पृथ्वी की आंतरिक संरचना पृथ्वी की प्रकृति के बारे में आप किस प्रकार का अनुमान लगाते हैं? क्या आपके अनुमान के अनुसार पृथ्वी िकेट की गेंद की तरह एक ठोस गेंद है, या यह एक खोखली गेंद है, जिसपर चट्टðानों की मोटी परत स्थलमंडल है। क्या आपने कभी टेलीविजन पर ज्वालामुखी उद्गार दिखाते हुए चित्रों को देखा है? क्या आपको ज्वालामुखी से निकलते हुए गमर् लावा, मिट्टðी, ध्ुआँ, आग तथा मैग्मा याद है? पृथ्वी के आंतरिक भाग को अप्रत्यक्ष प्रमाणों के आधर पर समझा जा सकता है, क्योंकि पृथ्वी के आंतरिक भाग में न तो कोइर् पहुँच सका है और न पहुँच सकता है। पृथ्वी के ध्रातल का विन्यास मुख्यतः भूगभर् में होने वाली प्रियाओं का परिणाम है। बहिजार्त व अंतजार्त प्रियाएँ लगातार भूदृश्य को आकार देती रहती हैं। अंतजार्त प्रियाओं के प्रभाव को अनदेखा कर किसी भी क्षेत्रा की भूआकृति की प्रकृति को समझना अध्ूरा होगा। ;अथार्त् किसी भी प्रदेश की भूआकृति को समझने के लिए भूगभ्िार्क ियाओं के प्रभाव को जानना आवश्यक है।द्ध मानव जीवन मुख्यतः अपनी क्षेत्राीय भूआकृति से प्रभावित होता है। इसलिए भूदृश्य के विकास को प्रभावित करने वाले सभी कारकों के विषय में जानना आवश्यक है। यह समझने के लिए कि पृथ्वी में वंफपन क्यों होता है, या सुनामी लहरें कैसे पैदा होती हैं, यह शरूरी है कि हमें पृथ्वी की आंतरिक संरचना का विस्तृत ज्ञान हो। पिछले अध्याय में आपने पढ़ा कि पृथ्वी का निमार्ण करने वाली, भू - पपर्टी ;ब्तनेजद्ध से क्रोड ;ब्वतमद्ध तक सभी पदाथर् परतों के रूप में विभाजित हैं। यह जानना भी अत्यंत अध्याय रोचक है कि वैज्ञानिकों ने कैसे इन परतों के संबंध् में जानकारी प्राप्त की और प्रत्येक परत की विशेषताओं के बारे में अनुमान लगाया। यह अध्याय इसी विषय से संबंध्ित है। भूगभर् की जानकारी के साध्न पृथ्वी की त्रिाज्या 6ए370 कि0मी0 है। पृथ्वी की आंतरिक परिस्िथतियों के कारण यह संभव नहीं है कि कोइर् पृथ्वी के वेंफद्र तक पहुँचकर उसका निरीक्षण कर सके या वहाँ के पदाथर् का वुफछ नमूना प्राप्त कर सके। यह आश्चयर् की बात है कि ऐसी परिस्िथतियों में भी वैज्ञानिक हमें यह बताने में सक्षम हुए कि भूगमर् की संरचना कैसी है और इतनी गहराइर् पर किस प्रकार के पदाथर् पाए जाते हैं? पृथ्वी की आंतरिक संरचना के विषय में हमारी अध्िकतर जानकारी परोक्ष रूप से प्राप्त अनुमानों पर आधरित है। तथापि इस जानकारी का वुफछ भाग प्रत्यक्ष प्रेक्षणों और पदाथर् के विश्लेषण पर भी आधरित है। प्रत्यक्ष ड्डोत पृथ्वी से सबसे आसानी से उपलब्ध् ठोस पदाथर् ध्रातलीय चट्टðानें हैं, अथवा वे चट्टðानें है, जो हम खनन क्षेत्रों से प्राप्त करते हंै। दक्ष्िाणी अÚीका की सोने की खानें 3 से 4 कि0मी0 तक गहरी हैं। इससे अध्िक गहराइर् में जा पाना असंभव है, क्योंकि उतनी गहराइर् पर तापमान बहुत अध्िक होता है। खनन के अतिरिक्त वैज्ञानिक, विभ्िान्न परियोजनाओं के अंतगर्त पृथ्वी की आतरिक स्िथति को जानने के लिए पपर्टी में गहराइर् तक छानबीन कर रहे हंै। संसार भर के वैज्ञानिक दो मुख्य परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं। ये हैं गहरे समुद्र में प्रवेध्न परियोजना ;क्ममच वबमंद कतपससपदह चतवरमबजद्ध व समन्िवत महासागरीय प्रवेध्न परियोजना ;प्दजमहतंजमक वबमंद कतपससपदह चतवरमबजद्ध। आज तक सबसे गहरा प्रवेध्न ;क्तपससद्ध आकर्टिक महासागर में कोला ;ज्ञवसंद्ध क्षेत्रा में 12 कि0मी0 की गहराइर् तक किया गया है। इन परियोजनाओं तथा बहुत सी अन्य गहरी खुदाइर् परियोजनाओं के अंतगर्त, विभ्िान्न गहराइर् से प्राप्त पदाथोर्ं के विश्लेषण से हमें पृथ्वी की आंतरिक संरचना से संबंध्ित असाधरण जानकारी प्राप्त हुइर् है। ज्वालामुखी उद्गार प्रत्यक्ष जानकारी का एक अन्य ड्डोत है। जब कभी भी ज्वालामुखी उद्गार से लावा पृथ्वी के ध्रातल पर आता है, यह प्रयोगशाला अन्वेषण के लिए उपलब्ध् होता है। यद्यपि इस बात का निश्चय कर पाना कठिन होता है कि यह मैग्मा कितनी गहराइर् से निकला है। अप्रत्यक्ष ड्डोत पदाथर् के गुणध्मर् के विश्लेषण से पृथ्वी के आंतरिक भाग की अप्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त होती है। खनन वि्रफया से हमें पता चलता है कि पृथ्वी के ध्रातल में गहराइर् बढ़ने के साथ - साथ तापमान एवं दबाव में वृि होती है। इतना ही नहीं, हमें यह भी पता चलता है कि गहराइर् बढ़ने के साथ - साथ पदाथर् का घनत्व भी बढ़ता है। तापमान, दबाव व घनत्व में इस परिवतर्न की दर को आँका जा सकता है। पृथ्वी की वुफल मोटाइर् को ध्यान में रखते हुए, वैज्ञानिकों ने विभ्िान्न गहराइयों पर पदाथर् के तापमान, दबाव एवं घनत्व के मान को अनुमानित किया है। प्रत्येक परत के संदभर् में इन लक्षणों का सविस्तार वणर्न इसी अध्याय में आगे किया गया है। पृथ्वी की आंतरिक जानकारी का दूसरा अप्रत्यक्ष ड्डोत उल्काएँ हैं, जो कभी - कभी ध्रती तक पहुँचती हैं। हाँलाकि, हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उल्काओं के विश्लेषण के लिए उपलब्ध् पदाथर् पृथ्वी के आंतरिक भाग से प्राप्त नहीं होते हैं। परंतु उल्काओं से प्राप्त पदाथर् और उनकी संरचना पृथ्वी से मिलती - जुलती है। ये ;उल्काएँद्ध वैसे ही पदाथर् के बने ठोस पिंड हैं, जिनसे हमारा ग्रह ;पृथ्वीद्ध बना है। अतः पृथ्वी की आंतरिक जानकारी के लिए उल्काओं का अध्ययन एक अन्य महत्वपूणर् ड्डोत है। भौतिक भूगोल के मूल सि(ांत अन्य अप्रत्यक्ष स्रोतों में गुरुत्वाकषर्ण, चुंबकीय क्षेत्रा, व भूवंफप संबंध्ी ियाएँ शामिल हंै। पृथ्वी के ध्रातल पर भी विभ्िान्न अक्षांशों पर गुरुत्वाकषर्ण बल एक समान नहीं होता है। यह ;गुरुत्वाकषर्ण बलद्ध ध््रुवों पर अध्िक एवं भूमध्यरेखा पर कम होता है। पृथ्वी के वेंफद्र से दूरी के कारण गुरुत्वाकषर्ण बल ध््रुवों पर अध्िक और भूमध्यरेखा पर कम होता है। गुरुत्व का मान पदाथर् के द्रव्यमान के अनुसार भी बदलता है। पृथ्वी के भीतर पदाथोर्ं का असमान वितरण भी इस भ्िान्नता को प्रभावित करता है। अलग - अलग स्थानों पर गुरुत्वाकषर्ण की भ्िान्नता अनेक अन्य कारकों से भी प्रभावित होती है। इस भ्िान्नता को गुरुत्व विसंगति ;ळतंअपजल ंदवउंसलद्ध कहा जाता है। गुरुत्व विसंगति हमें भूपपर्टी में पदाथर् के द्रव्यमान के वितरण की जानकारी देती है। चुंबकीय सवेर्क्षण भी भूपपर्टी में चुंबकीय पदाथर् के वितरण की जानकारी देते हंै। भूवंफपीय गतिविध्ियाँ भी पृथ्वी की आंतरिक जानकारी का एक महत्वपूणर् ड्डोत है। अतः हम वुफछ विस्तार से इस पर चचार् करंेगे। भूवंफप भूवंफपीय तरंगों का अध्ययन, पृथ्वी की आंतरिक परतों का संपूणर् चित्रा प्रस्तुत करता है। साधरण भाषा में भूवंफप का अथर् है - पृथ्वी का वंफपन। यह एक प्राकृतिक घटना है। उफजार् के निकलने के कारण तरंगें उत्पन्न होती हैं, जो सभी दिशाओं में पैफलकर भूवंफप लाती हैं। पृथ्वी में वंफपन क्यों होता है? प्रायः भ्रंश के किनारे - किनारे ही ऊजार् निकलती है। भूपपर्टी की शैलों में गहन दरारें ही भं्रश होती हैं। भ्रंश के दोनों तरपफ शैलें विपरीत दिशा में गति करती हंै। जहाँ उफपर के शैलखंड दबाव डालते हैं, उनके आपस का घषर्ण उन्हें परस्पर बाँध्े रहता है। पिफर भी, अलग होने की प्रवृिा के कारण एक समय पर घषर्ण का प्रभाव कम हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप शैलखंड विकृत होकर अचानक एक दूसरे के विपरीत दिशा में सरक जाते हंै। इसके परिणामस्वरूप ऊजार् निकलती है और ऊजार् तरंगें सभी दिशाओं में गतिमान होती हैं। वह स्थान जहाँ से ऊजार् निकलती है, भूवंफप का उद्गम केन्द्र ;थ्वबनेद्ध कहलाता है। इसे अववेंफद्र ;भ्लचवबमदजतमद्ध भी कहा जाता है। ऊजार् तंरगें अलग - अलग दिशाओं में चलती हुइर् पृथ्वी की सतह तक पहुँचती हैं। भूतल पर वह बिंदु जो उद्गम वेंफद्र के समीपतम होता है, अध्िवेंफद्र ;म्चपबमदजतमद्ध कहलाता है। अध्िवेंफद्र पर ही सबसे पहले तंरगों को महसूस किया जाता है। अध्िवेंफद्र उद्गम वेंफद्र के ठीक ऊपर ;90॰ के कोण परद्ध होता है। भूवंफपीय तरंगें ;म्ंतजीुनंाम ूंअमेद्ध सभी प्राकृतिक भूवंफप स्थलमंडल ;स्पजीवेचीमतमद्ध में ही आते हैं। इसी अध्याय में आगे आप पृथ्वी की विभ्िान्न परतों के बारे में पढ़ेंगे। अभी इतना समझ लेना पयार्प्त है कि स्थलमंडल पृथ्वी के ध्रातल से 200 कि0मी0 तक की गहराइर् वाले भाग को कहते हैं। भूवंफपमापी यंत्रा ;ैमपेउवहतंचीद्ध सतह पर पहुँचने वाली भूवंफपतरंगों को अभ्िालेख्िात करता हैं। चित्रा 3.1 भूवंफपीय तंरगों का अभ्िालेखीय वक्र ;ब्नतअमद्ध दिखाता है। यह वक्र तीन अलग बनावट वाली तरंगों को प्रदश्िार्त करता है। बुनियादी तौर पर भूवंफपीय तरंगें दो प्रकार की हंै - भूगभ्िार्क तरंगें ;ठवकल ूंअमेद्ध व ध्रातलीय तरंगें ;ैनतंिबम ूंअमेद्ध। भूगभ्िार्क तरंगें उद्गम वेंफद्र से ऊजार् के मुक्त होने के दौरान पैदा होती हैं और पृथ्वी के अंदरूनी भाग से होकर सभी दिशाओं में आगे बढ़ती हैं। इसलिए इन्हें भूगभ्िार्क तरंगंे कहा जाता है। भूगभ्िार्क तरंगों एवं ध्रातलीय शैलों के मध्य अन्योन्य िया के कारण नइर् तरंगें उत्पन्न होती हैं जिन्हें ध्रातलीय तरंगें कहा जाता है। ये तरंगें ध्रातल के साथ - साथ चलती हैं। तंरगों का वेग अलग - अलग घनत्व वाले पदाथोर्ं से गुजरने पर परिवतिर्त हो जाता है। अध्िक घनत्व वाले पदाथोर्ं में तरंगों का वेग अध्िक होता है। पदाथो± के घनत्व में भ्िान्नताएँ होने के कारण परावतर्न ;त्मसिमबजपवदद्ध एवं आवतर्न ;त्मतिंबजपवदद्ध होता है, जिससे इन तरंगों की दिशा भी बदलती है। भूगभीर्य तरंगंे भी दो प्रकार की होती हैं। इन्हें ‘च्’ तरंगें व ‘ै’ तरंगें कहा जाता है। ‘च्’ तरंगें तीव्र गति से चलने वाली तरंगें हैं और ध्रातल पर सबसे पहले पहॅुँचती हैं। इन्हें ‘प्राथमिक तरंगें’ भी कहा जाता है। ‘च्’ तरंगें ध्वनि तरंगों जैसी होती हंै। ये गैस, तरल व ठोस - तीनों प्रकार के पदाथोर्ं से गुजर सकती हैं। ‘ै’ तरंगें ध्रातल पर वुफछ समय अंतराल के बाद पहुँचती हैं। ये ‘द्वितीयक तरंगें’ कहलाती हैं। ‘ै’ तरंगांे के विषय में एक महत्वपूणर् तथ्य यह है कि ये केवल ठोस पदाथोर्ं के ही माध्यम से चलती हैं। ‘ै’ तरंगों की यह एक महत्वपूणर् विशेषता है। इसी विशेषता ने वैज्ञानिकों को भूगभीर्य संरचना समझने में मदद की। परावतर्न ;त्मसिमबजपवदद्ध से तरंगें प्रतिध्वनित होकर वापस लौट आती हंै, जबकि आवतर्न ;त्मतिमबजपवदद्ध से तरंगें कइर् दिशाओं में चलती हैं। भूवंफपलेखी पर बने आरेख से तरंगों की दिशा - भ्िान्नता का अनुमान लगाया जाता है। ध्रातलीय तरंगें भूवंफपलेखी पर अंत में अभ्िालेख्िात होती हंै। ये तरंगें ज्यादा विनाशकारी होती हैं। इनसे शैल विस्थापित होती हैं और इमारतंे गिर जाती हंै। भूवंफपीय तरंगों का संचरण भ्िान्न - भ्िान्न प्रकार की भूवंफपीय तरंगों के संचरित होने की प्रणाली भ्िान्न - भ्िान्न होती है। जैसे ही ये संचरित होती हैं तो शैलों में वंफपन पैदा होती है। ‘च्’ तरंगों से वंफपन की दिशा तरंगों की दिशा के समानांतर ही होती है। यह संचरण गति की दिशा में ही पदाथर् पर दबाव डालती है। इसके ;दबावद्ध के पफलस्वरूप पदाथर् के घनत्व में भ्िान्नता आती है और शैलों में संवुफचन व पफैलाव की प्रिया पैदा होती है। अन्य तीन तरह की तरंगंे संचरण गति के समकोण दिशा में वंफपन पैदा करती हैं। ‘ै’ तरंगें उफध्वार्ध्र तल में, तरंगों की दिशा के समकोण पर वंफपन पैदा करती हंै। अतः ये जिस पदाथर् से गुजरती हैं उसमें उभार व गतर् बनाती हैं। ध्रातलीय तरंगें सबसे अध्िक विनाशकारी समझी जाती हैं। छाया क्षेत्रा का उद्भव भूवंफपलेखी यंत्रा ;ैमपेउवहतंचीद्ध पर दूरस्थ स्थानों से आने वाली भूवंफपीय तरंगें अभ्िालेख्िात होती हैं। यद्यपि वुफछ ऐसे क्षेत्रा भी हंै जहाँ कोइर् भी भूवंफपीय तरंग अभ्िालेख्िात नहीं होती। ऐसे क्षेत्रा को भूवंफपीय छाया क्षेत्रा ;ैींकवू ्रवदमद्ध कहा जाता है। विभ्िान्न भूवंफपीय घटनाओं के अध्ययन से पता चलता है कि एक भूवंफप का छाया क्षेत्रा दूसरे भूवंफप के छाया क्षेत्रा से सवर्था भ्िान्न होता है। चित्रा 3.2 अ और ब में ‘च्’ व ‘ै’ तरंगों का छाया क्षेत्रा प्रदश्िार्त किया गया है। यह देखा जाता है कि भूवंफपलेखी भूवंफप अध्िवेंफद्र से 105° के भीतर किसी भी दूरी पर ‘च्’ व ‘ै’ दोनों ही तरंगों का अभ्िालेखन करते हैं। भूवंफपलेखी, अध्िवेंफद्र से 145° से परे केवल भौतिक भूगोल के मूल सि(ांत ‘च्’ तरंगों के पहुँचने को ही दजर् करते हैं और ‘ै’ तरंगों को अभ्िालेख्िात नहीं करते। अतः वैज्ञानिकों का मानना है कि भूवंफप अध्िवेंफद्र से 105° और 145° के बीच का क्षेत्रा ;जहाँ कोइर् भी भूवंफपीय तरंग अभ्िालेख्िात नहीं होतीद्ध दोनों प्रकार की तरगों के लिए छाया क्षेत्रा ;ैींकवू ्रवदमद्ध हैं। 105° के परे पूरे क्षेत्रा में ‘ै’ तरंगें नहीं पहुँचतीं। ‘ै’ तरंगों का छाया क्षेत्रा ‘च्’ तरंगों के छाया क्षेत्रा से अध्िक विस्तृत है। भूवंफप अध्िवेंफद्र के 105° से 145° तक ‘च्’ तरंगों का छाया क्षेत्रा एक पट्टðी ;ठंदकद्ध के रूप में पृथ्वी के चारों तरपफ प्रतीत होता है। ‘ै’ तरंगों का छाया क्षेत्रा न केवल विस्तार में बड़ा है, वरन् यह पृथ्वी के 40 प्रतिशत भाग से भी अध्िक है। अगर आपको भूवंफप अध्िवेंफद्र का पता हो तो आप किसी भी भूवंफप का छाया क्षेत्रा रेखांकित कर सकते हैं। ;किसी भूवंफप अध्िवेंफद्र को जानने का विवरण बाॅक्स में पृष्ठ 28 में दिया गया है।द्ध भूवंफप प्रकार ;पद्ध सामान्यतः विवतर्निक ;ज्मबजवदपबद्ध भूवंफप ही अध्िक आते हैं। ये भूवंफप भ्रंशतल के किनारे चट्टðानों के सरक जाने के कारण उत्पन्न होते हैं। ;पपद्ध एक विश्िाष्ट वगर् के विवतर्निक भूवंफप को ही ज्वालामुखीजन्य ;टवसबंदपबद्ध भूवंफप समझा जाता है। ये भूवंफप अध्िकांशतः सिय ज्वालामुखी क्षेत्रों तक ही सीमित रहते हैं। ;पपपद्ध खनन क्षेत्रों में कभी - कभी अत्यध्िक खनन कायर् से भूमिगत खानों की छत ढह जाती है, जिससे हल्के झटके महसूस किए जाते हैं। इन्हें नियात ;ब्वससंचेमद्ध भूवंफप कहा जाता है। ;पअद्ध कभी - कभी परमाणु व रासायनिक विस्पफोट से भी भूमि में वंफपन होती है। इस तरह के झटकों को विस्पफोट ;म्गचसवेपवदद्ध भूवंफप कहते हैं। ;अद्ध जो भूवंफप बड़े बाँघ वाले क्षेत्रों में आते हैं, उन्हें बाँध् जनित ;त्मेमतअवपत पदकनबमकद्ध भूवंफप कहा जाता है। भूवंफपों की माप भूवंफपीय घटनाओं का मापन भूवंफपीय तीव्रता के आधर पर अथवा आघात की तीव्रता के आधर पर किया जाता है। भूवंफपीय तीव्रता की मापनी ‘रिक्टर स्केल’ ;त्पबीजमत ेबंसमद्ध के नाम से जानी जाती है। भूवंफपीय तीव्रता भूवंफप के दौरान ऊजार् मुक्त होने से संबंध्ित है। इस मापनी के अनुसार भूवंफप की तीव्रता 0 से 10 तक होती है। आघात की तीव्रता/गहनता ;प्दजमदेपजल ेबंसमद्ध को इटली के भूवंफप वैज्ञानिक मरवैफली ;डमतबंससपद्ध के नाम पर जाना जाता है। यह झटकों से हुइर् प्रत्यक्ष हानि द्वारा निधर्रित की जाती है। इसकी गहनता 1 से 12 तक होती है। भूवंफप के प्रभाव भूवंफप एक प्राकृतिक आपदा है। भूवंफपीय आपदा से होने वाले प्रकोप निम्न हैं ;पद्ध भूमि का हिलना ;पपद्ध ध्रातलीय विसंगति ;पपपद्ध भू - स्खलन/पंकस्खलन ;पअद्ध मृदा द्रवण ;ैवपस सपुनमंिबजपवदद्ध ;अद्ध ध्रातल का एक तरपफ झुकना ;अपद्ध हिमस्खलन ;अपपद्ध ध्रातलीय विस्थापन ;अपपपद्ध बाँघ व तटबंघ के टूटने से बाढ़ ;पगद्ध आग लगना ;गद्ध इमारतों का टूटना तथा ढाँचों का ध्वस्त होना ;गपद्ध वस्तुओं का गिरना ;गपपद्ध सुनामी। भौतिक भूगोल के मूल सि(ांत उपरोक्त सूचीब( प्रभावों में से पहले छः का प्रभाव स्थलरूपों पर देखा जा सकता है जबकि अन्य को उस क्षेत्रा में होने वाले जन व ध्न की हानि से समझा जा सकता है। ‘सुनामी’ का प्रभाव तभी पड़ेगा जब भूवंफप का अध्िवेंफद्र समुद्री अध्स्तल पर हो और भूवंफप की तीव्रता बहुत अध्िक हो। ‘सुनामी’ अपने आप में भूवंफप नहीं है, ये वास्तव में लहरें हैं जो भूवंफपीय तरंगों से उत्पन्न होती हैं। यद्यपि मूल रूप से वंफपन की िया वुफछ सेवेंफड ही रहती है, पिफर भी यदि भूवंफप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 5 से अध्िक है तो इसके परिणाम अत्यध्िक विनाशकारी होते हैं। भूवंफप की आवृिा भूवंफप एक प्राकृतिक आपदा है। तीव्र भूवंफप के झटकों से जन व ध्न की अध्िक हानि होती है। पिफर भी ऐसा नहीं है कि विश्व के सभी भागों में तीव्र भूवंफप ही आते हैं। केवल वही क्षेत्रा जो भ्रंश के समीप हैं, ऐसे तीव्र झटके महसूस करते हंै। हम ज्वालामुखी व भूवंफप के वितरण का वणर्न अगले अध्याय में पढ़ेंगे। प्रायः यह देखा गया है कि रिक्टर स्केल पर 8 से अध्िक तीव्रता वाले भूवंफप के आने की संभावना बहुत ही कम होती है जो 1 - 2 वषो± में एक ही बार आते हैं। जबकि हल्के भूवंफप लगभग हर मिनट पृथ्वी के किसी न किसी भाग में महसूस किए जाते हैं। पृथ्वी की संरचना भूपपर्टी ;ज्ीम ब्तनेजद्ध यह ठोस पृथ्वी का सबसे बाहरी भाग है। यह बहुत भंगुर ;ठतपजजसमद्ध भाग है जिसमें जल्दी टूट जाने की प्रवृिा पाइर् जाती है। भूपपर्टी की मोटाइर् महाद्वीपों व महासागरों के नीचे अलग - अलग है। महासागरों में भूपपर्टी की मोटाइर् महाद्वीपों की तुलना में कम है। महासागरों के नीचे इसकी औसत मोटाइर् 5 कि0 मी0 है, जबकि महाद्वीपों के नीचे यह 30 कि0 मी0 तक है। मुख्य पवर्तीय शृंखलाओं के क्षेत्रा में यह मोटाइर् और भी अध्िक है। हिमालय पवर्त श्रेण्िायों के नीचे भूपपर्टी की मोटाइर् लगभग 70 कि0मी0 तक है। भूपपर्टी भारी चट्टðानों से बना है और इसका घनत्व 3 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर है। महासागरों के नीचे भूपपर्टी की चट्टðानें बेसाल्ट निमिर्त हैं। महासागरों के नीचे इनका घनत्व 2.7 ग्राम प्रति घन से0मी0 है। चित्रा 3.3: पृथ्वी का आंतरिक भाग मैंटल ;ज्ीम डंदजसमद्ध भूगभर् में पपर्टी के नीचे का भाग मैंटल कहलाता है। यह मोहो असांतत्य ;क्पेबवदजपदनपजलद्ध से आरंभ होकर 2ए900 कि0 मी0 की गहराइर् तक पाया जाता है। मैंटल का ऊपरी भाग दुबर्लतामंडल ;।ेजीमदवेचीमतमद्ध कहा जाता है। ‘एस्थेनो’ ;।ेजीमदवद्ध शब्द का अथर् दुबर्लता से है। इसका विस्तार 400 कि0मी0 तक आँका गया है। ज्वालामुखी उद्गार के दौरान जो लावा ध्रातल पर पहुँचता है, उसका मुख्य ड्डोत यही है। इसका घनत्व भूपपर्टी की चट्टðानों से अध्िक है। ;अथार्त् 3.4 ग्राम प्रति घन से0मी0 से अिाक है।द्ध भूपपर्टी एवं मैंटल का ऊपरी भाग मिलकर स्थलमंडल ;स्पजीवेचीमतमद्ध कहलाते हैं। इसकी मोटाइर् 10 से 200 कि0 मी0 के बीच पाइर् जाती है। निचले मैंटल का विस्तार दुबर्लतामंडल के समाप्त हो जाने के बाद तक है। यह ठोस अवस्था में है। क्रोड ;ज्ीम ब्वतमद्ध जैसा कि पहले ही इंगित किया जा चुका है कि भूवंफपीय तरंगों के वेग ने पृथ्वी के क्रोड को समझने में सहायता की है। क्रोड व मैंटल की सीमा 2ए900 कि0मी0 की गहराइर् पर है। बा“य क्रोड ;व्नजमत बवतमद्ध तरल अवस्था में है जबकि आंतरिक क्रोड ;प्ददमत बवतमद्ध ठोस अवस्था में है। मैंटल व क्रोड की सीमा पर चट्टðानों का घनत्व लगभग 5 ग्राम प्रति घन से0 मी0 तथा वेंफद्र में 6ए300 कि0मी0 की गहराइर् तक घनत्व लगभग 13 ग्राम प्रति घन से0मी0 तक हो जाता है। इससे यह पता चलता है कि क्रोड भारी पदाथोर्ं मुख्यतः निकिल ;छपबासमद्ध व लोहे ;थ्मततनउद्ध का बना है। इसे ‘निपेफ’ ;छपमिद्ध परत के नाम से भी जाना जाता है। ज्वालामुखी व ज्वालामुखी निमिर्त स्थलरूप आपने अनेक बार ज्वालामुखी के चित्रा देखे होंगे। ज्वालामुखी वह स्थान है जहाँ से निकलकर गैसंे, राख और तरल चट्टðानी पदाथर्, लावा पृथ्वी के ध्रातल तक पहुँचता है। यदि यह पदाथर् वुफछ समय पहले ही बाहर आया हो या अभी निकल रहा हो तो वह ज्वालामुखी सिय ज्वालामुखी कहलाता है। तरल चट्टðानी पदाथर् दुबर्लता मण्डल से निकल कर ध्रातल पर पहुँचता है। जब तक यह पदाथर् मैंटल के ऊपरी भाग में है, यह मैग्मा कहलाता है। जब यह भूपटल के ऊपर या ध्रातल पर पहुँचता है तो लावा कहा जाता है। वह पदाथर् जो ध्रातल पर पहुँचता है, उसमें लावा प्रवाह, लावा के जमे हुए टुकड़ांे का मलवा ;ज्वलखण्डाश्िमद्ध, ;च्लतवबसंेजपब कमइतपेद्ध ज्वालामुखी बम, राख, धूलकण व गैसें जैसे - नाइट्रोजन यौगिक, सल्पफर यौगिक और वुफछ मात्रा में क्लोरीन, हाइड्रोजन व आगर्न शामिल होते हैं। ज्वालामुखी उद्गार की प्रवृिा और ध्रातल पर विकसित आकृतियों के आधर पर ज्वालामुख्िायों को वगीर्कृत किया जाता है। वुफछ मुख्य ज्वालामुखी निम्न प्रकार से हंैः शील्ड ज्वालामुखी ;ैीपमसक अवसबंदवमेद्ध बेसाल्ट प्रवाह को छोड़कर, पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी ज्वालामुख्िायों में शील्ड ज्वालामुखी सबसे विशाल है। हवाइर् द्वीप के ज्वालामुखी इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं। ये ज्वालामुखी मुख्यतः बेसाल्ट से निमिर्त सिंडर शंवुफ होते हैं जो तरल लावा के ठंडे होने से बनते हैं। यह लावा उद्गार के समय बहुत तरल होता है। इसी कारण इन ज्वालामुख्िायों का ढाल तीव्र नहीं होता। यदि किसी तरह निकास नालिका ;टमदजद्ध से पानी भीतर चला जाए तो ये ज्वालामुखी विस्पफोटक भी हो जाते हंै। अन्यथा कम विस्पफोटक होना ही इनकी विशेषता है। इन ज्वालामुख्िायों से लावा पफव्वारे के रूप में बाहर आता है और निकास पर एक शंवुफ ;ब्वदमद्ध बनाता है, जो सिंडर शंवुफ ;ब्पदकंत ब्वदमद्ध के रूप में विकसित होता है। मिश्रित ज्वालामुखी ;ब्वउचवेपजम अवसबंदवमेद्ध इन ज्वालामुख्िायों से बेसाल्ट की अपेक्षा अध्िक ठंडे व श्यान ;गाढ़ा या चिपचिपाद्ध लावा उद्गार होते हैं। प्रायः ये ज्वालामुखी भीषण विस्पफोटक होते हैं। इनसे लावा के साथ भारी मात्रा में ज्वलखण्डाश्िम ;च्लतवबसंेजपबद्ध पदाथर् व राख भी ध्रातल पर पहुँचती हैं। यह पदाथर् निकास नली भौतिक भूगोल के मूल सि(ांत के आस - पास परतों के रूप में जमा हो जाते हैं जिनके जमाव मिश्रित ज्वालामुखी के रूप में दिखते हैं। ज्वालामुखी वुंफड ;ब्ंसकमतंद्ध ये पृथ्वी पर पाए जाने वाले सबसे अध्िक विस्पफोटक ज्वालामुखी हैं। आमतौर पर ये इतने विस्पफोटक होते हैं कि जब इनमें विस्पफोट होता है तब वे उफँचा ढाँचा बनाने के बजाय स्वयं नीचे ध्ँस जाते हैं। ध्ँसे हुए विध्वंस गतर् मिश्रित ज्वालामुखी ;लावा के गिरने से जो गîक्के बनते हैंद्ध ही ज्वालामुखी वुंफड वि्रफयाकलाप: भूवंफप अध्िवेंफद्र का पता लगाना इसके लिए आपको चाहिएः तीन भूवंफपलेखी स्थानों से ‘च्’ तरंगों व ‘ै’ तरंगों के पहुँचने के समय संबंध्ी आँकड़े। कायर् प्रणालीः 1. किसी भूवंफप घटना का दिए गए तीन स्थानों से ;जिसके आँकड़े आपके पास होंद्ध, ‘च्’ तरंगों के पहुँचने का समय व ‘ै’ तरंगों के पहुँचने का समय लिखंे। 2. अब ‘च्’ व ‘ै’ तरंगों के पहुँचने में समयांतर ;ज्पउम संहद्ध की गणना करें। ऐसा तीनों स्थानों के लिए करें। ;यह ध्यान रहे कि यह अंतर उद्गम वेंफद्र व सिस्मोग्रापफ वेंफद्र की दूरी से सीघे संबंध्ित है।द्ध एक साधरण नियम: 1 सेवेंफड का समयांतर ;ज्पउम संहद्ध यह बताता है कि वहाँ से भूवंफप लगभग 8 कि0 मी0 दूरी पर है। 3. उपरोक्त नियम का प्रयोग करते हुए समायांतर को दूरी में बदलें ;अथार्त् समयांतर ;सेवेंफड मेंद्ध ग् 8द्ध. ऐसा हर स्थान के लिए अलग - अलग बार करंे या दोहराएँ। 4.मानचित्रा पर भूवंफपलेखी/सिस्मोग्रापफ स्थानों को अंकित करें। 5.सिस्मोग्रापफ स्थानों को वेंफद्र - बिंदु मानते हुए वृत्त खींचें। वृत्त का अध्र्व्यास ;उपरोक्त 3 न0 पर बताए गए नियमानुसारद्ध गणना की गइर् दूरी के बराबर लें। ;दूरी को मानचित्रा मापक के अनुसार बदलना न भूलेंद्ध 6.ये वृत्त आपस में एक बिंदु पर काटेंगे। यह बिंदु ही भूवंफप अध्िवेंफद्र है। सामान्यतः भूवंफप अध्िवेंफद्र की स्िथति वंफप्यूटर माॅडल की सहायता से जानी जाती है। ये माॅडल पृथ्वी के भूपटल की संरचना को भी ध्यान में रखते हैं। इससे त्राुटि रहित यथाथर् स्िथति का पता लगाया जा सकता है। जो कायर् प्रणाली यहाँ बताइर् गइर् है वह वंफप्यूटर माॅडल का सरलीकरण है, यद्यपि सि(ांत लगभग वही है। दिए गए चित्रा में, भूवंफप अध्िवेंफद्र की स्िथति की जानकारी ऊपर बताए गए दिशा निदेर्श के अनुसार है। एक तालिका भी है जिसमें संबंध्ित आँकड़े हंै। आप इसे स्वयं भी कर सकते हैं। आँकड़े स्टेशन तरंगों के पहुँचने का समय ‘च्’ तरंगें ‘ै’ तरंगें घंटे मिनट सेवेंफड घंटे मिनट सेवेंफड ै1 03 23 20 03 24 45 ै2 03 22 17 03 23 57 ै3 03 22 00 03 23 55 पैमाना 1 सेमी॰ = 4 किमी॰ ;ब्ंसकमतंद्ध कहलाते हैं। इनका यह विस्पफोटक रूप बताता है कि इन्हें लावा प्रदान करने वाले मैग्मा के भंडार न केवल विशाल हैं, वरन् इनके बहुत पास स्िथत हैं। इनके द्वारा निमिर्त पहाड़ी मिश्रित ज्वालामुखी की तरह प्रतीत होती है। बेसाल्ट प्रवाह क्षेत्रा ;थ्सववक इंेंसज चतवअपदबमेद्ध ये ज्वालामुखी अत्यध्िक तरल लावा उगलते हैं जो बहुत दूर तक बह निकलता है। संसार के वुफछ भाग हजारों वगर् कि0मी0 घने लावा प्रवाह से ढके हैं। इनमें लावा प्रवाह क्रमानुसार होता है और वुफछ प्रवाह 50 मीटर से भी अध्िक मोटे हो जाते हैं। कइर् बार अकेला प्रवाह सैकड़ों कि0मी0 दूर तक पफैल जाता है। भारत का दक्कन ट्रैप, जिस पर वतर्मान महाराष्ट्र पठार का ज्यादातर भाग पाया जाता है, वृहत् बेसाल्ट लावा प्रवाह क्षेत्रा है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि आज की अपेक्षा, आरंभ में एक अध्िक वृहत् क्षेत्रा इस प्रवाह से ढका था। मध्य - महासागरीय कटक ज्वालामुखी इन ज्वालामुख्िायों का उद्गार महासागरों में होता है। मध्य महासागरीय कटक एक शृंखला है जो 70ए000 कि0मी0 से अध्िक लंबी है और जो सभी महासागरीय बेसिनों में पैफली है। इस कटक के मध्यवतीर् भाग में लगातार उद्गार होता रहता है। अगले अध्याय में हम इसे विस्तारपूवर्क पढं़ेगे। ज्वालामुखी स्थलावृफतियाँ ;टवसबंदपब स्ंदकवितउेद्ध अंतवेर्ध्ी आकृतियाँ ज्वालामुखी उद्गार से जो लावा निकलता है, उसके ठंडा होने से आग्नेय शैल बनती हैं। लावा का यह जमाव या तो ध्रातल पर पहुँच कर होता है या ध्रातल तक पहुँचने से पहले ही भूपटल के नीचे शैल परतों में ही हो जाता है। लावा के ठंडा होने के स्थान के आधर पर आग्नेय शैलों का वगीर्करण किया जाता है - 1. ज्वालामुखी शैलों ;जब लावा ध्रातल पर पहुँच कर ठंडा होता हैद्ध और 2. पातालीय ;च्सनजवदपबद्ध शैल ;जब लावा ध्रातल के नीचे ही ठंडा होकर जम जाता हैद्ध। जब लावा भूपटल के भीतर ही ठंडा हो जाता है तो कइर् आकृतियाँ बनती हैं। ये आकृतियाँ अंतवेर्ध्ी आकृतियाँ ;प्दजतनेपअम वितउेद्ध कहलाती हैं। इनमें से वुफछ चित्रा 3.4 में दिखाए गए हैं। बैथोलिथ ;ठंजीवसपजीेद्ध यदि मैग्मा का बड़ा पिंड भूपपर्टी में अध्िक गहराइर् पर ठंडा हो जाए तो यह एक गुंबद के आकार में विकसित हो जाता है। अनाच्छादन प्रियाओं के द्वारा ऊपरी पदाथर् के हट जाने पर ही यह ध्रातल पर प्रकट होते हैं। ये विशाल क्षेत्रा में पफैले होते हैं और कभी - कभी इनकी गहराइर् भी कइर् कि0मी0 तक होती है। ये ग्रेनाइट के बने पिंड हैं। इन्हें बैथोलिथ कहा जाता है जो मैग्मा भंडारों के जमे हुए भाग हैं। लैकोलिथ ;स्ंबवसपजीेद्ध ये गुंबदनुमा विशाल अन्तवेर्ध्ी चट्टðानें हैं जिनका तल समतल व एक पाइपरूपी वाहक नली से नीचे से जुड़ा होता है। इनकी आकृति ध्रातल पर पाए जाने वाले मिश्रित ज्वालामुखी के गुंबद से मिलती है। अंतर केवल यह होता है कि लैकोलिथ गहराइर् में पाया जाता है। कनार्टक के पठार में ग्रेनाइट चट्टðानों की बनी ऐसी ही गुंबदनुमा पहाडि़याँ हैं। इनमें से अध्िकतर अब अपपत्रिात ;म्गविसपंजमकद्ध हो चुकी हैं व ध्रातल पर देखी जा सकती हैं। ये लैकोलिथ व बैथोलिथ के अच्छे उदाहरण हैं। भौतिक भूगोल के मूल सि(ांत लैपोलिथ, पफैकोलिथ व सिल ;स्ंचवसपजीए चींबवसपजी अंतवेर्ध्ी आग्नेय चट्टðानों का क्षैतिज तल में एक ंदक ेपससेद्ध चादर के रूप में ठंडा होना सिल या शीट कहलाता है। जमाव की मोटाइर् के आधर पर इन्हें विभाजित कियाऊपर उठते लावे का वुफछ भाग क्षैतिज दिशा में पाए जाने जाता है - कम मोटाइर् वाले जमाव को शीट व घने मोटाइर्वाले कमजोर ध्रातल में चला जाता है। यहाँ यह वाले जमाव सिल कहलाते हैं।अलग - अलग आकृतियों में जम जाता है। यदि यह तश्तरी ;ैंनबमतद्ध के आकार में जम जाए, तो यह लैपोलिथ डाइक कहलाता है। कइर् बार अन्तवेर्ध्ी आग्नेय चट्टðानों की जब लावा का प्रवाह दरारों में ध्रातल के लगभगमोड़दार अवस्था में अपनति ;।दजपबसपदमद्ध के ऊपर व समकोण होता है और अगर यह इसी अवस्था में ठंडा होअभ्िानति ;ैलदबसपदमद्ध के तल में लावा का जमाव जाए तो एक दीवार की भाँति संरचना बनाता है। यही पाया जाता है। ये परतनुमा/लहरदार चट्टðानें एक निश्िचत संरचना डाइक कहलाती है। पश्िचम महाराष्ट्र क्षेत्रा की वाहक नली से मैग्मा भंडारों से जुड़ी होती हैं। ;जो अंतवेर्ध्ी आग्नेय चट्टðानों में यह आकृति बहुतायत में पाइर् क्रमशः बैथोलिथ में विकसित होते हैंद्ध यह ही पैफकोलिथ जाती है। ज्वालामुखी उद्गार से बने दक्कन ट्रेप के कहलाते हैं। विकास में डाइक उद्गार की वाहक समझी जाती हैं। अभ्यास 1. बहुवैकल्िपक प्रश्न: ;पद्ध निम्नलिख्िात में से कौन भूगभर् की जानकारी का प्रत्यक्ष साध्न हैः ;कद्ध भूवंफपीय तरगें ;खद्ध गुरुत्वाकषर्ण बल ;गद्ध ज्वालामुखी ;घद्ध पृथ्वी का चुंबकत्व ;पपद्ध दक्कन ट्रैप की शैल समूह किस प्रकार के ज्वालामुखी उद्गार का परिणाम हैः ;कद्ध शील्ड ;खद्ध मिश्र ;गद्ध प्रवाह ;घद्ध वुंफड ;पपपद्ध निम्नलिख्िात में से कौन सा स्थलमंडल को वण्िार्त करता है? ;कद्ध ऊपरी व निचले मैंटल ;खद्ध भूपटल व व्रफोड ;गद्ध भूपटल व ऊपरी मैंटल ;घद्ध मैंटल व व्रफोड ;पअद्ध निम्न में भूकम्प तरंगें चट्टðानों में संवुफचन व पैफलाव लाती हैं: ;कद्ध श्च्श् तरंगें ;खद्ध श्ैश् तरंगें ;गद्धध्रातलीय तरंगें ;घद्ध उपयुर्क्त में से कोइर् नहीं 2. निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए: ;पद्ध भूगभीर्य तरंगें क्या हैं? ;पपद्ध भूगभर् की जानकारी के लिए प्रत्यक्ष साध्नों के नाम बताइए। ;पपपद्ध भूवंफपीय तरंगें छाया क्षेत्रा वैफसे बनाती हैं? ;पअद्ध भूवंफपीय गतिविध्ियों के अतिरिक्त भूगभर् की जानकारी संबंध्ी अप्रत्यक्ष साध्नों का संक्षेप में वणर्न करें। 3. निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए: ;पद्ध भूवंफपीय तरंगो के संचरण का उन चट्टðानों पर प्रभाव बताएँ जिनसे होकर यह तरंगें गुजरती हंै। ;पपद्ध अंतवेर्ध्ी आकृतियों से आप क्या समझते हैं? विभ्िान्न अंतवेर्ध्ी आकृतियों का संक्षेप में वणर्न करें।

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