अध्याय पृथ्वी के धरातल का निमार्ण करने वाले पदाथो± पर अपक्षय की प्रिया के पश्चात् भू - आवृफतिक कारक जैसे - प्रवाहित जल, भूमिगत जल, वायु, हिमनद तथा तरंग अपरदन करते हैं। आप यह जानते ही हैं कि अपरदन धरातलीय स्वरूप को बदल देता है। निक्षेपण प्रिया अपरदन प्रिया का परिणाम है और निक्षेपण से भी धरातलीय स्वरूप में परिवतर्न आता है। चूँकि, यह अध्याय भू - आवृफतियों तथा उनके विकास से संबंिात है, अतः सबसे पहले यह जानें कि भू - आवृफति क्या है? साधारण शब्दों में छोटे से मध्यम आकार के भूखंड भू - आवृफति कहलाते हैं। अगर पृथ्वी के छोटे से मध्यम आकार के स्थलखंड को भू - आवृफति कहते हैं तो भूदृश्य क्या है? बहुत सी संबंिात भू - आवृफतियाँ मिलकर भूदृश्य बनाती हैं, जो भूतल के विस्तृत भाग हैं। प्रत्येक भू - आवृफति की अपनी भौतिक आवृफति, आकार व पदाथर् होते हैं जो कि वुफछ भू - प्रियाओं एवं उनके कारकों द्वारा नि£मत हैं। अिाकतर भू - आवृफतिक प्रियाएँ धीमी गति से कायर् करती हैं और इसी कारण उनके आकार बनने में लंबा समय लगता है। प्रत्येक भू - आवृफति का एक प्रारंभ होता है। भू - आवृफतियों के एक बार बनने के बाद उनके आकार, आवृफति व प्रवृफति में बदलाव आता है जोभू - आवृफतिक प्रियाओं व कायर्कत्तार्ओं के लगातार धीमे अथवा तेज गति के कारण होता है। जलवायु संबंधी बदलाव तथा वायुराश्िायों के उफध्वार्धर अथवा क्षैतिज संचलन के कारण, भू - आवृफतिक प्रियाओं की गहनता से या स्वयं ये प्रियाएँ स्वयं परिव£तत हो जाती हैं जिनसे भू - आवृफतियाँ रूपांतरित होती हैं। विकास भू - आवृफतियाँ तथा उनका विकास का यहाँ अथर् भूतल के एक भाग में एक भू - आवृफति का दूसरी भू - आवृफति में या एक भू - आवृफति के एक रूप से दूसरे रूप में परिव£तत होने की अवस्थाओं से है। इसका अभ्िाप्राय यह है कि प्रत्येक भू - आवृफति के विकास का एक इतिहास है और समय के साथ उसका परिवतर्न हुआ है। एक स्थलरूप विकास की अवस्थाओं से गुजरता है जिसकी तुलना जीवन की अवस्थाओं - युवावस्था, प्रौढ़ावस्था तथा वृ(ावस्था से की जा सकती है। भू - आवृफतियों के विकास के दो महत्त्वपूणर् पहलू क्या हैं? भूतल के लगातार बदलते ऐतिहासिक विकास को समझना अत्यंत आवश्यक है ताकि इसे असंतुलित किए बिना और भविष्य में इसकी संभावनाओं को कम किए बिना इसका प्रभावशाली रूप में उपयोग किया जा सके। भू - आवृफतिक विज्ञान भूतल के इतिहास का पुनअर्ध्ययन है जिसमें इसके आकार, पदाथो± व प्रियाओं जिनसे यह भूतल नि£मत है, का अध्ययन किया जाता है। भूतल पर परिवतर्न अनेक भू - आवृफतिक कारकों के द्वारा किए गये अपरदन से होता है। निःसंदेह निक्षेपण प्रिया भी बेसिनों, घाटियों व निचले स्थलरूपों को भर कर धरातलीय स्वरूप को परिव£तत करती है। अपरदन के पश्चात् निक्षेपण होता है और निक्षेपित तल भी पिफर से अपरदित होते हैं। प्रवाहित जल, भूमिगत जल, हिमनद, पवनें व तरंगें प्रबल अपरनदकारी व निक्षेपणकारी कारक है जिनके साथ अपक्षय व बृहत् क्षरण भी सहायक होकर भूतल को आकार देते हैं और बदलते हैं। ये भू - आवृफतिक कारक लंबे समय तक कायर् करते हुए व्रफमब( ;ैलेजमउंजपबद्ध बदलाव लाते हैं जिसके परिणामस्वरूप स्थलरूपों का अनुव्रफमिक ;ैमुनमदजपंसद्ध विकास होता है। प्रत्येक भू - आवृफतिक कारक एक विशेष प्रकार का स्थलरूप समुच्चय ;।ेेमउइसंहमद्ध बनाता है। यही नहीं, प्रत्येक प्रिया व कारक अपने द्वारा बनाए गए स्थलरूपों पर अपनी एक अनोखी छाप छोड़ते हैं। आप जानते हैं कि अिाकतर भू - आवृफतिक प्रियाएँ बहुत धीरे - धीरे ;जिन्हें महसूस न किया जाएद्ध कायर् करती हैं और उन्हें उनके परिणाम द्वारा ही देखा या मापा जा सकता है। ये परिणाम क्या हैं? ये परिणाम वुफछ और नहीं अपितु स्थलरूप और उनकी विशेषताएँ हैं। अतः इन स्थलरूपों का अध्ययन ही हमें इनकी प्रियाओं और कारकों के विषय में बताएगा जिन्होंने इन्हें नि£मत किया है या कर रहे हैं। अिाकतर भू - आवृफतिक प्रियाओं का बोध नहीं होता। ऐसी वुफछ प्रियाएँ बताएँ जो देखी जा सकती हैं तथा वुफछ ऐसी जिन्हें देखा नहीं जा सकता। चूँकि, भू - आवृफतिक कारक अपरदन व निक्षेपण में सक्षम हैं, अतः अपरदित और निक्षेपित - दो प्रकार के स्थलरूपों का निमार्ण होता है। प्रत्येक कारक द्वारा कइर् प्रकार के स्थलरूप विकसित होते हैं, जो चट्टðानों की संरचना तथा प्रकार यथा मोड़, जोड़, विभंग, कठोरता, कोमलता, पारगम्यता तथा अपारगम्यता भ्रंश, दरार, जोड़ आदि पर निभर्र करते हैं। वुफछ अन्य स्वतंत्रा नियंत्राक भी हैं जैसे ;पद्ध समुद्र तल का स्थायित्व, ;पपद्ध भूतल का विवर्तनिक स्वरूप ;पपपद्ध जलवायु - जो स्थलरूपों के विकास को प्रभावित करते हैं। इन तीनों नियंत्राक कारकों में से किसी में व्यवधान आने के कारण भी स्थलरूपों का व्रफमब( एवं अनुव्रफमिक विकास को बािात कर सकता है। इस अध्याय में आगे प्रत्येक भू - आवृफतिक कारक जैसे - प्रवाहित जल, भौम जल, हिमनद, तरंग और पवनें आदि का संक्ष्िाप्त विवरण प्रस्तुत है। यह भी प्रस्तुत है कि इन कारकों द्वारा भूतलीय अपरदन वैफसे प्रभावित होता है। इसके साथ ही वुफछ अपरदित व निक्षेपित स्थलरूपों का विकास भी प्रस्तुत किया जाता है। प्रवाहित जल आद्रर् प्रदेशों में, जहाँ अत्यिाक वषार् होती है, प्रवाहितजल सबसे महत्त्वपूणर् भू - आवृफतिक कारक है जो धरातल का निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी है। प्रवाहित जल केदो तत्त्व हैं। एक, धरातल पर परत के रूप में पैफला हुआ प्रवाह है। दूसरा, रैख्िाक प्रवाह है जो घाटियों में नदियों, सरिताओं के रूप में बहता है। प्रवाहित जल द्वारा नि£मत अिाकतर अपरदित स्थलरूप ढाल प्रवणता के अनुरूप बहती हुइर् नदियों की आक्रामक युवावस्था से संबंिात हैं। कालांतर म, तेज ढाल लगातार अपरदन के कारण मंद ेंढाल में परिव£तत हो जाते हैं और परिणामस्वरूप नदियों का वेग कम हो जाता है, जिससे निक्षेपण आरंभ होता है। तेज ढाल से बहती हुइर् सरिताएँ भी वुफछ निक्षेपित भू - आवृफतियाँ बनाती हैं, लेकिन ये नदियों के मध्यम तथा धीमे ढाल पर बने आकारों की अपेक्षा बहुत कम होते हैं। प्रवाहित जल का ढाल जितना मंद होगा, उतना ही अिाक निक्षेपण होगा। जब लगातार अपरदन के कारण नदी तल समतल हो जाए, तो अधोमुखी कटाव कम हो जाता है और तटों का पाश्वर् अपरदन बढ़ जाता है और इसके पफलस्वरूप पहाडि़याँ और घाटियाँ समतल मैदानों में परिव£तत हो जाते है। क्या ऊँचे स्थलरूपों के उच्चावच का संपूणर् निम्नीकरण संभव है? स्थलगत प्रवाह ;व्अमतसंदक सिवूद्ध परत अपरदन का कारण है। परत प्रवाह धरातल की अनियमितताओं के आधार पर संकीणर् व विस्तृत मागो± पर हो सकता है। प्रवाहित जल के घषर्ण के कारण बहते हुए जल द्वारा कम या अिाक मात्रा में बहाकर लाए गए तलछटों के कारण छोटी व तंग क्षुद्र सरिताएँ बनती हैं। ये क्षुद्र सरिताएँ धीरे - धीरे लंबी व विस्तृत अवनालिकाओं में विकसित होती हैं। इन अवनलिकाओं कालांतर में, अिाक गहरी, चैड़ी तथा लंबाइर् में विस्तृत होकर एक दूसरे में समाहित होकर घाटियों का जाल बनाती हैं। प्रारंभ्िाक अवस्थाओं में अधोमुखी कटाव अिाक होता है जिससे अनियमितताएँ जैसे - जलप्रपात व सोपानी जलप्रपात आदि लुप्त हो जाते हैं। मध्यावस्था में, सरिताएँ नदी तल में धीमा कटाव करती हैं और घाटियों में पाश्वर् अपरदन अिाक होता है। कालांतर में, घाटियों के किनारों की ढाल मंद होती जाती है। इसी प्रकार अपवाह बेसिन के मध्य विभाजक तब तक निम्न होते जाते हैं, जब तक ये पूणर्तः समतल नहीं हो जातेऋ और अंततः एक धीमे उच्चावच का निमार्ण होता है जिसमें यत्रा - तत्रा अवरोधी चट्टðानों के अवशेष दिखाइर् देते हैं जिन्हें मोनाडनोक ;डवदंकंदवगद्ध कहते हैं। नदी अपरदन के द्वारा बने इस प्रकार के मैदान, समप्राय मैदान या पेनीप्लेन ;च्मदमचसंपदद्ध कहलाते हैं। प्रवाहित जल से नि£मत प्रत्येक अवस्था की स्थलरूप संबंधी विशेषताओं का संक्ष्िाप्त वणर्न निम्न प्रकार हैः युवावस्था ;ल्वनजीद्ध इस अवस्था में नदियों की संख्या बहुत कम होती है ये नदियाँ उथली ट.आकार की घाटी बनाती हैं जिनमें बाढ़ के मैदान लगभग अनुपस्िथत या संकरें बाढ़ मैदान मुख्य नदी के साथ - साथ पाए जाते हैं। जल विभाजक अत्यिाक विस्तृत ;चैड़ेद्ध व समतल होते हैं, जिनमें दलदल वझीलें होती हैं। इन ऊँचे समतल धरातल पर नदी विसपर्विकसित हो जाते हैं। ये विसपर् अंततः ऊँचे धरातलों में गभीरभूत हो जाते हैं ;अथार्त् विसपर् की तली में निम्न कटाव होता है और ये गहराइर् में बढ़ते हैंद्ध। जहाँ अनावरित कठोर चट्टðानें पाइर् जाती है। वहाँ जलप्रपात व क्ष्िापि्रकाएँ बन जाते है। प्रौढ़ावस्था ;डंजनतमद्ध इस अवस्था में नदियों में जल की मात्रा अिाक होती है और सहायक नदियाँ भी इसमें आकर मिलती हैं। नदी घाटियाँ ट.आकार की होती हैं लेकिन गहरी होती हैं। मुख्य नदी के व्यापक और विस्तृत होने से विस्तृत बाढ़ के मैदान पाए जाते हैं जिसमें घाटी के भीतर ही नदी विसपर् बनाती हुइर् प्रवाहित होती है। युवावस्था में नि£मत समतल, विस्तृत व अंतर नदीय दलदली क्षेत्रा लुप्त हो जाते हैं और नदी विभाजक स्पष्ट होते हैं। जलप्रपात व क्ष्िापि्रकाएँ लुप्त हो जाती हैं। वृ(ावस्था ;व्सकद्ध वृ(ावस्था में छोटी सहायक नदियाँ कम होती हैं और ढाल मंद होता है। नदियाँ स्वतंत्रा रूप से विस्तृत बाढ़ के मैदानों में बहती हुइर् नदी विसपर्, प्रावृफतिक तटबंध, गोखुर झील आदि बनाती हैं। विभाजक विस्तृत तथा समतल होते हैं जिनमें झील, दलदल पाये जाते हैं। अिाकतरभूदृश्य समुद्रतल के बराबर या थोड़े ऊँचे होते हैं। भौतिक भूगोल के मूल सि(ांत अपरदित स्थलरूप घाटियाँ घाटियों का प्रारंभ तंग व छोटी - छोटी क्षुद्र सरिताओं से होता है। ये क्षुद्र सरिताएँ धीरे - धीरे लंबी व विस्तृत अवनलिकाओं में विकसित हो जाती हैं। ये अवनालिकाएँ धीरे - धीरे और गहरी हो जाती हैंऋ ये चैड़ी व लंबी होकर घाटियों का रूप धारण करती हैं। लम्बाइर्, चैड़ाइर् एवं आवृफति के आधार पर ये घाटियाँ - ट.आकार घाटी, गाॅजर्, वैफनियन आदि में वगीर्वृफत की जा सकती हैं। गाॅजर् एक गहरी संकरी घाटी है जिसके दोनों पाश्वर् तीव्र ढाल के होते हैं ;चित्रा 7.1द्ध। एक वैफनियन के किनारे भी खड़ी ढाल वाले होते हैं और यह भी गाॅजर् की ही भाँति गहरी होती है ;चित्रा 7.2द्ध। गाॅजर् की चैड़ाइर् इसकेतल व ऊपरी भाग में लगभग एक समान होती है। इसकेअपरदन अिाक नहीं होता लेकिन मंद ढालों पर बहती हुइर् नदियाँ अिाक पाश्वर् अपरदन करती हैं। क्षैतिज अपरदन अिाक होने के कारण, मंद ढालों पर बहती हुइर् नदियाँ ववि्रफत होकर बहती हैं या नदी विसपर् बनाती हैं। नदी विसपो± का बाढ़ मैदानों और डेल्टा मैदानों पर पाया जाना एक सामान्य बात है क्योंकि यहाँ नदी का ढाल बहुत मंद होता है। कठोर चट्टðानों में भी गहरे कटे हुए और विस्तृत विसपर् मिलते हैं। इन विसपो± को अधःक£तत विसपर् या गभीरभूत विसपर् कहा जाता है ;चित्रा 7.2द्ध। विपरीत, एक वैफनियन तल की अपेक्षा ऊपरी भाग अिाक चैड़ा होता है। वास्तव में वैफनियन, गाॅजर् का ही एक दूसरा रूप है। चट्टðानों के प्रकार और संरचना पर घाटी का प्रकार निभर्र होता है। उदाहरणाथर् वैफनियन का निमार्ण प्रायः अवसादी चट्टðानों के क्षैतिज स्तरण में पाए जाने से होता है तथा गाॅजर् कठोर चट्टðानों में बनता है। जलग£तका तथा अवनमित वुंफड ;च्वजीवसमे ंदक चसनदहम चववसेद्ध पहाड़ी क्षेत्रों में नदी तल में अपरदित छोटे चट्टðानी टुकड़ेछोटे गत्तो± में पंफसकर वृत्ताकार रूप में घूमते हैं जिन्हें जलग£तका कहते हैं। एक बार छोटे व उथले गतो± के बन जाने पर वंफकड़, पत्थर व गोलाश्म इन गतो± में एकत्रिात हो जाते हैं और प्रवाहित जल के साथ घूमते हैं और धीरे - धीरे इन गतो± का आकार बढ़ता जाता है। यह गतर् आपस में मिल जाते हैं और कालांतर में नदी - घाटी गहरी होती जाती है। जलप्रपात के तल में भी एक गहरे व बड़ेजलग£तका का निमार्ण होता है जो जल के ऊँचाइर् सेगिरने व उनमें श्िालाखंडों के वृत्ताकार घूमने से नि£मत होते हैं। जलप्रपातों के तल में ऐसे विशाल व गहरे वुंफड अवनमित वुंफड ;च्सनदहम चववसेद्ध कहलाते हैं। ये वुंफड भी घाटियों को गहरा करने में सहायक होते हैं। अन्य स्थलरूपों की भाँति जलप्रपात भी बदलते स्वरूप हैं जोधीरे - धीरे पीछे हटते हैं और जलप्रपात का ऊपरी तल धीरे - धीरे आधार तल के बराबर हो जाता है। अधःक£तत विसपर् या गभीरीभूत विसपर्;प्छब्प्ैम्क् व्त् म्छज्त्म्छब्भ्म्क् डम्।छक्म्त्ैद्ध तीव्र ढालों में तीव्रता से बहती हुइर् नदियाँ सामान्यतः नदी तल पर अपरदन करती हैं। तीव्र नदी ढालों में भी पाश्वर् नदी विकास की प्रारंभ्िाक अवस्था में प्रारंभ्िाक मंद ढाल पर विसपर् लूप विकसित होते हैं और ये लूप चट्टðानों में गहराइर् तक होते हैं जो प्रायः नदी अपरदन या भूतल के धीमे व लगातार उत्थान के कारण बनते हैं। कालांतर में ये गहरे तथा विस्तृत हो जाते हैं और कठोर चट्टðानी भागों में गहरे गाॅजर् व वैफनियन के रूप में पाए जाते हैं। ये उन प्राचीन धरातलों के परिचायक हैं जिन पर नदियाँ विकसित हुइर् हैं। बाढ़ व डेल्टा मैदानों पर बने विसपर् व अधःक£तत विसपर् में क्या अंतर है? नदी वेदिकाएँ ;त्पअमत जमततंबमेद्ध नदी वेदिकाएँ प्रारंभ्िाक बाढ़ मैदानों या पुरानी नदी घाटियोंके तलों के चिÉ हैं। ये जलोढ़ रहित मूलाधार चट्टðानों के धरातल या नदियों के तल हैं जो निक्षेपित जलोढ़़़ वेदिकाओं के रूप में पाए जाते हैं। नदी वेदिकाएँ मुख्यतः अपरदित स्थलरूप हैं क्योंकि ये नदी निक्षेपित बाढ़ मैदानों के लंबवत् अपरदन से नि£मत होते हैं। विभ्िान्न उफँचाइयों पर कइर् वेदिकाएँ हो सकती हैं जो आरंभ्िाक नदी जल स्तर को दशार्ते हैं। नदी वेदिकाएँ चित्रा 7.3: युग्िमत एवं अयुग्िमत वेदिकाएँ नदी के दोनों तरपफ समान ऊँचाइर् वाली हो सकती हैं और इनके इस स्वरूप को युग्म ;च्ंपतमकद्ध वेदिकाएँ कहते हैं ;चित्रा 7.3द्ध। जब नदी के केवल एक तट या पाश्वर् पर वेदिकाएँ पाइर् जाती हैं और दूसरी तरपफ इनकी अनुपस्िथति यादूसरे किनारे पर इनकी ऊँचाइर् पहले पाश्वर् से बिल्वुफल भ्िान्न हो तो ऐसी वेदिकाओं को अयुग्िमत ;नदचंपतमकद्ध वेदिकाएँ कहते हैं। अयुगमित वेदिकाएँ उन क्षेत्रों के धीमे भूउत्थान की द्योतक हैं। या उन क्षेत्रों के तट जलस्तर परिवतर्न की असंगति को दिखाते हैं। नदी वेदिकाओं कीउत्पिा का कारण है: ;पद्ध जल प्रवाह का कम होना ;पपद्ध जलवायु परिवतर्न के कारण जलीय क्षेत्रा में परिवतर्नऋ ;पपपद्ध विवतर्निक कारणों से भूउत्थान ;पअद्ध अगर नदियाँ तट के निकट हाती हैं तो समुद्र तल में बदलाव आदि। भौतिक भूगोल के मूल सि(ांत प्रायः निम्न शंवुफ की आवृफति तथा शीषर् से पाद तक मंद ढाल वाले होते हैं। शुष्क व अ(र् - शुष्क जलवायवी प्रदेशों में ये तीव्र ढाल वाले व उच्च शंवुफ बनाते हैं। डेल्टा डेल्टा जलोढ़़़ पंखों की ही भाँति होते हैं, लेकिन इनके विकसित होने का स्थान भ्िान्न होता है। नदी अपने लाये हुए पदाथो± को समुद्र में किनारे बिखेर देती हैं। अगर यह भार समुद्र में दूर तक नहीं ले जाया गया हो तो यह तट के साथ ही शंवुफ के रूप में एक साथ पैफल जाता है। जलोढ़ पंखों के विपरीत, डेल्टा का निक्षेप व्यवस्िथत होता है और इनका जलोढ़ स्तरित होता है। अथार्त् मोटे पदाथर् तट के निकट व बारीक कण जैसे - चीका मिट्टðी, गाद आदि सागर में दूर तक जमा हो जाता है। जैसे - जैसे डेल्टा का आकार बढ़ता है, नदी वितरिकाओं की लंबाइर् बढ़ती जाती है और डेल्टा निक्षेपित स्थलरूप सागर वेंता रहता हफ अदर तक बढ़ै ;चित्रा 7.5द्ध। जलोढ़ पंख जब नदी उच्च स्थलों से बहती हुइर् गिरिपद व मंद ढाल के मैदानों में प्रवेश करती है तो जलोढ़़़ पंख का निमार्ण होता है ;चित्रा 7.4द्ध। साधारणतया पवर्तीय क्षेत्रों में बहने वाली नदियाँ भारी व स्थूल आकार के नद्य - भार को वहन करती हैं। मंद ढालों पर नदियाँ यह भार वहन करने में असमथर् होती हैं तो यह शंवुफ के आकार में निक्षेपित हो जाता है जिसे जलोढ़़़ पंख कहते हैं। जो नदियाँ जलोढ़़़ पंखों से बहती हैं, वे प्रायः अपने वास्तविक वाह - मागर् को बहुत दूर तक नहीं बहतीं बल्िक अपना मागर् बदल लेती हैं और कइर् शाखाओं में बँट जाती हैं जिन्हंे जलवितरिकाएँ ;क्पेजतपइनजंतपमेद्ध कहते हैं। आद्रर् प्रदेशों में जलोढ़़़ पंख चित्रा 7.4: अमरनाथ, जम्मू तथा कश्मीर के मागर् में एक पहाड़ी सरिता द्वारा निक्षेपित जलोढ़़़ पंख चित्रा 7.5: वृफष्णा नदी डेल्टा ;आंध्र प्रदेशद्ध के भाग का उपग्रह द्वारा लिया गया एक चित्रा बाढ़ - मैदान, प्रावृफतिक तटबंध तथा विसपीर् रोिाका जिस प्रकार अपरदन से घाटियाँ बनती हैं, उसी प्रकार निक्षेपण से बाढ़ के मैदान विकसित होते हैं। बाढ़ के मैदान नदी निक्षेपण के मुख्य स्थलरूप हैं। जब नदी तीव्र ढाल से मंद ढाल में प्रवेश करती है तो बड़े आकार के पदाथर् पहले ही निक्षेपित हो जाते हैं। इसी प्रकार बारीक पदाथर् जैसे रेत, चीका मिट्टðी और गाद आदि अपेक्षावृफत मंद ढालों पर बहने वाली कम वेग वाली जल धाराओं में मिलते हैं और जब बाढ़ आने पर पानी तटों पर पैफलता है तो ये उस तल पर जमा हो जाते हैं। नदी निक्षेप से बने ऐसे तल सिय बाढ़ के मैदान कहलाते हैं। तलों से ऊँचाइर् पर बने तटों को असिय बाढ़ के मैदान कहते हैं। असिय बाढ़ के मैदान, जो तटों के उफपर ;उफँचाइर्द्ध होते हैं, मुख्यतः दो प्रकार के निक्षेपों से बने होते हैं - बाढ़ निक्षेप व सरिता निक्षेप। मैदानी भागों में नदियाँ प्रायः क्षैतिज दिशा में अपना मागर् बदलती हैं और कटा हुआ मागर् धीरे - धीरे भर जाता है। बाढ़ मैदानों के ऐसे क्षेत्रा, जो नदियों के कटे हुए या छूटे हुए भाग हैंऋ उनमें स्थूल पदाथो± के जमाव होते हैं। ऐसे जमाव, जो बाढ़ के पानी के पैफलने से बनते हैं अपेक्षावृफत महीन कणों - चिकनी मिट्टðी, गाद आदि के होते हैं। ऐसे बाढ़ मैदान, जो डेल्टाओं में बनते हैं, उन्हें डेल्टा मैदान कहते हैं। प्रावृफतिक तटबंध और विसपीर् रोिाका आदि वुफछमहत्त्वपूणर् स्थलरूप हैं जो बाढ़ के मैदानों से संबंिात हैं। प्रावृफतिक तटबंध बड़ी नदियों के किनारे पर पाए जाते हैं। ये तटबंध नदियों के पाश्वो± में स्थूल पदाथो± के रैख्िाक, निम्न व समानांतर कटक के रूप में पाये जाते हैं, जो कइर् स्थानों पर कटे हुए होते हैं। बाढ़ के दौरान जब जल तटों पर पैफलता है, तो जल का वेग कम होने के कारण बड़े आकार का मलबा नदी के पाश्वर् तटों पर लंबे कटकों के रूप मेंजमा हो जाता है। प्रावृफतिक तटबंध नदी के साथ ऊँचे और नदी से दूर मंद ढाल वाले होते हैं। नदी चैनल के निकट तटबंधों पर निक्षेप, नदी के दूर के निक्षेपों की तुलना में अपेक्षावृफत मोटे पदाथो± के होते हैं। जब नदी का जल कम हो जाता है या नदी क्षैतिज अवस्था में अपना मागर् बदलती है तो यह व्रफमब( प्रावृफतिक तटबंध बनाती है। नदी रोिाकाएँ विसपीर् रोिाकाओं के नाम से भी जानी जाती हैं। नदी रोिाकाएँ ;च्वपदज इंतेद्ध या विसपीर् रोिाकाएँ ;डमंदकमत इंतेद्ध, बड़ी नदी विसपो± के उत्तल ढालों पर पाइर् जाती हैं और ये रोिाकाएँ प्रवाहित जल द्वारा लाए गए तलछटों के नदी किनारों पर निक्षेपण के कारण बनी हैं। इनकी चैड़ाइर् व परिच्छेदिका लगभग एक समान होती है और इनके अवसाद मिश्रित आकार के होते हैं। अगर नदी रोिाकाओं की कटक एक से अिाक हों तो वहाँ विसपर् अवरोिाकाओं के मध्य तंग व लंबे गतर् भी पाए जाते हैं। नदी में इनका क्रम प्रवाह की मात्रा तथा तलछट की आपू£तपर निभर्र करता है। चूँकि, नदी अवरोिाकाएँ उसके उत्तल तट पर बनती हैऋ अतः नदी के अवतल तट पर अिाक अपरदन होता है। प्रावृफतिक तटबंध विसपर् अवरोिाकाओं से वैफसे भ्िान्न हैं? नदी विसपर् ;डमंदकमतेद्ध विस्तृत बाढ़ व डेल्टा मैदानों में नदियाँ शायद ही सीधे मागो± में बहती होंगी। बाढ़ व डेल्टाइर् मैदानों पर लूप जैसे चैनल प्रारूप विकसित होते हैं - जिन्हें विसपर् कहा जाता है। ;चित्रा 7.7द्ध विसपर् एक स्थलरूप न होकर एक प्रकार का चैनल प्रारूप है। नदी विसपर् के नि£मत होने के कारण निम्नलिख्िात हैं: ;पद्ध मंद ढाल पर बहते जल में तटों पर क्षैतिज या चित्रा 7.7: मुशफ्रप़फरपुर, बिहार के समीप विसपीर् बूढ़ी गंडक नदी दशार्ने वाला उपग्रह से लिया गया चित्रा जिसमें कइर् छाड़न झीलें दिखाइर् दे रही हैं। पा£श्वक कटाव करने की प्रवृिा का होना ;पपद्ध तटों पर जलोढ़़़ का अनियमित व असंगठित जमाव जिससे जल के दबाव का नदी पाश्वो± बढ़ना ;पपपद्ध प्रवाहित जल का कोरिआलिस प्रभाव से विक्षेपण ;ठीक उसी प्रकार जैसे कोरिआलिस बल से वायु प्रवाह विक्षेपित होता हैद्ध। जब चैनल की ढाल प्रवणता अत्यिाक मंद हो जाती है तो नदी में पानी का प्रवाह धीमा हो जाता तथा पाश्वो± का कटाव अिाक होता है। नदी तटों पर थोड़ी सी अनियमितताएँ भी, धीरे - धीरे मोड़ों के रूप में परिव£तत हो जाती हैं। यह मोड़ नदी के अंदरूनी भाग में जलोढ़ जमाव के कारण गहरे हो जाते हैं और बाहरी किनारा अपरदित होता रहता है। अगर अपरदन, निक्षेपण तथा निम्न कटाव न हो तो विसपर् कीप्रवृिा कम हो जाती है। प्रायः बड़ी नदियों के विसपर् मेंउत्तल किनारों पर सिय निक्षेपण होते हैं और अवतल किनारों पर अधोमुखी ;न्दकमतबनजजपदहद्ध कटाव होते हैं। अवतल किनारे कटाव किनारों के रूप में भी जाने जाते हैंऋ जो अिाक अपरदन से तीव्र कगार ;ैजममच बसपद्धिि केरूप में परिवतिर्त हो जाते हैं। उत्तल किनारों का ढाल मंद होता है और ये स्वंफध ढाल ;ैसपच.व.ििइंदाद्ध कहलाते हैं ;चित्रा 7.8द्ध। विसपो± के गहरे छल्ले के आकार में विकसित हो जाने पर ये अंदरूनी भागों पर अपरदन के कारण कट जाते हैं और गोखुर झील ;व्ग.इवू संामद्ध बन जाती है। भौतिक भूगोल के मूल सि(ांत गुम्िपफत नदी ;ठतंपकमक ब्ींददमसेद्ध यदि नदी द्वारा प्रवाहित नद्य भार का निक्षेपण उसके मध्य में लंबी रोिाका के रूप में हो जाता है तो नदी धारा दो शाखाओं में विभाजित हो जाती है और यह प्रवाह किनारों पर क्षैतिज अपरदन करता है। नदी घाटी की चैड़ाइर् बढ़ने पर और जल आयतन कम होने पर, प्रवाहित जलोढ़़़ अिाक मात्रा में एक क्षैतिज अवरोध के रूप में द्वीप की भाँति निक्षेपित हो जाते हैं तथा मुख्य जलधारा कइर् भागों में बँट जाती है। गुम्िपफत नदी प्रारूप के लिए तटों पर अपरदन व निक्षेप आवश्यक है। या जब नदी में जल की मात्रा कम तथा जलोढ़़़ अिाक हो जाएँ, तब चैनल में ही रेत, मिट्टðी, बजरी आदि की लंबी अवरोिाकाओं का जमाव हो जाता है और नदी चैनल कइर् जल वितरिकाओं में बँट जाता है। जल प्रवाह की ये वितरिकाएँ आपस में मिल जाती हैं और पिफर पतली - पतली उपधाराओं में बँट जाती हैं। इस प्रकार एक गुम्िपफत नदी प्रारूप का विकास होता है ;चित्रा 7.9द्ध। भौम जल ;ळत्व्न्छक्ॅ।ज्म्त्द्ध भौम जल यहाँ एक संसाधन के रूप में वण्िार्त नहीं है। यहाँ भौम जल का अपरदन के कारक के रूप में और उसके द्वारा निमिर्त स्थलरूपों का वणर्न किया गया है। जब चट्टðानें पारगम्य, कम सघन, अत्यिाक जोड़ों/सन्िधयों व दरारों वाली हों, तो धरातलीय जल का अन्तः स्रवण आसानी से होता है। लम्बवत् गहराइर् पर जाने के बाद जल धरातल के नीचे चट्टðानों की संिायों, छिद्रों व संस्तरण तल से होकर क्षैतिज अवस्था में बहना प्रारंभ करता है। जल का यह क्षैतिज व उफध्वार्धर प्रवाह ही चट्टðानों के अपरदन का कारण है। भौम जल में पदाथो±के परिवहन द्वारा बने स्थलरूप महत्त्वहीन हैं। इसी कारण भूमिगत जल का कायर् सभी प्रकार की चट्टðानों में नहीं देखा जा सकता। लेकिन ऐसी चट्टðानें जैसे - चूना पत्थर या डोलोमाइट, जिनमें वैफल्िशयम काबोर्नेट की प्रधानता होती है, उनमें धरातलीय व भौम जल, रासायनिक प्रवि्रफया द्वारा ;घोलीकरण व अवक्षेपणद्ध अनेक स्थल रूपों को विकसित करते हैं। ये दो प्रियाएँ - घोलीकरण व अवक्षेपण - या तो चूना पत्थर व डोलामाइट चट्टðानों में अलग से या अन्य चट्टðानों के साथ अंतरासंस्तरित पाइर् जाती हैं। किसी भी चूनापत्थर ;स्पउमेजवदमद्धया डोलोमाइट चट्टðानों के क्षेत्रा में भौम जल द्वारा घुलनप्रिया और उसके निक्षेपण प्रिया से बने ऐसे स्थलरूपों को कास्टर् ;ज्ञंतेज जवचवहतंचीलद्ध स्थलाकृति का नाम दिया गया है। यह नाम एडिªयाटिक सागर के साथ बालकन कास्टर् क्षेत्रा में उपस्िथत लाइमस्टोन चट्टðानों परविकसित स्थलाकृतियों पर आधारित है। अपरदनात्मक तथा निक्षेपणात्मक - दोनों प्रकार केस्थलरूप कास्टर् स्थलाकृतियों की विशेषताएँ हैं। अपरदित स्थलरूप वुंफड ;च्ववसेद्धए घोलरंध्र ;ैपदाीवसमेद्धए लैपीज ;स्ंचपमेद्ध और चूना - पत्थर चबूतरे ;स्पउमेजवदम चंअमउमदजेद्ध चूना - पत्थर चट्टðानों के तल पर घुलन िया द्वारा छोटे व मध्यम आकार के छोटे घोल गतो± का निमार्ण होता है, जिनके विलय पर इन्हें विलयन रंध्र ;ैूंससवू ीवसमेद्ध कहते हैं। घोलरंध्र कास्टर् क्षेत्रों में बहुतायत में पाए जाते हैं। घोल रंध्र एक प्रकार के छिद्र होते हैं जो उफपर सेवृत्ताकार व नीचे कीप की आकृति के होते हैं और इनका क्षेत्राीय विस्तार वुफछ वगर् मीटर से हैक्टेयर तक तथा गहराइर् आधा मीटर से 30 मीटर या उससे अिाक होती है। इनमें से वुफछ का निमार्ण अकेले घुलन प्रिया द्वारा ही होता है और वुफछ अन्य पहले घुलन प्रिया द्वारा चित्रा 7.10: कास्टर् स्थलावृफति के विभ्िान्न रूपों का परिच्छेद चित्राण बनते हैं और अगर इन घोलरंध्रों के नीचे बनी वंफदराओं की छत ध्वस्त हो जाए तो ये बड़े छिद्र ध्वस्त या निपात रंध्र ;ब्वससंचेम ेपदोद्ध के नाम से जाने जाते हैं।अिाकतर घोलरंध्र ऊपर से अपरदित पदाथो± के जमने से ढ़क जाते हैं और उथले जल वुंफड जैसे प्रतीत होते हैं। ध्वस्त घोल रंध्रों को डोलाइन ;क्वसपदमेद्ध भी कहा जाता है। ध्वस्त रंध्रों की अपेक्षा घोलरंध्र अिाक संख्या में पाए जाते हैं। सामान्यतः धरातलीय प्रवाहित जल घोल रंध्रों व विलयन रंध्रों से गुजरता हुआ अन्तभौमि नदी के रूप में विलीन हो जाता है और पिफर वुफछ दूरी के पश्चात् किसी वंफदरा से भूमिगत नदी के रूप में पिफर निकल आता है। जब घोलरंध्र व डोलाइन इन वंफदराओं की छत के गिरने से या पदाथो± के स्खलन द्वारा आपस में मिल जाते हैं, तो लंबी, तंग तथा विस्तृत खाइयाँ बनती हैं जिन्हें घाटी रंध्र ;टंससमल ेपदोद्ध या युवाला ;न्अंसंेद्ध कहते हैं। धीरे - धीरे चूनायुक्त चट्टðानों के अिाकतर भाग इन गतो± व खाइयों के हवाले हो जाता है और पूरे क्षेत्रा में अत्यिाक अनियमित, पतले व नुकीले कटक आदि रह जाते हैं, जिन्हें लेपीस ;स्ंचपमेद्ध कहते हैं। इन कटकों या लेपीस का निमार्ण चट्टðानों की संिायों में भ्िान्न घुलन प्रियाओं द्वारा होता है। कभी - कभी लेपीश के ये विस्तृत क्षेत्रा समतल चूनायुक्त चबूतरों में परिवतिर्त हो जाते हैं। वंफदराएँ ;ब्ंअमेद्ध ऐसे प्रदेश जहाँ चट्टðानों के एकांतर संस्तर हों ;शैल, बालू पत्थर व क्वार्टजाइटद्ध और इनके बीच में अगर चूनापत्थर व डोलोमाइट चट्टðानें हों या जहाँ सघन चूना - पत्थर चट्टðानों के संस्तर हों, वहाँ प्रमुखतया वंफदराओं का निमार्ण होता है। पानी दरारों व संिायों से रिसकर शैल संस्तरण के साथ क्षैतिज अवस्था में बहता है। इसी तल संस्तरण के सहारे चूना चट्टðानें घुलती हैं और लंबे एवं तंग विस्तृत रिक्त स्थान बनते हैं जिन्हें वंफदराएँ कहा जाता है। कभी - कभी विभ्िान्न स्तरों पर वंफदराओं का एक जाल सा बन जाता है जो चूना - पत्थर चट्टðानों के तल व उनके बीच संस्तरित चट्टðानों पर निभर्र है। प्रायः वंफदराओं का एक खुला मुख होता है जिससे वंफदरा सरिताएँ बाहर निकलती हैं। ऐसी वंफदराएँ जिनके दोनों सिरे खुले हों, उन्हें सुरंग ;ज्नददमसेद्ध कहते हैं। भौतिक भूगोल के मूल सि(ांत निक्षेपित स्थलरूप अिाकतर निक्षेपित स्थलरूप वंफदराओं के भीतर ही निमिर्त होते हैं। चूना पत्थर चट्टðानों में मुख्य रसायन वैफल्िशयम काबोर्नेट है जो काबर्नयुक्त जल ;वषार् जल में घुला हुआ काबर्नद्ध में शीघ्रता से घुल जाता है। जब इस जल का वाष्पीकरण होता है तो घुले हुए वैफल्िशयम काबोर्नेट का निक्षेपण हो जाता है या जब चट्टðानों की छत से जल वाष्पीकरण के साथ काबर्न डाइर्आक्साइड गैस मुक्त हो जाती है तो वैफल्िशयम काबोर्नेट के चट्टðानी धरातल पर टपकने से निक्षेपण हो जाता है। स्टैलेक्टाइट, स्टैलेग्माइट और स्तंभ स्टैलेक्टाइट विभ्िान्न मोटाइयों के लटकते हुए हिमस्तंभ जैसे होते हैं। प्रायः ये आधार पर या वंफदरा की छत के वंफदराओं की छत से धरातल पर टपकने वाले चूनामिश्रित जल से बनते हैं या स्टेलेक्टाइट के ठीक नीचे पतले पाइप की आवृफति में बनते हैं ;चित्रा 7.11द्ध। स्टैलेग्माइट एक स्तंभ के एक चपटी तश्तरीनुमा आकार में या समतल अथवा व्रेफटरनुमा गîक्के के आकार में विकसित हो जाते हैं। विभ्िान्न मोटाइर् के स्टैलेग्माइट तथा स्टैलेक्टाइट के मिलने से स्तंभ और वंफदरा स्तंभ बनते हैं। कास्टर् प्रदेशों में वुफछ अन्य अपेक्षाकृत छोटे स्थलरूपव आकृतियाँ भी पाइर् जाती हैं, जिन्हें स्थानीय नामों से पुकारा जाता है। हिमनद पृथ्वी पर परत के रूप में हिम प्रवाह या पवर्तीय ढालों से घाटियों में रैख्िाक प्रवाह के रूप में बहते हिम संहति को हिमनद कहते हैं। महाद्वीपीय हिमनद या गिरिपद हिमनद वे हिमनद हैं जो वृहत् समतल क्षेत्रा पर हिम परत के रूप में पैफले हों तथा पवर्तीय या घाटी हिमनद वे हिमनद हैं जो पवर्तीय ढालों में बहते हैं ;चित्रा 7.12द्ध। प्रवाहित जल के विपरीत हिमनद प्रवाह बहुत धीमा होता है। हिमनद प्रतिदिन वुफछ सेंटीमीटर या इससे कम से हमारे देश में भी अनेक हिमनद हैं जो हिमालय पवर्तीयढालों से घाटी में बहते हैं। उत्तरांचल, हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर के उच्च प्रदेशों में वुफछ स्थानों पर इन्हें देखा जा सकता है। क्या आप जानते हैं कि भगीरथी नदी का उद्गम गंगोत्राी हिमनद का अग्रभाग ;गोमुखद्ध है। वास्तव में अलकनंदा नदी का उद्गम अलकापुरी हिमनद से है। देवप्रयाग के निकट अलकनंदा व भगीरथी के मिलने पर यहाँ से इसे गंगा के नाम से जाना जाता है। हिमनदों से प्रबल अपरदन होता है जिसका कारण इसके अपने भार से उत्पन्न घषर्ण है। हिमनद द्वारा कष्िार्त चट्टðानी पदाथर् ;प्रायः बड़े गोलाश्म व शैलखंडद्ध इसके तल में ही इसके साथ घसीटे जाते हैं या घाटी के किनारों पर अपघषर्ण व घषर्ण द्वारा अत्यिाक अपरदन करते हैं। हिमनद अपक्षय रहित चट्टðानों का भी प्रभावशाली अपरदनकरते हैं, जिससे ऊँचे पवर्त छोटी पहाडि़यों व मैदानों में परिवतिर्त हो जाते हैं। हिमनद के लगातार संचलित होने से हिमनद मलवा हटता होता है विभाजक नीचे हो जाता है और कालांतर में ढाल इतने निम्न हो जाते हैं कि हिमनद की संचलनशिाफ समाप्त हो जाती है तथा निम्न पहाडि़यों व अन्य निक्षेपित स्थलरूपों वाला एक हिमानी धैत ;व्नजूंेी चसंपदद्ध रह जाता है। चित्रा 7.13 तथा 7.14 हिमनद के अपरदन व निक्षेपण से निमिर्त स्थलरूपों को दशार्ता है जिसका वणर्न भी अगले अनुच्छेदों में किया गया है। अपरदित स्थलरूप सवर्फ हिमानीकृत पवर्तीय भागों में हिमनद द्वारा उत्पन्न स्थलरंध्रोंमें सवर्फ सवार्िाक महत्त्वपूणर् है। अिाकतर सवर्फ हिमनद घाटियों के शीषर् पर पाए जाते हैं। एकत्रिात हिम पवर्तीय क्षेत्रों से नीचे आती हुइर् सवर्फ को काटती है। सवर्फ गहरे, लंबे व चैड़े गतर् हैं जिनकी दीवार तीव्र ढाल वाली सीधी या अवतल होती है। हिमनद के पिघलने पर जल से भरी झील भी प्रायः इन गतो± में देखने को मिलती है। इन झीलों को सवर्फ झील या टानर् झील कहते हैं। आपस में मिले हुए दो या दो से अिाक सवर्फ सीढ़ीनुमा क्रम में दिखाइर् देते हैं। हाॅनर् या गिरिशृंग और सिरेटेड कटक सवर्फ के शीषर् पर अपरदन होने से हाॅनर् निमिर्त होते हैं। यदि तीन या अिाक विकीण्िार्त हिमनद निरंतर शीषर् पर चित्रा 7.13: हिमनद द्वारा अपरदन एवं निक्षेपण के विभ्िान्न रूप ;स्पेन्सर, 1962 से संकलित एवं संशोिातद्ध तब - तक अपरदन जारी रखें जब तक उनके तल आपस में मिल जाएँ तो एक तीव्र किनारों वाली नुकीली चोटी का निमार्ण होता है जिन्हें हाॅनर् कहते हैं। लगातार अपदरन से सवर्फ के दोनों तरपफ की दीवारें तंग हो जाती हैं और इसका आकार वंफघी या आरी के समान कटकों के रूप में हो जाता है, जिन्हें अरेत;।तश्मजेद्ध ;तीक्ष्ण कटकद्ध कहतेहैं। इनका ऊपरी भाग नुकीला तथा बाहरी आकार टेढ़ा - मेढ़ा होता है। इन कटकों का चढ़ना प्रायः असंभव होता है। आल्प्स पवर्त पर सबसे ऊँची चोटी मैटरहाॅनर् तथा हिमालयपवर्त की सबसे ऊँची चोटी एवरेस्ट, वास्तव में, हाॅनर् है जो सवर्फ के शीषर् अपदरन से निमिर्त है। हिमनद घाटी/गतर् हिमानीकृत घाटियाँ गतर् की भाँति होती हैं जो आकार में अंग्रेजी के अक्षर न् जैसी होती हैंऋ जिनके तल चैड़े व किनारे चिकने तथा ढाल तीव्र होते हैं। घाटी में मलबा बिखरा होता है अथवा हिमोढ़ मलबा दलदली रूप में दिखाइर् देता है। चट्टðानी धरातल पर झील भी उभरी होती है अथवा ये झीलें घाटी में उपस्िथत हिमोढ़ मलबे सेबनती हैं। मुख्य घाटी के एक तरपफ या दोनों तरपफ ऊँचाइर् पर लटकती घाटी ;भ्ंदहपदह अंससमलद्ध भी होती हैं। इन लटकती घाटियों के तल, जो मुख्य घाटी में खुलते हैं, इनके विभाजक क्षेत्रों के कट जाने से ये त्रिाकोण रूप में नशर आती हैं। बहुत गहरी हिमनद गते± जिनमें समुद्री जल भर जाता है तथा जो समुद्री तटरेखा पर होती हैं, उन्हें पिफयोडर् कहते हैं। नदी घाटियों तथा हिमनद घाटियों में आधारभूत अंतर क्या है? निक्षेपित स्थलरूप पिघलते हुए हिमनद के द्वारा मिश्रित रूप में भारी व महीन पदाथो± का निक्षेप - हिमोढ़ या हिमनद गोलाश्म के रूप में जाना जाता है। इन निक्षेप में अिाकतर चट्टðानी टुकड़े नुकीले या कम नुकीले आकार के होते हैं। चित्रा 7.14: हिमनदीय स्थलावृफति के विभ्िान्न निक्षेपित भू - आवृफतियों का सुंदर चित्राण ;स्पेन्सर, 1962 से संकलित एवं संशोिातद्ध हिमनदों के तल, किनारों या छोर पर बपर्फ पिघलने से सरिताएँ बनती हैं। वुफछ मात्रा में शैल मलबा इस पिघले जल से बनी सरिता में प्रवाहित होकर निक्षेपित होता है। ऐसे हिमनदी - जलोढ़़़ निक्षेप हिमानी धैत ;व्नजूंेीद्ध कहलाते हैं। हिमोढ़ निक्षेप के विपरीत हिमानी धौत ;व्नजूंेी कमचवेपजेद्ध प्रायः स्तरीकृत व वगीर्कृत होते हैं। हिमनद अपक्षेप में चट्टðानी टुकड़े गोल किनारों वाले होते हैं। चित्रा 7.14 में हिमनद क्षेत्रों के मुख्य निक्षेपित स्थलरूप दशार्ये गये हैं। हिमोढ़ हिमोढ़, हिमनद टिल ;ज्पससद्ध या गोलाश्मी मृिाका के जमाव की लंबी कटवेंफ हैं। अंतस्थ हिमोढ़ ;ज्मतउपदंस उवतंपदमेद्ध हिमनद के अंतिम भाग में मलबे के निक्षेप से बनी लंबी कटके हैं। पाश्िर्वक हिमोढ़ ;स्ंजमतंस उवतंपदबेद्ध हिमनद घाटी की दीवार के समानांतर निमिर्त होते हैं। पाश्िर्वक हिमोढ़ अंतस्थ हिमोढ़ से मिलकर घोड़े की नाल या अध्र्चंद्राकार कटक का निमार्ण करते हैं ;चित्रा 7.13द्ध। हिमनद घाटी के दोनों ओर अत्यिाक मात्रामें पाश्िर्वक हिमोढ़ पाए जाते हैं। इस हिमोढ़ की उत्पिा पूणर्तया आंश्िाक रूप से हिमानी - जल द्वारा होती हैऋ जो इस जलोढ़़़ को हिमनद के किनारों पर धकेलती है। वुफछ घाटी हिमनद तेजी से पिघलने पर घाटी तल पर हिमनद टिल को एक परत के रूप में अव्यवस्िथत रूप से छोड़ देते हैं। ऐसे अव्यवस्िथत व भ्िान्न मोटाइर् के निक्षेप तलीय या तलस्थ;ळतवनदकद्ध हिमोढ़ कहलाते हैं। घाटी के मध्य में पाश्िर्वक हिमोढ़ के साथ - साथ हिमोढ़ मिलते हैं जिन्हें मध्यस्थ ;डमकपंसद्ध हिमोढ़ कहते हैं। ये पाश्िर्वक हिमोढ़ की अपेक्षा कम स्पष्ट होते हैं। कभी - कभी मध्यस्थ हिमोढ़ व तलस्थ के अंतर को पहचानना कठिन होता है। एस्कर ;म्ेामतेद्ध ग्रीष्म ट्टतु में हिमनद के पिघलने से जल हिमतल केऊपर से प्रवाहित होता है अथवा इसके किनारों से रिसता है या बपर्फ के छिद्रों से नीचे प्रवाहित होता है। यह जल हिमनद के नीचे एकत्रिात होकर बपर्फ के नीचे नदी धारामें प्रवाहित होता है। ऐसी नदियाँ नदी घाटी के ऊपर बपर्फ के किनारों वाले तल में प्रवाहित होती हैं। यह जलधारा अपने साथ बड़े गोलाश्म, चट्टðानी टुकड़े और छोटा चट्टðानी मलबा मलबा बहाकर लाती है जो हिमनद के नीचे इस बपर्फ की घाटी में जमा हो जाते हैं। ये बपर्फपिघलने के बाद एक वक्राकार कटक के रूप में मिलतेहैं, जिन्हें एस्कर कहते हैं। हिमानी धैत मैदान ;व्नजूंेी चसंपदेद्ध हिमानी गिरिपद के मैदानों में अथवा महाद्वीपीय हिमनदों से दूर हिमानी - जलोढ़़़ निक्षेपों से ;जिसमें बजरी, रेत,चीका मिट्टðी व मृिाका के विस्तृत समतल जलोढ़़़ - पंख भी शामिल हैंद्ध, हिमानी धैत मैदान निमिर्त होते हैं। नदी के जलोढ़़़ मैदान व हिमानी धैत मैदानों में अंतर स्पष्ट करें। ड्रमलिन ;क्तनउसपदेद्ध ड्रमलिन हिमनद मृिाका के अंडाकार समतल कटकनुमा स्थलरूप हैं जिसमें रेत व बजरी के ढेर होते हैं। ड्रमलिन के लंबे भाग हिमनद के प्रवाह की दिशा के समानांतरहोते हैं। ये एक किलोमीटर लंबे व 30 मीटर तक ऊँचे होते हैं। ड्रमलिन का हिमनद सम्मुख भाग स्टाॅस ;ैजवेेद्ध कहलाता है, जो पृच्छ ;ज्ंपसद्ध भागों की अपेक्षा तीखा तीव्र ढाल लिए होता है। ड्रमलिन का निमार्ण हिमनद दरारों में भारी चट्टðानी मलबे के भरने व उसके बपर्फ के नीचे रहने से होता है। इसका अग्र भाग या स्टाॅस भाग प्रवाहित हिमखंड के कारण तीव्र हो जाता है। ड्रमलिन हिमनद प्रवाह दिशा को बताते हैं। गोलाश्मी मृिाका व जलोढ़़़ में क्या अन्तर है? तरंग व धाराएँ तटीय प्रियाएँ सवार्िाक ियाशील हैं और इसी कारण अत्यिाक विनाशकारी होती हैं। क्या आप नहीं सोचते कि तटीय प्रियाओं तथा उनसे निमिर्त स्थलरूपों को जाननाअति महत्त्वपूणर् है? तट पर वुफछ परिवतर्न बहुत शीघ्रता से होते हैं। एक ही स्थान पर एक मौसम में अपरदन व दूसरे मौसम में निक्षेपण हो सकता है। तटों के किनारों पर अिाकतर परिवतर्न तरंगों द्वारा संपन्न होते हैं। जब तरंगों का अवनमन होता है तो जल तट पर अत्यिाक दबाव डालता है और इसके साथ ही साथ सागरीय तल पर तलछटों में भी दोलन होता है। तरंगों के स्थायी अवनमन के प्रवाह से तटों पर अभूतपूवर् प्रवाह पड़ता है। सामान्य तरंग अवनमन की अपेक्षा सुनामी लहरें कम समय में अिाक परिवतर्न लाती हैं। तरंगों में परिवतर्न ;उनकी आवृति आदिद्ध होने से उनके अवनमन से उत्पन्न प्रभाव की गहनता भी परिवतिर्त हो जाती है। भौतिक भूगोल के मूल सि(ांत क्या आप तरंग व धाराओं को उत्पन्न करने वाले बलों के विषय में जानते हैं? यदि नहीं तो महासागरीय जल का परिसंचरण, अध्याय पढें़। तरंगों के कायर् के अतिरिक्त, तटीय स्थलरूप वुफछ अन्य कारकों पर भी निभर्र हैं। ये हैंः ;पद्ध स्थल व समुद्री तल की बनावट, ;पपद्ध समुद्रोन्मुख उन्मग्न तट या जलमग्न तट। समुद्री जल स्तर को स्िथर या स्थायी मानते हुए, तटीय स्थलरूपों के विकास को समझने के लिए तटों कोदो भागों में वगीर्कृत किया जाता है: ;पद्ध ऊँचे, चट्टðानी तट ;जलमग्न तटद्ध ;पपद्ध निम्न, समतल व मंद ढाल के अवसादी तट ;उन्मग्न तटद्ध। ऊँचे चट्टðानी तट ऊँचे चट्टðानी तटों के सहारे तट रेखाएँ अनियमित होती हैं तथा नदियाँ जलमग्न प्रतीत होती हैं। तटरेखा का अत्यिाक अवनमन होने से किनारे के स्थल भाग जलमग्न हो जाते हैं और वहाँ पिफयोडर् तट बनते हैं। पहाड़ी भाग सीधे जल में डूबे होते हैं। सागरीय किनारों पर प्रारंभ्िाक निक्षेपित स्थलरूप नहीं होते। अपरदित स्थलरूपों की बहुतायत होती है। उफँचे चट्टðानी तटों के सहारे तरंगें अवनमित होकर धरातल पर अत्यिाक बल के साथ प्रहार करती है जिससे पहाड़ी पाश्वर् भृगु ;ब्सपद्धिि का आकार के लेते हैं। तरंगों के स्थायी प्रहार से भृगु शीघ्रता से पीछे हटते हैं और समुद्री भृगु ;ब्सपद्धिि के सम्मुख तरंग घष्िार्त चबूतरे बन जाते हैं तरंगें धीरे - धीरे सागरीय किनारों की अनियमितताओं को कम कर देती हैं। समुद्री भृगु से गिरने वाला चट्टðानी मलबा धीरे - धीरे छोटे टुकड़ों में टूट जाता है और लहरों के साथ घष्िार्त होता हुआ किनारों से दूर निक्षेपित हो जाता है। भृगु के विकास व उसके निवतर्न के वाँछनीय समय के बाद तट रेखा वुफछ सम/चिकनी हो जाती है तथा वुफछ अतिरिक्त मलबे के किनारों से दूर जमाव से तरंग घष्िार्त वेदिकाओं के सामने तरंग निमिर्त वेदिकाएँ देखी जा सकती हैं। जैसे ही तटों के साथ अपरदन आरंभ होता है, वेलांचली प्रवाह ;स्वदहेीवतम बनततमदजद्ध व तरंगें इस अपरदित पदाथर् को सागरीय किनारों पर पुलिन ;ठमंबीमेद्ध और रोिाकाओं के रूप में निक्षेपित करती हैं। रोिाकाएँ ;ठंतेद्ध जलमग्न आकृतियाँ हैं और जब यही रोिाकाएँजल के ऊपर दिखाइर् देती हैं तो इन्हें रोध ;ठंततपमतेद्ध कहा जाता है। ऐसी रोिाकाएँ जिनका एक भाग खाड़ी के शीषर्स्थल से जुड़ा हो तो इसे स्िपट ;ैचपजद्ध कहा जाता है। जब रोिाका तथा स्िपट किसी खाड़ी के मुख पर निमिर्त होकर इसवेेफ मागर् को अवरू( कर देते हैं तब लैगून ;स्ंहववदद्ध निमिर्त होते हैं। कालांतर में लैगून स्थल से बहाए गए तलछट से भर जाता है और तटीय मैदान की रचना होती है। निम्न अवसादी तट निचले अवसादी तटों के सहारे नदियाँ तटीय मैदान एवं डेल्टा बनाकर अपनी लंबाइर् बढ़ा लेती हैं। कहीं - कहीं लैगून व ज्वारीय सँकरी खाड़ी के रूप में जल भराव के अतिरिक्त तटरेखा सम/चिकनी होती है। सागरोन्मुख स्थल मंद ढाल लिए होता है। तटों के साथ समुद्री पंक व दलदल पाए जाते हैं। इन तटों पर निक्षेपित स्थलावृफतियों की बहुतायत होती है। जब मंद ढाल वाले अवसादी तटों पर तरंगें अवनमित होती हैं तो तल के अवसाद भी दोलित होते हैं और इनके परिवहन से अवरोिाकाएँ, लैगून व स्िपट निमिर्त होते हैं। लैगून कालांतर में दलदल में परिवतिर्त हो जाते चित्रा 7.15: उपग्रहीय चित्रा - गोदावरी नदी डेल्टा का स्िपट हैं जो बाद में तटीय मैदान बनते हैं। इन निक्षेपित स्थलावृफतियों का बना रहना अवसादी पदाथोर्ं की स्थायी एवं लगातार आपूतिर् पर निभर्र करता है। अवसादों के अतिरिक्त तूपफान व सुनामी लहरें इनमें अभूतपूवर् परिवतर्न लाती हैं। बड़ी नदियाँ जो अिाक नद्यभार लाती हैं, निचले अवसादी तटों के साथ डेल्टा बनाती हैं। हमारे देश का पश्िचमी तट उफँचा चट्टðानी निवतर्न ;त्मजतमंजपदहद्ध तट है। पश्िचमी तट पर अपरदित आवृफतियाँ बहुतायत में हैं। भारत के पूवीर् तट निचले अवसादी तट हैं। इन तटों पर निक्षेपित स्थलावृफतियाँ पाइर्जाती हैं। इन दोनों तटों की उत्पिा व प्रवृिा को जानने के लिए आप ‘भारत - भौतिक पयार्वरण’ पुस्तक पढ़ें। उच्च चट्टðानी व निम्न अवसादी तटों की प्रवि्रफयाओं व स्थलावृफतियों के संदभर् में विभ्िान्न अंतर क्या है? अपरदित स्थलरूपभृगु ;ब्सपद्धििए वेदिकाएँ ;ज्मततंबमेद्धए वंफदराएँ ;ब्ंअमेद्ध तथा स्टैक ;ैजंबाद्ध ऐसे तट जहाँ अपरदन प्रमुख प्रिया है, वहाँ प्रायः दो मुख्य आवृफतियाँμ तरंग घष्िार्त भृगु व वेदिकाएँ पाइर् जाती हैं। लगभग सभी समुद्र भृगु की ढाल तीव्र होती है जो वुफछ मीटर से लेकर 30 मीटर या उससे अिाक हो सकती है। इनकी तलहटी पर एक मंद ढाल वाला या समतल प्लेटपफामर् होता है, जो समुद्री भृगु से प्राप्त शैल मलबे से ढका होता है। अगर ये प्लेटपफाॅमर् तरंग की औसत उफँचाइर् से अिाक उफँचाइर् पर मिलते हैं तो इन्हें तरंग घष्िार्त वेदिकाएँ कहते हैं। भृगु की कठोर चट्टðान के विरू( जब तरंगें टकराती हैं तो भृगु के आधार पर रिक्त स्थान बनाती हैं और इसे गहराइर् तक खोखला कर देती हैं जिससे समुद्री वंफदराएँ बनती हैं। इन कंदराओं की छत ध्वस्त होने से समुद्री भृगु स्थल की ओर हटते हैं। भृगु के निवतर्न से चट्टðानों के वुफछ अवशेष तटों पर अलग - थलग छूट जाते हैं। ऐसी अलग - थलग प्रतिरोधी चट्टðानें जो कभी भृगु के भाग थे, समुद्री स्टैक कहलाते हैं। अन्य स्थलरूपों की भाँति समुद्री स्टैक भी अस्थायी आवृफतियाँ हैं जो तरंग अपरदन द्वारा समुद्री पहाडि़यों व भृगु की भाँति धीरे - धीरे तंग समुद्री मैदानों में परिवतिर्त हो जाती हैं और स्थल से प्रवाहित जलोढ़़़ से आच्छादित रेत व श्िांगिल चैड़े पुलिन ;ठमंबीद्ध में परिवतिर्त हो जाते हैं। निक्षेपित स्थलरूप पुलिन ;ठमंबीमेद्ध और टिब्बे ;क्नदमेद्ध तटों की प्रमुख विशेषता पुलिन की उपस्िथति हैऋ यद्यपि उफबड़ - खाबड़ तटों पर भी ये टुकड़ों में पाए जाते हैं। वे अवसाद जिनसे पुलिन निमिर्त होते हैं, अिाकतर थल से नदियों व सरिताओं द्वारा अथवा तरंगों के अपरदन द्वारा बहाकर लाए गए पदाथर् होते हैं। पुलिन अस्थाइर् स्थलावृफतियाँ हैं। वुफछ रेत पुलिन ;ैंदक इमंबीमेद्ध जो स्थायी प्रतीत होते हैंऋ किसी और मौसम मेें स्थूल वंफकड़ - पत्थरों की तंग पट्टðी में परिवतिर्त हो जाते हैं। अिाकतर पुलिन रेत के आकार के छोटे कणों से बने होते हैं। श्िांगिल पुलिन में अत्यिाक छोटी गुटिकाएँ तथा गोलाश्िमकाएँ होती हैं। पुलिन के ठीक पीछे, पुलिन तल से उठाइर् गइर् रेत टिब्बे ;क्नदमेद्ध के रूप में निक्षेपित होती है। तटरेखा के समानांतर लंबाइर् में कटकों के रूप में बने रेत, टिब्बे निम्न तलछटी तटों पर अकसर देखे जा सकते हैं। रोिाका ;ठंतेद्धए रोध ;ठंततपमतेद्ध तथा स्िपट ;ैचपजेद्ध समुद्री अपतट पर, तट के समांतर पाइर् जाने वाली रेत और श्िांगिल की कटक अपतट समानांतर पाइर् जाने वाली रेत और श्िांगिल की कटक को अपतट रोिाक ;व्ेििीवतम इंतद्ध कहलाती है। ऐसी अपतटीय रोिाका जो रेत के अिाक निक्षेपण से उफपर दिखाइर् पड़ती है उसे रोध - रोिाका ;ठंततपमत इंतद्ध कहते हैं। अपतटीय रोध व रोिाकाएँ प्रायः या तो खाड़ी के प्रवेश पर या नदियों के मुहानों के सम्मुख बनती हैं। कइर् बार इन रोिाकाओं का एक सिरा खाड़ी से जुड़ जाता है तो इन्हें स्िपट कहते हैं ;चित्रा 7.15द्ध शीषर्स्थल से एक सिरा जुड़ने पर भी स्िपट विकसित होती है। रोिाकाएँ, रोध व स्िपट धीरे - धीरे खाड़ी के मुख पर बढ़ते रहते हैं जिससे खाड़ी का समुद्र में खुलने वाला द्वार तंग हो जाता है तथा कालांतर में खाड़ी एक लैगून में परिवतिर्त हो जाती है। लैगून भी धीरे - धीरे स्थल से लाए गये तलछटों से या पुलिन से वायु द्वारा लाए गये तलछट से लैगून के स्थान पर एक चैड़े व विस्तृत तटीय मैदान में विकसित हो जाते हैं। क्या आप जानते हैं कि समुद्र के अपतट पर बनी रोिाकाएँ तूपफान और सुनामी लहरों के आक्रमण के समय सबसे पहले बचाव करती हैं क्योंकि ये रोिाकाएँ इनकी प्रबलता को कम कर देती हैं। इसके बाद रोध, पुलिन, पुलिन स्तूप तथा मैंग्रोव हैं जो इनकी प्रबलता को झेलते हैं। अतः अगर हम तटों के किनारों पर पाए जाने वाले मैंग्रोव व तलछट ;ैमकपउमदजंतल इनकहमजद्ध भौतिक भूगोल के मूल सि(ांत से छेड़छाड़ करते हैं तो ये तटीय स्थलावृफतियाँ अपरदित हो जाएँगी तथा मानव व मानवीय बस्ितयों को तूपफान व सुनामी लहरों के सीधे व प्रथम प्रहार झेलने होंगे। पवनें ;ॅप्छक्ैद्ध उष्ण मरुस्थलों के दो प्रभावशाली अनाच्छादनकतार् कारकोंमें पवन एक महत्त्वपूणर् अपरदन का कारक है। मरुस्थलीय धरातल शीघ्र गमर् और शीघ्र ठंडे हो जाते हैं। उष्ण धरातलों के ठीक उफपर वायु गमर् हो जाती है जिससे हल्की गमर् हवा प्रक्षुब्धता के साथ उफध्वार्धर गति करतीहै। इसके मागर् में कोइर् रुकावट आने पर भँवर, वातावृत्तबनते हैं तथा अनुवात एवं उत्त्वात प्रवाह उत्पन्न होता है। पवनें मरुस्थलीय धरातल के साथ - साथ भी तीव्र गति से चलती हैं और उनके मागर् में रूकावटें पवनों में विक्षोभ उत्पन्न करते हैं। निःसंदेह तूपफानी पवन अिाक विनाशकारी होता है। पवन अपवाहन, घषर्ण आदि द्वारा अपरदन करती हैं। अपवाहन में पवन धरातल से चट्टðानों के छोटे कण व धूल उठाती हैं। वायु की परिवहन की प्रिया में रेत व बजरी आदि औजारों की तरह धरातलीय चट्टðानों पर चोट पहुँचाकर घषर्ण करती हैं। जब वायु में उपस्िथत रेत के कण चट्टðानों के तल से टकराते हैं तो इसका प्रभाव पवन के संवेग पर निभर्र करता है। यह प्रिया बालू घषर्ण ;ैंदक इसंेजपदहद्ध जैसी है। मरुस्थलों में पवनें कइर् रोचक अपरदनात्मक व निक्षेपणात्मक स्थलरूप बनाती हैं। वास्तव में मरुस्थलों में अिाकतर स्थलावृफतियों का निमार्ण बृहत् क्षरण और प्रवाहित जल की चादर बाढ़ ;ैीममज सिववकद्ध से होता है। यद्यपि मरुस्थलों में वषार् बहुत कम होती है, लेकिन यह अल्प समय में मूसलाधार वषार् ;ज्वततमदजपंसद्ध के रूप में होती है। मरुस्थलीय चट्टðानें अत्यिाक वनस्पति विहीन होने के कारण तथा दैनिक तापांतर के कारण यांत्रिाक व रासायनिक अपक्षय से अिाक प्रभावित होती है। अतः इनका शीघ्र क्षय होता है और वेग प्रवाह इस अपक्षय जनित मलबे को आसानी से बहा ले जाते हैं। अथार्त् मरुस्थलों में अपक्षय जनित मलबा केवल पवन द्वारा ही नहीं, वरन वषार् व वृष्िट धोवन ;ैीममज ूंेीद्ध से भी प्रवाहित होता है। पवन केवल महीन मलबे का ही अपवाहन कर सकती हैं और बृहत् अपरदन मुख्यतः परत बाढ़ या वृष्िट धोवन से ही संपन्न होता है। मरुस्थलों में नदियाँ चैड़ी, अनियमित तथा वषार् के बाद अल्प समय तक ही प्रवाहित होती हैं। अपरदनात्मक स्थलरूप पेडीमेंट ;च्मकपउमदजद्ध और पदस्थली ;च्मकपचसंपदद्ध मरुस्थलों में भूदृश्य का विकास मुख्यतः पेडीमेंट का निमार्ण व उसका ही विकसित रूप है। पवर्तों के पाद पर मलबे रहित अथवा मलबे सहित मंद ढाल वाले चट्टðानी तल पेडीमेंट कहलाते हैं। पेडीमेंट का निमार्ण पवर्तीय अग्रभाग के अपरदन मुख्यतः सरिता के क्षैतिज अपरदन व चादर बाढ़ दोनों के संयुक्त अपरदन से होता है। अपरदन भूसंहति के तीव्र ढाल वाले कोर के साथ - साथ प्रारंभ होता है या विवतर्निकी द्वारा नियंत्रिात कटावों के तीव्र ढाल वाले पाश्वर् पर अपरदन प्रारंभ होता है। जब एक बार एक तीव्र मंद ढाल के साथ पेडीमेंट का निमार्ण हो जाता है जिसके पीछे एक भृगु या मुक्त पाश्वर् होता है तो कटाव के कारण मंद ढाल तथा मुक्त पाश्वर् पीछे हटने लगता है। अपरदन की इस प(ति को पृष्ठक्षरण ;ठंबाूंेजपदहद्ध के द्वारा की गइर् ढाल की समानांतर निवतर्न वि्रफया कहते हैं। अतः समानांतर ढाल निवतर्न द्वारा पवर्तों के अग्रभाग को अपरदित करते हुए पेडीमेंट आगे बढ़ते हैं तथा पवर्त घ्िासते हुए पीछे हटते हैं और धीरे - धीरे पवर्तों का अपरदन हो जाता है और केवल इंसेलबगर् ;प्देमसइमतहद्ध निमिर्ेेंै जा कि पवर्तों के त हात हेअवश्िाष्ट रूप हैं। इस प्रकार मरुस्थलीय प्रदेशों में एक उच्च धरातल, आवृफति विहीन, मैदान में परिवतिर्त हो जाता है जिसे पेडीप्लेन/पदस्थली कहते हैं। प्लाया ;च्संलंद्ध मरुभूमियों में मैदान ;च्संपदेद्ध प्रमुख स्थलरूप हैं। पवर्तों व पहाडि़यों से घ्िारे बेसिनों में अपवाह मुख्यतः बेसिन के मध्य में होता है तथा बेसिन के किनारों से लगातार लाए हुए अवसाद जमाव के कारण बेसिन के मध्य में लगभग समतल मैदान की रचना हो जाती है। पयार्प्त जल उपलब्ध होने पर यह मैदान उथले जल क्षेत्रा में परिवतिर्त हो जाता है। इस प्रकार की उथली जल झीलें ही प्लाया ;च्संलंद्ध कहलाती हैं। प्लाया में वाष्पीकरण के कारण जल अल्प समय के लिए ही रहता है और अकसर प्लाया में लवणों के समृ( निक्षेप पाए जाते हैं। ऐसे प्लाया मैदान, जो लवणों से भरें हों, कल्लर भूमि या क्षारीय क्षेत्रा ;।सांसप सिंजेद्ध कहलाते हैं। अपवाहन गतर् ;क्मसिंजपवद ीवससवूेद्ध तथा गुहा ;ब्ंअमेद्ध पवनों के एक ही दिशा में स्थायी प्रवाह से चट्टðानों के अपक्षय जनित पदाथर् या असंगठित मिट्टðी का अपवाहन होता है। इस प्रिया में उथले गतर् बनते हैं जिन्हें अपवाहन गतर् कहते हैं। अपवाहन प्रिया से चट्टðानी धरातल पर छोटे गîक्के या गुहिकाएँ भी बनती हैं। तीव्र वेग पवन के साथ उड़ने वाले धूल कण अपघषर्ण से चट्टðानी तल पर पहले उथले गतर् जिन्हें वात - गतर् ;इसवूवनजेद्ध कहते हैंऋ बनाते हैं और इनमें से वुफछ वात - गतर् गहरे और विस्तृत हो जाते है, जिन्हें गुहा ;ब्ंअमेद्ध कहते हैं। छत्राक ;डनेीतववउद्ध, टेबल तथा पीठिका शैल मरुस्थलों में अिाकतर चट्टðानें पवन अपवाहन व अपघषर्ण द्वारा शीघ्रता से कट जाती हैं और वुफछ प्रतिरोधी चट्टðानों के घ्िासे हुए अवशेष जिनके आधार पतले व उफपरी भाग विस्तृत और गोल, टोपी के आकार के होते है, छत्राक के आकार में पाए जाते हैं। कभी - कभी प्रतिरोधी चट्टðानों का उफपरी हिस्सा मेज की भाँति विस्तृत होता है और अिाकतर ऐसे अवशेष पीठिका की भाँति खड़े रहते हैं। बाढ़ चादर व पवन के द्वारा बनाए गए अपरदनात्मक स्थलरूपों को वण्िार्त करें। निक्षेपित स्थलरूप पवन एक छँटाइर् करने वाला कारक ;ैवतजपदह ंहमदजद्ध भी है, अथार्त पवन द्वारा बारीक रेत का परिवहन अिाक उफँचाइर् व अिाक दूरी तक होता है। पवनों के वेग के अनुरूप मोटे आकार के कण धरातल के साथ घषर्ण करते हुए चले आते हैं और अपने टकराने से अन्य कणों को ढीला कर देते हैं, जिसे साल्टेशन कहते हैं। हवा मेें लटकते महीन कण अपेक्षावृफत अिाक दूरी तक उड़ा कर ले जाए जा सकते हैं। चूँकि, पवनों द्वारा कणों का परिवहन उनके आकार व भार के अनुरूप होता है, अतः पवनों की परिवहन प्रिया में ही पदाथो± छँटाइर् का काम हो जाता है। जब पवन की गति घट जाती है या लगभग रुक जाती है तो कणों के आकार के आधार पर निक्षेपण प्रिया आरंभ होती है। अतः पवन के निक्षेपित स्थलरूपों में कणों की महीनता भी देखी जा सकती है। रेत की आपूतिर् व स्थायी पवन दिशा के आधार पर शुष्क प्रदेशों में पवन निक्षेपित स्थलरूप विकसित होते हैं। बालू - टिब्बे ;ैंदक कनदमेद्ध उष्ण शुष्क मरुस्थल बालू - टिब्बों के निमार्ण के उपयुक्त स्थान हैं। इनके निमार्ण के लिए अवरोध का होना भी अत्यंत आवश्यक है। बालू - टिब्बे विभ्िान्न प्रकार के होते हैं ;चित्रा 7.16द्ध। चित्रा 7.16: बालू - टिब्बों के विभ्िान्न रूप। तीर द्वारा वायु दिशा का चित्राण नव चंद्राकार टिब्बे जिनकी भुजाएँ पवनों की दिशा में निकली होते हैंऋ बरखान कहलाते हैं। जहाँ रेतीले धरातल पर आंश्िाक रूप से वनस्पति भी पाइर् जाती हैं वहाँ परवलयिक ;च्ंतंइवसपबद्ध बालुका - टिब्बों का निमार्ण होता है, अथार्त् अगर पवनों की दिशा स्थायी रहे तो परवलयिक बालू - टिब्बे बरखान से भ्िान्न आवृफति वाले होते हैंऋ सीप़्ाफ ;ैमपद्धि बरखान की ही भांति होते हैं। सीपफ बालू - टिब्बों में केवल एक ही भुजा होती है। ऐसा पवनों की दिशा में बदलाव के कारण होता है। सीपफ की यह भुजा उफँची व अध्िक लंबाइर् में विकसित हो सकती है। जब रेत की आपूतिर् कम तथा पवनों की दिशा स्थायी रहे तो अनुदैध्यर् टिब्बे ;स्वदहपजनकपदंस कनदमेद्ध बनते हैं। ये अत्यिाक लंबाइर् व कम ऊँचाइर् के लम्बायमान कटक प्रतीत होते हैं। अनुप्रस्थ टिब्बे ;ज्तंदेअमतेम कनदमेद्ध प्रचलित पवनों की दिशा के समकोण पर बनते हैं। इन टिब्बों के निमार्ण में पवनों की दिशा निश्िचत और रेत का स्रोत पवनों की दिशाके समकोण पर हों। ये अिाक लंबे व कम ऊँचाइर् वाले होते हैं। जब रेत की आपूतिर् अिाक हो तो अिाकतर नियमित बालु - टिब्बे एक - दूसरे में विलीन हो जाते हैं और उनकी वास्तविक आवृफति व अनोखी विशेषताएँ नहीं रहतीं। मरुस्थलों में अिाकतर टिब्बों का स्थानांतरण होता रहता है और इनमें से वुफछ विशेषकर मानव बस्ितयों के निकट स्िथत हो जाते हैं। अभ्यास 1.बहुवैकल्िपक प्रश्न: ;पद्ध स्थलरूप विकास की किस अवस्था में अधोमुख कटाव प्रमुख होता है? ;कद्ध तरुणावस्था ;खद्ध प्रथम प्रौढ़ावस्था ;गद्धअंतिम प्रौढ़ावस्था ;घद्ध वृ(ावस्था ;पपद्ध एक गहरी घाटी जिसकी विशेषता सीढ़ीनुमा खड़े ढाल होते हैंऋ किस नाम से जानी जाती है: ;कद्धन् आकार घाटी ;ख द्धअंधी घाटी ;गद्धगाॅजर् ;घद्ध वैफनियन ;पपपद्ध निम्न में से किन प्रदेशों में रासायनिक अपक्षय प्रिया यांत्रिाक अपक्षय प्रिया की अपेक्षा अिाक शक्ितशाली होती है: ;कद्धआद्रर् प्रदेश ;खद्ध शुष्क प्रदेश ;गद्धचूना - पत्थर प्रदेश ;घद्ध हिमनद प्रदेश ;पअद्ध निम्न में से कौन सा वक्तव्य लेपीज ;स्ंचपमेद्ध शब्द को परिभाष्िात करता है: ;कद्ध छोटे से मध्यम आकार के उथले गतर्;खद्ध ऐसे स्थलरूप जिनके ऊपरी मुख वृत्ताकार व नीचे से कीप के आकार के होते हैं। ;गद्ध ऐसे स्थलरूप जो धरातल से जल के टपकने से बनते हैं। ;घद्ध अनियमित धरातल जिनके तीखे कटक व खाँच हों। ;अद्ध गहरे, लंबे व विस्तृत गतर् या बेसिन जिनके शीषर् दीवार खड़े ढाल वाले व किनारे खड़े व अवतल होते हैं, उन्हें क्या कहते हैं? ;कद्धसवर्फ ;खद्ध पा£श्वक हिमोढ़ ;गद्ध घाटी हिमनद ;घद्ध एस्कर 2. निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए: ;पद्ध चट्टðानों में अधःक£तत विसपर् और मैदानी भागों में जलोढ़़़ के सामान्य विसपर् क्या बताते हैं? ;पपद्ध घाटी रंध््र अथवा युवाला का विकास वैफसे होता है? ;पपपद्ध चूनायुक्त चट्टðानी प्रदेशों में धरातलीय जल प्रवाह की अपेक्षा भौम जल प्रवाह अिाक पाया जाता है, क्यों? ;पअद्ध हिमनद घाटियों में कइर् रैख्िाक निक्षेपण स्थलरूप मिलते हैं। इनकी अवस्िथति व नाम बताएँ। ;अद्ध मरुस्थली क्षेत्रों में पवन वैफसे अपना कायर् करती है? क्या मरुस्थलों में यही एक कारक अपरदित स्थलरूपों का निमार्ण करता है। 3. निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए: ;पद्ध आद्रर् व शुष्क जलवायु प्रदेशों मंें प्रवाहित जल ही सबसे महत्त्वपूणर् भू - आवृफतिक कारक है। विस्तार से वणर्न करें। ;पपद्ध चूना चट्टðानें आद्रर् व शुष्क जलवायु में भ्िान्न व्यवहार करती हैं क्यों? चूना प्रदेशों में प्रमुख व मुख्य भू - आवृफतिक प्रिया कौन सी हैं और इसके क्या परिणाम हैं? ;पपपद्ध हिमनद ऊँचे पवर्तीय क्षेत्रों को निम्न पहाडि़यों व मैदानों में वैफसे परिव£तत करते हैं या किस प्रिया से यह कायर् सम्पन्न होता है बताएँ? परियोजना कायर् अपने क्षेत्रा के आसपास के स्थलरूप, उनके पदाथर् तथा वह जिन प्रियाओं से नि£मत है, पहचानें।

RELOAD if chapter isn't visible.