्र के सामान्य स्थलाकृति का अध्ययन मैदानों, पठारों, पहाड़ियों या पर्वतों को उनके शिखरों, टीलों एवं ढाल की दिशा के साथ किया जाता है। इन आकृतियों को निम्नलिखित वर्गों के अंतर्गत पढ़ा जाता है:

पहाड़ी: अवतल, उत्तल, सीधा या मंद ढाल तथा आकार के साथ

पठार: यह चौड़ा, संकरा, चपटा, तरंगित अथवा कटा-फटा है या नहीं।

मैदान ः इसके प्रकार यानि, जलोढ़, हिमानी, कार्स्ट, तटीय, कच्छ इत्यादि।

पर्वत: सामान्य ऊँचाई, शिखर, दर्रे इत्यादि।

क्षेत्र का अपवाह: महत्त्वपूर्ण नदियाँ एवं उनकी सहायक नदियाँ तथा उनके द्वारा बनाए गए घाटियों के प्रकार एवं विस्तार। उनके द्वारा बनाए गए अपवाह तंत्र, जैसे- द्रुमाकृतिक, अरीय, वलय, जालीनुमा एवं आंतरिक इत्यादि की व्याख्या की जाती है।

भूमि उपयोग: इसमें विभिन्न प्रकारों से भूमि उपयोगों का विश्लेषण किया जा सकता है, जैसे-

प्राकृतिक वनस्पति एवं वन (कौन-सा क्षेत्र वनाच्छादित है, यह वन घना है या विरल तथा वन के वर्ग, जैसे- यह संरक्षित, वर्गीकृत या अवर्गीकृत है)।

कृषिगत्, फलोद्यान, बंजर भूमि, औद्योगिक इत्यादि।

सुविधाएँ एवं सेवाएँ, जैसे- विद्यालय, महाविद्यालय, चिकित्सालय, पार्क, हवाईअडे्ड, विद्युत उपकेंद्र इत्यादि।

यातायात एवं संचार: यातायात के साधनों के अंतर्गत राष्ट्रीय तथा राज्य महामार्ग, जिला सड़कें, रथ्या, ऊँटों के रास्ते, पगडंडी, रेलवे, जल मार्ग, मुख्य संचार साधन, डाकघर इत्यादि।

बस्तियाँ ः निम्नलिखित शीर्षकों में बस्तियों का अध्ययन किया जाता है-

ग्रामीण बस्तियाँ: ग्रामीण बस्तियों के प्रकार, जैसे- संहत, प्रकीर्ण, रैखिक इत्यादि।

नगरीय बस्तियाँ : नगरीय बस्तियों के प्रकार एवं उनके कार्य, जैसे- राजधानी नगर, प्रशासनिक नगर, धार्मिक नगर, पत्तन नगर, पर्वत नगर इत्यादि।

व्यवसाय: किसी क्षेत्र के लोगों के सामान्य व्यवसाय को वहाँ के भूमि उपयोग तथा बस्तियों के प्रकार के द्वारा पहचाना जा सकता है। उदाहरण के लिए, ग्रामीण क्षेत्रों में अधिसंख्य लोगों का मुख्य व्यवसाय खेती होता है, आदिवासी क्षेत्रों में लकड़ी काटना एवं प्रारंभिक खेती की अधिकता होती है तथा तटीय क्षेत्रों में मछली पकड़ने का कार्य किया जाता है। इसी प्रकार शहरों एवं नगरों में सेवाएँ तथा व्यापार लोगों का मुख्य पेशा है।


मानचित्र निर्वचन विधि

मानचित्र निर्वचन में उन कारकों का अध्ययन शामिल है, जो मानचित्र पर दिखाए गए अनेक लक्षणों के बीच संबंधों को समझने में सहायता करते हैं। उदाहरण के लिए, स्थलाकृतिक मानचित्रों पर प्राकृतिक वनस्पतियों के वितरण तथा कृषि के अंतर्गत क्षेत्रों को भू-आकृतियों एवं अपवाह तंत्र की पृष्ठ भूमि में ठीक से समझ सकते हैं। इसी प्रकार बस्तियों के वितरण को परिवहन के साधनों एवं स्थलाकृतियों के द्वारा पहचाना जा सकता है।

निम्नलिखित चरण मानचित्रों की व्याख्या में सहायता प्रदान करेंगे :

  • स्थलाकृतिक मानचित्र में स्थलाकृतिक शीट सूचक संख्या के अनुसार भारत में इसकी अवस्थिति ज्ञात की जा सकती है। इससे बृहत एवं मध्यम स्तर वाले भू-आकृतिक विभागों की भी सामान्य विशेषताओं की जानकारी मिलती है। मानचित्र के मापनी तथा समोच्च अंतरालों को देखिए, जो आपको एक क्षेत्र की सामान्य स्थलाकृति एवं उसके विस्तार को बताता है।
  • ट्रेसिंग कागज पर निम्नलिखित लक्षणों को उतारिए:

         (क) मुख्य स्थलाकृतियाँ- समोच्च रेखाओं एवं भौगोलिक लक्षणों द्वारा दिखाए गए।

         (ख) अपवाह एवं जलीय लक्षण- मुख्य नदी एवं उसकी महत्त्वपूर्ण सहायक नदियाँ।

         (ग) भूमि उपयोग, जैसे- वन, कृषिगत् भूमि, बेकार भूमि, पशु विहार, पार्क, विद्यालय इत्यादि।

          (घ) बस्तियाँ एवं परिवहन प्रतिरूप।

  • प्रत्येक लक्षण के वितरण प्रतिरूप का वर्णन सबसे महत्त्वपूर्ण पक्षों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए अलग-अलग कीजिए।
  • एक समय में मानचित्रों के एक जोड़े को अध्यारोपित करके, यदि किन्हीं दो प्रारूपों के बीच कोई संबंध है, तो उसे लिखिए। उदाहरण के लिए, अगर एक समोच्च मानचित्र भूमि उपयोग से मिल जाता है, तो ढाल के डिग्री एवं उपयोग में आने वाली भूमि के बीच संबंध को बताएगा।

एक ही क्षेत्र के हवाई चित्रों तथा उपग्रही प्रतिबिंबों की तुलना उस क्षेत्र के स्थलाकृतिक मानचित्र के द्वारा की जा सकती है।


अभ्यास

1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें।

(क) स्थलाकृतिक मानचित्र क्या होते हैं?

(ख) भारत की स्थलाकृतिक मानचित्र बनाने वाली संस्था का नाम बताइए तथा इसके मानचित्रों में प्रयुक्त मापनियों के विषय में बताइए।

(ग) भारतीय सर्वेक्षण विभाग हमारे देश के मानचित्रण में किन मापनियों का उपयोग करता है?

(घ) समोच्च रेखाएँ क्या हैं?

(ङ) समोच्च रेखाओं के अंतराल क्या दर्शाते हैं?

(च) रूढ़ चिह्न क्या हैं?

2. संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिए-

(क) समोच्च रेखाएँ

(ख) स्थलाकृतिक शीट में उपांत सूचनाएँ

(ग) भारतीय सर्वेक्षण विभाग

3. स्थलाकृतिक मानचित्र निर्वचन का क्या अर्थ है तथा इसकी विधि क्या है, इसकी विवेचना कीजिए।

4. यदि आप स्थलाकृतिक शीट के सांस्कृतिक लक्षणों की व्याख्या कर रहे हैं, तो आप किस प्रकार की सूचनाएँ लेना पसंद करेंगे तथा इन सूचनाओं को कैसे प्राप्त करेंगे? उपयुक्त उदाहरण की सहायता से विवेचना करें।

5. निम्नलिखित लक्षणों के लिए रूढ़ चिह्नों एवं संकेतों को बनाइए:

(क) अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखाएँ

(ख) तल चिह्न

(ग) गाँव

(घ) पक्की सड़क

(ङ) पुल सहित पगडंडी

(च) पूजा करने के स्थान

(छ) रेल लाइन


अभ्यास (क)


समोच्च प्रणाली को देखें तथा निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें।

1. समोच्च रेखाओं से निर्मित स्थलाकृति का नाम लिखें।

2. मानचित्र में समोच्च अंतराल का पता लगाएँ।

3. मानचित्र पर के E एवं F के बीच की दूरी को धरातल पर की दूरी में बदलें।

4. A तथा B, C तथा D एवं E तथा F के बीच के ढालों के प्रकार का नाम लिखें।

5. G से E, D तथा F के दिशाओं को बताएँ।


अभ्यास (ख)

स्थलाकृतिक शीट संख्या 63 K/12 जैसा कि पृष्ठ 62 पर चित्र में दिखाया गया है का अध्ययन करें तथा निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें-

1. 1ः50,000 को साधारण कथन में बदलें।

2. क्षेत्र की मुख्य बस्तियों के नाम लिखें।

3. गंगा नदी के बहाव की दिशा क्या है?

4. गंगा नदी के कौन-से किनारे पर भतौली स्थित है?

5. गंगा नदी के किनारे ग्रामीण बस्तियाँ किस प्रकार अवस्थित हैं?

6. उन गाँवों/बस्तियों के नाम लिखें, जहाँ डाकघर स्थित है?

7. क्षेत्र में पीला रंग क्या दर्शाता है?

8. भतौली गाँव के लोगों के द्वारा नदी को पार करने के लिए परिवहन के किस साधन का उपयोग किया जाता है?



5.1

स्थलाकृतिक शीट संख्या 63 K/12 का भाग


अभ्यास (ग)

पृष्ठ 64 पर दी गई स्थलाकृतिक शीट संख्या 63 K/12 का अध्ययन करें तथा निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें-

1. मानचित्र के सबसे उच्च बिंदु की ऊँचाई ज्ञात करें।

2. जमटिहवा नदी मानचित्र के किस भाग से होकर बह रही है?

3. कुरदरी नाले के पूर्व में कौन-सी मुख्य बस्ती अवस्थित है?

4. इस क्षेत्र में किस प्रकार की बस्ती है?

5. सिपू नदी के बीच के सफेद धब्बे किस प्रकार की भौगोलिक स्थलाकृति को दर्शाते हैं?

6. स्थलाकृतिक शीट के इस भाग पर दर्शायी गई दो प्रकार की वनस्पतियों के नाम लिखें।

7. कुरदरी के बहाव की दिशा क्या है?

8. नीचला खजौरी डैम स्थलाकृतिक शीट के किस भाग में अवस्थित है?


5.2

स्थलाकृतिक शीट संख्या 63 K/12 का भाग



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