पृथ्वी पर जीवन इस पुस्तक के विभ्िान्न अध्यायों से अब तक आप पयार्वरण के तीन मुख्य परिमंडल - स्थलमंडल, जलमंडल व वायुमंडल के विषय में जान चुके हैं। आप जानते हैं कि पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीवधारी, जो मिलकर जैवमंडल ;ठपवेचीमतमद्ध बनाते हैं - ये पयार्वरण के दूसरे मंडलों के साथ पारस्परिक िया करते हैं। जैवमंडल में पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जीवित घटक शामिल हैं। जैवमंडल सभी पौधों, जंतुओं, प्राण्िायों ;जिसमें पृथ्वी पर रहने वाले सूक्ष्म जीव भी हैंद्ध और उनके चारों पृथ्वी पर जीवन लगभग हर जगह पाया जाता है।जीवधारी विषुवत् वृत्त से ध्रुवों तक, समुद्री तल सेहवा में कइर् किलोमीटर तक, सूखी घाटियों में,बपफीर्ले जल में, जलमग्न भागों में, व हज़ारों मीटरगहरे धरातल के भौम जल तक में पाए जाते हैं। तरपफ के पयार्वरण के पारस्परिक अंतस±बंध से बना है। अिाकतर जीव स्थलमंडल पर ही मिलते हैं परंतु वुफछ जलमंडल और वायुमंडल में भी रहते हैं। बहुत से ऐसे जीव भी हैं, जो एक मंडल से दूसरे मंडल में स्वतंत्रा रूप से विचरण करते हैं। जैवमंडल और इसके घटक पयार्वरण के बहुतमहत्त्वपूणर् तत्त्व हैं। ये तत्त्व अन्य प्रावृफतिक घटकों जैसे - भूमि, जल व मिट्टðी के साथ पारस्परिक िया करते हैं।ये वायुमंडल के तत्त्वों जैसे - तापमान, वषार्, आद्रर्ता व सूयर् के प्रकाश से भी प्रभावित होते हैं। जैविक घटकों का भूमि, वायु व जल के साथ पारस्परिक आदान - प्रदान जीवों के जीवित रहने, बढ़ने व विकसित होने में सहायक होता है। अध्याय पारिस्िथतिकी ;म्बवसवहलद्ध समाचार पत्रों व पत्रिाकाओं में आप पारिस्िथतिकी व पयार्वरण संबंधी समस्याओं के विषय में पढ़ते होंगे। क्या आपने कभी सोचा है कि ‘इकोलाॅजी’ या पारिस्िथतिकी क्या है? जैसाकि आप जानते हैं, पयार्वरण - जैविक वअजैविक तत्त्वों के मेल से बना है। यह जानना अत्यंत रोचक है कि संतुलन के लिए विभ्िान्न जीवधारियों का होना और बने रहना क्यों आवश्यक है? इस संतुलन के बने रहने के लिए भी विविध प्राण्िायों/जीवधारियों का एक विशेष अनुपात में रहना आवश्यक है, जिससेजैविक व अजैव तत्त्वों में स्वस्थ अंतविर््रफया जारी रहे। पारिस्िथतिकी प्रमुख रूप से जीवधारियों के जन्म,विकास, वितरण, प्रवृिा व उनके प्रतिवूफल अवस्थाओं में भी जीवित रहने से संबंिात है। पारिस्िथतिकी केवल जीवधारियों और उनके आपस में संबंध का ही अध्ययन नहीं है। किसी विशेष क्षेत्रा में किसी विशेष समूह केजीवधारियों का भूमि, जल अथवा वायु ;अजैविक तत्त्वोंद्धसे ऐसा अत±संबंध जिसमें ऊजार् प्रवाह व पोषण शृंखलाएं स्पष्ट रूप से समायोजित हों, उसे पारितंत्रा ;म्बवसवहपबंस ेलेजमउद्ध कहा जाता है। पारिस्िथति के संदभर् में आवास ;ींइपजंजद्ध पयार्वरण के भौतिक व रासायनिक कारकों का योग है। विभ्िान्न प्रकार के पयार्वरण व विभ्िान्न परिस्िथतियों में भ्िान्न प्रकार के पारितंत्रा पाए जाते हैं, जहाँ अलग - अलग प्रकार के पौधे व जीव - जंतु विकास क्रम द्वारा उस पयार्वरण के अभ्यस्त हो जाते हैं। इस प्रकरण को पारिस्िथतिक अनुवूफलन ;म्बवसवहपबंस ंकंचजंजपवदद्ध कहते हैं। भौतिक भूगोल के मूल सि(ांत इकोलोजी ;मबवसवहलद्ध शब्द ग्रीक भाषा के दो शब्दों ;व्पावेद्ध ‘ओइकोस’ और ;सवहलद्ध ‘लोजी’ से मिलकर बना है। ओइकोस का शाब्िदक अथर् ‘घर तथा ‘लोजी’ का अथर् विज्ञान या अध्ययन से है। शाब्िदक अथार्नुसार इकोलोजी - पृथ्वी पर पौधों, मनुष्यों, जतुओं व सूक्ष्म जीवाणुओं के ‘घर - के रूप में अध्ययन है, एक - दूसरे पर आश्रित होने के कारण ही ये एक साथ रहते हैं जमर्न प्राणीशास्त्राी अनर्स्ट हैक्कल ;म्तदेज भ्ंमबामसद्ध, जिन्होंने सवर्प्रथम सन् 1869 में ओइकोलोजी ;व्मावसवहपमद्ध शब्द का प्रयोग किया, पारिस्िथतिकी के ज्ञाता के रूप में जाने जाते हैं। जीवधारियों ;जैविकद्ध व अजैविक ;भौतिक पयार्वरणद्ध घटकों के पारस्परिक संपकर् के अघ्ययन को ही पारिस्िथतिकी विज्ञान कहते हैं। अतः जीवधारियों का आपस में व उनका भौतिक पयार्वरण से अंतसब±धांेका वैज्ञानिक अध्ययन ही पारिस्िथतिकी है। पारितंत्रा के प्रकार ;ज्लचमे व िम्बवेलेजमउेद्ध पारितंत्रा मुख्यतः दो प्रकार के हैंः स्थलीय ;ज्मततमेजतपंसद्ध पारितंत्रा व जलीय ;।ुनंजपबद्ध पारितंत्रा। स्थलीय पारितंत्रा को पुनः ‘बायोम’ ;ठपवउमेद्ध में विभक्त किया जा सकता है। बायोम, पौधों व प्राण्िायों का एक समुदाय है, जो एक बड़े भौगोलिक क्षेत्रा में पाया जाता है। पृथ्वी पर विभ्िान्न बायोम की सीमा का निधार्रण जलवायु वअपक्षय संबंधी तत्त्व करते हैं। अतः विशेष परिस्िथतियों में पादप व जंतुओं के अंतस±बंधो के वुफल योग को ‘बायोम’ कहते हैं। इसमें वषार्, तापमान, आदर््रता व मिट्टðी संबंधी अवयव भी शामिल हैं। संसार के वुफछ प्रमुख पारितंत्रा: वन, घास क्षेत्रा, मरुस्थल और टुण्ड्रा ;ज्नदकतंद्ध पारितंत्रा हैं। जलीय पारितंत्रा को समुद्री पारितंत्रा व ताजे जल के पारितंत्रा में बाँटा जाता है। समुद्रीपारितंत्रा में महासागरीय, ज्वारनदमुख, प्रवाल भ्िािा ;ब्वतंस तममद्धि, पारितंत्रा सम्िमलित हैं। ताजे जल के पारितंत्रा में झीलें, तालाब, सरिताएँ, कच्छ व दलदल ;डंतेीमे ंदक इवहेद्ध शामिल हैं। पारितंत्रा की कायर् प्रणाली व संरचना ;ैजतनबजनतम ंदक निदबजपवदे व िम्बवेलेजमउेद्ध पारितंत्रा की संरचना में वहाँ उपलब्ध पौधों व जंतुओं की प्रजातियों का वणर्न सम्िमलित है। यह उनके ;प्राण्िायों व पौधों की प्रजातियों केद्ध इतिहास, वितरण व उनकी संख्या को भी वण्िार्त करता है। संरचना की दृष्िट से, सभी पारितंत्रा में जैविक व अजैविक कारक होते हैं। अजैविक या भौतिक ;।इपवजपब ंिबजवतेद्ध कारकों में तापमान, वषार्, सूयर् का प्रकाश, आद्रर्ता, मृदा की स्िथतिव अजैविक या अकाबर्निक तत्त्व ;काबर्न डाइर् आक्साइड, जल, नाइट्रोजन, वैफल्िशयम, पफाॅस्पफोरस, पोटाश्िायम आदिद्ध सम्िमलित हैं। जैविक कारकों ;ठपवजपब ंिबजवतेद्ध में उत्पादक, उपभोक्ता ;प्राथमिक, द्वितीयक व तृतीयकद्ध तथा अपघटक शामिल हैं। उत्पादकों में सभी हरे पौधे सम्िमलित हैं, जो प्रकाश - संश्लेषण प्रिया द्वारा अपना चित्रा 15.1: परितंत्रा की कायर् प्रणाली व संरचना भोजन बनाते हैं। प्रथम श्रेणी के उपभोक्ताओं में शाकाहारी जंतु जैसे - हिरण, बकरी, चूहे और सभी पौधों पर निभर्र जीव शामिल हैं। द्वितीयक श्रेणी के उपभोक्ताओं में सभी माँसाहारी जैसे - साँप, बाघ, शेर आदि शामिल हैं। वुफछ माँसाहारी, जो दूसरे माँसाहारी जीवों पर निभर्र हैं, उन्हें चरम स्तर के माँसाहारी ;ज्वच बंतदपअवतमेद्ध के रूप में जाना जाता है। जैसे - बाज़ और नेवला आदि। अपघटक, वे हैं, जो मृत जीवों पर निभर्र हंै ;जैसे - कौवा और गि(द्ध, तथा वुफछ अन्य अपघटक, जैसे - बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्म जीवाणु मृतकों को अपघटित कर उन्हें सरल पदाथो± में परिवतिर्त करते हैं। प्राथमिक उपभोक्ता, उत्पादक पर निभर्र हैं, जबकि प्राथमिक उपभोक्ता, द्वितीयक उपभोक्ताओं के भोजन बनते हैं। द्वितीयक उपभोक्ता पिफर तृतीयक उपभोक्ताओं के द्वारा खाए जाते हैं। अपघटक प्रत्येक स्तर पर मृतकों पर निभर्र होते हैं। ये अपघटक इन्हें ;मृतकों कोद्ध विभ्िान्न पदाथो±, जैसे - काबर्निक व अकाबर्निक अवयवोंऔर मिट्टðी की उवर्रता के लिए पोषक तत्त्वों में परिवतिर्त कर देते हैं। पारितंत्रा के जीवाणु एक खाद्य - शृंखला से परस्पर जुड़े हुए होते हैं। उदाहरण के लिए - पौधे पर जीवित रहने वाला एक कीड़ा ;ठममजसमद्ध एक मेंढक का भोजन है, जो मेढक साँप का भोजन है और साँप एक बाश द्वारा खा लिया जाता है। यह खाद्य क्रम और इस क्रम सेएक स्तर से दूसरे स्तर पर ऊजार् प्रवाह ही खाद्य शृंखला ;थ्ववक बींपदद्ध कहलाती है। खाद्य शृंखला की प्रियामें एक स्तर से दूसरे स्तर पर ऊजार् के रूपांतरण कोऊजार् प्रवाह ;थ्सवू व िमदमतहलद्ध कहते हैं। खाद्य शृंखलाएँ पृथक अनुक्रम न होकर एक दूसरे से जुड़ी होती हैं। उदाहरणाथर् - एक चूहा, जो अन्न पर निभर्र है, वह अनेक द्वितीयक उपभोक्ताओं का भोजन है और तृतीयक माँसाहारी अनेक द्वितीयक जीवों से अपने भोजन की पूतिर् करते हैं। इस प्रकार प्रत्येक माँसाहारी जीव एक से अिाक प्रकार के श्िाकार पर निभर्र है। परिणामस्वरूप खाद्य शृंखलाएँ आसपास में एक - दूसरे से जुड़ी हुइर् हैं। प्रजातियों के इस प्रकार जुड़े होने ;अथार्त् जीवों की खाद्यशृंखलाओं के विकल्प उपलब्ध होने परद्ध को खाद्य जाल ;थ्ववक ूमइद्ध कहा जाता है। सामान्यतः दो प्रकार की खाद्य शृंखलाएँ पाइर् जाती हैं - चराइर् खाद्य शृंखला ;ळतं्रपदह विवक.बींपदद्ध और अपरद खाद्य शृंखला ;क्मजतपजने विवक बींपदद्ध चराइर् खाद्य शृंखला पौधों ;उत्पादकद्ध से आरंभ होकर माँसाहारी ;तृतीयक उपभोक्ताद्ध तक जाती है, जिसमेंशाकाहारी मघ्यम स्तर पर हैं। हर स्तर पर ऊजार् का ”ास होता है, जिसमें श्वसन, उत्सजर्न व विघटन प्रियाएं सम्िमलित हैं। खाद्य शृंखला में तीन से पाँच स्तर होतेहैं और हर स्तर पर ऊजार् कम होती जाती है। अपरद खाद्य शृंखला चराइर् खाद्य शृंखला से प्राप्त मृत पदाथो± पर निभर्र है और इसमें काबर्निक पदाथर् का अपघटन सम्िमलित हैं। बायोम के प्रकार ;ज्लचमे व िठपवउमेद्ध पिछले अध्ययन से आप जान गए हैं कि ‘बायोम’ का अथर् क्या है? आओ, हम अब संसार के वुफछ प्रमुख बायोम पहचानें और उन्हें रेखांकित करें। संसार के पाँच प्रमुख बायोम इस प्रकार हैं: वन बायोम, मरुस्थलीय बायोम, घासभूमि बायोम, जलीय बायोम और उच्च प्रदेशीय बायोम। इनकी विशेषताओं का विस्तारपूवर्क वणर्न सारणी 15ण्1 में वण्िार्त है। जैव भू - रासायनिक चक्र ;ठपवहमवबीमउपबंस ब्लबसमद्ध सूयर् ऊजार् का मूल स्रोत है। जिसपर सम्पूणर् जीवन निभर्रहै। यही ऊजार् जैवमंडल में प्रकाश संश्लेषण - िया द्वारा जीवन प्रिया आरंभ करती है, जो हरे पौधों के लिएभोजन व ऊजार् का मुख्य आधार है। प्रकाश संश्लेषण के दौरान काबर्न डाइर्आॅक्साइर्ड, आॅक्सीजन व काबर्निक यौगिक में परिवतिर्त हो जाती है। धरती पर पहुँचने वाले सूयार्ताप का बहुत छोटा भाग ;केवल 0ण्1 प्रतिशतद्ध प्रकाशसंश्लेषण प्रिया में काम आता है। इसका आधे से अिाक भाग पौधे की श्वसन - विसजर्न िया में और शेष भाग अस्थाइर् रूप से पौधे के अन्य भागों में संचित हो जाता है। पृथ्वी पर जीवन विविध प्रकार के जीवित जीवों के रूप में पाया जाता है। ये जीवधारी विविध प्रकार के पारिस्िथतकीय अंतस±बंधों पर जीवित हैं। जीवधारी बहुलता भौतिक भूगोल के मूल सि(ांत सारणी 15.1ः संसार के बायोम बायोम उप - प्रकार प्रदेश जलवायु संबंधीविशेषताएँ मृदा वनस्पतिजात व प्राणी जात वन ;थ्वतमेजद्ध ।ण् उष्ण कटिबंधीय ।1ण् भूमध्यरेखीय ।2ण् पणर्पाती ठण् शीतोष्ण कटिबंधीय ब्ण् बोरियल ।1ण् भूमध्य रेखा से 10° उत्तर व दक्ष्िाण अक्षांश ।2ण् 10° से 25° उत्तर व दक्ष्िाण अक्षांश ठण् पूवीर् उत्तरी अमेरिका,उत्तरी - पूवीर् एश्िाया, पश्िचमी व मध्य यूरोप ब्ण् यूरेश्िाया व उत्तर अमेरिका का उच्च ।1ण् तापमान 20° से 25° से॰ लगभग एकसमान वितरण ।2ण् तापमान 25° से 30° से॰ वषार् - वाष्िार्क औसत 1ए000 मि॰मी॰ एक )तु में ठण् तापमान 20° से 30° से॰ वषार् - समान रूप से वितरित - 750 से ।1ण् अम्लीय, पोषकतत्त्वों की कमी। ।2ण् पोषक तत्त्वों में धनी ठण् उपजाऊ, अव - घटक जीवों ;व वूफड़ा ककर्ट आदि पदाथो±द्ध से भरपूर ब्ण् अम्लीय व पोषक तत्त्वों की ।1ण् असंख्य वृक्षों के झुंड, लंबे व घने वृक्ष। ।2ण् कम घने, मध्यम ऊँचाइर्के वृक्ष, अिाकप्रजातियों का एक साथ पाया जाना। दोनों में कीट - पतंगे,चमगादड़, पक्षी वस्तनधारी जंतुओं कापाया जाना। ठण् मध्यम घने चैड़े पत्तेवाले वृक्ष। पौधों की अक्षांशीय भाग - 1ए500 मि.मी कमी। मिट्टðी की प्रजातियों में कम साइबेरिया का वुफछ भाग, अलास्का, कनाडा व स्केंडेनेवियन देश। स्पष्ट )तुएं तथाअसाधारण शीत। ब्ण् छोटी आद्रर् )तु वमध्यम रूप से गमर् ग्रीष्म )तु तथा लंबी अपेक्षावृफत पतली परत। विविधता - ओक,बीच, मेप्पल आदिसामान्य प्रजातियाँ।गिलहरी, खरगोश,पक्षी, काले भालू, ;वषार् रहितद्ध शीत पहाड़ी शेर व स्वंफक )तु। आदि। वषार्ःमुख्यतः हिमपातके रूप में 400 से ब्ण् सदाबहार कोणधारीवन जैसे - पाइन, 1ए000 मि॰मी॰ पफर व स्पू्रस आदि। कठपफोड़ा, चील, भालू, हिरण, खरगोश, भेडि़ये व चमगादड़ आदि मुख्य प्राणी। मरुस्थलीय 1.गमर् व उष्ण मरुस्थल 1. सहारा, कालाहारी, तापमान: 20ह् से 45ह् से॰। पोषक तत्त्वों से 1 से 3 न्यून वनस्पति - 2.अधर्शुष्क मरुस्थल मरुस्थली, रूब - 21 से 38ह् से॰। भरपूर व जैव पदाथो± वुफछ बड़े स्तनधारी कीट 3.तटीय मरुस्थल एल - खाली। 15 से 35ह् से॰। का बहुत कम या पंतगें, रेंगने वाले जीवधारी 4.शीत मरुस्थल 2गमर् मरुस्थल के गौण क्षेत्रा एटेकामा। 3टुण्ड्रा जलवायु प्रदेश 2 से 25ह् से॰। वषार्: । से क् .50 मि॰मी॰ से कम न होना। व पक्षी।4. खरगोश, चूहे, हिरण वपृथ्वी पर रहने वाली गिलहरी। घास भूमि 1.उष्ण कटिबंधीय 2.शीतोष्ण कटिबंधीय ;स्टैपीद्ध 1. अप्रफीका के विशाल क्षेत्रा, आस्ट्रेलिया, दक्ष्िाण अमेरिका व भारत 2. यूरेश्िाया के वुफछ भागव उत्तर अमेरिका। गमर्, उष्ण जलवायु, वषार् 500 से 1ए250 मि.मी.। उष्ण ग्रीष्म व शीत )तु। वषार्: 500 से 900 मि.मी.। सरंिा्रत मृदा व साथ ही ह्यूमस की पतली परत। घास, पेड़ व लंबी झाडि़यों की अनुपस्िथति। जिरापफ, जेबरा, भैंस, चीता, लक्कड़बग्घा, हाथी, चूहे, साँप व अन्य कीड़े आदि जीव। घास, कहीं - कहीं वृक्ष जैसे - ओक व मुलायम बायोम उप - प्रकार प्रदेश जलवायु संबंधीविशेषताएँ मृदा वनस्पतिजात व प्राणी जात लकड़ी के वृक्ष - विलो आदि। गशेल जेबरा, गेंडे, जंगली घोड़े, शेर, तरह - तरह के पक्षी, कीड़े, साँप आदि जीव - जंतु जलीय ;।बुनंजपबद्ध 1. ताजा जल के 2. समुद्री जल के 1.झीलें, नदियाँ, सरिताएँ व अन्य आद्रर् भूमि 2महासागर, प्रवाल - भ्िािा, लैगून व ज्वारनद मुख ;म्ेजनंतपमेद्ध 1 से 2ह् से.। तापमान में विविधता - वायुदाब व आद्रर्ता अिाक 1. जल: दलदल 2. जलः समुद्री दलदल शैवाल व अन्य जलीय व समुद्री पादप समुदाय व साथ ही पानी में रहने वाली जंतु व प्राणी। पवर्तीय ;।सजपजनकपदंसद्ध ...... ऊँची पवर्तीय श्रेण्िायों के ढाल जैसे - हिमालय एंडीज व राॅकी पवर्त क्षेत्रा तापमान व वषार् मे भ्िान्नता - अक्षांशों पर आधारित। ढाल - रेगोलिथ से ढके हुए। पणर्पाती से टुण्ड्रा प्रकारकी वनस्पति, ऊँचाइर् के आधार पर भ्िान्नता। व विविधता में ही जिंदा रह सकते हैं। इसमें ;अथार्त्, जीवित रहने की प्रवि्रफया मेंद्ध वििावत प्रवाह जैसे - ऊजार्, जल व पोषक तत्त्वों की उपस्िथति सम्िमलित है। इनकी उपलब्धता संसार के विभ्िान्न भागों में भ्िान्न है। यह भ्िान्नता क्षेत्राीय होने के साथ - साथ सामयिक ;अथार्त् वषर् के 12 महीनों में भी भ्िान्न हैद्ध भी है। विभ्िान्न अध्ययनों से पता चलता है कि पिछले 100 करोड़ वषोर्ं में वायुमंडल व जलमंडल की संरचना में रासायनिक घटकों का संतुलन लगभग एक जैसा अथार्त् बदलावरहित रहा है। रासायनिक तत्त्वों का यह संतुलन पौधे वप्राणी ऊतकों से होने वाले चक्रीय प्रवाह के द्वारा बनारहता है। यह चक्र जीवों द्वारा रासायनिक तत्त्वों के अवशोषण से आरंभ होता है और उनके वायु, जल व मिट्टðी में विघटन से पुनः आरंभ होता है। ये चक्र मुख्यतः सौर ताप से संचालित होते हैं। जैवमंडल में जीवधारी वपयार्वरण के बीच ये रासायनिक तत्त्वों के चक्रीय प्रवाह जैव भू - रासायनिक चक्र ;ठपवहमवबीमउपबंस बलबसमेद्ध कहे जाते हैं। ‘बायो’ ;ठपवद्ध का अथर् है जीव तथा ‘ज्यो’ ;ळमवद्ध का तात्पयर् पृथ्वी पर उपस्िथत चट्टðानें, मिट्टðी, वायु व जल से है। जैव भू - रासायनिक चक्र दो प्रकार के हैं - एक गैसीय ;ळंेमवने बलबसमद्ध और दूसरा तलछटी चक्र ;ैमकपउमदजंतल बलबसमद्ध, गैसीय चक्र में पदाथर् का मुख्य भंडार/स्रोत वायुमंडल व महासागर हैं। तलछटी चक्र के प्रमुख भंडार पृथ्वी की भूपपर्टी पर पाइर् जाने वाली मिट्टðी, तलछट व अन्य चट्टðानें हैं। जलचक्र ;ज्ीम ूंजमत बलबसमद्ध सभी जीवधारी, वायुमंडल व स्थलमंडल में जल का एक चक्र बनाए रखते हैं, जो तरल, गैस व ठोस अवस्था में है - इसे ही जलीय चक्र कहा जाता है ;जलचव्रफ के लिए अध्याय 13 देखेंद्ध। काबर्न चक्र ;ज्ीम बंतइवद बलबसमद्ध सभी जीवधारियों में काबर्न पाया जाता है। यह सभीकाबर्निक यौगिक का मूल तत्त्व हैं। जैवमंडल में असंख्य काबर्न यौगिक के रूप में जीवों में विद्यमान हैं। काबर्न चक्र काबर्न डाइआॅक्साइड का परिवतिर्त रूप है। यह परिवतर्न पौधों में प्रकाश - संश्लेषण प्रिया द्वारा काबर्न डाइ आॅक्साइड के यौगिकीकरण द्वारा आरंभ होता है। इस प्रिया से काबोर्हाइड्रेट्स व ग्लूकोस बनता है, जो काबर्निक यौगिक जैसे - स्टाचर्, सेल्यूलोस, सव्रफोश ;ैनबतवेमद्ध के रूप में पौधों में संचित हो जाता है। काबोर्हाइड्रेट्स का वुफछ भाग सीधे पौधों की जैविक ियाओं में प्रयोग हो जाता है। इस प्रिया के दौरान चित्रा 15.2: काबर्न चव्रफ विघटन से पौधों के पत्तों व जड़ों द्वारा काबर्न डाइर्आॅक्साइड गैस मुक्त होती है, शेष काबोर्हाइड्रेट्स, जो पौधों कीजैविक ियाओं में प्रयुक्त नहीं होते, वे पौधों के ऊतकों में संचित हो जाते हैं। ये पौधे या तो शाकाहारियों के भोजन बनते हैं, अन्यथा सूक्ष्म जीवों द्वारा विघटित हो जाते हैं। शाकाहारी उपभोग किये गए काबोर्हाइड्रेटस को काबर्न डाइआॅक्साइड में परिवतिर्त करते हैं, और श्वसन िया द्वारा वायुमंडल में छोड़ते हैं। इनमें शेष काबोर्हाइड्रेटस का जंतुओं के मरने पर, सूक्ष्म जीव अपघटन करते हैं। सूक्ष्म जीवाणुओं द्वारा काबोर्हाइड्रेट्स आॅक्सीजन प्रिया द्वारा काबर्न डाइआॅक्साइड मंे परिवतिर्त होकर पुनः वायुमंडल में आ जाती है ;चित्रा 15.2द्ध। आॅक्सीजन चक्र ;ज्ीम वगलहमद बलबसमद्ध प्रकाश - संश्लेषण िया का प्रमुख सह - परिणाम ;ठल चतवकनबजद्ध आॅक्सीजन है। यह काबोर्हाइड्रेट्स केआॅक्सीकरण में सम्िमलित है जिससे ऊजार्, काबर्न डाइआॅक्साइड व जल विमुक्त होते हैं। आॅक्सीजन चक्रबहुत ही जटिल प्रिया है। बहुत से रासायनिक तत्त्वों और सम्िमश्रणों में आॅक्सीजन पाइर् जाती है। यह नाइट्रोजन के साथ मिलकर नाइट्रेट बनाती है तथा बहुत से अन्यखनिजों व तत्त्वों से मिलकर कइर् तरह के आॅक्साइड बनाती है जैसे - आयरन आॅक्साइड, एल्यूमिनियम आॅक्साइड आदि। सूयर्प्रकाश में प्रकाश - संश्लेषण प्रिया के दौरान, भौतिक भूगोल के मूल सि(ांत जल अणुओें ;भ्2व्द्ध के विघटन से आॅक्सीजन उत्पन्न होती है और पौधों की वाष्पोत्सजर्न प्रिया के दौरान भी यह वायुमंडल मंे पहुंचती हैं। नाइट्रोजन चक्र ;ज्ीम दपजतवहमद बलबसमद्ध वायुमंडल की संरचना का प्रमुख घटक नाइट्रोजन, वायुमंडलीय गैसों का 79 प्रतिशत भाग है। विभ्िान्न काबर्निक यौगिक जैसे - एमिनो एसिड, न्यूक्िलक एसिड, विटामिन व वणर्क ;च्पहउमदजद्ध आदि में यह एकमहत्त्वपूणर् घटक है। ;वायु में स्वतंत्रा रूप से पाइर् जाने वाली नाइट्रोजन को अिाकांश जीव प्रत्यक्ष रूप से ग्रहण करने में असमथर् हैंद्ध केवल वुफछ विश्िाष्ट प्रकार के जीव जैसे - वुफछ मृदा जीवाणु व ब्लू ग्रीन एल्गी ;ठसनम हतममद ंसहंमद्ध ही इसे प्रत्यक्ष गैसीय रूप में ग्रहण करने में सक्षम हैं। सामान्यतः नाइट्रोजन यौगिकीकरण ;थ्पगंजपवदद्ध द्वारा ही प्रयोग में लाइर् जाती है। नाइट्रोजन का लगभग 90 प्रतिशत भाग जैविक ;ठपवसवहपबंसद्ध है, अथार्त् जीव ही ग्रहण कर सकते हैं। स्वतंत्रा नाइट्रोजन का प्रमुख स्रोत मिट्टðी के सूक्ष्म जीवाणुओं की िया व संबंिात पौधों की जड़ें व रंध्र वाली मृदा है, जहाँ से यह वायुमंडल में पहुँचती है। वायुमंडल में भी बिजली चमकने ;स्पहीजमदपदहद्ध व अंतरिक्ष विकिरण ;ब्वेउपब तंकपंजपवदद्ध द्वारा नाइट्रोजन का यौगिकीकरण होता है। महासागरों में वुफछ समुद्री जीव भी इसका यौगिकीकरण करते हैं। वायुमंडलीय नाइट्रोजन के इस तरह यौगिक रूप में उपलब्ध होने पर हरे पौधों में इसका स्वांगीकरण ;छपजतवहमद ंेेपउपसंजपवदद्ध होता है। शाकाहारी जंतुओं द्वारा इन पौधों के खाने पर इसका ;नाइट्रोजनद्ध वुफछ भाग उनमें चला जाता है। पिफर मृत पौधों व जानवरों के नाइट्रोजनी अपश्िाष्ट ;म्गबतमजपवद व िदपजतवहमदवने ूंेजमेद्ध मिट्टðी, में उपस्िथत बैक्टीरिया द्वारा नाइट्राइट में परिवतिर्त हो जाते हैं। वुफछ जीवाणु नाइट्राइट को नाइट्रेट में परिवतिर्त करने में सक्षम होते हैं व पुनः हरे पौधों द्वारा नाइट्रोजन - यौगिकीकरण हो जाता है। वुफछ अन्य प्रकार के जीवाणु इन नाइट्रेट को पुनः स्वतंत्रा नाइट्रोजन में परिवतिर्त करने में सक्षम होते हैं और इस प्रिया को डी नाइट्रीकरण ;क्म.दपजतपपिबंजपवदद्ध कहा जाता है ;चित्रा 15.3द्ध। अन्य खनिज चक्र ;व्जीमत उपदमतंस बलबसमेद्ध जैव मंडल में मुख्य भू - रासायनिक तत्त्वों - काबर्न, आॅक्सीजन, नाइट्रोजन और हाइड्रोजन के अतिरिक्त पौधों व प्राणीजीवन के लिए अत्यिाक महत्त्व के बहुत से अन्य खनिज मिलते हैं। जीवधारियों के लिए आवश्यक ये खनिज पदाथर् प्राथमिक तौर पर अकाबर्निक रूप में मिलते हैं, जैसे - पफाॅस्पफोरस, सल्पफर, वैफल्िशयम और पोटैश्िायम। प्रायः ये घुलनशील लवणों के रूप में मिट्टðी, में या झील में अथवा नदियों व समुद्री जल में पाए जाते हैं। जब घुलनशील लवण जल चक्र में सम्िमलित हो जाते हैं, तब ये अपक्षय प्रिया द्वारा पृथ्वी की पपर्टी पर और पिफर बाद में समुद्र तक पहुँच जाते हैं। अन्य लवण तलछट के रूप में धरातल पर पहुँचते हैं और पिफर अपक्षय से चक्र में शमिल हो जाते हैं। सभी जीवधारी अपने पयार्वरण में घुलनशील अवस्था में उपस्िथत खनिज लवणों से ही अपनी खनिजों की आवश्यकता को पूरा करते हैं। वुफछ अन्य जंतु पौधों व प्राण्िायों के भक्षण से इन खनिजों को प्राप्त करते हैं। जीवधारियों की मृत्यु के बाद ये खनिज अपघटित व प्रवाहित होकर मिट्टðी व जल में मिल जाते हैं। पारिस्िथतिक संतुलन ;म्बवसवहपबंस इंसंदबमद्ध किसी पारितंत्रा या आवास में जीवों के समुदाय में परस्पर गतिक साम्यता की अवस्था ही पारिस्िथतिक संतुलन है। यह तभी संभव है, जब जीवधारियों की विविधता अपेक्षावृफत स्थायी रहे। क्रमशः परिवतर्न भी हो, लेकिन ऐसा प्रावृफतिक अनुक्रमण ;छंजनतंस ेनबबमेेपवदद्ध के द्वारा ही होता है। इसे पारितंत्रा में हर प्रजाति की संख्या के एक स्थाइर् संतुलन के रूप में भी वण्िार्त किया जा सकता है। यह संतुलन निश्िचत प्रजातियों में प्रतिस्पधार् व आपसी सहयोग से होता है। वुफछ प्रजातियों के जिंदा रहने के संघषर् से भी पयार्वरण संतुलन प्राप्त किया जाता है। संतुलन इस बात पर भी निभर्र करता है कि वुफछ प्रजातियाँ अपने भोजन व जीवित रहने के लिए दूसरी प्रजातियों पर निभर्र रहती हैं ;जिससे प्रजातियों की संख्या निश्िचत रहती है और संतुलन बना रहता हैद्ध इसके उदाहरण विशाल घास के मैदानों में मिलते हैं, जहाँ शाकाहारी जंतु ;हिरण, जेबरा व भैंस आदिद्ध अत्यिाक संख्या में होते हैं। दूसरी तरपफ माँसाहारी ;बाघ, शेर आदिद्ध अिाक नहीं होते और शाकाहारियों के श्िाकार पर निभर्र होते हैं, अतः इनकी संख्या नियंित्रात रहती है। पौधों के पारिस्िथतिक संतुलन में बदलाव के कारण हैं। जैसे - वनों की प्रारंभ्िाक प्रजातियों में कोइर् व्यवधन जैसे - स्थानांतरी वृफष्िा में वनों को सापफ करने से प्रजातियों के वितरण में बदलाव आता है। यह परिवतर्न प्रतिस्पधार् के कारण है, जहाँ द्वितीय वन - प्रजातियों जैसे - घास, बाँस और चीड़ आदि के वृक्ष प्रारंभ्िाक प्रजातियों के स्थान पर उगते हैं और प्रारंभ्िाक ;व्तपहपदंसद्ध वनों की संरचना को बदल देते हैं। यही अनुक्रमण ;ैनबबमेेपवदद्ध कहलाता है। पारिस्िथतिक असंतुलन के कारण - नइर् प्रजातियों का आगमन, प्रावृफतिक विपदाएं और मानव जनित कारक भी हैं। मनुष्य के हस्तक्षेप से पादप समुदाय का संतुलन प्रभावित होता है, जो अन्ततोगत्वा पूरे पारितंत्रा के संतुलन को प्रभावित करता है। इस असंतुलन से कइर् अन्य द्वितीय अनुक्रमण आते हैं। प्रावृफतिक संसाधनों पर जनसंख्या दबाव भौतिक भूगोल के मूल सि(ांत से भी पारिस्िथतिकी बहुत प्रभावित हुइर् है। इसने पयार्वरण विशेष आवास स्थानों में पौधों व प्राणी समुदायों में के वास्तविक रूप को लगभग नष्ट कर दिया है और घनिष्ट अंतस±बंध पाए जाते हैं। निश्िचत स्थानों पर जीवों सामान्य पयार्वरण पर भी बुरा प्रभाव डाला है। पयार्वरण में विविधता वहाँ के पयार्वरणीय कारकों का संकेतक है। असंतुलन से ही प्रावृफतिक आपदाएँ जैसे - बाढ़ भूवंफप, इन कारकों का समुचित ज्ञान व समझ ही पारितंत्रा के बीमारियाँ और कइर् जलवायु सबंधी परिवतर्न होते हैं। संरक्षण व बचाव के प्रमुख आधार हैं। अभ्यास 1. बहुवैकल्िपक प्रश्न: ;पद्ध निम्नलिख्िात में से कौन जैवमंडल में सम्िमलित हैं: ;कद्धकेवल पौधे ;खद्ध केवल प्राणी ;गद्धसभी जैव व अजैव जीव ;घद्ध सभी जीवित जीव। ;पपद्ध उष्णकटिबंधीय घास के मैदान निम्न में से किस नाम से जाने जाते हैं? ;कद्धप्रेयरी ;खद्ध स्टैपी ;गद्ध सवाना ;घद्ध इनमें से कोइर् नहीं ;पपपद्ध चट्टðानों में पाए जाने वाले लोहांश के साथ आॅक्सीजन मिलकर निम्नलिख्िात में से क्या बनाती है? ;कद्धआयरन काबोर्नेट ;खद्ध आयरन आॅक्साइड ;गद्धआयरन नाइट्राइट ;घद्ध आयरन सल्पेफट ;पअद्ध प्रकाश - संश्लेषण प्रवि्रफया के दौरान, प्रकाश की उपस्िथति में काबर्न डाइर्आॅक्साइड जल के साथ मिलकर क्या बनाती है? ;कद्धप्रोटीन ;खद्ध काबोर्हाइड्रेट्स ;गद्धएमिनोएसिड ;घद्ध विटामिन 2. निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए: ;पद्ध पारिस्िथतिकी से आप क्या समझते हैं ? ;पपद्ध पारितंत्रा ;म्बवसवहपबंस ेलेजमउद्ध क्या है? संसार के प्रमुख पारितंत्रा प्रकारों को बताएं। ;पपपद्ध खाद्य शृंखला क्या है? चराइर् खाद्य शृंखला का एक उदाहरण देते हुए इसके अनेक स्तर बताएं। ;पअद्ध खाद्य जाल ;थ्ववक ूमइद्ध से आप क्या समझते है? उदाहरण सहित बताएं। ;अद्ध बायोम ;ठपवउमद्ध क्या है? 3. निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए: ;पद्ध संसार के विभ्िान्न वन बायोम ;थ्वतमेज इपवउमेद्ध की महत्त्वपूणर् विशेषताओं का वणर्न करें। ;पपद्ध जैव भू - रासायनिक चक्र ;ठपवहमवबीमउपबंस बलबसमद्ध क्या है? वायुमंडल में नाइट्रोजन का यौगिकीकरण ;थ्पगंजपवदद्ध वैफसे होता है? वणर्न करें। ;पपपद्ध पारिस्िथतिक संतुलन ;म्बवसवहपबंस इंसंदबमद्ध क्या है? इसके असंतुलन को रोकने केमहत्त्वपूणर् उपायों की चचार् करें। परियोजना कायर् ;पद्ध प्रत्येक बायोम की प्रमुख विशेषताओं को बताते हुए विश्व के मानचित्रा पर विभ्िान्न बायोम के वितरण को दशार्इए। ;पपद्ध अपने स्वूफल प्रांगण में पाए जाने वाले पेड़, झाड़ी व सदाबहार पौधों पर एक संक्ष्िाप्त लेख लिखें और लगभग आधे दिन यह पयर्वेक्षण करें कि किस प्रकार के पक्षी इस वाटिका में आते हैं। क्या आप इन पक्ष्िायों की विविधता का भी उल्लेख कर सकते हैं?

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