महासागरों और महाद्वीपों का वितरण पिछले अध्याय में आपने भूगभर् के विषय में पढ़ा। आप संसार के मानचित्रा से भी परिचित हैं। आप जानते हैं कि पृथ्वी के 29 प्रतिशत भाग पर महाद्वीप और बाकी पर महासागर पैफले हुए हैं। महाद्वीपों और महासागरों की अवस्िथति, जैसाकि आज मानचित्रा पर दिखाइर् देती है, हमेशा से ऐसी नहीं रही है। इसके अतिरिक्त, यह भी एक तथ्य है कि आने वाले समय में भी महाद्वीप व महासागरों की स्िथति आज जैसी नहीं रहेगी। अगर ऐसा है तो प्रश्न यह है कि पुराकाल में इनकी अवस्िथति वैफसी थी? इनकी अवस्िथति में परिवतर्न क्यों और वैफसे होता है? यदि यह सच है कि महाद्वीपों और महासागरों की अवस्िथति में परिवतर्न हुआ है और अभी भी हो रहा है, तो आप यह जानकर आश्चयर्चकित होंगे कि वैज्ञानिक यह सब वैफसे जानते हैं? उन्होंने इन महाद्वीपों एवं महासागरों की पहले की स्िथति का निधर्रण वैफसे किया होगा? इन्हीं प्रश्नों के उत्तर और इनसे संबंध्ित प्रश्न ही इस अध्याय का विषय हैं। महाद्वीपीय प्रवाह;ब्वदजपदमदजंस कतपजिद्ध अटलांटिक महासागरीय तटरेखा की आवृफति को ध्यान से देखें। इस महासागर के दोनों तरपफ की तटरेखा में आश्चयर्जनक सममिति ;ैलउउमजतलद्ध है। इसी समानता के कारण बहुत से वैज्ञानिकों ने दक्ष्िाण व उत्तर अमेरिका तथा यूरोप व अप्रफीका के एक साथ जुड़े होने की संभावना को व्यक्त किया। विज्ञान के इतिहास के ज्ञात अभ्िालेखों से पता चलता है कि सन् 1596 में एक डच मानचित्रावेत्ता अब्राहम आॅरटेलियस ;।इतंींउ व्तजमसपनेद्ध ने सवर्प्रथम इस संभावना को व्यक्त किया था। एन्टोनियो पैलेग्रीनी ;।दजवदपव च्मससमहतपदपद्ध ने अध्याय एक मानचित्रा बनाया, जिसमें तीनों महाद्वीपों को इकट्टòा दिखाया गया था। जमर्न मौसमविद अल्प्रेफड वेगनर ;।सतिमक ॅमहमदमतद्ध ने फ्महाद्वीपीय विस्थापन सि(ांतय् सन् 1912 में प्रस्तावित किया। यह सि(ांत महाद्वीप एवं महासागरों के वितरण से ही संबंध्ित था। इस सि(ांत की आधरभूत संकल्पना यह थी कि सभी महाद्वीप एक अकेले भूखंड में जुड़े हुए थे। वेगनर के अनुसार आज के सभी महाद्वीप इस भूखंड के भाग थे तथा यह एक बड़े महासागर से घ्िारा हुआ था। उन्होंने इस बड़े महाद्वीप को पैंजिया;च्ंदहंमंद्ध का नाम दिया। पैंजिया का अथर् है - संपूणर् पृथ्वी। विशाल महासागर को पैंथालासा;च्ंदजींसंेेंद्ध कहा, जिसका अथर् है - जल ही जल। वेगनर के तवर्फ के अनुसार लगभग 20 करोड़ वषर् पहले इस बड़े महाद्वीप पैंजिया का विभाजन आरंभ हुआ। पैंजिया पहले दो बड़े महाद्वीपीय पिंडों लारेश्िाया ;स्ंनतंेपंद्ध और गोंडवानालैंड ;ळवदकूंदंसंदकद्ध व्रफमशः उत्तरी व दक्ष्िाणी भूखंडों के रूप में विभक्त हुआ। इसके बाद लारेश्िाया व गोडवानालैंड ध्ीरे - ध्ीरे अनेक छोटे हिस्सों में बँट गए, जो आज के महाद्वीप के रूप हैं। महाद्वीपीय विस्थापन के पक्ष में अनेक प्रमाण भी प्रस्तुत किए गए हैं, इनमें से वुफछ इस प्रकार हैं। महाद्वीपीय विस्थापन के पक्ष में प्रमाण ;म्अपकमदबमे पद ेनचचवतज व िबवदजपदमदजंस कतपजिद्ध महाद्वीपों में साम्य दक्ष्िाण अमेरिका व अप्रफीका के आमने - सामने की तटरेखाएँ अद्भुत व त्राुटिरहित साम्य दिखाती हैं। यह भी ध्यान देने योग्य है कि 1964 इर्0 में बुलडर् ;ठनससंतकद्ध ने एक वंफप्यूटर प्रोग्राम की सहायता से अटलांटिक तटों को जोड़ते हुए एक मानचित्रा तैयार किया था। तटों का यह साम्य बिल्वुफल सही सि( हुआ। साम्य बिठाने की यह कोश्िाश आज की तटरेखा की अपेक्षा 1,000 पैफदम की गहराइर् की तटरेखा के साथ की गइर् थी। महासागरों के पार चट्टðानों की आयु में समानता आध्ुनिक समय में विकसित की गइर् रेडियोमिटिªक काल निधर्रण ;त्ंकपवउमजतपब कंजपदहद्ध विध्ि से महासागरों के पार महाद्वीपों की चट्टðानों के निमार्ण के समय को सरलता से जाना जा सकता है। 200 करोड़ वषर् प्राचीन शैल समूहों की एक पट्टðी ब्राजील तट और पश्िचमी अप्रफीका के तट पर मिलती हैं, जो आपस में मेल खाती है। दक्ष्िाण अमेरिका व अप्रफीका की तटरेखा के साथ पाए जाने वाले आरंभ्िाक समुद्री निक्षेप जुरेसिक काल ;श्रनतंेेपब ंहमद्ध के हैं। इससे यह पता चलता है कि इस समय से पहले महासागर की उपस्िथति वहाँ नहीं थी। टिलाइट ;ज्पससपजमद्ध टिलाइट वे अवसादी चट्टðानें हैं, जो हिमानी निक्षेपण से निमिर्त होती हैं। भारत में पाए जाने वाले गोंडवाना श्रेणी के तलछटों के प्रतिरूप दक्ष्िाण गोलाध्र् के छः विभ्िान्न स्थलखंडों में मिलते हैं। गोंडवाना श्रेणी के आधर तल में घने टिलाइट हैं, जो विस्तृत व लंबे समय तक हिमआवरण या हिमाच्छादन की ओर इंगित करते हैं। इसी व्रफम के प्रतिरूप भारत के अतिरिक्त अप्रफीका, पफाॅकलैंड द्वीप, मैडागास्कर, अंटावर्फटिक और आस्ट्रेलिया में मिलते हैं। गोंडवाना श्रेणी के तलछटों की यह समानता स्पष्ट करती है कि इन स्थलखंडों के इतिहास में भी समानता रही है। हिमानी निमिर्त टिलाइट चट्टðानें पुरातन जलवायु और महाद्वीपों के विस्थापन के स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। प्लेसर निक्षेप ;च्संबमत कमचवेपजेद्ध घाना तट पर सोने के बड़े निक्षेपों की उपस्िथति व उद्गम चट्टðानों की अनुपस्िथति एक आश्चयर्जनक तथ्य है। सोनायुक्त श्िाराएँ ;ळवसक इमंतपदह अमपदेद्ध ब्राजील में पाइर् जाती हैं। अतः यह स्पष्ट है कि घाना में मिलने वाले सोने के निक्षेप ब्राजील पठार से उस समय निकले होंगे, जब ये दोनों महाद्वीप एक दूसरे से जुड़े थे। जीवाश्मों का वितरण ;क्पेजतपइनजपवद व िविेेपसेद्ध यदि समुद्री अवरोध्क के दोनों विपरीत किनारों पर जल व स्थल में पाए जाने वाले पौधें व जंतुओं की समान प्रजातियाँ पाइर् जाए, तो उनके वितरण की व्याख्या में समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। इस प्रेक्षण से कि ‘लैमूर’ भारत, मैडागास्कर व अप्रफीका में मिलते हैं, वुफछ वैज्ञानिकों ने इन तीनों स्थलखंडों को जोड़कर एक सतत् स्थलखंड ‘लेमूरिया’ ;स्मउनतपंद्ध की उपस्िथति को स्वीकारा। मेसोसारस ;डमेवेंनतनेद्ध नाम के छोटे रेंगने वाले जीव केवल उथले खारे पानी में ही रह सकते थे - इनकी अस्िथयाँ केवल दक्ष्िाण अप्रफीका के दक्ष्िाणी केप प्रांत और ब्राजील में इरावर शैल समूह में ही मिलते हैं। ये दोनों स्थान आज एक दूसरे से 4,800 कि0मी0 की दूरी पर हैं और इनके बीच में एक महासागर विद्यमान है। प्रवाह संबंध्ी बल ;थ्वतबम वित कतपजिपदहद्ध वेगनर के अनुसार महाद्वीपीय विस्थापन के दो कारण थेः ;1द्ध पोलर या ध्ु्रवीय फ्रलीइंग बल ;च्वसंत सिममपदह वितबमद्ध और ;2द्ध ज्वारीय बल ;ज्पकंस वितबमद्ध। ध्ु्रवीय फ्रलीइंग बल पृथ्वी के घूणर्न से संबंध्ित है। आप जानते हैं कि पृथ्वी की आवृफति एक संपूणर् गोले जैसी नहीं हैऋ वरन् यह भूमध्यरेखा पर उभरी हुइर् है। यह उभार पृथ्वी के घूणर्न के कारण है। दूसरा बल, जो वेगनर महोदय ने सुझाया - वह ज्वारीय बल है, जो सूयर् व चंद्रमा के आकषर्ण से संब( है, जिससे महासागरों में ज्वार पैदा होते हैं। वेगनर का मानना था कि करोड़ों वषो± के दौरान ये बल प्रभावशाली होकर विस्थापन के लिए सक्षम हो गए। यद्यपि बहुत से वैज्ञानिक इन दोनों ही बलों को महाद्वीपीय विस्थापन के लिए सवर्था अपयार्प्त समझते हैं। संवहन - धरा सि(ांत ;ब्वदअमबजपवदंस बनततमदज जीमवतलद्ध 1930 के दशक मंे आथर्र होम्स ;।तजीनत भ्वसउमेद्ध ने मैंटल ;डंदजसमद्ध भाग में संवहन - धराओं के प्रभाव की संभावना व्यक्त की। ये धराएँ रेडियोएक्िटव तत्त्वों से उत्पन्न ताप भ्िान्नता से मैंटल भाग में उत्पन्न होती हैं। होम्स ने तवर्फ दिया कि पूरे मैंटल भाग में इस प्रकार की धराओं का तंत्रा विद्यमान है। यह उन प्रवाह बलों की व्याख्या प्रस्तुत करने का प्रयास था, जिसके आधर पर समकालीन वैज्ञानिकों ने महाद्वीपीय विस्थापन सि(ांत को नकार दिया। महासागरीय अध्स्तल का मानचित्राण ;डंचचपदह व िजीम वबमंद सिववतद्ध महासागरों की बनावट और आकार पर विस्तृत शोध्, यह स्पष्ट करते हैं कि महासागरों का अध्स्तल एक विस्तृत मैदान नहीं है, वरन् उनमंे भी उच्चावच पाया जाता है। यु(ोत्तर काल ;च्वेज.ूंत चमतपवकद्ध महासागरीय अधस्तल के निरूपण अभ्िायान ने महासागरीय उच्चावच संबंध्ी विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की और यह दिखाया कि इसके अध्स्तली में जलमग्न पवर्तीय कटवेंफ व गहरी खाइयाँ हैं, जो प्रायः महाद्वीपों के किनारों पर स्िथत हैं। मध्य महासागरीय कटवेंफ ज्वालामुखी उद्गार के रूप में सबसे अध्िक सवि्रफय पायी गइर्। महासागरीय पपर्टी की चट्टðानों के काल निधर्रण ;क्ंजपदहद्ध ने यह तथ्य स्पष्ट कर दिया कि महासागरों के नितल की चट्टðानें महाद्वीपीय भागों में पाइर् जाने वाली चट्टðानों की अपेक्षा नवीन हैं। महासागरीय कटक के दोनों तरपफ की चट्टðानें, जो कटक से बराबर दूरी पर स्िथत हैं, उन की आयु व रचना में भी आश्चयर्जनक समानता पाइर् जाती है। महासागरीय अध्स्तल की बनावट ;व्बमंद सिववत बवदपिहनतंजपवदद्ध इस भाग में हम महासागरीय तल की बनावट से संबंध्ित वुफछ ऐसे तथ्यों का अध्ययन करेंगे, जो महासागर व महाद्वीपों के वितरण को समझने में मददगार होंगे। महासागरीय तल की आवृफतियाँ अध्याय 13 में विस्तार से वण्िार्त हैं। गहराइर् व उच्चावच के प्रकार के आधर पर, महासागरीय तल को तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया जा सकता है। ये भाग हैं: ;1द्ध महाद्वीपीय सीमा, ;2द्ध गहरे समुद्री बेसिन और ;3द्ध मध्य - महासागरीय कटक। महाद्वीपीय सीमा ;ब्वदजपदमदजंस उंतहपदेद्ध ये महाद्वीपीय किनारों और गहरे समुद्री बेसिन के बीच का भाग है। इसमें महाद्वीपीय मग्नतट, महाद्वीपीय ढाल, महाद्वीपीय उभार और गहरी महासागरीय खाइयाँ आदि शामिल हैं। महासागरों व महाद्वीपों के वितरण को समझने के लिए गहरी - महासागरीय खाइयों के क्षेत्रा विशेष महत्वपूणर् और रोचक हैं। वितलीय मैदान ;।इलेेंस च्संपदेद्ध ये विस्तृत मैदान महाद्वीपीय तटों व मध्य महासागरीय कटकों के बीच पाए जाते हैं। वितलीय मैदान, वह क्षेत्रा हैं, जहाँ महाद्वीपों से बहाकर लाए गए अवसाद इनके तटों से दूर निक्षेपित होते हैं। मध्य महासागरीय कटक ;डपक.वबमंदपब तपकहमेद्ध मध्य महासागरीय कटक आपस में जुड़े हुए पवर्तों की एक शृंखला बनाती है। महासागरीय जल में डूबी हुइर्, यह पृथ्वी के ध्रातल पर पाइर् जाने वाली संभवतः सबसे लंबी पवर्त शृंखला है। इन कटकों के मध्यवतीर् श्िाखर पर एक रिफ्रट, एक प्रभाजक पठार और इसकी लंबाइर् के साथ - साथ पाश्वर् मंडल इसकी विशेषता है। मध्यवतीर् भाग में उपस्िथत द्रोणी वास्तव में सवि्रफय ज्वालामुखी क्षेत्रा है। पिछले अध्याय में मध्य - महासागरीय ज्वालामुखी के रूप में ऐसे ज्वालामुख्िायों की जानकारी दी गइर् है। भूवंफप व ज्वालामुख्िायों का वितरण ;क्पेजतपइनजपवद व िमंतजीुनंामे ंदक अवसबंदवमेद्ध भूवंफपीय गतिविध्ि और ज्वालामुखी वितरण का दिए गए मानिचत्रा 4.5 ;अद्ध और ;बद्ध मंे अध्ययन करें। आप अटलांटिक महासागर के मध्यवतीर् भाग में, तट रेखा के लगभग समानांतर, एक बिंदु रेखा देखेंगे। यह आगे हिंद महासागर तक जाती है। भारतीय उपमहाद्वीप के थोड़ा दक्ष्िाण में यह दो भागों में बँट जाती है, जिसकी एक शाखा पूवीर् अप्रफीका की ओर चली जाती है और दूसरी मयनमार से होती हुइर् न्यू गिनी पर एक ऐसी ही रेखा से मिल जाती चित्रा 4.2: भूवंफप व ज्वालामुख्िायों का वितरण है। आप यह पाएँगे कि यह बिंदुरेखा मध्य - महासागरीय कटकों के समरूप है। भूवंफपीय संकेन्द्रण का दूसरा क्षेत्रा छायांकित मेखला ;ैींकमक इमसजद्ध के माध्यम से दिखाया गया है, जो अल्पाइन - हिमालय ;।सचपदम.भ्पउंसंलंदद्ध श्रेण्िायों के और प्रशांत महासागरीय किनारों के समरूप है। सामान्यतः मध्य महासागरीय कटकों के क्षेत्रा में भूवंफप के उद्गम वेंफद्र कम गहराइर् पर हैं जबकि अल्पाइन - हिमालय पट्टðी व प्रशांत महासागरीय किनारों पर ये वेंफद्र अध्िक गहराइर् पर हैं। ज्वालामुखी मानचित्रा भी इसी का अनुकरण करते हैं। प्रशांत महासागर के किनारों को सवि्रफय ज्वालामुखी के क्षेत्रा होने के कारण ‘रिंग आॅपफ पफायर’ ;त्पदह व िपितमद्ध भी कहा जाता है। सागरीय अध्स्तल का विस्तार जैसा कि उफपर वणर्न किया गया है, प्रवाह उपरांत अध्ययनों ने महत्वपूणर् जानकारी प्रस्तुत की, जो वेगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सि(ांत के समय उपलब्ध् नहीं थी। चट्टðानों के पुरा चुंबकीय अध्ययन और महासागरीय तल के मानचित्राण ने विशेष रूप से निम्न तथ्यों को उजागर कियाः ;पद्ध यह देखा गया कि मध्य महासागरीय कटकों के साथ - साथ ज्वालामुखी उद्गार सामान्य वि्रफया है और ये उद्गार इस क्षेत्रा में बड़ी मात्रा में लावा बाहर निकालते हैं। ;पपद्ध महासागरीय कटक के मध्य भाग के दोनों तरपफ समान दूरी पर पाइर् जाने वाली चट्टðानों के निमार्ण का समय, संरचना, संघटन और चुंबकीय गुणों में समानता पाइर् जाती है। महासागरीय कटकों के समीप की चट्टðानों में सामान्य चुंबकत्व ध्ु्रवण ;छवतउंस चवसंतपजलद्ध पाइर् जाती है तथा ये चट्टðानें नवीनतम हैं। कटकों के शीषर् से दूर चट्टðानों की आयु भी अध्िक है। ;पपपद्ध महासागरीय पपर्टी की चट्टðानें महाद्वीपीय पपर्टी की चट्टðानों की अपेक्षा अध्िक नइर् हैं। महासागरीय पपर्टी की चट्टðानें कहीं भी 20 करोड़ वषर् से अध्िक पुरानी नहीं हैं। ;पअद्ध गहरी खाइयों में भूवंफप के उद्गम अध्िक गहराइर् पर हैं। जबकि मध्य - महासागरीय कटकों के क्षेत्रा में भूवंफप उद्गम वेंफद्र ;थ्वबपद्ध कम गहराइर् पर विद्यमान हैं। इन तथ्यों और मध्य महासागरीय कटकों के दोनों तरपफ की चट्टðानों के चुंबकीय गुणों के विश्लेषण के चित्रा 4.4: पिछले 5,400 लाख वषो± में महाद्वीपों की गति। ;1द्धअप्रफीकाऋ ;2द्ध दक्ष्िाण अमेरिकाऋ ;3द्ध अंटावर्फटिकाऋ ;4द्धआॅस्टेªेलियाऋ ;5द्ध भारतऋ ;6द्ध चीनऋ ;7द्ध उत्तरी अमेरिकाऋ ;8द्धयूरोपऋ ;9द्ध एवं ;10द्ध साइबेरिया ;एमिलानी, 1992द्ध आधर पर हेस ;भ्मेेद्ध ने सन् 1961 में एक परिकल्पना प्रस्तुत की, जिसे ‘सागरीय अध्स्तल विस्तार’ ;ैमं सिववत ेचतमंकपदहद्ध के नाम से जाना जाता है। हेस ;भ्मेेद्ध के तकार्नुसार महासागरीय कटकों के शीषर् पर लगातार ज्वालामुखी उद्भेदन से महासागरीय पपर्टी में विभेदन हुआ और नया लावा इस दरार को भरकर महासागरीय चित्रा 4.4: भूवैज्ञानिक कालों में महाद्वीपों की स्िथति पपर्टी को दोनों तरपफ ध्केल रहा है। इस प्रकार महासागरीय अध्स्तल का विस्तार हो रहा है। महासागरीय पपर्टी का अपेक्षावृफत नवीनतम होना और इसके साथ ही एक महासागर में विस्तार से दूसरे महासागर के न सिवुफड़ने पर, हेस ;भ्मेेद्ध ने महासागरीय पपर्टी के क्षेपण की बात कही। हेस के अनुसार, यदि ज्वालामुखी पपर्टी से नइर् पपर्टी का निमार्ण होता है, तो दूसरी तरपफ महासागरीय गतो± में इसका विनाश भी होता है। चित्रा 4.3 में सागरीय तल विस्तार की मूलभूत संकल्पना को दिखाया गया है। प्लेट विवतर्निकी ;च्संजम जमबजवदपबेद्ध सागरीय तल विस्तार अवधरणा के पश्चात् विद्वानों की महाद्वीपों व महासागरों के वितरण के अध्ययन में पिफर से रुचि पैदा हुइर्। सन् 1967 में मैक्वैफन्शी ;डबामद्रपमद्ध, पारकर ;च्ंतामतद्ध और मोरगन ;डवतहंदद्ध ने स्वतंत्रा रूप से उपलब्ध् विचारों को समन्िवत कर अवधरणा प्रस्तुत की, जिसे ‘प्लेट विवतर्निकी’ ;च्संजम जमबजवदपबेद्ध कहा गया। एक विवतर्निक प्लेट ;जिसे लिथोस्पेफरिक प्लेट भी कहा जाता हैद्ध, ठोस चट्टðान का विशाल व अनियमित आकार का खंड है, जो महाद्वीपीय व महासागरीय स्थलमंडलों से मिलकर बना है। ये प्लेटें दुबर्लतामंडल ;।ेजीमदवेचीमतमद्ध पर एक दृढ़ इकाइर् के रूप में क्षैतिश अवस्था मंे चलायमान हैं। स्थलमंडल में पपर्टी एवं उफपरी मैंटल को सम्िमलित किया जाता है, जिसकी मोटाइर् महासागरों में 5 से 100 कि0मी0 और महाद्वीपीय भागों में लगभग 200 कि0मी0 है। एक प्लेट को महाद्वीपीय या महासागरीय प्लेट भी कहा जा सकता हैऋ जो इस बात पर निभर्र है कि उस प्लेट का अध्िकतर भाग महासागर अथवा महाद्वीप से संब( है। उदाहरणाथर् प्रशांत प्लेट मुख्यतः महासागरीय प्लेट है, जबकि यूरेश्िायन प्लेट को महाद्वीपीय प्लेट कहा जाता है। प्लेट विवतर्निकी के सि(ांत के अनुसार पृथ्वी का स्थलमंडल सात मुख्य प्लेटों व वुफछ छोटी प्लेटों में विभक्त है। नवीन वलित पवर्त श्रेण्िायाँ, खाइयाँ और भं्रश इन मुख्य प्लेटों को सीमांकित करते हैं। ;चित्रा 4.7द्ध चित्रा 4.5: संसार की प्रमुख बड़ी व छोटी प्लेट का वितरण प्रमुख प्लेट इस प्रकार हैं: ;पद्ध अंटावर्फटिक प्लेट ;जिसमें अंटावर्फटिक और इसको चारों ओर से घेरती हुइर् महासागरीय प्लेट भी शामिल हैद्ध ;पपद्ध उत्तर अमेरिकी प्लेट ;जिसमें पश्िचमी अटलांटिक तल सम्िमलित है तथा दक्ष्िाणी अमेरिकन प्लेट व वैफरेबियन द्वीप इसकी सीमा का निधर्रण करते हैंद्ध ;पपपद्ध दक्ष्िाण अमेरिकी प्लेट ;पश्िचमी अटलांटिक तल समेत और उत्तरी अमेरिकी प्लेट व वैफरेबियन द्वीप इसे पृथक करते हैंद्ध ;पअद्ध प्रशांत महासागरीय प्लेट। ;अद्ध इंडो - आस्ट्रेलियन - न्यूशीलैंड प्लेट। ;अपद्ध अप्रफीकी प्लेट ;जिसमें पूवीर् अटलांटिक तल शामिल हैद्ध और ;अपपद्ध यूरेश्िायाइर् प्लेट ;जिसमें पूवीर् अटलांटिक महासागरीय तल सम्िमलित हैद्ध वुफछ महत्वपूणर् छोटी प्लेटें निम्नलिख्िात हैं: ;पद्ध कोकोस ;ब्वबवंेद्ध प्लेट - यह प्लेट मध्यवतीर् अमेरिका और प्रशांत महासागरीय प्लेट के बीच स्िथत है। ;पपद्ध नशका प्लेट ;छं्रबं चसंजमद्ध - यह दक्ष्िाण अमेरिका व प्रशांत महासागरीय प्लेट के बीच स्िथत है। ;पपपद्ध अरेबियन प्लेट ;।तंइपंद चसंजमद्ध - इसमें अध्िकतर अरब प्रायद्वीप का भू - भाग सम्िमलित है। ;पअद्ध पिफलिपीन प्लेट ;च्ीपससपचचपदम चसंजमद्ध - यह एश्िाया महाद्वीप और प्रशांत महासागरीय प्लेट के बीच स्िथत है। ;अद्ध वैफरोलिन प्लेट ;ब्ंतवसपदम चसंजमद्ध - यह न्यू गिनी के उत्तर में पिफलिपियन व इंडियन प्लेट के बीच स्िथत है। ;अपद्ध फ्रयूजी प्लेट ;थ्नरप चसंजमद्ध - यह आस्ट्रेलिया के उत्तर - पूवर् मंे स्िथत है। ग्लोब पर ये प्लेटें पृथ्वी के पूरे इतिहास काल में लगातार विचरण कर रही हैं। वेगनर की संकल्पना कि केवल महाद्वीप गतिमान हैं, सही नहीं है। महाद्वीप एक प्लेट का हिस्सा है और प्लेट चलायमान हैं। यह एक निविर्वाद तथ्य है कि भूवैज्ञानिक इतिहास में सभी प्लेट गतिमान रही हैं और भविष्य में भी गतिमान रहेंगी। चित्रा 4.4 में विभ्िान्न कालों में महाद्वीपीय भागों की स्िथति को दशार्या गया है। वेगनर के अनुसार आरंभ में, सभी महाद्वीपों से मिलकर बना एक सुपर महाद्वीप ;ैनचमत बवदजपदमदजद्ध पैंजिया के रूप में विद्यमान था। यद्यपि बाद की खोजों ने यह स्पष्ट किया कि महाद्वीपीय पिंड, जो प्लेट के उफपर स्िथत हैं, भूवैज्ञानिक काल पयर्न्त चलायमान थे और पैंजिया अलग - अलग महाद्वीपीय खंडों के अभ्िासरण से बना था, जो कभी एक या किसी दूसरी प्लेट के हिस्से थे। पुराचुंबकीय ;च्ंसंमवउंहदमजपबद्ध आँकड़ों के आधर पर वैज्ञानिकों ने विभ्िान्न भूकालों में प्रत्येक महाद्वीपीय खंड की अवस्िथति निधर्रित की है। भारतीय उपमहाद्वीप ;अध्िकांशतः प्रायद्वीपीय भारतद्ध की अवस्िथति नागपुर क्षेत्रा में पाइर् जाने वाली चट्टðानों के विश्लेषण के आधर पर आँकी गइर् है। प्लेट संचरण के पफलस्वरूप तीन प्रकार की प्लेट सीमाएँ बनती हैं। अपसारी सीमा ;क्पअमतहमदज इवनदकंतपमेद्ध जब दो प्लेट एक दूसरे से विपरीत दिशा में अलग हटती हैं और नइर् पपर्टी का निमार्ण होता है। उन्हें अपसारी प्लेट कहते हैं। वह स्थान जहाँ से प्लेट एक दूसरे से दूर हटती हैं, इन्हें प्रसारी स्थान ;ैचतमंकपदह ेपजमद्ध भी कहा जाता है। अपसारी सीमा का सबसे अच्छा उदाहरण मध्य - अटलांटिक कटक है। यहाँ से अमेरिकी प्लेटें ;उत्तर अमेरिकी व दक्ष्िाण अमेरिकी प्लेटेंद्ध तथा यूरेश्िायन व अप्रफीकी प्लेटें अलग हो रही हैं। अभ्िासरण सीमा ;ब्वदअमतहमदज इवनदकंतपमेद्ध जब एक प्लेट दूसरी प्लेट के नीचे ध्ँसती है और जहाँ भूपपर्टी नष्ट होती है, वह अभ्िासरण सीमा है। वह स्थान जहाँ प्लेट ध्ँसती हैं, इसे प्रविष्ठन क्षेत्रा ;ैनइकनबजपवद ्रवदमद्ध भी कहते हैं। अभ्िासरण तीन प्रकार से हो सकता है - ;1द्ध महासागरीय व महाद्वीपीय प्लेट के बीच ;2द्ध दो महासागरीय प्लेटों के बीच ;3द्ध दो महाद्वीपीय प्लेटों के बीच। रूपांतर सीमा ;ज्तंदेवितउ इवनदकंतपमेद्ध जहाँ न तो नइर् पपर्टी का निमार्ण होता है और न ही पपर्टी का विनाश होता है, उन्हें रूपांतर सीमा कहते हैं। इसका कारण है कि इस सीमा पर प्लेटें एक दूसरे के साथ - साथ क्षैतिज दिशा में सरक जाती हैं। रूपांतर भं्रश ;ज्तंदेवितउ ंिनसजेद्ध दो प्लेट को अलग करने वाले तल हैं जो सामान्यतः मध्य - महासागरीय कटकों से लंबवत स्िथति में पाए जाते हैं। क्योंकि कटकों के शीषर् पर एक ही समय में सभी स्थानों पर ज्वालामुखी उद्गार नहीं होता, ऐसे में पृथ्वी के अक्ष से दूर प्लेट के हिस्से भ्िान्न प्रकार से गति करते हैं। इसके अतिरिक्त पृथ्वी के घूणर्न का भी प्लेट के अलग खंडों पर भ्िान्न प्रभाव पड़ता है। प्लेट प्रवाह की दर वैफसे निधर्रित होती है? प्लेट प्रवाह दरें ;त्ंजमे व िचसंजम उवअमउमदजद्ध सामान्य व उत्व्रफमण चुंबकीय क्षेत्रा की पिðयाँ जो मध्य - महासागरीय कटक के सामानांतर हैं, प्लेट प्रवाह की दर समझने में वैज्ञानिक के लिए सहायक सि( हुइर् हैं। प्रवाह की ये दरें बहुत भ्िान्न हैं। आवर्फटिक कटक की प्रवाह दर सबसे कम है ;2.5 सेंटीमीटर प्रति वषर् से भी कमद्ध। इर्स्टर द्वीप के निकट पूवीर् प्रशांत महासागरीय उभार, जो चिली से 3,400 कि0मी0 पश्िचम की ओर दक्ष्िाण प्रशांत महासागर में है, इसकी प्रवाह दर सवार्ध्िक है ;जो 5 से0मी0 प्रति वषर् से भी अध्िक हैद्ध। प्लेट को संचलित करने वाले बल ;थ्वतबमे वित जीम चसंजम उवअमउमदजद्ध जिस समय वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन सि(ांत प्रस्तुत किया था, उस समय अध्िकतर वैज्ञानिकों का विश्वास था कि पृथ्वी एक ठोस, गति रहित पिंड है। यद्यपि सागरीय अध्स्तल विस्तार और प्लेट विवतर्निक - दोनों सि(ांतों ने इस बात पर बल दिया कि पृथ्वी का ध्रातल व भूगभर् दोनों ही स्िथर न होकर गतिमान हैं। प्लेट विचरण करती है - यह आज एक अकाट्य तथ्य है। ऐसा माना जाता है कि दृढ़ प्लेट के नीचे चलायमान चट्टðानें वृत्ताकार रूप में चल रही हैं। उष्ण पदाथर् ध्रातल पर पहुँचता है, पैफलता है और ध्ीरे - ध्ीरे ठंडा होता हैऋ पिफर गहराइर् में जाकर नष्ट हो जाता है। यही चव्रफ बारंबार दोहराया जाता है और वैज्ञानिक इसे संवहन प्रवाह ;ब्वदअमबजपवद सिवूद्ध कहते हैं। पृथ्वी के भीतर ताप उत्पिा के दो माध्यम हैं - रेडियोध्मीर् तत्वों का क्षय और अवश्िाष्ट ताप। आथर्र चित्रा 4.6: भारतीय प्लेट का प्रवाह ;डवअमउमदज व िजीम प्दकपंद च्संजमद्ध होम्स ने सन् 1930 में इस विचार को प्रतिपादित किया। जिसने बाद में हैरी हेस की सागरीय तल विस्तार अवधरणा को प्रभावित किया। दृढ़ प्लेटों के नीचे दुबर्ल व उष्ण मैंटल है, जो प्लेट को प्रवाहित करता है। भारतीय प्लेट का संचलन ;डवअमउमदज व िजीम प्दकपंद च्संजमद्ध भारतीय प्लेट में प्रायद्वीप भारत और आस्ट्रेलिया महाद्वीपीय भाग सम्िमलित हैं। हिमालय पवर्त श्रेण्िायों के साथ - साथ पाया जाने वाला प्रविष्ठन क्षेत्रा ;ैनइकनबजपवद ्रवदमद्ध, इसकी उत्तरी सीमा निधर्रित करता है - जो महाद्वीपीय - महाद्वीपीय अभ्िासरण ;ब्वदजपदमदज.बवदजपदमदज अलग करता था। ऐसा माना जाता है कि लगभग 20 बवदअमतहमदबमद्ध के रूप में हैं। ;अथार्त् दो महाद्वीप करोड़ वषर् पहले, जब पैंजिया विभक्त हुआ तब भारत ने प्लेटों की सीमा हैद्ध यह पूवर् दिशा में म्याँमार के उत्तर दिशा की ओर ख्िासकना आरंभ किया। लगभग 4 राकिन्योमा पवर्त से होते हुए एक चाप के रूप में जावा से 5 करोड़ वषर् पहले भारत एश्िाया से टकराया व परिणामस्वरूप हिमालय पवर्त का उत्थान हुआ। 7.1खाइर् तक पैफला हुआ है। इसकी पूवीर् सीमा एक विस्तारित करोड़ वषर् पहले से आज तक की भारत की स्िथतितल ;ैचतमंकपदह ेपजमद्ध है, जो आस्ट्रेलिया के पूवर् में मानचित्रा 4.6 मंे दिखाइर् गइर् है। आरेख 4.6 भारतीयदक्ष्िाणी पश्िचमी प्रशांत महासागर में महासागरीय कटक उपमहाद्वीप व यूरेश्िायन प्लेट की स्िथति भी दशार्ता है।के रूप में है। इसकी पश्िचमी सीमा पाकिस्तान की आज से लगभग 14 करोड़ वषर् पहले यह उपमहाद्वीपकिरथर श्रेण्िायों का अनुसरण करती है। यह आगे मकरान सुदूर दक्ष्िाण मंे 500 दक्ष्िाणी अक्षांश पर स्िथत था। इन दोतट के साथ - साथ होती हुइर् दक्ष्िाण - पूवीर् चागोस द्वीप प्रमुख प्लेटों को टेथ्िास सागर अलग करता था औरसमूह ;ब्ींहवे ंतबीपचमसंहवद्ध के साथ - साथ लाल तिब्बतीय खंड, एश्िायाइर् स्थलखंड के करीब था। भारतीयसागर द्रोणी ;जो विस्तारण तल हैद्ध में जा मिलती है। प्लेट के एश्िायाइर् प्लेट की तरपफ प्रवाह के दौरान एकभारतीय तथा आवर्फटिक प्लेट की सीमा भी महासागरीय प्रमुख घटना घटी - वह थी लावा प्रवाह से दक्कन ट्रेप काकटक से निधर्रित होती है ;जो एक अपसारी सीमा निमार्ण होना। ऐसा लगभग 6 करोड़ वषर् पहले आरंभ ;क्पअमतहमदज इवनदकंतलद्ध है।द्ध और यह लगभग हुआ और एक लंबे समय तक यह जारी रहा। याद रहे पूवर् - पश्िचम दिशा में होती हुइर् न्यूजीलैंड के दक्ष्िाण में कि यह उपमहाद्वीप तब भी भूमध्यरेखा के निकट था। विस्तारित तल में मिल जाती है। लगभग 4 करोड़ वषर् पहले और इसके पश्चात् हिमालय भारत एक वृहत् द्वीप था, जो आस्ट्रेलियाइर् तट से दूर की उत्पिा आरम्भ हुइर्। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह एक विशाल महासागर में स्िथत था। लगभग 22.5 करोड़ प्रवि्रफया अभी भी जारी है और हिमालय की उफँचाइर् अब वषर् पहले तक टेथीस सागर इसे एश्िाया महाद्वीप से भी बढ़ रही है। अभ्यास 1. बहुवैकल्िपक प्रश्न: ;पद्ध निम्न में से किसने सवर्प्रथम यूरोप, अप्रफीका व अमेरिका के साथ स्िथत होने की संभावना व्यक्त की? ;कद्ध अल्प्रेफड वेगनर ;खद्ध अब्राहम आरटेलियस ;गद्ध एनटोनियो पेलेगि्रनी ;घद्ध एडमंड हैस ;पपद्ध पोलर फ्रलीइंग बल ;च्वसंत सिममपदह वितबमद्ध निम्नलिख्िात में से किससे संबंध्ित है? ;कद्ध पृथ्वी का परिव्रफमण ;खद्ध पृथ्वी का घूणर्न ;गद्ध गुरुत्वाकषर्ण ;घद्ध ज्वारीय बल ;पपपद्ध इनमें से कौन सी लघु ;डपदवतद्ध प्लेट नहीं है? ;कद्ध नजका ;खद्ध पिफलिपीन ;गद्ध अरब ;घद्ध अंटावर्फटिक ;पअद्ध सागरीय अध्स्तल विस्तार सि(ांत की व्याख्या करते हुए हेस ने निम्न में से किस अवधरणा पर विचार नहीं किया? ;कद्ध मध्य - महासागरीय कटकों के साथ ज्वालामुखी वि्रफयाएँ। ;खद्ध महासागरीय नितल की चट्टðानों में सामान्य व उत्व्रफमण चुंबकत्व क्षेत्रा की पिðयों का होना। ;गद्ध विभ्िान्न महाद्वीपों में जीवाश्मों का वितरण। ;घद्ध महासागरीय तल की चट्टðानों की आयु। ;अद्ध हिमालय पवर्तों के साथ भारतीय प्लेट की सीमा किस तरह की प्लेट सीमा है? ;कद्ध महासागरीय - महाद्वीपीय अभ्िासरण ;खद्ध अपसारी सीमा ;गद्ध रूपांतर सीमा ;घद्ध महाद्वीपीय - महाद्वीपीय अभ्िासरण। 2.निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए: ;पद्ध महाद्वीपों के प्रवाह के लिए वेगनर ने निम्नलिख्िात में से किन बलों का उल्लेख किया? ;पपद्ध मैंटल में संवहन धराओं के आरंभ होने और बने रहने के क्या कारण हैं? ;पपपद्ध प्लेट की रूपांतर सीमा, अभ्िासरण सीमा और अपसारी सीमा में मुख्य अंतर क्या है? ;पअद्ध दक्कन ट्रेप के निमार्ण के दौरान भारतीय स्थलखंड की स्िथति क्या थी? 3.निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए: ;पद्ध महाद्वीपीय विस्थापन सि(ांत के पक्ष में दिए गए प्रमाणों का वणर्न करें। ;पपद्ध महाद्वीपीय विस्थापन सि(ांत व प्लेट विवतर्निक सि(ांत में मूलभूत अंतर बताइए। ;पपपद्ध महाद्वीपीय प्रवाह सि(ांत के उपरांत की प्रमुख खोज क्या है, जिससे वैज्ञानिकों ने महासागर व महाद्वीपीय वितरण के अध्ययन में पुनः रुचि ली? परियोजना कायर् भूवंफप के कारण हुइर् क्षति से संबंध्ित एक कोलाज बनाइए।

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