258 जीव विज्ञान मुख गुहा कणर्पूवर् ग्रंथ्िा मुख ग्रसनी अधेजंभ और अधेजिह्ना ग्रंथ्िायां ग्रसिका यकृत पित्ताशय आमाशय अग्नाशयग्रहणी अनुप्रस्थ वृ“दंत्रा अग्र क्षुद्रांत्रा आरोही वृ“दंत्रा अवरोही वृहदंत्राक्षुद्रांत अंध्नाल मलाशय कृमिरूप परिशेष्िाका गुदा चित्रा 16.1 मानव पाचन तंत्रा ;क्पचीलवकवदजद्ध कहते हैं। वयस्क मनुष्य में 32 स्थायी दांत होते हैं, जिनके चार प्रकार हैं जैसे - कृंतक ;प्द्ध, रदनक ;ब्द्ध अग्र - चवर्णक ;च्डद्ध और चवर्णक ;डद्ध। ऊपरी एवं निचले जबड़े के प्रत्येक आध्े भाग में दांतों की व्यवस्था प्ए ब्ए च्डए ड क्रम में एक दंतसूत्रा 2123 के अनुसार होती है जो मनुष्य के लिए है। इनैमल से बनी दांतों की चबाने वाली2123कठोर सतह भोजन को चबाने में मदद करती है। जिह्ना स्वतंत्रा रूप से घूमने योग्य एक पेशीय अंग है जो Úेनुलम ;तिमदनसनउद्ध द्वारा मुखगुहा की आधर से जुड़ी होती है। जिह्ना की ऊपरी सतह पर छोटे - छोटे उभार के रूप में पिप्पल ;पैपिलाद्ध होते हैं, जिनमें वुफछ पर स्वाद कलिकाएं होती हैं। मुखगुहा एक छोटी ग्रसनी में खुलती है जो वायु एवं भोजन, दोनों का ही पथ है। उपास्िथमय घाँटी ढक्कन, भोजन को निगलते समय श्वासनली में प्रवेश करने से रोकती है। ग्रसिका ;वमेवचींहनेद्ध एक पतली लंबी नली है, जो गदर्न, वक्ष एवं मध्यपट से होते हुए पश्च भाग में श्श्रश् आकार के थैलीनुमा आमाशय में खुलती है। ग्रसिका का आमाशय पाचन एवं अवशोषण 259 में खुलना एक पेशीय ;आमाशय - ग्रसिकाद्ध अवरोध्िनी द्वारा नियंत्रिात होता है। आमाशय ;गुहा के ऊपरी बाएं भाग में स्िथत होता हैद्ध, को मुख्यतः तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है - जठरागम भाग जिसमें ग्रसिका खुलती है, पंफडिस क्षेत्रा और जठरनिगर्मी भाग जिसका छोटी आंत में निकास होता है ;चित्रा 16.3द्ध। छोटी आंत के तीन भाग होते हैं - ष्ब्ष् आकार की ग्रहणी, वुफंडलित मध्यभाग अग्रक्षुद्रांत्रा और लंबी वुंफडलित क्षुद्रांत्रा। आमाशय का ग्रहणी में निकास जठरनिगर्म अवरोध्िनी द्वारा नियंत्रिात होता है। क्षुद्रांत्रा बड़ी आंत में खुलती है जो अंध्नाल, वृहदंात्रा और मलाशय से बनी होती है। अंध्नाल एक छोटा थैला है जिसमें वुफछ सहजीवीय सूक्ष्मजीव रहते हैं। अंध्नाल से एक अंगुली जैसा प्रवर्ध्, परिशेष्िाका निकलता है जो एक अवशेषी अंग है। अंध्नाल, बड़ी आंत में खुलती है। वृहदंात्रा तीन भागों में विभाजित होता है - आरोही, अनुप्रस्थ एवं अवरोही भाग। अवरोही भाग मलाशय में खुलता है जो मलद्वार ;ंदनेद्ध द्वारा बाहर खुलता है। आहार नाल की दीवार में ग्रसिका से मलाशय तक, चार स्तर होते हैं ;चित्रा 16.4द्ध जैसे सिरोसा, मस्वुफलेरिस, सबम्यूकोसा और म्युकोसा। सिरोसा सबसे बाहरी परत है और एक पतली मेजोथ्िालियम ;अंतरंग अंगों की उपकलाद्ध और वुफछ संयोजी ऊतकों से बनी होती है। मस्वुफलेरिस प्रायः अंातरिक वतुर्ल पेश्िायों एवं बाह्य अनुदैघ्यर् पेश्िायों की बनी होती है। वुफछ भागों में एक तियर्क पेशी स्तर होता है। सबम्यूकोसा स्तर रुिार, लसीका व तंत्रिाकाओं युक्त मुलायम संयोजी ऊतक की बनी होती है। ग्रहणी में, वुफछ ग्रंथ्िायाँ भी सबम्यूकोसा में पाइर् जाती हैं। आहार नाल की ल्यूमेन की सबसे भीतरी परत म्यूकोसा है। यह स्तर आमाशय में अनियमित वलय एवं छोटी आंत में अंगुलीनुमा प्रवध्र् बनाता है जिसे अंवुफर ;अपससपद्ध कहते हैं ;चित्रा 16.5द्ध। अंवुफर की सतह पर स्िथत कोश्िाकाओं से असंख्य सूक्ष्म प्रवध्र् निकलते हैं जिन्हें सूक्ष्म अंवुफर कहते हैं, जिससे ब्रस - बाडर्र जैसा लगता है। यह रूपांतरण सतही क्षेत्रा को अत्यध्िक बढ़ा देता है। अंवुफरों में केश्िाकाओं का जाल पैफला रहता है और एक बड़ी लसीका वाहिका ;अमेेमसद्ध होती है जिसे वृंफतक रदनक अग्र - चवर्णक चवर्णक हनु - गतिर्काएं चित्रा 16.2 एक ओर हनु में विभ्िान्न प्रकार के दंत - विन्यास और दूसरी ओर हनु - गतिर्काओं को दशार्ते हुए। ग्रसिका जठरागम ग्रहणी का पंफडस ऊध्वर् भाग जठरनिगर्म चित्रा 16.3 एक ओर हनु में विभ्िान्न प्रकार के दंत - विन्यास और दूसरी ओर हनु - गतिर्काओं को दशार्ते हुए। पाचन एवं अवशोषण 261 होते हुए एक पतली पेशीय थैली - पित्ताशय में सांदि्रत एवं जमा होता है। पित्ताशय की नलिका यकृतीय नलिका से मिलकर एक मूल पित्त वाहिनी बनाती है ;चित्रा 16.6द्ध। पित्ताशयी नलिका एवं अग्नाशयी नलिका, दोनों मिलकर यकृतअग्नाशयी वाहिनी द्वारा ग्रहणी में खुलती है जो ओडी अवरोध्िनी से नियंत्रिात होती हैं। अग्नाशय न् आकार के ग्रहणी के बीच स्िथत एक लंबी ग्रंथ्िा है जो बहिः ड्डावी और अंतः ड्डावी, दोनों ही ग्रंथ्िायों की तरह कायर् करती है। बहिः ड्डावी भाग से क्षारीय अग्नाशयी ड्डाव निकलता है, जिसमें एंजाइम होते हैं और अंतः ड्डावी भाग से इंसुलिन और ग्लुकेगोन नामक हामार्ेन का ड्डाव होता है। पित्ताशय यकृत - वाहिनियाँपित्ताशय वाहिनी मूल पित वाहिनी अग्नाशय अग्नाशयी वाहिनी ग्रहणी यकृत - अग्नाशयी वाहिनी चित्रा 16.6 यकृत, पित्ताशय और अनाशय का वाहिनी - तंत्रा 16.2 भोजन का पाचन पाचन की प्रिया यांत्रिाक एवं रासायनिक विध्ियों द्वारा संपन्न होती है। मुखगुहा के मुख्यतः दो प्रकायर् हैं, भोजन का चवर्ण और निगलने की िया। लार की मदद से दांत और जिह्ना भोजन को अच्छी तरह चबाने एवं मिलाने का कायर् करते हैं। लार का श्लेषम भोजन कणों को चिपकाने एवं उन्हें बोलस में रूपंातरित करने में मदद करता है। इसके उपरांत निगलने की िया द्वारा बोलस ग्रसनी से ग्रसिका में चला जाता है। बोलस पेशीय संवुफचन के क्रमावुंफचन ;चमतपेजंसेपेद्ध द्वारा ग्रसिका में आगे बढ़ता है। जठर - ग्रसिका अवरोध्िनी भोजन के अमाशय में प्रवेश को नियंत्रिात करती है। लार ;मुखगुहाद्ध में विद्युत - अपघट्य ;मसमबजतवसलजमेद्ध ;छं़ए ज्ञ़ए ब्सदृए भ्ब्व्3 दृ द्ध और एंजाइम ;लार एमाइलेज या टायलिन तथा लाइसोजाइमद्ध होते हैं। पाचन की रासायनिक प्रिया

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