अध्याय 1 परिचय अथर्शास्त्रा के एक प्रवतर्कद्ध के द्वारा कहे गए वाक्यांश जीवन के सामान्य कारोबार के संदभर् में मनुष्य के अध्ययन से संबंिात है। आइए, समझें कि इसका तात्पयर् क्या है? जब आप वस्तुएँ खरीदते हैं ;ताकि आप अपनी व्यक्ितगत, अपने परिवार की अथवा उन अन्य व्यक्ितयों की आवश्यकताओं को संतुष्ट कर सवंेफ, जिन्हें आप उपहार देना चाहते हैंद्ध, तब आप उपभोक्ता कहलाते हैं। जब आप वस्तुओं को स्वयं के लाभ के लिए बेचते हैं ;आप दुकानदार हो सकते हैंद्ध, तब आप विक्रेता कहलाते हैं। जब आप वस्तुओं का उत्पादन करते हैं ;आप किसान अथवा विनिमार्ता हो सकते हैंद्ध, तब आप उत्पादक कहलाते हैं। जब आप कोइर् नौकरी करते हैं अथार्त् दूसरों के लिए कायर् करते हैं, जिसके लिए आपको पारिश्रमिक अथर्शास्त्रा में सांख्ियकी दिया जाता है ;आपको किसी ने काम पर रखा हो, जो आपको मशदूरी या वेतन देता होद्ध, तब आप सेवाधारी कहलाते हैं। जब आप भुगतान लेकर अन्य व्यक्ितयों को सेवा प्रदान करते हैं ;आप डाॅक्टर, वकील, बैंकर, टैक्सी चालक या सामान - वाहक हो सकते हैंद्ध, तब आप सेवाप्रदाता कहलाते हैं। इन सभी स्िथतियों में आप किसी आथ्िार्क िया में लाभकारी रूप से नियोजित कहे जाएंगे। आथ्िार्क ियाएँ वे होती हैं, जो धन प्राप्त करने के लिए की जाती हैं। जीवन के आम कारोबार से अथर्शास्ित्रायों का यही तात्पयर् है। बिना दिए वुफछ भी नहीं मिलता यदि आपने कभी अलादीन और उसके जादुइर् चिराग के बारे में सुना हो तो आप इस बात से सहमत होंगे कि अलादीन एक भाग्यशाली व्यक्ित था। वह जब भी, और जो भी वस्तु चाहता था, उसे अपने जादुइर् चिराग को रगड़ना पड़ता था और तुरंत ही उसकी इच्छाओं को पूरा करने के लिए एक जिन्न प्रकट हो जाता था। जब वह रहने के लिए एक महल की इच्छा करता, तब जिन्न उसी क्षण उसके लिए महल बना देता था। जब उसने राजा की बेटी का हाथ माँगने के लिए उस के लिए बहुमूल्य उपहारों की माँग की, तो पलक झपकते ही वे उसे मिल गए। वास्तविक जीवन में हम अलादीन की तरह भाग्यशाली नहीं हो सकते। यद्यपि, हमारी इच्छाएँ उसी की तरह असीमित हैं, परंतु हमारे पास कोइर् जादुइर् चिराग नहीं है। उदाहरणाथर्, आप अपने जेब खचर् को ही ले लीजिए। यदि आपके पास जेब खचर् अिाक होता, तो आप लगभग अपनी सभी इच्िछत वस्तुएँ खरीद सकते थे। लेकिन, चूँकि आपका जेब खचर् सीमित होता है, अतः आप उसी वस्तु को चुनते हैं, जिन्हें आप सबसे ज्यादा आवश्यक मानते हैं। यही अथर्शास्त्रा का आधारभूत सबक है। अभाव सभी आथ्िार्क समस्याओं की जड़ है। यदि अभाव न होता तो कोइर् आथ्िार्क समस्या ही न होती। तब आपको अथर्शास्त्रा पढ़ने की आवश्यकता भी नहीं पड़ती। हम अपने दैनिक जीवन में, विभ्िान्न प्रकार के अभावों का सामना करते हैं। रेलवे आरक्षण - ख्िाड़कियों पर लगी लंबी कतारें, भीड़ भरी बसें एवं रेलगाडि़याँ, अत्यावश्यक वस्तुओं की कमी, किसी नइर् पिफल्म को देखने के लिए टिकट की भारी भीड़ आदि सभी बातें अभाव को व्यक्त करती हैं। हम अभाव का सामना इसलिए करते हैं क्योंकि जो वस्तुएँ हमारी आवश्यकता की पूतिर् करती हैं, उनकी उपलब्धता सीमित होती है। क्या आप अभाव के वुफछ अन्य उदाहरणों की कल्पना कर सकते हैं? उत्पादकों के पास जो संसाधन होते हैं, वे भी सीमित होते हैं और साथ ही उनके वैकल्िपक प्रयोग भी होते हैं। आप भोजन का ही उदाहरण लें, जिसे आप प्रतिदिन खाते हैं। यह आपके पोषण की शरूरतों को पूरा करता है। खेती के कामों में लगे हुए किसान पफसलें उगाते हैं और उनसे आपका भोजन उत्पादितहोता है। समय विशेष पर कृष्िा संसाधनों, जैसे खेत की भूमि, श्रम, पानी, उवर्रक आदि की उपलब्धता निश्िचत होती है। इन सभी संसाधनों के वैकल्िपक प्रयोग भी होते हैं। इन्हीं संसाधनों का प्रयोग खाद्येतर पफसलों जैसे रबर, कपास, जूट आदि के उत्पादन में भी किया जा सकता है। इस प्रकार, संसाधनों का वैकल्िपक प्रयोग उन वस्तुओं के बीच चयन की समस्या को जन्म देता है, जिन्हें इनके द्वारा उत्पादित किया जा सकता है। उपभोग, उत्पादन और वितरण यदि आपने ध्यान से सोचा हो, तो यह महसूस किया होगा कि अथर्शास्त्रा विभ्िान्न प्रकार की आथ्िार्क ियाकलापों में संलग्न मनुष्य का अध्ययन है। इसके लिए, आपको विविध आथ्िार्क ियाकलापों जैसे, उत्पादन, उपभोग, वितरण आदि के बारे में विश्वसनीय तथ्यों को जानने की आवश्यकता होती है। अथर्शास्त्रा के अध्ययन को प्रायः तीन भागों में बाँटा जाता हैः उपभोग, उत्पादन एवं वितरण। हम जानना चाहते है कि उपभोक्ता यह निणर्य वैफसे करता है कि वह अपनी निश्िचत आय और ज्ञात कीमतों ;वस्तुओं कीद्ध को देखते हुए अनेक वैकल्िपक वस्तुओं में से किन वस्तुओं को खरीदे। यह उपभोग का अध्ययन है। ठीक इसी प्रकार हम यह भी जानना चाहते हैं कि कोइर् उत्पादक, जिसे अपनी लागत और कीमतें ज्ञात हैं, इसका चयन वैफसे करता है कि बाजार के लिए क्या उत्पादन करे। यह उत्पादन का अध्ययन है। अंत में, हम यह जानना चाहते हैं कि राष्ट्रीय आय या वुफल आय, जो देश में उत्पादन से प्राप्त होती है, ;जिसे सकल घरेलू उत्पाद कहते हैंद्ध मजदूरी ;एवं वेतनद्ध, लाभ तथा ब्याज ;अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार एवं निवेश से प्राप्त आय को छोड़करद्ध को वैफसे वितरित किया जाता है। यह वितरण का अध्ययन है। अथर्शास्त्रा के इन तीन परंपरागत विभाजनों, जिनके तथ्यों के बारे में हम जानना चाहते हैं, के साथ आधुनिक अथर्शास्त्रा में देश की वुफछ आधारभूत समस्याओं को भी विशेष अध्ययन के लिए सम्िमलित करना होगा। उदाहरणाथर्, आप यह जानना चाहेंगे कि हमारे समाज के वुफछ परिवारों के पास दूसरोें की अपेक्षा अिाक आय अजिर्त करने की क्षमता क्यों और कितनी होती है। आप यह भी जानना चाहेंगे कि हमारे देश में कितने लोग वास्तविक रूप से गरीब हैं, कितने मध्यम - वगर् के हैं और कितने लोग अपेक्षाकृत धनी हैं, आदि। आप यह भी जानना चाहेंगे कि ऐसे निरक्षर लोग कितने हैं, जिन्हें नौकरी नहीं मिलेगी क्योंकि उसके लिए श्िाक्षा की आवश्यकता है, कितने लोग बहुत अिाक श्िाक्ष्िात हैं, जिन्हें अच्छी नौकरियों के अवसर प्राप्त होंगे आदि। दूसरे शब्दों में, आप ऐसे तथ्यों की अिाकािाक संख्यात्मक जानकारी प्राप्त करना चाहेंगे जिनसे समाजमें गरीबी एवं असमानताओं के प्रश्नों का उत्तर मिल सके। यदि आप यह नहीं चाहते कि गरीबी और समाज में व्याप्त घोर विषमताएँ जारी रहें और समाज की इन बुराइयों के विरु( वुफछ किया जाए, तो इस विषय में सरकार द्वारा कोइर् भी उपयुक्त कारर्वाइर् करने की माँग से पहले इन सभी संबंिात तथ्यों की जानकारी लेना आपके लिए आवश्यक होगा। यदि आप तथ्यों को जानें तो आपके लिए अपने जीवन को भी अिाक बेहतर ढंग से नियोजित करना संभव होगा। ठीक उसी प्रकार से, आपने हमारे देश के लिए घातक खतरों के विषय में सुना होगा और वुफछ ने तो इनका सामना भी किया होगा जो मनुष्य के ‘आम जीवन के कारोबार’ को प्रभावित करते हैं, जैसे सुनामी, भूकंप तथा बडर् फ्रलू आदि विपदाएँ। अथर्शास्त्राी इन सभी बातों पर विचार कर सकते हैं, यदि उन्हें इन विपदाओं पर होने वाले खचर् से संबंिात तथ्यों को व्यवस्िथत और सही तरीके से संगृहीत करने और एक साथ प्रस्तुत करने का ज्ञान हो तो। अब आप संभवतः इस पर विचार कर सकते हैं और स्वयं से भी पूछ सकते हैं कि क्या यह सही है कि आधुनिक अथर्शास्त्रा के अध्ययन में उन मूलभूत कौशलों का समावेश है जो कइर् प्रकार के उपयोगी अध्ययनों के लिए आवश्यक हंै, जैसे निधर्नता का मापन, आय का वितरण, आय अजर्न के अवसरों का श्िाक्षा से संबंध, पयार्वरण - संबंधी विपदाओं का हमारे जीवन पर प्रभाव आदि। स्पष्टतः यदि आप इस दिशा में सोचें तो आप यह समझ पाएँगे कि आधुनिक अथर्शास्त्रा के सभी आधुनिक पाठ्यक्रमों में सांख्ियकी को शामिल करने की आवश्यकता हमें क्यों पड़ी। क्या अब आप अथर्शास्त्रा की निम्नलिख्िात परिभाषा से सहमत हैं, जिसका प्रयोग अिाकांश अथर्शास्त्राी करते हैं? व्यक्ित और समाज अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए तथा समाज के विभ्िान्न व्यक्ितयों एवं समूहों में उपभोग हेतु वितरित करने के लिए इसका चुनाव वैफसे करे कि वैकल्िपक प्रयोग वाले अल्प संसाधनों का नियोजन विभ्िान्न वस्तुओं के उत्पादन में वैफसे हो, अथर्शास्त्रा इसका अध्ययन है। अथर्शास्त्रा में सांख्ियकी 2.अथर्शास्त्रा में सांख्ियकी पिछले अनुच्छेद में आपको किसी देश की मूलभूत समस्याओं से संबंिात वुफछ विशेष अध्ययनों के बारे में बताया गया था। इस अध्ययन के लिए आवश्यकता है कि हम आथ्िार्क तथ्यों को संख्याओं के रूप में भली - भाँति जानें। इस प्रकार के आथ्िार्क तथ्यों को आँकड़े भी कहते हैं। इन आथ्िार्क समस्याओं के बारे में आँकड़े संग्रह करने का उद्देश्य इन समस्याओं के विभ्िान्न कारणों को जानना और उनकी व्याख्या करना है। दूसरे शब्दों में, हम उनका विश्लेषण करने की कोश्िाश करते हैं। उदाहरणाथर्, जब हम निधर्नता के कारण उत्पन्न कठिनाइयों का विश्लेषण करते हैं, तब हम इसकी व्याख्या विभ्िान्न कारकों जैसे बेरोजगारी, लोगों की निम्न उत्पादकता, पिछड़ी हुइर् प्रौद्योगिकी आदि, के रूप में करने की कोश्िाश करते हैं। परंतु निधर्नता के विश्लेषण का तब तक कोइर् अथर् नहीं है जब तक हम इसे दूर करने के उपायों को खोज न लें। इसलिए हम उन उपायों को खोजने का प्रयास कर सकते हैं जो आथ्िार्क समस्या को सुलझाने में सहायक हों। अथर्शास्त्रा में ऐसे उपायों को नीतियों के रूप में जाना जाता है। अतः क्या अब आप समझ गए कि किसी आथ्िार्क समस्या के विभ्िान्न कारकों से संबंिात आँकड़ों की उपलब्धता के बिना उस समस्या का कोइर् विश्लेषण संभव नहीं? इसलिए ऐसी स्िथति में, इन्हें हल करने के लिए नीतियों का निमार्ण नहीं किया जा सकता। यदि हाँ, तो आप कापफी हद तक अथर्शास्त्रा एवं सांख्ियकी के बीच के आधारभूत संबंध को समझ चुके हैं। 3.सांख्ियकी क्या है? अब आप संभवतः सांख्ियकी के संदभर् में वुफछ अिाक जानने को उत्सुक हों। आप यह जानना चाहेंगे कि सांख्ियकी की विषय - वस्तु क्या है? अथर्शास्त्रा में इसके क्या विश्िाष्ट उपयोग हैं? क्या ‘सांख्ियकी’ का कोइर् और अथर् भी है? आइये देखें कि इस विषय के अिाक निकट पहुँचने के लिए, हम इन प्रश्नों का हल वैफसे खोजते हैं? हमारे दैनिक बोलचाल की भाषा में सांख्ियकी शब्द का प्रयोग दो भ्िान्न अथार्ें में होता हैः एकवचन में तथा बहुवचन में। आॅक्सपफोडर् शब्दकोष के अनुसार, बहुवचन के रूप में सांख्ियकी का तात्पयर् ‘‘व्यवस्िथत रूप से संगृहीत संख्यात्मक तथ्योंं’’ से है। अतः बहुवचन के रूप में सांख्ियकी का सरल अथर् ‘आँकड़े’ है। क्या आप जानते है कि एकवचन के रूप में सांख्ियकी शब्द का अथर् ‘संख्याओं के संकलन, वगीर्करण तथा प्रयोग का विज्ञान’ अथवा कोइर् ‘सांख्ियकीय तथ्य’ है। आँकड़ों या सांख्ियकी से हमारा तात्पयर् मात्रात्मक एवं गुणात्मक उन दोनों प्रकार के तथ्यों से है, जिनका अथर्शास्त्रा में प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए, अथर्शास्त्रा में यह कथन कि ‘‘भारत में चावल का उत्पादन वषर् 1974μ75 में 39.58 मिलियन टन था, जो वषर् 1984μ85 में बढ़कर 58.64 मिलियन टन हो गया’’ एक मात्रात्मक तथ्य है। यहाँ 39.58 मिलियन टन तथा 58.64 मिलियन टन जैसे संख्यात्मक अंक भारत में क्रमशः वषर् 1974μ75 तथा 1984μ85 में चावल के उत्पादन के सांख्ियकीय आँकड़े हैं। मात्रात्मक आँकड़ों के साथ ही, अथर्शास्त्रा में गुणात्मक आँकड़ों का भी प्रयोग होता है। इस प्रकार की सूचना की मुख्य विशेषता यह होती है कि इसमें किसी व्यक्ित - विशेष या व्यक्ितयों के समूह विशेष केऐसे महत्त्वपूणर् गुणों की व्याख्या होती है, जिन्हें मात्रात्मक रूप से तो नहीं मापा जा सकता लेकिन यथासंभव सही रूप से आलेख्िात करना आवश्यक होता है। उदाहरण के तौर पर ‘लिंग’ को ही लें। इसके द्वारा किसी व्यक्ित में पुरुष/स्त्राी अथवा लड़का/लड़की के रूप में भेद किया जाता है। प्रायः किसी व्यक्ित के किसी गुण की कोटियों के बारे में सूचना देना संभव और उपयोगी होता है, जैसे अच्छा/बुरा, अस्वस्थ/स्वस्थ/अिाक स्वस्थ, अवुफशल/वुफशल/अत्यिाक वुफशल आदिद्ध। इस प्रकार की गुणात्मक सूचना या सांख्ियकी का अथर्शास्त्रा तथा अन्य सामाजिक विज्ञानों में प्रायः प्रयोग किया जाता है। इन्हें मात्रात्मक सूचनाओं की भाँति ही ;कीमत, आय, कर - भुगतान आदिद्ध संकलित और व्यवस्िथत रूप से संगृहीत किया जाता है, चाहे वह एक व्यक्ित के लिए हो या पिफर व्यक्ितयों के समूह के लिए। अगले अध्यायों में आप अध्ययन करेंगे कि सांख्ियकी का संबंध आँकड़ों के संग्रहण एवं व्यवस्थापन से है। इसका अगला चरण आँकड़ों को सारणीब(, आरेखी एवं आलेखी रूपों में प्रस्तुत करना है। इसके पश्चात् इन आँकड़ों को माध्य, प्रसरण, मानक विचलन आदि उन विभ्िान्न संख्यात्मक सूचकांकों का परिकलन करके संक्ष्िाप्त किया जाता है, जो सूचना के संगृहीत समुच्चय की व्यापक विशेषताओं को दशार्ते हैं।4.सांख्ियकी क्या करती है? अब तक आप जान चुके होंगे कि किसी अथर्शास्त्राी के लिए सांख्ियकी एक ऐसा अपरिहायर् साधन है, जो किसी आथ्िार्क समस्या को समझने में उसकी सहायता अथर्शास्त्रा में सांख्ियकी करता है। इसकी विभ्िान्न वििायों का प्रयोग करते हुए किसी आथ्िार्क समस्या के कारणों को गुणात्मक एवं मात्रात्मक तथ्यों की सहायता से खोजने का प्रयास किया जाता है। एक बार जब समस्या के कारणों का पता चल जाता है, तब इससे निपटने के लिए निश्िचत नीतियों का निमार्ण करना सरल हो जाता है। परंतु सांख्ियकी का क्षेत्रा इससे कहीं अिाक विस्तृत है। यह किसी अथर्शास्त्राी को आथ्िार्क तथ्यों को यथातथ्य तथा निश्िचत रूप में प्रस्तुत करने योग्य बनाता है, जो दिए गए कथन को सही ढंग से समझने में सहायता करता है। जब आथ्िार्क तथ्यों को सांख्ियकीय रूप में व्यक्त किया जाता है तब वे यथाथर् तथ्य बन जाते हैं। यथाथर् तथ्य अस्पष्ट कथनों की अपेक्षा अिाक विश्वसनीय होते हैं। उदाहरण के लिए, एक यथा तथ्य संख्या बताते हुए यह कहना कि ‘‘कश्मीर में हाल ही में आए भूवंफप के दौरान 310 लोगों की मौत हुइर्’’ कहीं अिाक तथ्यात्मक है, अतः यह सांख्ियकीय आँकड़ा है। जबकि, यह कहना कि सैकड़ों लोगों की मौत हुइर्, सांख्ियकीय आँकड़ा नहीं है। सांख्ियकी, आँकड़ों के समूह को वुफछ संख्यात्मक मापों ;जैसे माध्य, प्रसरण आदि जिनके बारे में आप आगे पढ़ेंगेद्ध के रूप में संक्ष्िाप्त करने में सहायता करती है। ये संख्यात्मक माप आँकड़ों के संक्ष्िाप्तीकरण में सहायता करते हैं। उदाहरण के लिए, यदि किसी आँकड़े में लोगों की संख्या बहुत अिाक है, तो आपके लिए उन सबकी आय को याद रख पाना असंभव है। पिफर, किसी व्यक्ित के लिए सांख्ियकीय रूप से प्राप्त संक्ष्िाप्त अंकों, जैसे औसत आय, को याद रखना आसान है। इस प्रकार, सांख्ियकी के द्वारा आँकड़ों के समूह के विषय में साथर्क एवं समग्र सूचनाएँ प्रस्तुत की जाती हैं। प्रायः सांख्ियकी का प्रयोग विभ्िान्न आथ्िार्क कारकों के बीच संबंधों को ज्ञात करने के लिए किया जाता है। किसी अथर्शास्त्राी की रुचि को यह जानने में हो सकती है कि जब किसी वस्तु की कीमत में कमी अथवा वृि होती है तो उसकी माँग पर क्या प्रभाव पड़ता है? या पिफर, उस वस्तु की अपनी ही कीमतों में परिवतर्न से उसकी पूतिर् प्रभावित होगी? या, जब लोगों की औसत आय बढ़ती है तो क्या उनके उपभोग - व्यय में वृि होती है? या, जब सरकारी व्यय बढ़ जाता है, तो सामान्य मूल्य - स्तर पर क्या प्रभाव पड़ता है? ऐसे प्रश्नोंका उत्तर तभी दिया जा सकता है जब विभ्िान्न आथ्िार्क घटकों के बीच किसी प्रकार का परस्पर संबंध विद्यमानहो, जिनकी व्याख्या ऊपर की जा चुकी है। इस प्रकार का कोइर् परस्पर संबंध विद्यमान है या नहीं, इसे उन आँकड़ों में सांख्ियकीय वििायों का प्रयोग करके सरलता से सत्यापित किया जा सकता है। कभी - कभी अथर्शास्त्राी उनके बीच एक निश्िचत संबंध की कल्पना करके इसका परीक्षण कर सकते हैं कि संबंध के बारे में उनकी पूवर्धारणा वैध है या नहीं। अथर्शास्त्राी ऐसा केवल सांख्ियकीय तकनीकों का प्रयोग करके ही कर सकते हंै। किसी अन्य स्िथति में, अथर्शास्त्राी किसी अन्य कारक में परिवतर्न के पफलस्वरूप किसी एक आथ्िार्क कारक में परिवतर्नों का पूवार्नुमान लगाने में रुचि रख सकते हैं। उदाहरणाथर्, उनकी रुचि भविष्य की राष्ट्रीय आय पर आज के निवेश के प्रभाव को जानने में हो सकती है। इस प्रकार की कोइर् भी कायर् - प्रिया सांख्ियकी के ज्ञान के बिना नहीं की जा सकती है। कभी - कभी योजनाओं एवं नीतियों के निमार्ण के लिए भविष्य की प्रवृिायों के ज्ञान की आवश्यकता होती है। उदाहरणाथर्, एक आथ्िार्क योजनाकार वषर् 2005 में यह निणर्य करता है कि 2010 में अथर्व्यवस्था में कितना उत्पादन होना चाहिए। दूसरे शब्दों में, यह जानना आवश्यक होगा कि वषर् 2010 के लिए उत्पादन योजना निश्िचत करने के लिए वषर् 2010 में अपेक्ष्िात उपभोग स्तर क्या होगा? ऐसी स्िथति में, कोइर् व्यक्ित वषर् 2010 के उपभोग के अनुमान के आधार पर निणर्य ले सकता है। विकल्प के रूप में, वह वषर् 2010 में उपभोग के पूवार्नुमान के लिए सांख्ियकीय वििायों का प्रयोग कर सकता है। ऐसा पिछले वषार्ें के अथवा हाल के वुफछ वषार्ें के सवर्ेक्षण से प्राप्त उपभोग - आँकड़ों के आधार पर हो सकता है। इस प्रकार, सांख्ियकीय वििायाँ ऐसी उपयुक्त आथ्िार्क नीतियों के गठन में सहायता देती हैं, जिनसे आथ्िार्क समस्याओं का समाधान हो सकता है। 5.सारांश आजकल हम गंभीर आथ्िार्क समस्याओं, जैसे मूल्यवृि, बढ़ती जनसंख्या, बेरोजगारी, निधर्नता आदि के विश्लेषण में सांख्ियकी का अिाकािाक प्रयोग कर रहे हैं, ताकि इन समस्याओं को हल करने के उपाय ढूँढ़े जा सवंेफ। इसके अतिरिक्त यह आथ्िार्क समस्याओं के समाधान में इन नीतियों के प्रभाव का मूल्यांकन करने में भी सहायक है। उदाहरण के लिए, सांख्ियकीय तकनीकों का प्रयोग करके निरंतर बढ़ती जनसंख्या पर रोक लगाने के लिए परिवार नियोजन की नीतियाँ प्रभावशाली हैं या नहीं, इसका पता सरलता से लगाया जा सकता है। आथ्िार्क नीतियों के निणर्य की प्रिया में सांख्ियकीकी एक महत्त्वपूणर् भूमिका है। उदाहरण के लिए,वत्तर्मान समय में विश्व भर में तेल की बढ़ती कीमतों के कारण यह निणर्य करना आवश्यक हो सकता है कि वषर् 2010 में भारत को कितना तेल आयात करना चाहिए। तेल के आयात का निणर्य प्रत्याश्िात घरेलू तेल उत्पादन तथा वषर् 2010 में तेल की संभावित माँग पर निभर्र होगा। सांख्ियकी के प्रयोग बिना यह ज्ञात नहीं किया जा सकता कि वषर् 2010 में तेल का प्रत्याश्िात घरेलू उत्पादन तथा तेल की संभावित माँग क्या होगी? इसलिए, तेल के आयात का निणर्य तब तक नहीं किया जा सकता है, जब तक हमें तेल की वास्तविक आवश्यकता की जानकारी न हो। तेल के आयात के विषय में निणर्य की दृष्िट से यह महत्वपूणर् जानकारी केवल सांख्ियकी के द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है। सांख्ियकीय वििायाँ सामान्य बुि का स्थानापन्न नहीं हैं! सांख्ियकी का उपहास करने के लिए एक रोचक कहानी सुनाइर् जाती है। ऐसा कहा जाता है कि एक बार चार व्यक्ितयों का एक परिवार ;पति - पत्नी तथा दो बच्चेद्ध नदी पार करने निकले। पिता को नदी की औसत गहराइर् की जानकारी थी। अतः उसने परिवार के सदस्यों के औसत कद का हिसाब लगाया। चूँकि परिवार के सदस्यों का औसत कद, नदी की औसत गहराइर् से अिाक था, इसलिए उसने सोचा कि वे सभी सुरक्ष्िात रूप से नदी पार कर सकते हैं। परिणामस्वरूप, नदी पार करते समय परिवार के वुफछ सदस्य ;बच्चेद्ध पानी में डूब गए। क्या यह दोष औसतों के परिकलन की सांख्ियकीय वििा का है अथवा औसतों के दुरुपयोग का? अथर्शास्त्रा में सांख्ियकी पुनरावतर्न ऽ हमारी आवश्यकताएँ असीमित हैं, परंतु इन्हें पूरा करने वाली वस्तुओं के उत्पादन में प्रयुक्त होने वाले संसाधन सीमित एवं दुलर्भ हैं। यह दुलर्भता ही आथ्िार्क समस्याओं की जड़ है। ऽ संसाधनों के वैकल्िपक प्रयोग होते हैं। ऽ अपनी विभ्िान्न आवश्यकताओं की पूतिर् करने के लिए उपभोक्ताओं द्वारा वस्तुओं का क्रय, उपभोग कहलाता है। ऽ उत्पादकों द्वारा बाजार में बेचने के लिए वस्तुओं का विनिमार्ण उत्पादन कहलाता है। ऽ राष्ट्रीय आय के मजदूरी, लाभ, किराए तथा ब्याज में विभाजन को वितरण कहा जाता है। ऽ सांख्ियकी के अंतगर्त आँकड़ों का प्रयोग करते हुए आथ्िार्क संबंधों का पता लगाया जाता है और उनकी सत्यता की जाँच वफी जाती है। ऽ सांख्ियकीय साधनों का प्रयोग भावी प्रवृिायों के पूवार्नुमान हेतु किया जाता है। ऽ सांख्ियकीय वििायाँ आथ्िार्क समस्याओं का विश्लेषण करने तथा उन्हें हल करने के लिए नीतियों के निमार्ण में सहायक होती हैं। अभ्यास 1. निम्नलिख्िात कथन सही है अथवा गलत? इन्हें तदनुसार चिित करेंः ;कद्ध सांख्ियकी केवल मात्रात्मक आँकड़ों का अध्ययन करती है। ;खद्ध सांख्ियकी आथ्िार्क समस्याओं का समाधान करती है। ;गद्ध आँकड़ों के बिना अथर्शास्त्रा में सांख्ियकी का कोइर् उपयोग नहीं है। 2.उन ियाकलापों की सूची बनाएँ जो जीवन के सामान्य कारोबार के अंग होते हैं। क्या ये आथ्िार्क ियाकलाप हैं? 3.सरकार और नीति - निमार्ता आथ्िार्क विकास के लिए उपयुक्त नीतियों के निमार्ण के लिए सांख्ियकीय आँकड़ों का प्रयोग करते हैं। दो उदाहरणों सहित व्याख्या कीजिए। 4.आपकी आवश्यकताएँ असीमित हैं तथा उनकी पूतिर् करने के लिए आपके पास संसाधन सीमित हैं। दो उदाहरणों द्वारा इसकी व्याख्या करें। 5.उन आवश्यकताओं का चुनाव आप वैफसे करेंगे, जिनकी आप पूतिर् करना चाहेंगे? 6.आप अथर्शास्त्रा का अध्ययन क्यों करना चाहते है? कारण बताइए। 7.सांख्ियकीय वििायाँ सामान्य बुि का स्थानापन्न नहीं होती! टिप्पणी कीजिए।

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Arthashastramesankhyiki-001

अध्याय 1


परिचय

इस अध्याय को पढ़ने के बाद आप इस योग्य होंगे किः

अर्थशास्त्र की विषय-वस्तु के बारे में जान सकें;

समझ सकें कि अर्थशास्त्र उपभोग, उत्पादन तथा वितरण में आर्थिक क्रियाओं के अध्ययन से किस प्रकार संबंधित है;

जान सकें कि उपभोग, उत्पादन तथा वितरण की व्याख्या में सांख्यिकी का ज्ञान कैसे सहायक हो सकता है;

आर्थिक क्रियाओं की बेहतर समझ के लिए सांख्यिकी के प्रयोगों के बारे में सीख सकें।

1. अर्थशास्त्र क्यों?

विद्यालय की पूर्ववर्ती कक्षाओं में संभवतः अर्थशास्त्र आपका एक विषय रहा होगा। आपको यह बताया गया होगा कि विषय मुख्यतः एल्फ्रेड मार्शल (आधुनिक अर्थशास्त्र के एक प्रवर्तक) के द्वारा कहे गए वाक्यांश
जीवन के सामान्य कारोबार के संदर्भ में मनुष्य के अध्ययन से संबंधित है। आइए, समझें कि इसका तात्पर्य क्या है?

जब आप वस्तुएँ खरीदते हैं (ताकि आप अपनी व्यक्तिगत, अपने परिवार की अथवा उन अन्य व्यक्तियों की आवश्यकताओं को संतुष्ट कर सकें, जिन्हें आप उपहार देना चाहते हैं), तब आप उपभोक्ता कहलाते हैं।

जब आप वस्तुओं को स्वयं के लाभ के लिए बेचते हैं (आप दुकानदार हो सकते हैं), तब आप विक्रेता कहलाते हैं।

जब आप वस्तुओं का उत्पादन करते हैं (आप किसान अथवा विनिर्माता हो सकते हैं) या सेवाएँ प्रदान करते हैं (आप डॉक्टर, कुली, टैक्सी चालक या वस्तुओं के परिवहन-संचालक हो सकते हैं), तो आप उत्पादक कहलाते हैं।

जब आप कोई नौकरी करते हैं अर्थात् दूसरों के लिए कार्य करते हैं, जिसके लिए आपको पारिश्रमिक दिया जाता है (आपको किसी ने काम पर रखा हो, जो आपको मज़दूरी या वेतन देता हो), तब आप कर्मचारी कहलाते हैं।

जब आप भुगतान लेकर अन्य व्यक्तियों को सेवा प्रदान करते हैं (आप डॉक्टर, वकील, बैंकर, टैक्सी चालक या सामान-वाहक हो सकते हैं), तब आप नियोक्ता कहलाते हैं।

इन सभी स्थितियों में आप किसी आर्थिक क्रिया में लाभकारी रूप से नियोजित कहे जाएंगे। आर्थिक क्रियाएँ वे होती हैं, जो धन प्राप्त करने के लिए की जाती हैं। जीवन के आम कारोबार से अर्थशास्त्रियों का यही तात्पर्य है।

क्रियात्मक गतिविधियाँ

• अपने परिवार के सदस्यों के विभिन्न क्रियाकलापों की सूची बनाएँ। क्या आप उन्हें आर्थिक क्रियाकलाप कहेंगे? कारण बताएँ।

• क्या आप स्वयं को एक उपभोक्ता मानते हैं? क्यों?


बिना दिए कुछ भी नहीं मिलता

यदि आपने कभी अलादीन और उसके जादुई चिराग के बारे में सुना हो तो आप इस बात से सहमत होंगे कि अलादीन एक भाग्यशाली व्यक्ति था। वह जब भी, और जो भी वस्तु चाहता था, उसे अपने जादुई चिराग को रगड़ना पड़ता था और तुरंत ही उसकी इच्छाओं को पूरा करने के लिए एक जिन्न प्रकट हो जाता था। जब वह रहने के लिए एक महल की इच्छा करता, तब जिन्न उसी क्षण उसके लिए महल बना देता था। जब उसने राजा की बेटी का हाथ माँगने के लिए उस के लिए बहुमूल्य उपहारों की माँग की, तो पलक झपकते ही वे उसे मिल गए।

वास्तविक जीवन में हम अलादीन की तरह भाग्यशाली नहीं हो सकते। यद्यपि, हमारी इच्छाएँ उसी की तरह असीमित हैं, परंतु हमारे पास कोई जादुई चिराग नहीं है। उदाहरणार्थ, आप अपने जेब खर्च को ही ले लीजिए। यदि आपके पास जेब खर्च अधिक होता, तो आप लगभग अपनी सभी इच्छित वस्तुएँ खरीद सकते थे। लेकिन, चूँकि आपका जेब खर्च सीमित होता है, अतः आप उसी वस्तु को चुनते हैं, जिन्हें आप सबसे ज्यादा आवश्यक मानते हैं। यही अर्थशास्त्र का आधारभूत सबक है।

क्रियात्मक गतिविधियाँ

• क्या आप स्वयं कुछ अन्य एेसे उदाहरणों की कल्पना कर सकते हैं, जहाँ व्यक्ति को यह चुनना होता है कि वह वर्तमान कीमतों पर अपनी निश्चित आय से किन वस्तुओं को और उनकी कितनी मात्रा खरीद सकता है?

• यदि वर्तमान कीमतें बढ़ जाएँ तब क्या होगा?

अभाव सभी आर्थिक समस्याओं की जड़ है। यदि अभाव न होता तो कोई आर्थिक समस्या ही न होती। तब आपको अर्थशास्त्र पढ़ने की आवश्यकता भी नहीं पड़ती। हम अपने दैनिक जीवन में, विभिन्न प्रकार के अभावों का सामना करते हैं। रेलवे आरक्षण-खिड़कियों पर लगी लंबी कतारें, भीड़ भरी बसें एवं रेलगाड़ियाँ, अत्यावश्यक वस्तुओं की कमी, किसी नई फिल्म को देखने के लिए टिकट की भारी भीड़ आदि सभी बातें अभाव को व्यक्त करती हैं। हम अभाव का सामना इसलिए करते हैं क्योंकि जो वस्तुएँ हमारी आवश्यकता की पूर्ति करती हैं, उनकी उपलब्धता सीमित होती है। क्या आप अभाव के कुछ अन्य उदाहरणों की कल्पना कर सकते हैं?

उत्पादकों के पास जो संसाधन होते हैं, वे भी सीमित होते हैं और साथ ही उनके वैकल्पिक प्रयोग भी होते हैं। आप भोजन का ही उदाहरण लें, जिसे आप प्रतिदिन खाते हैं। यह आपके पोषण की ज़रूरतों को पूरा करता है। खेती के कामों में लगे हुए किसान फसलें उगाते हैं और उनसे आपका भोजन उत्पादित होता है। समय विशेष पर कृषि संसाधनों, जैसे खेत की भूमि, श्रम, पानी, उर्वरक आदि की उपलब्धता निश्चित होती है। इन सभी संसाधनों के वैकल्पिक प्रयोग भी होते हैं। इन्हीं संसाधनों का प्रयोग खाद्येतर फसलों जैसे रबर, कपास, जूट आदि के उत्पादन में भी किया जा सकता है। इस प्रकार, संसाधनों का वैकल्पिक प्रयोग उन वस्तुओं के बीच चयन की समस्या को जन्म देता है, जिन्हें इनके द्वारा उत्पादित किया जा सकता है।

क्रियात्मक गतिविधियाँ

• आपकी कौन-कौन सी आवश्यकताएँ हैं? आप उनमें से कितनों को पूरा कर सकते हैं? उनमें से कितनी अपूर्ण रह जाती हैं? आप उन्हें पूरा कर पाने में क्यों असमर्थ रहते हैं?

• आप अपने दैनिक जीवन में कितने प्रकार के अभावों का सामना करते हैं? उनके कारणों का पता लगाएँ।


उपभोग, उत्पादन और वितरण

यदि आपने ध्यान से सोचा हो, तो यह महसूस किया होगा कि अर्थशास्त्र विभिन्न प्रकार की आर्थिक क्रियाकलापों में संलग्न मनुष्य का अध्ययन है। इसके लिए, आपको विविध आर्थिक क्रियाकलापों जैसे, उत्पादन, उपभोग, वितरण आदि के बारे में विश्वसनीय तथ्यों को जानने की आवश्यकता होती है। अर्थशास्त्र के अध्ययन को प्रायः तीन भागों में बाँटा जाता हैः उपभोग, उत्पादन एवं वितरण। हम जानना चाहते हैं कि उपभोक्ता यह निर्णय कैसे करता है कि वह अपनी निश्चित आय और ज्ञात कीमतों (वस्तुओं की) को देखते हुए अनेक वैकल्पिक वस्तुओं में से किन वस्तुओं को खरीदे। यह उपभोग का अध्ययन है।

ठीक इसी प्रकार हम यह भी जानना चाहते हैं कि कोई उत्पादक, जिसे अपनी लागत और कीमतें ज्ञात हैं, इसका चयन कैसे करता है कि बाजार के लिए क्या उत्पादन करे। यह उत्पादन का अध्ययन है।

अंत में, हम यह जानना चाहते हैं कि राष्ट्रीय आय या कुल आय, जो देश में उत्पादन से प्राप्त होती है, (जिसे सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं) मजदूरी (एवं वेतन), लाभ तथा ब्याज (अंतर्राष्ट्रीय व्यापार एवं निवेश से प्राप्त आय को छोड़कर) को कैसे वितरित किया जाता है। यह वितरण का अध्ययन है।

अर्थशास्त्र के इन तीन परंपरागत विभाजनों, जिनके तथ्यों के बारे में हम जानना चाहते हैं, के साथ आधुनिक अर्थशास्त्र में देश की कुछ आधारभूत समस्याओं को भी विशेष अध्ययन के लिए सम्मिलित करना होगा।

उदाहरणार्थ, आप यह जानना चाहेंगे कि हमारे समाज के कुछ परिवारों के पास दूसरोें की अपेक्षा अधिक आय अर्जित करने की क्षमता क्यों और कितनी होती है। आप यह भी जानना चाहेंगे कि हमारे देश में कितने लोग वास्तविक रूप से गरीब हैं, कितने मध्यम- वर्ग के हैं और कितने लोग अपेक्षाकृत धनी हैं, आदि। आप यह भी जानना चाहेंगे कि एेसे निरक्षर लोग कितने हैं, जिन्हें नौकरी नहीं मिलेगी क्योंकि उसके लिए शिक्षा की आवश्यकता है, कितने लोग बहुत अधिक शिक्षित हैं, जिन्हें अच्छी नौकरियों के अवसर प्राप्त होंगे आदि । दूसरे शब्दों में,आप एेसे तथ्यों की अधिकाधिक संख्यात्मक जानकारी प्राप्त करना चाहेंगे जिनसे समाज में गरीबी एवं असमानताओं के प्रश्नों का उत्तर मिल सके। यदि आपयह नहींचाहते कि गरीबी और समाज में व्याप्त घोर विषमताए जारी रहें और समाज की इन बुराइयों के विरुद्ध कुछ किया जाए,तो इस विषय में सरकार द्वारा कोई भी उपयुक्त कार्रवाई करने की माँग से पहले इन सभी संबंधित तथ्यों की जानकारी लेना आपके लिए आवश्यक होगा। यदि आप तथ्यों को जानें तो आपके लिए अपने जीवन को भी अधिक बेहतर ढंग से नियोजित करना संभव होगा। ठीक उसी प्रकार से, आपने हमारे देश के लिए घातक खतरों के विषय में सुना होगा और कुछ ने तो इनका सामना भी किया होगा जो मनुष्य के ‘आम जीवन के कारोबार’ को प्रभावित करते हैं, जैसे सुनामी, भूकंप तथा बर्ड फ्लू आदि विपदाएँ। अर्थशास्त्री इन सभी बातों पर विचार कर सकते हैं, यदि उन्हें इन विपदाओं पर होने वाले खर्च से संबंधित तथ्यों को व्यवस्थित और सही तरीके से संगृहीत करने और एक साथ प्रस्तुत करने का ज्ञान हो तो। अब आप संभवतः इस पर विचार कर सकते हैं और स्वयं से भी पूछ सकते हैं कि क्या यह सही है कि आधुनिक अर्थशास्त्र के अध्ययन में उन मूलभूत कौशलों का समावेश है जो कई प्रकार के उपयोगी अध्ययनों के लिए आवश्यक हैं, जैसे निर्धनता का मापन, आय का वितरण, आय अर्जन के अवसरों का शिक्षा से संबंध, पर्यावरण-संबंधी विपदाओं का हमारे जीवन पर प्रभाव आदि।

स्पष्टतः यदि आप इस दिशा में सोचें तो आप यह समझ पाएँगे कि आधुनिक अर्थशास्त्र के सभी आधुनिक पाठ्यक्रमों में सांख्यिकी को शामिल करने की आवश्यकता हमें क्यों पड़ी।

क्या अब आप अर्थशास्त्र की निम्नलिखित परिभाषा से सहमत हैं, जिसका प्रयोग अधिकांश अर्थशास्त्री करते हैं?

व्यक्ति और समाज अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए तथा समाज के विभिन्न व्यक्तियों एवं समूहों में उपभो हेतु वितरित रने के लिए इसका चुनाव कैसे करे कि वैकल्पिक प्रयोग वाले अल्प संसाधनों का प्रयोग विभिन्न वस्तुओं के उत्पादन में हो सके, अर्थशास्त्र इसका अध्ययन है।

क्रियात्मक गतिविधि

• उपर्युक्त विवेचना के आधार पर क्या आप कह सकते हैं कि अब यह परिभाषा थोड़ी अपर्याप्त-सी लगती है? इसमें क्या कमी है?

2. अर्थशास्त्र में सांख्यिकी

पिछले अनुच्छेद में आपको किसी देश की मूलभूत समस्याओं से संबंधित कुछ विशेष अध्ययनों के बारे में बताया गया था। इस अध्ययन के लिए आवश्यकता है कि हम आर्थिक तथ्यों को संख्याओं के रूप में भली-भाँति जानें। इस प्रकार के आर्थिक तथ्यों को आँकड़े भी कहते हैं।

इन आर्थिक समस्याओं के बारे में आँकड़े संग्रह करने का उद्देश्य इन समस्याओं के विभिन्न कारणों को जानना और उनकी व्याख्या करना है। दूसरे शब्दों में, हम उनका विश्लेषण करने की कोशिश करते हैं। उदाहरणार्थ, जब हम निर्धनता के कारण उत्पन्न कठिनाइयों का विश्लेषण करते हैं, तब हम इसकी व्याख्या विभिन्न कारकों जैसे बेरोजगारी, लोगों की निम्न उत्पादकता, पिछड़ी हुई प्रौद्योगिकी आदि, के रूप में करने की कोशिश करते हैं।

परंतु निर्धनता के विश्लेषण का तब तक कोई अर्थ नहीं है जब तक हम इसे दूर करने के उपायों को खोज न लें। इसलिए हम उन उपायों को खोजने का प्रयास कर सकते हैं जो आर्थिक समस्या को सुलझाने में सहायक हों। अर्थशास्त्र में एेसे उपायों को नीतियों के रूप में जाना जाता है।

अतः क्या अब आप समझ गए कि किसी आर्थिक समस्या के विभिन्न कारकों से संबंधित आँकड़ों के बिना उस समस्या का कोई विश्लेषण संभव नहीं? इसलिए एेसी स्थिति में, इन्हें हल करने के लिए नीतियों का निर्माण नहीं किया जा सकता। यदि हाँ, तो आप काफी हद तक अर्थशास्त्र एवं सांख्यिकी के बीच के आधारभूत संबंध को समझ चुके हैं।

3. सांख्यिकी क्या है?

अब आप संभवतः सांख्यिकी के संदर्भ में कुछ
अधिक जानने को उत्सुक हों। आप यह जानना चाहेंगे कि सांख्यिकी की विषय-वस्तु क्या है?

सांख्यिकी का संबंध आँकड़ों के एकत्रीकरण, प्रस्तुतीकरण तथा विश्लेषण से है। ये आँकड़े भौतिकी शास्त्र, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान या किसी भी क्षेत्र से हो सकते हैं।

यहाँ हमारा संबंध अर्थशास्त्र के क्षेत्र के आँकड़ों से है। अर्थशास्त्र के अधिकतर आँकड़े मात्रात्मक होते हैं।

उदाहरण के लिए, अर्थशास्त्र में यह कथन कि ‘‘भारत में चावल का उत्पादन वर्ष 1974–75 में 39.58 मिलियन टन था, जो वर्ष 2013–14 में बढ़कर 106.5 मिलियन टन हो गया’’ यह मात्रात्मक आँकड़े हैं।

मात्रात्मक आँकड़ों के साथ ही, अर्थशास्त्र में गुणात्मक आँकड़ों का भी प्रयोग होता है। इस प्रकार की सूचना की मुख्य विशेषता यह होती है कि इसमें किसी व्यक्ति-विशेष या व्यक्तियों के समूह विशेष के एेसे महत्त्वपूर्ण गुणों की व्याख्या होती है, जिन्हें मात्रात्मक रूप से तो नहीं मापा जा सकता लेकिन यथासंभव सही रूप से आलेखित करना आवश्यक होता है। उदाहरण के तौर पर ‘लिंग’ को ही लें। इसके द्वारा किसी व्यक्ति में पुरुष/स्त्री अथवा लड़का/लड़की के रूप में भेद किया जाता है। प्रायः किसी व्यक्ति के किसी गुण की कोटियों के बारे में सूचना देना संभव और उपयोगी होता है, जैसे अच्छा/बुरा, अस्वस्थ/स्वस्थ/अधिक स्वस्थ, अकुशल/कुशल/अत्यधिक कुशल आदि)। इस प्रकार की गुणात्मक सूचना या सांख्यिकी का अर्थशास्त्र तथा अन्य सामाजिक विज्ञानों में प्रायः प्रयोग किया जाता है। इन्हें मात्रात्मक सूचनाओं की भाँति ही (कीमत, आय, कर-भुगतान आदि) संकलित और व्यवस्थित रूप से संगृहीत किया जाता है, चाहे वह एक व्यक्ति के लिए हो या फिर व्यक्तियों के समूह के लिए।

अगले अध्यायों में आप अध्ययन करेंगे कि सांख्यिकी का संबंध आँकड़ों के संग्रहण एवं व्यवस्थापन से है। इसका अगला चरण आँकड़ों को सारणीबद्ध, आरेखी एवं आलेखी रूपों में प्रस्तुत करना है। इसके पश्चात् इन आँकड़ों को माध्य, प्रसरण, मानक विचलन आदि उन विभिन्न संख्यात्मक सूचकांकों का परिकलन करके संक्षिप्त किया जाता है, जो सूचना के संगृहीत समुच्चय की व्यापक विशेषताओं को दर्शाते हैं।

क्रियात्मक गतिविधियाँ

• मात्रात्मक एवं गुणात्मक आँकड़ों के दो उदाहरणों के बारे में सोचें।

• निम्नलिखित में से किसके द्वारा आपको गुणात्मक आँकड़े उपलब्ध होंगेः सौंदर्य, बुद्धि, अर्जित आय, किसी विषय में प्राप्तांक, गाने की योग्यता तथा अधिगम कौशल?

4. सांख्यिकी क्या करती है?

अब तक आप जान चुके होंगे कि किसी अर्थशास्त्री के लिए सांख्यिकी एक एेसा अपरिहार्य साधन है, जो किसी आर्थिक समस्या को समझने में उसकी सहायता करता है। इसकी विभिन्न विधियों का प्रयोग करते हुए किसी आर्थिक समस्या के कारणों को गुणात्मक एवं मात्रात्मक तथ्यों की सहायता से खोजने का प्रयास किया जाता है। एक बार जब समस्या के कारणों का पता चल जाता है, तब इससे निपटने के लिए निश्चित नीतियों का निर्माण करना सरल हो जाता है।

परंतु सांख्यिकी का क्षेत्र इससे कहीं अधिक विस्तृत है। यह किसी अर्थशास्त्री को आर्थिक तथ्यों को यथातथ्य तथा निश्चित रूप में प्रस्तुत करने योग्य बनाता है, जो दिए गए कथन को सही ढंग से समझने में सहायता करता है। जब आर्थिक तथ्यों को सांख्यिकीय रूप में व्यक्त किया जाता है तब वे यथार्थ तथ्य बन जाते हैं। यथार्थ तथ्य अस्पष्ट कथनों की अपेक्षा अधिक विश्वसनीय होते हैं। उदाहरण के लिए, एक यथा तथ्य संख्या बताते हुए यह कहना कि ‘‘कश्मीर में हाल ही में आए भूकंप के दौरान 310 लोगों की मौत हुई’’ कहीं अधिक तथ्यात्मक है, अतः यह सांख्यिकीय आँकड़ा है। जबकि यह कहना कि सैकड़ों लोगों की मौत हुई, सांख्यिकीय आँकड़ा नहीं है।

सांख्यिकी, आँकड़ों के समूह को कुछ संख्यात्मक मापों (जैसे माध्य, प्रसरण आदि जिनके बारे में आप आगे पढ़ेंगे) के रूप में संक्षिप्त करने में सहायता करती है। ये संख्यात्मक माप आँकड़ों के संक्षिप्तीकरण में सहायता करते हैं। उदाहरण के लिए, यदि किसी आँकड़े में लोगों की संख्या बहुत अधिक है, तो आपके लिए उन सबकी आय को याद रख पाना असंभव है। फिर, किसी व्यक्ति के लिए सांख्यिकीय रूप से प्राप्त संक्षिप्त अंकों, जैसे औसत आय, को याद रखना आसान है। इस प्रकार, सांख्यिकी के द्वारा आँकड़ों के समूह के विषय में सार्थक एवं समग्र सूचनाएँ प्रस्तुत की जाती हैं।

प्रायः सांख्यिकी का प्रयोग विभिन्न आर्थिक कारकों के बीच संबंधों को ज्ञात करने के लिए किया जाता है। किसी अर्थशास्त्री की रुचि को यह जानने में हो सकती है कि जब किसी वस्तु की कीमत में कमी अथवा वृद्धि होती है तो उसकी माँग पर क्या प्रभाव पड़ता है? या फिर, उस वस्तु की अपनी ही कीमतों में परिवर्तन से उसकी पूर्ति प्रभावित होगी? या, जब लोगों की औसत आय बढ़ती है तो क्या उनके उपभोग-व्यय में वृद्धि होती है? या, जब सरकारी व्यय बढ़ जाता है, तो सामान्य मूल्य-स्तर पर क्या प्रभाव पड़ता है? एेसे प्रश्नों का उत्तर तभी दिया जा सकता है जब विभिन्न आर्थिक घटकों के बीच किसी प्रकार का परस्पर संबंध विद्यमान हो, जिनकी व्याख्या ऊपर की जा चुकी है। इस प्रकार का कोई परस्पर संबंध विद्यमान है या नहीं, इसे उन आँकड़ों में सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग करके सरलता से सत्यापित किया जा सकता है। कभी-कभी अर्थशास्त्री उनके बीच एक निश्चित संबंध की कल्पना करके इसका परीक्षण कर सकते हैं कि संबंध के बारे में उनकी पूर्वधारणा वैध है या नहीं। अर्थशास्त्री एेसा केवल सांख्यिकीय तकनीकों का प्रयोग करके ही कर सकते हैं।

किसी अन्य स्थिति में, अर्थशास्त्री किसी अन्य कारक में परिवर्तन के फलस्वरूप किसी एक आर्थिक कारक में परिवर्तनों का पूर्वानुमान लगाने में रुचि रख सकते हैं। उदाहरणार्थ, उनकी रुचि भविष्य की राष्ट्रीय आय पर आज के निवेश के प्रभाव को जानने में हो सकती है। इस प्रकार की कोई भी कार्य-प्रक्रिया सांख्यिकी के ज्ञान के बिना नहीं की जा सकती है।

कभी-कभी योजनाओं एवं नीतियों के निर्माण के लिए भविष्य की प्रवृत्तियों के ज्ञान की आवश्यकता होती है। उदाहरणार्थ, एक आर्थिक योजनाकार वर्ष 2005 में यह निर्णय करता है कि 2010 में अर्थव्यवस्था में कितना उत्पादन होना चाहिए। दूसरे शब्दों में, यह जानना आवश्यक होगा कि वर्ष 2010 के लिए उत्पादन योजना निश्चित करने के लिए वर्ष 2010 में अपेक्षित उपभोग स्तर क्या होगा? एेसी स्थिति में, कोई व्यक्ति वर्ष 2010 के उपभोग के अनुमान के आधार पर निर्णय ले सकता है। विकल्प के रूप में, वह वर्ष 2010 में उपभोग के पूर्वानुमान के लिए सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग कर सकता है। एेसा पिछले वर्षाें के अथवा हाल के कुछ वर्षाें के सर्वेक्षण से प्राप्त उपभोग-आँकड़ों के आधार पर हो सकता है। इस प्रकार, सांख्यिकीय विधियाँ एेसी उपयुक्त आर्थिक नीतियों के गठन में सहायता देती हैं, जिनसे आर्थिक समस्याओं का समाधान हो सकता है।

5. सारांश

आजकल हम गंभीर आर्थिक समस्याओं, जैसे मूल्यवृद्धि, बढ़ती जनसंख्या, बेरोजगारी, निर्धनता आदि के विश्लेषण में सांख्यिकी का अधिकाधिक प्रयोग कर रहे हैं, ताकि इन समस्याओं को हल करने के उपाय ढूँढ़े जा सकें। इसके अतिरिक्त, यह आर्थिक समस्याओं के समाधान में इन नीतियों के प्रभाव का मूल्यांकन करने में भी सहायक है। उदाहरण के लिए, सांख्यिकीय तकनीकों का प्रयोग करके निरंतर बढ़ती जनसंख्या पर रोक लगाने के लिए परिवार नियोजन की नीतियाँ प्रभावशाली हैं या नहीं, इसका पता सरलता से लगाया जा सकता है।

आर्थिक नीतियों के निर्णय की प्रक्रिया में सांख्यिकी की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका है। उदाहरण के लिए, वर्त्तमान समय में विश्व भर में तेल की बढ़ती कीमतों के कारण यह निर्णय करना आवश्यक हो सकता है कि वर्ष 2010 में भारत को कितना तेल आयात करना चाहिए। तेल के आयात का निर्णय प्रत्याशित घरेलू तेल उत्पादन तथा वर्ष 2010 में तेल की संभावित माँग पर निर्भर होगा। सांख्यिकी के प्रयोग बिना यह ज्ञात नहीं किया जा सकता कि वर्ष 2010 में तेल का प्रत्याशित घरेलू उत्पादन तथा तेल की संभावित माँग क्या होगी? इसलिए, तेल के आयात का निर्णय तब तक नहीं किया जा सकता है, जब तक हमें तेल की वास्तविक आवश्यकता की जानकारी न हो। तेल के आयात के विषय में निर्णय की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण जानकारी केवल सांख्यिकी के द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है।


सांख्यिकीय विधियाँ सामान्य बुद्धि का स्थानापन्न नहीं हैं!

सांख्यिकी का उपहास करने के लिए एक रोचक कहानी सुनाई जाती है। एेसा कहा जाता है कि एक बार चार व्यक्तियों का एक परिवार (पति-पत्नी तथा दो बच्चे) नदी पार करने निकले। पिता को नदी की औसत गहराई की जानकारी थी। अतः उसने परिवार के सदस्यों के औसत कद का हिसाब लगाया। चूँकि परिवार के सदस्यों का औसत कद, नदी की औसत गहराई से अधिक था, इसलिए उसने सोचा कि वे सभी सुरक्षित रूप से नदी पार कर सकते हैं। परिणामस्वरूप, नदी पार करते समय परिवार के कुछ सदस्य (बच्चे) पानी में डूब गए।

क्या यह दोष औसतों के परिकलन की सांख्यिकीय विधि का है अथवा औसतों के दुरुपयोग का?


पुनरावर्तन

• हमारी आवश्यकताएँ असीमित हैं, परंतु इन्हें पूरा करने वाली वस्तुओं के उत्पादन में प्रयुक्त
होने वाले संसाधन सीमित एवं दुर्लभ हैं। यह दुर्लभता ही आर्थिक समस्याओं की जड़ है।

• संसाधनों के वैकल्पिक प्रयोग होते हैं।

• अपनी विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए उपभोक्ताओं द्वारा वस्तुओं का क्रय, उपभोग कहलाता है।

• उत्पादकों द्वारा बाजार में बेचने के लिए वस्तुओं का विनिर्माण उत्पादन कहलाता है।

• राष्ट्रीय आय के मजदूरी, लाभ, किराए तथा ब्याज में विभाजन को वितरण कहा जाता है।

• सांख्यिकी के अंतर्गत आँकड़ों का प्रयोग करते हुए आर्थिक संबंधों का पता लगाया जाता है और उनकी सत्यता की जाँच की जाती है।

• सांख्यिकीय साधनों का प्रयोग भावी प्रवृत्तियों के पूर्वानुमान हेतु किया जाता है।

• सांख्यिकीय विधियाँ आर्थिक समस्याओं का विश्लेषण करने तथा उन्हें हल करने के

लिए नीतियों के निर्माण में सहायक होती हैं।

अभ्यास

1. निम्नलिखित कथन सही है अथवा गलत? इन्हें तदनुसार चिह्नित करेंः

(क) सांख्यिकी केवल मात्रात्मक आँकड़ों का अध्ययन करती है।

(ख) सांख्यिकी आर्थिक समस्याओं का समाधान करती है।

(ग) आँकड़ों के बिना अर्थशास्त्र में सांख्यिकी का कोई उपयोग नहीं है।

2. बस स्टैंड या बाजार में होने वाले क्रियाकलापों की सूची बनाएँ। इनमें से कितने आर्थिक क्रियाकलाप हैं?

3. सरकार और नीति-निर्माता आर्थिक विकास के लिए उपयुक्त नीतियों के निर्माण के लिए सांख्यिकीय आँकड़ों का प्रयोग करते हैं। दो उदाहरणों सहित व्याख्या कीजिए।

4. ‘‘आपकी आवश्यकताएँ असीमित हैं तथा उनकी पूर्ति करने के लिए आपके पास संसाधन सीमित हैं।’’ दो उदाहरणों द्वारा इस कथन की व्याख्या करें।

5. उन आवश्यकताओं का चुनाव आप कैसे करेंगे, जिनकी आप पूर्ति करना चाहेंगे?

6. आप अर्थशास्त्र का अध्ययन क्यों करना चाहते हैं? कारण बताइए।

7. सांख्यिकीय विधियाँ सामान्य बुद्धि का स्थानापन्न नहीं होती! अपने दैनिक जीवन से उदाहरणों द्वारा इस कथन की व्याख्या करें।

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