18.1 रुध्िर 18.2 लसीका ;ऊतक द्रव्यद्ध 18.3 परिसंचरण पथ 18.4 द्विपरिसंचरण 18.5 हृद िया का नियंत्राण 18.6 परिसंचरण से संबंध्ित रोग अब तक आप यह सीख चुके हंै कि जीवित कोश्िाकाओं को आॅक्सीजन पोषण अन्य आवश्यक पदाथर् उपलब्ध् होने चाहिए। ऊतकों के सुचारु कायर् हेतु अपश्िाष्ट या हानिकारक पदाथर् जैसे काबर्नडाइआॅक्साइड ;ब्व्2द्ध का लगातार निष्कासन आवश्यक है। अतः इन पदाथो± के कोश्िाकाओं तक से चलन हेतु एक प्रभावी ियाविध्ि का होना आवश्यक था। विभ्िान्न प्राण्िायांे में इस हेतु अभ्िागमन के विभ्िान्न तरीके विकसित हुए हैं। सरल प्राणी जैसे स्पंज व सिलेंटेªट बाहर से अपने शरीर में पानी का संचरण शारीरिक गुहाओं में करते हैं, जिससे कोश्िाकाओं के द्वारा इन पदाथो± का आदान - प्रदान सरलता से हो सके। जटिल प्राणी इन पदाथो± के परिवहन के लिए विशेष तरल का उपयोग करते हैं। मनुष्य सहित उच्च प्राण्िायों में रक्त इस उद्देश्य में काम आने वाला सवार्ध्िक सामान्य तरल है। एक अन्य शरीर द्रव लसीका भी वुफछ विश्िाष्ट तत्वों के परिवहन में सहायता करता है। इस अध्याय में आप रुध्िर एवं लसीका ;ऊतक द्रव्यद्ध के संघटन एवं गुणों के बारे में पढ़ंेगे। इसमें रुध्िर के परिसंचरण वफो भी समझाया गया है। 18.1 रुध्िर रक्त एक विशेष प्रकार का ऊतक है, जिसमें द्रव्य आधत्राी ;मैटिªक्सद्ध प्लाज्मा ;प्लैज्माद्ध तथा अन्य संगठित संरचनाएं पाइर् जाती हैं। 18.1.1 प्लाज्मा ;प्लैज्माद्ध प्रद्रव्य एक हल्के पीले रंग का गाढ़ा तरल पदाथर् है, जो रक्त के आयतन लगभग 55 प्रतिशत होता है। प्रद्रव्य में 90 - 92 प्रतिशत जल तथा 6 - 8 प्रतिशत प्रोटीन पदाथर् होते हंै। पफाइबि्रनोजन, ग्लोबुलिन तथा एल्बूमिन प्लाज्मा में उपस्िथत मुख्य प्रोटीन हैं। पफाइबि्रनोजेन की आवश्यकता रक्त थक्का बनाने या स्वंफदन में होती है। ग्लोबुलिन का उपयोग शरीर जीव विज्ञान न्यूट्रोपिफल तथा मोनोसाइट ;6 - 8 प्रतिशतद्ध भक्षण कोश्िाका होती है जो अंदर प्रवेश करने वाले बाह्य जीवों को समाप्त करती है। बेसोपिफल, हिस्टामिन, सिरोटोनिन, हिपैरिन आदि का स्राव करती है तथा शोथकारी ियाओं में सम्िमलित होती है। इओसिनोपिफल ;2 - 3 प्रतिशतद्ध संक्रमण से बचाव करती है तथा एलजीर् प्रतििया में सम्िमलित रहती है। लिंपफोसाइट ;20 - 25 प्रतिशतद्ध मुख्यतः दो प्रकार की हैं - बी तथा टी। बी और टी दोनों प्रकार की लिंपफोसाइट शरीर की प्रतिरक्षा के लिए उत्तरदायी हैं। पट्टिकाणु ;प्लेटलेट्सद्ध को थ्रोम्बोसाइट भी कहते हैं, ये मैगाकेरियो साइट ;अस्िथ मज्जा की विशेष कोश्िाकाद्ध के टुकड़ों में विखंडन से बनती हैं। रक्त में इनकी संख्या 1.5 से 3.5 लाख प्रति घन मिमी. होती हैं। प्लेटलेट्स कइर् प्रकार के पदाथर् स्रवित करती हैं जिनमें अध्िकांश रुध्िर वफा थक्का जमाने ;स्वंफदनद्ध में सहायक हैं। प्लेटलेट्स की संख्या में कमी के कारण स्वंफदन ;जमावद्ध में विकृति हो जाती है तथा शरीर से अिाक रक्त स्राव हो जाता है। 18.1.3 रक्त समूह ;ब्लड ग्रुपद्ध जैसा कि आप जानते हैं कि मनुष्य का रक्त एक जैसा दिखते हुए भी वुफछ अथोर्ं में भ्िान्न होता है। रक्त का कइर् तरीके से समूहीकरण किया गया है। इनमें से दो मुख्य समूह ।ठव् तथा त्ी का उपयोग पूरे विश्व में होता है। 18.1.3.1 ।ठव् समूह ।ठव् समूह मुख्यतः लाल रुध्िर कण्िाकाओं की सतह पर दो प्रतिजन/एंटीजन की उपस्िथति या अनुपस्िथत पर निभर्र होता है। ये ऐंटीजन । और ठ हैं जो प्रतिरक्षा अनुिया को प्रेरित करते हैं। इसी प्रकार विभ्िान्न व्यक्ितयों में दो प्रकार के प्राकृतिक प्रतिरक्षी/एंटीबोडी ;शरीर प्रतिरोध्ीद्ध मिलते हैं। प्रतिरक्षी वे प्रोटीन पदाथर् हैं जो प्रतिजन के विरु( पैदा होते हैं। चार रक्त समूहों, ।ए ठए ।ठए और व् में प्रतिजन तथा प्रतिरक्षी की स्िथति को देखते हैं, जिसको तालिका 18.1 में दशार्या गया है। तालिका 18.1 रक्त समूह तथा रक्तदाता सुयोग्यता रक्त समूह लाल रुध्िर कण्िाकाओं प्लाज्मा में प्रतिरक्षी रक्तदाता समूह पर प्रतिजन ;एंटिबोडीजद्ध । । एंटी ठ ।ए व् ठ ठ एंटी । ठए व् ।ठ ।ठ अनुपस्िथत ।ठए ।ए ठएव् व् अनुपस्िथत एंटी ।एठ व् दाता एवं ग्राही/आदाता के रक्त समूहों का रक्त चढाने से पहले सावधनीपूवर्क मिलान कर लेना चाहिए जिससे रक्त स्वंफदन एवं त्ठब् के नष्ट होने जैसी गंभीर परेशानियां न हों। दाता संयोज्यता ;डोनर वंफपेटिबिलिटीद्ध तालिका 18.1 में दशार्यी गइर् है। जीव विज्ञान पाया जाता है। दाएं तथा बाएं निलयों से निकलने वाली क्रमशः पुफप्पुफसीय ध्मनी तथा महाध्मनी का निकास द्वार अध्र्चंद्र कपाटिकर ;सेमील्युनर वाल्वद्ध से युक्त रहता है। हृदय के कपाट रुध्िर को एक दिशा में ही जाने देते हैं अथार्त् अलिंद से निलय और निलय से पुफप्पुफस ध्मनी या महाध्मनी। कपाट वापसी या उल्टे प्रवाह को रोकते हैं। यह हृद पेशीयों से बना है। निलयों की भ्िािा अलिंदों की भ्िािा से बहुत मोटी होती है। एक विशेष प्रकार की हृद पेशीन्यास, जिसे नोडल ऊतक कहते हैं, भी हृदय में पाया जाता है ;चित्रा 18.2द्ध। इस ऊतक का एक ध्ब्बा दाहिने अलिंद के दाहिने ऊपरी कोने पर स्िथत रहता है, जिसे श्िाराअलिंदंपवर् ;साइनों - आटिªयल नाॅड ै।छद्ध कहते हैं। इस ऊतक का दूसरा पिण्ड दाहिने अलिंद में नीचे के कोने पर अलिंद निलयी पट के पास में स्िथत होता है जिसे अलिंद निलय पवर् ;आटिªयो - वेटीवुफलर नाॅड/ ।टछद्ध कहते हैं। नोडल ;ग्रंथ्िालद्ध रेशों का एक बंडल, जिसे अलिंद निलय बंडल ;।ट बंडलद्ध भी कहते हैं। अंतर निलय पट के ऊपरी भाग में अलिंद निलय पवर् से प्रारंभ होता है तथा शीघ्र ही दो दाईं एवं बाईं शाखाओं मेें विभाजित होकर अंतर निलय पट के साथ पश्च भाग में बढ़ता है। इन शाखाओं से संक्ष्िाप्त रेशे निकलते हैं जो पूरे निलयी पेशीविन्यास मंे दोनों तरपफ पफैले रहते हैं, जिसे पुरविंफजे तंतु कहते हैं। दाईं एवं बाईं शाखाओं सहित ये तंतु हिज के बंडल ;ठनदकसम व िभ्पेद्ध कहलाते हैं। नोडल ऊतक बिना किसी बाह्य प्रेरणा के ियाविभव पैदा करने में सक्षम होते हैं। इसे स्वउत्तेजनशील ;आटोएक्साइटेबलद्ध कहते हैं। हालांकिऋ एक मिनट में उत्पन्न हुए ियाविभव की संख्या नोडल तंत्रा के विभ्िान्न भागों में घट - बढ़ सकती है। श्िाराअलिंदपवर् ;गांठद्ध सबसे अध्िक ियाविभव पैदा कर सकती है। यह एक मिनट में 70 - 75 ियाविभव पैदा करती है तथा हृदय का लयात्मक संवुफचन ;रिदमिक कांटेªक्शनद्ध को प्रारंभ करता है तथा बनाए रखता है। इसलिए इसे गतिप्रेरक ;पेश मेकरद्ध कहते हैं। इससे हमारी सामान्य हृदय स्पंदन दर 70 - 75 प्रति मिनट होती है। ;औसतन 72 स्पंदन प्रति मिनटद्ध। 18.3.2 हृद चक्र हृदय काम वैफसे करता है? आओ हम जानें। प्रारंभ में माना कि हृदय के चारों कक्ष श्िाथ्िाल अवस्था में हैं अथार्त् हृदय अनुश्िाथ्िालन अवस्था में है। इस समय त्रिावलन या द्विवलन कपाट खुले रहते हंै, जिससे रक्त पुफप्पुफस श्िारा तथा महाश्िारा से क्रमशः बाएं तथा दाएं अलिंद से होता हुआ बाएं तथा दाएं निलय में पहुँचता है। अध्र् चंद्रकपाटिका इस अवस्था में बंद रहती है। अब श्िाराअलिंदपवर् ;ै।छद्ध ियाविभव पैदा करता है, जो दोनों अलिंदों को प्रेरित कर अलिंद प्रवुफंचन ;ंजतपंस ेलेजवसमद्ध पैदा करती है। इस िया से रक्त का प्रवाह निलय में लगभग 30 प्रतिशत बढ़ जाता है। निलय में ियाविभव का संचालन अलिंद निलय ;पवर्द्ध तथा अलिंद निलय बंडल द्वारा होता है जहाँ से हिज के बंडल इसे निलयी पेशीन्यास ;अमदजतपबनसंत उनेबनसंजपतमद्ध तक पहँुचाता है। इसके कारण निलयी पेश्िायों में संवुफचन होता है अथार्त् निलय प्रवुफंचन इस समय अलिंद विश्राम अवस्था में जाते हैं। इसे अलिंद को अनुश्िाथ्िालन कहते हैं जो अलिंद प्रवुफंचन के साथ - साथ होता है। निलयी प्रवुफंचन, निलयी दाब बढ़ जाता है, जिससे त्रिावलनी व शरीर द्रव तथा परिसंचरण पेफपफड़ा पुफप्पुफस ध्मनी पुफप्पुफस श्िारा पृष्ठ महाध्मनी महाश्िारा चिकनी पेशी अवकाश्िाका श्िारा शरीर अंग अवकाश्िाका चिकनी पेशीध्मनी कोश्िाका चित्रा 18.4 मानव रक्त परिसंचरण का आरेखीय चित्रा 18.5 हृद िया का नियमन हृदय की सामान्य ियाओं का नियमन अंतरिम होता है अथार्त् विशेष पेशी ऊतक ;नोडल ऊतकद्ध द्वारा स्व नियमित होते हैं, इसलिए हृदय को पेशीजनक ;मायोजनिकद्ध कहते हैं। मेड्यूला ओबलांगाटा के विशेष तंत्रिाका केंद्र स्वायत्त तंत्रिाका के द्वारा हृदय की ियाओं को संयमित कर सकता है। अनुकंपीय तंत्रिाकाओं से प्राप्त तंत्राीय संकेत हृदय स्पंदन को बढ़ा देते हैं व निलयी संवुफचन को सुदृढ़ बनाते हैं, अतः हृद निकास बढ़ जाता है। दूसरी तरपफ परानुकंपी तंत्रिाकय संकेत ;जो स्वचालित तंत्रिाका केंद्र का हिस्सा हैद्ध हृदय स्पंदन एवं ियाविभव की संवहन गति कम करते हैं। अतः यह हृद निकास को कम करते हैं। अध्िवृक्क अंतस्था ;एडीनल मेड्यूलाद्ध का हामोर्न भी हृद निकास को बढ़ा सकता है। 18.6 परिसंचरण की विकृतियाँ उच्च रक्त दाब ;अति तनावद्ध: अति तनाव रक्त दाब की वह अवस्था है, जिसमें रक्त चाप सामान्य ;120/80द्ध से अध्िक होता है। इस मापदंड में 120 मिमी. एच जी ;मिलीमीटर में मकर्री दबावद्ध को प्रवुफंचन या पंपिंग दाब और 80 मिमी. एच जी को अनुश्िाथ्िालन या विराम काल ;सहजद्ध रक्त दाब कहते हैं। यदि किसी का रक्त दाब बार - बार मापने पर भी व्यक्ित 140/90 या इससे अध्िक होता है तो वह अति तनाव प्रदश्िार्त करता है। उच्च रक्त चाप हृदय की बीमारियों को जन्म देता है तथा अन्य महत्वपूणर् अंगों जैसे मस्ितष्क तथा वृक्क जैसे अंगों को प्रभावित करता है। जीव विज्ञान हृद ध्मनी रोग ;ब्।क्द्ध: हृद ध्मनी बीमारी या रोग को प्रायः एथ्िारोकाठिंय ;एथ्िारोस सक्लेरोसिसद्ध के रूप में संदभ्िार्त किया जाता है, जिसमें हृदय पेशी को रक्त की आपूतिर् करने वाली वाहिनियाँ प्रभावित होती हैं। यह बीमारी ध्मनियों के अंदर वैफल्िसयम, वसा तथा अन्य रेशीय ऊतकों के जमा होने से होता है, जिससे ध्मनी की अवकाश्िाका संकरी हो जाती है। हृदशूल ;एंजाइनाद्ध: इसको एंजाइना पेक्टोरिस ;हृदशूल पेक्टोरिसद्ध भी कहते हैं। हृद पेशी में जब पयार्प्त आॅक्सीजन नहीं पहुँचती है तब सीने में ददर् ;वक्ष पीड़ाद्ध होता है जो एंजाइना ;हृदशूलद्ध की पहचान है। हृदशूल स्त्राी या पुरुष दोनों में किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन मध्यावस्था तथा वृ(ावस्था में यह सामान्यतः होता है। यह अवस्था रक्त बहाव के प्रभावित होने से होती है। हृदपात ;हाटर् पफेल्योरद्ध: हृदपात वह अवस्था है जिसमें हृदय शरीर के विभ्िान्न भागों को आवश्यकतानुसार पयार्प्त आपूतिर् नहीं कर पाता है। इसको कभी - कभी संवुफलित हृदपात भी कहते हंै, क्योंकि पुफप्पुफस का संवुफलन हो जाना भी उस बीमारी का प्रमुख लक्षण है। हृदपात ठीक हृदघात की भाँति नहीं होता ;जहाँ हृदघात में हृदय की ध्ड़कन बंद हो जाती है जबकि, हृदपात में हृदयपेशी को रक्त आपूतिर् अचानक अपयार्प्त हो जाने से यकायक क्षति पहुँचती है। सारांश कशेरुकी रक्त ;द्रव संयोजी ऊतकद्ध को पूरे शरीर में संचारित करते हैं जिसके द्वारा आवश्यक पदाथर् कोश्िाकाओं कहते हैं, भी वुफछ पदाथोर्ं को अभ्िागमित करता है। रक्त, द्रव आधत्राी ;मैटिªक्सद्ध प्लैज्मा ;प्लाज्माद्ध तथा संगठित पदाथोर्ं से बना होता है। लाल रुध्िर कण्िाकाएं ;त्ठबे/इरिथ्रोसाइटद्ध, श्वेत रुध्िर कण्िाकाएं ;ल्यूकोसाइटद्ध और प्लेट्लेट्स ;थ्रोम्बोसाइटद्ध, संगठित पदाथोर्ं का हिस्सा है। मानव का रक्त चार समूहों ।ए ठए ।ठए व् में वगीर्कृत किया गया है। इस वगीर्करण का आधर लाल रुध्िर कण्िाकाओं की सतह पर दो एंटीजेन । अथवा ठ का उपस्िथत अथवा अनुपस्िथत होना है। दूसरा वगीर्करण लाल रुध्िर कण्िाकाओं की सतह पर त्ी घटक की उपस्िथति अथवा अनुपस्िथति पर किया गया है। ऊतक की कोश्िाकाओं के मध्य एक द्रव पाया जाता है जिसे ऊतक द्रव कहते हैं। इस द्रव को लसीका भी कहते हैं जो रक्त के समान होता है, परंतु इसमें प्रोटीन कम होती है तथा संगठित पदाथर् नहीं होते हैं। सभी कशेरुकियों तथा वुफछ अकशेरुकियों में बंद परिसंचरण तंत्रा होता है। हमारे परिसंचरण तंत्रा के अंतगर्त पेशीय पंपिंग अवयव, हृदय, वाहिकाओं का जाल तंत्रा तथा द्रव, रक्त आदि सम्िमलित होते हैं। हृदय में दो आलिंदद्ध तथा दो निलय होते हैं। हृद पेशीन्यास स्व - उत्तेजनीय होता है। श्िाराअलिंद पवर् ;कोटरालिंद गाँठ ै।छ अध्िकतम संख्या में प्रति मिनट ;70/75 मिनटद्ध ियविभव को उत्पन्न करती है और इस कारण यह हृदय की गतिविध्ियों की गति निधर्रित करती है। इसलिए इसे पेश मेकर ;गति प्रेरकद्ध कहते हैं। आलिंद द्वारा पैदा किया विभव और इसके बाद निलयों की आवुफंचन ;प्रवुफंचनद्ध का अनुकरण अनुश्िाथ्िालन द्वारा होता है। यह प्रवुफंचन रक्त के अलिंद से निलयों की ओर बहाव के लिए दबाव डालता है और वहाँ से पुफप्पुफसीय ध्मनी और महाध्मनी तक ले जाता है। हृदय की इस क्रमिक घटना को एक चक्र के रूप में बार - बार दोहराया जाता है जिसे हृद चक्र कहते हैं। एक स्वस्थ व्यक्ित प्रति मिनट ऐसे 72 चक्रों को प्रदश्िार्त करता है। एक हृद चक्र के दौरान प्रत्येक निलय द्वारा लगभग 70 मिली रक्त हर बार पंप किया जाता है। इसे स्ट्रोक या विस्पंदन आयतन कहते हैं। हृदय के निलय द्वारा प्रति मिनट पंप किए गए रक्त आयतन को हृद निकास कहते

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