उच्च पादपों में प्रकाश - संश्लेषण बनाने का प्रयोग को किया होगा। स्टाचर् के लिए इन पिायों के परीक्षण से यह बात प्रकट होती है कि प्रकाश - संश्लेषण िया सूयर् के प्रकाश में पेड़ के केवल हरे भाग में संपन्न होती है। आपने एक अन्य प्रयोग आध्ी पत्ती से किया होगा जिसमें एक पत्ती का आंश्िाक भाग परखनली के अंदर रखा होगा और इसमें ावी से भीगी हुइर् रूइर् भी रखी होगी ;ज्ञव्भ् ब्व्2 को अवशोष्िात करता हैद्ध जबकि शेष भाग को प्रकाश में रहने दिया होगा। इसके बाद इस उपकरण को वुफछ समय के लिए ध्ूप में रखा जाता है। वुफछ समय के बाद आप स्टाचर् के लिए पत्ती का परीक्षण करते हों। इस परीक्षण से आपको पता लगा कि पत्ती का जो भाग परखनली में था, उसने स्टाचर् की पुष्िट ;अद्ध ;बद्ध नहीं की और जो भाग प्रकाश में था, उसने स्टाचर् की पुष्िट की। इस प्रयोग से यह सि( होता है कि प्रकाश - संश्लेषण के लिए काबर्नडाइआॅक्साइड ;ब्व्2द्ध आवश्यक है। क्या आप इसका वणर्न कर सकते हो कि ऐसा निष्कषर् किस प्रकार निकाला जा सकता है? 13.2 प्रारंभ्िाक प्रयोग उन साधरण प्रयोगों के विषय में जानना कापफी रुचिकर होगा जिनसे प्रकाशसंश्लेषण की प्रिया क्रमिक विकसित हुइर् है। जोसेपफ प्रीस्टले ;1733 - 1804द्ध ने 1770 में बहुत से प्रयोग किए जिनसे पता लगा कि हरे पौधें की वृि में हवा ;सद्ध ;दद्धकी एक अनिवायर् भूमिका है। आप को याद होगा कि प्रीस्टले चित्रा 13.1 प्रीस्टले का प्रयोगने 1774 में आॅक्सीजन की खोज की थी। प्रीस्टले ने देखा कि एक बंद स्थान - जैसे कि एक बेलजार में जलने वाली मोमबत्ती जल्दी ही बुझ जाती है ;चित्रा 13.1 अ,ब,स,दद्ध। इसी प्रकार किसी चूहे का सीमित स्थान में जल्दी ही दम घुट जाएगा। इन अवलोकनों के आधर पर उन्होंने यह निष्कषर् निकाला कि चाहे जलती मोमबत्ती हो अथवा कोइर् प्राणी जो वायु से साँस लेते हैं, वे हवा को क्षति पहुँचाते हैं। लेकिन जब उसने उसी बेल जार में एक पुदीने का पौध रखा तो उसने पाया कि चूहा जीवित रहा और मोमबत्ती भी सतत जलती रही। इस आधर पर प्रीस्टले ने निम्न परिकल्पना कीः ‘‘पौध्े उस वायु की क्षतिपूतिर् करते हैं, जिन्हें साँस लेने वाले प्राणी और जलती हुइर् मोमबत्ती कम कर देती है।’’ क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि प्रीस्टले ने प्रयोग करने के लिए एक मोमबत्ती एवं पौध्े का उपयोग वैफसे किया होगा? याद रखें कि उसे मोमबत्ती को वुफछ दिनों बाद पुनः जलाने की आवश्यकता होगी ताकि यह पता कर सके कि वुफछ दिनों बाद वह जलेगी अथवा नहीं। सेटअप को बिना बाध्ित किए आप मोमबत्ती को जलाने के लिए कितनी विध्ियों के बारे में सोच सकते हो? जाॅन इंजेनहाउज;1730 - 1799द्ध ने प्रीस्टले द्वारा निमिर्त जैसे सेटअप का उपयोग किया जिसमें उसने उसे एक बार अंध्ेरे में और पिफर एक बार सूयर् की रोशनी में रखा। जीव विज्ञान अतः जैव संश्लेषण चरण को अप्रकाशी अभ्िािया ;डावर्फ रिएक्शनद्ध कहना क्या एक मिथ्या है? अपने साथ्िायों के बीच इसकी चचार् करें। आइए अब देखें कि जैव संश्लेषण चरण में एटीपी तथा एनएडीपीएच का उपयोग वैफसेे होता है? हम पहले देख चुवेंफ हैं कि भ्व् के साथ ब्व् के मिलने से ;ब्भ्व्द्ध222द अथवा शवर्फरा उत्पादित होती है। यह वैज्ञानिकों की रुचि थी कि उन्हांेने यह खोजा कि यह प्रतििया वैफसे संपन्न होती है अथवा यह जाना कि ब्व्2 के प्रतििया में आने से अथवा यौगिकीकृत होने से कौन सा पहला उत्पाद बनता है। द्वितीय विश्व यु( के ठीक बाद, लाभदायी उपयोग हेतु रेडियो आइसोटोपिक का उपयोग किया गया। इस उपयोग में मेलविन केल्िवन का कायर् सराहनीय था। उन्होंने शैवाल में रेडियो एक्िटव 14ब् का उपयोग प्रकाश - संश्लेषण अध्ययन में किया, जिससे पता लगा कि ब्व् 2यौगिकीकरण ;पिफक्सेशनद्ध पहला उत्पाद एक 3 काबर्न वाला काबर्निक अम्ल था। इसके साथ ही उसने संपूणर् जैव संश्लेषण पथ की खोज की अतः इसे केल्िवन चक्र कहते हैं। इस पहले उत्पाद का नाम 3 - पफोस्पफोग्िलसेरिक अम्ल अथवा संक्षेप में पीजीए है। इसमें कितने काबर्न परमाणु होते हैं? वैज्ञानिकों ने जानने का यह भी प्रयत्न किया कि क्या सभी पौध्े ब्व् 2यौगिकीकरण ;स्िथरीकरणद्ध के बाद पहला उत्पाद पीजीए ही बनाते हंै अथवा पिफर अन्य पौधें में कोइर् अन्य उत्पाद हैं। बहुत सारे पौधें में व्यापक शोध् किए गए, जहाँ पर ब्व् 2 के यौगिकीकरण का पहला स्थायी उत्पाद पुनः एक काबर्निक अम्ल था, जिसमें काबर्न के चार परमाणु थे। यह अम्ल ओक्सैलोएसिटिक अम्ल अथवा ओएए था। तब से प्रकाश - संश्लेषण के दौरान ब्व्2के स्वांगीकरण ;एसिमिलेशनद्ध को दो मुख्य विध्ियों से बताया गया। जिन पौधें में, ब्व्2यौगिकीकरण का पहला उत्पाद ब्3 अम्ल ;च्ळ।द्ध था उसे ब् पथ और जिनका पहला उत्पाद ब् अम्ल ;ओएएद्ध था, उसे ब् पथ कहते हैं। इन दोनों3 4 4 समूह के पौधें में वुफछ अन्य अभ्िालक्षण भी होते हैं, जिनकी चचार् हम बाद में करेंगे। 13.7.1 ब्व्2 के प्राथमिकग्राही आइए, अब हम अपने आप से एक प्रश्न पूछें, जिसे कि उन वैज्ञानिकों द्वारा पूछा गया था जो अप्रकाशी अभ्िािया को समझने के लिए संघषर् कर रहे थे। उस अणु में कितने काबर्न परमाणु हैं जो ब्व्2 को ग्राह्य करने के बाद तीन काबर्न यौगिक ;अथार्त् पीजीएद्ध बनाते हैं? अध्ययनों से पता लगा कि ग्राही अणु एक पाँच काबर्न वाला कीटोज शुगर ;शवर्फराद्ध था, यह रिब्यूलोज 1 - 5 बिसपफोस्पफेट ;त्नठच्द्ध था। क्या आपमंे से किसी ने इस संभावना के बारे में सोचा था? परेशान मत होइएऋ वैज्ञानिकों को भी इसे जानने में बहुत समय लगा और किसी निष्कषर् पर पहुँचने से पहले बहुत सारे प्रयोग किए गए थे। उन्हें यह भी यकीन था कि, चूँकि पहला उत्पाद ब्3अम्ल था, अतः प्राथमिकग्राही 2 काबर्न कंपाउंड ;यौगिकद्ध होगा। उन्हांेने पहले 2 काबर्न कम्पाउंड को पहचानने के लिए कइर् वषर् तक प्रयत्न किए। अंततः उन्होंने पाँच काबर्न वाले त्नठच् की खोज करने में सपफलता प्राप्त की। जीव विज्ञान केल्िवन चक्र को आसानी से समझने के लिए इसको तीन चरणों - काबोर्क्िसलीकरण ;काबोर्क्सीलेशनद्ध, रिडक्शन तथा रिजनरेशन में वणर्न करते हैं। 1.काबोर्क्िसलीकरण - ब्व्2 के यौगिकीकरण से एक स्िथर काबर्निक मध्यस्थ बनता है। केल्िवन चक्र में काबोर्क्िसलीकरण एक अत्यध्िक निणार्यक चरण है जहाँ त्नठच् के काबोर्क्िसलीकरण के लिए ब्व्2 का उपयोग किया जाता है। यह प्रतििया एंजाइम त्नठच् काबोर्क्िसलेस के द्वारा उत्प्रेरित होती है, जिसके परिणामस्वरूप 3 - च् ळ। के दो अणु बनते हैं। चूँकि इस एंजाइम में एक आॅक्सीजिनेशन ;आॅक्सीकरणद्ध क्षमता भी होती है, अतः यह ज्यादा उचित होगा कि हम इस एंजाइम को त्नठच् काबोर्क्सीलेस - आॅक्सीजिनेस अथवा रुबिस्को कहें। 2.रिडक्शन ;अपचयनद्ध यह प्रतिियाओं की एक शृंखला है जिसमें ग्लूकोज बनता है। इस चरण में प्रत्येक ब्व्2 अणु के स्िथरण हेतु एटीपी के 2 अणुओं का उपयोग पफाॅस्पफोरिलेशन के लिए तथा एनएडीपीएच के दो अणुओं का उपयोग अपचयन हेतु होता है। पथ से ग्लूकोज के एक अणु को बनाने के लिए ब्व्2 के 6 अणुओं के यौगिकीकरण तथा चक्करों की आवश्यकता होती है। 3.रिजेनरेशन ;पुनरुद्भवनद्ध यदि चक्र को बिना बाध के जारी रहना है तो ब्व् 2 ग्राही अणु त्नठच् का पुनरुद्भवन बहुत ही आवश्यक होता है। पुनरुद्भवन के चरण में त्नठच् गठन हेतु पफाॅस्पफोरीलेशन के लिए एक एटीपी की आवश्यकता होती है। इसलिए, केल्िवन चक्र में ब्व्2 के प्रत्येक अणु को प्रवेश के लिए एटीपी के 3 अणु तथा एनएडीपीएच के 2 अणुओं की आवश्यकता होती है। अप्रकाश अभ्िािया में उपयोग होने वाले एटीपी और एनएडीपीएच की संख्याओं में यह अंतर ही चक्रीय पफाॅस्पफोरीलेशन को संपन्न कराने का कारण है। ग्लूकोस के एक अणु की रचना के लिए इस चक्र के 6 चक्करों की आवश्यकता होती है। यह पता करें कि केल्िवन पथ के माध्यम से ग्लूकोस के एक अणु की रचना के लिए कितने एटीपी तथा एनएडीपीएच के अणुओं की आवश्यकता होती है। आपको यह बात शायद समझने में मदद करेगी कि केल्िवन चक्र में क्या अंदर जाता है और क्या बाहर निकलता है। अंदर बाहर6 ब्व्2 एक ग्लूकोज18 एटीपी 18 एडीपी12 एनएडीपीएच 12 एनएडीपी 13.8 पथ ब्4 ब्4पथ जैसा कि पहले बताया गया है कि पौध्े जो शुष्क उष्णकटिबंध्ी क्षेत्रा में पाए जाते हैं उनमें ब्4 पथ होता है। इन पौधें में ब्व् 2 को यौगिकीकरण का पहला उत्पाद यद्यपि ब्4 औक्जेलोएसिटिक अम्ल होता है पिफर भी इनके मुख्य जैव संश्लेषण पथ में ब्3 पथ उच्च पादपों में प्रकाश - संश्लेषण अथवा केल्िवन चक्र ही होता है। तब पिफर सेे ब्3 पौधें से किस प्रकार में भ्िान्न हैं? यह एक प्रश्न है जिसे आप पूछ सकते हैं। ब्4 पौध्े विश्िाष्ट हैंः इनकी पिायों में एक विशेष प्रकार की शारीरिकी होती है। ये उच्च ताप को सह सकते हैं। ये उच्च प्रकाश तीव्रता के प्रति अनुिया करते हैं। उनमें प्रकाश श्वसन प्रिया नहीं होती और उनमें जैव भार अध्िक उत्पन्न होता है। आइए, इन्हें एक - एक करके समझें। आओ, ब्3 तथा ब्4 पिायों की खड़ी काट का अध्ययन करें। क्या आपने इन दोनों में कोइर् अंतर देखा है? क्या दोनों में एक ही प्रकार के पणर्मध्योतक हैं? क्या इनके संवहनी पूलाच्छद के आस - पास एक ही प्रकार की कोश्िाकाएं हैं? ब्4 पथ पौधें की संवहन बंडल के चारों ओर स्िथत बृहद् कोश्िाकाएं पूलाच्छद ;बंडल शीथद्ध कोश्िाकाएं कहलाती है और पिायाँ जिनमें ऐसी शारीर होती है, उन्हें क्रैंजी शारीर वाली पिायाँ कहते हैं। यहाँ, क्रैंज का अथर् है छल्ला अथवा घेरा, चूँकि कोश्िाकाओं की व्यवस्था एक छल्ले के रूप में होती है। संवहन बंडल के आस - पास पूलाच्छद कोश्िाकाओं की अनेकों परतें होती हैं, इनमें बहुत अध्िक संख्या में क्लोरोप्लास्ट होते हैं, इसकी मोटी भ्िािायाँ गैस से अप्रवेश्य होती हैं और इनमें अंतरकोशीय स्थान नहीं होता। आप ब्4 पौधें जैसे मक्का अथवा ज्वार की पिायों का एक भाग काटो, ताकि क्रैंज शारीर एवं पणर्मध्योतक देख सकें। अपने आस - पास के विभ्िान्न स्पेशीज के पेड़ों की पिायाँ एकत्रा करें और उनकी पिायों की खड़ी काट लें। सूक्ष्मदशीर् से इसके संवहन बंडल पूल के आस - पास पूलाच्छद को देखें। पूलाच्छद की उपस्िथति ब्4 पौधें को पहचानने में आपकी सहायता करेगा। अब चित्रा 13.9 में दिखाए गए पथ का अध्ययन करें। इस पथ को हैच एवं स्लैल पथ कहते हैं। यह भी एक चक्रीय प्रिया है। आइए, हम चरणों को समझते हुए पथ का अध्ययन करें। ब्व् 2 का प्राथमिक ग्राही एक 3 काबर्न अणु पफोस्पफोइनोल पाइरुवेट ;च्म्च्द्ध है और वह पणर्मध्योतक कोश्िाका में स्िथत होता है। इस यौगिकीकरण को पेप काबोर्क्सीलेस अथवा पेप केस ;च्म्च्द्ध नामक एंजाइम संपन्न करता है। पणर्मध्योतक कोश्िाकाओं में रुबिस्को एंजाइम नहीं होता है। ब्4 अम्ल ओएए पणर्मध्योतक कोश्िाका में निमिर्त होता है। जीव विज्ञान इसके बाद ये पणर्मध्योतक कोश्िाका में अन्य 4 - काबर्न वाले अम्ल जैसे मैलिक अम्ल और एस्पाटिर्क अम्ल बनते हैं, जोकि पूलाच्छद कोश्िाका में चले जाते हैं। पूलाच्छद कोश्िाका में यह ब्4 अम्ल विघटित हो जाता है जिससे ब्व्2 तथा एक 3 - काबर्न अणु मुक्त होते हैं। 3 - काबर्न अणु पुनः पणर्मध्योतक में वापस आ जाता है, जहाँ यह पुनः पेप में बदला जाता है और इस तरह से यह चक्र पूरा होता है। पूलाच्छद कोश्िाका से निकली ब्व्2 केल्िवन पथ अथवा ब्3 में प्रवेश करती है केल्िवन एक ऐसा पथ जो सभी पौधें में समान रूप से होता है। पूलाच्छद कोश्िाका रुबिस्को से भरपूर होती है, परंतु पेप केस से रहित होती है। अतः मौलिक पथ केल्िवन पथ जिसके परिणामस्वरूप शवर्फरा बनती है, वह ब्3 एवं ब्4 पौधें में सामान्य रूप से होता है। क्या आपने ध्यान दिया है कि केल्िवन पथ सभी ब्3 पौधें की पणर्मध्योतक कोश्िाकाओं में पाया जाता है? ब्4 पौधें में पणर्मध्योतक कोश्िाकाओं में यह संपन्न नहीं होता है, किंतु पूलाच्छद कोश्िाकाओं में केवल कारगर होता है। 13.9 प्रकाश श्वसन ;पफोटोरेस्िपरेशनद्ध आइए, हम एक और प्रिया - प्रकाश श्वसन को जानने का प्रयत्न करते हैं, जो ब्3 एवं ब्4 पौधें में महत्वपूणर् अंतर करती है। प्रकाश श्वसन समझने के लिए, हमें केल्िवन पथ के प्रथम चरण अथार्त् ब्व्2 स्िथरीकरण के पहले चरण के विषय में वुफछ अध्िक जानकारी करनी होगी। यह वह अभ्िािया है जहाँ त्नठच् काबर्न डाइर्आॅक्साइड से संयोजित कर 3 पीजीए के 2 अणुओं का गठन करता है और एक एंजाइम रिबूलोज विसपफोस्पफेट काबोर्क्सीलेस आॅक्सीजिनेस ;त्नठपेब्व्द्ध के द्वारा उत्प्रेरित होता है। रुबिस्कोत्नठच् ़ ब्व् ⎯⎯⎯⎯⎯⎯→ 2ग3च्ळ। 2 रुबिस्को नामक एंजाइम विश्व में सबसे ज्यादा प्रचुर है ;आपको आश्चयर् होता है क्यों?द्ध और इसका यह गुण है कि इसकी सिय जगह ब्व्2 एवं व्2 दोनों से बंिात हो सकता है। इसलिए इसे रुबिस्को कहते हैं। क्या आप सोच सकते हैं कि यह केसे संभव है? रुबिस्को में व्2 की अपेक्षा ब्व्2 के लिए अध्िक बंध्ुता है। कल्पना कीजिए कि यदि ऐसा नहीं होता तो क्या होता! यह आबंध्ता प्रतियोगितात्मक है। व्2 अथवा ब्व्2 इनमें से कौन आबंध् होगा, यह उनकी सापेक्ष सांद्रता पर निभर्र करता है। ब्पौधें में वुफछ व्रुबिस्को से बंध्ित होती है अतः ब्व्का यौगिकीकरण32 2 कम हो जाता है। यहाँ पर आरयुबीपी 3 - च्ळ। के अणुओं में पतिवतिर्त होने की बजाय आॅक्सीजन से संयोजित होकर चक्र में एक पफास्पफोग्िलसरेट अणु तथा पफाॅस्पफोग्लाइकोलेट का एक अणु बनाते हैं जिसे प्रकाश श्वसन कहते हैं। प्रकाश श्वसन पथ में शवर्फरा और एटीपी का संश्लेषण नहीं होताऋ बल्िक इसमें एटीपी के उपयोग के साथ ब्व्2 भी निकलती है। प्रकाश श्वसन पथ में एटीपी अथवा एनएडीपीएच का संश्लेषण नहीं होता। अतः प्रकाश श्वसन एक निरथर्क प्रिया है। जीव विज्ञान ब्4 पौध्े में प्रकाश श्वसन नहीं होता है। इसका कारण यह है कि इनमें एक ऐसी प्रणाली होती है जो एंजाइम स्थल पर ब्व् 2 की साद्र्रंता बढ़ा देती है। ऐसा तब होता है जब पणर्मध्योतक का ब्4 अम्ल पूलाच्छद में टूटकर ब्व् 2 को मुक्त करता है, जिसके परिणामस्वरूप ब्व्2 की अंतरकोश्िाकीय संाद्रता बढ़ जाती है। इससे यह सुनिश्िचत हो जाता है कि रुबिस्को काबोर्क्सीलेस के रूप में कायर् करता है, जिससे इसकी आॅक्सीजिनेस के रूप में कायर् करने की क्षमता कम हो जाती है। अब, आप जानते है कि ब्4 पौधें में प्रकाश श्वसन नहीं होता। अब संभवतः आप समझ गए होंगे कि इन पौधें में उत्पादकता एवं उत्पादन क्यों अच्छा होता है। इसके अतिरिक्त ये पौध्े उच्च ताप को भी सहन कर सकते हैं। उपयुर्क्त परिचचार् के आधर पर क्या आप उन पौधें की तुलना कर सकते हो जिसमें ब्3 तथा ब्4 पथ होता है। आप दी गइर् तालिका का उपयोग कर आवश्यक सूचनाओं को भरें। 13.10 प्रकाश - संश्लेषण को प्रभावित करने वाले कारक प्रकाश - संश्लेषण को प्रभावित करने वाले कारकों के विषय में जानना आवश्यक है। प्रकाश - संश्लेषण की दर पौधें एवं पफसली पादपों के उत्पादन जानने में अत्यंत ही महत्वपूणर् है। प्रकाश - संश्लेषण कइर् कारकों से प्रभावित होता है जो बाह्य तथा आंतरिक दोनों ही हो सकते हैं। पादप कारकों में संख्या, आकृति, आयु तथा पिायों का विन्यास, पणर्मध्योतक कोश्िाकाएं तथा क्लोराप्लास्ट आंतरिक ब्व्2 की संाद्रता और क्लोरापिफल की मात्रा आदि है। पादप अथवा आंतरिक कारक पौध्े की वृि तथा आनुवंश्िाक पूवार्नुकूलता पर निभर्र करते हैं। बाह्य कारक हैं सूयर् का प्रकाश, ताप, ब्व्2 की संाद्रता तथा जल। पादप की प्रकाश - संश्लेषण प्रिया में ये सभी कारक एक समय में साथ - साथ ही प्रभाव डालते हैं। यद्यपि, बहुत सारे कारक प्रकाशसंश्लेषण की दरपरस्पर िया करते हैं तथा साथ - साथ प्रकाश - संश्लेषण अथवा ब्व् 2 के यौगिकीकरण को प्रभावित करते हंै, पिफर भी प्रायः इनमें से कोइर् भी एक कारक इस की दर कोख ग प्रभावित अथवा सीमित करने का मुख्य कारण बन जाताच है। अतः किसी भी समय पर उपानुकूलतम स्तर पर उपलब्ध् कारक द्वारा प्रकाश - संश्लेषण की दर का निधर्रण होगा। जब अनेक कारक किसी ;जैवद्ध रासायनिक प्रिया को प्रभावित करते हैं तो ब्लैकमैन का ;1905द्ध लाॅ आॅपफ लिमिटिंग पफैक्टसर् प्रभाव में आता है। इसके अनुसारः घ यदि कोइर् रासायनिक प्रिया एक से अध्िक कारकों द्वारा प्रभावित होती है तो इसकी दर का निधर्रण उस समीपस्थचित्रा 13.10 प्रकाश की तीव्रता का प्रकाशसंश्लेषण कारक द्वारा होगा जो कि न्यूनतम मान ;मूल्यद्ध वाला हो।के प्रति दर पर प्रभाव का ग्रापफ

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