कोश्िाका चक्र और कोश्िाका विभाजन है। कोश्िाका विभाजन के दौरान, प्रतिकृति गुणसूत्रा ;डीएनएद्ध जटिल घटना क्रम के द्वारा संतति वेंफद्रकों में वितरित हो जाते हैं। ये सारी घटनाएं आनुवंश्िाक नियंत्राण के अंतगर्त होती हंै। 10.1.1 कोश्िाका चक्र की प्रावस्थाएं एक प्ररूपी ;यूकेरियोटिकद्ध चक्र का उदाहरण मनुष्य की कोश्िाका के संव(र्न में होता है, जो लगभग प्रत्येक चैबीस घंटे में विभाजित होती है ;चित्रा 10.1द्ध। यद्यपि कोश्िाका चक्र की यह अविा एक जीव से दूसरे जीव एवं कोश्िाका से दूसरी कोश्िाका प्रारूप के लिए बदल सकती है। उदाहरणाथर् - यीस्ट के कोश्िाका चक्र के पूणर् होने में लगभग नब्बे मिनट लगते हैं। कोश्िाका चक्र की दो मूल प्रावस्थाएं होती हैंः चित्रा 10.1 कोश्िाका चक्र का चित्रात्मक दृश्य जो एक कोश्िाका1.अंतरावस्था ;प्दजमतचींेमद्ध को दो कोश्िाकाओं के बनाने को इंगित करता है।2.एम प्रावस्था ;सूत्राी विभाजनद्ध ;डपजवेपे च्ींेमद्ध सूत्राी विभाजन ;एम अवस्थाद्ध उस अवस्था को व्यक्त करता है, जिसमें वास्तव में पादप व प्राणी अपने कोश्िाका विभाजन या समसूत्राी विभाजन होता है और अंतरावस्था दो क्रमिक एम जीवन काल वैफसे वृि करते प्रावस्थाओं के बीच की प्रावस्था को व्यक्त करता है। यह ध्यान देने योग्य महत्व की बात हैं? क्या पौधों में सभी है कि मनुष्य की कोश्िाका के औसतन अवध्ि चैबीस घंटे की कोश्िाका चक्र में कोश्िाका कोश्िाकाएं जीवन भर विभाजन सिपर्फ लगभग एक घंटे में पूणर् होता है, जिसमें कोश्िाका चक्र की वुफल अवध्ि विभाजित होती रहती हैं? क्या आप सोचते हैं किकी 95 प्रतिशत से अिाक की अवध्ि अंतरावस्था में ही व्यतीत होती है। वुफछ कोश्िाकाएं सभी पौधोंएम प्रावस्था का आरंभ वेंफद्रक के विभाजन ;वैफरियो काइनेसिसद्ध से होता है,जो एवं प्राण्िायों के जीवन मेंकि संगत संतति गणसूत्रा के पृथक्करण ;सूत्राी विभाजनद्ध के समतुल्य होता है और इसका हमेशा विभाजित होती रहतीअंत कोश्िाकाद्रव्य विभाजन ;साइटोकाइनेसिसद्ध के साथ होता है। अंतरावस्था को हैं? क्या आप उच्चकोटि के विश्राम प्रावस्था भी कहते हैं। यह वह प्रावस्था है जिसमें कोश्िाका विभाजन के लिए तैयार पादप मेें उस ऊतक का होती है तथा इस दौरान क्रमब( तरीके से कोश्िाका वृि व डीएनए का प्रतिकृतिकरण नाम व स्थान बता सकते हैं, दोनों होते हैं। जिसकी कोश्िाकाएं जीवन भर विभाजित होती रहतीअंतरावस्था को तीन प्रावस्थाओं में विभाजित किया गया है: हैं? शीषर्स्थ कोश्िाका मेंऽ पश्च सूत्राी अंतरकाल प्रावस्था ;ळ1 च्ींेमद्ध पाए जाने वाली कोश्िाकाऽ संश्लेषण प्रावस्था ;ै च्ींेमद्ध जीवन भर विभाजित होती ऽ पूवर् - सूत्राी विभाजन अंतरालकाल प्रावस्था ;ळ2 च्ींेमद्ध रहती है, इसलिए उन्हें पश्च सूत्राी अंतरकाल प्रावस्था ;जी1पेफसद्ध समसूत्राी विभाजन एवं डीएनए प्रतिकृतिकरण विभज्योतिकी ऊतक कहते के बीच अंतराल को प्रदश्िार्त करता है। जी1 प्रावस्था में कोश्िाका उपापचयी रूप से सिय हैं। क्या प्राण्िायों में भी ऐसा होती हैं एवं लगातार वृि करती है, परंतु इसका डीएनए प्रतिकृति नहीं करता। एस पेफस ही विभज्योतिकी ऊतक मिलता है?या संश्लेषण प्रावस्था के दौरान डीएनए का निमार्ण एवं इसकी प्रतिकृति होती है। इस दौरान डीएनए की मात्रा दुगुनी हो जाती है। यदि डीएनए की प्रारंभ्िाक मात्रा को 2 ब् से कोश्िाका चक्र और कोश्िाका विभाजन है। गुणसूत्राीय संघनन की प्रिया के दौरान ही गुणसूत्राीय द्रव्य स्पष्ट होने लगते हैं ;चित्रा 10.2 अद्ध। तारकवेंफद्र जिसका अतंरावस्था की ै प्रावस्था के दौरान ही द्विगुणन हुआ था, अब कोश्िाका के विपरीत धुव्रों की ओर चलना प्रारंभ कर देता है। पूवार्वस्था के पूणर् होने के दौरान जो महत्वपूणर् घटनाएं होती हैं उनकी निम्न विशेषताएं हैंः ऽ गुणसूत्राीय द्रव्य संघनित होकर ठोस गुणसूत्रा बन जाता है। प्रारंभ्िाक पूवार्वस्थागुणसूत्रा दो अधर्गुणसूत्रों से बना होता है, जो आपस में सेंट्रोमियर से जुड़े रहते हैं। ऽ समसूत्राी तवुर्फ, सूक्ष्म नलिकाओं के जमावड़े की प्रिया प्रारंभ हो जाती है। कोश्िाका जीवद्रव्य के ये प्रोटीनयुक्त घटक इस प्रिया में सहायता करते हैं। पूवार्वस्था के अंत में यदि कोश्िाका को सूक्ष्मदशीर् से देखा जाता है तो इसमें गाॅल्जीकाय, अंतदर््रव्यी जालिका, वेंफदि्रका व वेंफद्रक आवरण दिखाइर् नहीं देता है। पश्चपूवार्वस्था ;अद्ध10.2.2 मध्यावस्था वेंफद्रक आवरण के पूणर्रूप से विघटित होने के साथ समसूत्राी विभाजन की द्वितीय अवस्था प्रारंभ होती है, इसमें गुणसूत्रा कोश्िाका के कोश्िाका द्रव्य में पफैल जाते हैं। इस अवस्था तक गुणसूत्रों का संघनन पूणर् हो जाता है और सूक्ष्मदशीर् से देखने पर ये स्पष्ट रूप से दिखाइर् देने लगते हैं। यही वह अवस्था है जब गुणसूत्रों की आकृति का अध्ययन बहुत ही सरल तरीके से किया जा सकता है। मध्यावस्था गुणसूत्रा दो संतति अधर्गुणसूत्रों से बना होता है जो आपस मध्यावस्था की ओरमें गुणसूत्राबिंदु से जुडे़ होते हैं ;चित्रा 10.2बद्ध। गुणसूत्राबिंदु के सतह पर परिवतर्नएक छोटा बिंब आकार की संरचना मिलती है जिसे काइनेटोकोर कहते हैं। सूक्ष्म नलिकाओं से बने हुए तवर्ुफतंतु के जुड़ने का स्थान ये संरचनाएं ;काइनेटीकोरद्ध हैं, जो दूसरी ओर कोश्िाका के वेंफद्र में स्िथत गुणसूत्रा से जुडे़ होते हैं। मध्यावस्था में सभी गुणसूत्रा मध्यरेखा पर आकर स्िथत रहते हैं। प्रत्येक गुणसूत्रा का एक अध्र्गुणसूत्रा एक ध्रुव से तवर्ुफतंतु द्वारा अपने काइनेटोकोर के द्वारा जुड़ जाता है, वहीं इसका संतति अध्र्गुणसूत्रा तवर्ुफतंतु द्वारा अपने काइनेटोकोर से विपरीत धु्रव से जुड़ा होता है ;चित्रा 10.2 बद्ध। मध्यावस्था में जिस तल पर गुणसूत्रा पंक्ितब( हो जाते हैं, उसे मध्यावस्था मध्यावस्था पट्टिका कहते हैं। इस अवस्था की मुख्य विशेषता निम्नवत हैः ;बद्ध ऽ तवर्ुफतंतु गुणसूत्रा के काइनेटोकोर से जुड़े रहते हैं। चित्रा 10.2 अ एवं ब सूत्राी विभाजन की ऽ गुणसूत्रा मध्यरेखा की ओर जाकर मध्यावस्था पट्टिका पर अवस्थाओं का चित्रात्मक दृश्य पंक्ितब( होकर ध्रुवों से तवर्ुफतंतु से जुड़ जाते हैं। 166 जीव विज्ञान पश्चावस्था ;सद्ध अंत्यावस्था ;दद्ध अंतरावस्था ;यद्ध चित्रा 10.2 स से य सूत्राी विभाजन की अवस्थाओं का चित्रात्मक दृश्य 10.2.3 पश्चावस्था पश्चावस्था के प्रारंभ में मध्यावस्था पट्टिका पर आए प्रत्येक गुणसूत्रा एक साथ अलग होने लगते हैं, इन्हें संतति अध्र्गुणसूत्रा कहते हैं जो कोश्िाका विभाजन के बाद बनने वाले नए संतति वेंफद्रक का गुणसूत्रा बनेंगे, वे विपरीत धु्रवों की ओर जाने लगते हैं। जब प्रत्येक गुणसूत्रा मध्यांश पट्टिका से कापफी दूर जाने लगता है तब प्रत्येक का गुणसूत्राबिंदु ध्रुवों की ओर होता है जो गुणसूत्रों को ध्रुवों की ओर जाने का नेतृत्व करते हैं, साथ ही गुणसूत्रा की भुजाएं पीछे आती हैं ;चित्रा 10.2 सद्ध। पश्चावस्था की निम्न विशेषताएं है: ऽ गुणसूत्राबिंदु विखंडित होते हैं और अध्र्गुणसूत्रा अलग होने लगते हैं। ऽ अध्र्गुणसूत्रा विपरीत ध्रुवों की ओर जाने लगते हैं। 10.2.4 अंत्यावस्था सूत्राी विभाजन की अंतिम अवस्था के प्रारंभ में अंत्यावस्था गुणसूत्रा जो क्रमानुसार अपने ध्रुवों पर चले गए हैंऋ असंघनित होकर अपनी संपूणर्ता को खो देते हैं। एकल गुणसूत्रा दिखाइर् नहीं देता है व अध्र्गुणसूत्रा द्रव्य दोनों ध्रुवों की तरपफ एक समूह के रूप में एकत्रिात हो जाते हैं ;चित्रा 10.2 दद्ध। इस अवस्था की मुख्य घटनाएं निम्नवत हैंः ऽ गुणसूत्रा विपरीत घ्रुवों की ओर एकत्रिात हो जाते हैं और इनकी पृथक पहचान समाप्त हो जाती है। ऽ गुणसूत्रा समूह के चारों तरपफ वेंफद्रक झिल्ली का निमार्ण हो जाता है। ऽ वेंफदि्रका, गाॅल्जीकाय व अंतदर््रव्यी जालिका का पुननिर्मार्ण हो जाता है। 10.2.5 कोश्िाकाद्रव्य विभाजन ;ब्लजवापदमेपेद्ध सूत्राी विभाजन के दौरान द्विगुण्िात गुणसूत्रों का संतति वेंफद्रकों में संपृथकन होता है जिसे वेंफद्रक विभाजन ;ज्ञंतलवापदमेपेद्ध कहते हैं। कोश्िाका विभाजन संपन्न होने के अंत में कोश्िाका स्वयं एक अलग प्रिया द्वारा दो संतति कोश्िाकाओं में विभाजित हो जाती है, इस प्रिया को कोश्िाकाद्रव्य विभाजन कहते हैं ;चित्रा 102 यद्ध। प्राणी कोश्िाका का विभाजन जीवद्रव्यकला में एक खांच बनने से संपन्न होता है। खांचों के लगातार गहरा होने व अंत में वेंफद्र में आपस में मिलने से कोश्िाका का कोश्िाकाद्रव्य दो भागों में बँट जाता है। यद्यपि पादप कोश्िाकाएं जो अपेक्षाकृत अप्रसारणीय कोश्िाका भ्िािा से घ्िारी होती हैं अतः इनमें कोश्िाकाद्रव्य विभाजन दूसरी भ्िान्न प्रियाओं द्वारा संपन्न होता है। पादप कोश्िाकाओं में नइर् कोश्िाका भ्िािा निमार्ण कोश्िाका के वेंफद्र से शुरू होकर बाहर की ओर पूवर् स्िथत पाश्वर् कोश्िाका भ्िािा से जुड़ जाता है। नइर् कोश्िाकाभ्िािा निमार्ण एक साधरण पूवर्गामी रचना से प्रारंभ होता है जिसे कोश्िाका पट्टिका कहते हैं, जो दो सन्िनकट कोश्िाकाओं की भ्िािायों के बीच मध्य पट्टिका को दशार्ती है। कोश्िाकाद्रव्य विभाजन के समय कोश्िाका अंगक जैसे सूत्राकण्िाका ;माइटोकॅाडिªयाद्ध कोश्िाका चक्र और कोश्िाका विभाजन पूवार्वस्था - प् मध्यावस्था - प् पश्चावस्था - प् अंत्यावस्था - प् चित्रा 10.3 अ(र्सूत्राण की अवस्थाएं हैं। विनिमय बिंदु पर ग् आकार की संरचना को काएज्मेटा कहते हैं। वुफछ कशेरुकी प्राण्िायों के अडंकों में द्विपट्ट महीनों या वषोर्ं बाद समाप्त होती है। अध्र्सूत्राी पूवार्वस्था प् की अंतिम अवस्था पारगतिक्रम ;डायाकाइनेसिसद्ध कहलाती है। जिसमें काएज्मेटा का उपांतीभवन हो जाता है, जिसमें काएज्मेटा का अंत होेने लगता है। इस अवस्था में गुणसूत्रा पूणर्तया संघनित हो जाते हैं व तवर्ुफतंतु एकत्रिात होकर समजात गुणसूत्रों को अलग करने में सहयोग प्रदान करते हैं। पारगतिक्रम के अंत तक वेंफदि्रका अदृश्य हो जाती है और वेंफद्रक - आवरण झिल्ली भी विघटित हो जाता है। पारगतिक्रम मध्यावस्था की ओर पारगमन को निरूपित करता है। मध्यावस्था प्: युगली गुणसूत्रा मध्यरेखा पट्टिका पर व्यवस्िथत हो जाते हंै ;चित्रा 10.3द्ध। विपरीत ध्रुवों के तवर्ुफतंतु की सूक्ष्मनलिकाएं समजात गुणसूत्रों के जोड़ांे से अलग - अलग चिपक जाती हैं। पश्चावस्था प्: समजात गुणसूत्रा पृथव्फ हो जाते हैं, जबकि संतति अधर्गुणसूत्रा गुणसूत्राबिंदु से जुड़े रहते हंै ;चित्रा 10.3द्ध। अंत्यावस्था प्: इस अवस्था में वेंफद्रक आवरण व वेंफदि्रक पुनः स्पष्ट होने लगते हैं, कोश्िाकाद्रव्य विभाजन शुरू हो जाता है और कोश्िाका की इस अवस्था को कोश्िाका द्विक कहते हैं ;चित्रा 10.3द्ध। यद्यपि बहुत से मामलों मंे गुणसूत्रा का वुफछ छितराव हो जाता है जबकि अंतरावस्था वेंफद्रक में पूणर्तया पफैली अवस्था में नहीं मिलते हैं। दो अधर्सूत्राी विभाजन के बीच की अवस्था को अंतरालावस्था ;इंटरकाइनेसिसद्ध कहते हैं और यह सामान्यतया कम समय के लिए होती है। उसके बाद पूवार्वस्था प्प् आती है जो पूवार्वस्था प् से कापफी सरल होती है। 10.4.2 अधर्सूत्राी विभाजन प्प् पूवार्वस्था प्प्: अध्र्सूत्राी विभाजन प्प् गुणसूत्रा के पूणर् लंबा होने के पहले व कोश्िाकाद्रव्य विभाजन के तत्काल बाद प्रारंभ होता है। अध्र्सूत्राी विभाजन प् के विपरीत अध्र्सूत्राी विभाजन प्प् सामान्य सूत्राी विभाजन के समान होता है। पूवार्वस्था प्प् के अंत तक वेंफद्रक 170 जीव विज्ञान पूवार्वस्था - प्प् मध्यावस्था - प्प् पश्चावस्था - प्प् अन्त्यावस्था - प्प् चित्रा 10.4 अ(र्सूत्राण की अवस्थाएं आवरण अदृश्य हो जाता है ;चित्रा 10.4द्ध। गुणूसत्रा पुनः संहनित हो जाते हैं। मध्यावस्था प्प्: इस अवस्था में गुणसूत्रा मध्यांश पर पंक्ितब( हो जाते हैं और विपरीत धु्रवों की तवर्ुफतंतु की सूक्ष्मनलिकाएं, इनके संतति अध्र्गुणसूत्रा के काइनेटोकोर से चिपक जाती हैं ;चित्रा 10.4द्ध। पश्चावस्था प्प्: इस अवस्था में गुणसूत्राबिंदु अलग हो जाते हैं और इनसे जुड़े संतति अध्र्गुणसूत्रा कोश्िाका के विपरीत धु्रवों की ओर चले जाते हैं ;चित्रा 10.4द्ध। अंत्यावस्था प्प्: यह अवस्था अध्र्सूत्राी विभाजन की अंतिम अवस्था है, जिसमें गुणसूत्रों के दो समूह पुनः वेंफद्रक आवरण द्वारा घ्िार जाते हैं। कोश्िाकाद्रव्य विभाजन के उपरांत चार अगुण्िात संतति कोश्िाकाओं का कोश्िाका चतुष्टय बन जाता है ;चित्रा 10.4द्ध। अध्र्सूत्राी विभाजन एक ऐसी प्रिया है जिसके द्वारा लैंगिक जनन करने वाले जीवों की प्रत्येक जाति में विश्िाष्ट गुणसूत्रों की संख्या पीढ़ी दर पीढ़ी संरक्ष्िात रहती है। यद्यपि विरोधभासी प्रिया के परिणाम स्वरूप गुणसूत्रों की संख्या आधी हो जाती है। इसके द्वारा जीवधारियों की जनसंख्या मंे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक आनुवंश्िाक विभ्िान्नताएं बढ़ती जाती है। विकास प्रिया के लिए विभ्िान्नताएं अत्यंत महत्वपूणर् हैं।

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