हमारे शरीर में कुछ विश्िाष्ट कोश्िाकाएं, जैसे - महाभक्षकाणु ;उंबतवचींहमेद्ध और श्वेताणु ;समनबवबलजमेद्ध रुध्िर में अमीबीय गति प्रदश्िर्ात करती हैं। यह िया जीवद्रव्य की प्रवाही गति द्वारा वूफवूफट पाद बनाकर की जाती है ;अमीबा सदृशद्ध। कोश्िाका वंफकाल तंत्रा जैसे - सूक्ष्मतंतु भी अमीबीय गति में सहयोगी होते हैं। हमारे अध्िकांश नलिकाकार अंगों में, जो पक्ष्माभ उपभ्िािा से आस्तारित होते हैं, पक्ष्माभ गति होती है। श्वास नली में पक्ष्माभों की समन्िवत गति से वायुमंडलीय वायु के साथ प्रवेश करने वाले धूल कणों एवं बाह्य पदाथोर्ं को हटाने में मदद मिलती है। मादा प्रजनन मागर् में डिंब का परिवहन पक्ष्माभ गति की सहायता से ही होता है। हमारे पादों, जबड़ों, जिह्ना, आदि की गति के लिए पेशीय गति आवश्यक है। पेश्िायों के संवुफचन के गुण का प्रभावी उपयोग मनुष्य और अध्िकांश बहुकोश्िाकीय जीवों के चलन और अन्य प्रकार की गतियों में होता है। चलन के लिए पेशीय, वंफकाल और तंत्रिाका तंत्रा की पूणर् समन्िवत िया की आवश्यकता होती है। इस अध्याय में आप पेश्िायों के प्रकार, उनकी संरचना, उनके संवुफचन की ियाविध्ि और वंफकाल तंत्रा के महत्वपूणर् पहलू के बारे में जानेंगे। 20.2 पेशी पेशी एक विशेष प्रकार का ऊतक है जिसकी उत्पिा अध्यजनस्तर से होती है। एक वयस्क मनुष्य के शरीर के भार का 40 - 50 प्रतिशत हिस्सा पेश्िायों का होता है। इनके कइर् विशेष गुण होते हैं, जैसे - उत्तेजनशीलता, संवुफचनशीलता, प्रसायर् एंव प्रत्यास्थता। पेश्िायों को भ्िान्न - भ्िान्न आधरों पर वगीर्कृत किया गया है, जैसे - स्थापन, रंग - रूप और उनकी िया की नियमन प(ति। स्थापन के आधर पर, तीन प्रकार की पेश्िायाँ पाइर् जाती हैं - ;पद्ध वंफकाल ;पपद्ध अंतरंग और ;पपपद्ध हृद। वंफकाल पेश्िायाँ शारीरिक वंफकाल अवयवों के निकट संपकर् में होती हैं। सूक्ष्मदशीर् द्वारा देखने पर इनमें धरियाँ दिखती हैं, अतः इन्हें रेख्िात पेशी कहते हैं। चूँकि इनकी ियाओं का तंत्रिाका तंत्रा द्वारा ऐच्िछक नियंत्राण होता है, अतः इन्हें ऐच्िछक पेशी भी कहते हैं। ये मुख्य रूप से चलन िया और शारीरिक मुद्रा बदलने में सहायक होती हंै। अंतरंग पेश्िायाँ शरीर के खोखले अंतरंग अगोंऋ जैसे - आहार नाल, जनन मागर् आदि की भीतरी भ्िािा में स्िथत होती हैं। ये अरेख्िात और चिकनी दिखती हैं। अतः इन्हें चिकनी पेश्िायाँ ;अरेख्िात पेशीद्ध कहते हैं। इनकी िया तंत्रिाका तंत्रा के ऐच्िछक नियंत्राण में नहीं होती, इसलिए ये अनैच्िछक पेश्िायाँ कही जाती हंै। ये पाचन मागर् द्वारा भोजन और जनन मागर् द्वारा युग्मक ;हंउमजमद्ध के अभ्िागमन ;परिवहनद्ध में सहायता करती हैं। जैसा कि नाम से विदित है, हृद पेश्िायाँ हृदय की पेश्िायाँ हैं। कइर् हृद पेशी कोश्िाकाएं हृद पेशी के गठन के लिए शाश्वत रचना में एकत्रिात होती हैं। रंग रूप के आधार पर, हृद पेश्िायाँ रेख्िात होती हैं। ये अनैच्िछक स्वभाव की होती हैंऋ क्योंकि तंत्रिाका तंत्रा इनकी ियाओं को सीध्े नियंत्रिात नहीं करता। वंफकाल पेशी की संरचना और संवुफचन ियाविध्ि को समझने के लिए हम इसका विस्तार से परीक्षण करेंगें। हमारे शरीर में, प्रत्येक संगठित वंफकाल पेशी कइर् पेशी बंडलों 304 जीव विज्ञान या पूलिकाओं ;ंिेबपबसमेद्ध की बनी होती है, जो संयुक्त रूप से कोलैजनी संयोजी ऊतक स्तर से घ्िारे रहती हैं जिसे संपट्ट ;ंिेबपंद्ध कहते हैं। प्रत्येक पेशी बंडल मंे कइर् पेशी रेशे होते हैं ;चित्रा 20.1द्ध। प्रत्येक पेशी रेशा प्लाज्मा झिल्ली से आस्तारित होता है पेफसिकल ;पुलिकाद्ध पेशी तंतु सार कोलीमा रक्त कोश्िाका चित्रा 20.1 पेशी समूह तथा पेशी तंतु को दशार्ते हुए पेशी का अनुप्रस्थ काट जिसे साकोर्लेमा कहते हैं। पेशी रेशा एक संकोश्िाका है क्योंकि पेशीद्रव्य ;ेंतबवचसंेउद्ध में कइर् केंद्रक होते हैं। अंतःद्रव्य जालिका अथार्त् पेशी रेशों के पेशीद्रव्य जालिका ;सारकोप्लाज्िमक रेटीक्यूलमद्ध कैल्िसयम आयनों का भंडार गृह हैऋ पेशी रेशा की एक विशेषता पेशीद्रव्य में समांतर रूप से व्यस्िथत अनेक तंतुओं की उपस्िथति है जिसे पेशीतंतु ;मायोपिफलामेंटद्ध पेशीतंतुक ;मायोपफाइर्बि्रलद्ध कहते हैं। प्रत्येक पेशी तंतुक मंे क्रमवार गहरे एवं हल्के पट्ट ;बैंडद्ध होते हैं। पेशी रेशक के विस्तृत अध्ययन ने यह स्थापित कर दिया है कि इनका रेख्िात रूप दो प्रमुख प्रोटीन - एक्िटन और मायोसिन के विशेष प्रकार के वितरण के कारण होता है। हल्के बैंडों में एक्िटन होता है जिसे प् - बैंड या समदैश्िाक बैंड कहते हैं जबकि गहरे बैंडों को श्।श् बैंड या विषम दैश्िाक बैंड कहते हैं जिसमें मायोसिन होता है। दोनों प्रोटीन छड़नुमा संरचनाओं में परस्पर समानांतर पेशी रेशक के अनुदैध्यर् अक्ष के भी समानांतर व्यवस्िथत होते हैं एक्िटन तंतु मायोसिन तंतुओं की तुलना में पतले होते हैं, अतः इन्हें क्रमशः पतले एवं मोटे तंतु कहते हैं। प्रत्येक प् - बैंड के मध्य में इसे द्विविभाजित करने वाली एक प्रत्यास्थ रेखा होती है, जिसे श्र्श् - रेखा कहते हैं। पतले तंतु श्र्श् - रेखा से दृढ़ता से जुड़े होते हैं। श्।श् बैंड के मोटे तंतु, श्।श् बैंड के मध्य में एक पतली रेशेदार झिल्ली, जिसे श्डश् - रेखा कहते हैं, द्वारा जुड़े होते हैं। पेशी रेशों की पूरी लंबाइर् में श्।श् और श्प्श् बैंड एकांतर क्रम में व्यवस्िथत होते हैं। दो अनक्रमित श्र्श् - रेखाओं के बीच स्िथत पेशी रेशक का भाग एक संकुचन कायर् इकाइर् बनाता है जिसे साकोर्मियर कहते हैं ;चित्रा 20.2द्ध। विश्राम की अवस्था में, पतले तंतुओं के सिरे दोनों ओर के मोटे तंतुओं के बीच के भाग को छोड़कर स्वतंत्रा सिरों पर अतिच्छादित होते हैं। ;पतले तंतुओं के सिरे मोटे तंतुओं के सिरों के बीच में पाए जाते हैंद्ध मोटे तंतुओं का केंद्रीय भाग जो पतले तंतुओं से अतिच्छादित नहीं होता, श्भ्श्.क्षेत्रा कहलाता है। 20.2.1 संवुफचनशील प्रोटीन की संरचना प्रत्येक एक्िटन ;पतलेद्ध तंतु एक दूसरे से सपिर्ल रूप में कुंडलित दो श्थ्श् ;तंतुमयद्ध एक्िटनों का बना होता है। प्रत्येक श्थ्श् एक्िटन श्ळश् ;गोलाकारद्ध एक्िटन इकाइयों का बहुलक है। एक दूसरे प्रोटीन, ट्रोपोमायोसिन के दो तंतु श्थ्श् एक्िटन के निकट पूरी लंबाइर् में जाते हैं। एक जटिल ट्रोपोनिन प्रोटीन अणु ट्रोपोमायोसिन पर नियत अंतरालों पर पाइर् जाती है। विश्राम की अवस्था में ट्रोपोनिन की एक उप - इकाइर् एक्िटन तंतुओं के मायोसिन के बंध् बनाने वाले सिय स्थानों को ढक कर रखती है ;चित्रा 20.3अद्ध। प्रत्येक मायोसिन ;मोटेद्ध तंतु भी एक बहुलक प्रोटीन है। कइर् एकलकी प्रोटीन जिसे मेरोमायोसिन कहते हैं ;चित्रा 20.3 बद्ध एक मोटा तंतु बनाती हैं। प्रत्येक मेरोमायोसिन के दो महत्वपूणर् भाग होते हैं - एक छोटी भुजा सहित गोलाकार सिर तथा एक पूँछ। सिर को ;अद्ध साकार्ेमियर ;बद्ध चित्रा 20.2 ;अद्ध साकार्ेमियर को दशार्ते हुए एक पेशी तंतु की संरचना ;बद्ध एक साकार्ेमियर का आरेख 306 जीव विज्ञान ट्रोपोनिन ट्रोपोमायोसिनथ्एक्िटन;अद्ध एक्िटन योजी स्थल शीषर् ।ज्च्योजी स्थल क्रास भुजा ;बद्ध चित्रा 20.3 ;अद्ध एक एक्िटन ;पतलाद्ध तंतु ;बद्ध एकल मायोसिन ;मिरोमायोसिनद्ध भारी मेरोमायोसिन ;भ्डडद्ध और पूँछ को हल्का मेरोमायोसिन ;स्डडद्ध कहते हैं। मेरोमायोसिन अवयव अथार्त् सिर एवं छोटी भुजा पर नियत दूरी तथा आपस में एक नियत दूरी नियत कोण पर । तंतु पर बाहर की तरपफ उभरे होते हैं। जिसे क्रास भुजा ;काॅस - आमर्द्ध कहते हैं। गोलाकार सिर एक सिय एटिपीऐज एंजाइम है जिसमें एटीपी के बंध्न स्थान तथा एक्िटन के लिए सिय स्थान होते हैं। 20.2.2 पेशी संवुफचन की ियाविध्ि पेशी संवुफचन की ियाविध्ि को सपीर्तंतु सि(ांत द्वारा अच्छी तरह समझाया जा सकता है जिसके अनुसार पेशीय रेशों का संवुफचन पतले तंतुओं के मोटे तंतुओं के ऊपर सरकने से होता है। वेंफद्रीय तंत्रिाका तंत्रा की प्रेरक तंत्रिाका द्वारा एक संकेत प्रेषण से पेशी संवुफचन का आरंभ होता है। एक प्रेरक न्यूरोन तथा इससे पेशीय रेशे एक प्रेरक इकाइर् का गठन करते हैं। प्रेरक तंत्रिाएक और पेशीय रेशा के साकोर्लेमा की संध्ि को तंत्रिाका - पेशीय संगम या प्रेरक अंत्य पट्टिकाकहते हैं। इस संगम पर एक तंत्रिाक संकेत पहँुचने से एक तंत्रिाका संचारी ;एसिटिल कोलिनद्ध मुक्त होता है जो साकोर्लेमा में एक िया विभव ;ंबजपवद चवजमदजपंसद्ध उत्पन्न करता है। यह समस्त पेशीय रेशे पर पफैल जाता है जिससे साकोर्प्लाज्म में कैल्िसयम आयन मुक्त होते हैं। कैल्िसयम आयन स्तर में वृि से एक्िटन तंतु पर ट्रोपोनिन की उप इकाइर् से कैल्िसयम बंध् बनाकर एक्िटन के ढके हुए सिय स्थानों को खोल देता है। ।ज्च् के जल अपघटन से प्राप्त ऊजार् का उपयोग कर मायोसिन शीषर् एक्िटन के खुले सिय स्थानों से क्रास सेतु बनाने के लिए बँध् जाते हैं ;चित्रा 20.4द्ध। इस बंध् से जुड़े हुए एक्िटन तंतुओं श्।श् बैंड के वेंफद्र की तरपफ ख्िंाचते हैं इन एक्िटनों से जुड़ी हुइर् श्।श् रेखा भी अंदर की तरपफ ख्िांच जाती है जिससे साकोर्मियर एक्िटन तंतु मायोसिन तंतु मायोसिन शीषर्क्राॅस सेतु क्राॅस सेतु का टूटना क्राॅस सेतु का बनना सपर्ण / घूणर्न चित्रा 20.4 क्राॅस सेतु के बनने की अवस्थाएं/शीषर् का घूणर्न तथा क्राॅस सेतु का टूटना छोटा हो जाता है अथार्त् संवुफचित हो जाता है। ऊपर के चरणों से स्पष्ट है कि पेशी के छोटा होते समय अथार्त् संकुचन के समय श्प्श् - बैंडों की लंबाइर् कम हो जाती है जबकि श्।श् - बैंडों की लंबाइर् ज्यों कि त्यों रहती है ;चित्रा 20.5द्ध। ।क्च् और च्2 मुक्तकर, मायोसिन विश्राम अवस्था में वापस चला जाता है। एक नए ।ज्च् के बंध्ने से क्रास - सेतु टूटते हैं ;चित्रा 20.4द्ध। मायोसिन शीषर् ।ज्च् को अपघटित कर पेशी के ओर संकुचन के लिए िया दोहराते हैं विंफतु तंत्रिाका संवेगी के समाप्त हो जाने पर साकार्ेप्लाज्िमक रेटीक्यूलम द्वारा ब्ं़1 के अवशोषण से एक्िटन स्थल पुनः ढक जाते हैं। इसके पफलस्वरूप श्र्श् - रेखाएं अपने मूल स्थान पर वापस हो जाती हैंऋ अथार्त् श्िाथ्िालन हो जाता है। विभ्िान्न पेश्िायों में रेशों की प्रतििया अवध्ि में अंतर हो सकता है। पेश्िायों के बार - बार उत्तेजित होने पर उनमें ग्लाइकोजन के अवायवी विख्ंाडन से लैक्िटक अम्ल का जमाव होने लगता है जिससे थकान ;श्रांतिद्ध होती है। पेशी में आॅक्सीजन भंडारित करने वाला लाल रंग का एक मायोग्लोबिन होता है। कुछ पेश्िायों में मायोग्लोबिन की मात्रा ज्यादा होती है जिससे वे लाल रंग के दिखते हैं। ऐसी पेश्िायों को लाल पेश्िायाँ कहते हैं। ऐसी पेश्िायों में माइट्रोकोंडिªया अध्िक होती हैं जो ।ज्च् के निमार्ण हेतु उनमें भंडारित आॅक्सीजन की बड़ी मात्रा का उपयोग कर सकती हैं। इसलिए, इन पेश्िायों को वायुजीवी पेश्िायाँ भी कह सकते हैं। दूसरी तरपफ, कुछ पेश्िायों में मायोग्लोबिन की बहुत कम मात्रा पाइर् जाती है जिससे वे हल्के रंग की अथवा श्वेत प्रतीत होती हैं। ये श्वेत पेश्िायाँ हैं। इनमें माइटोकोंडिªया तो अल्पसंख्यक होती है, लेकिन पेशीद्रव्य जालिका अत्यध्िक मात्रा में होती हैं। ये अवायवीय विध्ि द्वारा ऊजार् प्राप्त करती हैं। प्रफंटल अस्िथ पैराइटल अस्िथ स्पफीनाॅयड अस्िथ एथमोयड अस्िथ लैक्रीमल अस्िथ नैथाल अस्िथ टेंपोरल अस्िथ जाइगोमेटिक अस्िथ ओक्सीपीटल अस्िथ मैक्िसला अस्िथ ओक्सीपीटल कोंडायाल मेंडीबल अस्िथ हायड अस्िथ चित्रा 20.6 मनुष्य की करोटि का आरेख एक न् - आकार की एकल अस्िथ हाइआॅइड ;ीलवपकद्ध मुख गुहा के नीचे स्िथत होती है, यह भी कपाल में ही सन्िनहित है। प्रत्येक मध्यकणर् मंे तीन छोटी अस्िथयाँ होती हैं - मैलियस, ग्रीवा कशेरुक इनकस एवं स्टेपीज। इन्हें सामूहिक रूप से कणर् अस्िथकाएं कहते हैं। कपाल भाग कशेरूक दंड के अग्र भाग के साथ दो अनुकपाल अस्िथवंफदों ;वबबपचपजंस बवदकलसमेद्ध की सहायता से संध्ियोजन करता है ;द्विवंफदीय करोटिया डाइकोंडाइलिक वक्षीय कशेरुकस्कलद्ध। हमारा कशेरुक दंड ;चित्रा 20.7द्ध क्रम में व्यस्िथत पृष्ठ भाग में स्िथत 26 इकाइयों का बना है जिन्हें कशेरुक कहते हैं। यह कपाल के आधर से निकलता और ध्ड़ भाग का मुख्य ढंाचा तैयार करता है। प्रत्येक कशेरुक के बीच का भाग कटि/लम्बरअंतर कशेरुकीखोखला ;तंत्राकीय नालद्ध होता है जिससे होकर मेरुरज्जु कशेरुकपट्ट;ेचपदंस बवतकद्ध गुजरती है। प्रथम कशेरुक एटलस है और यह अनुकपाल अस्िथवंफदों के साथ संध्ियोजन करता है। सैक्रम/त्रिाक कशेरुक दंड, कपाल की ओर से प्रारंभ करने पर, ग्रीवा ;7द्ध, अनुत्रिाकवक्षीय ;12द्ध, कटि ;5द्ध, त्रिाक सेक्रमी ;1 - संयोजितद्ध और अनुत्रिाक ;1 - संयोजितद्ध कशेरुकों में विभेदित होता है। ग्रीवा चित्रा 20.7 मेरुदंड ;दायाँ पाश्वर् दृश्यद्धकशेरुकों की संख्या मनुष्य सहित लगभग सभी स्तनधरियों में 310 जीव विज्ञान चित्रा 20.8 पसलियाँ तथा पिंजर क्लेविकल स्केपुल “यूमेरस रेडियस अल्ना कापर्ल्स मेटाकापर्ल्स पैफलेंजेज चित्रा 20.9 दाँयी अंस मेखला तथा अग्रपाद अस्िथयां ;सामने से अभ्िादश्िार्तद्ध 7 ;सातद्ध होती है। कशेरुक दंड मेरुरज्जु ;ेचपदंस बवतकद्ध की रक्षा करता है, सिर का आधर बनाते हैं और पसलियों तथा पीठ की पेश्िायों के संध्ि स्थल का निमार्ण करते हैं। उरोस्िथ ;ेजमतदनउद्ध वक्ष की मध्य अध्र रेखा पर स्िथत एक चपटी अस्िथ है। पसलियों ;त्पइेद्ध की 12 जोडि़याँ होती हैं। प्रत्येक पसली एक पतली चपटी अस्िथ है जो पृष्ठ भाग में कशेरुक दंड और अध्र भाग में उरोस्िथ के साथ जुड़ी होती हैं। इसके पृष्ठ सिरे पर दो संध्ियोजन सतहें होती हैं जिसके कारण इसे द्विश्िारस्थ ;इपबमचींसपबद्ध भी कहते हैं। प्रथम सात जोड़ी पसलियों को वास्तविक पसलियाँ कहते हैं। पृष्ठ में ये वक्षीय कशेरुकों और अध्रीय भाग में उरोस्िथ से काचाभ उपास्िथ ;ीलंसपदम बंतजपसंहमद्ध की सहायता से जुड़ी होती हैं। 8वीं, 9वीं और 10वीं जोड़ी - पसलियाँ उरोस्िथ के साथ सीध्े संध्ियोजित नहीं होतीं, बल्िक काचाभ उपास्िथ के सहयोग से सातवीं पसली से जुड़ती हैं। इन्हें वटिर्ब्रोकांड्रल ;वूफटद्ध पसलियाँ कहते हैं। पसलियों की अंतिम दो जोडि़याँ ;11वीं और 12वींद्ध अध्र में जुड़ी हुइर् नहीं होतीं, इसलिए उन्हें प्लावी पसलियाँ ;सिवंजपदह तपइेद्ध कहते हैं। वक्षीय कशेरुक, पसलियाँ और उरोस्िथ मिलकर पसली पंजर ;तपइ बंहमद्ध की संरचना करते हैं ;चित्रा 20.8द्ध। पादों की अस्िथयाँ अपनी मेखला के साथ उपांगीय वंफकाल बनाती हैं। प्रत्येक पाद में 30 अस्िथयाँ पाइर् जाती हैं अग्रपाद ;भुजाद्ध की अस्िथयाँ हैं - ह्यूमेरस, रेडियस और अल्ना, कापर्ल्स ;कलाइर् की अस्िथयाँ - संख्या में 8द्ध, मेटा कापर्ल्स ;हथेली की अस्िथयाँ - संख्या में 5द्ध और पफैलेंजेज ;अंगुलियों की अस्िथयाँ - संख्या में 14द्ध ;चित्रा 20.9द्ध। पफीमर ;उरु अस्िथ - सबसे लम्बी अस्िथद्ध, टिबिया और पिफबुला, टासर्ल ;टखनों की अस्िथयाँ - संख्या में 7द्ध, मेटाटासर्ल ;संख्या में 5द्ध और अंगुलि अस्िथयाँ पफैलेंजेज ;चित्रा 20.10द्ध। कप के आकार की एक अस्िथ जिसे पटेल्ला ;च्ंजमससंद्ध कहते हैं। घुटने को अध्र की ओर से ढकती है ;घुटना पफलकद्ध। अंस और श्रोण्िा मेखला अस्िथयाँ अक्षीय वंफकाल तथा क्रमशः अग्र एवं पश्च पादों के बीच संध्ियोजन में सहायता करती हैं। प्रत्येक मेखला के दो अध्र् भाग होते हैं। अंस मेखला के प्रत्येक अध्र् भाग में एक क्लेविकल एवं एक स्कैपुला होती है ;चित्रा 20.9द्ध। स्कैपुला वक्ष के पृष्ठ भाग में दूसरे एवं सातवीं पसली के बीच स्िथत एक बड़ी इलियम श्रोण्िा अस्िथचपटी, त्रिाभुजाकार अस्िथ है। स्कैपुला के पश्च चपटे त्रिाभुजाकार भाग में एक उभार ;वंफटकद्ध एक विस्तृत प्यूबिस सैक्रम चपटे प्रबंध् के रूप में होता है जिसे एक्रोमिन कहते हैं। इस्िचयम क्लैविकिल इसके साथ संध्ियोजन करती हैं। एक्रोमिन के नीचे एक अवनमन जिसे ग्लीनाॅयड गुहा कहते हैं पफीमर ह्युमूरस के शीषर् के साथ वंफधें की जोड़ बनाने के लिए संध्ियोजन करती है। प्रत्येक क्लैविकल एक लंबी पतली अस्िथ है, जिसमें दो वक्र पाए जाते हैं। इस अस्िथ को पटेल्ला सामान्यतः जत्राुक ;बवससंत इवदमद्ध कहते हैं। श्रोण्िा मेखला ;च्मसअपब हपतकसमद्ध में दो श्रोण्िा अस्िथयाँ टिबिआ होती हैं ;चित्रा 20.10द्ध। प्रत्येक श्रोण्िा अस्िथ तीन पिफबुला अस्िथयों के संलयन से बनी होती है - इलियम, इस्िचयम और प्युबिस। इन अस्िथयों के संयोजन स्थल पर एक टारसाल गुहा एसिटैबुलम होती है जिससे उरु अस्िथ संध्ियोजन मेटाटार साल पैफलेंजेजकरती है। अध्र भाग में श्रोण्िा मेखला के दोनों भाग मिलकर प्युबिक संलयन ;च्नइपब ेलउचीलेपेद्ध बनाते चित्रा 20.10 दाईं श्रोण्िा अस्िथ एवं पश्च पाद अस्िथयाँ हैं जिसमें रेशेदार उपास्िथ होती है। ;सामने से अभ्िादश्िार्तद्ध 20.4 संध्ियाँ या जोड़ संध्ियाँ या जोड़ हर प्रकार की गति के लिए आवश्यक है जिनमें शरीर की अस्िथयाँ सहयोगी होती हैं चलन गति भी इसका अपवाद नहीं है। जोड़ अस्िथयों अथवा एक अस्िथ एवं एक उपास्िथ के बीच का संध्िस्थल है। जोड़ों द्वारा गति के लिए पेशी जनित बल का उपयोग किया जाता है। यहाँ जोड़ आलंब ;निसबतनउद्ध का कायर् करते हैं। इन जोड़ों पर गति विभ्िान्न कारकों पर निभर्रता के कारण बदलती हैं। जोड़ों को मुख्यतः तीन संरचनात्मक रूपों में वगीर्कृत किया गया है, जैसे - रेशीय, उपास्िथयुक्त और साइनोवियल ;स्रावद्ध। रेशीय जोड़ किसी प्रकार की गति नहीं होने देते। इस तरह के जोड़ द्वारा कपाल की चपटी अस्िथयाँ, जो घने रेशीय संयोजी ऊतक की सहायता से सीवन ;ेनजनतमेद्ध के रूप में कपाल बनाने के लिए संयोजित होती हैं। उपास्िथ युक्त जोड़ों में, अस्िथयाँ आपस में उपास्िथयों द्वारा जुड़ी होती हैं। कशेरुक दंड में दो निकटवतीर् कशेरुकों के बीच इसी प्रकार के जोड़ हैं जो सीमित गति होने देते हैं। साइनोवियल जोड़ों की विशेषता दो अस्िथयों की संध्ियोजन सतहों के बीच तरल से भी साइर्नोवियल गुहा की उपस्िथति है। इस तरह की व्यवस्था में पयार्प्त गति संभव है। ये जोड़ चलन सहित कइर् तरह की गति में सहायता करते हैं। वंफदुक खल्िलका संध्ि ;ह्युमूरस और अंस मेखला के बीचद्ध, कब्जा संध्ि ;घुटना संध्िद्ध, ध्ुराग्र संध्ि ;पाइवट

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