गया है - ;1द्ध उपकला ऊतक ;2द्ध संयोजी ऊतक ;3द्ध पेशी ऊतक ;4द्ध तंत्रिाका ऊतक 7.1.1 उपकला ऊतक हम उपकला ऊतक को सामान्यतः उपकला ही कहते हैं। इस ऊतक में एक मुक्त स्तर होता है जो एक ओर तो देह - तरल ;इवकल सिनपकद्ध और दूसरी ओर बाह्य वातावरण के संपकर् में रहता है और इस प्रकार देह का आवरण अथवा आस्तर ;सपदपदहद्ध का निमार्ण करता है। कोश्िाकाएं अंतराकोश्िाकीय आधत्राी ;पदजमतबमससनसंत उंजतपगद्ध द्वारा दृढतापूवर्क जुड़ी रहती हैं। उपकला ऊतक दो प्रकार के होते हैं - 1.सरल उपकला तथा संयुक्त उपकला। सरल उपकला एक ही स्तर का बना होता है तथा यह देहगुहाओं, वाहिनियों, और नलिका का आस्तर है। संयुक्त उपकला कोश्िाकाओं की दो या दो से अध्िक स्तरों की बनी होती है और इसका कायर् रक्षात्मक है जैसे कि हमारी त्वचा। कोश्िाका के सरंचनात्मक रूपांतरण के आधर पर सरल उपकला ऊतक तीन प्रकार के हैं - शल्की ;ेुनंउवनेद्ध उपकला, घनाकार ;बनइवपकद्ध उपकला तथा स्तंभाकार ;बवसनउदंतद्ध ;चित्रा 7.1द्ध शल्की ;अद्ध घनाकार कोश्िाका ;बद्ध लंबी कोश्िाका ;दद्ध;सद्ध चित्रा 7.1 सरल उपकला ;अद्ध शल्की ;बद्ध घनाकार ;सद्ध स्तंभाकार ;दद्ध पक्ष्माभ धरी स्तंभाकार कोश्िाकाएं शल्की उपकला ऊतक यह एक चपटी कोश्िाकाओं के पतले स्तर से बनता है जिसके किनारे अनियमित होेते हैं। यह ऊतक रक्त वाहिकाओं की भ्िािा में तथा पेफपफडे़ के वायु कोश ;ंपत ेंबद्ध में पाया जाता है और यह विसरण सीमा का कायर् करती है। घनाकार उपकला यह ऊतक एक स्तरीय घन जैसी कोश्िाकाओं से बना होता है। यह सामान्यतः वृक्कों के वृक्ककों ;दमचीतवदेद्ध के नलिकाकार भागों तथा ग्रंथ्िायों की वाहिनियों में पाया जाता है। इनका मुख्य कायर् ड्डवण और अवशोषण है। वृक्क में वृक्ककों की समीपस्थ वलयित ;बवदबवसनजमकद्ध सूक्ष्म नलिका की उपकला में सूक्ष्मांवुफर ;उपबतवअपससपद्ध होते हैं। स्तंभाकर उपकला लंबी एवं पतली कोश्िाकाओं के एक स्तर का बना होता है। वेंफद्रक प्रायः कोश्िाका के आधरी भाग मंे होता है। मुक्त सतह पर प्रायः सूक्ष्मांवुफर पाए जाते हैं। सूक्ष्मांवुफर आमाशय, आंत्रा तथा आंतरिक आस्तर में पाए जाते हैं और यह स्रवण ओर अवशोषण में सहायक देते हंै। यदि इन स्तंभाकार या घनाकार कोश्िाकाओं की मुक्त सतह पर पक्ष्माभ होते हंै तो इसे पक्ष्माभी ;बपसपंजमकद्ध उपकला ;चित्रा 7.1घद्ध कहते हैं। इनका कायर् कणों अथवा श्लेष्मा को उपकला की सतह पर एक निश्िचत दिशा में ले जाना है। यह मुख्यतः श्वसनिका ;इतवदबीमवसद्ध तथा डिंबवाहिनी 102 जीव विज्ञान नलिकाओं ;ंिससवचपंउ जनइमेद्ध जैसे खोखले अंगों की भीतरी सतह में पाए जाते है। वुफछ स्तंभाकार या घनाकार कोश्िाकाओं में स्रवण एककोश्िाक ग्रंथ्िा की विशेषता होती है और ऐसी उपकला को उपकला ग्रंथ्िाल ;हसंदकनसंत मचपजीतसपनउद्ध कहते हैं ;चित्रा 7.2द्ध। इसे दो समूहों में वगीर्कृत किया जा सकता बहुकोश्िाक ग्रंथ्िा है - एक कोश्िाक जो पृथक गं्रथ्िाल कोश्िाकाओं का ;बद्ध बना होता है, जैसे आहार नाल की कलश कोश्िाका;अद्ध ;हवइसमज बमससद्ध तथा बहुकोश्िाक जो कोश्िाकाओं केचित्रा 7.2 ग्रंथ्िाल उपकला ;अद्ध एककोश्िाक ;बद्ध बहुकोश्िाक पुंज ;उदाहरण - लार गं्रथ्िाद्ध का बना होता है। स्रावी कोश्िाका में स्राव के निष्कासन के आधर पर गं्रथ्िायों को दो भागों में विभाजित किया जाता है, जिन्हें बहिःस्रावी ;मवबतपदमद्ध गं्रथ्िा तथा अंतः स्रावी गं्रथ्िा ;मदकवबतपदमद्ध कहते हैं। बहिःस्रावी गं्रथ्िा से श्लेष्मा, बहुस्तरीय लार, कणर् मोम ;मंतूंगद्ध तेल, दुग्ध्, आमाशय एंजाइम तथा अन्य कोश्िाका उत्पाद स्रावित होते हैं। ये सब वाहिनियों अथवा नलिकाओं के माध्यम से निमुर्क्त होते हैं। इसके विपरीत अंतःस्रावी गं्रथ्िायों मेंचित्रा 7.3 संयुक्त उपकला नलिकाएं नहीं होती हैं। इसके उत्पाद हामार्ेन हैं जो सीध्े उस तरल में छोड़े जाते हैं, जिसमें ग्रंथ्िा स्िथत होती है। संयुक्त उपकला एक से ज्यादा कोश्िाका स्तरों ;बहु - स्तरितद्ध की बनी होती है और इस प्रकार स्रवण और अवशोषण में इसकी भूमिका सीमित है ;चित्रा 7.3द्ध। इसका मुख्य कायर् रासायनिक व यांत्रिाक प्रतिबलों ;ेजतमेेमेद्ध से रक्षा करना है। यह त्वचा की शुष्क सतह, मुख गुहा की नम सतह पर, ग्रसनी, लार ग्रंथ्िायों और अग्नाशयी की वाहिनियों के भीतरी आस्तर को ढकता है। उपकला की सभी कोश्िाकाएं एक दूसरे से अंतरकोश्िाकीय पदाथोर्ं से जुड़ी रहती हैं। लगभग सभी प्राण्िा ऊतकों मंे कोश्िाकाओं के विशेष जोड़ व्यक्ितगत ;पदकपअपकनंस द्ध कोश्िाकाओं को संरचनात्मक एवं कायार्त्मक संध्ि प्रदान करते हैं। उपकला और अन्य ऊतकों में तीन प्रकार की संध्ि ;रनदबजपवदेद्ध पाइर् जाती हैं। ये हैं - दृढ़, आंसजी एवं अंतराली संध्ि। दृढ़ संध्ि पदाथोर्ं को ऊतक से बाहर निकलने से रोकती है। अंासजी संध्ियों पड़ोसी कोश्िाकाओं के कोश्िाका द्रव्य को एक दूसरे से जोड़ने का काम करती हैं। अंतराली संध्ियों आयनों तथा छोटे अणुओं एवं कभी - कभी बड़े अणुओं के तुरंत स्थंातरित करने में सहायता करती हैं। वे ऐसा संलग्न कोश्िाकाओं के कोश्िाकाद्रव को आपस में जोड़कर करती हैं। 7.1.2 संयोजी ऊतक जटिल प्राण्िायों के शरीर में संयोजी ऊतक बहुतायत एवं विस्तृत रूप से पफैला हुआ पाया जाता है। संयोजी ऊतक नाम शरीर के अन्य ऊतकों एवं अंग को एक दूसरे से जोड़ने तथा बृहद्भक्षकाणु तंतु ;रेशद्ध वसा संग्रह क्षेत्रा कोरक वेंफद्रककोलेजन रेशा प्लैज्मा झिल्ली ;बद्ध;अद्ध मास्ट कोश्िाका चित्रा 7.4 ढीला संयोजी ऊतक ;अद्ध ऐरियोलर ऊतक ;बद्ध वसा ऊतक आलंबन के आधर पर दिया गया है। संयोजी ऊतक में कोमल ऊतक से लेकर विशेष प्रकार के ऊतक जैसे - उपास्िथ, अस्िथ, वसीय ऊतक तथा रक्त सम्िमलित हैं। रक्त को छोड़कर सभी संयोजी ऊतकों में कोश्िाका संरचनात्मक प्रोटीन का तंतु स्रावित करती हैं, जिसे कोलेजन या इलास्िटन कहते हैं। ये ऊतक को शक्ित, प्रत्यास्थता एवं लचीलापन प्रदान करते हैं। ये कोश्िाका रूपांतरित पाॅलिसेकेराइड भी स्रावित करती है, जो कोश्िाका और तंतु के बीच में जमा होकर आधत्राी का कायर् करता है। संयोजी ऊतक को तीन प्रकारों में विभक्त किया गया है ;पद्ध लचीले संयोजी ऊतक, ;पपद्ध संघन संयोजी ऊतक एवं ;पपपद्ध विश्िाष्टकृत संयोजी ऊतक। श्िाथ्िाल संयोजी ऊतक में कोश्िाका एवं तंतु एक दूसरे से अधर्तरल आधरीय पदाथर् में श्िाथ्िालता से जुडे़ रहते हैं, उदाहरण - त्वचा ;बद्ध गतिर्का ऊतक जो त्वचा के नीचे पाया जाता है ;चित्रा 7.4द्ध। यह कोलेजन रेशे प्रायः उपकला के लिए आधरीय ढाँचे का कायर् करता है। इस संयोजी ऊतक में प्रायः तंतु कोरक ;जो तंतु को जन्म देता हैद्ध, महाभक्षकाणु एवं मास्ट कोश्िाकाएं होती हैं। वसा ऊतक दूसरा श्िाथ्िाल संयोजी ऊतक है जो मुख्यतया त्वचा के नीचे स्िथति होता है। इस ऊतक की कोश्िाकाएं वसा संग्रहण के लिए विश्िाष्ट होती हैं। भोजन के जो पदाथर् प्रयोग में नहीं आते, वे वसा के रूप में परिवतिर्त कर इस ऊतक में संग्रहित कर लिए जाते हैं। सघन संयोजी ऊतकों में तंतु एवं तंतु कोश्िाकाएं दृढ़ता से व्यवस्िथत रहती हैं। अभ्िाविन्यास के आधर पर तंतु तथा तंतुकोरक सघन संयोजी ऊतक को नियमित संयोजी ऊतक तथा अनियमित संयोजी ऊतक में विभाजित किया गया है। सघन नियमित ऊतक में तंतु कोरक समानंातर तंतु के गुच्छों के बीच में कतार में उपस्िथत होते ;अद्ध हैं। कंडराएं जो कंकाल पेशी को अस्िथ से जोड़ती हैं तथा स्नायु, जो एक अस्िथ को दूसरी अस्िथ से जोड़ती हैं इसका उदाहरण है। चित्रा 7.5 घना संयोजी ऊतक ;अद्ध घना नियमित ;बद्ध घना अनियमित कोलैजन तंतु का गुच्छा कंडराओं को प्रतिरोध्ी क्षमता प्रदान करता है 104 जीव विज्ञान और इसे टूटने से बचाता है। सघन नियमित संयोजी ऊतक लचीली स्नायु ;सपहंउमदजद्ध में पाया जाता है। सघन अनियमित ऊतक में कोलेजन रेशा तंतु तथा तंतुकोरक होते हैं ;तंतु में अध्िकांश कोलेजन होता हैद्ध ;चित्रा 7.5द्ध जिनका अभ्िाविन्यास अलग होता है। यह ऊतक त्वचा मेंउपास्िथ कोश्िाका पाया जाता है। उपास्िथ, अस्िथ एवं रक्त विशेष प्रकार के संयोजी ऊतक हैं। ;अद्ध उपास्िथ का अंतराकोश्िाक पदाथर् ठोस, विश्िाष्ट आनम्य एवं संपीडन संहत अस्िथ ऊतक रोध्ी होता है। इस ऊतक को बनाने वाली कोश्िाकाएं ;उपास्िथ अणुद्ध स्वयं द्वारा स्रावित आधत्राी में छोटी छोटी गुहिकाओं में बंद हो जाती है। ;चित्रा 7.6 अद्ध। कशेरुकी भ्रूण में विद्यमान अध्िकांश उपास्िथयां, वयस्क अवस्था में अस्िथ द्वारा प्रतिस्थापित हो जाती हैं। वयस्क में वुफछ उपास्िथ नाक की नोंक, बाह्य कान संध्ियों, मेरुदंड की आस पास की अस्िथयों के मध्य तथा पैर और हाथ में पाइर् जाती है। ;बद्ध अस्िथ खनिज युक्त ठोस संयोजी ऊतक है, इसका आनम्य आधत्राी काॅलेजन तंतु एवं कैल्िसयम लवण युक्त होता है जो अस्िथ को मजबूती प्रदान करता है ;चित्रा 7.6 बद्ध। यह शरीर का मुख्य ऊतक है जो कि लाल रुध्िर कण्िाका शरीर के कोमल अंगों का संरचनात्मक ढँाचा बनाता है तथा ऊतकों को सहारा एवं सुरक्षा देता है। अस्िथ कोश्िाकाएं आधत्राी के अंदर रिक्ितकाओं पट्टिकाणु में उपस्िथत रहती हैं। पैर की अस्िथ जैसे आपकी लंबी अस्िथ भार वहन का कायर् करती है। अस्िथ कंकाल पेशी से जुड़कर परस्पर िया द्वारा गति श्वेत रुध्िर कण्िाका;सद्ध प्रदान करती है। वुफछ अस्िथयों में अस्िथ मज्जा, रक्त कोश्िाकाओं का उत्पादन करती है। चित्रा 7.6 विश्िाष्टीकृत संयोजी ऊतक रक्त तरलः संयोजी ऊतक होता है जिसमें जीवद्रव्य, लाल रुध्िर कण्िाकाएं, सपेफद रुध्िर कण्िाकाएं और पट्टिकाणु ;चसंजसमजेद्ध पाए जाते हंै ;चित्रा 7.6 सद्ध रक्त मुख्य परिसंचारी तरल है जो कि विभ्िान्न पदाथोर्ं के परिवहन में सहायता करता है। इसके बारे में आप विस्तृत रूप से अध्याय 17 और 18 मंे पढ़ेंगे। 7.1.3 पेशी ऊतक पेशी ऊतक अनेक लंबे, बेलनाकार तंतुओं ;रेशोंद्ध से बना होता है जो समानंातर - पंक्ित में सजे रहते हैं। यह तंतु कइर् सूक्ष्म तंतुकों से बना होता है जिसे पेशी तंतुक ;उलवपिइतपसद्ध कहते हैं। समस्त पेशी तंतु समन्िवत रूप से उद्दीपन के कारण संवुफचित हो जाते हैं तथा पुनः लंबा होकर अपनी असंवुफचित अवस्था में आ जाते हैं। पेशीय ऊतक की िया से शरीर वातावरण में होने वाले परिवतर्नों के अनुसार गति करता है तथा शरीर के विभ्िान्न अंगों की स्िथति को संभाले रखता है। सामान्यतया शरीर की सभी गतियों में पेश्िायां प्रमुख भूमिका निभाती हैं। पेशीय ऊतक तीन प्रकार के होते हैं - ;1द्ध कंकाल पेशी ;2द्ध चिकनी पेशी ;3द्ध हृदय पेशी कंकाल पेशी मुख्य रूप से कंकाली अस्िथ से जुड़ी रहती है। प्रारूप ;जलचपबंसद्ध पेशी जैसे द्विश्िारस्का ;इपबमचेद्ध ;दो सिर वालीद्ध पेशी में रेखीय कंकाल पेशी तंतु एक चिकनी रेखाएंरेखाएं पेशी रेशे वेंफद्रक संलग्न वेंफद्रक कोश्िाकाओं के बीच संध्िस्थल ;अद्ध ;बद्ध ;सद्ध चित्रा 7.7 पेशी ऊतक ;अद्ध कंकालीय ;रेख्िातद्ध पेशी ऊतक ;बद्ध चिकनी पेशी ऊतक ;सद्ध हृद - पेशी ऊतक समूह में एक साथ समानंातर रूप में पाए जाते हैं। पेशी ऊतक के समूह के चारों ओर कठोर संयोजी ऊतक का आवरण होता है। ;चित्रा 7.7 अद्ध ;इसके बारे में आप अध्याय 20 में विस्तार से पढ़ेंगेद्ध। चिकनी पेशी - चिकनी पेशीय ऊतक की संवुफचनशील कोश्िाका के दोनों किनारे पतले होते हैं तथा इनमें रेखा या धरियाँ नहीं होती हैं ;चित्रा 7.7 बद्ध। कोश्िाका संध्ियां उन्हंे एक साथ बँाध्ें रखती हंै तथा ये संयोजी ऊतक के आवरण से ढके समूह रहते हंै। आंतरिक अंगों जैसे - रक्त नलिका, अग्नाशय तथा आँत की भ्िािा में इस प्रकार का पेशी ऊतक पाया जाता है। चिकनी पेशी का संवुफचन ‘‘अनैच्िछक’’ होता हैऋ क्योंकि इनकी ियाविध्ि पर सीध नियंत्राण नहीं होता है। जैसा कि हम कंकाल पेश्िायों के बारे में कर सकते हैं, चिकनी पेशी को मात्रा सोचने भर से हम संवुफचित नहीं कर सकते हैं। हृदय पेशी - संवुफचनशील ऊतक है जो केवल हृदय में ही पाइर् जाती है। हृदय पेशी की कोश्िाकाएं कोश्िाका संध्ियों द्वारा द्रव्य कला से एकरूप होकर चिपकी रहती हैं ;चित्रा 7.7 सद्ध। संचार संध्ियों अथवा अंतविर्ष्ट डिस्क ;पदजमतबंसंजमक कपेबद्ध के वुफछ संगलन बिंदुओं पर कोश्िाका तंत्रिाकाक्ष एक इकाइर् रूप में संवुफचित होती है। जैसे कि जब एक कोश्िाका संवुफचन के लिए संकेत ग्रहण करती वेंफद्रक सहितहै तब दूसरी पास की कोश्िाका भी संवुफचन के कोश्िाका कायलिए उद्दीपित होती है। द्रुमिका7.1.4 तंत्रिाका ऊतक तंत्रिाका ऊतक मुख्य रूप से परिवतिर्त अवस्थाओं कण्िाकाएं के प्रति शरीर की अनुियाशीला ;तमेचवदेपअमदमेेद्ध के नियंत्राण के लिए उत्तरदायी होता है। चित्रा 7.8 तंत्रिाकी - ऊतक ;तंत्रिाकोश्िाकाद्धतंत्रिाका कोश्िाकाएं उत्तेजनशील कोश्िाकाएं हैं, जो पुरोमुख ;प्रोस्टोमियमद्ध परितुंड ;पेरिस्टोमियमद्ध शूक वलय क्लोइटेलम मुख द्वार क्लाइटेलम विखंड गुदा जनन - पिप्पल ;अद्ध ;बद्ध चित्रा 7.9 वेंफचुए का शरीर ;अद्ध पृष्ठ दृश्य ;बद्ध अध्र दृश्य ;सद्ध मुख द्वार दशार्ते हुए पाश्वर् दृश्य 7.3.1 आकारिकी इनका शरीर लंबा, और लगभग 100 - 120 समान समखंडों ;उमजंउमतमेद्ध में बँटा होता है। पृष्ठ तल पर एक गहरी मध्यरेखा ;पृष्ठ रक्त वाहिकाद्ध दिखाइर् देती है। अध्रतल पर जनन छिद्र पाए जाते हैं, जिसकी वजह से यह पृष्ठ तल से विभेदित किया जा सकता है। शरीर के अग्र भाग पर मुख एवं पुरोमुख ;च्तवेेवउपनउद्ध होते हंै। पुरोमुख एक पालि ;सवइमद्ध है जो मुख को ढकने वाली एक पफाननुमा संरचना है। यह पफान मृदा दरारों को खोलकर कृमि को उसमें रेंग कर जाने में मदद करती है। पुरोमुख एक संवेदी संरचना है। शरीर का पहला खंड परितुंड ;चमतपेजवउपनउद्ध या मुखखंड होता है, जिसमें मुख उपस्िथत होता है। एक परिपक्व कृमि में एक चैड़ी ग्रंथ्िाल गोलाकार पट्टी चैदहवें से सोलहवें खंड को घेरे रहती है। इन ग्रंथ्िाल ऊतक वाले खंडों को पयार्ण्िाक ;बसपजमससनउद्ध कहते हैं। इस प्रकार शरीर तीन प्रमुख भागों - अग्र - पयार्ण्िाका, पयार्ण्िाक और पश्च पयार्ण्िाक खंडों में विभक्त होता है ;चित्रा 7.9द्ध। 5 - 9 खंडों में अंतरखंडीय खांचों के अध्र - पाश्वीर्य भाग में चार जोड़ी शुक्रग्रहिका रंध््र ;ेचमतउंजीमबंस ंचमतजनतमेद्ध स्िथत होते हैं। एकल मादा जनन छिद्र चैदहवें खंड की मध्य अध्र रेखा पर स्िथत होता है। एक जोड़ा नर जनन छिद्र अठारवें खंड के अध्र - पाश्वर् में स्िथत होते हैं। बहुत से छोटे छिद्र जिन्हें वृक्कक रंध््र कहते हैं, अध्र तल शूक मादा जनन रंध््र नर जनन रंध््र अनुप्रस्थ खांच अथवा वलयिकाएं 108 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 चित्रा 7.10 वेंफचुए की आहार नाल मुख ग्रसनी ग्रसिका पेषणी आमाशय आंत्रा का आंत्रावलन पूवर् भाग आंत्रा - अंध्नाल लसीका ग्रंथ्िा आंत्रा का आंत्रावलनी भाग आंत्रा आंत्रावलन जीव विज्ञान पर लगभग संपूणर् शरीर पर पाए जाते हैं। इन छिद्रों के द्वारा उत्सगिर्काएं शरीर के बाहर की ओर खुलती हैं। शरीर के प्रथम, अंतिम एवं पयार्ण्िाका खंडों को छोड़कर समस्त देहखंडों में ै आकार के शूक ;ेमजंमद्ध पाए जाते हैं, जो प्रत्येक खंड के मध्य में स्िथत उपकला गतर् में ध्ँसे रहते हैं। शूक छोटी बाल के समान संरचना होती है, जो कि पफैल तथा सिवुफड़ सकती है तथा गति में महत्वपूणर् भूमिका अदा निभाती है। 7.3.2 आंतरिक आकारिकी वेंफचुए का शरीर एक पतली अकोश्िाकीय परत से ढका रहता है जिसे उपत्वचा कहते हैं। इसके नीचे अध्िचमर्, दो पेशीय ;गोलाकार व लंबवत्द्ध परतें तथा सबसे अंदर की ओर देहगुहीय उपकला पाइर् जाती है। अध्िचमर् स्तंभाकार उपकला कोश्िाकाओं की एक स्तर की बनी हुइर् होती है, जिसमें अन्य प्रकार की कोश्िाकाएं जैसे ड्डावी ग्रंथ्िा कोश्िाकाएं भी सम्िमलित हैं। आहारनाल शरीर के प्रथम से अंतिम खंड तक एक लंबी, सीध्ी नली के रूप में उपस्िथत होती है ;चित्रा 7.10द्ध। प्रथम खंड पर उपस्िथत मुख, प्रथम से तृतीय खंड में पफैली मुखगुहा में खुलता है, जो ग्रसनी की ओर अग्रसर होती है और चैथे खंड में खुलती है। ग्रसनी एक छोटी संकरी नलिका में खुलती है, जिसे ग्रसिका कहते हैं, यह पँाचवे से सातवें खंड तक पाइर् जाती है, तथा एक पेशीय पेषणी ;हप्र्रंतकद्ध आठवें और नवें खंड तक चलती है। यह सड़ी पिायों और मिट्टी आदि के कणों को पीसने में मदद करती है। आमाशय नौ से चैदह खंड तक स्िथत होता है। वेंफचुए का भोजन सड़ी - गली पिायाँ और मिट्टी में मिश्रित काबर्निक पदाथर् होते हैं। आमाशय में स्िथत केल्सीपेफरस ग्रंथ्िायाँ “यूमस में उपस्िथत - “यूमिक अम्लों को उदासीन बना देती है। आंत्रा पंद्रहवें खंड से प्रारंभ होकर अंतिम खंड तक एक लंबवत नलिका के रूप में मिलती है। छब्बीसवें खंड में आंत्रा से एक जोड़ी छोटी और शंक्वाकार आंत्रिाक अंध्नाल निकलती हैैं। आंत्रा का विश्िाष्ट गुण जो 26 खण्ड से प्रारंभ होता है तथा अन्ितम 23 - 25 खण्डों को छोड़कर आंत्रा की पृष्ठ सतह में आंतरिक वलन, भ्िािाभंज का पाया जाता है, जिसे आंत्रावलन ;जलचीसवेवसमद्ध कहते हैं। यह वलन अंात्रा में अवशोषण के प्रभावी क्षेत्रा में वृि कर देता है। आहार नाल, शरीर के अंतिम खंड पर एक छोटे छिद्र के रूप में खुलती है। जिसे गुदा ;ंदनेद्ध कहते हैं। वेंफचुआ काबर्निक पदाथोर्ं से भरपूर मृदा को भोजन के रूप में निगलता है, आहारनाल से गुजरते समय, पृष्ठ वाहिका पाश्वर् हृदय पाश्वर् ग्रसिकीय हृदय 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 संधयी वाहिका 2 1 अध्स्तंत्रिाका वाहिका पाश्वर् ग्रसिकीय अध्र अग्र पाश वाहिका वाहिका ;लूपद्ध चित्रा 7.11 संवृत परिसंचरण तंत्रा मुख पाचक रस एंजाइमों का स्राव होता है जो कि पदाथोर्ं के साथ घुल - मिल जाता है। ये एंजाइम जटिल भोज्य कणों को सूक्ष्मग्रसनीयमुख गुहा वृक्ककों का अवशोषण योग्य कणों में बदल देते हैं ये सरल अणु वाहिनियां ;उवसमबनसमेद्ध आहारनाल - झिल्ली द्वारा अवशोष्िात करकेग्रसनी उपयोग में लाए जाते हैं।रक्त ग्रंथ्िायां ग्रसनीय पेफरिटिमा ;वेंफचुएद्ध का रुध्िर परिसंचरण तंत्रा बंद प्रकारवृक्ककों की का होता है, जिसमें रुध्िर वाहिकाएं, केश्िाकाएं, हृदय होताचूड़ा है ;चित्रा 7.11द्ध। बंद रुध्िर परिसंचरण तंत्रा के कारण रुध्िर का ;अमेेमसेद्ध हृदय तथा रक्त वाहिनियों तक हीवृक्कक सीमित रहता है। संवुफचन रक्त परिसंचरण को एक दिशा में रखता है। सूक्ष्म रुध्िर वाहिकाएं रक्त को आहारनाल,अध्यावरणी तंत्रिाका रज्जु और शरीर भ्िािा तक पहुँचाती हैं। रुध्िर ग्रंथ्िायाँवृक्ककों का पुंज चैथे, पाँचवें और छठे देह खंड पर पाइर् जाती हैं। ये ग्रंथ्िायाँ पटीय हीमोग्लोबिन तथा रुध्िर कोश्िाकाओं का निमार्ण करती हैं जो वृक्कक रुध्िर प्लाज्मा में घुल जाती हंै। इनकी प्रकृति भक्षकाण्िवक होती है। वेंफचुए में विश्िाष्ट श्वसन तंत्रा नहीं होता। श्वसन चित्रा 7.12 वेंफचुए का वृक्कक - तंत्रा ;गैसद्ध विनिमय शरीर की आद्रर् सतह से उनकी रुध्िर धरा में संपन्न होता है। उत्सजीर् अंग खंडों में व्यवस्िथत और वलयित नलिकाओं के बने होते हैं, जिन्हें वृक्कक ;दमचीतपकपंद्ध कहते हैं। ये वृक्कक तीन प्रकार के होते हैं। ;पद्ध पटीय ;ेमचजंसद्ध वृक्कक 15 वें खंड से अंतिम खंड के दोनों ओर अंतर खंडीय पटों पर पाए जाते हैं तथा ये आंत्रा में खुलते हैं। ;पपद्ध अध्यावरणी वृक्कक जो शरीर की देह भ्िािा के आंतरिक आस्तर पर तीसरे खंड से अंतिम खंड तक चिपके रहते हैं तथा शरीर की सतह पर खुलते हैं। ;पपपद्ध ग्रसनीय वृक्कक चैथे, पाँचवें एवं छठे खंड में तीन युग्िमत गुच्छों के रूप में पाए जाते हैं, ;चित्रा 7.12द्ध। ये विभ्िान्न प्रकार के वृक्कक संरचना में मूलतः समान होते हैं। शुक्राणुओं के आपस में आदान - प्रदान की प्रिया मैथुन के द्वारा होती है। जब एक कृमि दूसरे कृमि को पाता है तथा उनके जनद द्वार ;हवदंकंस वचमदपदहद्ध एक दूसरे के सानिध्य में आते हैं तो वे अपने शुक्राणुओं से भरे थैलों को जिन्हें शुक्राणुधर कहते हैं बदल लेते हैं। पयार्ण्िाका की गं्रथ्िा कोश्िाकाओं द्वारा ;ककूनद्ध उत्पन्न कोकूनों में परिपक्व शुक्राणु व अंड कोश्िाकाओं तथा तरल जमा किया जाता है। निषेचन एवं परिवध्र्न कोकून के अंदर होता है जिसे कृमि मृदा में छोड़ देता है। अंड व शुक्राणु कोश्िाकाओं का कोकून के अंदर ही निषेचन हो जाता है। कृमि इन्हें अपने शरीर से अलग कर देता है व मृदा ;नम स्थानद्ध के ऊपर या अंदर छोड़ देता है। कृमि भू्रण कोकून में रहते हैं। लगभग तीन सप्ताह के बाद लगभग चार की औसत से कोकून 2 - 20 श्िाशु कृमि का निमार्ण करता है। कृमि में परिवध्र्न प्रत्यक्ष होता है अथार्त् लावार् अवस्था नहीं होती है। वेंफचुआ किसानों का मित्रा कहलाता है। यह मिट्टी में छोटे - छोटे बिल बनाता है, जिससे मिट्टी छिदि्रत हो जाती है और बढ़ते पौधें की जड़ों के लिए वायु की उपलब्धता और उनका नीचे की ओर बढ़ना सुगम हो जाता है। इस प्रकार वेंफचुओं द्वारा मिट्टी को उपजाऊ बनाने की विध्ि या मिट्टी की उवर्र शक्ित बढ़ाने की विध्ि को कृमि कंपोस्ट खाद निमार्ण कहते हैं। वेंफचुए मछली पकड़ने के लिए प्रलोभक के रूप में प्रयोग में भी लिए जाते हैं। 7.4 काॅकरोच ;तिलचट्टाद्ध काॅकरोच चमकदार भूरे अथवा काले रंग के सपाट शरीर वाले प्राणी हैंऋ जिन्हें कि संघ ;पफाइलमद्ध आथोर्पोडा ;संध्िपादद्ध की वगर् इन्सेक्टा ;कीटवगर्द्ध में सम्िमलित किया गया है। उष्णकटिबंध्ीय भाग में चमकीले पीले, लाल तथा हरे रंग के काॅकरोच अक्सर दिखाइर् दे जाते हैं। इनका आकार 1/4 - 3 इंच ;0.6 - 7.6 सेमी.द्ध होता है। इनमें लंबी शंृगिका ;ंदजमददंद्ध पैर तथा ऊपरी शरीर भ्िािा में चपटी वृि होती है जो कि सिर को ढके तंतुरूप शृंगिका संयुक्त आँख सिर प्रवक्ष पृष्ठक टेगामिनामध्य वक्ष अग्र वक्षीय टांग पाश्चपश्च वक्षीय पंखमध्य वक्षीय टांग उदरपश्च वक्षीय टांग गुदा लूम चित्रा 7.14 तिलचट्टे का बाह्य चित्रा 112 जीव विज्ञान रहती है। समस्त संसार में ये रात्रिाचर, सवर्भक्षी प्राणी हैं तथा नम जगह पर मिलते हैं। ये मनुष्यों के घर में रहकर गंभीर पीड़क एवं अनेक प्रकार के रोगों के वाहक हैं। 7.4.1 बाह्य आकारिकी सामान्य वयस्क कॅाकरोच, जाति पेरिप्लेनेटा अमेरिकाना का 34.53 मिमी. लंबा तथा पंखों वाला होता है, पंख नर में उदर के आख्िारी छोर से भी आगे बढ़े होते हंै। काॅकरोच का शरीर मुख्य रूप से खंडों में बँटा होता है, तथा इसके तीन मुख्य भाग होते हैं। सिर, वक्ष तथा उदर ;चित्रा 7.14द्ध। इसका पूरा शरीर मजबूत काइर्टिन युक्त बाह्य कंकाल ;भूरे रंग काद्ध का बना होता है। प्रत्येक खंड में, बाह्य कंकाल में मजबूत पट्टिकाएं होती हंै जिन्हें कठक ;ेबसमतपजमेद्ध ;पृष्ठवाली - पृष्ठकंाश और अध्रवाली - अध्रकांशद्ध कहते हैं, ये खंड आपस में एक पतली ;महीनद्ध व लचीली झिल्ली से जुड़े होते हैं, जिसे संध्िकारी - झिल्ली या संध्ि झिल्ली कहते हैं। शरीर के अग्र भाग में स्िथत सिर त्रिाकोणीय होता है। शरीर के अनुदैघ्यर् अक्ष के साथ लगभग समकोण बनाता है। यह छः खंडों के मिलने से बनता है तथा अपनी लचीली गदर्न के कारण सभी दिशाओं में घूम सकता है। सिर संपुटिका पर एक जोड़ी संयुक्त नेत्रा होते हैं। आँखों के आगे झिल्लीयुक्त साॅकेट से धगे जैसी एक जोड़ी शृंगिका निकलती है। शंृगिका में संवेदी ग्राही उपस्िथत होते हैं, जो वातावरणीय दशाओं को मापने का काम करते हैं। सिर के आगे वाले छोर पर उपांग लगे होते हैं, जिनसे काटने व चबाने वाले मुखंाग बनते हैं। मुखांग में एक जोड़ी ऊध्वोर्ष्ठ ऊपरी जबड़ा, एक जोड़ी चिबुकास्िथ, एक जोड़ी जंभ्िाका, एक अधरोष्ठ होता है। एक मध्य लचीली पालि जिसे अधेग्रसनी ;ीलचवचीलंदगद्ध कहते हैं जिह्ना का कायर् करती है जो कि मुखंागों से घ्िारी गुहा मंे उपस्िथत होती है ;चित्रा 7.15द्ध। वक्ष मुख्यतः तीन भागों में बँटा होता है। अग्रवक्ष, मध्यवक्ष व पश्चवक्ष। सिरवक्ष से अग्रवक्षक एक छोटे प्रसार द्वारा जुड़ा रहता है जिसे गदर्न नेत्राक संयुक्त आँख लेब्रम पोषण क्षेत्रा मैक्िसला मैंडिवल हाइपोपैफरिन्स कृतक क्षेत्रा मैंडिवल मैंडिवुल लेब्रम लेबियम लेवियम मैक्िसला मैक्िसला लैबि्रयम चित्रा 7.15 तिलचट्टा के सिर का क्षेत्रा ;अद्ध सिर क्षेत्रा को दशार्ते हुए ;बद्ध मुख भाग कहते हैं। प्रत्येक वक्षीय खंड में एक जोड़ी टांगें पाइर् जाती हैं कक्षांग ;बवगंद्ध, श्िाखरक ;जतवबींदजमतद्ध ऊविर्का ;मिउनतद्ध, अंतजर्घ्िाका ;जपइपंद्ध व गुल्पफ ;जंतेनेद्ध। पंखों का प्रथम जोड़ा मध्यवक्ष से निकलता है तथा दूसरा पश्चवक्ष से। अग्र पंख ;मध्यवक्षीयद्ध जिन्हंे प्रवार ;जमहउमदद्ध आच्छद कहते हैं। अपारदशीर्, गहरे रंग के होते हैं तथा विश्राम अवस्था में पश्चवक्ष पंखों से ढके रहते हैं। पश्चपंख पारदशीर् झिल्लीनुमा होते हैं तथा यह उड़ने में मदद करते हैं। नर व मादा दोनों में उदर दस खंडीय होता है। सातवँा अध्रक नौकाकार होता है। तथा आठवां व नवां अध्रक के साथ मिलकर एक जनन - कोष्ठ या जननिक कोष्ठ बनाता है जिसके अग्र भाग में मादा जनन छिद्र, स्पमेर्थ्िाकल छिद्र व संपाश्िवर्क ग्रंथ्िायाँ होती हैं। नर में केवल आठवाँ पृष्ठक ही सातवें खंड द्वारा ढका रहता है। नर - मादा दोनों में दसवें खंड पर एक जोड़ी संध्ियुक्त तंतुमय गुदीय लूम ;बमतबपद्ध होते हैं। इन लूमों के नीचे की ओर नर के नवें खंड में एक जोड़ी छोटे व धगे के समान गुदा शूक ;ंदंस ेजलसमसेद्ध होते हैं। मादा में शूक अनुपस्िथत होते हैं। 7.4.2 आंतरिक आकारिकी देहगुहा में स्िथत आहारनाल तीन भागों - अग्रांत्रा, मध्यांत्रा एवं पश्चांत्रा में बँटी होती है ;चित्रा 7.16द्ध। मुख एक छोटी नलिकाकार ग्रसनी में खुलता है, जिससे एक सीध्ी और संकरी नली ग्रसिका निकलती है। ग्रसिका एक पतले भ्िात्ती वाले कोष में खुलती है, जिसे अन्नपुट कहते हैं, जिसमें भोजन संग्रहीत रहता है। इसके पीछे ग्रंथ्िाल जठर ;चतवअमदजतपबनसनेद्ध अथवा पेषणी होती है। इसमें बाहर एक मोटा वतुर्ल पेशी स्तर होता है तथा स्तर की उपत्वचा छः स्थानों पर मोटी होकर उपत्वचीय दांत बनाती है। ये दांत भोजन के मोटे कणों को पीसने में सहायक होते हैं। पूरा अग्रंात्रा अंदर से उपत्वचा ;क्यूटिकलद्ध से आस्तरित रहता है। मध्यांत्रा एक संकरी एवं समान व्यास की नलिका होती है, जिसमें उपत्वचा का आस्तर नहीं होता है। अग्रांत्रा व मध्यांत्रा के संध्िस्थल पर अंगुली के समान छह से आठ अंध् - नलिकाएं लगी रहती हैं, जिनके सिरे बंद रहते हैं। इनको यकृतीय या जठरीय अंध्नाल कहते हैं, ये पाचकरस बनाती हैं। मध्यांत्रा व पश्चांत्रा के संध्ि स्थल पर लगभग 100 - 150 पतली पीले रंग की नलिकाएं होती है। जिन्हें लार ग्रंथ्िा लार वुंफड ग्रसिका शस्थ पेषणी यकृतीय अंध्नाल मध्यंत्त या मध्य आहर नली मैलपीगी नली क्षुंद्रात वृहदंत्रा ग्रसनी मलाशय चित्रा 7.16 तिलचट्टा की आहारनाल अग्र महाध्मनी पक्षाकार पेशी हृदयकोश चित्रा 7.17 तिलचट्टे का खुला परिसंचरण तंत्रा वृषण श्िाश्नीय ग्रंथ्िा छोटी नलिकाएं बड़ी नलिकाएं शुक्राशय शुक्र वाहिका स्खलन वाहिनी दाया खंड अध्र श्िाश्न खंड गूदा लूम वाया श्िाश्न खंड वूफट श्िाश्न पुच्छ शूक लिगागि्रकांत ;अद्ध अंडाशय अंड वाहिनीशुक्र ग्राहिका सामान्य अंडवाहिनी श्लेषक ग्रंथ्िा जनन कक्ष जनन कोष्ठ युग्मन प्रवध्र् बाहृ प्रगुहा;बद्ध चित्रा 7.18 तिलचट्टे का जनन तंत्रा ;अद्ध नर ;बद्ध मादा खंड के पाश्वर् में व्यवस्िथत होते हैं। प्रत्येक वृषण से एक पतली नलिका जिसे शुक्रवाहिनी कहते हैं, शुक्राशय से होते हुए स्खलनीय वाहिनी में खुलती है। ये स्खलनीय वाहिनी नर - जनन छिद्र में खुलती है जो गुदा के अध्र में होता है। एक विश्िाष्ट छत्राक रूपी ग्रंथ्िा उदर के छठे एवं सातवें खंड में होती है, जो सहायक जनन - ग्रंथ्िा का कायर् करती है। बाह्य जननेन्िद्रय नर गोनोपफोपिफसस ;युग्मनप्रवध्र्द्ध अथवा श्िाश्नखंड के रूप में होती है जननरंध््र के चारों ओर काइटिनी असममितीय संरचना है। शुक्राणु, शुक्राशय में संग्रहित रहते हैं और पुंज के रूप में आपस में चिपके रहते हैं। इन पुंजों को शुक्राणुध्र कहते हैं। मैथुन के समय ये विसजिर्त कर दिए जाते हैं। मादा जनन तंत्रा में दो बृहद् आकार के अंडाशय होते हैं, जो उदर के दो से छठे खंड के पाश्वर् में स्िथत होते हैं। प्रत्येक अंडाशय आठ अंडाशयी नलिका अथवा अंडाशयकों का बना हेाता है, जिसमें परिवध्िर्त हो रहे बल्िक त्वचा द्वारा इसका अवशोषण करता है। मेंढक का शरीर सिर व ध्ड़ में विभाजित रहता है। ;चित्रा 7.19द्ध पूंछ व गदर्न का अभाव होता है। मुख के ऊपर एक जोड़ी नासिका द्वार खुलते हैं। आँखें बाहर की ओर निकली व निमेषकपटल से ढकी होती हैं ताकि जल के अंदर आँखों का बचाव हो सके। आँखों के दोनों ओर ;कानद्ध टिम्पैनम या कणर् पटह उपस्िथत होते हैं, जो ध्वनि संकेतों को ग्रहण करने का कायर् करते हैं। अग्र व पश्चपाद चलने, पिफरने, टहलने व गड्ढा बनाने का काम करते हैं। अग्र पाद में चार अंगुलियाँ होती हैंऋ जबकि पश्चपाद में पाँच होती हैं। तथा पश्चपाद लंबें व मांसल होते हैं। पश्च पाद की झिल्लीयुक्त अंगुलि जल में तैरने में महत्वपूणर् भूमिका निभाती है। मेंढक में लैंगिक द्विरूपता देखी जाती है। नर मेंढक में आवाज उत्पन्न करने वाले वाव्फ कोष ;अवबंस ेंबेद्ध के साथ - साथ अग्रपाद की पहली अंगुलि में मैथुनांग होते हैं। ये अंग मादा मेंढक में नहीं मिलते हैं। 7.5.2 आंतरिक आकारिकी मेंढक की देह गुहा में पाचन तंत्रा, श्वसन तंत्रा, तंत्रिाका तंत्रा, संचरण तंत्रा, जनन तंत्रा पूणर् अच्छी तरह परिवध्िर्त संरचनाओं एवं कायोर्ं युक्त होते हैं। मेंढक का पाचन तंत्रा आहार नाल तथा आहर गं्रंथ्िा का बना होता है ;चित्रा 7.20द्ध। मेंढक मांसाहारी है, अतः इसकी हृदय ग्रसिका यकृत पित्ताशय पेफपफड़ा आमाशय वसा वाडी वृक्क मूत्रा वाहिनी आंत्रा मूत्राशय मलाशय अवस्कर अवस्कर द्वार चित्रा 7.20 मेंढक की आंतरिक संरचना जो पूणर् आहार तंत्रा दशार्ती है। आहारनाल लंबाइर् में छोटी होती है। इसका मुख, मुखगुहिका में खुलता है जो ग्रसनी से होते हुए ग्रसिका तक जाती है। ग्रसिका एक छोटी नली है जो आमाशय में खुलती है। आमाशय आगे चलकर आंत्रा, मलाशय और अंत में अवस्कर ;बसवंबंद्ध द्वारा बाहर खुलता है। इसका मुँह मुखगुहिका द्वारा ग्रसनी में खुला है जो ग्रसिका तक जाती है। यकृत पित्त रस स्रावित करता है जो पित्ताशय में एकत्रिात रहता है। अग्नाश्य जो एक पाचक गं्रथ्िा है, जो अग्नाशयी रस स्रवित करता है जिसमें पाचक एंजाइम होते हैं। मेंढक अपनी द्विपालित जीभ से भोजन का श्िाकार पकड़ता है। इसके भोजन का पाचन आमाशय की दीवारों द्वारा स्रवित हाइड्रोक्लोरिक अम्ल तथा पाचक रसों द्वारा होता है। अध्र्पाचित भोजन काइम कहलाता है जो आमाशय से ग्रहणी में जाता है। ग्रहणी पित्ताशय से पित्त और अग्नाशय से अग्नाशयी रस मूल पित्त वाहिनी द्वारा प्राप्त करती है। पित्तरस वसा तथा अग्नाशयी रस काबोर्हाइडेªटों तथा प्रोटीन का पाचन करता है। पाचन की अंतिम प्रिया आँत में होती है। पाचित भोजन आँत के अंदर अंवुफर और सूक्ष्मांवुफरों द्वारा अवशोष्िात होते हैं। अपाचित भोजन अवस्कर द्वार से बाहर निष्कासित कर दिया जाता है। मेंढक जल व थल दोनों स्थानों पर दो विभ्िान्न विध्ियों द्वारा श्वसन कर सकते हैं। इसकी त्वचा एक जलीय श्वसनांग का कायर् करती है। इसे त्वचीय श्वसन कहते हैं। विसरण द्वारा पानी में घुली हुइर् आॅक्सीजन का विनिमय होता है। जल के बाहर त्वचा, मुख गुहा और पेफपफड़े वायवीय श्वसन अंगों का कायर् करते हैं। पेफपफड़ों के द्वारा श्वसन पुफप्पफसीय श्वसन कहलाता है। पेफपेफडे़ एक लंबें अंडाकार गुलाबी रंग की थैलीनुमा संरचनाएं होती हैं, जो देहगुहा के वक्षीय भाग में पाइर् जाती हैं। वायु नासा छिद्रों से होकर मुख गुहा तथा पेफपफड़ों में पहुँचती है। ग्रीष्म निष्िक्रयता व शीत निष्िक्रयता के दौरान मेंढक त्वचा से श्वसन करते हैं। मेंढक का परिसंचरण तंत्रा, सुविकसित बंद प्रकार का होता है। इसमें लसीका परिसंचरण भी पाया जाता है। अथार्त् आॅक्सीजनित अथवा विआॅक्सीजनित रक्त हृदय में मिश्रित हो जाते हैं। रुध्िर परिसंचरण तंत्रा हृदय, रक्त वाहिकाओं और रुध्िर से मिलकर बनता है। लसीका तंत्रा लसीका, लसीका नलिकाओं और लसीका ग्रंथ्िायों का बना होता है। हृदय एक त्रिाकोष्ठीय मांसल संरचना है, जो कि देह गुहा के ऊपरी भाग में स्िथत है। यह पतली पारदशीर् झिल्ली, हृदय - आवरण ;पेरीका£डयमद्ध द्वारा ढका रहता है। एक त्रिाकोष्ठीय संरचना, जिसे श्िाराकोटर ;साइनस वेनोससद्ध कहते हैं, हृदय के दाहिने अलिंद से जुड़ा रहता है तथा महाश्िाराओं से रक्त प्राप्त करता है। हृदय की अध्र सतह पर दाएं अलिंद के ऊपर एक थैलानुमा रचना ध्मनी शंवुफ होता है, जिसमें निलय ;अमदजतपबसमद्ध खुलता है। हृदय से रक्त ध्मनियों द्वारा शरीर के सभी भागों में भेजा जाता है। इसे ध्मनी तंत्रा कहते हैं। श्िाराएं शरीर के विभ्िान्न भागों से रक्त एकत्रिात कर हृदय में पहुँचाती हैं, यह श्िारा - तंत्रा कहलाता है। मेंढक में विशेष संयोजी श्िाराएं यकृत तथा अँातों के मध्य वृक्क तथा शरीर के निचले भागों के मध्य पाइर् जाती है। इन्हें क्रमशः यकृत निवाहिका तंत्रा एवं वृक्कीय निवाहिका तंत्रा कहते हैं। रक्त प्लेज्मा तथा रक्त - कण्िाकाओं से मिलकर बना है। रक्त कण्िाकाएं हैं - लाल रुध्िर कण्िाकाएं ;रक्ताणुद्ध एवं श्वेत रुध्िर कण्िाकाएं ;श्वेताणुद्ध एवं पट्टिकाणु ;प्लेटलेटद्ध। लाल रुध्िर कण्िाकाओं में लाल रंग का श्वसन रंजक हीमोग्लोबिन पाया जाता है। इन कण्िाकाओं में वेंफद्रक पाया जाता है। लसीका रुिार से भ्िान्न होता हैऋ क्योंकि इसमें वुफछ प्रोटीन व लाल रुध्िर कण्िाकाएं अनुपस्िथत होती हैं। परिसंचरण के दौरान रक्त पोषकों गैसों व जल को नियत स्थानों तक ले जाता है। रुध्िर परिसंचरण मांसल हृदय की पंपन िया द्वारा होता है। नाइट्रोजनी अपश्िाष्ट को शरीर से बाहर निकालने के लिए मेंढक में पूणर् विकसित उत्सजीर् तंत्रा होता है। उत्सजीर् अंग में मुख्यतः एक जोड़ी वृक्क, मूत्रावाहिनी, अवस्कर द्वार तथा मूत्राशय होते हैं। ये गहरे लाल रंग के सेम के आकार के होते हैं और देहगुहा में थोड़ा सा पीछे की ओर केशेरुक दंड के दोनों ओर स्िथत होते हैं। प्रत्येक वृक्क कइर् सरंचनात्मक व ियात्मक इकाइयों, मूत्राजन नलिकाओं या वृक्काओं का बना होता है। नर मेंढक में मूत्रा नलिका वृक्क से मूत्रा जनन नलिका के रूप में बाहर आती है। मूत्रावाहिनी अवस्कर द्वार में खुलती है। मादा मेंढक में मूत्रा वाहिनी एवं अंडवाहिनी अवस्कर द्वार में अलग - अलग खुलती हैं। एक पतली दीवार वाला मूत्राशय भी मलाशय के अध्र भाग पर स्िथत होता है, जो कि अवस्कर में खुलता है। मेंढक यूरिया का उत्सजर्न करता है इसलिए यूरिया - उत्सजीर् प्राणी कहलाता है। उत्सजीर् अपश्िाष्ट रक्त द्वारा वृक्क में पहुँचते हैं, जहाँ पर ये अलग कर दिए जाते हंै और उनका उत्सजर्न कर दिया जाता है। नियंत्राण व समन्वय तंत्रा मेंढक में पूणर् विकसित होता है। इनमें अंतः स्रावी गं्रथ्िायाँ ;मदकवबतपदम ेलेजमउद्ध व तंत्रिाका तंत्रा दोनों पाए जाते हैं। विभ्िान्न अंगों में आपसी समन्वयन वुफछ रसायनों द्वारा होता है जिन्हें हॅामोर्न कहते हैं। ये अंतःस्रावी ग्रंथ्िायों द्वारा स्रावित होते हंै। मेंढक की मुख्य अंतःस्रावी ग्रंथ्िायँा हैं - पीयूष ;पिट्यूटरीद्ध, अवटु ;थाॅइराइडद्ध, परावटु ;पैराथाइॅराइडद्ध, थाइमस, पीनियल काय, अग्नाशयी द्वीपकाएं, अध्ि वृक्क ;ंकतमदंसद्ध और जनद ;हवदंकद्ध। तंत्रिाका तंत्रा ;मस्ितष्क तथा मेरु रज्जुद्ध वेंफद्रीय तंत्रिाका तंत्रा, परिध्ीय तंत्रिाका तंत्रा ;कपालीय व मेरु तंत्राद्ध और स्वायत्त तंत्रिाका तंत्रा ;ओटोनोमिक नवर्स सिस्टमद्ध अनुकंपी और परानुकंपी ;सिंपेथेटिक व पैरासिंपेथ्िाटकद्ध तंत्रा का बना होता है। मस्ितष्क से 10 जोड़ी कपाल तंत्रिाकाएं निकलती है। मस्ितष्क, हड्डियों से निमिर्त मस्ितष्क बाॅक्स अथवा कपाल के अंदर बंद रहता है। यह अग्र मस्ितष्क, मध्य मस्ितष्क और पश्च मस्ितष्क में विभाजित होता है। अग्र मस्ितष्क में घ्राण पालियाँ, जुड़वाँ, युग्िमत, प्रमस्ितष्क गोलाध्र् और केवल एक अग्रमस्ितष्क पश्च ;कपमदबमचींसवदद्ध होते हैं। मध्य मस्ितष्क एक जोड़ा दृक पालियों का बना होता है। पश्च मस्ितष्क, अनुमस्ितष्क एवं मेडूला आॅब्लांगेटा का बना होता है। मेडूला आॅब्लांगेटा महारंध््र से निकलकर मेरुदंड में स्िथत मेरुरज्जु से जुड़ा रहता है। मेंढक में भ्िान्न प्रकार के संवेदी अंग पाए जाते हैं। जैसे - स्पशर् अंग ;संवेदी पिप्पलद्ध स्वाद अंग ;स्वाद कलिकाएंद्ध गंध् ;नासिका उपकलाद्ध दृष्िट ;नेत्राद्ध व श्रवण ;कणर् पटह और आंतरिक कणर्द्ध। इन सब में आँखें और आंतरिक कणर् सुव्यवस्िथत होते हैं और बचे हुए दूसरे संवेदी अंग केवल तंत्रिाका सिरों पर कोश्िाकाओं के गुच्छे होते हैं। मेंढक में एक जोड़ी गोलाकार नेत्रा गड्ढों में स्िथत होते हैं। ये साधरण नेत्रा होते हैं। मेंढक में बा“य कणर् अभ्यास 1.एक शब्द या एक पंक्ित में उत्तर दीजिएः ;पद्ध पेरिप्लेनेटा अमेरिकाना का सामान्य नाम लिख्िाए। ;पपद्ध वेंफचुए में कितनी शुक्राणुधनियां पाइर् जाती हैं? ;पपपद्ध तिलचट्टे में अंडाशय की स्िथति क्या है? ;पअद्ध तिलचट्टे के उदर में कितने खंड होते हैं? ;अद्ध मैलपीगी नलिकाएं कहाँ पाइर् जाती हैं? 2.निम्न प्रश्नों के उत्तर दीजिए। ;पद्ध वृक्कक का क्या कायर् है? ;पपद्ध अपनी स्िथति के अनुसार वेंफचुए में कितने प्रकार के वृक्कक पाए जाते हैं? 3.वेंफचुए के जननांगों का नामांकित चित्रा बनाइए। 4.तिलचट्टे की आहारनाल का नामांकित चित्रा बताइए। 5.निम्न में विभेद करेंः ;अद्ध पुरोमुख एवं परितुंड ;बद्ध पटीय ;ेमचजंसद्ध वृक्कक और ग्रसनीय वृक्कक 6.रुध्िर के कणीय अवयव क्या है? 7.निम्न क्या हंै तथा प्राण्िायों के शरीर में कहाँ मिलते हैं? ;अद्धअपास्िथ - अणु ;कोंड्रोसाइटद्ध ;बद्ध तंत्रिाकाक्ष ऐक्सॅान ;सद्ध पक्ष्माभ उपकला 8.रेखांकित चित्रा की सहायता से विभ्िान्न उपकला ऊतकों का वणर्न कीजिए। 9.निम्न में विभेद कीजिए। ;अद्ध सरल उपकला तथा संयुक्त उपकला ऊतक ;बद्ध हृदय पेशी तथा रेख्िात पेशी ;सद्ध सघन नियमित एवं सघन अनियमित संयोजी ऊतक ;दद्ध वसामय तथा रुध्िर ऊतक ;वद्ध सामान्य तथा संयुक्त ग्रंथ्िा 10.निम्न शृंखलाओं में सुमेलित न होने वाले अंशों को इंगित कीजिएः ;अद्ध एरिओल ऊतकऋ रुध्िर, तंत्रिाकोश्िाका न्यूरॅान, कंडरा ;टेंडनद्ध ;बद्ध लाल रुध्िर कण्िाकाएं, सपेफद रुध्िर कण्िाकाएं, प्लेटलेस्ट, उपास्िथ ;सद्ध बाह्यस्रावी, अंतस्रावी, लारग्रंथ्िा, स्नायु ;लिगामेंटद्ध ;दद्ध मैक्िसला, मैंडिबल, लेब्रय, शंृगिका ;एंटिनाद्ध ;वद्ध प्रोटोनेमा, मध्यवक्ष, पश्चवक्ष तथा कक्षंाग ;काॅक्सद्ध 11.स्तंभ - प् और स्तंभ - प्प् को सुमेलित कीजिएः स्तंभ - प् स्तंभ - प्प् ;कद्ध संयुक्त उपकला ;पद्ध आहारनाल ;खद्ध संयुक्त नेत्रा ;पपद्ध तिलचट्टे ;गद्ध पट्टीय वृक्कक ;पपपद्ध त्वचा ;घद्ध खुला परिसंचरण तंत्रा ;पअद्ध किमीर्र दृष्िट ;ड.द्ध अंात्रावलन ;अद्ध वेंफचुआ ;चद्ध अस्िथ अणु ;अपद्ध श्िाश्न खंड ;छद्ध जननेन्िद्रय ;अपपद्ध अस्िथ 12.वेंफचुए के परिसंचरण तंत्रा का संक्षेप में वणर्न करें। 13.मेंढक के पाचन तंत्रा का नामांकित चित्रा बनाइए। 14.निम्न के कायर् बताइएः ;अद्ध मेंढक की मूत्रावाहिनी ;बद्ध मैलपिगी नलिका ;सद्ध वेंफचुए की देहभ्िािा

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