15.1 वृि 15.2 विभेदन, निविर्भेदन तथा पुनविर्भेदन 15.3 परिवध्र्न 15.4 पादप वृि नियामक 15.5 दीप्ितकालिता 15.6 वसंतीकरण आपने पहले ही इस इकाइर् के अध्याय 5 के अंतगर्त पूफल वाले पौध्े के संगठन के बारे में अध्ययन किया है। क्या आपने कभी सोचा है कि मूल, तना, पिायां, पूफल तथा बीज जैसी संरचनाएं कहाँ और वैफसे पैदा होती हैं और वह भी एक क्रमब( तरीके से? अब आप बीज, पौध् ;नव अंवुफरित पौधद्ध, पादपक ;छोटा पौधद्ध तथा परिपक्व पौध्े जैसे शब्दों से परिचित हो गए हैं। आपने यह भी देखा है कि सभी पेड़ समय के अंतराल में ऊंचाइर् एवं गोलाइर् ;चैड़ाइर्द्ध में लगातार वृि करते हैं। हालाँकि उसी वृक्ष की पिायां, पूफल एवं पफल आदि न केवल एक सीमित लंबाइर् - चैड़ाइर् के होते हैं, बल्िक समयानुवूफल वृक्ष से निकलते एवं गिर जाते हैं। यही प्रिया लगातार दोहराइर् जाती है। एक पौध्े में पूफल आने की प्रिया कायिक वृि के बाद क्यों होती है? सभी पौधें के अंग विभ्िान्न तरह के ऊतकों से बने होते हैं। क्या एक कोश्िाका/ऊतक/अंग की संरचना और उसके द्वारा संपन्न जाने वाली ियाकलाप के बीच कोइर् संबंध् है? पौध्े की सभी कोश्िाकाएं युग्मज की संतति या वंशज होती है। तब सवाल यह उठता है कि क्यों और वैफसे उनमें भ्िान्न - भ्िान्न संरचनात्मक एवं ियात्मक विशेषताएं होती हैं? परिवध्र्न दो प्रियाओं का योग हैः वृि एवं विभेदन। शुरुआत में यह जानना अनिवायर् है कि एक परिपक्व वृक्ष का परिवध्र्न एक युग्मक ;एक निषेचित अंडाद्ध से शुरू होकर एक सुनिश्िचत एवं उच्च नियमित वंशानुक्रम की घटना है। इस प्रिया के दौरान एक जटिल शरीर संरचना का गठन होता है जो जड़ों, पिायों, शाखाओं, पूफलों, पफलों एवं बीजों को उत्पादित करता है और अंततः वे मर जाते हैं। ;चित्रा 15.1द्ध4 इस अध्याय मेंऋ आप वुफछ उन कारकों के बारे में पढ़ेंगे जो कि इस परिवध्र्न प्रिया को संचालित एवं नियंत्रिात करते हैं। ये कारक एक पौध्े के लिए आंतरिक एवं बाहरी होते हैं। जीव विज्ञान बीजावरण बीजपत्रोपरिक अंवुफश्िाका मिट्टी की रेखा बीजापत्रा बीजपत्रा बीजपत्राधर बीजपत्राधर चित्रा 15.1 सेम में अंवुफरण एवं नवोद्भ्िादों का परिवध्र्न 15.1 वृि एक जीवित वस्तु के लिए वृि को सवार्ध्िक आधरभूत एवं सुस्पष्ट विश्िाष्टता के रूप मंें जाना जाता है। वृि क्या है? वृि को एक अवयव या अंग या इसके किसी भाग या यहाँ तक कि एक कोश्िाका के आधर में अनिवत्यर् ;अनपलटद्ध स्थाइर् बढ़त के रूप में पारिभाष्िात किया जा सकता है। सामान्यतः वृि उपापचयी प्रियाओं ;उपचय एवं अपचय दोनों सेद्ध से जुड़ा होता है जो ऊजार् के व्यय पर आधरित होता है। इसलिए एक पत्ती का विस्तार वृि है। आप एक लकड़ी के टुकड़े को पानी में डालने से हुए पैफलाव या विस्तार का वणर्न वैफसे करेंगे? 15.1.1 पादप वृि प्रायः अपरिमित है पादप वृि अनूठे ढंग से होती हैऋ क्योंकि पौध्े जीवन भर असीमित वृि की क्षमता को अजिर्त किए होते हैं। इस क्षमता का कारण उनके शरीर में वुफछ खास जगहों पर विभज्योतक ;मेरिस्टेमद्ध ऊतकों की उपस्िथति है। ऐसे विभज्योतकों की कोश्िाकाओं में विभाजन एवं स्वशाश्वतता ;निरंतरताद्ध की क्षमता होती है। हालाँकि यह उत्पाद जल्द ही विभाजन की क्षमता खो देते हैं और ऐसी कोश्िाकाएं जो विभाजन की क्षमता खो देती है, वे पादप शरीर की रचना करती है। इस प्रकार की वृि जहाँ पर विभज्योतक की ियात्मकता से पौध्े के शरीर में सदैव नइर् कोश्िाकाओं को जोड़ा जाता है, उसे वृि का खुला स्वरूप कहा जाता है। क्या होगा जब विभज्योतक का विभाजन बंद हो जाए? क्या कभी ऐसा होता है? पादप वृि एवं परिवध्र्न आपने अध्याय 6 में मूल श्िाखाग्र विभज्योतक तथा प्ररोह श्िाखाग्र विभज्योतक के स्तर पर विभज्योतक के बारे में पढ़ा है। ये पौधें की प्राथमिक वृि के लिए जिम्मेदार होते हैं और मुख्यतया पौध्े के अक्ष के समानांतर दीघीर्करण में भागीदारी करते हैं। द्विबीज पत्ती तथा नग्नबीजी पौधें में पाश्वर् विभज्योतक, संवहनी वैंफबियम तथा कावर्फ वैंफबियम जीवन में बाद में प्रकट होते हैं। ये विभज्योतक उन अंग की चैड़ाइर् को बढ़ाते हैं, जहाँ ये ियाशील होते हैं। इसे द्वितीयक वृि के नाम से जाना जाता है ;चित्रा - 15.2 देखंेद्ध। 15.1.2 वृि माप योग्य है कोश्िाकीय स्तर पर वृि मुख्यतः जीवद्रव्य मात्रा में वृि का परिणाम है। चूँकि जीवद्रव्य की वृि को सीध्े मापना कठिन हैऋ अतः वुफछ दूसरी मात्राओं को मापा जाता है जो कम या ज्यादा इसी के अनुपात में होता है। इसलिए, वृि को विभ्िान्न मापदंडों द्वारा मापा जाता है। वुफछेक मापदंड ये हैंः ताजी भार वृि, शुष्क भार, लंबाइर् क्षेत्रापफल, आयतन तथा कोश्िाकाओं की संख्या आदि। आपको यह जानकर आश्चयर् होगा कि एक मक्के की मूल श्िाखाग्र विभज्योतक में प्रति घंटे 17, 500 या अध्िक नइर् कोशकाएं पैदा हो सकती हैं, जबकि एक तरबूज में कोश्िाकाओं की आकार में वृि 3, 50, 000 गुना तक हो सकती है। पहले वाले उदाहरण में वृि को कोश्िाकाओं की संख्या में वृि के रूप व्यक्त किया गया है, जबकि बाद वाले में वृि को कोश्िाका के आकार में बढ़ोत्तरी के रूप में किया गया है। एक पराग नलिका की वृि, लंबाइर् में बढ़त का एक अच्छा मापदंड है, जबकि पृष्ठाधर पत्ती की वृि को उसके पृष्ठीय क्षेत्रापफल की बढ़त के रूप में मापा जा सकता है। 15.1.3 वृि के चरण वृि की अवध्ि को मुख्यतः तीन चरणों में बाँटा गया हैऋ विभज्योतकीय, दीघीर्करण एवं परिपक्वता ;चित्रा - 15.3द्ध। आओ, हम इसे मूलाग्र को देख कर समझें। विभज्योतकीय चरण में कोश्िाकाएं मूल श्िाखाग्र तथा प्ररोह श्िाखाग्र दोनों में लगातार विभाजित होती हैं। इन क्षेत्रों की कोश्िाकाएं जीवद्रव्य से भरपूर होती हैं और व्यापक संलक्ष्य केंद्रक को अध्िकृत किए होती हंै। उनकी कोश्िाका भ्िािा प्राथमिक, पतली तथा प्रचुर जीवद्रव्य तंतु संयोजन के साथ सेलुलाजिक होती है। विभज्योतक क्षेत्रा के समीपस्थ ;ठीक प्ररोह अग्रस्थ विभज्योतक प्ररोह संवहनी वैंफबियम संवहनी वैंफबियम मूल मूल अग्रस्थ विभज्योतक चित्रा 15.2 मूल अग्रस्थ विभज्योतक, प्ररोह अग्रस्थ विभज्योतक तथा संवहनी वैंफबियम का आरेख निरुपण। कोश्िाका और वृि की दिशा को दिखाते हुए तीर। व लरय द स ब अ चित्रा 15.3 दीघीर्करण क्षेत्रा का पहचान समानांतर रेखा तकनीक द्वारा। क्षेत्रा अ, ब, स, द जो शीषर् के पीछे हैं सबसे ज्यादा दीघीर्कृत हुए हैं। पादप वृि एवं परिवध्र्न अतः एक पौध्े के जीवन में वृि, विभेदन और परिवध्र्न बहुत ही निकट संबंध् रखने वाली घटनाएं हैं। व्यापक तौर पर परिवध्र्न को वृि एवं विभेदन के योग के रूप में माना जाता है। पौधें में परिवध्र्न अथार्त् वृि एवं विभेदन दोनों आंतरिक एवं बाह्य कारकों से नियंत्रिात है। आंतरिक कारकों में अंतरकोश्िाकीय आनुवंश्िाक तथा अंतर कोश्िाकी कारक ;जैसे की पादप वृि नियामक रसायनद्ध शामिल होते हैं, जबकि बाह्य कारकों के अंतगतर् प्रकाश, तापक्रम, जल, आॅक्सीजन तथा पोषक आदि शामिल होते हैं। 15.4 पादप वृि नियामक 15.4.1 विश्िाष्टताएं पादप वृि नियामक विविध् रासायनिक संघटनों वाले साधरण तथा लघु अणु होते हैं। ये इंडोल सम्िमश्रण ;इंडोल - 3 एसिटिक अम्ल, आइर् ए एद्धऋ ऐडनीन व्युत्पन्न पफरफ्रयुराइल ऐमिनो प्युरीन काइनटिनद्ध केराटिनायड तथा वसा अम्लों के व्युत्पन्नक ;एंसीसिक एसिड, ए बी एद्ध, टपीर्न ;जिबेरेलिक एसिड, जी एद्ध या गैसेस ;एथीलिन ब्2 भ्4द्ध आदि हो सकते हैं। पादप वृि नियामक को पाठय सामग्री में, पादप वृि तत्व, पादप हामोर्न तथा पफाइटोहामोर्न के नाम से वण्िार्त किया गया है। पादप वृि नियामक ;पी जी आरद्ध को व्यापक रूप से एक जीवित पौध्े में उनकी कायर्शीलता के आधर पर दो समूहों में बाँटा जा सकता है। पीजीआर का एक समूह वृि उन्नयन ियाकलापों में लगा होता है जैसे कि कोश्िाका विभाजन, कोश्िाका प्रसार, प्रतिमान संरचना, ट्रापिक ;अनुवतर्नीद्ध वृि, पुष्पन, पफलीकरण तथा बीज संरचना आदि। इन्हें पादप वृि नियामक भी कहा जाता है जैसे कि आॅक्िसंस, जिब्बेरेलिंस तथा साइटोकिनिंस। उनके समूह के दूसरे पीजीआर तथा दवाब के प्रति पादपों की अनुिया समूह के दूसरे पीजीआर में महत्वपूणर् भूमिका निभाते हैं। इसके साथ ही वे विभ्िान्न वृि वाध्क कियाकलापों जैसे प्रसुप्ित एवं विलगन में भी शामिल होते हैं। एबसीसिक एसिड पीजीआर इसी समुह का सदस्य है। गैसीय पी जी आर, एथीलिन किसी भी समूह के साथ बैठ जाता है लेकिन व्यापक तौर पर यह एक वृि बाध्क िया कलापों में आता है। 15.4.2 पादप वृि नियामकों की खोज रोचक बात यह है कि पीजीआर के पाँच प्रमुख समूहों में प्रत्येक की खोज मात्रा एक संयोग है। इसकी शुरूआत चाल्सर् डारविन और उनके पुत्रा Úांसिस डारविन के अवलोकन से हुइर् जब उन्होंने देखा कि कनारी घास का प्रांवुफर चोल ;कोलियोपटाइलद्ध एकपाश्वीर् प्रदीपन के प्रति अनुिया करता है और प्रकाश के उद्गम की तरपफ वृि ;प्रकाशानुवतर्नद्ध करता है। प्रयोगों की एक लंबी शृंखला के पश्चात, यह निष्कषर् निकाला गया कि प्रांवुफर चोल की अ ब स द नोक संचारणीय प्रवाह की जगह है जो स्ंापूणर् प्रांवुफर चोल के मुड़ने का कारण है ;चित्रा 15.10द्ध। आॅक्िसन की चित्रा 15.10 प्रांवुफर चोल का अग्रभाग पादप वृि नियामक आॅक्सीजन का उद्गम पादप वृि एवं परिवध्र्न से प्रायः पाश्वर् कलियों की वृि होती है ;देखें चित्रा 15.11द्ध। यह बात व्यापक रूप से चाय रोपण एवं बाड़ बनाने ;हेज मेकिंगद्ध में लागू होती है। क्या आप बता सकते हैं, क्यों? इसके साथ ही आक्िसंस अनिषेकपफलन को प्रेरित करता है जैसे कि टमाटर में। इन्हें व्यापक रूप से शाकनाशी के रूप में उपयोग किया जाता है। 2, 4 - डी, व्यापक रूप से द्विबीजपत्ती खरपतवारों का नाश कर देता हैऋ लेकिन एकबीजपत्ती परिपक्व पौधें को प्रभावित नहीं करता है। इसका उपयोग मालियों के द्वारा लाॅन को तैयार करने में किया जाता है। इसके साथ ही आॅक्िसंस जाइलम विभेदन को नियंत्रिात करने तथा कोश्िाका के विभाजन में मदद करता है। चित्रा 15.11 ;अद्ध पादपों में शीषर्स्थ प्रभाविता ;अद्ध अग्रस्थ कलिका की उपस्िथति कक्षस्थ कलिका में ;बद्ध 15.4.3.2 जिब्वेरेलिंस वृि को रोकती है ;बद्ध अग्रस्थ कलिका जिब्वेरेलिंस एक अन्य प्रकार का प्रोत्साहक पी जी आर है। सौ से अध्िक जिब्वेरेलिंस की सूचना विभ्िान्न जीवों का लंबवत काट, कक्षस्थ कलिका से छत्राक हटाने के बाद शाखाओं के रूप में वृि से आ चुकी है जैसे कि कवकों और उच्च पादपों से। 1 12 23 3इन्हें जी ए;ळ। द्धजी ए;ळ। द्धजी ए;ळ। द्धऔर इसी तरह से नामित किया गया है।हालांकि जी ए3 वह जिबेरलिंस है जिसकी सबसे पहले खोज की गइर् थी और अभी भी सभी से अध्िक सघनता से अध्ययन किया जाने वाला स्वरूप है। सभी जी ए एस ;ळ।ेद्ध अम्लीय होते हंै। ये पौधें में एक व्यापक दायरे की कायिकीय अनुिया देते हैं। ये अक्ष की लंबाइर् बढ़ाने की क्षमता रखते हैं, अतः अंगूर के डंठल की लंबाइर् बढ़ाने में प्रयोग किये जाते हैं। जिब्वेरेलिंस सेव जैसे पफलों को लंबा बनाते हैं ताकि वे उचित रूप ले सवेंफ। ये जरावस्था को भी रोकते हैं, ताकि पफल पेड़ पर अध्िक समय तक लगे रह सवंेफ और बाजार में मिल सवेंफ। जी ए3 ;ळ।3द्ध को आसव ;शराबद्ध उद्योग में माल्िटंग की गति बढ़ाने के लिए उपयोग किया जाता है। गन्ने के तने में काबार्ेहाइड्रेट्स चीनी या शवर्फरा के रूप में एकत्रा रहता है। गन्ने की खेती में जिब्बेरेलिंस छिड़कने पर तनों की लंबाइर् बढ़ती है। इससे 20 टन प्रति एकड़ ज्यादा उपज बढ़ जाती है। जी ए छिड़कने पर किशोर शंवुफवृक्षों में परिपक्वता तीव्र गति से होती है अतः बीज जल्दी ही तैयार हो जाता है। जिब्बेरेलिंस चुवंफदर, पत्तागोभी एवं अन्य रोजेटी स्वभाव वाले पादपों में वोल्िंटग ;पुष्पन से पहले अंतःपवर् का दीघीर्करणद्ध को बढ़ा देता है। 15.4.3.3 साइटोकिनिंस साइटोकिनिंस अपना विशेष प्रभाव साइटोकिनेसिस ;कोश्िाकाद्रव्य विभाजनद्ध में डालता है और इसे काइनेटिन;एडेनिन का रूपांतरित रूप एक प्युरीनद्ध के रूप में आटोक्लेबड्र हेरिंग के शुक्राणु से खोजा गया था। काइनेटिन पौधें में प्राकृतिक रूप से नहीं पाया जाता है। साइटोकिनिन जैसे पदाथोर्ं की खोज के क्रम में मक्का की अष्िठ तथा नारियल दूध् से

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