66 जीव विज्ञान पुष्प कलिका तना ;स्तंभद्ध पफल नॅाड इंटर नाॅड कलिका द्वितीयक मूल प्राथमिक मूल मूल तंत्रा चित्रा 5.1 पुष्पी पादप के भाग मुख्य मूल पाश्वर् ;अद्ध मूसला मूल ;बद्ध तंतुक मूल पौधें जैसे घास तथा बरगद में मूल मूलांवुफर की बजाय पौध्े के अन्य भाग से निकलती हैं। इन्हें अपस्थानिक मूल कहते हैं ;चित्रा 5.2 सद्ध। मूल तंत्रा का प्रमुख कायर् मिट्टी से पानी तथा खनिज लवण का अवशोषण, पौध्े को मिट्टी में जकड़ कर रखना, खाद्य पदाथो± का संचय करना तथा पादप नियमकों का संश्लेषण करना है। 5.1.1 मूल के क्षेत्रा मूल का शीषर् अंगुलित्त जैसे मूल गोप से ढका रहता है ;चित्रा 5.3द्ध। यह कोमल शीषर् की तब रक्षा करता है जब मूल मिट्टी में अपना रास्ता बना रही होती है। मूल गोप से वुफछ मिलीमीटर ऊपर मेरिस्टेमी ियाओं का क्षेत्रा होता है। इस क्षेत्रा की कोश्िाकाएँ बहुत छोटी, पतली भ्िािा वाली होती हैं तथा उनमें सघन प्रोटोप्लाज्म होता है। उनमें बार - बार विभाजन होता है। इस क्षेत्रा मंे समीपस्थ स्िथत कोश्िाकाएं शीघ्रता से लंबाइर् में बढ़ती हैं और मूल को लंबाइर् में बढ़ाती हैं। इस क्षेत्रा को दीघीर्करण क्षेत्रा कहते हैं। दीघीर्करण क्षेत्रा की कोश्िाकाओं में अपस्थानिक मूल ;सद्ध चित्रा 5.2 विभ्िान्न प्रकार की जड़ें ;अद्ध मूसला मूल ;बद्ध तंतुक मूल ;सद्ध अपस्थानिक मूल पुष्पी पादपों की आकारिकी विविध्ता तथा परिपक्वता आती है। इसलिए दीघीर्करण के समीप स्िथत क्षेत्रा को परिपक्व क्षेत्रा कहते हैं। इस क्षेत्रा से बहुत पतली तथा कोमल धगे की तरह की संरचनाएँ निकलती हैं जिन्हें मूलरोम कहते हैं। ये मूल रोम मिट्टी से पानी तथा खनिज लवणों का अवशोषण करते हैं। 5.1.2 मूल के रूपांतरण वुफछ पादपों की मूल, पानी तथा खनिज लवण के अवशोषण तथा संवाहन के अतिरिक्त भी अन्य कायो± को करने के लिए अपने आकार तथा संरचना में रूपांतरण कर लेती हैं। वे भोजन संचय करने के लिए, सहारे के लिए, श्वसन के लिए अपने आप को रूपांतरित कर लेती हैं ;चित्रा 5.4 तथा 5.5द्ध। गाजर तथा शलजम की मूसला मूल तथा शकरकंद की अपस्थानिक मूल भोजन को संग्रहित करने के कारण पूफल जाती हैं। क्या आप इसी प्रकार के वुफछ अन्य उदाहरण दे सकते हैं? क्या आपको कभी देख कर यह आश्चयर् हुआ है कि बरगद से लटकती हुइर् संरचनाएँ क्या उसे सहारा देती हैं? इन्हें प्रोप रुट ;सहारा देनी वाली मूलद्ध कहते हैं। इसी प्रकार मक्का तथा गन्ने के तने में भी सहारा देने वाली मूल तने की निचली गाँठों से निकलती हैं। इन्हें अवस्तभ मूल कहते हैं। वुफछ पौधें जैसे राइजोपफोरा, जो अनूप क्षेत्रों में उगते हैं, में बहुत सी मूल भूमि से ऊपर वायु में निकलती हैं। ऐसी मूल को श्वसन मूल कहते हैं। ये श्वसन के लिए आॅक्सीजन प्राप्त करने में सहायक होती हैं। 5.2 तना ऐसे कौन से अभ्िालक्षण हैं जो तने तथा मूल में विभेद स्थापित करते हैं? तना अक्ष का ऊपरी भाग है जिस पर शाखाएँ, पिायाँ, पूफल तथा पफल होते हैं। यह अंवुफरित बीज के भ्रूण के प्रांवुफर से विकसित होता है। तने पर गाँठ तथा पोरियाँ होती हैं। तने के उस क्षेत्रा को जहां पर पिायाँ निकलती है गांठ कहते हैं। ये गांठें अंतस्थ अथवा कक्षीय हो सकती हैं। जब तना शैशव अवस्था में होता है, तब वह प्रायः हरा होता है और बाद में वह काष्ठीय तथा गहरा भूरा हो जाता है। परिपक्वन क्षेत्रा मूल रोम दीघीर्करण क्षेत्रा मूल गोप मेरेस्टेमी सियता क्षेत्रा चित्रा 5.3 मूल शीषर् के क्षेत्रा चित्रा 5.4 बरगद के वृक्ष को सहारे देने के लिए मूल में रूपांतरण 68 जीव विज्ञान शलजम गाजर शक्करकंद ऐसपेरेगस ;अद्ध ;बद्ध चित्रा 5.5 राइजोपफोरा में ;अद्ध संग्रहण ;बद्ध श्वसन के लिए मूल का रूपांतरण तने का प्रमुख कायर् शाखाओं को पफैलाना, पत्ती, पूफल तथा पफल को संभाले रखना है। यह पानी, खनिज लवण तथा प्रकाश संश्लेषी पदाथो± का संवहन करता है। वुफछ तने भोजन संग्रह करने, सहारा तथा सुरक्षा देने और कायिक प्रवध्र्न करने के भी कायर् संपन्न करते हैं। 5.2.1 तने का रूपांतरण तने सदैव आशा के अनुसार प्ररूपी नहीं होते। वे विभ्िान्न कायो± को संपन्न करने के लिए अपने आप को रूपांतरित कर लेते हैं ;चित्रा 5.6द्ध। आलू, अदरक, हल्दी, जमीकंद, अरबी के भूमिगत तने भोजन संचय के लिए रूपांतरित हो जाते हैं। वृि के लिए प्रतिवूफल परिस्िथतियों के समय ये चिरकालिक अंग की तरह कायर् करते हैं। तने के प्रतान जो कक्षीय कली से निकलते हैं, पतले तथा वुफंडलित होते हैं और पौध्े को ऊपर चढ़ने में सहायता करते हैं, जैसे कद्दुवगीर्य सब्जी ;घीया, खीरा, तरबूज आदिद्ध तथा अंगूर लता ;वाइनद्ध तने की कक्षीय कलियाँ काष्ठीय, सीध्े तथा नुकीले कांटों में रूपांतरित हो सकती हैं। कांटे बहुत से पौधें में होते हैं जैसे सिट्रस, बोगेनविलिया।ये पशुओं से पौधें को बचाते हैं। शुष्क क्षेत्रों के पौध्े चपटे तने ;ओपंश्िाया, केक्ट्सद्ध अथवा गूदेदार सिलिंडिराकार ;यूपफाॅरबियाद्ध रचनाओं में रूपांतरित हो जाते हैं इनके तनों में क्लोरोपिफल होता है और प्रकाश - संश्लेषण करते हैं। वुफछ पौध् ांे को भूमिगत तने जैसे घास तथा स्ट्राॅबैरी, आदि नइर् कमर् स्िथति ;निशद्ध में पफैल जाते हैं और जब पुराने पौध्े मर जाते हैं तब नये पौध्े बनते हैं। पोदीना तथा चमेली जैसे पौधों मेें प्रमुख अक्ष के आधर से एक पाश्वर् शाखा निकलती है और वुफछ समय तक वायवीय वृि करने के बाद मुड़कर जमीन को छूते हैं। पिस्िटया तथा आइकोरनिया जैसे कलीय पादपों में एक पाश्वीर्य शाखा निकलती है जिसकी पोरियां छोटी होती हैं और जिसके प्रत्येक गांठ पर पिायों का झुंड तथा पूफल का गुच्छा तथा क्राइसेनिथमम ;गुलदाउदीद्ध में 72 जीव विज्ञान चित्रा 5.11 असीमाक्षी पुष्पक्रम चित्रा 5.12 ससीमाक्षी पुष्पक्रम ससीमाक्षी पुष्पक्रम में प्रमुख अक्ष के शीषर् पर पूफल लगता है, इसलिए इसमें सीमित वृि होती है। पूफल तलाभ्िासारी क्रम में लगे रहते हैं जैसा कि चित्रा 5.12 में दिखाया गया है। 5.5 पुष्प एंजियोस्पमर् में पुष्प ;पूफलद्ध एक बहुत महत्वपूणर् ध्यानकषीर् रचना है। यह एक रूपांतरित प्ररोह है जो लैंगिक जनन के लिए होता है। एक प्ररूपी पूफल में विभ्िान्न प्रकार के विन्यास होते हैं जो क्रमानुसार पूफले हुए पुष्पावृंत जिसे पुष्पासन कहते हैं, पर लगे रहते हैं। ये हैं - केलिक्स, कोरोला, पुमंग तथा जायांग। केलिक्स तथा कोरोला सहायक अंग है जबकि पुमंग तथा जायांग लैंगिक अंग हैं। वुफछ पूफलों जैसे प्याज में केल्िकस तथा कोरोला में कोइर् अंतर नहीं होता। इन्हें परिदलपुंज ;पेरिऐंथद्ध कहते हैं। जब पूफल में पुंकेसर तथा पुमंग दोनों ही होते हैं तब उसे द्विलिंगीअथवा उभयलिंगी कहते हैं। यदि किसी पूफल में केवल एक पुंकेसर अथवा अंडप हो तो उसे एकलिंगी कहते हैं। सममिति में पूफल त्रिाज्यसममिति ;नियमितद्ध अथवा एकव्याससममित ;द्विपाश्िवर्कद्ध हो सकते हैं। जब किसी पूफल को दो बराबर भागों में विभक्त किया जा सके तब उसे त्रिाज्यसममिति कहते हैं। इसके उदाहरण हैं सरसों, ध्तूरा, मिचर्। लेकिन जब पूफल को केवल एक विशेष ऊध्वार्ध्र समतल से दो समान भागों में विभक्त किया जाए तो उसे एकव्याससममित कहते हैं। इसके उदाहरण हैं - मटर, गुलमोहर, सेम, केसिया आदि। जब कोइर् पूफल बीच से किसी भी ऊध्वार्ध्र समतल से दो समान भागों में विभक्त न हो सके तो उसे असममिति अथवा अनियमित कहते हैं। जैसे कि केना । एक पुष्प त्रिातयी, चतुष्टयी, पंचतयी हो सकता है यदि उसमें उनके उपांगों की संख्या 3,4 अथवा 5 के गुणक में हो सकती है। जिस पुष्प में सहपत्रा होते हैं ;पुष्पवृंत के आधार पर छोटी - छोटी पिायाँ होती हैंद्ध उन्हें सहपत्राी कहते हैं और जिसमें सहपत्रा नहीं होते, उन्हें सहपत्राहीन कहते हैं। पुष्पवृंत पर केल्िकस, केरोला, पुमंग तथा अंडाशय की सापेक्ष स्िथति के आधर पर पुष्प को अधेजायांगता ;हाइपोगाइनसद्ध, परिजायांगता ;पेरीगाइनसद्ध, तथा अध्िजायांता पुष्पी पादपों की आकारिकी का ऊध्वर् होता है जिसके द्वारा बीज पफल से जुड़ा बीजावरणरहता है। इसे नाभ्िाका कहते हैं। प्रत्येक बीज में बीजपत्रा प्रांवुफरनाभ्िाका के ऊपर छिद्र होता है जिसे बीजांडद्वार कहते हैं। बीजावरण हटाने के बाद आप बीज पत्रों के बीच भ्रूण को देख सकते हैं। भ्रूण में एक भू्रणीय अक्ष और दो गूदेदार बीज पत्रा होते हैं। बीज पत्रों में भोज्य पदाथर् नाभ्िाका संचित रहता है। अक्ष के निचले नुकीले भाग को बीजांड द्वार मूलांवुफरमूलांवुफर तथा ऊपरी पत्तीदार भाग को प्रांवुफर कहते है ;चित्रा 5.18द्ध। भ्रूणपोष भोजन संग्रह करने वाला चित्रा 5.18 द्विबीजपत्राी बीज की संरचनाऊतक है जो द्विनिषेचन के परिणामस्वरूप बनते हैं। चना, सेम तथा मटर में भ्रूणपोष पतला होता है। इसलिए ये अभ्रूणपोषी हैं जबकि अरंड में यह गूदेदार होता है ;भ्रूण पोषी हैद्ध। 5.7.2 एकबीजपत्राी बीज की संरचना प्रायः एकबीजपत्राी बीज भ्रूणपोषी होते हैं लेकिन उनमें से वुफछ अभू्रणपोषी होते हैं। उदाहरणतः आकिर्ड। अनाज के बीजों जैसे मक्का में बीजावरण झिल्लीदार, तथा पफल भ्िािा से संग्िलत होता है। भ्रूणपोष स्थूलीय होता है और भोजन का संग्रहण करता है। भ्रूणपोष की बाहरी भ्िािा भ्रूण से एक प्रोटीनी सतह द्वारा अलग होती है जिसे एल्यूरोन सतह कहते हैं। भू्रण आकार में छोटा होता है और यह भ्रूण पोष के एक सिरे पर खाँचे में स्िथत होता है। इसमें एक बड़ा तथा ढालाकार बीजपत्रा होता है जिसे स्वुफटेलम कहते हैं। इसमें एक छोटा अक्ष होता है जिसमें प्रांवुफर तथा मूलांवुफर होते हैं। प्रांवुफर तथा मूलांवुफर एक चादर से ढके होते हैं, जिसे क्रमशः प्रांवुफरचोल तथा मूलांवुफरचोल कहते हैं। ;चित्रा 5.19द्ध बीजावरण भ्रूणपोष ऐल्यूरोन सतह स्वुफटेलम प्रांवुफरचोल भ्रूणपोष प्रंावुफर भ्रूण मूलांवुफर मूलांवुफरचोल चित्रा 5.19 एकबीजपत्राी बीज की संरचना 80 जीव विज्ञान ;दद्ध;बद्ध ;सद्ध ;अद्ध ;यद्ध ;रद्ध चित्रा 5.22 सोलैनम नाइग्रम कोइर् को पौध ;अद्ध पुष्पीशाखा ;बद्ध पुष्प ;सद्ध पुष्प की अनुदैघ्यर्काट ;दद्ध पुंकेसर ;यद्ध अंडप ;रद्ध पुष्पी चित्रा कायिक अभ्िालक्षण इसके पौध्े प्रायः शाकीय, झाडि़याँ तथा छोटे वृक्ष वाले होते हैं तनाः शाकीय, कभी - कभी काष्ठीयऋ वायवीय, सीध, सिलिंडिराकर, शाख्िात, ठोस अथवा खोखला, रोमयुक्त अथवा अरोमिल, भूमिगत जैसे आलू ;सोलैनम टयूबीरोसमद्ध, पिायाँः एकांतर, सरल, कमीर् संयुक्त पिच्छाकार अनुपणीर्, जालिका विन्यास पुष्पी अभ्िालक्षणः पुष्पक्रमः एकल, कक्षीय, ससीमाक्षी जैसे सोलैनम मेंऋ पूफलः उभयलिंगी, त्रिाज्यसममिति केल्िकसः पाँच बाह्य दल, संयुक्त, दीघर्स्थायी, कोरस्पशीर् पुष्प दल विन्यास कोरोलाः पाँच दल, संयुक्त, कोरस्पशीर् पुष्पदल विन्यास पुमंगः पाँच पुंकेसर, दललग्न जायांगः द्विअंडपी, युक्तांडपी, अंडाशय ऊध्वार्वतीर्, द्विकोष्ठी, बीजांडासन पूफला हुआ जिसमें बहुत से ब़ीजांड पफलः संपुट अथवा सरस बीजः भ्रूणपोषी, अनेक पुष्पी सूत्रा: ⊕ आथ्िार्क महत्व इस वुफल के अध्िकांश सदस्य भोजन ;टमाटर, बैंगन, आलूद्ध, मसाले ;मिचर्द्ध, औषध्ि ;बेलाडोना, अश्वगंधद्धऋ ध्ूमक ;तंबावूफद्ध, सजावटी पौध्े ;पिटुनिआद्ध के स्रोत हैं। जीव विज्ञान सारांश यदि हम समस्त पादप जगत पर दृष्िट डालें तो पुष्पीय पादप सवार्ध्िक विकसित होते हैं। ये आकार, माप, संरचना, पोषण की विध्ि, जीवन काल, प्रकृति तथा आवास में अत्यध्िक विविध्ता प्रदश्िार्त करते हैं। इनमें मूल तथा प्ररोह तंत्रा भली भँाति विकसित होते हैं। इनमें मूल तंत्रा मूसला अथवा झकड़ा मूल पाइर् जाती हंै। समान्यता के संग्रहण तथा यांत्रिाक सहारे तथा श्वसन के लिए रूपांतरित हो जाती हैं। प्ररोह तंत्रा तना, पत्ती, पुष्प तथा पफलों में बँटा रहता है। तने के आकारिकीय अभ्िालक्षण जैसे गँाठों तथा पोरियों की उपस्िथति, बहुकोश्िाक रोम, तथा घनात्मक प्रकाशानुवतीर् प्रकृति आदि की उपस्िथति से तने तथा मूल में अंतर को आसानी से समझा जा सकता है। तने भी विभ्िान्न कायोर्ं जैसे खाद्य संचयन, कायिक प्रवध्र्न तथा विभ्िान्न परिस्िथतियों में संरक्षण के लिए अपने आप को रूपांतरित कर लेते हैं। पत्ती तने की पाश्वीर्य उ(र्व पर गांठ से बहिर्जाति रूप में विकसित होती है। यह रंग में हरी होती है ताकि प्रकाश संश्लेषण को िया संपन्न हो सके। पिायां आकार, माप, किनारे, शीषर्, तथा पत्ती की स्तरिका के कटाव में सुस्पष्ट विविध्ताएं प्रदश्िार्त करती हैं। पादपों के अन्य भागों की भांति पिायां भी अन्य भागों जैसे प्रतान, चढ़ने के लिए तथा शूल संरक्षण के लिए अपने आप को रूपांतरित कर लेती हंै। पुष्प एक प्रकार के प्ररोह का रूपांतरित रूप है जो लैंगिक जनन संपन्न करता है। पुष्प विभ्िान्न प्रकार के पुष्पक्रम में विन्यस्त रहते हैं। यह संरचना, ज्यामिति, अन्य भागों के सापेक्ष अंडाशय की स्िथति, दलों बाह्य दलों, अंडाशय आदि का क्रमब( विन्यास में भी विविध्ता प्रदश्िार्त करता है। निषेचन के पश्चात अंडाशय से पफल तथा बीजांड से बीजों का निमार्ण होता है। बीज एकबीजपत्राी अथवा द्विबीजपत्राीय हो सकते हैं वे आकार, माप तथा जीवन क्षमता काल में विविध् रूप के होते हैं। पुष्पीय अभ्िालक्षण पुष्पीय पादपों केे वगीर्करण तथा पहचान के आधर माने जाते हैं। इसका वणर्न वुफलों के अ(र् तकनीकी विवरण से चित्रों सहित किया जा सकता है। अतः एक पुष्पी पादप का वणर्न वैज्ञानिक शब्दावली का उपयोग करते हुए निदिर्ष्ट क्रम में कर सकते हैं। पुष्पीय अभ्िालक्षण संक्ष्िाप्त रूप पुष्पीय चित्रों, पुष्पीय अंगों द्वारा निरूपित कर सकते हैं। अभ्यास 1.मूल के रूपांतरण से आप क्या समझते हैं? निम्नलिख्िात में किस प्रकार का रूपांतरण पाया जाता है। ;अद्धबरगद ;बद्ध शलजम ;सद्ध मैंग्रोव वृक्ष 2.बाह्य लक्षणों के आधर पर निम्नलिख्िात कथनों की पुष्िट करें ;पद्ध पौध्े के सभी भूमिगत भाग सदैव मूल नहीं होते ;पपद्धपूफल एक रूपांतरित प्ररोह है 3.एक पिच्छाकार संयुक्त पत्ती हस्ताकार संयुक्त पत्ती से किस प्रकार भ्िान्न है? 4.विभ्िान्न प्रकार के पणर्विन्यास का उदाहरण सहित वणर्न करो।

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