उत्सजीर् उत्पाद एवं उनका निष्कासन के वृक्कों की आधत्राी ;मैटिªक्सद्ध में अपेक्ष्िात परासरणता को बनाए रखने के लिए यूरिया की वुफछ मात्रा रह जाती है। सरीसृपों, पक्ष्िायों, स्थलीय घोंघों तथा कीटों में नाइट्रोजनी अपश्िाष्ट यूरिक अम्ल का उत्सजर्न, जल की कम मात्रा के साथ गोलिकाओं या पेस्ट के रूप में होता है और ये यूरिकअम्लउत्सजीर् ;यूरिकोटेलिकद्ध कहलाते हैं। प्राणी जगत में कइर् प्रकार के उत्सजीर् अंग पाए जाते हैं। अध्िकांश अकशेरुकियों में यह संरचना सरल नलिकाकार रूप में होती है, जबकि कशेरुकियों में जटिल नलिकाकार अंग होते हैं, जिन्हें वृक्क कहते हैं। इन संरचनाओं के प्रमुख रूप नीचे दिए गए हैं - आदिवृक्कक ;प्रोटोनेपि्रफडिआद्ध या ज्वाला कोश्िाकाएं, प्लेटिहेल्िमंथ ;चपटे कृमि जैसे प्लैनेरियाद्ध, राॅटीपफर वुफछ एनेलिड, सिपेफलोकाॅडेर्ट ;एम्पफीआॅक्ससद्ध आदि में उत्सजीर् संरचना के रूप में पाए जाते हैं। आदिवृक्कक प्राथमिक रूप से आयनों व द्रव के आयतन - नियमन जैसे परासरणनियमन से संबंध्ित हैं। वेंफचुए व अन्य एनेलिड में नलिकाकार उत्सजीर् अंग वृक्कक पाए जाते हैं। वृक्कक नाइट्रोजनी अपश्िाष्टों को उत्सजिर्त करने तथा द्रव और आयनों का संतुलन बनाए रखने में सहायता करते हैं। तिलचट्टों ;काॅकरोचद्ध सहित अध्िकांश कीटों में उत्सजीर् अंग के रूप में मैलपीगी नलिकाएं पाइर् जाती हैं। मैलपीगी नलिकाएं नाइट्रोजनी अपश्िाष्टों के उत्सजर्न और परासरणनियमन में मदद करती हैं। झींगा ;प्राॅनद्ध जैसे क्रस्टेश्िायाइर् प्राण्िायों में शंृगिक ग्रंथ्िायाँ ;एंटिनलग्लांडद्ध या हरित ग्रंथ्िायँा उत्सजर्न का कायर् करती हैं। 19.1 मानव उत्सजर्न तंत्रा अध्िवृक्क ग्रंथ्िामनुष्यों में उत्सजीर् तंत्रा एक जोड़ी वृक्क, एक जोड़ी मूत्रा नलिका, एक मूत्राशय और एक मूत्रा मागर् का पश्चमहाश्िारा वृक्क ध्मनी बना होता है ;चित्रा 19.1द्ध। वृक्क सेम के बीज की वृक्क श्िारा आकृति के गहरे भूरे लाल रंग के होते हैं तथा ये पेल्िवस अंतिम वक्षीय और तीसरी कटि कशेरुका के समीप वृक्कमेडुला/मध्यांशउदर गुहा में आंतरिक पृष्ठ सतह पर स्िथत होते हैं। वयस्क मनुष्य के प्रत्येक वृक्क की लम्बाइर् 10 - 12 वल्वुफटसेमी., चैड़ाइर् 5 - 7 सेमी., मोटाइर् 2 - 3 सेमी. तथा पृष्ठ महाध्मनी भार लगभग 120 - 170 ग्राम होता है। वृक्क के मूत्रा वाहिनी वेंफद्रीय भाग की भीतरी अवतल ;काॅन्केवद्ध सतह के मध्य में एक खांच होती है, जिसे हाइलम कहते हैं। इसे होकर मूत्रा - नलिका, रक्त वाहिनियाँ और तंत्रिाकाएं मूत्राशय प्रवेश करती हैं। हाइलम के भीतरी ओर कीप के आकार का रचना होती है जिसे वृक्कीय श्रोण्िा मूत्रा मागर् ;पेल्िवसद्ध कहते हैं तथा इससे निकलने वाले प्रक्षेपों चित्रा 19.1 मानव का उत्सजर्न तंत्रा 292 जीव विज्ञान मध्यांश बरतीनी के पिरामिड स्तंभ वैफलिक्स वृक्क ध्मनी वल्वुफट वृक्क श्िारा वृक्क वृक्क पेल्िवस आवरण मूत्रा वाहिनी चित्रा 19.2 वृक्क का भाग अभ्िावाही ध्मनिका ग्लोमेकलस/कोश्िाका गुच्छ बोमेन संपुट आरोही भुजा हेनले पाश अवरोही भुजा वासा रेक्टा ;प्रोजेक्शनद्ध को चषक ;वैफलिक्सद्ध कहते हैं। वृक्क की बाहरी सतह पर दृढ़ संपुट होता है। वृक्क में दो भाग होते हैं - बाहरी वल्कुट ;काॅटेर्क्सद्ध और भीतरी मध्यांश ;मेडुलाद्ध। मध्यांश वुफछ शंक्वाकार पिरामिड ;मध्यांश पिरामिडद्धमें बँटा होता है जो कि चषकों में पैफले रहते हैं। वल्कुट मध्यांश पिरामिड ;पिंडोंद्ध के बीच पैफलकर वृक्क स्तंभ बनाते हैं, जिन्हें बरतीनी - स्तंभ ;ब्वसनउदे व िठमतजपदपद्ध कहते हैं ;चित्रा 19.2द्ध। प्रत्येक वृक्क में लगभग 10 लाख जटिल नलिकाकार संरचना वृक्काणु ;नेप्रफोनद्ध पाइर् जाती हैं जो ियात्मक इकाइयाँ हैं ;चित्रा 19.3द्ध। प्रत्येक वृक्काणु के दो भाग होते हैं। जिन्हें गुच्छ ;ग्लोमेरूलसद्ध और वृक्क नलिका कहते हैं। गुच्छा वृक्कीय ध्मनी की शाखा अभ्िावाही धमनिकाओं ;ंमिितमदज ंतजमतपवसमद्ध से बनी केश्िाकाओं ;वैफपिलरीद्ध का एक गुच्छ है। ग्लोमेरूलस से रक्त अपवाही ध्मनिका ;ममिितमदज ंतजमतपवसमद्ध द्वारा ले जाया जाता है। अपवाही ध्मनिका समीपस्थ संवालित नलिका दूरस्थ संवालित नलिका संग्रह नलिका चित्रा 19.3 रक्त वाहिनयाँ, वाहिनियाँ तथा नलिकाएं प्रदश्िार्त करता हुआ एक नेप्रफोन 296 जीव विज्ञान 19.4 निस्यंद ;छनितद्ध को सांद्रण करने की ियाविध्ि स्तनधरी सांदि्रत मूत्रा का उत्पादन करते हंै। इस कायर् में हेनले - लूप और वासा रेक्टा महत्वपूणर् भूमिका निभाते हंै। हेनले - लूप की दोनों भुजाओं में निस्यंद का विपरीत दिशाओं में प्रवाह होता है, जिससे प्रतिधरा उत्पन्न होती है। वासा रेक्टा की दोनों भुजाओं में रक्त का बहाव भी प्रतिधरा प्रतिरूप ;पैटनर्द्ध में होता है। हेनले - लूप व वासा रेक्टा के बीच की नजदीकी तथा उनमें प्रतिधरा मध्यांशी अंतराकाश ;मेडुलरी इंटरटिश्िायमद्ध के परासरण दाब को विशेष प्रकार से नियमित करती है। परासरण दाब मध्यांश के बाहरी भाग से भीतरी भाग की ओर लगातार बढ़ता जाता है, जैसे कि वल्कुट की ओर 300 उव्ेउ/लीटर से आंतरिक मध्यांश में लगभग 1200 उव्ेउ / लीटर। यह प्रवणता सोडियम क्लोराइड तथा यूरिया के कारण बनती है। छंब्स का परिवहन हेनले - लूप की बोमेन सम्पुट अभ्िावाही ध्मनिका कोश्िाका गुच्छ/ग्लोमेरुलस अपवाही ध्मनिका वल्वुफट बाह्य मध्यांश आंतरिक मध्यांश वासा रेक्टा नेप्रफोन चित्रा 19.6 नेप्रफोन तथा वासा रेक्टा द्वारा निमिर्त प्रतिधरा प्रवाह ियाविध्ि जीव विज्ञान हंै जो अंत में मध्यंाश पिरामिड में से होकर वृक्कीय श्रोण्िा में खुलती हैं। बोमन - संपुट एवं गुच्छ मिलकर मेलपीगी काय या वृक्क कण्िाका ;कापसर्लद्ध बनाते हंै। मूत्रा निमार्ण में 3 मुख्य प्रियाएं होती है - निस्यंदन, पुनरावशोषण और ड्डवण। निस्यंदन, गुच्छ द्वारा केश्िाकाओं के रक्त दाब का उपयोग कर संपादित की जाने वाली अचयनात्मक प्रिया है। गुच्छ द्वारा बोमेन - संपुट में प्रति मिनट 125 मिली. निस्यंद बनाने के लिए प्रति मिनट 1200 मिली. रक्त का निस्यंदन होता है ;जीएपफआरद्ध। वृक्काणु के विशेष भाग जेजीए की जीएपफआर के नियमन में महत्वपूणर् भूमिका है। निस्यंद के 99 प्रतिशत भाग का वृक्काणु के विभ्िाÂ भागों द्वारा पुनरावशोषण किया जाता है। समीपस्थ संवलित नलिका पीसीटी पुनरावशोषण और चयनात्मक स्रवण का मुख्य स्थान है। वृक्क मध्यांश अंतराकाशी में हेनले - लूप परासरण प्रवणता ;300 उव्ेउध्स् से 1200 उव्ेउ/लीटरद्ध को नियमित करने में सहायता करता है। दूरस्थ संवलित नलिका ;डीसीटीद्ध और संग्रह नलिका जल और विद्युत अपघट्यों का पुनरावशोषण करती हैं, जो परासरण नियमन में सहायक है। शरीर - तरल के आयनी साम्य और उसके चभ् को बनाए रखने के लिए नलिकाओं द्वारा भ़्ए ज्ञ़ और छभ्3 निस्यंद ड्डवित होते हैं। अमोनिया का नलिकाओं द्वारा ड्डाव भी होता है। प्रतिधरा ियाविध्ि हेनले - लूप की दो भुजाओं और वासा - रेक्टा के बीच कायर् करती है। निस्यंद जैसे - जैसे अवरोही भुजा में नीचे उतरता है, वैसे - वैसे सांद्र होता जाता है, लेकिन आरोही भुजा में यह पुनः तनु हो जाता है। इस व्यवस्था के द्वारा वैद्युत अपघट्य और कुछ यूरिया, अंतराकाशी स्थल में बचे रह जाते हैं। डी.सी.टी. और संग्रह नलिका निस्यंद को 4 गुना अध्िक सांद्र कर देते हैं - अथार्त् 300 उव्ेउ/लीटर से 1200 उव्ेउ/लीटर तक यह जल संरक्षण की उत्तम ियाविध्ि है। मूत्राशय में मूत्रा का संग्रह केंद्रीय तंत्रिाका तंत्रा द्वारा ऐच्िछक संकेत प्राप्त होने तक किया जाता है। संकेत प्राप्त होने पर मूत्रा मागर् द्वारा इसका निष्कासन मूत्राण कहलाता है। त्वचा, पेफपफड़े और यकृत भी उत्सजर्न में सहयोग करते हैं। अभ्यास 1.गुच्छीय निस्यंद दर ;ळथ्त्द्ध को पारिभाष्िात कीजिए। 2.गुच्छीय निस्यंद दर ;ळथ्त्द्ध की स्वनियमन ियाविध्ि को समझाइए। 3.निम्नलिख्िात कथनों को सही अथवा गलत में इंगित कीजिए। ;अद्धमूत्राण प्रतिवतीर् िया द्वारा होता है। ;बद्धएडीएच मूत्रा को अल्पपरासरणी बनाते हुए जल के निष्कासन में सहायक होता है। ;सद्धबोमेन - संपुट में रक्तप्लाज्मा से प्रोटीन रहित तरल निस्यंदित होता है। ;दद्ध हेनले - लूप मूत्रा के संाद्रण में महत्वपूणर् भूमिका निभाता है। ;यद्ध समीपस्थ संवलित नलिका ;च्ब्ज्द्ध में ग्लूकोस सिय रूप से पुनः अवशोष्िात होता है। 4.प्रतिधरा ियाविध्ि का संक्षेप में वणर्न कीजिए। 5.उत्सजर्न में यकृत, पुफप्पुफस तथा त्वचा का महत्व बताइए। 6.मूत्राण की व्याख्या कीजिए। उत्सजीर् उत्पाद एवं उनका निष्कासन 7.स्तंभ प् के बिंदुओं का खंड स्तंभ प्प् से मिलान करें। स्तंभ प् स्तंभ प्प् ;पद्ध अमोनियोत्सजर्न ;अद्ध पक्षी ;पपद्ध बोमेन - संपुट ;बद्ध जल का पुनः अवशोषण ;पपपद्ध मूत्राण ;सद्ध अस्िथल मछलियाँ ;पअद्ध यूरिकाअम्ल उत्सजर्न ;दद्ध मूत्राशय ;अद्ध एडीएच ;यद्ध वृक्क नलिका 8.परासरण नियमन का अथर् बताइए। 9.स्थलीय प्राणी सामान्यतया यूरिया उत्सजीर् या यूरिक अम्ल उत्सजीर् होते हैं तथा अमोनिया उत्सजीर् नहीं होते हैं, क्यों? 10.वृक्क के कायर् में जक्सटागुच्छउपकरण ;श्रळ।द्ध का क्या महत्व है? 11.नाम का उल्लेख कीजिएः ;अद्धएक कशेरुकी जिसमें ज्वाला कोश्िाकाओं द्वारा उत्सजर्न होता है। ;बद्धमनुष्य के वृक्क के वल्वुफट के भाग जो मध्यांश के पिरामिड के बीच धँसे रहते हैं। ;सद्धहेनले - लूप के समानांतर उपस्िथत केश्िाका का लूप। 12.रिक्त स्थानों की पूतिर् करें: - ;अद्धहेनले - लूप की आरोही भुजा जल के लिए ऋऋऋऋऋऋ जबकि अवरोही भुजा इसके लिए ऋऋऋऋऋऋ है। ;बद्धवृक्क नलिका के दूरस्थ भाग द्वारा जल का पुनरावशोषण ऋऋऋऋऋऋऋऋ हामोर्न द्वारा होता है। ;सद्धअपोहन द्रव में ऋऋऋऋऋऋऋऋ पदाथर् के अलावा रक्त प्लाज्मा के अन्य सभी पदाथर् उपस्िथत होते हैं। ;दद्धएक स्वस्थ व्यस्क मनुष्य द्वारा औसतन ऋऋऋऋऋऋऋऋ ग्राम यूरिया का प्रतिदिन उत्सजर्न होता है।

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