भू - आवृफतिक प्रवि्रफयाएँ पृथ्वी की उत्पिा वैफसे हुइर्? इसकी पपर्टी एवं अन्य आंतरिक संस्तरों का व्रफम - विकास वैफसे हुआ? भूपपर्टी प्लेट्स का संचलन किस प्रकार हुआ एवं वैफसे हो रहा है? भूवंफप, ज्वालामुखी के प्रकार एवं भू - पपर्टी को निमिर्त करने वाले शैलों और खनिजों के विषय में सूचनाओं की जानकारी के पश्चात् अब हम जिस धरातल पर रहते हैं, उसके विषय में भी विस्तार से जानने का प्रयास करेंगे। हम इस प्रश्न के साथ प्रारंभ करते हैंः धरातल असमतल क्यों है? सवर्प्रथम भू - पपर्टी गत्यात्मक है। आप अच्छी तरह जानते हैं कि यह क्षैतिज तथा उफध्वार्धर दिशाओं में संचलित होती रहती है। निश्िचत तौर पर यह भूतकाल में वतर्मान गति की अपेक्षा थोड़ी तीव्रतर संचलित होती थी। भू - पपर्टी का निमार्ण करने वाले पृथ्वी के भीतर सवि्रफय आंतरिक बलों में पाया जाने वाला अंतर ही पृथ्वी के बाह्य सतह में अंतर के लिए उत्तरदायी है। मूलतः, धरातल सूयर् से प्राप्त उफजार् द्वारा प्रेरित बाह्य बलों से अनवरत प्रभावित होता रहता है। निश्िचत रूप से आंतरिक बल अभी भी सवि्रफय हैं, यद्यपि उनकी तीव्रता में अंतर है। इसका तात्पयर् है कि धरातल पृथ्वी मंडल के अंतगर्त उत्पन्न हुए बाह्य बलों एवं पृथ्वी के अंदर उद्भूत आंतरिक बलों से अनवरत प्रभावित होता है तथा यह सवर्दा परिवतर्नशील है। बाह्य बलों को बहिजर्निक ;म्गवहमदपबद्ध तथा आंतरिक बलों को अंतजर्नित ;म्दकवहमदपबद्ध बल कहते हैं। बहिजर्निक बलों की वि्रफयाओं का परिणाम होता है - उभरी हुइर् भू - आवृफतियों का विघषर्ण ;ॅमंतपदह कवूदद्ध तथा बेसिन/निम्न अध्याय क्षेत्रों/गतो± का भराव ;अिावृि/तल्लोचनद्ध। धरातल पर अपरदन के माध्यम से उच्चावच के मध्य अंतर के कम होने को तल संतुलन;ळतंकंजपवदद्ध कहते हैं। अंतजर्नित शिाफयाँ निरंतर धरातल के भागों को उफपर उठाती हैं या उनका निमार्ण करती हैं तथा इस प्रकार बहिजर्निक प्रवि्रफयाएँ उच्चावच में भ्िान्नता को सम ;बराबरद्ध करने में असपफल रहती हैं। अतएव भ्िान्नता तब तक बनी रहती है जब तक बहिजर्निक एवं अन्तजर्नित बलों के विरोधात्मक कायर् चलते रहते हैं। सामान्यतः अंतजर्नित बल मूल रूप से भू - आवृफति निमार्ण करने वाले बल हैं तथा बहिजर्निक प्रवि्रफयाएँ मुख्य रूप से भूमि विघषर्ण बल होती हैं। भू - तल संवेदनशील है। मानव अपने निवार्ह के लिए इस पर निभर्र करता है तथा इसका व्यापक एवं सघन उपयोग करता है। लगभग सभी जीवों का धरातल के पयार्वरण के अनुवाह ;ैनेजंपदद्ध में योगदान होता है। मनुष्यों ने संसाधनों का अत्यिाक दोहन किया है। हमें इनका उपयोग करना चाहिए, विंफतु भविष्य में जीवन निवार्ह के लिए इसकी पयार्प्त संभाव्यता को बचाये रखना चाहिए। धरातल के अिाकांश भाग को बहुत लंबी अविा ;सैकड़ों - हशारों - वषो±द्ध में आकार प्राप्त हुआ है तथा मानव द्वारा इसके उपयोग, दुरुपयोग एवं वुफप्रयोग के कारण इसकी संभाव्यता ;विभवद्ध में बहुत तीव्र गति से ”ास हो रहा है। यदि उन प्रवि्रफयाओं, जिन्होंने धरातल को विभ्िान्न आकार दिया और अभी दे रही हैं, तथा उन पदाथो± की प्रवृफति जिनसे यह निमिर्त है, को समझ लिया जाए तो निश्िचत रूप से मानव उपयोग जनित हानिकारक प्रभाव को कम करने एवं भविष्य के लिए इसके संरक्षण हेतु आवश्यक उपाय किए जा सकते हैं। भू - आवृफतिक प्रवि्रफयाएँ ;ळमवउवतचीपब च्तवबमेेमेद्ध आप भू - आवृफतिक प्रवि्रफयाएँ के अथर् को समझना चाहेंगे। धरातल के पदाथो± पर अंतजर्नित एवं बहिजर्निक बलों द्वारा भौतिक दबाव तथा रासायनिक वि्रफयाओं के कारण भूतल के विन्यास में परिवतर्न को भू - आवृफतिक प्रवि्रफयाएँ कहते हैं। पटल विरूपण ;क्पंेजतवचीपेउद्ध एवं ज्वालामुखीयता ;टवसबंदपेउद्ध अंतजर्नित भू - आवृफतिक प्रवि्रफयाएँ हैं, जो इससे पहले की इकाइर् में संक्षेप में विवेचित हैं। अपक्षय, वृहत क्षरण ;डंेे ूंेजपदहद्ध, अपरदन एवं निक्षेपण ;क्मचवेपजपवदद्ध बहिजर्निक भू - आवृफतिक प्रवि्रफयाएँ हैं। इनका इस अध्याय में विस्तार से विवेचन किया गया है। प्रवृफति के किसी भी बहिजर्निक तत्त्व ;जैसे - जल, हिम, वायु इत्यादिद्ध, जो धरातल के पदाथो± का अिाग्रहण ;।बुनपतमद्ध तथा परिवहन करने में सक्षम है, को भू - आवृफतिक कारक कहा जा सकता है। जब प्रवृफति के ये तत्त्व ढाल प्रवणता के कारण गतिशील हो जाते हैं तो पदाथो± को हटाकर ढाल के सहारे ले जाते हैं और निचले भागों में निक्षेपित कर देते हैं। भू - आवृफतिक प्रवि्रफयाएँ तथा भू - आवृफतिक कारक विशेषकर बहिजर्निक, को यदि स्पष्ट रूप से अलग - अलग न कहा जाए तो इन्हें एक ही समझना होगा क्योंकि ये दोनों एक ही होते हैं। एक प्रवि्रफया एक बल होता है जो धरातल के पदाथो± के साथ अनुप्रयुत्तफ होने पर प्रभावी हो जाता है। एक कारक ;।हमदजद्ध एक गतिशील माध्यम ;जैसे - प्रवाहित जल, हिमानी, हवा, लहरें एवं धाराएँ इत्यादिद्ध है जो धरातल के पदाथो± को हटाता, ले जाता तथा निक्षेपित करता है। इस प्रकार प्रवाहयुत्तफ जल, भूमिगत जल, हिमानी, हवा, लहरों, धाराओं इत्यादि को भू - आवृफतिक कारक कहा जा सकता है। क्या आप समझते हैं भू - आवृफतिक कारकों एवं भू - आवृफतिक प्रवि्रफयाओं में अंतर करना आवश्यक है? गुरुत्वाकषर्ण, ढाल के सहारे सभी गतिशील पदाथो± को सवि्रफय बनाने वाली दिशात्मक ;क्पतमबजपवदंसद्ध बल होने के साथ - साथ धरातल के पदाथो± पर दबाव ;ैजतमेेद्ध डालता है। अप्रत्यक्ष गुरुत्वाकषर्क प्रतिबल ;ैजतमेेद्ध लहरों एवं ज्वार - भाटा जनित धाराओं को वि्रफयाशील बनाता है। निःसंदेह गुरुत्वाकषर्ण एवं ढाल प्रवणता के अभाव में गतिशीलता संभव नहीं हैं अतः अपरदन, परिवहन एवं निक्षेपण भी नहीं होगा। गुरुत्वाकषर्ण एक ऐसा बल है जिसके माध्यम से हम धरातल से संपवर्फ में रहते हैं। यह वह बल है जो भूतल के सभी पदाथो± के संचलन को प्रारंभ करता है। सभी संचलन, चाहे वे पृथ्वी के अंदर हों या सतह पर, प्रवणता के कारण ही घटित होते हैं, जैसे उफँचे स्तर से नीचे स्तर की ओर, तथा उच्च वायु दाब क्षेत्रा से निम्न वायु दाब क्षेत्रा की ओर। अंतजर्नित प्रवि्रफयाएँ ;म्दकवहमदपब चतवबमेेमेद्ध पृथ्वी के अंदर से निकलने वाली उफजार् भू - आवृफतिक प्रवि्रफयाओं के लिए प्रमुख बल स्रोत होती है। पृथ्वी के अंदर की उफजार् अिाकांशतः रेडियोधमीर् वि्रफयाओं, घूणर्न ;त्वजंजपवदंसद्ध एवं ज्वारीय घषर्ण तथा पृथ्वी की उत्पिा से जुड़ी उफष्मा द्वारा उत्पन्न होती है। भू - तापीय प्रवणता एवं अंदर से निकले उफष्मा प्रवाह से प्राप्त उफजार् पटल विरूपण ;क्पेंजतवचीपेउद्ध एवं ज्वालामुखीयता को प्रेरित करती है। भू - तापीय प्रवणता एवं अंदर के उफष्मा प्रवाह, भू - पपर्टी की मोटाइर् एवं दृढ़ता में अंतर के कारण अंतजर्नित बलों के कायर् समान नहीं होते हैं। अतः विवतर्निक द्वारा नियंत्रिात मूल भू - पपर्टी की सतह असमतल होती है। पटल विरूपण ;क्पंेजतवचीपेउद्ध सभी प्रवि्रफयाएँ जो भू - पपर्टी को संचलित, उत्थापित तथा निमिर्त करती हैं, पटल विरूपण के अंतगर्त आती हैं। इनमें निम्नलिख्िात सम्िमलित हैं: ;पद्ध तीक्ष्ण वलयन के माध्यम से पवर्त निमार्ण तथा भू - पपर्टी की लंबी एवं संकीणर् पिðयों को प्रभावित करने वाली पवर्तनी प्रवि्रफयाएँ ;पपद्ध धरातल के बड़े भाग के उत्थापन या विवृफति में संलग्न महाद्वीप रचना संबंधी प्रवि्रफयाएँ, ;पपपद्ध अपेक्षावृफत छोटे स्थानीय संचलन के कारण उत्पन्न भूवंफप, ;पअद्ध पपर्टी प्लेट के क्षैतिज संचलन करने में प्लेट विवतर्निकी की भूमिका। प्लेट विवतर्निक/पवर्तनी की प्रवि्रफया में भू - पपर्टी वलयन के रूप में तीक्ष्णता से विवृफत हो जाती है। महाद्वीप रचना के कारण साधारण विवृफति हो सकती है। पवर्तनी पवर्त निमार्ण प्रवि्रफया है, जबकि महाद्वीप रचना महाद्वीप निमार्ण - प्रवि्रफया है। पवर्तनी, महाद्वीप रचना ;म्चमपतवहमदलद्ध, भूवंफप एवं प्लेट विवतर्निक की प्रवि्रफयाओं से भू - पपर्टी में भं्रश तथा विभंग हो सकता है। इन सभी प्रवि्रफयाओं के कारण दबाव, आयतन तथा तापव्रफम में परिवतर्न होता है जिसके पफलस्वरूप शैलों का कायांतरण प्रेरित होता है। ज्वालामुखीयता ;टवसबंदपेउद्ध ज्वालामुखीयता के अंतगर्त पिघली हुइर् शैलों या लावा ;डंहउंद्ध का भूतल की ओर संचलन एवं अनेक आंतरिक तथा बाह्य ज्वालामुखी स्वरूपों का निमार्ण सम्िमलित होता है। इस पुस्तक की द्वितीय इकाइर् के ज्वालामुखी शीषर्क एवं पिछले अध्याय के आग्नेय शैलें शीषर्क के अंतगर्त ज्वालामुखीयता के बहुत से पक्षों का विस्तृत विवरण दिया जा चुका है। ज्वालामुखीयता एवं ज्वालामुखी शब्दों में भेद बताइए। बहिजर्निक प्रवि्रफयाएँ ;म्गवहमदपब चतवबमेेमेद्ध बहिजर्निक प्रवि्रफयाएँ अपनी उफजार् ‘सूयर् द्वारा निधर्रित वायुमंडलीय उफजार् एवं अंतजर्नित शिाफयों से नियंत्रिात विवतर्निक ;ज्मबजवदपबद्ध कारकों से उत्पन्न प्रवणता से प्राप्त करती हैं। आप क्यों सोचते हैं कि ढाल या प्रवणता बहिजर्निक बलों से नियंत्रिात विवतर्निक कारकों द्वारा निमिर्त होते हैं? गुरुत्वाकषर्ण बल ढालयुत्तफ सतह वाले धरातल पर कायर्रत रहता है तथा ढाल की दिशा में पदाथर् को संचलित करता है। प्रति इकाइर् क्षेत्रा पर अनुप्रयुत्तफ बल को प्रतिबल ;ैजतमेेद्ध कहते हैं। ठोस पदाथर् में प्रतिबल ;ैजतमेेद्ध धक्का एवं ख्िांचाव ;च्नेी ंदक चनससद्ध से उत्पन्न होता है। इससे विवृफति प्रेरित होती है। धरातल के पदाथो± के सहारे सवि्रफय बल अपरूपण प्रतिबल ;ैीमंत ेजतमेेमेद्ध ;विलगकारी बलद्ध होते हैं। यही प्रतिबल शैलों एवं धरातल के पदाथो± को तोड़ता है। अपरूपण प्रतिबल का परिणाम कोणीय विस्थापन ;।दहनसंत कपेचसंबमउमदजद्ध या विसपर्ण/पिफसलन ;ैसपचचंहमद्ध होता है। धरातल के पदाथर् गुरुत्वाकषर्ण प्रतिबल के अतिरिक्त आण्िवक प्रतिबलों से भी प्रभावित होते हैं, जो कइर् कारकों, जैसे - तापमान में परिवतर्न, वि्रफस्टलन ;ब्तलेजंसपेंजपवदद्ध एवं पिघलन द्वारा उत्पन्न होते हैं। रासायनिक प्रवि्रफयाएँ सामान्यतः कणों ;ळतंपदेद्ध के बीच के बंधन को ढीला करते हैं तथा विलेय पदाथो± को घुला देते हैं। इस प्रकार, धरातल के पदाथो± के पिंड ;ठवकलद्ध में प्रतिबल का विकास अपक्षय, वृहत् क्षरण संचलन, अपरदन एवं निक्षेपण का मूल कारण है। चूँकि, धरातल पर विभ्िान्न प्रकार के जलवायु प्रदेश मिलते हैं इसलिए बहिजर्निक भू - आवृफतिक प्रविफयाएँ भी एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में भ्िान्न होती हैं। तापव्रफम तथा वषर्ण दो महत्त्वपूणर् जलवायवीय तत्त्व हैं, जो विभ्िान्न प्रवि्रफयाओं को नियंत्रिात करते हैं। सभी बहिजर्निक भू - आवृफतिक प्रवि्रफयाओं को एक सामान्य शब्दावली अनाच्छादन ;क्मदनकंजपवदद्ध के अंतगर्त रखा जा सकता है। अनाच्छादन शब्द का अथर् है निरावृत्त ;ैजतपच वद्धिि करना या आवरण हटाना। अपक्षय, वृहत् क्षरण, संचलन, अपरदन, परिवहन आदि सभी इसमें सम्िमलित किये जाते हैं। प्रवाह चित्रा ;चित्रा 6.1द्ध अनाच्छादन प्रवि्रफयाओं तथा उनसे संबंिात प्रेरक बल को दशार्ता है। इससे यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि प्रत्येक प्रवि्रफया के लिए एक विश्िाष्ट प्रेरक बल या उफजार् होती है। बहिजर्निक भू - आवृफतिक प्रवि्रफयाएँ एक क्षेत्रा से दूसरे क्षेत्रा में भ्िान्न - भ्िान्न होती हैं। जैसा कि स्पष्ट है कि पृथ्वी के धरातल पर तापीय प्रवणता के कारण भ्िान्न - भ्िान्न जलवायु प्रदेश स्िथत हैं जो कि अक्षांशीय, मौसमी एवं जल - थल विस्तार में भ्िान्नता के द्वारा उत्पन्न होते हैं। तापमान एवं वषर्ण जलवायु के दो महत्त्वपूणर् घटक हैं जो कि विभ्िान्न भू - आवृफतिक प्रवि्रफयाओं को नियंत्रिात करते हैं। वनस्पति का घनत्व, प्रकार एवं वितरण, जो प्रमुखतः वषार् एवं तापव्रफम पर निभर्र करते हैं, बहिजर्निक भू - आवृफतिक प्रवि्रफयाओं पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डालते हैं। विभ्िान्न जलवायु - प्रदेशों मंे विभ्िान्न जलवायवी तत्त्वों जैसे - उफँचाइर् में अंतर, दक्ष्िाणमुखी ढालों पर पूवर् एवं पश्िचममुखी ढालों की अपेक्षा अिाक सूयार्तप प्राप्ित आदि के कारण स्थानीय भ्िान्नता पायी जाती है। पुनश्च, वायु का वेग एवं दिशा, वषर्ण की मात्रा एवं प्रकार, इसकी गहनता, वषर्ण एवं वाष्पीकरण में संबंध, तापव्रफम की दैनिक श्रेणी, हिमकरण एवं पिघलन की आवृिा, तुषार ;थ्तवेजद्ध व्यापन की गहराइर् इत्यादि में अंतर के कारण किसी भी जलवायु प्रदेश के अंदर भू - आवृफतिक प्रवि्रफयाएँ भ्िान्न - भ्िान्न होती हैं। सभी बहिजर्निक प्रवि्रफयाओं के पीछे एकमात्रा प्रेरक बल क्या होता है? यदि जलवायवी कारक समान हों तो बहिजर्निक भू - आवृफतिक प्रवि्रफयाओं के कायो± की गहनता शैलों के प्रकार एवं संरचना पर निभर्र करती है। संरचना में वलन, भं्रश, संस्तर का पूवार्भ्िामुखीकरण ;व्तपमदजंजपवदद्ध, झुकाव, जोड़ों की उपस्िथति या अनुपस्िथति, संस्तरण तल, घटक खनिजों की कठोरता या कोमलता तथा उनकी रासायनिक संवेदनशीलता, पारगम्यता ;च्मतउमंइपसपजलद्ध या अपारगम्यता इत्यादि सम्िमलित माने गये हैं। क्षमता प्रस्तुत करती हैं। एक विशेष शैल एक प्रवि्रफया के प्रति प्रतिरोधपूणर् तथा वही दूसरी प्रवि्रफया के प्रति प्रतिरोध रहित हो सकती हैं विभ्िान्न जलवायवी दशाओं में एक विशेष प्रकार की शैलें भू - आवृफतिक प्रतिवि्रफयाओं के प्रति भ्िान्न - भ्िान्न अंशों का प्रतिरोध प्रस्तुत कर सकती हैं अतएव वे भ्िान्न दरों पर कायर्रत रहती हैं तथा स्थलावृफति में भ्िान्नता का कारण बन जाती हैं। अिाकांश बहिजर्निक भू - आवृफतिक प्रतिवि्रफयाओं का प्रभाव थोड़ा एव मंद होता है तथा अल्पाविा में अनवगम्य ;प्उचमतबमचजपइसमद्ध हो सकता है। दीघार्विा में यह सतत श्रांति ;थ्ंजपहनमद्ध के कारण शैलों को तीव्र रूप से प्रभावित करता है। अंततः यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि धरातल पर विभ्िान्नता यद्यपि मूल रूप से भू - पपर्टी के उद्भव से संबंिात है, तथापि धरातल के पदाथो± के प्रकार एवं संरचना में अंतर, भू - आवृफतिक प्रवि्रफयाओं एवं उनके सवि्रफयता दर में अंतर आदि के कारण एक ना एक रूप में विद्यमान रहती है। वुफछ बहिजर्निक भू - आवृफतिक प्रवि्रफयाओं का यहाँ विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया है। अपक्षय ;ॅमंजीमतपदहद्ध अपक्षय के अंतगर्त वायुमंडलीय तत्त्वों की धरातल के पदाथो± पर की गइर् वि्रफया सम्िमलित होती है। अपक्षय के अंदर ही अनेक प्रवि्रफयाएँ हैं जो पृथक या ;प्रायःद्ध सामूहिक रूप से धरातल के पदाथो± को प्रभावित करती हैं। अपक्षय को मौसम एवं जलवायु के कायो± के माध्यम से शैलों के यांत्रिाक विखंडन ;डमबींदपबंसद्ध एवं रासायनिक वियोजन/ अपघटन ;क्मबवउचवेपजपवदद्ध के रूप में परिभाष्िात किया जा सकता है। चूँकि, अपक्षय में पदाथो± का बहुत - थोड़ा अथवा नगण्य संचलन होता है यह एक स्वस्थाने ;प्द ेपजनद्ध या तदस्थन ;व्द.ेपजमद्ध प्रवि्रफया है। क्या अपक्षय के कारण कभी - कभी होने वाली यह धीमी गति परिवहन का पयार्य है? यदि नहीं तो क्यों? अपक्षय - प्रवि्रफयाएँ जटिल भौमिकी, जलवायवी, स्थलावृफतिक एवं वनस्पतिक कारकों द्वारा प्रानुवूफलित ;ब्वदकपजपवदमकद्ध होती हैं। इन सबमें जलवायु का विशेष महत्त्व है। न केवल अपक्षय प्रवि्रफयाएँ अपितु अपक्षय मैंटल की गहराइर् भी एक जलवायु से दूसरे जलवायु में भ्िान्न - भ्िान्न होती है ;चित्रा 6.2द्ध। चित्रा 6.2 में विभ्िान्न जलवायु प्रदेशों के अक्षांश को अंकित कीजिए तथा उनसे प्राप्त विवरण की तुलना कीजिए। अपक्षय प्रवि्रफयाओं के तीन प्रमुख प्रकार हैं: ;1द्ध रासायनिक ;2द्ध भौतिक या यांत्रिाक एवं ;3द्ध जैविक। इनमें से कोइर् एक प्रवि्रफया कतिपय ही अकेले काम करती है परंतु प्रायः किसी एक प्रवि्रफया का अिाक महत्त्वपूणर् योगदान देखा जा सकता है। रासायनिक अपक्षय प्रवि्रफयाएँ ;ब्ीमउपबंस ॅमंजीमतपदह च्तवबमेेमेद्ध अपक्षय प्रवि्रफयाओं का एक समूह जैसे कि विलयन, काबोर्नेटीकरण, जलयोजन, आॅक्सीकरण तथा न्यूनीकरण शैलों के अपघटन, विलयन अथवा न्यूनीकरण का कायर् करते हैं, जो कि रासायनिक वि्रफया द्वारा सूक्ष्म ;ब्संेजपबद्ध अवस्था में परिवतिर्त हो जाती हैं। आॅक्सीजन, ध्रातलीय जल, मृदा - जल एवं अन्य अम्लों की प्रवि्रफया द्वारा चट्टðानों का न्यूनीकरण होता है। इसमें उफष्मा के साथ जल एवं वायु ;आॅक्सीजन तथा काबर्न डाइर्आॅक्साइडद्ध की विद्यमानता सभी रासायनिक प्रतिवि्रफयाओं को तीव्र गति देने के लिए आवश्यक है। वायु में विद्यमान काबर्न डाइर्आॅक्साइड के अतिरित्तफ पौधों एवं पशुओं का अपघटन भूमिगत काबर्न डाइर्आॅक्साइड की मात्रा को बढ़ा देता है। विभ्िान्न खनिजों पर रासायनिक प्रतिवि्रफयाएँ किसी अनुसंधानशाला में प्रतिवि्रफयाओं के समान ही होती हैं। घोल/विलयन ;ैवसनजपवदद्ध जब कोइर् वस्तु, जल या अम्ल ;।बपकद्ध में घुल जाती है तो घुलित तत्त्वों के जल या अम्ल को घोल कहते हैं। इस प्रवि्रफया में ठोस पदाथो± का घोल में मिलना सम्िमलित होता है जो जल या कम अम्ल में खनिज की विलयता पर निभर्र करता है। जल से सम्पवर्फ में आने पर अनेक ठोस पदाथर् विघटित हो जाते हैं एवं जल में निलंबन ;ैनेचमदेपवदद्ध के रूप में मिश्रित हो जाते हैं। घुलनशील शैल निमार्ण करने वाले नाइट्रेट, सल्पेफट एवं पोटेश्िायम जैसे खनिज इस प्रवि्रफया से प्रभावित होते हैं। अतः यह खनिज अध्िक वषार् की जलवायु में बिना कोइर् अवश्िाष्ट छोड़े सुगमता से निक्षालित ;स्मंबीमकद्ध हो जाते हैं और शुष्क प्रदेशों में वषार् के कारण एकत्रिात हो जाते हैं। चूना पत्थर में विद्यमान वैफल्िशयम काबोर्नेट, वैफल्िशयम मैग्नेश्िायम बाइर्काबोर्नेट जैसे खनिज, काबोर्निक एसिड युत्तफ जल ;जो जल में काबर्न डाइर्आॅक्साइड मिलने से बनता हैद्ध में घुलनशील होते हैं तथा जल में एक घोल के रूप में प्रवाहित होते हैं। क्षयोन्मुख जैव पदाथो± द्वारा जनित काबर्न डाइर्आॅक्साइड मृदा जल के साथ मिलकर इस प्रवि्रफया में बहुत सहायक होता है। साधारण ;ब्वउउवदद्ध लवण - सोडियम क्लोराइड भी एक शैल निमार्ण करने वाला खनिज है जो कि घुलनशील है। काबोर्नेशन ;ब्ंतइवदंजपवदद्ध काबोर्नेट एवं बाइर् काबोर्नेट की खनिजों से प्रतिवि्रफया का प्रतिपफल काबोर्नेशन कहलाता है। यह पेफल्सपार तथा काबोर्नेट खनिज को पृथक करने में एक आम सहायक प्रवि्रफया है। जल द्वारा वायुमंडल एवं मृदावायु से काबर्न डाइर्आॅक्साइड, अवशोष्िात की जाती है। इससे काबोर्निक अम्ल का निमार्ण होता है जो कि एक कम सवि्रफय अम्ल के रूप में कायर् करता है। वैफल्िशयम काबोर्नेट एवं मैग्नीश्िायम काबोर्नेट, काबर्निक एसिड में घुल जाते हैं तथा कोइर् अवशेष नहीं छोड़ते। इसके परिणामस्वरूप भूमिगत गुपफाओं का निमार्ण होता है। जलयोजन ;भ्लकतंजपवदद्ध जलयोजन जल का रासायनिक योग है। खनिज स्वयं जल धारण करके विस्तारित ;म्गचंदकमकद्ध हो जाते हैं एवं यह विस्तार पदाथर् के आयतन ;टवसनउमद्ध अथवा शैल में वृि का कारण बनते हैं। वैफल्िशयम सल्पेफट जल मिलने के बाद जिप्सम में परिवतिर्त हो जाता है जो वैफल्िशयम सल्पेफट की अपेक्षा अिाक अस्थायी होता है। चित्रा 6.3: आंध्र प्रदेश में भंगीर ;भुवनागिरीद्ध के समीप ग्रेनाइट शैल में वृहत् अपशल्कन गुम्बद यह प्रतिवि्रफया उत्व्रफमणीय एवं लंबी होती है तथा इसके सतत् पुनरावृिा से शैलों में श्रांति हो जाती है जिसके पफलस्वरूप उनमें विघटन हो सकता है। अनेक क्ले खनिज शुष्क एवं आद्रर् होने की प्रवि्रफया में पूफलते एवं संवुफचित होते हैं तथा इस प्रवि्रफया की पुनरावृिा उपरिशायी ;व्अमतसलपदहद्ध पदाथो± में दरार का कारण बनती है। रंध्र क्षेत्रा में समाहित लवण तीव्र एवं बार - बार जलयोजन से प्रभावित होकर शैल विभंग ;थ्तंबजनतमद्ध में सहायक होता है। जलयोजन के कारण खनिजों के आयतन में परिवतर्न अपशल्कन ;म्गविसपंजपवदद्ध एवं कणीय विघटन द्वारा भौतिक अपक्षय मंे भी सहायता प्रदान करता है। आॅक्सीकरण एवं न्यूनीकरण ;व्गपकंजपवद ंदक त्मकनबजपवदद्ध अपक्षय में आॅक्सीकरण का तात्पयर् होता है आॅक्साइड या हाइड्रोआॅक्साइड के निमार्ण हेतु खनिज एवं आॅक्सीजन का संयोग। आॅक्सीकरण वहीं होता है जहाँ वायुमंडल एवं आॅक्सीजन युत्तफ जल मिलते हैं। इस प्रवि्रफया में लौह, मैगनीज, गंधक ;ैनसचीनतद्ध इत्यादि सवार्िाक शामिल होते हैं। आॅक्सीकरण की प्रवि्रफया में आॅक्सीजन के योग के कारण पैदा हुए व्यवधान से शैलों का टूटना जारी रहता है। आॅक्सीकरण एक महत्त्वपूणर् प्रवि्रफया है जो लौह धारक बायोटाइट, ओलीवाइन, एवं पाइरोक्सीन जैसे खनिजों को प्रभावित करती है। आॅक्सीकरण होने पर लौह का लाल रंग, भूरे या पीले रंग में परिवतिर्त हो जाता है। जब आॅक्सीवृफत खनिज ऐसे वातावरण में रखे जाते हैं जहाँ आॅक्सीजन का अभाव है तो एक दूसरी रासायनिक अपक्षय प्रवि्रफया प्रारंभ हो जाती है जिसे न्यूनीकरण वि्रफया कहते हैं। ऐसी दशाएँ प्रायः भौम जलस्तर के नीचे, रू( जल के क्षेत्रा या जलप्लावित क्षेत्रों में पायी जाती हैं। न्यूनीवृफत होने पर लौह का लाल रंग, हरे या आसमानी - धूसर ;ठसनपेी हतमलद्ध रंग में बदल जाता है। अपक्षय की ये प्रवि्रफयाएँ अंतःसंबंिात हैं। जलयोजन, काबोर्नेशन एवं आॅक्सीकरण साथ - साथ चलते रहते हैं एवं अपक्षय प्रवि्रफया को त्वरित बना देते हैं। क्या हम लौह मंे जंग लगने को आॅक्सीकरण का उदाहरण मान सकते हैं? रासायनिक अपक्षय प्रवि्रफयाओं में जल कितना आवश्यक है? क्या रासायनिक अपक्षय प्रवि्रफया जलाभाव ;ॅंजमत ेबंतबमद्ध वाले उष्ण मरुस्थलों में प्रभावकारी हो सकती है? भौतिक अपक्षय प्रवि्रफयाएँ ;च्ीलेपबंस ॅमंजीमतपदह च्तवबमेेमेद्ध भौतिक या यांत्रिाक अपक्षय - प्रवि्रफयाएँ वुफछ अनुप्रयुत्तफ बलों ;थ्वतबमेद्ध पर निभर्र करती हैं। ये अनुप्रयुत्तफ बल निम्नलिख्िात हो सकते हैं: ;पद्ध गुरुत्वाकषर्क बल, जैसे अत्यिाक उफपर भार दबाव, एवं अपरूपण प्रतिबल ;ैीमंत ेजतमेेद्ध, ;पपद्ध तापव्रफम में परिवतर्न, वि्रफस्टल रवों में वृि एवं पशुओं के वि्रफयाकलापों के कारण उत्पन्न विस्तारण ;म्गचंदेपवदद्ध बल, ;पपपद्ध शुष्कन एवं आद्रर्न चव्रफों से नियंत्रिात जल का दबाव। इनमें से कइर् बल धरातल एवं विभ्िान्न धरातल पदाथो± के अंदर अनुप्रयुक्त होती हैं जिसका परिणाम शैलों का विभंग ;थ्तंबजनतमद्ध होता है। भौतिक अपक्षय प्रवि्रफयाओं में अिाकांश तापीय विस्तारण एवं दबाव के निमुर्त्तफ होने ;त्मसमंेमद्ध के कारण होता है। ये प्रवि्रफयाएँ लघु एवं मंद होती हैं परंतु कइर् बार संवुफचन एवं विस्तारण के कारण शैलों के सतत् श्रांति ;थ्ंजपहनमद्ध के पफलस्वरूप ये शैलों को बड़ी हानि पहुँचा सकती हैं। भारविहीनीकरण एवं विस्तारण ;न्दसवंकपदह ंदक मगचंदेपवदद्ध अनवरत अपरदन के कारण उपरिशायी शैलों के भार का अपनयन उफध्वार्ध्र दबाव ;टमतजपबंस चतमेेनतमद्ध के निमुर्िाफ का कारक होता है जिससे शैलों के उफपरी संस्तर विस्तारित हो जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप शैलों का पातन एवं तत्स्वरूप विघटन होता है। विभंग ;थ्तंबजनतमद्ध मोटे तौर पर भूतल की सतह के समानांतर विकसित होता है। भूमि के वव्रफ सतह वाले क्षेत्रों में चाप विभंग द्वारा शैलों की भारी चादरें या अपशल्कन पिðयाँ निमिर्त करने की प्रवृिा पायी जाती है। भारविहीनीकरण ;न्दसवंकपदहद्ध एवं दबाव मुक्त होने के कारण विस्तारण से उत्पन्न अपशल्कन चादरों का क्षैतिज विस्तार सैकड़ों या यहाँ तक कि हजारों मीटर तक हो सकता है। बड़े, चिकने गोलाकार गुंबद को अपशल्कन गुंबद कहते हैं ;चित्रा 6.3द्ध जो इस प्रवि्रफया के द्वारा बनता है। तापव्रफम में परिवतर्न एवं विस्तारण ;ज्मउचमतंजनतम बींदहमे ंदक मगचंदेपवदद्ध शैलों में विद्यमान विभ्िान्न प्रकार के खनिजों में स्वयं के विस्तारण एवं संवुफचन की अपनी सीमाएँ होती हैं। तापव्रफम बढ़ने के साथ प्रत्येक खनिज पैफलता है एवं अपने निकटस्थ खनिज को दबाता है तथा तापव्रफम गिरने के साथ उसमें तद्नुसार संवुफचन होता है। तापव्रफम में दैनिक परिवतर्न के कारण शैलों के छिछले संस्तरों के खनिज कणों में आंतरिक संचलन नियमित रूप से होता रहता है। यह प्रवि्रफया शुष्क जलवायु एवं अिाक उफँचे क्षेत्रों में, जहाँ दैनिक तापव्रफमांतर बहुत अिाक होता है, सवार्िाक प्रभावशाली होती है। जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है कि ये संचलन बहुत लघु होते हैं परंतु अनवरत श्रांति ;थ्ंजपहनमद्ध से शैलों को बहुत कमजोर बना देते हैं। शैलोें के सतही संस्तरों में उनकी गहराइर् के संस्तरों की अपेक्षा विस्तारण की प्रवृिा अिाक होती है, जिसके कारण शैलों के अंदर प्रतिबल ;ैजतमेेद्ध उत्पन्न होता है, परिणामस्वरूप सतह के समानांतर अनुप्रस्थ विस्थापन एवं विभंग विकसित हो जाते हैं। गमर् तथा ठंडा होने में विभेद एवं भ्िान्नता होने के कारण सतह के संस्तर में होने वाले पैफलाव तथा संवुफचन और तत्पश्चात् ध्रातल से अपशल्कन के कारण शैलों में चिकनी, गोलाकार सतहों का निमार्ण होता है। ग्रेनाइट शैलों में इस प्रवि्रफया से चिकनी सतह के छोटे से लेकर बड़े गोलाश्मों का निमार्ण होता है, जिसे टाॅर कहते हैं। अपशल्िकत गुंबद एवं अपशल्िकत टाॅर के मध्य क्या अंतर होता है? हिमकरण, पिघलन एवं तुषार वेजिंग ;थ्तमम्रपदह जींूपदह ंदक तिवेज ूमकहपदहद्ध शैलों के रंध्रों एवं दरारों में बार - बार हिमकरण एवं पिघलन के होने से हिम की वृि के कारण तुषार अपक्षय घटित होता है। यह प्रवि्रफया मध्य अक्षांशों में अिाक उफँचाइयों, जहाँ हिमकरण एवं पिघलन की प्रायः पुनरावृिा होती है, में सवार्िाक प्रभावशाली होती है। जल का तीव्रता से हिमकरण इसके अचानक पैफलाव एवं उच्च दबाव का कारण बनता है। यह पैफलाव संिायों ;श्रवपदजेद्ध दरारों एवं छोटी - छोटी अंतवर्फणीय ;प्दजमतहतंदनसंतद्ध विभंगों को प्रभावित कर उन्हें तब तक चैड़ा करता जाता है जब तक शैलें टूटकर अलग नहीं हो जातीं। लवण अपक्षय ;ैंसज ूमंजीमतपदहद्ध शैलों में नमक तापीय वि्रफया, जलयोजन एवं वि्रफस्टलीकरण के कारण पैफलता है। वैफल्िशयम, सोडियम, मैग्नेश्िायम, पोटैश्िायम एवं बोरियम जैसे कइर् लवणों में आयतनिक पैफलाव की प्रवृिा होती है। इन लवणों का पैफलाव उनके तापव्रफम एवं तापीय विशेषताओं पर निभर्र करता है। रेगिस्तानों में 30° से॰ से 50° से॰ तक का सतह पर उच्च तापव्रफम लवण विस्तारण में सहायक होता है। सतह के निकटस्थ रंध्रों में लवण के वि्रफस्टल शैलों के पृथक कणों में विपाटन पैदा कर देते हैं जो अन्ततः गिर जाते हैं। पृथक कणों के गिरने की यह प्रवि्रफया कण्िाक विघटन या कण्िाक शल्कन का कारण बन सकती है। सभी लवण विघटन प्रवि्रफयाओं में लवण वि्रफस्टलन सवार्िाक प्रभावकारी है। आदर््रता एवं शुष्कन के एकांतर वाले क्षेत्रों में लवण वि्रफस्टल की वृि के लिए उपयुत्तफ दशाएँ होती हैं। इसमें निकटस्थ कण अलग हो जाते हैं। मरुस्थली क्षेत्रों में सोडियम क्लोराइड एवं जिप्सम वि्रफस्टल अनुप्रस्थ - विस्थापित ;भ्मंअमक नचद्ध हो जाते हैं जिसके पफलस्वरूप पूरे अनुप्रस्थ - विस्थापित सतह पर दरारें विकसित हो जाती हैं। लवण वि्रफस्टल की वृि के साथ खडि़या बड़ी सुगमता से टूट जाती है। इसके बाद चूना पत्थर, बालू पत्थर, शेल, नीस, ग्रेनाइट की भी यही स्िथति होती है। जैविक कायर् एवं अपक्षय ;ठपवसवहपबंस ंबजपअपजल ंदक ूमंजीमतपदहद्ध जैविक अपक्षय, जीवों की वृि या संचलन से उत्पन्न अपक्षय - वातावरण एवं भौतिक परिवतर्न से खनिजों एवं आयन ;प्वदेद्ध के स्थानांतरण की दिशा मंे एक योगदान है। वेंफचुओं, दीमकों, चूहों, वृंफतकों इत्यादि जैसे जीवों द्वारा बिल खोदने एवं वेजिंग ;पफानद्ध के द्वारा नयी सतहांे ;ैनतंिबमेद्ध का निमार्ण होता है जिससे रासायनिक प्रवि्रफया के लिए अनावृत्त ;म्गचवेमद्ध सतह में नमी एवं हवा के वेधन में सहायता मिलती है। मानव भी वनस्पतियों को अस्त - व्यस्त कर, खेत जोतकर एवं मिट्टðी में वृफष्िा करके धरातलीय पदाथो± मंे वायु, जल एवं खनिजों के मिश्रण तथा उनमें नये संपवर्फ स्थापित करने में सहायक होता है। सड़ने वाले पौधों एवं पशुओं के भौतिक भूगोल के मूल सि(ांत पदाथर्ऋ ह्यूमिक, काबर्निक एवं अन्य अम्ल जैसे तत्त्वों के उत्पादन में योगदान देते हैं जिससे वुफछ तत्त्वों का सड़ना, क्षरण तथा घुलन बढ़ जाता है। पौधों की जड़ें धरातल के पदाथो± पर जबरदस्त दबाव डालती हैं तथा उन्हें यांत्रिाक ढंग ;डमबींदपबंससलद्ध से तोड़कर अलग - अलग कर देती हैं। अपक्षय के विशेष प्रभाव ;ैचमबपंस ममििबजे व िूमंजीमतपदहद्ध अपशल्कन इसकी व्याख्या पहले ही भौतिक अपक्षय प्रवि्रफयाओं, तापीय संवुफचन एवं पैफलाव तथा लवण अपक्षय के अंतगर्त की जा चुकी है। अपशल्कन एक परिणाम है, प्रवि्रफया नहीं। शैल या आधार शैल के उफपर से मोटे तौर पर घुमावदार चादर के रूप में उत्खंडित या पत्राकन होता है जिसके परिणामस्वरूप चिकनी एवं गोल सतह का निमार्ण होता है। ;चित्रा 6.3 तथा 6.4द्ध। अपशल्कन अभारितकरण ;न्दसवंकपदहद्ध एवं तापव्रफम परिवतर्न द्वारा प्रेरित पैफलाव एवं संवुफचन के कारण भी होता है। अपशल्िकत गुंबद एवं टासर् व्रफमशः अभारितकरण एवं तापीय संवुफचन से उत्पन्न होते हैं। अपक्षय का महत्त्व ;ैपहदपपिबंदबम व िूमंजीमतपदहद्ध अपक्षय प्रवि्रफयाएँ शैलों को छोटे - छोटे टुकड़ों में तोड़ने तथा न केवल आवरण प्रस्तर एवं मृदा निमार्ण के लिए मागर् प्रशस्त करते हैं अपितु अपरदन एवं वृहत संचलन ;डंेे उवअमउमदजद्ध के लिए भी उत्तरदायी होते हैं। जैव मात्रा एवं जैव - विविधता प्रमुखतः वनों ;वनस्पतिद्ध की देन है तथा वन, अपक्षयी प्रावार ;ॅमंजीमतपदह उंदजसमद्ध की गहराइर् पर निभर्र करता है। यदि शैलों का अपक्षय न हो तो अपरदन का कोइर् महत्त्व नहीं होता। इसका अथर् है कि अपक्षय वृहत क्षरण, अपरदन, उच्चावच के लघुकरण में सहायक होता है एवं स्थलावृफतियाँ अपरदन का परिणाम हैं। शैलों का अपक्षय एवं निक्षेपण राष्ट्रीय अथर्व्यवस्था के लिए अतिमहत्त्वपूणर् है, क्योंकि मूल्यवान खनिजों जैसे - लोहा, मैंगनीज, एल्यूमिनियम, ताँबा के अयस्कों के समृ(ीकरण ;म्दतपबीउमदजद्ध एवं संवेंफद्रण ;ब्वदबमदजतंजपवदद्ध में यह सहायक होता है। अपक्षय मृदा निमार्ण की एक महत्त्वपूणर् प्रवि्रफया है। जब शैलों का अपक्षय होता है तो वुफछ पदाथर् भूमिगत जल द्वारा रासायनिक तथा भौतिक निक्षालन के माध्यम से स्थानांतरित हो जाते हैं तथा शेष बहुमूल्य पदाथो± का संवेंफद्रण हो जाता है। इस प्रकार के अपक्षय के हुए बिना बहुमूल्य पदाथो± का संवेंफद्रण अपयार्प्त होगा तथा आथ्िार्क दृष्िट से उनका दोहन प्र्रव्रफमण तथा शोधन के लिए व्यवहायर् नहीं होगा। इसीको समृिकरण कहते हैं। बृहत् संचलन ;डंेे उवअमउमदजद्ध बृहत् संचलन के अंतगर्त वे सभी संचलन आते हैं, जिनमें शैलों वफा बृहत् मलवा ;क्मइतपेद्ध गुरुत्वाकषर्ण के सीधे प्रभाव के कारण ढाल के अनुरूप स्थानांतरित होता है। इसका तात्पयर् है कि वायु, जल, हिम ही अपने साथ एक स्थान से दूसरे स्थान तक मलवा नहीं ढोते, अपितु मलवा भी अपने साथ वायु, जल या हिम ले जाते हैं। बृहत् मलबे की संचलन गति मंद से तीव्र हो सकती है जिसके पफलस्वरूप पदाथो± के छिछले से गहरे स्तंभ प्रभावित होते हैं जिनके अंतगर्त विसपर्ण, बहाव, स्खलन एवं पतन ;थ्ंससद्ध सम्िमलित होते हैं। गुरुत्वाकषर्ण बल आधर शैलों एवं अपक्षय से पैदा सभी पदाथो± पर अपना प्रभाव डालता है। यद्यपि बृहत् संचलन के लिए अपक्षय अनिवायर् नहीं है, परंतु यह इसे बढ़ावा देता है। बृहत् संचलन अपक्षयित ढालों पर अनपक्षयित पदाथो± की अपेक्षा बहुत अिाक सवि्रफय रहता है। बृहत् संचलन में गुरुत्वाकषर्ण शक्ित सहायक होती है तथा कोइर् भी भू - आवृफतिक कारक जैसे - प्रवाहित जल, हिमानी, वायु, लहरें एवं धाराएँ बृहत् संचलन की प्रवि्रफया में सीधे रूप से सम्िमलित नहीं होते इसका अथर् है कि बृहत् संचलन अपरदन के अंदर नहीं आता है यद्यपि पदाथो± का संचलन ;गुरुत्वाकषर्ण की सहायता सेद्ध एक स्थान से दूसरे स्थान को होता रहता है। ढाल पर पदाथर् बाधक बलों के प्रति अपना प्रतिरोध प्रस्तुत करते हैं एवं तभी असपफल होते हैं जब बल पदाथो± के अपरूपण प्रतिरोध से महानतर होते हैं। असंब( कमजोर पदाथर्, छिछले संस्तर वाली शैलें, भं्रश, तीव्रता से झुके हुए संस्तर, खड़े भृगु या तीव्र ढाल, पयार्प्त वषार्, मूसलाधार वषार् तथा वनस्पति का अभाव बृहत् संचलन में सहायक होते हैं ;चित्रा 6.5द्ध। बृहत् संचलन की सवि्रफयता के कइर् कारक होते हैं। वे इस प्रकार हैं: ;पद्ध प्रावृफतिक एवं वृफत्रिाम साधनों द्वारा उफपर के पदाथो± के टिकने के आधार का हटाना। ;पपद्ध ढालों की प्रवणता एवं उफँचाइर् में वृि, ;पपपद्ध पदाथो± के प्रावृफतिक अथवा वृफत्रिाम भराव के कारण उत्पन्न अतिभार, ;पअद्ध अत्यिाक वषार्, संतृप्ित एवं ढाल के पदाथो± के स्नेहन ;स्नइतपबंजपवदद्ध द्वारा उत्पन्न अतिभार, ;अद्ध मूल ढाल की सतह पर से पदाथर् या भार का हटना, ;अपद्ध भूवंफप आना, ;अपपद्ध विस्पफोट या मशीनों का वंफपन ;टपइतंजपवदद्ध, ;अपपपद्ध अत्यिाक प्रावृफतिक रिसाव, ;पगद्ध झीलों, जलाशयों एवं नदियों से भारी मात्रा में जल निष्कासन एवं परिणामस्वरूप ढालों एवं नदी तटों के नीचे से जल का मंद गति से बहना, ;गद्धप्रावृफतिक वनस्पति का अंधाधुंध विनाश। संचलन के निम्न तीन रूप होते हैंः ;पद्ध अनुप्रस्थ विस्थापन ;तुषार वृि या अन्य कारणों से मृदा का अनुप्रस्थ विस्थापनद्ध, ;पपद्ध प्रवाह एवं ;पपपद्ध स्खलन। चित्रा 6.5 बृहत् संचलन विभ्िान्न प्रकारोंऋ संचलन की सापेक्ष गति/दर एवं आद्रर्ता की सीमाओं के संबंधों को दशार्ता है। बृहत् संचलन को दो प्रमुख प्रकारों मंे वगीर्वृफत किया जा सकता है: ;पद्ध मंद संचलन, ;पपद्ध तीव्र संचलन। मंद संचलन ;ैसवू उवअमउमदजेद्ध मंद विरूपण ;ब्तममचद्ध - इस वगर् का एक प्रकार हैं जोकि मध्यम तीव्र ;डवकमतंजमसल ेजममचद्ध एवं मृदा से आच्छादित ढाल पर घटित होता है। इसमें पदाथो± का संचलन इतना मंद होता है कि इसका आभास करना कठिन होता है और दीघर् कालिक पयर्वेक्षण से ही इसका पता चलता है। इसमें सम्िमलित पदाथर्, मृदा एवं शैल का मलवा हो सकता है। क्या आपने कभी बाड़ - स्तंभ, दूरभाष स्तंभ ;ज्मसमचीवदम चवसमद्ध को अपनी लंबवत् ;टमतजपबंसद्ध स्िथति से झुके हुए तथा संरेखण ;।सपहदउमदजद्ध में देखा है? यदि देखा है तो वह मंद विरूपण का प्रभाव है - इसमें सम्िमलित पदाथो± के आधार पर अनेक प्रकार के मंद विरूपण जैसे - मिट्टðी मंद विरूपण, टैलस मंद विरूपण, शैल हिमानी मंद विरूपण आदि की पहचान की जा सकती है। इस वगर् में मृदा विरूपण भी सम्िमलित होता है जिसका संबंध ढाल के सहारे मंद गति से प्रवाहित मृदा के अंबार अथवा पानी से स्नेहित या संतृप्त सूक्ष्म कण वाले शैल मलवा से होता है। यह प्रवि्रफया उन क्षेत्रों में आम होती है जहाँ परिहिमानीय एवं आदर््र शीतोष्ण क्षेत्रा होते हैं, जहाँ पर गहराइर् तक हिमवृफत मैदान का सतही पिघलाव होता है तथा वहाँ लंबी लगातार वषार् होती है। जब उफपरी भाग संतृप्त ;हो जाता हैद्ध एवं ;जबद्ध निम्न भाग जल के लिए अप्रवेश्य हो तो उफपरी भागों में प्रवाह होता है। तीव्र संचलन ;त्ंचपक उवअमउमदजेद्ध ये संचलन आद्रर् जलवायु प्रदेशों में निम्न से लेकर तीव्र ढालों पर घटित होते हैं। संतृप्त चिकनी मिट्टðी या गादी धरातल - पदाथो± का निम्न अंशों वाली वेदिकाओं या पहाड़ी ढालों ;ैपकमेद्ध के सहारे निम्नान्मुख संचलन मृदा - प्रवाह ;म्ंतजी सिवूद्ध कहलाता है। प्रायः पदाथर् सीढ़ी के समान वेदिकाएँ बनाते हुए अवसपर् कर जाते हैं तथा अपने शीषर् के पास चापाकार कगार तथा पदांगुलि के पास एकत्रिात उभार छोड़ जाते हैं। जब ढाल तीव्रतर होते हैं तो आधार शैल, विशेषकर कोमल ;ैवजिद्ध परतदार शैल, जैसे शेल या गहराइर् से अपक्षयित आग्नेय शैल, भी ढाल के नीचे स्खलित हो जाती हंै। इस वगर् में दूसरा प्रकार है कीचड़ प्रवाह ;डनक सिवूद्ध। वनस्पति आवरण के अभाव एवं भारी वषार् के कारण अपक्षयित पदाथो± के मोटे संस्तर जल से संतृप्त हो जाते हैं एवं धीरे - धीरे अथवा तीव्रता से निश्िचत वाहिकाओं ;ब्ींददमसद्ध के सहारे नीचे की ओर प्रवाहित होने लगते हैं। यह एक घाटी के अंदर कीचड़ की नदी - सी दिखाइर् पड़ती है। जब कीचड़ प्रवाह वाहिकाओं से बाहर निकल कर गिरिपद ;पीडमांटद्ध या मैदान में आते हैं तो वे सड़कों, पुलों एवं मकानों को चपेट में लेते हुए बहुत विध्वंसकारक सि( होते हैं। ऐसे कीचड़ प्रवाह उद्गाररत या हाल में ही उद्गारित ज्वालामुखी के ढालों पर बहुधा पाये जाते हैं। ज्वालामुखीय राख, धूल एवं अन्य खंडित तत्त्व भारी वषार् के कारण कीचड़ में परिवतिर्त हो जाते हैं भौतिक भूगोल के मूल सि(ांत एवं ढालों पर कीचड़ की नदी या जिह्ना ;ज्वदहनमद्ध के रूप में प्रवाहित होते हैं। इनसे मानव अिावासों को बहुत बड़ी क्षति पहुँचती है। इस प्रकार के संचलन में तीसरा प्रकार मलवा अवधाव ;।अंसंदबीमद्ध, वनस्पति आवरणयुत्तफ या उससे वंचित आद्रर् प्रदेशों की विशेषता है। यह तीव्र ढालों पर संकीणर् पथ के रूप में घटित होता है। मलवा अवधाव, कीचड़ प्रवाह से बहुत तीव्रतर होता है तथा हिम अवधाव के समान होता है। दक्ष्िाण अमेरिका के ऐंडीज पवर्तों एवं उत्तर अमेरिका के राॅकीश पवर्तों में वुफछ ऐसे ज्वालामुखी हैं जिनमें पिछले दशक में उद्गार हुआ तथा उनके ढालों पर उद्गार की अविा में तथा उद्गार के पश्चात् बहुत विनाशकारी कीचड़ प्रवाह हुआ। भूस्खलन ;स्ंदकेसपकमेद्ध भूस्खलन अपेक्षावृफत तीव्र एवं अवगम्य संचलन है। इसमें स्खलित होने वाले पदाथर् अपेक्षतया शुष्क होते हैं। असंलग्न वृहत का आकार एवं आवृफति शैल में अनिरंतरता की प्रवृफिा, क्षरण का अंश तथा ढाल की ज्यामिति पर निभर्र करते हैं। इस वगर् में पदाथो± के संचलन के प्रकार के आधार पर वगर् में कइर् प्रकार के स्खलन पहचाने जा सकते हैं ;चित्रा 6.6द्ध। ढाल, जिसपर संचलन होता है, के संदभर् में पश्च - आवतर्न ;त्वजंजपवदद्ध के साथ शैल - मलवा की एक या कइर् इकाइयों के पिफसलन ;ैसपचचपदहद्ध को अवसपर्ण कहते हैं। ;चित्रा 6.6द्ध। पृथ्वी के पिंड के पश्च - आवतर्न के बिना मलवा का तीव्र लोटन ;त्वससपदहद्ध या स्खलन मलवा स्खलन कहलाता है। मलवा स्खलन में खड़े ;टमतजपबंसद्ध या प्रलंबी पफलक ;थ्ंबमद्ध से मिट्टðी मलवा का प्रायः स्वतंत्रा पतन होता है। संस्तर जोड़ या भं्रश के नीचे पृथक शैल बृहत् के स्खलन को शैल स्खलन कहते हैं। तीव्र ढालों पर शैल स्खलन बहुत तीव्र एवं विध्वंसक होता है। चित्रा 6.7 तीव्र ढाल पर भू - स्खलन की खरोंच दशार्ता है। तीव्र नति संस्तरण तल जैसे अनिरंतरताओं के सहारे स्खलन एक समतलीय पात के रूप में घटित होता है। किसी तीव्र ढाल के सहारे शैल खंडों का ढाल से दूरी रखते हुए स्वतंत्रा रूप से गिरना शैल पतन ;थ्ंससद्ध कहलाता है। शैल पतन शैलों के पफलक के उथले संस्तर से होता है जो इसे शैल स्खलन ;जिसमें पदाथर् पयार्प्त गहराइर् तक प्रवाहित होते हैंद्ध से अलग करता है। बृहत् क्षरण एवं बृहत् संचलन में से आपके अनुसार कौन सी शब्दावली अिाक उपयुत्तफ है? एवं क्यों? क्यों मृदा सपर्ण को तीव्र प्रवाह संचलन ;त्ंचपक सिवू उवअमउमदजद्ध के अंतगर्त सम्िमलित किया जा सकता है? ऐसा क्यों हो सकता है या क्यों नहीं? हमारे देश में मलवा अवधाव एवं भूस्खलन हिमालय में प्रायः घटित होते हैं। इसके अनेक कारण हैंऋ पहला, हिमालय, विवतर्निक दृष्िटकोण से सवि्रफय है। यह अिाकांशतः परतदार शैलों एवं असंघटित एवं अध्र् - संघटित पदाथो± से बना हुआ है। इसकी ढाल मध्यम न होकर तीव्र है। हिमालय की तुलना में तमिलनाडु, कनार्टक एवं केरल की सीमा बनाता हुआ नीलगिरि एवं पश्िचमी तट के किनारे पश्िचमी घाट अपेक्षावृफत विवतर्निकी दृष्िट से अिाक स्थायी ;ैजंइसमद्ध है तथा बहुत कठोर शैलों से निमिर्त हैऋ परंतु अब भी इन पहाडि़यों में मलवा अवधाव एवं भूस्खलन होते रहते हैं, यद्यपि उनकी बारंबारता उतनी नहीं है जितनी हिमालय में। क्योंकि, पश्िचमी घाट एवं नीलगिरि में ढाल खड़े भृगु एवं कगार के साथ तीव्रतर हैं। तापव्रफम में परिवतर्न एवं ताप परिसर ;त्ंदहमेद्ध के कारण यांत्रिाक अपक्षय सुस्पष्ट होता है। वहाँ लघु अविा में अिाक वषार् होती है। अतः इन स्थानों में भूस्खलन एवं मलवा अवधाव के साथ प्रायः सीधे शैल पतन ;क्पतमबज तवबा ंिससद्ध होता है। अपरदन एवं निक्षेपण ;म्तवेपवद ंदक क्मचवेपजपवदद्ध अपरदन के अंतगर्त शैलों के मलवे की अवाप्ित ;।बुनपेजपवदद्ध एवं उनके परिवहन को सम्िमलित किया जाता है। पिंडाकार शैलें जब अपक्षय एवं अन्य वि्रफयाओं के कारण छोटे - छोटे टुकड़ों ;थ्तंहउमदजेद्ध में टूटती हैं तो अपरदन के भू - आवृफतिक कारक जैसे कि प्रवाहित जल, भौमजल, हिमानी, वायु, लहरें एवं धाराएँ उनको एक स्थान से हटाकर दूसरे स्थानों को ले जाते हैं जो कि इन कारकों के गत्यात्मक स्वरूप पर निभर्र करते हैं। भू - आवृफतिक कारकों द्वारा परिवहन किया जाने वाले चट्टðानी - मलबे द्वारा अपघषर्ण भी अपरदन में पयार्प्त योगदान देता है। अपरदन द्वारा उच्चावचन का निम्नीकरण होता है, अथार्त् भूदृश्य विघष्िार्त होते हैं। इसका तात्पयर् है कि अपक्षय अपरदन में सहायक होता है, लेकिन अपक्षय अपरदन के लिए अनिवायर् दशा नहीं है। अपक्षय, बृहत् क्षरण एवं अपरदन निम्नीकरण की प्रवि्रफयाएँ हैं। बृहत् संचलन एवं अपरदन में अंतर है। बृहत् संचलन में शैल मलवा, चाहे वह शुष्क हो अथवा नम, गुरुत्वाकषर्ण के कारण स्वयं आधारतल पर जाते हैंऋ परंतु प्रवाहशील जल, हिमानी, लहरें एवं धाराएँ तथा वायु निलंबित मलवे को नहीं ढोते हैं। वस्तुतः यह अपरदन ही है जो धरातल में होने वाले अनवरत परिवतर्न के लिए उत्तरदायी है। जैसा कि चित्रा संख्या 6.1 से स्पष्ट है कि अपरदन एवं परिवहन जैसी अनाच्छादन प्रवि्रफयाएँ गतिज उफजार् द्वारा नियंत्रिात होती हैं। धरातल के पदाथो± का अपरदन एवं परिवहन वायु, प्रवाहशील जल, हिमानी, लहरों एवं धाराओं तथा भूमिगत जल द्वारा होता है। इनमें से प्रथम तीन कारक जलवायवी दशाओं द्वारा नियंत्रिात होते हैं। क्या आप जलवायु के इन तीन नियंत्रिात कारकों की तुलना कर सकते हैं? यह कारक पदाथो± की व्रफमशः तीन अवस्थाओं - गैसीय ;हवाद्ध, तरल ;प्रवाहशील जलद्ध एवं ठोस ;हिमानीद्ध का प्रतिनििात्व करते हैं। अपरदन का अथर् है फ्गतिज उफजार् का अनुप्रयोग जो भू - सतह के साथ संचलित कारकों से संबंिात होता है।य् गतिज उफजार् निम्न प्रकार से ज्ञात की जा सकती है: ज्ञम् ;ज्ञपदमजपब म्दमतहलद्ध त्र )उअ2 जहाँ उ त्र उंेे ;बृहत्द्ध, अ त्र अमसवबपजल ;वेगद्ध इस प्रकार के कायर् करने हेतु प्राप्त उफजार् पदाथर् के बृहत तथा उसकी संचलन वेग पर निभर्र करेगी। जैसे कि विशालकाय हिमानी बृहत् बहुत मंद गति से संचलित होते हैं परंतु अपरदन की दृष्िट से ये बहुत प्रभावकारी होते हैं। दूसरी ओर हवा, जो कि गैसीय रूप में होती है, कम प्रभावी होती है। अपरदन के दो अन्य कारकों - लहरों एवं धाराओं तथा भूमिगत जल का कायर् जलवायु द्वारा नियंत्रिात नहीं होता। लहरें थल एवं जलमंडल के अंतरापृष्ठ - तटीय प्रदेश में कायर् करती है, जबकि भूमिगत जल का कायर् प्रमुखतः किसी क्षेत्रा की आश्िमक ;स्पजीवसवहपबंसद्ध विशेषताओं द्वारा निधार्रित होता है। यदि शैलें पारगम्य घुलनशील एवं जल प्राप्य हैं तो केवल कास्टर् ;चूनावृफतद्ध आवृफतियों का निमार्ण होता है। अगले अध्याय में हम अपरदन के कारकों द्वारा निमिर्त भूआवृफतियों का विवरण प्रस्तुत करेंगे। निक्षेपण अपरदन का परिणाम होता है। ढाल में कमी के कारण जब अपरदन के कारकों के वेग में कमी आ जाती तो परिणामतः अवसादों का निक्षेपण प्रारंभ हो जाता है। दूसरे शब्दों में, निक्षेपण वस्तुतः किसी कारक का कायर् नहीं होता। पहले स्थूल तथा बाद में सूक्ष्म पदाथर् निक्षेपित ;क्मचवेपजमकद्ध होते हैं। निक्षेपण से निम्न भूभाग ;क्मचतमेेपवदेद्ध भर जाते हैं। वहीं अपरदन के कारक, जैसे - प्रवाहयुत्तफ जल, हिमानी, वायु, लहरें, धाराएँ एवं भूमिगत जल इत्यादि तल्लोचन अथवा निक्षेपण के कारक के रूप में भी कायर् करने लग जाते हैं। अपरदन एवं निक्षेपण के कारण धरातल पर क्या होता है? इसका विवेचन अगले अध्यायः ‘भू - आवृफतियाँ एवं उनका उद्भव ;म्अवसनजपवदद्ध’ में विस्तृत रूप से किया गया है। बृहत् संचलन एवं अपरदन दोनों में पदाथो± का एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरण होता है। अतः दोनों एक ही माने जा सकते हैं या नहीं? यदि नहीं, तो क्यों? क्या शैलों के अपक्षय के बिना पयार्प्त अपरदन संभव हो सकता है? मृदा निमार्ण ;ैवपस वितउंजपवदद्ध मृदा एवं मृदा के तत्त्व ;ैवपस ंदक ेवपस बवदजमदजेद्ध आप पौधें को मृदा में बढ़ते हुए देखते हैं। आप मैदान में खेलते हैं और मृदा के संपवर्फ में आते हैं। आप मृदा को छूते हैं, उसका अनुभव करते हैं और आपके कपड़ों पर भी मिट्टðी लग जाती है। आपको वैफसा अनुभव होता है? क्या आप बता सकते हैं? मृदा वैज्ञानिकों के अनुसार मृदा धरातल पर प्रावृफतिक तत्त्वों का समुच्चय है जिसमें जीवित पदाथर् तथा पौधों को पोष्िात करने की क्षमता होती है। मृदा एक गत्यात्मक माध्यम है जिसमें बहुत सी रासायनिक, भौतिक एवं जैविक वि्रफयाएँ अनवरत चलती रहती हैं। मृदा अपक्षय अपकषर् का परिणाम है, यह वृि का माध्यम भी है। यह एक परिवतर्नशील एवं विकासोन्मुख तत्त्व है। इसकी बहुत सी विशेषताएँ मौसम के साथ बदलती रहती हैं। यह वैकल्िपक रूप से ठंडी और गमर् या शुष्क एवं आद्रर् हो सकती हैं। यदि मृदा बहुत अिाक ठंडी या बहुत अिाक शुष्क होती है तो जैविक वि्रफया मंद या बंद हो जाती है। यदि इसमें पिायाँ गिरती हैं या घासें सूख जाती हैं तो जैव पदाथर् बढ़ जाते हैं। मृदा का रसायन, उसमें जैव पदाथर् की मात्रा, पेड़ - पौधे और प्राण्िाजात, तापव्रफम और नमी, सभी मौसम के साथ तथा विस्तारित ;निमार्ण कीद्ध कालाविा के साथ परिवतिर्त हो जाते हैं। इसका तात्पयर् है कि मृदा जलवायु की दशाओं, भूआवृफतियों एवं वनस्पतियों के साथ अनुवूफलित होती रहती हैं और यदि उत्तफ नियंत्राक दशाओं में परिवतर्न हो जाए तो आंतरिक रूप से भी परिवतिर्त हो सकती है। मृदा निमार्ण की प्रवि्रफयाएँ ;च्तवबमेे व िैवपस वितउंजपवदद्ध मृदा निमार्ण या मृदाजनन ;च्मकवहमदमेपेद्ध सवर्प्रथम अपक्षय पर निभर्र करती है। यह अपक्षयी प्रावार ;अपक्षयी पदाथर् की गहराइर्द्ध ही मृदा निमार्ण का मूल निवेश होता है। सवर्प्रथम अपक्षयित प्रावार या लाए गए पदाथो± के निक्षेप, बैक्टेरिया या अन्य निवृफष्ट पौधे जैसे काइर् एवं लाइकेन द्वारा उपनिवेश्िात किए जाते हैं। प्रावार एवं निक्षेप के अंदर कइर् गौण जीव भी आश्रय प्राप्त कर लेते हैं। जीव एवं पौधों के मृत्त अवशेष ह्यूमस के एकत्राीकरण मंे सहायक होते हैं। प्रारंभ में गौण घास एवं पफन्सर् की वृि हो सकती है बाद में पक्ष्िायों एवं वायु द्वारा लाए गए बीजों से वृक्ष एवं झाडि़यों में वृि होने लगती है। पौधों की जड़ें नीचे तक घुस जाती हैं। बिल बनाने वाले, जानवर कणों ;च्ंतजपबसमेद्ध को उफपर लाते हैं, जिससे पदाथो± का पुंज ;अंबारद्ध छिद्रमय एवं स्पंज की तरह हो जाता है। इस प्रकार जल - धारण करने की क्षमता, वायु के प्रवेश आदि के कारण अंततः परिपक्व, खनिज एवं जीव - उत्पाद युत्तफ मृदा का निमार्ण होता है। क्या अपक्षय मिट्टðी के निमार्ण के लिए पूणर्रूप से उत्तरदायी है? यदि नहीं तो क्यों? पेडालाॅजी मृदा विज्ञान है एवं पेडालाॅजिस्ट एक मृदा वैज्ञानिक होता है। मृदा निमार्ण के कारक ;ैवपस वितउपदह ंिबजवतेद्ध मृदा निमार्ण पाँच मूल कारकों द्वारा नियंत्रिात होता है। ये कारक हैः ;पद्ध मूल पदाथर् ;शैलेंद्ध ;पपद्ध स्थलावृफति ;पपपद्ध जलवायु ;पअद्ध जैविक वि्रफयाएँ एवं ;अद्ध समय। वस्तुतः मृदा निमार्ण कारक संयुत्तफ रूप से कायर्रत रहते हैं एवं एक दूसरे के कायर् को प्रभावित करते हैं। इनका संक्ष्िाप्त विवरण अधोलिख्िात है। जलवायु ;ब्सपउंजमद्ध जलवायु मृदा निमार्ण में एक महत्त्वपूणर् सवि्रफय कारक है। मृदा के विकास मंे संलग्न जलवायवी तत्त्वों में प्रमुख हैंः ;पद्ध प्रवणता, वषार् एवं वाष्पीकरण की बारंबारता व अविा तथा आद्रर्ता, ;पपद्ध तापव्रफम में मौसमी एवं दैनिक भ्िान्नता। मूल पदाथर्/शैल ;च्ंतमदज उंजमतपंसद्ध मृदा निमार्ण में मूल शैल एक निष्िव्रफय नियंत्राक कारक है। मूल शैल कोइर् भी स्वस्थाने ;प्द ेपजनद्ध या उसी स्थान पर अपक्षयित शैल मलवा ;अवश्िाष्ट मृदाद्ध या लाये गये निक्षेप ;परिवहनवृफत मृदाद्ध हो सकती है। मृदा निमार्ण गठन ;मलवा के आकारद्ध संरचना ;एकल/पृथक कणों/मलवा के कणों का विन्यासद्ध तथा शैल निक्षेप के खनिज एवं रासायनिक संयोजन पर निभर्र करता है। मूल पदाथर् के अंतगर्त अपक्षय की प्रवृफति एवं उसकी दर तथा आवरण की गहराइर्/मोटाइर् प्रमुख विचारणीय तत्त्व होते हैं। समान आधार शैल पर मृदाओं में अंतर हो सकता है तथा असमान आधार पर समान मृदाएँ मिल सकती हैं। परंतु जब मृदाएँ बहुत नूतन ;ल्वनदहद्ध तथा पयार्प्त परिपक्व नहीं होती तो मृदाआंे एवं मूल शैलों के प्रकार में घनिष्ट संबंध होता है। वुफछ चूना क्षेत्रों ;स्पउम ेजवदम ंतमंेद्ध में भी, जहाँ अपक्षय प्रवि्रफयाएँ विश्िाष्ट एवं विचित्रा ;च्मबनसपंतद्ध होती हैं, मििðयाँ मूल शैल से स्पष्ट संबंध दशार्ती हैं। स्थलावृफति/उच्चावच ;ज्वचवहतंचीलद्ध मूल शैल की भाँति स्थलावृफति भी एक दूसरा निष्िव्रफय नियंत्राक कारक है। स्थलावृफति मूल पदाथर् के आच्छादन अथवा अनावृत होने को सूयर् की किरणों के संबंध में प्रभावित करती हैं तथा स्थलावृफति ध्रातलीय एवं उप - सतही अप्रवाह की प्रवि्रफया को मूल पदाथर् के संबंध में भी प्रभावित करती है। तीव्र ढालों पर मृदा छिछली ;ज्ीपदद्ध तथा सपाट उच्च क्षेत्रों में गहरी/मोटी ;ज्ीपबाद्ध होती है। निम्न ढालों जहाँ अपरदन मंद तथा जल का परिश्रवण ;च्मतबवसंजपवदद्ध अच्छा रहता है मृदा निमार्ण बहुत अनुवूफल होता है। सपाट/समतल क्षेत्रों में चीका मिट्टðी ;ब्संलद्ध के मोटे स्तर का विकास हो सकता है तथा जैव पदाथर् के अच्छे एकत्राीकरण के साथ मिट्टðी/मृदा का रंग भी गहरा ;कालाद्ध हो सकता है। मध्य अक्षांशों में दक्ष्िाणोन्मुख सूयर् की किरणों से अनावृत ढालों की वनस्पति तथा मृदा की दशा भ्िान्न होती है एवं उत्तरोन्मुख ठंडे, नम दशाओं वाले ढालों पर अन्य प्रकार की मिट्टðी एवं वनस्पति मिलती है। जैविक वि्रफयाएँ ;ठपवसवहपबंस ंबजपअपजपमेद्ध वनस्पति आवरण एवं जीव जो मूल पदाथो± पर प्रारंभ तथा बाद में भी विद्यमान रहते हैं मृदा में जैव पदाथर्, नमी धारण की क्षमता तथा नाइट्रोजन इत्यादि जोड़ने में सहायक होते हैं। मृत पौधे मृदा को सूक्ष्म विभाजित जैव पदाथर् - ह्यूमस प्रदान करते हैं। वुफछ जैविक अम्ल जो ह्यूमस बनने की अविा में निमिर्त होते हैं मृदा के मूल पदाथो± के खनिजों के विनियोजन में सहायता करते हैं। बैक्टीरियल कायर् की गहनता ठंडी एवं गमर् जलवायु की मििðयों में अंतर को दशार्ती है। ठंडी जलवायु में ह्यूमस एकत्रिात हो जाता है, क्योंकि यहाँ बैक्टीरियल वृि धीमी होती है। उप - आवर्फटिक एवं टुंड्रा जलवायु में निम्न बैक्टेरियल वि्रफयाओं के कारण अवियोजित जैविक पदाथो± के साथ पीट ;च्मंजद्ध के संस्तर विकसित हो जाते हैं। आद्रर्, उष्ण एवं भूमध्य रेखीय जलवायु में बैक्टेरियल वृि एवं वि्रफयाएँ सघन होती हैं तथा मृत वनस्पति शीघ्रता से आॅक्सीवृफत हो जाती है जिससे मृदा में ह्यूमस की मात्रा बहुत कम रह जाती है। बैक्टेरिया एवं मृदा के जीव हवा से गैसीय नाइट्रोजन प्राप्त कर उसे रासायनिक रूप में परिवतिर्त कर देते हैं जिसका पौधों द्वारा उपयोग किया जा सकता है। इस प्रवि्रफया को नाइट्रोजन निधार्रण ;छपजतवहमद पिगंजपवदद्ध कहते हैं। राइजोबियम ;त्ीप्रवइपनउद्ध, एक प्रकार का बैक्टेरिया जंतुवाले ;स्महनउपदवनेद्ध पौधों के जड़ गंं्रथ्िाका में रहता है तथा मेजबान ;भ्वेजद्ध पौधों के लिए लाभकारी नाइट्रोजन निधार्रित करता है। चींटी, दीमक, वेंफचुए, वृंफतक ;त्वकमदजेद्ध इत्यादि कीटों का महत्त्व अभ्िायांत्रिाकी ;डमबींदपबंसद्ध सा होता है, परंतु मृदा निमार्ण में ये महत्त्वपूणर् होते हैं क्योंकि वे मृदा को बार - बार उफपर नीचे करते रहते हैं। वेंफचुए मिट्टðी खाते हैं, अतः उनके शरीर से निकलने वाली मिट्टðी का गठन एवं रसायन परिवतिर्त हो जाता है। कालाविा ;ज्पउमद्ध मृदा निमार्ण में कालाविा तीसरा महत्त्वपूणर् कारक है। मृदा निमार्ण प्रवि्रफयाओं के प्रचलन में लगने वाले काल ;समयद्ध की अविा मृदा की परिपक्वता एवं उसके पाश्िवर्का ;च्तवपिसमद्ध का विकास निधार्रण करती है। एक मृदा तभी परिपक्व होती है जब मृदा निमार्ण की सभी प्रवि्रफयाएँ लंबे काल तक पाश्िवर्का विकास करते हुए कायर्रत रहती हैं। थोड़े समय पहले ;त्मबमदजसलद्ध निक्षेपित जलोढ़ मिट्टðी या हिमानी टिल से विकसित मृदाएँ तरुण/युवा ;ल्वनदहद्ध मानी जाती हैं तथा उनमें संस्तर ;भ्वतप्रवदद्ध का अभाव होता है अथवा कम विकसित संस्तर मिलता है। संपूणर् परिप्रेक्ष्य में मिट्टðी के विकास या उसकी परिपक्वता के लिए कोइर् विश्िाष्ट ;ैचमबपपिबद्ध कालाविा नहीं है। क्या मृदा निमार्ण प्रवि्रफया एवं मृदा निमार्ण नियंत्राक कारकों को अलग करना आवश्यक है? मृदा निमार्ण - प्रवि्रफया में कालाविा, स्थलावृफति एवं मूल पदाथर् निष्िव्रफय नियंत्राक कारक क्यों माने जाते हैं? अभ्यास 1. बहुवैकल्िपक प्रश्न: ;पद्ध निम्नलिख्िात में से कौन सी एक अनुव्रफमिक प्रवि्रफया है? ;कद्ध निक्षेप ;खद्ध ज्वालामुखीयता ;गद्ध पटल - विरूपण ;घद्ध अपरदन ;पपद्ध जलयोजन प्रवि्रफया निम्नलिख्िात पदाथो± मंे से किसे प्रभावित करती है? ;कद्ध गे्रनाइट ;खद्ध क्वाट्र्श ;गद्ध चीका ;क्लेद्ध मिट्टðी ;घद्ध लवण ;पपपद्ध मलवा अवधाव को किस श्रेणी में सम्िमलित किया जा सकता है? ;कद्ध भूस्खलन ;खद्ध तीव्र प्रवाही बृहत् संचलन ;गद्ध मंद प्रवाही बृहत् संचलन ;घद्ध अवतलन/धसकन 2. निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए: ;पद्ध अपक्षय पृथ्वी पर जैव विविधता के लिए उतरदायी है। वैफसे? ;पपद्ध बृहत् संचलन जो वास्तविक, तीव्र एवं गोचर/अवगम्य ;च्मतबमचजपइसमद्ध हैं, वे क्या हैं? सूचीब( कीजिए। ;पपपद्ध विभ्िान्न गतिशील एवं शिाफशाली बहिजर्निक भू - आवृफतिक कारक क्या हैं तथा वे क्या प्रधान कायर् संपन्न करते हैं? ;पअद्ध क्या मृदा निमार्ण में अपक्षय एक आवश्यक अनिवायर्ता है? 3. निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए: ;पद्ध फ्हमारी पृथ्वी भू - आवृफतिक प्रवि्रफयाओं के दो विरोधात्मक ;व्चचवेपदहद्ध वगो± के खेल का मैदान है,य् विवेचना कीजिए। ;पपद्ध ‘बहिजर्निक भू - आवृफतिक प्रवि्रफयाएँ अपनी अंतिम उफजार् सूयर् की गमीर् से प्राप्त करती हैं।’ व्याख्या कीजिए। ;पपपद्ध क्या भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय प्रवि्रफयाएँ एक दूसरे से स्वतंत्रा हैं? यदि नहीं तो क्यों? सोदाहरण व्याख्या कीजिए। ;पअद्ध आप किस प्रकार मृदा निमार्ण प्रवि्रफयाओं तथा मृदा निमार्ण कारकों के बीच अंतर ज्ञात करते हैं? जलवायु एवं जैविक वि्रफयाओं की मृदा निमार्ण में दो महत्त्वपूणर् कारकों के रूप में क्या भूमिका है? परियोजना कायर् अपने चतुदिर्क विद्यमान भूआवृफति/उच्चावच एवं पदाथो± के आधार पर जलवायु, संभव अपक्षय प्रवि्रफयाओं एवं मृदा के तत्त्वों और विशेषताओं को परख्िाए एवं अंकित कीजिए।

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