अध्याय 3 अक्षांश, देशांतर और समय पृथ्वी लगभग गोले के समान है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पृथ्वी की विषुवतीय त्रिाज्या तथा ध्रुवीय त्रिाज्या एक समान नहीं है। पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूणर्न विषुवत वृत पर उभार पैदा करता है। इसलिए वास्तविक आकार एक लध्वक्ष गोलाभ के समान प्रतीत होता है। पृथ्वी के इस आकार के कारण धरातलीय लक्षणों की अवस्िथति को जानने में वुफछ कठिनाइर् होती है, क्योंकि इसपर अन्य बिंदुओं की सापेक्ष स्िथति को मापने के लिए कोइर् संदभर् बिंदु उपस्िथत नहीं है। इसलिए विभ्िान्न स्थानों की स्िथति को जानने के लिए ग्लोब या मानचित्रा पर काल्पनिक रेखाओं का जाल बनाया जाता है। आइए, देखें ये रेखाएँ क्या हैं एवं वैफसे खींची जाती हैं?पृथ्वी के अपने अक्ष पर पश्िचम से पूवर् घूणर्न करने से दो प्राकृतिक संदभर् बिंदु प्राप्तहोते हैं, जो उत्तरी ध्रुव एवं दक्ष्िाणी ध्रुव हैं। ये भौगोलिक गि्रड ;ळमवहतंचीपबंस ळतपकद्ध को आधार प्रदान करते हैं। प्रतिच्छेदी रेखाओं के जाल को भूपृष्ठ पर विभ्िान्न धरातलीय लक्षणों की स्िथति को निश्िचत करने के उद्देश्य से बनाया गया है। गि्रड में दो प्रकार की रेखाएँ हैं - क्षैतिज एवं उफध्वार्धर, जिसे अक्षांश समानांतर तथा देशांतरीय याम्योत्तर कहा जाता है।क्षैतिज रेखाएँ एक - दूसरे के समांतर पूवर् से पश्िचम दिशा में खींची गइर् हैं। उत्तरी ध्रुवएवं दक्ष्िाणी ध्रुव के मध्य खींची गइर् रेखा को विषुवत वृत्त कहा जाता है। यह सबसे बड़ा वृत्तहै तथा यह ग्लोब को दो बराबर भागों में बाँटता है। इसे बृहत वृत्त भी कहा जाता है। अन्यसभी समांतर रेखाएँ विषुवत वृत्त से ध्रुवों की ओर बढ़ने से, आनुपातिक रूप से आकार में छोटीहोती जाती हैं तथा ये पृथ्वी को दो असमान भागों में बाँटती हैं, जिन्हें लघु वृत्त भी कहते हैं। पूवर् से पश्िचम की ओर खींची इन काल्पनिक रेखाओं को सामान्यतः अक्षांश समांतर कहा जाता है।उत्तर से दक्ष्िाण दिशा की ओर जाने वाली लंबवत् रेखाएँ दोनों ध्रुवों को जोड़ती हैं।इन्हें देशांतरीय याम्योत्तर कहा जाता है। विषुवत वृत्त पर इन रेखाओं के बीच की दूरी सबसे अिाक होती है तथा प्रत्येक ध्रुव पर ये एक बिंदु पर मिल जाती हैं।अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं को सामान्यतः भौगोलिक निदेर्शांक ;ब्ववतकपदंजमद्ध कहा जाता है, क्योंकि ये रेखाओं के जाल का एक तंत्रा बनाती हैं, जिसपर हम धरातल के विभ्िान्न लक्षणों की स्िथति को प्रद£शत कर सकते हैं। इन निदेर्शांको की सहायता से विभ्िान्न ¯बदुओं की अवस्िथति, दूरी तथा दिशा को आसानी से निधार्रित किया जा सकता है।यद्यपि ग्लोब पर अनंत समांतर एवं याम्योत्तर रेखाएँ खींची जा सकती हैं, उनमें से वुफछ चुनी हुइर् रेखाएँ ही मानचित्रा पर खींची जाती हैं। अक्षांशों एवं देशांतरों को डिग्री या अंश ;°द्ध में मापते हैं, क्योंकि ये कोणीय दूरी को प्रद£शत करते हैं। प्रत्येक डिग्री को 60 मिनट ;श्द्ध में एवं प्रत्येक मिनट को 60 सेवेंफड ;ष्द्ध में विभाजित किया जाता है। अक्षांश, देशांतर और समय अक्षांश समांतर भूपृष्ठ पर किसी स्थान का अक्षांश उस स्थान की वह कोणीयदूरी है, जो विषुवत वृत्त के उत्तर या दक्ष्िाण याम्योत्तर पर पृथ्वी के वेंफद्र से मापी जाती है। एक ही अक्षांश पर स्िथत स्थानों कोमिलाने वाली रेखा समांतर कहलाती है। विषुवत वृत्त का मान 0° है एवं ध्रुवों के अक्षांश 90° उ. एवं 90°द. हैं ;चित्रा 3.1द्ध। यदि अक्षांश समांतरों को 1° के अंतराल पर खींचते हैं, तो उत्तरी एवं दक्ष्िाणी दोनों गोला(ो± में 89 अक्षांश समांतर होंगे। इसप्रकार, विषुवत वृत्त को लेकर अक्षांश समांतरों की वुफल संख्या179 होगी। किसी स्थान की अवस्िथति विषुवत वृत्त के उत्तर या दक्ष्िाण में होने के आधार पर अक्षांशों के मान के साथ उ;छद्ध या द.;ैद्ध लिखते हैं। यदि पृथ्वी बिल्वुफल गोल होती तो 1° अक्षांश ;याम्योत्तर का 1° चापद्ध एक स्िथरांक होता, अथार्त् पृथ्वी के प्रत्येक स्थान पर इसका मान 111 किलोमीटर होता। यह लंबाइर् विषुवतवृत्त पर सभी देशांतर रेखाओं के एक डिग्री के लगभग समानहै। लेकिन विषुवत वृत्त से ध्रुवों की ओर अक्षांशों की लंबाइर् मेंवुफछ परिवतर्न आता है। विषुवत वृत्त पर यह लंबाइर् 110.6 किलोमीटर है, जबकि ध्रुवों पर यह 111.7 किलोमीटर है। किसी स्थान का अक्षांश सूयर् की तुंगता या ध्रुवतारे की सहायता से निधार्रित किया जा सकता है। अक्षांश समांतर बनाना अक्षांश समांतर वैफसे खींचा जाता है? एक वृत्त बनाएँ तथा वेंफद्र में एक क्षैतिज रेखा खींचकर इसे दो बराबर भागों में बाँटंे। यहरेखा विषुवत वृत्त को दशार्ती है। इस वृत्त पर चांदा ;प्रोट्रैक्टरद्ध को इस तरह से रखें कि चांदा की 0° एवं 180° की रेखा चित्रा 3.2: अक्षांश समांतर बनाना चित्रा 3.3: देशांतरीय याम्योत्तर चित्रा 3.4: उत्तरी ध्रुव पर मिलने वाले 0° तथा 180° याम्योत्तर भूगोल में प्रयोगात्मक कायर् कागज पर बनाए वृत्त के मध्य खींची रेखा से मिल जाए। अब 20° द. ;ैद्ध दशार्ने के लिए वृत्त के निचले आधे भाग में, विषुवत वृत्त से 20° का कोण बनाते हुए पूवर् एवं पश्िचम में दो बिंदु लगाएँ, जैसाकि चित्रा 3.2 में दिखाया गया है। कोण की दोनों भुजाएँ वृत्त वेोफ दबिंदुओं को काटती हैं। विषुवत वृत्त के समांतर रेखा खींचते हुए इन दो बिंदुओं को मिला दें। यह 20° द. ;ैद्ध होगा। देशांतर याम्योत्तर पूणर् वृत्त बनाने वाली अक्षांश रेखाओं के विपरीत, अ(र्गोलाकारदेशांतरीय याम्योत्तर ध्रुवों पर एक ¯बदु पर मिल जाती हैं। अगरआमने - सामने के याम्योत्तरों को एक साथ मिला दिया जाए तो येपूणर् वृत्त बन जाते हैं, लेकिन इनकी गणना दो अलग - अलगयाम्योत्तर के रूप में की जाती है।ये याम्योत्तर विषुवत वृत्त को समकोण पर काटते हैं। अक्षांश समांतर के विपरीत इनकी लंबाइर् समान होती है। सुविधाजनक गणना के लिए गि्रनिच वेधशाला ;लंदन के निकटद्ध से गुजरनेवाली देशांतरीय याम्योत्तर को अंतरार्ष्ट्रीय समझौते के द्वारा प्रमुखयाम्योत्तर माना गया है तथा इसे 0° का मान दिया गया है।किसी स्थान का देशांतर उस स्थान के प्रमुख याम्योत्तर के पूवर् या पश्िचम में उस स्थान की कोणीय दूरी होती है। इसे डिग्रीमें भी मापा जाता है। देशांतरों का मान प्रमुख याम्योत्तर से पूवर् तथा पश्िचम में 0° से 180° तक होता है ;चित्रा 3.3द्ध। पृथ्वी का वहभाग, जो प्रमुख याम्योत्तर के पूवर् में है, उसे पूवीर् गोला(र् तथा जो पश्िचम में है, उसे पश्िचमी गोला(र् कहा जाता है। देशांतरीय याम्योत्तर बनाना देशांतर रेखाएँ वैफसे खींची जाती हैं? एक वृत्त बनाएँ, जिसका वेंफद्रउत्तरी ध्रुव को प्रद£शत करता हो। इसकी परििा विषुवत वृत्त कोप्रद£शत करेगी। वृत्त के वेंफद्र, अथार्त् उत्तरी ध्रुव से एक लंबवत्सीधी रेखा खींचे। यह उत्तरी ध्रुव पर मिलने वाली 0° एवं 180° याम्योत्तरों को प्रद£शत करती है ;चित्रा 3.4द्ध। जब आप मानचित्रा को देखते हैं, पूवर् दिशा आपके दाहिनी ओर एवं पश्िचम दिशा आपके बायीं ओर होती है। ¯वफतु एकयाम्योत्तर खींचने के लिए, मान लें कि आप उत्तरी ध्रुव पर हैं,यानी चित्रा 3.4 के अनुसार वृत्त के वेंफद्र पर हैं। अब ध्यान दें कि इस अवस्था में पूवर् एवं पश्िचम की सापेक्ष दिशाएँ उलट जाती अक्षांश, देशांतर और समय 0°हैं, तो अब आपके बायीं ओर पूवर् एवं दाहिनी ओर पश्िचम दिशा होगी। अब चित्रा 3.5 के अनुसार 45° पू. ;म्द्ध एवं प. ;ॅद्धयाम्योत्तर खींचे। इसके लिए आप चांदा को लंबवत् रेखा के साथ 0° तथा 180° याम्यात्तरों को मिलाते हुए रखें तथा दोनों तरपफ 45° को मापें जो कि क्रमशः आपके बायीं एवं दाहिनी ओर 45° पू;म्द्ध एवं 45° प.;ॅद्ध याम्योत्तरों को दशार्एगा। यह चित्रा पृथ्वीका वह रूप प्रस्तुत करेगा जैसा उत्तरी ध्रुव के ठीक ऊपर से दिखाइर् देता है। 180° चित्रा 3.5: देशांतरीय याम्योत्तर बनाना भूगोल में प्रयोगात्मक कायर् देशांतर एवं समय हम सभी जानते हैं कि पृथ्वी अपनी धुरी पर पश्िचम से पूवर् की ओर घूमती है। यही कारण है कि पूवर् में सूयोर्दय एवं पश्िचम में सूयार्स्त होता है। पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती हुइर् 360° देशांतर अथार्त् एक चक्कर लगभग 24 घंटे में पूरा करती है। चूँकि, 180° देशांतर प्रमुख याम्योत्तर के पूवर् एवं पश्िचम दोनों ओर स्िथत है, इसलिए सूयर् पूवर् से पश्िचमी गोला(र् में जाने में 12 घंटे का समय लेता है। इस प्रकार सूयर् पूवर् से पश्िचम प्रति घंटा 15° देशांतर या प्रति 4 मिनट में 1° देशांतर को पार करता हुआ दिखाइर् देता है। जब हम पश्िचम से पूवर् की ओर बढ़ते हैं तब समय बढ़ता है तथा जब हम पश्िचम की ओर बढ़ते हैं तब समय घटता है।किसी क्षेत्रा के स्थानीय समय का निधार्रण प्रमुख याम्योत्तर पर होने वाले समय के सापेक्ष कियाजाता है। आइए वुफछ उदाहरणों के द्वारा प्रमुख याम्योत्तर के सापेक्ष समय के निधार्रण को समझने का प्रयास करें। उदाहरण 1: जब गि्रनिच पर दोपहर के 12 बजे हैं, तब 90° पूवर् देशांतर पर स्िथत ¯थपू, भूटान का स्थानीय समय क्या होगा। प्रकथन: प्रमुख याम्योत्तर के पूवर् में प्रति 1° देशांतर पर समय 4 मिनट की दर से बढ़ता है। हल: गि्रनिच एवं ¯थपू के बीच का अंतर त्र 90° देशांतर समय का वुफल अंतर त्र 90 × 4 त्र 360 मिनट त्र 360/60 त्र 6 घंटा। इसलिए, थ्िांपू का स्थानीय समय गि्रनिच से 6 घंटे आगे यानी अपराÉ 6.00 बजे का होगा। उदाहरण 2: जब गि्रनिच पर दोपहर के 12 बजे हों, तो 90° पश्िचम देशांतर पर स्िथत न्यू औरलियेंस ;अक्टूबर 2005 में वैफटरीना तूपफान से सबसे अिाक प्रभावित होने वाला क्षेत्राद्ध का स्थानीय समय क्या होगा? प्रकथन: प्रमुख याम्योत्तर के पश्िचम में प्रति 1° देशांतर पर समय 4 मिनट की दर से घटता है। हल: गि्रनिच एवं न्यू औरलियेंस के बीच का अंतर त्र 90° देशांतर समय का वुफल अंतर त्र 90 × 4 त्र 360 मिनट त्र 360ध्60 त्र 6 घंटा इसलिए न्यू - औरलियेंस का स्थानीय समय गि्रनिच से 6 घंटा कम यानी पूवार्É के 6 बजे का होगा। इसी प्रकार विश्व के किसी भी स्थान का समय ज्ञात किया जा सकता है। किसी देश कीसीमाओं के भीतर यथासंभव समय में एकरूपता बनाए रखने के लिए उस देश के वेंफद्रीय याम्योत्तरको उस देश का मानक याम्योत्तर माना जाता है तथा उसके स्थानीय समय को देश का मानक समयमाना जाता है। मानक याम्योत्तर का चुनाव इस तरह किया जाता है कि ये 150° या 7°30श् द्वारा विभाजित हों, ताकि मानक समय एवं गि्रनिच माध्य समय के बीच के अंतर को 1 या आधे घंटे के गुणक के रूप में बताया जा सके। भारत के मानक समय का निधार्रण 82°30श् पू. ;म्द्ध से किया जाता है, जो कि मिशार्पुर से गुजरती है। अतः भारतीय मानक समय ;प्ैज्द्ध गि्रनिच माध्य समय ;ळडज्द्ध से 5.30 घंटे आगे है। ;82°30श् × 4द्धझ् ;60 मिनटद्ध त्र 5 घंटे 30 मिनट। इसी प्रकार, विश्व के सभी देश अपनी अक्षांश, देशांतर और समय प्रशासनिक सीमाओं के भीतर एक मानक याम्योत्तर तय करके अपने देश के स्थानीय समय कानिधार्रण करते हैं। पूवर् - पश्िचम में अिाक विस्तार वाले देश एक से अिाक मानक याम्योत्तर चुन सकते हैं, जैसा कि रूस, कनाडा तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में है। विश्व को 24 टाइम शोन में विभाजित किया गया है ;चित्रा 3.6द्ध। अंतरार्ष्ट्रीय तिथ्िा रेखा जहाँ विश्व को 24 टाइम शोन में विभाजित किया गया है, वहीं एक स्थान तो ऐसा होगा जहाँ गि्रनिच समय से पूरे दिन का अंतर होगा, अथार्त् ऐसा स्थान, जहाँ से पृथ्वी पर सचमुच दिन का प्रारंभ होता है। 180° देशांतर रेखा लगभग उसी स्थान पर स्िथत है, जहाँ से अंतरार्ष्ट्रीय तिथ्िा रेखा गुजरती है। इस देशांतर के समय में 0° देशांतर से ठीक 12 घंटे का अंतर होता है, चाहे प्रमुख याम्योत्तर सेपूवर् जाएँ या पश्िचम। हम जानते हैं कि प्रमुख याम्योत्तर के पूवर् में समय घटता है तथा पश्िचम मेंबढ़ता है। इसलिए, जब कोइर् व्यक्ित प्रमुख याम्योत्तर से पूवर् दिशा की ओर जाता है, तो वहाँ का समय 0° देशांतर से 12 घंटे कम होगा और पश्िचम दिशा में जाने वाले दूसरे व्यक्ित के लिए समय 12 घंटे अिाक होगा। उदाहरण के लिए, मंगलवार को पूवर् दिशा में जाने वाले व्यक्ित के लिए अंतरार्ष्ट्रीय तिथ्िा रेखा को पार कर लेने पर बुधवार का दिन हो जाएगा। इसी प्रकार, उसी दिन अपनी यात्रा शुरू करने वाले, लेकिन पश्िचम दिशा में जाने वाले व्यक्ित के लिए अंतरार्ष्ट्रीय तिथ्िा रेखा पार कर लेने के बाद सोमवार का दिन हो जाएगा। भूगोल में प्रयोगात्मक कायर् अभ्यास 1ण् निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें: ;पद्ध पृथ्वी पर दो प्रावृफतिक संदभर् ¯बदु कौन - से हैं? ;पपद्ध बृहत वृत्त क्या है? ;पपपद्ध निदेर्शांक क्या है? ;पअद्ध सूयर् पूवर् से पश्िचम जाता हुआ क्यों दिखाइर् देता है? ;अद्ध स्थानीय समय से आप क्या समझते हैं? 2ण् अक्षांशों एवं देशांतरों के बीच अंतर स्पष्ट करें। वि्रफयाकलाप 1ण् एटलस की सहायता से निम्नलिख्िात स्थानों को खोजकर उनके अक्षांश एवं देशांतर लिखें। स्थान अक्षांश देशांतर ;पद्ध मुंबइर् ;पपद्ध वलाॅदिवोस्तोंक ;पपपद्ध वैफरो ;पअद्ध न्यूयाॅकर् ;अद्ध ओटावा ;अपद्ध जेनेवा ;अपपद्ध जोहानसबगर् ;अपपपद्ध सिडनी 2ण् जब प्रमुख याम्योत्तर पर दिन के 10 बजे हों, तो निम्नलिख्िात शहरों में क्या समय होगा? ;पद्ध दिल्ली ;पपद्ध लंदन ;पपपद्ध टोकियो ;पअद्ध पेरिस ;अद्ध वैफरो ;अपद्ध माॅस्को

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Bhugolmeprayogatmakkaryabhag1-003

अध्याय 3

अक्षांश, देशांतर और समय

पृथ्वी लगभग गोले के समान है। एेसा इसलिए है क्योंकि पृथ्वी की विषुवतीय त्रिज्या तथा ध्रुवीय त्रिज्या एक समान नहीं है। पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूर्णन विषुवत वृत पर उभार पैदा करता है। इसलिए वास्तविक आकार एक लध्वक्ष गोलाभ के समान प्रतीत होता है। पृथ्वी के इस आकार के कारण धरातलीय लक्षणों की अवस्थिति को जानने में कुछ कठिनाई होती है, क्योंकि इसपर अन्य बिंदुओं की सापेक्ष स्थिति को मापने के लिए कोई संदर्भ बिंदु उपस्थित नहीं है। इसलिए विभिन्न स्थानों की स्थिति को जानने के लिए ग्लोब या मानचित्र पर काल्पनिक रेखाओं का जाल बनाया जाता है। आइए, देखें ये रेखाएँ क्या हैं एवं कैसे खींची जाती हैं?

पृथ्वी के अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व घूर्णन करने से दो प्राकृतिक संदर्भ बिंदु प्राप्त होते हैं, जो उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिणी ध्रुव हैं। ये भौगोलिक ग्रिड (Geographical Grid) को आधार प्रदान करते हैं। प्रतिच्छेदी रेखाओं के जाल को भूपृष्ठ पर विभिन्न धरातलीय लक्षणों की स्थिति को निश्चित करने के उद्देश्य से बनाया गया है। ग्रिड में दो प्रकार की रेखाएँ हैं- क्षैतिज एवं ऊर्ध्वाधर, जिसे अक्षांश समानांतर तथा देशांतरीय याम्योत्तर कहा जाता है।

क्षैतिज रेखाएँ एक-दूसरे के समांतर पूर्व से पश्चिम दिशा में खींची गई हैं। उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिणी ध्रुव के मध्य खींची गई रेखा को विषुवत वृत्त कहा जाता है। यह सबसे बड़ा वृत्त है तथा यह ग्लोब को दो बराबर भागों में बाँटता है। इसे बृहत वृत्त भी कहा जाता है। अन्य सभी समांतर रेखाएँ विषुवत वृत्त से ध्रुवों की ओर बढ़ने से, आनुपातिक रूप से आकार में छोटी होती जाती हैं तथा ये पृथ्वी को दो असमान भागों में बाँटती हैं, जिन्हें लघु वृत्त भी कहते हैं। पूर्व से पश्चिम की ओर खींची इन काल्पनिक रेखाओं को सामान्यतः अक्षांश समांतर कहा जाता है।

उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर जाने वाली लंबवत् रेखाएँ दोनों ध्रुवों को जोड़ती हैं। इन्हें देशांतरीय याम्योत्तर कहा जाता है। विषुवत वृत्त पर इन रेखाओं के बीच की दूरी सबसे अधिक होती है तथा प्रत्येक ध्रुव पर ये एक बिंदु पर मिल जाती हैं।

अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं को सामान्यतः भौगोलिक निर्देशांक (Coordinate) कहा जाता है, क्योंकि ये रेखाओं के जाल का एक तंत्र बनाती हैं, जिसपर हम धरातल के विभिन्न लक्षणों की स्थिति को प्रदर्शित कर सकते हैं। इन निर्देशांको की सहायता से विभिन्न बिंदुओं की अवस्थिति, दूरी तथा दिशा को आसानी से निर्धारित किया जा सकता है।

यद्यपि ग्लोब पर अनंत समांतर एवं याम्योत्तर रेखाएँ खींची जा सकती हैं, उनमें से कुछ चुनी हुई रेखाएँ ही मानचित्र पर खींची जाती हैं। अक्षांशों एवं देशांतरों को डिग्री या अंश (°) में मापते हैं, क्योंकि ये कोणीय दूरी को प्रदर्शित करते हैं। प्रत्येक डिग्री को 60 मिनट (') में एवं प्रत्येक मिनट को 60 सेकेंड (") में विभाजित किया जाता है।

शब्दावली

अक्षांश समांतर : यह विषुवत वृत्त के उत्तर या दक्षिण में स्थित किसी बिंदु की कोणीय दूरी को डिग्री, मिनट तथा सेकेंड में व्यक्त करता है। अक्षांश रेखाओं को प्रायः समांतर रेखाएँ भी कहा जाता है।

देशांतर याम्योत्तर: यह प्रधान याम्योत्तर (ग्रीनविच) के पूर्व या पश्चिम में स्थित किसी बिंदु की कोणीय स्थिति को डिग्री, मिनट एवं सेकेंड में व्यक्त करता है। देशांतर रेखाओं को प्रायः याम्योत्तर कहा जाता है।

अक्षांश समांतर

भूपृष्ठ पर किसी स्थान का अक्षांश उस स्थान की वह कोणीय दूरी है, जो विषुवत वृत्त के उत्तर या दक्षिण याम्योत्तर पर पृथ्वी के केंद्र से मापी जाती है। एक ही अक्षांश पर स्थित स्थानों को मिलाने वाली रेखा समांतर कहलाती है। विषुवत वृत्त का मान 0° है एवं ध्रुवों के अक्षांश 90° उ. एवं 90° द. हैं (चित्र 3.1)। यदि अक्षांश समांतरों को 1° के अंतराल पर खींचते हैं, तो उत्तरी एवं दक्षिणी दोनों गोलार्द्धों में 89 अक्षांश समांतर होंगे। इस प्रकार, विषुवत वृत्त को लेकर अक्षांश समांतरों की कुल संख्या 179 होगी। किसी स्थान की अवस्थिति विषुवत वृत्त के उत्तर या दक्षिण में होने के आधार पर अक्षांशों के मान के साथ उ. (N) या द. (S) लिखते हैं।

यदि पृथ्वी बिल्कुल गोल होती तो 1° अक्षांश (याम्योत्तर का 1° चाप) एक स्थिरांक होता, अर्थात् पृथ्वी के प्रत्येक स्थान पर इसका मान 111 किलोमीटर होता। यह लंबाई विषुवत वृत्त पर सभी देशांतर रेखाओं के एक डिग्री के लगभग समान है। लेकिन विषुवत वृत्त से ध्रुवों की ओर अक्षांशों की लंबाई में कुछ परिवर्तन आता है। विषुवत वृत्त पर यह लंबाई 110.6 किलोमीटर है, जबकि ध्रुवों पर यह 111.7 किलोमीटर है। किसी स्थान का अक्षांश सूर्य की तुंगता या ध्रुवतारे की सहायता से निर्धारित किया जा सकता है।

चित्र 3.1 अक्षांश समांतर

अक्षांश समांतर बनाना

अक्षांश समांतर कैसे खींचा जाता है? एक वृत्त बनाएँ तथा केंद्र में एक क्षैतिज रेखा खींचकर इसे दो बराबर भागों में बाँटें। यह रेखा विषुवत वृत्त को दर्शाती है। इस वृत्त पर चांदा (प्रोट्रैक्टर) को इस तरह से रखें कि चांदा की 0° एवं 180° की रेखा कागज पर बनाए वृत्त के मध्य खींची रेखा से मिल जाए। अब 20° द. (S) दर्शाने के लिए वृत्त के निचले आधे भाग में, विषुवत वृत्त से 20° का कोण बनाते हुए पूर्व एवं पश्चिम में दो बिंदु लगाएँ, जैसा कि चित्र 3.2 में दिखाया गया है। कोण की दोनों भुजाएँ वृत्त के दो बिंदुओं को काटती हैं। विषुवत वृत्त के समांतर रेखा खींचते हुए इन दो बिंदुओं को मिला दें। यह 20° द. (S) होगा।


चित्र 3.2: अक्षांश समांतर बनाना

देशांतर याम्योत्तर

पूर्ण वृत्त बनाने वाली अक्षांश रेखाओं के विपरीत, अर्द्धगोलाकार देशांतरीय याम्योत्तर ध्रुवों पर एक बिंदु पर मिल जाती हैं। अगर आमने-सामने के याम्योत्तरों को एक साथ मिला दिया जाए तो ये पूर्ण वृत्त बन जाते हैं, लेकिन इनकी गणना दो अलग-अलग याम्योत्तर के रूप में की जाती है।

ये याम्योत्तर विषुवत वृत्त को समकोण पर काटते हैं। अक्षांश समांतर के विपरीत इनकी लंबाई समान होती है। सुविधाजनक गणना के लिए ग्रिनिच वेधशाला (लंदन के निकट) से गुजरने वाली देशांतरीय याम्योत्तर को अंतर्राष्ट्रीय समझौते के द्वारा प्रमुख याम्योत्तर माना गया है तथा इसे 0° का मान दिया गया है।

किसी स्थान का देशांतर उस स्थान के प्रमुख याम्योत्तर के पूर्व या पश्चिम में उस स्थान की कोणीय दूरी होती है। इसे डिग्री में भी मापा जाता है। देशांतरों का मान प्रमुख याम्योत्तर से पूर्व तथा पश्चिम में 0° से 180° तक होता है (चित्र 3.3)। पृथ्वी का वह भाग, जो प्रमुख याम्योत्तर के पूर्व में है, उसे पूर्वी गोलार्द्ध तथा जो पश्चिम में है, उसे पश्चिमी गोलार्द्ध कहा जाता है।



चित्र 3.3: देशांतरीय याम्योत्तर

देशांतरीय याम्योत्तर बनाना

देशांतर रेखाएँ कैसे खींची जाती हैं? एक वृत्त बनाएँ, जिसका केंद्र उत्तरी ध्रुव को प्रदर्शित करता हो। इसकी परिधि विषुवत वृत्त को प्रदर्शित करेगी। वृत्त के केंद्र, अर्थात् उत्तरी ध्रुव से एक लंबवत् सीधी रेखा खींचे। यह उत्तरी ध्रुव पर मिलने वाली 0° एवं 180° याम्योत्तरों को प्रदर्शित करती है (चित्र 3.4)।


चित्र 3.4: उत्तरी ध्रुव पर मिलने वाले 0° तथा 180° याम्योत्तर

जब आप मानचित्र को देखते हैं, पूर्व दिशा आपके दाहिनी ओर एवं पश्चिम दिशा आपके बायीं ओर होती है। किंतु एक याम्योत्तर खींचने के लिए, मान लें कि आप उत्तरी ध्रुव पर हैं, यानी चित्र 3.4 के अनुसार वृत्त के केंद्र पर हैं। अब ध्यान दें कि इस अवस्था में पूर्व एवं पश्चिम की सापेक्ष दिशाएँ उलट जाती हैं, तो अब आपके बायीं ओर पूर्व एवं दाहिनी ओर पश्चिम दिशा होगी। अब चित्र 3.5 के अनुसार 45° पू. (E) एवं प. (W) याम्योत्तर खींचे। इसके लिए आप चांदा को लंबवत् रेखा के साथ 0° तथा 180° याम्यात्तरों को मिलाते हुए रखें तथा दोनों तरफ 45° को मापें जो कि क्रमशः आपके बायीं एवं दाहिनी ओर 45° पू.(E) एवं 45° प. (W) याम्योत्तरों को दर्शाएगा। यह चित्र पृथ्वी का वह रूप प्रस्तुत करेगा जैसा उत्तरी ध्रुव के ठीक ऊपर से दिखाई देता है।


चित्र 3.5: देशांतरीय याम्योत्तर बनाना

सारणी 3.1: अक्षांश समांतरों तथा देशांतरीय याम्योत्तरों की तुलना

क्रम सं. अक्षांश समांतर देशांतर याम्योत्तर
1. अक्षांश, विषुवत वृत्त के उत्तर या दक्षिण में स्थित किसी बिंदु की कोणीय दूरी है, जिसे डिग्री में मापा जाता है। देशांतर, विषुवत वृत्त के साथ बनी वह कोणीय दूरी है, जिसे डिग्री में मापा जाता है। इसे ग्रिनिच के पूर्व या पश्चिम 0° से 180° तक मापा जाता है।
2 सभी अक्षांश विषुवत वृत्त के समांतर होते हैं। देशांतर के सभी याम्योत्तर ध्रुवों पर मिलते हैं।
3. ग्लोब पर अक्षांश समांतर वृत्त के समान प्रतीत होते हैं। सभी याम्योत्तर वृत्त के समान प्रतीत होते हैं, जो ध्रुवों से गुजरते हैं।
4. दो अक्षांशों के बीच की दूरी लगभग 111 किलोमीटर होती है। याम्योत्तरों के बीच की दूरी विषुवत वृत्त पर अधिकतम (111.3 किलोमीटर) तथा ध्रुवों पर न्यूनतम (0 किलोमीटर) होती है। मध्य में अर्थात् 45° अक्षांश पर यह 79 किलोमीटर होती है।
5. 0° अक्षांश को विषुवत वृत्त एवं 90° को ध्रुव कहा जाता है। देशांतर 360° के होते हैं, जो प्रमुख याम्योत्तर से पूर्व एवं पश्चिम दोनों ओर 180° में बँटे होते हैं।
6. विषुवत वृत्त से ध्रुव की ओर अक्षांशों का उपयोग तापमंडलों के निर्धारण में होता है। जैसे, 0° से 23½° तक उत्तर या दक्षिण उष्ण कटिबंध, 23½° से 66½° तक शीतोष्ण कटिबंध तथा 66½° से 90° तक शीत कटिबंध। देशांतरों का उपयोग प्रमुख याम्योत्तर के सापेक्ष स्थानीय समय को निर्धारित करने में किया जाता है।


देशांतर एवं समय

हम सभी जानते हैं कि पृथ्वी अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है। यही कारण है कि पूर्व में सूर्योदय एवं पश्चिम में सूर्यास्त होता है। पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती हुई 360° देशांतर अर्थात् एक चक्कर लगभग 24 घंटे में पूरा करती है। चूँकि, 180° देशांतर प्रमुख याम्योत्तर के पूर्व एवं पश्चिम दोनों ओर स्थित है, इसलिए सूर्य पूर्व से पश्चिमी गोलार्द्ध में जाने में 12 घंटे का समय लेता है। इस प्रकार सूर्य पूर्व से पश्चिम प्रति घंटा 15° देशांतर या प्रति 4 मिनट में 1° देशांतर को पार करता हुआ दिखाई देता है। जब हम पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ते हैं तब समय बढ़ता है तथा जब हम पश्चिम की ओर बढ़ते हैं तब समय घटता है।

किसी क्षेत्र के स्थानीय समय का निर्धारण प्रमुख याम्योत्तर पर होने वाले समय के सापेक्ष किया जाता है। आइए कुछ उदाहरणों के द्वारा प्रमुख याम्योत्तर के सापेक्ष समय के निर्धारण को समझने का प्रयास करें।

उदाहरण 1: जब ग्रिनिच पर दोपहर के 12 बजे हैं, तब 90° पूर्व देशांतर पर स्थित थिंपू, भूटान का स्थानीय समय क्या होगा।

प्रकथन: प्रमुख याम्योत्तर के पूर्व में प्रति 1° देशांतर पर समय 4 मिनट की दर से बढ़ता है।

हल: ग्रिनिच एवं थिंपू के बीच का अंतर=90° देशांतर

समय का कुल अंतर = 90 × 4 = 360 मिनट

=360/60 = 6 घंटा।

इसलिए, थिंपू का स्थानीय समय ग्रिनिच से 6 घंटे आगे यानी अपराह्न 6.00 बजे का होगा।

उदाहरण 2: जब ग्रिनिच पर दोपहर के 12 बजे हों, तो 90° पश्चिम देशांतर पर स्थित न्यू औरलियेंस (अक्टूबर 2005 में कैटरीना तूफान से सबसे अधिक प्रभावित होने वाला क्षेत्र) का स्थानीय समय क्या होगा?

प्रकथन: प्रमुख याम्योत्तर के पश्चिम में प्रति 1° देशांतर पर समय 4 मिनट की दर से घटता है।

हल: ग्रिनिच एवं न्यू औरलियेंस के बीच का अंतर= 90° देशांतर

समय का कुल अंतर = 90 × 4 = 360 मिनट

= 360/60 = 6 घंटा

इसलिए न्यू-औरलियेंस का स्थानीय समय ग्रिनिच से 6 घंटा कम यानी पूर्वाह्न के 6 बजे का होगा।

इसी प्रकार विश्व के किसी भी स्थान का समय ज्ञात किया जा सकता है। किसी देश की सीमाओं के भीतर यथासंभव समय में एकरूपता बनाए रखने के लिए उस देश के केंद्रीय याम्योत्तर को उस देश का मानक याम्योत्तर माना जाता है तथा उसके स्थानीय समय को देश का मानक समय माना जाता है। मानक याम्योत्तर का चुनाव इस तरह किया जाता है कि ये 150° या 7°30' द्वारा विभाजित हों, ताकि मानक समय एवं ग्रिनिच माध्य समय के बीच के अंतर को 1 या आधे घंटे के गुणक के रूप में बताया जा सके।

भारत के मानक समय का निर्धारण 82°30' पू. (E) से किया जाता है, जो कि मिर्ज़ापुर से गुजरती है। अतः भारतीय मानक समय (IST) ग्रिनिच माध्य समय (GMT) से 5.30 घंटे आगे है। (82°30' × 4)÷ (60 मिनट) = 5 घंटे 30 मिनट। इसी प्रकार, विश्व के सभी देश अपनी प्रशासनिक सीमाओं के भीतर एक मानक याम्योत्तर तय करके अपने देश के स्थानीय समय का निर्धारण करते हैं। पूर्व-पश्चिम में अधिक विस्तार वाले देश एक से अधिक मानक याम्योत्तर चुन सकते हैं, जैसा कि रूस, कनाडा तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में है। विश्व को 24 टाइम ज़ोन में विभाजित किया गया है (चित्र 3.6)।

चित्र 3.6: विश्व के प्रमुख टाइम ज़ोन

अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा

जहाँ विश्व को 24 टाइम ज़ोन में विभाजित किया गया है, वहीं एक स्थान तो एेसा होगा जहाँ ग्रिनिच समय से पूरे दिन का अंतर होगा, अर्थात् एेसा स्थान, जहाँ से पृथ्वी पर सचमुच दिन का प्रारंभ होता है। 180° देशांतर रेखा लगभग उसी स्थान पर स्थित है, जहाँ से अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा गुजरती है। इस देशांतर के समय में 0° देशांतर से ठीक 12 घंटे का अंतर होता है, चाहे प्रमुख याम्योत्तर से पूर्व जाएँ या पश्चिम। हम जानते हैं कि प्रमुख याम्योत्तर के पूर्व में समय बढ़ता है तथा पश्चिम में घटता है। इसलिए, जब कोई व्यक्ति प्रमुख याम्योत्तर से पूर्व दिशा की ओर जाता है, तो वहाँ का समय 0° देशांतर से 12 घंटे कम होगा और पश्चिम दिशा में जाने वाले दूसरे व्यक्ति के लिए समय 12 घंटे अधिक होगा। उदाहरण के लिए, मंगलवार को पूर्व दिशा में जाने वाले व्यक्ति के लिए अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा को पार कर लेने पर बुधवार का दिन हो जाएगा। इसी प्रकार, उसी दिन अपनी यात्रा शुरू करने वाले, लेकिन पश्चिम दिशा में जाने वाले व्यक्ति के लिए अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा पार कर लेने के बाद सोमवार का दिन हो जाएगा।

अभ्यास

1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें:

(i) पृथ्वी पर दो प्राकृतिक संदर्भ बिंदु कौन-से हैं?

(ii) बृहत वृत्त क्या है?

(iii) निर्देशांक क्या है?

(iv) सूर्य पूर्व से पश्चिम जाता हुआ क्यों दिखाई देता है?

(v) स्थानीय समय से आप क्या समझते हैं?

2. अक्षांशों एवं देशांतरों के बीच अंतर स्पष्ट करें।

क्रियाकलाप

1. एटलस की सहायता से निम्नलिखित स्थानों को खोजकर उनके अक्षांश एवं देशांतर लिखें।

स्थान अक्षांश देशांतर

(i) मुंबई

(ii) वलॉदिवोस्तोंक

(iii) कैरो

(iv) न्यूयॉर्क

(v) ओटावा

(vi) जेनेवा

(vii) जोहानसबर्ग

(viii) सिडनी

2. जब प्रमुख याम्योत्तर पर दिन के 10 बजे हों, तो निम्नलिखित शहरों में क्या समय होगा?

(i) दिल्ली

(ii) लंदन

(iii) टोकियो

(iv) पेरिस

(v) कैरो

(vi) मॉस्को


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