तंत्रिाकीय नियंत्राण एवं समन्वय अंतराल पाए जाते हैं, जिन्हें रेनवीयर के नोड कहते हैं। आच्छदी तंत्रिाका तंतु मेरू व कपाल तंत्रिाकाओं में दुम्राक्ष्य ;डेंड्राइटद्ध पाए जाते हैं। आच्छदहीन तंत्रिाका तंतु भी श्वान कोश्िाका से घ्िारे रहते हैंऋ लेकिन वे ऐक्सोन के चारों ओर निसेल ग्रेन्यूल माइलीन आवरण नहीं बनाते हंै। सामान्यतया स्वायत्त तथा कायिक तंत्रिाका तंत्रा में मिलते हैं। कोश्िाकाकाय वेंफद्रक21.3.1 तंत्रिाका आवेगों की उत्पिा व संचरण तंत्रिाकोश्िाकाएं ;न्यूरोंसद्धउद्दीपनशील कोश्िाकाएं हैंऋ क्योंकि उनकी झिल्ली ध््रुवीय अवस्था में रहती है। क्या आप जानते हैं, यह झिल्ली ध््रुवीय अवस्था में श्वान कोश्िाका क्यों रहती है? विभ्िाÂ प्रकार के आयन पथ ;चैनलद्ध तंत्रिाका झिल्ली पर पाए जाते हैं। ये आयन पथ विभ्िाÂ तंत्रिाकाक्षआयनों के लिए चयनात्मक पारगम्य हैं। जब कोइर् न्यूराॅन आवेगों का संचरण नहीं करते हैं जैसे कि मायलिन आवरणविराम अवस्था मंे तंत्रिाकाक्ष झिल्ली सोडियम आयंस की तुलना में पोटैसियम आयंस तथा क्लोराइड आयंस रेन्वीयर के नोडके लिए अध्िक पारगम्य होती है। इसी प्रकार से झिल्ली, तंत्रिाकाक्ष द्रव्य में उपस्िथत ट्टण आवेष्िात तंत्रिाकाक्ष सिराप्रोटिकाल में भी अपारगम्य होती है। ध्ीरे - ध्ीरे तंत्रिाकाक्ष सिनेप्िटकके तंत्रिाका द्रव्य में ज्ञ़तथा ट्टणात्मक आवेष्िात प्रोटीन की उच्च संाद्रता तथा छं़की निम्न संाद्रता होती है। पुटिकाएं इस भ्िाÂता के कारण सांन्द्रता प्रवणता बनती है। चित्रा 21.1 तंत्रिाकोश्िाका की संरचनाझिल्ली पर पाइर् जाने वाली इस आयनिक प्रवणता को सोडियम पोटैसियम पंप द्वारा नियमित किया जाता है। इस पंप द्वारा प्रतिचक्र 3छं़ बाहर की ओर व 2ज्ञ़ कोश्िाका में प्रवेश करते हंै। परिणामस्वरूप तंत्रिाकाक्ष झिल्ली की बाहरी सतह ध्न आवेश्िातऋ जबकि अंातरिक सतह ट्टण आवेश्िात हो जाती हैऋ इसलिए यह ध््रुवित हो जाती है। विराम स्िथति में प्लाज्मा झिल्ली पर इस विभवंातर को विरामकला विभव कहते हैं। आप यह जानने के लिए उत्सुक हांेगे कि तंत्रिाकाक्ष पर तंत्रिाका आवेग की उत्पिा एवं उसका संचरण किस प्रकार होता है? जब किसी एक स्थान पर ध््रुवित झिल्ली पर आवेग होता है ;चित्रा 21.2 का उदाहरणद्ध तब । स्थल की ओर स्िथत झिल्ली छं़ के लिए मुक्त पारगमी हो जाती है। जिसके पफलस्वरूप छं़ तीव्र गति से अंदर जाते हैं और एक सतह पर विपरीत ध््रुवता हो जाती है अथार्त् झिल्ली की बाहरी सतह ट्टणात्मक आवेश्िात तथा आंतरिक सतह ध्नात्मक आवेश्िात हो जाती है। । स्थल पर झिल्ली की विपरीत ध््रुवता होने से विध््रुवीकरण हो जाता है। । झिल्ली की सतह पर विद्युत विभवंातर ियात्मक विभव कहलाता है, जिसे तथ्यात्मक रूप से तंत्रिाका आवेग कहा जाता है। तंत्रिाकीय नियंत्राण एवं समन्वय जानते हैं किस प्रकार पूवर् सिनेप्िटक आवेग ;सिय विभवद्ध का संचरण सिनेप्िटक दरार से पश्च सिनेप्िटक न्यूराॅन तक करते हैं? सिनेप्िसस द्वारा आवेगों के संचरण में न्यूरोट्राॅसमीटर ;तंत्रिाका संचारीद्ध कहलाने वाले रसायन सम्िमलित होते हैं। तंत्रिाकाक्ष के छोर पर स्िथत ;आश्रय पुटिकाऐंद्ध तंत्रिाका संचारी अणुओं से भरी होती हैं। जब तक आवेग तंत्रिाकाक्ष के छोर तक पहुँचता है। यह सिनेप्िटक पुटिका की गति को झिल्ली की ओर उत्तेजित करता है, जहाँ वे प्लाज्मा झिल्ली के साथ जुड़कर तंत्रिाका संचारी अणुओं को सिनेप्िटक दरार में मुक्त कर देते हैं। मुक्त किए गए तंत्रिाका संचारी अणु पश्च सिनेप्िटक झिल्ली पर स्िथत विश्िाष्ट ग्राहियों से जुड़ जाते हैं। इस जुड़ाव के पफलस्वरूप आयन चैनल खुल जाते हैं और उसमें आयनों के आगमन से पश्च सिनेप्िटक झिल्ली पर नया विभव उत्पन्न हो जाता है। उत्पन्न हुआ नया विभव उत्तेजक या अवरोध्क हो सकता है। तंत्रिाकाक्ष तंत्रिाकाक्ष सिरा सिनेप्िटक आशय पूवर् सिनेप्िटक झिल्ली सिनेप्िटक दरार पश्च सिनेप्िट झिल्ली ग्राही तंत्रिाका संचारी चित्रा 21.3 तंत्रिाकाक्ष सिरा एवं सिनेप्स को प्रदश्िार्त करते हुए 21.4 वेंफद्रीय तंत्रिाका तंत्रा - मानव मस्ितष्क मस्ितष्क हमारे शरीर का केंद्रीय सूचना प्रसारण अंग है और यह ‘आदेश व नियंत्राण तंत्रा’ की तरह कायर् करता है। यह ऐच्िछक गमन शरीर के संतुलन, प्रमुख अनेच्िछक अंगों के कायर् ;जैसे पेफपफड़े, हृदय, वृक्क आदिद्ध, तापमान नियंत्राण, भूख एवं प्यास, परिवहन, लय, अनेकों अंतःड्डावी ग्रंथ्िायों की ियाएं और मानव व्यवहार का नियंत्राण करता है। यह देखने, सुनने, बोलने की प्रिया, याददाश्त, कुशाग्रता, भावनाओं और विचारों का भी स्थल है। 324 जीव विज्ञान काॅनिर्या और लैंस के बीच की दूरी को एक्वस चैंबर ;जलीय कोष्ठद्ध कहते हंै। जिसमें पतला जलीय द्रव नेत्रोद होता है। लैंस और रेटिना के बीच के रिक्त स्थान को काचाभ/द्रव कोष्ठ कहते हैं और यह पारदशीर् द्रव काचाभ द्रव कहलाता है। 21.6.1.2 देखने की प्रिया दृश्य तरंगदैध्यर् में प्रकाश किरणों को काॅनिर्या व लैंस द्वारा रेटिना पर पफोकस करने पर शलाकाओं व शंवुफ में आवेग उत्पन्न होते हैं। यह पहले इंगित किया जा चुका है कि मानव नेत्रा में प्रकाश संवेदी यौगिक ;प्रकाश वणर्कद्ध ओप्िसन ;एक प्रोटिनद्ध और रेटिनल ;विटामिन ए का एल्िडहाइड सेद्ध बने होते हंै। प्रकाश ओप्िसन से रेटिनल के अलगाव को प्रेरित करता है, पफलस्वरूप आॅप्िसन की संरचना में बदलाव आता है तथा यह झिल्ली की पारगम्यता में बदलाव लाता है। इसके परिणामस्वरूप विभावांतर प्रकाश ग्राही कोश्िाका में संचरित होती है तथा एक संकेत की उत्पिा होती है, जो कि गुच्िछका कोश्िाकाओं में द्विध्ु्रवीय कोश्िाकाओं द्वारा सिय कोश्िाका विभव उत्पन्न करता है। इन सिय विभव के आवेगों का दृक तंत्रिाका द्वारा मस्ितष्क के दृष्िट वल्कुट क्षेत्रा में भेजा जाता है, जहाँ पर तंत्रिाकीय आवेगों की विवेचना की जाती है और छबि को पूवर् स्मृति एवं अनुभव के आधर पर पहचाना जाता है। 21.6.2 कणर् कणर् दो संवेदी ियाएं करते हैं, सुनना और शरीर का संतुलन बनाना। शरीर िया विज्ञान की दृष्िट से कणर् को तीन मुख्य भागों में विभक्त किया जा सकता है - बाह्य कणर्, मध्य कणर् और अंतःकणर् ;चित्रा 21.7द्ध। बाह्य कणर् पिन्ना या आॅरीकुला तथा बाह्य टेम्पोरल अस्िथ बाह्य कणर् मेलियस कणर् पट झिल्लीबाह्य श्रवण नलिका चित्रा 21.7 कणर् का आरेखी दृश्य इन्कस स्टेपीज काॅक्िलया तंत्रिाका काॅक्िलया यूस्टेकियन नलिका 326 जीव विज्ञान राइजनसर् झिल्ली स्केला वेस्टीवूलीस्केला मीडिया आर्गर्ेन आॅपफ काॅटार्इर् टेक्टोरियल झिल्ली आधर झिल्ली स्केलाक टिम्पेनी चित्रा 21.8 कोक्िलया के काट का दृश्य 21.6.2.1 श्रवण की िया कणर् किस प्रकार ध्वनि तंरगों को तंत्रिाकीय आवेगों में बदलता है, जो कि मस्ितष्क द्वारा उदीप्त व ियात्मक होकर हमें ध्वनि की पहचान कराते हैं? बाह्य कणर् ध्वनि तंरगों को ग्रहण कर कणर् पटह तक भेजता है। ध्वनि तंरगों के प्रतििया में कणर् पटह में वंफपन्न होता है और ये वंफपन्न कणर् अस्िथकाओं ;मैलियस, इंकस और स्टेपीसद्ध से होते हुए गोलाकार ख्िाड़की तक पहुँचते हैं। गोलाकार ख्िाड़की से कंपन्न कोक्िलया मंे भरे द्रव तक पहुँचते हैं, जहां वे लिंपफ में तरंगे उत्पन्न करते हैं। लिंपफ की तंरगें आधर कला में हलचल उत्तेजित करती हैं। आधरीय झिल्ली में गति से रोम कोश्िाकाएं मुड़ती हैं और टैक्टोरियल झिल्ली पर दबाव डालती हैं। पफलस्वरूप संगठित अभ्िावाही न्यूरोंस में तंत्रिाका आवेग उत्पन्न होते हैं। ये आवेग अभ्िावाही तंतुओं द्वारा श्रवण तंत्रिाका से होते हुए मस्ितष्क के श्रवण वल्कुट तक भेजे जाते हैं जहाँ आवेगों का विश्लेषण कर ध्वनि को पहचाना जाता है।

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