18 जीव विज्ञान एक अलग जगत ‘पंफजाइर्’ के अंतगर्त रखा गया है। सभी प्रोवैफरियोटिक जीवधरियों के साथ ‘माॅनेरा’ तथा एककोश्िाक जीवधरियों को प्रोटिस्टा जगत के अंतगर्त रखा गया है। प्रोटिस्टा जगत के अंतगर्त कोश्िाका भ्िािायुक्त क्लैमाइडोमोनासएवं क्लोरेला ;जिन्हें पहले पादपों के अंतगर्त शैवाल में रखा गया थाद्ध पैरामीश्िायम एवं अमीबा;जिन्हें पहले प्राण्िा जगत में रखा गया थाद्ध के साथ रखा गया है, जिनमें कोश्िाका भ्िािा नहीं पाइर् जाती है। इस प्रकार इस प(ति में अनेक जीवधरियों को एक साथ रखा गया है, जिन्हें पहले की प(तियों में अलग - अलग रखा गया था। ऐसा वगीर्करण के मानदंडों में परिवतर्न के कारण हुआ है। इस प्रकार के परिवतर्न भविष्य में भी हो सकते हैं, जो लक्षणों तथा विकासीय संबंधें के प्रति हमारी समझ में सुधर पर निभर्र होगी। समय के साथ - साथ वगीर्करण की एक ऐसी प(ति विकसित करने का प्रयास किया गया है जो न सिपर्फ आकारिक, कायिक एवं प्रजनन संबंध्ी समानताओं पर आधरित हों, बल्िक जातिवृत्तीय हो और विकासीय संबंधें पर भी आधरित हो। इस अध्याय में हम व्िहटेकर प(ति के अंतगर्त माॅनेरा, प्रोटिस्टा एवं पंफजाइर् के लक्षणों का अध्ययन करेंगे। प्लांटी एवं एनिमेलिया जगत, जिन्हें सामान्य भाषा में क्रमशः पादप एवं प्राण्िा जगत कहते हैं, की चचार् आगे के दो अध्यायों में अलग - अलग करेंगे। 2.1 माॅनेरा जगत सभी बैक्टीरिया माॅनेरा जगत के अंतगर्त आते हैं। ये सूक्ष्मजीवियों में सवार्ध्िक संख्या में होते हैं और लगभग सभी स्थानों पर पाए जाते हैं। मुट्ठी भर मिट्टी में सैकड़ों प्रकार के बैक्टीरिया देखे गए हैं। ये गमर् जल के झरनों, मरूस्थल, बपर्फ एवं गहरे समुद्र जैसे विषम एवं प्रतिकूल वास स्थानों, जहाँ दूसरे जीव मुश्िकल से ही जीवित रह पाते हैं, में भी पाए जाते हैं। कइर् बैक्टीरिया तो अन्य जीवों पर या उनके भीतर परजीवी के रूप में रहते हैं। बैक्टीरिया को उनके आकार के आधर पर चार समूहों गोलाकार कोकस ;बहुवचन कोकाइर्द्ध, छड़ाकार बैसिलस ;बहुवचन बैसिलाइर्द्ध काॅमा - आकार के, विबि्रयम ;बहुवचन - विबि्रयाँद्ध तथा सपिर्लाकार स्पाइरिलम ;बहुवचन स्पाइरिलाद्ध में बाँटा गया है ;चित्रा 2.1द्ध। कशाभबीजाणु बेसिलाइर्कोकाइर् स्पाइरिला विबि्रयो चित्रा 2.1 विभ्िान्न आकार के बैक्टीरिया जीव जगत का वगीर्करण यद्यपि संरचना में बैक्टीरिया अत्यंत सरल प्रतीत होते हैंऋ परंतु इनका व्यवहार अत्यंत जटिल होता हैै। चयपचाय ;उपापचयद्ध की दृष्िट से अन्य जीवधरियों की तुलना में बैक्टीरिया में बहुत अध्िक विविध्ता पाइर् जाती है। उदाहरण स्वरूप वे अपना भोजन अकाबर्निक पदाथोर्ं से संश्लेष्िात कर सकते हैं। ये प्रकाश संश्लेषी स्वपोषी अथवा रसायन संश्लेषी स्वपोषी होते हैं, अथार्त् वे अपना भोजन स्वयं संश्लेष्िात नहीं करते हैंऋ अपितु भोजन के लिए अन्य जीवधरियों अथवा मृत काबर्निक पदाथोर्ं पर निभर्र रहते हैं। 2.1.1 आद्य बैक्टीरिया ये विश्िाष्ट प्रकार के बैक्टीरिया होते हैं, ये बैक्टीरिया अत्यंत कठिन वास स्थानों, जैसे - अत्यंत लवणीय क्षेत्रा ;हैलोपफीद्ध, गमर् झरने ;थमोर्एसिडोपिफलसद्ध एवं कच्छ क्षेत्रा ;मैथेनोजेनद्ध मंे पाए जाते हैं। आद्य बैक्टीरिया तथा अन्य बैक्टीरिया की कोश्िाका भ्िािा की संरचना एक दूसरे से भ्िान्न होती है। यही लक्षण उन्हें प्रतिवूफल अवस्थाओं में जीवित रखने के लिए उत्तरदायी हैं। मैथेनोजेन अनेक रूमिनेंट पशुओं ;जैसे गाय एवं भैंसद्ध के आंत्रा में पाए जाते हैं तथा इनके गोबर से मिथेन ;जैव गैसद्ध वफा उत्पादन वफरते हैं। 2.1.2 यूबैक्टीरिया हजारों यूबैक्टीरिया अथवा वास्तविक बैक्टीरिया की पहचान एक कठोर कोश्िाका भ्िािा एवं एक कशाभ ;चल बैक्टीरियाद्ध द्वारा की जाती है। सायनो बैक्टीरिया ;जिन्हें नील - हरित शैवाल भी कहते हैंद्ध में हरित पादपों की तरह क्लोरोपिफल - ए पाया जाता है तथा ये प्रकाश संश्लेषी स्वपोषी होते हैं ;चित्रा 2.2द्ध। सायनो बैक्टीरिया एककोश्िाक, क्लोनीय अथवा तंतुमय अलवण जलीय समुद्री अथवा स्थलीय शैवाल हैं। इनवफी क्लोनी प्रायः जेलीनुमा आवरण से ढवफी रहती हैं जो प्रदूष्िात जल में बहुत पफलते - पफूलते हैं। बैक्टीरिया जैसे नाॅस्टाॅकएवं एनाबिना पयार्वरण के नाइट्रोजन को टेटरोसिस्ट नामक विश्िाष्ट कोश्िाकाओं द्वारा स्िथर कर सकते हैं। रसायन हेटेरोसिस्ट संश्लेषी बैक्टीरिया नाइट्रेट, नाइट्राइट एवं अमोनिया जैसे विभ्िान्न अकाबर्निक शलेष्मीपदाथोर्ं को आॅक्सीकृत कर उनसे मुक्त ऊजार् का उपयोग एटीपी उत्पादन के आच्छद लिए करते हैं। ये नाइट्रोजन, पफाॅस्पफोरस, आयरन एवं सल्पफर जैसे पोषकों के पुनचर्क्रण में महत्वपूणर् भूमिका निभाते हैं। परपोषी बैक्टीरिया प्रकृति में बहुलता से पाए जाते हैं और इनमें अिाकतर महत्वपूणर् अपघटक होते हैं। इन परपोषी बैक्टीरिया में से अनेक का मनुष्य के जीवन संबध्ी गतिविध्ियों पर महत्वपूणर् प्रभाव पड़ता है। ये दूध् से दही बनाने में, प्रतिजैविकों के उत्पादन में, लेग्युम पादप की जड़ों में नाइट्रोजन स्िथरिकरण में सहायता करते हैं। वुफछ बैक्टीरिया रोगजनक होते हैं जो मनुष्यों, पफसलों, पफामर् एवं पालतू पशुओं को हानि पहुँचाते हैं। विभ्िान्न बैक्टीरिया के कारण हैजा, टायपफाॅयड, टिटनेस, साइट्रस, वैफंकर जैसी चित्रा 2.2 एक तंतुमयी शैवाल - नाॅस्टाॅकबीमारियां होती हैं। 20 जीव विज्ञान कोश्िाका भ्िािा कोश्िाका झिल्ली डीएनए चित्रा 2.3 एक विभक्त होता हुआ बैक्टीरिया बैक्टीरिया प्रमुख रूप से कोश्िाका विभाजन द्वारा प्रजनन करते हैं। कभी - कभी, विपरीत परिस्िथतियों में ये बीजाणु बनाते हैं। ये लैंगिक प्रजनन भी करते हैं, जिनमें एक बैक्टीरिया से दूसरे बैक्टीरिया में डीएनए का पुरातन स्थानांतरण होता है। माइकोप्लाज्मा ऐसे जीवधरी हैं, जिनमें कोश्िाका भ्िािा बिल्वुफल नहीं पाइर् जाती है। ये सबसे छोटी जीवित कोश्िाकाएं हैं, जो आॅक्सीजन के बिना भी जीवित रह सकती हैं। अनेक माइकोप्लाज्मा प्राण्िायों और पादपों के लिए रोगजनक होती हैं। 2.2 प्रोटिस्टा जगत सभी एककोश्िाक यूवैफरियोटिक को प्रोटिस्टा के अंतगर्त रखा गया है, परंतु इस जगत की सीमाएं ठीक तरह से निधर्रित नहीं हो पाइर् हैं। एक जीव वैज्ञानिक के लिए जो ‘प्रकाशसंश्लेषी प्रोटिस्टा’ है, वही दूसरे के लिए ‘एक पादप’ हो सकता है। क्राइसोपफाइट, डायनोफ्रलैजिलेट, युग्लीनाॅइड, अवपंक कवक एवं प्रोटोजोआ सभी को इस पुस्तक में प्रोटिस्टा के अंतगर्त रखा गया है। प्राथमिक रूप से प्रोटिस्टा के सदस्य जलीय होते हैं। यूवैफरियोटिक होने के कारण इनकी कोश्िाका में एक सुसंगठित वेंफद्रक एवं अन्य झिल्लीब( कोश्िाकांग पाए जाते हैं। वुफछ प्रोटिस्टा में कशाभ एवं पक्ष्माभ भी पाए जाते हैं। ये अलैंगिक, तथा कोश्िाका संलयन एवं युग्मनज ;जाइगोटद्ध बनने की विध्ि द्वारा लैंगिक प्रजनन करते हैं। 2.2.1 क्राइसोपफाइट इस समूह के अंतगर्त डाइएटम तथा सुनहरे शैवाल ;डेस्िमडद्ध आते हैं। ये स्वच्छ जल एवं लवणीय ;समुद्रीद्ध पयार्वरण दोनों में पाए जाते हैं। ये अत्यंत सूक्ष्म होते हैं तथा जलधरा के साथ निश्चेष्ट रूप से बहते हैं। डाइएटम में कोश्िाका भ्िािा साबुनदानी की तरह इसी के अनुरूप दो अतिछादित कवच बनाती है। इन भ्िािायों में सिलिका होती है, जिस कारण ये नष्ट नहीं होते हैं। इस प्रकार मृत डाइएटम अपने परिवेश ;वास स्थानद्ध में कोश्िाका भ्िािा के अवशेष बहुत बड़ी संख्या में छोड़ जाते हैं। करोड़ों वषोर्ं में जमा हुए इस अवशेष को ‘डाइएटमी मृदा’ कहते हैं। कणमय होने के कारण इस मृदा का उपयोग पाॅलिश करने, तेलों तथा सिरप के निस्यंदन में होता है। ये समुद्र के मुख्य उत्पादक हैं। 2.2.2 डायनोफ्रलैजिलेट ये जीवधरी मुख्यतः समुद्री एवं प्रकाशसंश्लेषी होते हैं। इनमें उपस्िथत प्रमुख वणर्कों के आधर पीले, हरे, भूरे, नीले अथवा लाल दिखते हैं। इनकी कोश्िाका भ्िािा के बाह्य सतह 26 जीव विज्ञान शीषर् काॅलर आच्छद आर.एन.ए.कैप्िसड तंतु पुच्छ ;अद्ध ;बद्ध चित्रा 2.6 ;अद्ध टोबैको मोजैक वाइरस ;टीएमबीद्ध ;बद्ध जीवाणु भोजी वास्तविक ‘जीवन’ नहीं है - यदि हम यह मानते हैं कि सजीवों की कोश्िाका संरचना होती है। वाइरस अकोश्िाक जीव हैं जिनकी संरचना सजीव कोश्िाका के बाहर रवेदार होती है। एक बार जब ये कोश्िाका को संक्रमित कर देते हैं, तब ये मेजबान कोश्िाका की मशीनरी का उपयोग अपनी प्रतिकृति बनाने में करते हैं और मेजबान को मार देते हैं। क्या आप वाइरस को सजीव अथवा निजीर्व कहेंगे? वाइरस का अथर् है विष अथवा विषैला तरल। पास्चर डी. जे. इबानोवस्की ;1892द्ध ने तंबावूफ के मोजैक रोग के रोगाणुओं को पहचाना था, जिन्हें वाइरस नाम दिया गया। इनका माप बैक्टीरिया से भी छोटा था, क्योंकि ये बैक्टीरिया प्रूपफ पिफल्टर से भी निकल गए थे। एम. डब्ल्यु बेजेरिनेक ;1898द्ध ने पाया कि संक्रमित तंबावूफ के पौधें का रस स्वस्थ तंबावूफ के पौध्े को भी संक्रमित करने में सक्षम है। उन्होंने इस रस ;तरलद्ध को ‘वंफटेजियम वाइनम फ्रलुयइडम’ ;संक्रामक जीवित तरलद्ध कहा। डब्ल्यु. एम. स्टानले ;1935द्ध ने बताया कि वाइरस को रवेदार बनाया जा सकता है और इस रवे में मुख्यतः प्रोटीन होता है। वे अपनी विश्िाष्ट मेजबान कोश्िाका के बाहर निष्िक्रय होते हैं। वाइरस अविकल्पी परजीवी हैं। वाइरस में प्रोटीन के अतिरिक्त आनुवंश्िाक पदाथर् भी होता है, जो आरएनए ;त्छ।द्ध अथवा डीएनए ;क्छ।द्ध हो सकता है। किसी भी वाइरस में आरएनए तथा डीएनए दोनों नहीं होते। वाइरस वेंफद्रक प्रोटीन ;न्यूक्िलयो प्रोटीनद्ध और इसका आनुवंश्िाक पदाथर् संक्रामक होता है। प्रायः सभी पादप वाइरस में एक लड़ी वाला आरएनए होता है, और सभी जंतु वाइरस में एक अथवा दोहरी लड़ी वाला आरएनए अथवा डीएनए होता है। बैक्टीरियल वाइरस अथवा जीवाणुभोजी ;बैक्टीरियोपेफज - आवरण वाइरस जो बैक्टीरिया पर संक्रमण करता हैद्ध प्रायः दोहरी लड़ी

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