™ॅपजी जीम ब्ंसबनसने ंे ं ामलए डंजीमउंजपबे बंद इम ेनबबमेेनिससल ंचचसपमक जव जीम मगचसंदंजपवद व िजीम बवनतेम व िछंजनतम दृ ॅभ्प्ज्म्भ्म्।क् ऽ 13ण्1 भ्ूामिका ;प्दजतवकनबजपवदद्ध यह अध्याय कलन की एक भूमिका है। कलन गण्िात की वह शाखा है जिसमें मुख्यतः प्रांत में बिंदुओं के परिवतर्न से पफलन के मान में होने वाले परिवतर्न का अध्ययन किया जाता है। पहले हम अवकलज का ;वास्तविक रूप से परिभाष्िात किए बिनाद्ध सहजानुभूत बोध् ;प्दजनपजपअम पकमंद्ध कराते हैं। तद्ोपरांत हम सीमा की सहज परिभाषा देंगे और सीमा के बीजगण्िात का वुफछ अध्ययन करेंगे। इसके बाद हम अवकलज की परिभाषा करने के लिए वापस आएँगे और अवकलज के बीजगण्िात का वुफछ अध्ययन करेंगे। हम वुफछ विशेष मानक पफलनों के अवकलज भी प्राप्त करेंगे। ;1642.1727 ।ण्क्ण्द्ध13ण्2 अवकलजों का सहजानुभूत बोध् ;प्दजनपजपअम प्कमं व िक्मतपअंजपअमेद्ध भौतिक प्रयोगों ने अनुमोदित किया है कि पिंड एक खड़ी/ऊँची चट्टान से गिरकर ज सेवंफडों में 4ण्9ज2 मीटर दूरी तय करता है अथार्त् पिंड द्वारा मीटर में तय की गइर् दूरी ;ेद्ध सेवंफडों में मापे गए समय ;जद्ध के एक पफलन के रूप में े त्र 4ण्9ज2 से दी गइर् है।संलग्न सारणी 13.1 में एक खड़ी/ऊँची चट्टान से गिराए गए एक पिंड के सेवंफडों में विभ्िान्न समय ;जद्ध पर मीटर में तय की दूरी ;ेद्ध दी गइर् है। इन आँकड़ों से समयज त्र 2 सेवंफड पर पिंड का वेग ज्ञात करना ही उद्देश्य है। इस समस्या तक पहुँचने के लिए ज त्र 2 सेवंफड पर समाप्त होने बाले विविध् समयांतरालों पर माध्य वेग ज्ञात करना एक ढंग है और आशा करते हैं कि इससे ज त्र2 सेवंफड पर वेग के बारे में वुफछ प्रकाश पड़ेगा। ज त्र ज1 और ज त्र ज2 के बीच माध्य वेग ज त्र ज1 और ज त्र ज2 सेकंडों सारणी13ण्1 के बीच तय की गइर् दूरी को ;ज2दृ ज1द्ध से भाग देने पर प्राप्त होता है। अतः प्रथम 2 सेकंडों में माध्य वेग ज1 त्र 0 और ज2 त्र 2 के बीच तयकी गइर् दरूी त्र समयातंराल ;ज2 − ज1द्ध ;19ण्6 − 0द्ध मी त्र त्र 9ण्8 ध् े;20द्ध से मीस− इसी प्रकार, ज त्र 1 और ज त्र 2 के बीच माध्य वेग ;19ण्6 दृ 4ण्9 द्ध मी त्र त्र14ण्7 मीध् से 21 से; −द्ध इसी प्रकार विविध् के लिएज त्र ज1 और ज त्र 2 के बीच हम माध्य वेग का परिकलन करते हैं। निम्नलिख्िात सारणी 13.2, ज त्र ज1 सेवंफडों और ज त्र 2 सेवंफडों के बीच मीटर प्रति सेवंफड में माध्य वेग ;अद्ध देती है। सारणी13ण्2 ज े 0 0 1 4ण्9 1ण्5 11ण्025 1ण्8 15ण्876 1ण्9 17ण्689 1ण्95 18ण्63225 2 19ण्6 2ण्05 20ण्59225 2ण्1 21ण्609 2ण्2 23ण्716 2ण्5 30ण्625 3 44ण्1 4 78ण्4 ज1 0 1 1ण्5 1ण्8 1ण्9 1ण्95 1ण्99 अ 9ण्8 14ण्7 17ण्15 18ण्62 19ण्11 19ण्355 19ण्551 इस सारणी से हम अवलोकन करते हैं कि माध्य वेग ध्ीरे - ध्ीरे बढ़ रहा है। जैसे - जैसे ज त्र 2 पर समाप्त होने वाले समयांतरालोंको लघुत्तर बनाते जाते हैं हम देखते हैं कि ज त्र 2 पर हम वेग का एक बहुत अच्छा बोध् कर पाते हैं। आशा करते हैं कि 1.99 सेवंफड और 2 सेवंफड के बीच वुफछ अप्रत्याश्िात घटना न घटे तो हम निष्कषर् निकालते हैं कि ज त्र 2 सेवंफड पर माध्य वेग 19ण्55 मी/से से थोड़ा अध्ि क है। इस निष्कषर् को निम्नलिख्िात अभ्िाकलनों के समुच्चय से किंचित बल मिलता है। ज त्र 2 सेवंफड से प्रारंभ करते हुए विविध् समयांतरालों पर माध्य वेग का परिकलन कीजिए। पूवर् की भाँति ज त्र 2 सेवंफड और ज त्र ज2 सेवंफड के बीच माध्य वेग ;अद्ध 2 सेवंफडआरैज सवेंफड वफे बीच तय की दरूी त्र2 ज2 − 2 ज सकें ड में तय की दरी ू− 2 सवेंफड में तय की दरी ूत्र2 ज2− 2 ज सवे ंफडों मंे तय की दूरी − 19ण्6 त्र2 ज2 − 2 निम्नलिख्िात सारणी 13ण्3ए ज त्र 2 सेवंफडों और ज2 सेवंफड के बीच मीटर प्रति सेवंफड में माध्य वेग अ देती हैः सारणी13ण्3 ज2 4 3 2ण्5 2ण्2 2ण्1 2ण्05 2ण्01 अ 29ण्4 24ण्5 22ण्05 20ण्58 20ण्09 19ण्845 19ण्649 यहाँ पुनः हम ध्यान देते हैं कि यदि हम ज त्र 2ए से प्रारंभ करते हुए लघुत्तर समयान्तरालों को लेते जाते हैं तो हमें ज त्र 2 पर वेग का अध्िक अच्छा बोध् होता है। अभ्िाकलनों के प्रथम समुच्चय में हमने ज त्र 2 पर समाप्त होने वाले बढ़ते समयान्तरालों में माध्य वेग ज्ञात किया है और तब आशा की है कि ज त्र 2 से किंचित पूवर् कुछ अप्रत्याश्िात घटना न घटे। अभ्िाकलनों के द्वितीय समुच्चय में ज त्र 2 पर अंत होने वाले घटते समयांतरालों में माध्य वेग ज्ञात किया है और तब आशा की है कि ज त्र 2 के किंचित बाद कुछ अप्रत्याश्िात घटना न घटे। विशु( रूप से भौतिकीय आधर पर माध्य वेग के ये दोनों अनुक्रम एक समान सीमा पर पहुँचने चाहिए हम निश्िचत रूप से निष्कषर् निकालते हैं कि ज त्र 2 पर पिंड का वेग 19ण्551 मी/से और 19ण्649 मी/से के बीच है। तकनीकी रूप से हम कह सकते हैं कि ज त्र 2 पर तात्कालिक वेग 19ण्551 मी/से.और 19ण्649 मी/से. के बीच है। जैसा कि भली प्रकार ज्ञात है कि वेग दूरी के परिवतर्न की दर है। अतः हमने जो निष्पादित किया, वह निम्नलिख्िात है। फ्विविध् क्षण पर दूरी में परिवतर्न की दर का अनुमान लगाया है। हम कहते हैं कि दूरी पफलन े त्र 4ण्9ज2 का ज त्र 2 पर अवकलज 19ण्551 और 19ण्649 के बीच में है।य् इस सीमा की प्रिया की एक आवृफति 13ण्1विकल्प विध्ि आवृफति 13ण्1 में दशार्इर् गइर् है। यह बीते समय ;जद्ध और चट्टान के श्िाखर से पिंड की दूरी ;ेद्ध का आलेख है। जैसे - जैसे समयांतरालों के अनुक्रम ी1ए ी2ए ण्ण्ण्ए की सीमा शून्य की ओर अग्रसर होती है वैसे ही माध्य वेगों के अग्रसर होने की वही सीमा होती है जो ब्ठब्ठ ब्ठ1122 33 एए एण्ण्ण् ।ब्।ब् ।ब्12 3 के अनुपातों के अनुक्रम की होती है, जहाँ ब्ठ त्र े दृ ेवह दूरी है जो पिंड समयांतरालों1110 ी1 त्र ।ब्1 में तय करता है, इत्यादि। आवृफति 13ण्1 से यह निष्कषर् निकलना सुनिश्िचत है कि यह बाद की अनुक्रम वक्र के बिंदु । पर स्पशर्रेखा के ढाल की ओर अग्रसर होती है। दूसरे शब्दों में, जत्र 2 समय पर पिंड का तात्कालिक वेग वक्र ेत्र 4ण्9ज2 के जत्र 2 पर स्पशीर् के ढाल के समान है। 13ण्3 सीमाएँ ;स्पउपजेद्ध उपयुर्क्त विवेचन इस तथ्य की ओर स्पष्टतया निदिर्ष्ट करता है कि हमें सीमा की प्रिया और अध्िक स्पष्ट रूप से समझने की आवश्यकता है। हम सीमा की संकल्पना से परिचित होने के लिए वुफछ दृष्टांतों ;पससनेजतंजपवदेद्ध का अध्ययन करते हैं। पफलन ;िगद्धत्र ग2 पर विचार कीजिए। अवलोकन कीजिए कि जैसे - जैसे ग को शून्य के अध्िक निकट मान देते हैं, ;िगद्ध का मान भी 0 की ओर अग्रसर होता जाता है। ;देखें आवृफति 2.10 सपउ गिअध्याय 2द्ध हम कहते है ;द्धत्र0 ग→0 ;इसे ;िगद्ध की सीमा शून्य है, जब गशून्य की ओर अग्रसर होता है, पढ़ा जाता हैद्ध ;िगद्ध की सीमा, जब गशून्य की ओर अग्रसर होता है, को ऐसे समझा जाए जैसे ग त्र0 पर ;िगद्ध का मान होना चाहिए। व्यापक रूप से जब ग→ ंए ;िगद्ध → सए तब सको पफलन ;िगद्ध की सीमा कहा जाता है और सपउ गि सइसे इस प्रकार लिखा जाता है गं ;द्धत्र ण्→ पफलन ह;गद्धत्र द्यगद्यए ग ≠0 पर विचार कीजिए। ध्यान दीजिए कि ह;0द्ध परिभाष्िात नहीं है। ग के 0 के अत्यध्िक निकट मानों के लिए ह;गद्ध के मान का परिकलन करने के लिए हम देखते हैं कि ह;गद्ध का मान 0 की ओर अग्रसर करता है। इसलिए सपउ ह;गद्ध त्र 0ण् ग ≠0 के लिए लत्र द्यगद्य केग→0 आलेख से यह सहजता से स्पष्ट होता है। ;देखें आवृफति 2.13 अध्याय 2द्ध ग2 −4ीग त्र ए ग≠2निम्नलिख्िात पफलन पर विचार कीजिएः ;द्ध ण् ग−2 गके 2 के अत्यध्िक निकट मानों ;लेकिन 2 नहींद्ध के लिए ी;गद्ध के मान का परिकलन कीजिए। आप स्वयं को स्वीकार कराइए कि सभी मान 4 के निकट हैं। यहाँ ;आवृफति 13.2द्ध में दिए पफलन लत्र ी;गद्ध के आलेख पर विचार करने से इसको किंचित बल मिलता है। इन सभी दृष्टांतों से एक दिए मानगत्र ंपर पफलन के जो मान ग्रहण कर ने चाहिए वे वास्तव में इस पर आधरित नहीं हैं कि गवैफसे ंकी ओर अग्रसर होता है। ध्यान दीजिए कि गके संख्या ंकी ओर अग्रसर होने के लिए या तो बाईं ओर या दाईं ओर है, अथार्त् गके निकट सभी मान या तो ंसे कम हो सकते हैं या ंसे अध्िक हो सकते हैं। इससे स्वाभाविक रूप से दो सीमाएँ - बाएँ पक्ष की सीमा और दाएँ पक्ष की सीमा प्रेरित होती आवृफति 13ण्2है। पफलन विेफ दाएँ पक्ष की सीमा ;िगद्ध का वह मान है जो ;िगद्ध के मान से आदेश्िात होता है जब गए ंके दाईं ओर अग्रसर होता है। इसी प्रकार बाएँ पक्ष की सीमा। इसके दृष्टांत के लिए, पफलन पर विचार कीजिए ⎧1ए ग≤0गि;द्धत्र⎨ ⎩2ए गझ0 आवृफति 13ण्3 में इस पफलन का आलेख दशार्या गया है यह स्पष्ट है कि 0 पर किा मान ग≤ 0 के लिए ;िगद्ध के मान से पर निभर्र करता है जो कि 1 के समान है अथार्त् शून्य पर ;िगद्ध के बाएँ पक्ष की सीमा सपउ गि;द्ध त्र1 है। इसी प्रकार 0 पर किा मान ग→0 गझ 0 के लिए ;िगद्ध के मान पर निभर्र करता है, 2 है अथार्त् 0 सपउ गि;द्ध त्र2 आवृफति 13ण्3के दाएँ पक्ष की सीमा ग→0़ है। इस स्िथति में बाएँ और दाएँ पक्ष की सीमाएँ भ्िान्न - भ्िान्न हैं और अतः हम कह सकते हैं कि जब गशून्य की ओर अग्रसर होता है तब ;िगद्ध की सीमा अस्ितत्वहीन है। ;भले ही पफलन 0 पर परिभाष्िात है।द्ध सारांश हम कहते हैं कि सपउ ;िगद्धए गत्र ंपर ;िगद्ध का अपेक्ष्िात ;मगचमबजमकद्ध मान हैं, जिसने गकेग→ं दृ बाईं ओर निकट मानों के लिए ;िगद्ध को मान दिए हैं। इस मान को ंपर ;िगद्ध की बाएँ पक्ष की सीमा कहते हैं। गिहम कहते हैं कि सपउ ;द्ध ए गत्र ंपर ;िगद्ध का अपेक्ष्िात मान है जिसमें गके ंके दाईं→़गं ओर के निकट मानों के लिए ;िगद्ध के मान दिए हैं। इस मान को ंपर ;िगद्ध की दाएँ पक्ष की सीमा कहते हैं। यदि दाएँ और बाएँ पक्ष की सीमाएँ संपाती हों तो हम इस उभयनिष्ठ मान को गत्र ंपर ;िगद्ध की सीमा कहते हैं और इसे सपउ ;िगद्ध से निरूपित करते हैं।ग→ं यदि दाएँ और बाएँ पक्ष की सीमाएँ संपाती नहीं हों तो यह कहा जाता है कि गत्र ंपर ;िगद्ध की सीमा अस्ितत्वहीन है। दृष्टांत 1 ;प्ससनेजतंजपवद 1द्ध पफलन ;िगद्ध त्र ग़ 10 पर विचार कीजिए। हम गत्र 5 पर पफलन की सीमा ज्ञात करना चाहेंगे। आइए, हम 5 के अत्यंत निकट गके मानों के लिए विेफ मान का परिकलन करें। 5 के अत्यंत निकट बाईं ओर वुफछ बिंदु 4.9, 4.95, 4.994, 4.995... इत्यादि हैं। इन बिंदुओं पर ;िगद्ध के मान नीचे सारणीब( हैं। इसी प्रकार, 5 के अत्यंत निकट और दाईं ओर वास्तविक संख्याएँ 5.001, 5.01, 5.1 भी हैं। इन बिंदुओं पर भी पफलन के मान सारणी 13.4 में दिए हैं। सारणी13ण्4 ग 4ण्9 4ण्95 4ण्99 4ण्995 5ण्001 5ण्01 5ण्1 ;िगद्ध 14ण्9 14ण्95 14ण्99 14ण्995 15ण्001 15ण्01 15ण्1 सारणी 13ण्4 से हम निगमित करते हैं कि ;िगद्ध का मान 14.995 से बड़ा और 15.001 से छोटा है, यह कल्पना करते हुए कि ग त्र4ण्995 और 5.001 के बीच वुफछ अप्रत्याश्िात घटना घटित न हो। यह कल्पना करना तवर्फसंगत है कि 5 के बाईं ओर की संख्याओं के लिए ग त्र5 पर ;िगद्ध का मान सपउ गित्र15 15 है अथार्त् ग→5दृ ;द्ध इसी प्रकार, जब ग, 5 के दाईं ओर अग्रसर होता है, किा मान 15 होना चाहिए अथार्त् सपउ गित्र15 →़ग 5 ;द्ध अतः यह संभाव्य है कि विेफ बाएँ पक्ष की सीमा और दाएँ पक्ष की सीमा, दोनों 15 के बराबर हंै। इस प्रकार सपउ ;द्धत्र गि;द्धत्रसपउ गि सपउ गि;द्धत्र15 ग→5− ग→5़ ग→5 सीमा 15 के बराबर होने के बारे में यह निष्कषर् पफलन के आलेख जो आवृफति 2.9;पपद्ध अध्याय 2 में दिया है, को देखकर किंचित बल देता है। इस आवृफति में हम ध्यान देते हैं कि जैसे - जैसे ग, 5 के या तो दाईं ओर या बाईं ओर अग्रसर हो, पफलन ि;गद्ध त्र ग ़ 10 का आलेख बिंदु ;5, 15द्ध की ओर अग्रसर होता जाता हैं। हम देखते हैं कि ग त्र 5 पर भी पफलन का मान 15 के बराबर होता है। दृष्टांत 2 पफलन ;िगद्ध त्र ग3 पर विचार कीजिए। आइए हम ग त्र 1 पर इस पफलन की सीमा ज्ञात करने का प्रयास करें। पूवर्वतीर् स्िथति की तरह बढ़ते हुए हम ग के 1 के निकट मानों के लिए ;िगद्ध के मानों को सारणीब( करते हैं। इसे सारणी 13.5 में दिया गया हैः सारणी 13ण्5 इस सारणी से हम निगमन करते हैं कि ग त्र 1 पर िका मान 0ण्997002999 से अध्िक और 1ण्003003001 से कम है, यह कल्पना करते हुए कि ग त्र 0ण्999 और 1ण्001ण् के बीच वुफछ अप्रत्याश्िात घटना घटित न हो। यह मानना तवर्फसंगत है कि ग त्र 1 का मान 1 के बाईं ओर की संख्याओं पर निभर्र करता है अथार्त् सपउ गि त्र1;द्ध ण् ग→1− इसी प्रकार, जब ग, 1 के दाईं ओर अग्रसर होता है, तो िका मान 1 होना चाहिए अथार्त् सपउ ; द्धत्रगि 1ण्→़ग 1 अतः, यह संभाव्य है कि बाएँ पक्ष की सीमा और दाएँ पक्ष की सीमा दोनों 1 के बराबर हों। इस प्रकार ण् सपउ गि त्र सपउ गि त्र सपउ गि त्र1;द्ध ;द्ध;द्धग→1− ग→1़ ग→1 सीमा 1 के बराबर होने का यह निष्कषर् पफलन के आलेख जो आवृफति 2ण्11ए अध्याय 2 में दिया है, को देखकर किंचित बल देता है। इस आवृफति में हम ध्यान देते हैं कि जैसे - जैसे ग, 1 के या तो दाईं ओर या बाईं ओर अग्रसर हो, पफलन ;िगद्ध त्र ग3 का आलेख बिंदु ;1, 1द्ध की ओर अग्रसर होता जाता है। हम पुनः अवलोकन करते हैं कि ग त्र 1 पर पफलन का मान भी 1 के बराबर है। दृष्टांत 3 पफलन ;िगद्ध त्र 3ग पर विचार कीजिए। आइए, ग त्र 2 पर इस पफलन की सीमा ज्ञात करने का प्रयास करें। निम्नलिख्िात सारणी 13ण्6 स्वतः स्पष्ट करती है। सारणी13ण्6 ग 1ण्9 1ण्95 1ण्99 1ण्999 2ण्001 2ण्01 2ण्1 ;िगद्ध 5ण्7 5ण्85 5ण्97 5ण्997 6ण्003 6ण्03 6ण्3 पूवर्वत हम अवलोकन करते हैं कि ग या तो बाएँ या दाएँ 2 की ओर अग्रसर होता है, ;िगद्ध का मान 6 की ओर अग्रसर होता हुआ प्रतीत होता है। हम इसे, इस प्रकार अभ्िालेख्िात कर सकते हैं कि सपउ गि त्रसपउ गि त्रसपउ गि त्र6;द्ध ;द्ध;द्धग→2− ग→2़ ग→2 आवृफति 13.4 में प्रदश्िार्त इसका आलेख इस तथ्य को बल देता है। यहाँ पुनः हम ध्यान देते हैं किग त्र 2 पर पफलन का मान ग त्र 2 पर सीमा के संपाती है। दृष्टांत 4 अचर पफलन;िगद्ध त्र 3 पर विचार कीजिए। आइए हम ग त्र 2 पर इसकी सीमा ज्ञात करने का प्रयास करें। यह पफलन अचर पफलन होने के कारण सवर्त्रा एक ही मान ;इस स्िथति में 3द्ध प्राप्त करता है अथार्त् 2 के अत्यंत निकट बिंदुओं के आवृफति 13ण्4 लिए इसका मान 3 है। अतः सपउ गि त्रसपउ गि त्रसपउ गि त्र3;द्ध ;द्ध;द्धग→2 ग→2़ ग→2 ;िगद्ध त्र 3 का आलेख हर हालत में ;0, 3द्ध से जाने वाली ग.अक्ष के समांतर रेखा है और आवृफति 2ण्9ए अध्याय 2 में दशार्या गया है। इससे यह भी स्पष्ट है कि अभीष्ट सीमा 3 है तथ्यतः यह सपउ ;द्धत्रसरलता से अवलोकित होता है कि किसी वास्तविक संख्या ं के लिए → गि 3 गं गदृष्टांत 5 पफलन ;िगद्ध त्र ग2 ़ ग पर विचार कीजिए। हम सपउ ि;द्धज्ञात करना चाहते हैं। हमग→1 ग त्र 1 के निकट ;िगद्ध के मान सारणी 13ण्7 में सारणीब( करते हैंः सारणी 13ण्7 ग 0ण्9 0ण्99 0ण्999 1ण्01 1ण्1 1ण्2 ;िगद्ध 1ण्71 1ण्9701 1ण्997001 2ण्0301 2ण्31 2ण्64 इससे यह तवर्फसंगत निगमित होता है कि सपउ ;द्धत्र गि;द्धत्रसपउ गि सपउ गि;द्धत्र2 ग→1− ग→1़ ग→1ण् आवृफति 13.5 में दशार्ए ;िगद्ध त्र ग2 ़ गके आलेख से यह स्पष्ट है कि जैसे - जैसे गए1 की ओर अग्रसर होता है, आलेख ;1, 2द्ध की ओर अग्रसर होता जाता है। अतः हम पुनः प्रेक्षण करते हैं कि सपउ ग→1 ;िगद्ध त्र ;ि1द्ध अब, निम्नलिख्िात तीन तथ्यों को आप आवृफति 13ण्5 स्वयं को स्वीकार कराएँ सपउ ग2 त्र1ए सपउ गत्र1 आर सपउ ग़त्र 2ै1 ग→1 ग→1 ग→1 तब सपउ ग2 ़ सपउ ग 11 2 त्रसपउ ग2 ़ग⎤ण्त्ऱत्र ⎡⎣⎦ग→1 ग→1 ग→1 तथा ग ;ग1द्ध 1ण्2 त्र2 त्रसपउ ⎣गग ़1द्ध⎦⎤त्रसपउ ⎡ग2 ़ग⎤ण्सपउ ण् सपउ ़त्र ⎡; ⎣⎦ग→1 ग→1 ग→1 ग→1 सपउ ेपद गदृष्टांत 6 पफलन ;िगद्ध त्र ेपद गपर विचार कीजिए। हमारी π में रुचि है जहाँ कोण रेडियन मेंग→ 2 मापा गया है। यहाँ, हमने π2 के निकट ;िगद्ध के मानों ;निकटतमद्ध को सारणीब( किया है। सारणी 13ण्8 ग 0ण्1 2 π− 0ण्01 2 π− 0ण्01 2 π़ 0ण्1 2 π़ ;िगद्ध 0ण्9950 0ण्9999 0ण्9999 0ण्9950 सपउ गित्रसपउ गित्रसपउ गित्र1 −;द्ध ़;द्ध ;द्धइससे हम निगमन कर सकते हैं कि ππ ग→π ग→ ग→ 222 इसके अतिरिक्त, यह ;िगद्ध त्रेपद गके आलेख से पुष्ट होता है जो आवृफति 3ण्8 अध्याय 3 में दिया है। इस स्िथति में भी हम देखते हैं कि सपउ ेपद गत्र 1ण् π ग→2 दृष्टांत 7 पफलन ;िगद्धत्र ग़ बवे गपर विचार कीजिए। हम सपउ ;िगद्ध ज्ञात करना चाहते हंै।ग→0 यहाँ हमने 0 के निकट ;िगद्ध के मान ;निकटतमद्ध सारणीब( किए हैंः ;सारणी 13ण्9द्धण् सारणी 13ण्9 ग दृ 0ण्1 दृ 0ण्01 दृ 0ण्001 0ण्001 0ण्01 0ण्1 ;िगद्ध 0ण्9850 0ण्98995 0ण्9989995 1ण्0009995 1ण्00995 1ण्0950 सारणी 13ण्9ए से हम निगमन कर सकते हैं कि सपउ ;द्धत्र गि ;द्धत्रसपउ गि सपउ गि;द्धत्र1 ग→0− ग→0़ ग→0 इस स्िथति में भी हम प्रेक्षण करते हैं कि सपउ ;िगद्ध त्र ;ि0द्ध त्र 1ण्ग→0 अब, क्या आप स्वयं को स्वीकार करा सकते हैं कि सपउ ख्ग़बवे ग,त्रसपउ ग़सपउ बवे गवास्तव में सत्य हैघ् ग→0 ग→0 ग→0 गित्र 12 सपउ दृष्टांत 8 गझ0 के लिए, पफलन ;द्ध पर विचार कीजिए। हम ;िगद्ध ज्ञात करनाग→0ग चाहते हैं। यहाँ, हम अवलोकन करते हैं कि पफलन का प्रांत सभी ध्नात्मक वास्तविक संख्याएँ हैं। अतः जब हम ;िगद्ध के मान सारणीब( करते हैं, गशून्य के बाईं ओर अग्रसर होता है, का कोइर् अथर् नहीं है। नीचे हम 0 के निकट गके ध्नात्मक मानों के लिए पफलन के मानों को सारणीब( करते हैं ;इस सारणी में दकिसी ध्न पूणा±क को निरूपित करता है। नीचे दी गइर् सारणी 13.10 से, हम देखते हैं कि जब गए0 की ओर अग्रसर होता है, ;िगद्ध बड़ा और बड़ा होता जाता है। यहाँ इसका अथर् है कि, ;िगद्ध का मान किसी दी संख्या से भी बड़ा किया जा सकता है। सारणी 13ण्10 ग 1 0ण्1 0ण्01 10दृद ;िगद्ध 1 100 10000 102द सपउ गित्ऱ∞गण्िातीय रूप से, हम कह सकते हैं ;द्धग→0 हम टिप्पणी भी करते हैं कि इस पाठ्यक्रम में हम इस प्रकार की सीमाओं की चचार् नहीं करेंगे। गिदृष्टांत 9 हम सपउ ;द्धए ज्ञात करना चाहते हैं, जहाँग→0 ⎧ग−2ए गढ0 ;द्ध ⎨⎪गित्र 0ए गत्र0 ⎪ग़2ए गझ0⎩ पहले की तरह हम 0 के निकट गके लिए ;िगद्ध की सारणी बनाते हैं। प्रेक्षण करते हैं कि गके )णात्मक मानों के लिए हमें गदृ 2 का मान निकालने की आवश्यकता है और गके ध्नात्मक मानों के लिए ग़ 2 का मान निकालने की आवश्यकता होती है। सारणी 13ण्11 ग दृ 0ण्1 दृ 0ण्01 दृ 0ण्001 0ण्001 0ण्01 0ण्1 ;िगद्ध दृ 2ण्1 दृ 2ण्01 दृ 2ण्001 2ण्001 2ण्01 2ण्1 सारणी 13.11 की प्रथम तीन प्रविष्िटयों से, हम निगमन करते हैं कि पफलन का मान दृ2 तक घट रहा है और सपउ गित्र−2 →− ;द्धग 0 सारणी की अंतिम तीन प्रविष्िटयों से, हम निगमन करते हैं कि पफलन का मान 2 तक बढ़ रहा है और अतः सपउ गित्र2 →़ग 0 ;द्ध क्योंकि 0 पर बाएँ और दाएँ पक्षों की सीमाएँ संपाती नहीं हैं, हम कहते हैं कि 0 पर पफलन की सीमा अस्ितत्वहीन है। इस पफलन का आलेख आवृफति 13ण्6 में दिया है यहाँ, हमटिप्पणी करते हैं कि गत्र 0 पर पफलन का मान पूणर्तः परिभाष्िात हैऔर, वास्तव में, 0 के बराबर है, परंतु गत्र 0 पर पफलन की सीमा परिभाष्िात भी नहीं है। आवृफति13ण्6 गिदृष्टांत 10 एक अंतिम दृष्टांत के रूप में, हम सपउ ;द्धए ज्ञात करते हैं जबकिग→1 ⎧ग़2 ग≠1गित्र;द्ध ⎨ 0 गत्र1⎩ सारणी13ण्12 ग 0ण्9 0ण्99 0ण्999 1ण्001 1ण्01 1ण्1 ;िगद्ध 2ण्9 2ण्99 2ण्999 3ण्001 3ण्01 3ण्1 पहले की तरह, 1 के निकट गके लिए हम ;िगद्ध के मानों को सारणीब( करते हैं। 1 से कम गके लिए ;िगद्ध में मानों से, यह प्रतीत होता है कि गत्र 1 पर पफलन का मान 3 होना चाहिए अथार्त् सपउ ;द्धत्रगि 3 ग→1− इसी प्रकार, 1 से बड़े गके लिए ;िगद्ध के मानों से आदेश्िात ;िगद्ध का मान 3 होना चाहिए, अथार्त् सपउ ;द्धत्रगि 3 →़ ण् ग 1 परंतु तब बाएँ और दाएँ पक्षों की सीमाएँ संपाती हैं और अतः ग सपउ →1 गि;द्धत्र ग सपउ →1 गि;द्धत्रसपउ ग→1 गि ण्− ़ ;द्धत्र3 आवृफति 13ण्7 में पफलन का आलेख सीमा के बारे में हमारे निगमन को बल देता है। यहाँ, हम ध्यान देते हंै कि व्यापक रूप से, एक दिए बिंदु पर पफलन का मान और इसकी सीमा भ्िान्न - भ्िान्न हो सकते हैं ;भले ही दोनों परिभाष्िात हों।द्ध आवृफति13ण्7 13ण्3ण्1 सीमाओं का बीजगण्िात ;।सहमइतं व िसपउपजेद्ध उपयुर्क्त दृष्टांतों से, हम अवलोकन कर चुके हैं कि सीमा प्रिया योग, व्यवकलन, गुणा और भाग का पालन करती है जब तक कि विचाराध्ीन पफलन और सीमाएँ सुपरिभाष्िात हैं। यह संयोग नहीं है। वास्तव में, हम इनको बिना उपपिा के प्रमेय के रूप में औपचारिक रूप देते हैं। प्रमेय1 मान लीजिए कि अिौर हदो पफलन ऐसे हैं कि सपउ ;िगद्ध और सपउ ह;गद्ध दोनों का अस्ितत्व ग→ंग→ं है। तब;पद्ध दो पफलनों के योग की सीमा पफलनों की सीमाओं का योग होता है, अथार्त् सपउ ख्;िगद्ध ़ ह;गद्ध,त्र सपउ ;िगद्ध ़ सपउ ह;गद्धण् ;पपद्ध दो पफलनों के अंतर की सीमा पफलनों की सीमाओं का अंतर होता है, अथार्त् ग→ं ग→ंग→ं सपउ ख्;िगद्धदृ ह;गद्ध, त्र सपउ ;िगद्ध दृ सपउ ह;गद्धण् ग→ं ग→ंग→ं ;पपपद्ध दो पफलनों के गुणन की सीमा पफलनों की सीमाओं का गुणन होता है, अथार्त् सपउ ख्;िगद्धण् ह;गद्ध,त्र सपउ ;िगद्धण् सपउ ह;गद्धण् ग→ं ग→ंग→ं ;पअद्ध दो पफलनों के भागपफल की सीमा पफलनों की सीमाओं का भागपफल होता है, ;जबकि हर शून्येतर होता हैद्ध, अथार्त् सपउ ;िद्धगगि;द्ध गंसपउ त्र→ गं→;द्ध → ह;द्धहग सपउ ग गं टिप्पणी विशेष रूप से स्िथति ;पपपद्ध की एक विश्िाष्ट स्िथति में जब ह;गद्ध एक ऐसा अचर पफलन है कि किसी वास्तविक संख्या λके लिए ह;गद्ध त्र λ हम पाते हैं सपउ ⎡;λण् द्धि;गद्ध⎤त्रλण्सपउ ;िगद्धण् गं→⎣ गं⎦→ अगले दो अनुच्छेदों में, हम दृष्टांत देंगे कि इस प्रमेय को विश्िाष्ट प्रकार के पफलनों की सीमाओं के मान प्राप्त करने में वैफसे प्रयोग किया जाता है। 13ण्3ण्2 बहुपदों और परिमेय पफलनों की सीमाएँ ;स्पउपजे व िचवसलदवउपंसे ंदक तंजपवदंस निदबजपवदेद्ध एक पफलन ;िगद्ध बहुपदीय पफलन कहलाता है, यदि ;िगद्ध शून्य पफलन है या यदि द;िगद्धत्र ं0़ ं1ग़ ं2ग2 ़ण् ण् ण् ़ ंदगए जहाँ ंपेऐसी वास्तविक संख्याएँ हैं कि किसी प्रावृफत संख्या दके लिए ं≠ 0दहम जानते हैं कि सपउ गत्र ंण्अतः ग→ं सपउ ग2 त्रसपउ ;गगण् द्धत्रसपउ गण्सपउ त्र ण् ं 2गंत्र → गं गं गं गं→ →→ दपर आगमन का सरल अभ्यास हमको बताता है कि सपउ गदत्रंद गं→ अब, मान लीजिए ;िद्धत्र 01गं़ 22 ़़ ंदगदएक बहुपदीय पफलन है।गं़ ग ण्ण्ण् 0ए 1ग2 ग2एण्ण्ण्ए दगदप्रत्येक को एक पफलन जैसा विचारते हुए, हम पाते हैं किं एं⎡ 2 द⎤गि ं़ ण्ण्ण्सपउ ;द्धत्र सपउ 0 ़ 1गं2 ग़़ ंदग गं → →⎣गं ⎦ सपउ ं़सपउ ंग़सपउ ंग2 ण्ण्ण् द़़ सपउ ंगत्र 01 2 द गं→ गं → गं→ गं → सपउ गं सपउ ग2 ़़ ंसपउ गदं ़़ ण्ण्ण् त्र 01 2 द गं→ गं→ गं→ 2 दत्र ं ंं़़ ण्ण्ण् ़़ ं01 2 द त्र ;िंद्ध ;सुनिश्िचत करें कि आपने उपयुर्क्त में प्रत्येक चरण का औचित्य समझ लिया है।द्ध हग एक पफलन एिक परिमेय पफलन कहलाता है यदि ;िगद्धत्र ीगए जहाँ ह;गद्ध और ी;गद्ध ऐसे;द्ध ;द्ध बहुपद हैं कि ी;गद्ध ≠ 0ण् तो सपउ ;द्धह;द्धगगं ह;द्धंसपउ ;द्धत्र → हग त्रगि सपउ त्र गं→ गं ीग ीी;द्धगं → ;द्ध सपउ ;द्धगं → यद्यपि, यदि ी;ंद्ध त्र 0ए दो स्िथतियाँ हैं दृ ;पद्ध जब ह;ंद्ध ≠ 0 और ;पपद्ध जब ह;ंद्ध त्र 0ण् पूवर् की स्िथति में हम कहते हैं कि सीमा का अस्ितत्व नहीं है। बाद की स्िथति में हम ह;गद्धत्र ;गदृ ंद्धाह;गद्धए जहाँ ाए ह;गद्ध में ;गदृ ंद्ध की महत्तम घात है। इसी प्रकार1 ी;गद्धत्र ;गदृ ंद्ध सी;गद्ध क्योंकि ी;ंद्ध त्र 0ण् अब, यदि ाझ सएहम पाते हैं1 ;द्धग सपउ ;गं हग ;द्ध सपउ ह−द्धा 1 गं→ गं सपउ ;द्ध त्र→गित्र स गं → ;द्ध सपउ ग−ंीग →सपउ ीग ; द्ध;द्ध 1गं गं→ ;−द्धसपउ ;गंद्धहग हंगं − ास 1 ;द्ध 0ण् ;द्ध→ 1त्रत्र0त्र सपउ ीग → ;द्ध ीं ;द्ध11 गं यदि ाढ सएतो सीमा परिभाष्िात नहीं है। उदाहरण 1 सीमाएँ ज्ञात कीजिएः 32 ; 1;पद्ध सपउ ⎡गग −़1⎦⎤ ;पपद्ध सपउ ⎡गग़द्ध⎦⎤ ग→1 ⎣ ग→3 ⎣ ⎡ 2 10 ⎤;पपपद्ध सपउ 1़़गग़़ ग ण्ण्ण्ण् ग→−1 ⎣⎦हल अभीष्ट सभी सीमाएँ वुफछ बहुपदीय पफलनों की सीमाएँ हैं। अतः सीमाएँ प्रदत्त बिंदुओं पर पफलनों के मान हैं। हम पाते हैं सपउ 3;पद्ध ग→1ख्गदृ ग2 ़ 1, त्र 13 दृ 12 ़ 1 त्र 1 सपउ ⎡गग 33 ़त्र34 ;पपद्ध ⎣;़1द्ध⎤⎦त्र; 1द्ध ;द्धत्र12 ग→3 ;पपपद्ध सपउ ⎡⎣1़़ ़़ गग2 ण्ण्ण् ग10 ⎤⎦त्र 1 ़ ;दृ1द्ध ़ ;दृ1द्ध2 ़ ण्ण्ण् ़ ;दृ1द्ध10 ग→−1 त्र 1 दृ 1 ़ 1 ़ ण्ण्ण् ़ 1 त्र 1ण् उदाहरण 2 सीमाएँ ज्ञात कीजिएः 2 32⎡ग़1 ⎤⎡ग−4ग़4ग⎤ ;पद्ध सपउ ⎢⎥ ;पपद्ध सपउ ⎢ 2 ⎥ ग→1 ग 100 ग→2 −4⎣़⎦ ⎣ ग ⎦ 2 32⎡ ग−4 ⎤⎡ग−2ग ⎤सपउ सपउ ;पपपद्ध ⎢32 ⎥ ;पअद्ध ⎢2 ⎥→→2ग 2 ⎣ग−4ग़4ग⎦ ग ⎣ग−़5ग 6 ⎦ ⎡ग−21 ⎤ ;अद्ध सपउ ⎢2 −32 ⎥ण् ग→1 ⎣ग−गग −3ग़2ग⎦हल सभी विचाराध्ीन पफलन परिमेय पफलन हैं। अतः, हम पहले प्रदत्त बिंदुओं पर इन पफलनों के मान प्राप्त करते हैं। यदि यह 00 ए के रूप का है, हम गुणनखंडों, जो सीमा के 0 का रूप होने का कारण0 है, को निरस्त करते हुए पफलनों को पुनः लिखते हैं। ग2 ़1 12 ़12;पद्ध हम पाते हैं सपउ त्रत्र ग→1 ग़100 1़100 101 ;पपद्ध 2 पर पफलन का मान प्राप्त करने पर हम इसे 00 का रूप में पाते हैं। अतः ग3 −4ग2 ़4ग गग; द्ध −22 गग;−2द्धसपउ 2 त्रसपउ त्र सपउ क्योंकि ग≠ 2 ग→2 ग→2 ग़2 ग−2 ग→2 ग़2 ;द्ध0 ग −4 ;द्ध;द्ध ;द्ध 22 −2 त्र त्रत्र0ण्22 4़ ;पपपद्ध 2 पर पफलन का मान प्राप्त करने पर, हम इसे 00 के रूप में पाते हैं, अतः ;ग़2द्ध;ग−2द्धग2 −4 सपउ सपउ त्र 2 →23 2 ग→2 −2ग गगग−4ग़4ग ;द्ध;ग़2द्ध़ 422सपउ त्रत्र त्र ग 2 ;−2द्ध 22 ;−2द्ध 0→ गग जोकि परिभाष्िात नहीं है। ;पअद्ध 2 पर पफलन का मान प्राप्त करने पर, हम इसे 00 के रूप में पाते है। अतः 232 −द्धग−2ग गग; 2 सपउ त्र सपउ 2 ग→2ग→2 ग−5ग़6 ;ग−2द्ध; ग−3द्ध 22 ग2 ;द्ध4सपउ त्र त्रत्र−4त्र ण् ग→2 ;ग−3द्ध 2 −3 −1 ;अद्ध पहले हम पफलन को परिमेय पफलन जैसा पुनः लिखते हंै। ⎡ ⎤ग−21⎡ग−21 ⎤⎢ ⎥−− गग ⎥⎢ 2 32 ⎥त्र ⎢⎣; −1द्ध गग2 −3ग़2 ⎦⎣ग−गग −3ग़2ग⎦;द्ध ⎡ ग−21 ⎤ त्र ⎢− ⎥ गग−1 गग−1 ग−2⎢⎣; द्ध; द्ध; द्ध⎦⎥ ग2 −4ग 4⎡ ़− 1 ⎤ ⎢⎥त्र ⎢;−1द्ध; ग−2द्ध⎥गग⎣⎦ ग2 −4ग़3 त्र गग−1 ग−2;द्ध; द्ध 1 पर पफलन का मान प्राप्त करने पर हम 00 का रूप पाते हैं। अतः ⎡ग2 −21 2 ग 3⎤ ग −़ 4सपउ − सपउ ⎢2 32 ⎥त्र ग→1 ग −गग −3ग ़2गग→1 गग −1⎣ ⎦ ;द्ध;द्ध ग −2 ; द्ध−3 ;द्ध गग −1 त्र ग→1 −1 ग −3 13 सपउ गग;द्ध; द्ध ग −2 − त्र सपउ त्र − त्र 2ण्ग 1 −2 11 हम टिप्पणी करते हैं कि उपयुर्क्त मान प्राप्त करने में हमने पद;ग दृ 1द्ध को निरस्त किया क्योंकि ग ≠1ण् एक महत्वपूणर् सीमा का मान प्राप्त करना, जो कि आगे परिणामों में प्रयुक्त होगी, नीचे एक प्रमेय के रूप में प्रस्तुत है। प्रमेय 2 किसी ध्न पूणा±क द के लिए, →गग; द्ध ;द्ध 2 गद −ंद द−1सपउ त्रदं ण् गंग −ं→ टिप्पणी उपयुर्क्त प्रमेय में सीमा हेतु व्यंजक सत्य है जबकि द कोइर् परिमेय संख्या है और ं ध्नात्मक है। उपपिा ;गद दृ ंदद्ध को ;ग दृ ंद्धए से भाग देने पर, हम देखते हैं कि गद दृ ंद त्र ;गदृंद्ध ;गददृ1 ़ गददृ2 ं ़ गददृ3 ं2 ़ ण्ण्ण् ़ ग ंददृ2 ़ ंददृ1द्ध गद −ंद इस प्रकार सपउ त्रसपउ ;गददृ1 ़ गददृ2 ं ़ गददृ3 ं2 ़ ण्ण्ण् ़ ग ंददृ2 ़ ंददृ1द्धग→ंग −ंग→ं त्र ंद दृ स ़ ं ंददृ2 ़ण् ण् ण् ़ ंददृ2 ;ंद्ध ़ंददृस त्र ंददृ1 ़ ंद दृ 1 ़ण्ण्ण़्ंददृ1 ़ ंददृ1 ;द पदद्ध द−1 त्र दं उदाहरण 3 मान ज्ञात कीजिए ग15 −11 ग 1;पद्ध सपउ ;पपद्ध सपउ ़− ग→1 ग10 −1 ग→0 ग हल ;पद्ध हमारे पास है 15 10 ग15 −1 ⎡ग −1 ग −1⎤ सपउ त्र सपउ ⎢झ्⎥ ग 1 10 →1 ग −1 ग −1ग→ग −1 ⎣⎦ 15 10 ⎡ग −1⎤⎡ग −1⎤सपउ झ्सपउ त्र ⎢⎥⎢ ⎥ ग→1 ग −1 ग→1 ग −1⎣⎦⎣ ⎦ त्र 15 ;1द्ध14 झ् 10;1द्ध9 ;उपयुर्क्त प्रमेय सेद्ध 3 त्र 15 झ् 10 त्र 2 ;पपद्ध ल त्र 1 ़ गए जिससे ल →1 जैसे ग →0ण् तब −11 ग 1़−सपउ त्र सपउ ग→0 गल→1 ल दृ1 11 ल 2 −12 त्र सपउ ल→1 ल −1 112 1−1 त्र ;1द्ध ;उपयुर्क्त टिप्पणी सेद्ध त्र 2 2 13ण्4ण् त्रिाकोणमितीय पफलनों की सीमाएँ ;स्पउपजे व िज्तपहवदवउमजतपब थ्नदबजपवदेद्ध व्यापक रूप से, पफलनों के बारे में निम्नलिख्िात तथ्य ;प्रमेयों के रूप में कहे गएद्ध वुफछ त्रिाकोणमितीय पफलनों की सीमाओं का परिकलन करने में सुलभ हो जाते हैं। प्रमेय 3 मान लीजिए समान प्रांत वाले दो वास्तविक मानीय पफलन िऔर ह ऐसे हैं कि परिभाषा के प्रांत में सभी ग के लिए ि;गद्ध ≤ ह; गद्ध किसी ं के लिए यदि सपउ ;िगद्ध और सपउ ह;गद्ध दोनों का अस्ितत्व है तोग→ंग→ं सपउ ;िगद्ध ≤ सपउ ह;गद्ध इसे आवृफति 13ण्8 में चित्रा सेग→ंग→ं स्पष्ट किया गया है। आवृफति 13ण्8 प्रमेय 4 सैंडविच प्रमेय ;ैंदकूपबी ज्ीमवतमउद्ध मान लीजिए एि ह और ी वास्तविक मानीय पफलन ऐसे हैं कि परिभाषा के सवर्निष्ठ प्रांतों के सभी ग के लिए ि;गद्ध ≤ ह; गद्ध ≤ ी;गद्धण् किसी वास्तविक संख्या ं के लिए यदि सपउ ;िगद्धत्र स ग→ं सपउ सपउ त्र ी;गद्धए तो ह;गद्धत्र सण् इसे ग→ंग→ं आवृफति 13ण्9 में चित्रा से स्पष्ट किया गया है। त्रिाकोणमितीय पफलनों से संबंध्ित निम्नलिख्िात महत्वपूणर् असमिका की एक सुंदर ज्यामितीय आवृफति 13ण्9उपपिा नीचे प्रस्तुत हैः π ेपद ग0 ढग ढ के लिए बवे ग ढढ1 ;’द्ध2 ग π गउपपिा हम जानते हैं कि ेपद ;दृ गद्ध त्र दृ ेपद ग और बवे; दृ गद्ध त्र बवे गण् अतः 0 ढढ 2 के लिए असमिका को सि( करने के लिए यह पयार्प्त है। आवृफति 13ण्10ए में ऐसे इकाइर् वृत्त का केंद्र व् है। कोण ।व्ब्ए π ग रेडियन का है और 0 ढ ग ढ 2 । रेखाखंड ठ। और ब्क्ए व्। के लंबवत हंै। इसके अतिरिक्त ।ब् को मिलाया गया है। तब Δव्।ब् का क्षेत्रापफल ढ वृत्तखंड व्।ब् क्षेत्रापफल ढ Δव्।ठ का क्षेत्रापफल 1 ग 21 आवृफति 13ण्10 अथार्त् व्।ण्ब्क् ढ ण्πण्;व्।द्ध ढव्।ण्।ठ ण्22π 2 अथार्त् ब्क् ढ ग ण् व्। ढ ।ठण् Δव्ब्क् में ब्क्ेपद ग त्र व्।;चूँकि व्ब् त्र व्।द्ध और अतः ब्क् त्र व्। ेपद गण् इसके अतिरिक्त ।ठ जंद ग त्र व्। और अतः ।ठ त्र व्। जंद गण् इस प्रकार व्। ेपद ग ढ व्। ग ढ व्।ण् जंद गण् क्योंकि लंबाइर् व्। ध्नात्मक है, हम पाते हैं ेपद ग ढ ग ढ जंद गण् क्योंकि 0 ढ ग ढ π 2 ए ेपद ग ध्नात्मक है और इस प्रकार ेपद गए से सभी को भाग देने पर, हम पाते हैं ग 11ढ ढ सभी का व्युत्क्रम करने पर, हम पाते हैंेपद ग बवे ग ेपद ग बवे ग ढढ1 उपपिा पूणर् हुइर्।ग प्रमेय 5 निम्नलिख्िात दो महत्वपूणर् सीमाएँ हैंः ेपद ग − ग1बवे ;पद्ध सपउ त्र1 ;पपद्ध सपउ त्र0 ग→0 गग→0 ग उपपिा;पद्ध ;’द्ध में असमिका ;प्दमुनंसपजलद्ध के अनुसार पफलन ेपद ग ए पफलन बवे ग और अचर पफलनग जिसका मान 1 हो जाता है, के बीच में स्िथत है। इसके अतिरिक्त क्योंकि सपउ बवे ग त्र 1ए हम देखते हैं कि प्रमेय के ;पद्ध की उपपिा सैंडविचग→0 प्रमेय से पूणर् है। ग⎛⎞ ;पपद्ध को सि( करने के लिए, हम त्रिाकोणमिति सवर्समिका 1 दृ बवे ग त्र 2 ेपद2 ⎜⎟का प्रयोग करते2⎝⎠2 ⎛⎞गग⎛⎞2ेपद ेपद ⎜⎟ ⎜⎟1बवे ग ⎝⎠ 2 ⎛⎞−2 ⎝⎠ गहैं, तब सपउ त्र सपउ त्रसपउ ण्ेपद ⎜⎟ग→0 गग→0 ग→0 ग 2ग ⎝⎠ 2 ग⎛⎞ेपद ⎜⎟ ⎛⎞⎝⎠2 ग त्र सपउ ण्सपउेपद त्र1ण्0 त्र0⎜⎟ग→0 गग→02⎝⎠ 2 गअवलोकन कीजिए कि हमने अस्पष्ट रूप से इस तथ्य का प्रयोग किया है कि ग →0 ए2 →0 के गतुल्य है। इसको ल त्र 2 रखकर प्रमाण्िात किया जा सकता है। ेपद 4 ग जंद गउदाहरण 4 मान ज्ञात कीजिएः ;पद्ध सपउ ;पपद्ध सपउ ग→0 ेपद 2 गग→0 ग ेपद 4 ग ⎡ेपद 4 ग 2ग ⎤ हल ;पद्ध सपउ त्र सपउ ⎢ ण् ण्2 ⎥ ग→0 ेपद 2 गग→0 ⎣ 4ग ेपद 2 ग⎦ ⎡ेपद 4 ग⎤⎡ ेपद 2 ग⎤2ण्सपउ झ्त्र ग→0 ⎢ ⎥⎢ ⎥⎣ 4ग⎦⎣ 2ग⎦ ⎡ेपद4 ग⎤⎡ेपद2 ग⎤2ण् सपउ झ्सपउ त्र ⎢⎥ ⎢⎥4ग→04ग 2ग→02ग⎣⎦ ⎣⎦ त्र 2ण्1ण्1 त्र 2 ;जब ग→ 0ए 4ग→ 0 तथा 2ग→ 0द्ध जंद ग ेपद ग ेपद ग 1 हमारे पास है ;पपद्धसपउ त्र सपउ त्र सपउ ण्सपउ त्र 1ण्1 त्र 1 ग→0 ग→0 गबवे गग→0 गग→0 बवे गग एक सामान्य नियम, जिसको सीमाओं का मान निकालते समय ध्यान में रखने की आवश्यकता है, निम्नलिख्िात हैः गिसपउ ;द्धमाना कि सीमा → का अस्ितत्व है और हम इसका मान ज्ञात करना चाहते हैं। पहलेगं गह;द्ध हम ;िंद्ध और ह;ंद्ध के मानों को जाँचें। यदि दोनों शून्य हैं, तो हम देखते हैं कि यदि हम उस गुणनखंड को प्राप्त कर सकते हैं जो पद समाप्त होने का कारण है, अथार्त् देखें यदि हम ;िगद्धत्र ;िगद्ध ;िगद्ध लिख सकें जिससे ;िंद्ध त्र 0 और ;िंद्ध ≠ 0 । इसी प्रकार ह;गद्ध त्र ह;गद्ध12121ह;गद्धएलिखते हैं जहाँ ह;ंद्ध त्र 0 और ह;ंद्ध ≠ 0ण् ;िगद्ध और ह;गद्ध में से उभयनिष्ठ गुणनखंड ;यदि212संभव हैद्ध तो निरस्त कर देते हैं और गि;द्धगच;द्धत्र हगए जहाँ ु;गद्ध ≠ 0 लिखते हैं ,;द्धगु;द्ध ंि;द्धगच;द्धसपउ त्र तब गं→ हग ुं;द्ध ;द्ध प्रश्नावली 13ण्1 प्रश्न 1 से 22 तक निम्नलिख्िात सीमाओं के मान प्राप्त कीजिएः ⎛ 22 ⎞ 21ण् सपउ ग ़3 2ण् सपउ ⎜ग −⎟ 3ण् सपउ πत ग→3 ग→π त→1⎝ 7 ⎠ 54ग ़3 ग10 ़ग5 ़1 ;ग ़1द्ध−14ण् सपउ 5ण् सपउ 6ण् सपउ ग→4 ग −2 ग→−1 ग −1 ग→0 ग 3ग2 ग 10 ग4 −81 ़इ−− ंग7ण् सपउ 2 8ण् सपउ 2 9ण् सपउ ग→2 ग −4 ग→32ग −5ग −3 ग→0 बग ़1 1 31 2ंग ़इग ़ब10ण् सपउ ्र 1 − सपउ ए ंइब 011ण् ़़≠ ्र→12 6 ग→1 बग ़इग ़ं्र −1 11 ़ ेपद ंग ेपद ंग12ण् ग 2 13ण् सपउ 14ण् सपउ एएंइसपउ ग→−2 ग→0 इग ग→0 ेपद इगग ़2 ेपद ;π−गद्ध बवे ग बवे 2 ग −1सपउ सपउ सपउ 15ण् ग→π 16ण् 17ण्ππ;−गद्ध ग→0 π−गग→0 बवे ग −1 ंग ़गबवे ग18ण् सपउ सपउ गेमब ग19ण् ग→0ग→0 इेपद ग ेपद ंग ़इग 20ण् सपउ ए ंइं ए ़≠ एए इ 0 ग→0 ंग ़ेपद इग जंद 2 गसपउ 21ण् सपउ ;बवेमब ग −बवज गद्ध 22ण् ग→ππ ग→02 ग −2 ⎧2ग ़3ए ग ≤0 23ण् सपउ ;द्ध सपउ ि;द्ध ;द्धत्रग→0 गि और ग→1 ग ए ज्ञात कीजिए, जहाँ गि ⎩⎨3;ग ़1ए द्ध ग झ0 ≠0 320 गण्िात ⎧ 2⎪ग −1ए ग ≤1गि त्र24ण् सपउ ि;द्धग ए ज्ञात कीजिए, जहाँ ;द्ध ⎨ग→1 2−−1ए ग झ1⎪ग⎩ ⎧द्यद्य⎪ग ए ग ≠0सपउ गि गि ⎨25ण् ;द्धए का मान प्राप्त कीजिए, जहाँ ;द्धत्रग ग→0 ⎪⎩0ए ग त्र0 ⎧ग ⎪ ए ग ≠0सपउ गि गि द्यद्यत्रग26ण् ;द्धए ज्ञात कीजिए, जहाँ ;द्ध ⎨ ग→0 ⎪0ए ग त्र0⎩ 27ण् सपउ ि;द्धए ज्ञात कीजिए, जहाँ गि त्रग 5ग ;द्ध द्यद्य − ग→5 ़ ए ग ढ1⎧ंइग 28ण् मान लीजिए ि;द्धग त्र⎨⎪4ए ग त्र1 इंग ए ग झ1⎪−⎩ और यदि सपउ ि;गद्ध त्र ि;1द्ध तो ं और इ के संभव मान क्या हैंघ् ग→1 29ण् मान लीजिए ं1ए ंए ण् ण् ण्ए ं अचर वास्तविक संख्याएँ है और एक पफलन2द ि;गद्धत्र;ग −ं द्ध;ग −ं2 द्धण्ण्ण् ;ग −ं द्धसे परिभाष्िात है। सपउ ि;गद्ध क्या हैघ्1 द ग→ं1 किसी ं ≠ ं1ए ं2ए ण्ण्ण्ए ंदए के लिए सपउ ि;गद्ध का परिकलन कीजिए।ग→ं ⎧ग ़1ए ग ढ0 ;द्ध ⎪ ग त्र030ण् यदि गि त्र⎨0ए ण् ⎪ग −1ए ग झ0⎩ तो ं के किन मानों के लिए सपउ ि;गद्ध का अस्ितत्व हैघ् ग→ं गि;द्ध−2 ग31ण् यदि पफलन ;िगद्धए सपउ त्रπए को संतुष्ट करता है, तो सपउ ि;द्धका मान प्राप्त ग ग 1→1 ग2 −1 → कीजिए। ग32ण् किन पूणा±कों उ और द के लिए सपउ ि;द्धग और सपउ ि;द्धदोनों का अस्ितत्व है, यदिग→0 ग→1 ⎧उग2 ़दए ग ढ0 गग 1ि;द्धत्र⎪⎨दग ़उए0 ≤≤ ⎪ 3दग ़उए ग झ1⎩ 13ण्5 अवकलज ;क्मतपअंजपअमेद्ध हम अनुच्छेद 13ण्2ए में देख चुके हैं कि विविध् समयांतरालों पर पिंड की स्िथति को जानकर उस दर को ज्ञात करना संभव है जिससे पिंड की स्िथति परिवतिर्त हो रही है। समय के विविध् क्षणों पर एक निश्िचत प्राचल ;चंतंउमजमतद्ध का जानना और उस दर को ज्ञात करने का प्रयास करना जिससे इसमें परिवतर्न हो रहा है, अत्यंत व्यापक रुचि का विषय है। वास्तविक जीवन की अनेक स्िथतियाँ होती हैं जिनमें ऐसी प्रिया कायार्न्िवत करने की आवश्यकता होती है। उदाहरणतः एक टंकी के रख - रखाव करने वाले व्यक्ित के लिए समय के अनेक क्षणों पर पानी की गहराइर् जानकर यह जानना आवश्यक होता है कि टंकी कब छलकने लगेगी, विविध् समयों पर राकेट की ऊँचाइर् जानकर राकेट वैज्ञानिकों को उस यथाथर् वेग के परिकलन की आवश्यकता होती है जिससे उपग्रह का राकेट से प्रक्षेपण आवश्यक हो। वित्तीय संस्थानों को किसी विशेष स्टाक के वतर्मान मूल्य जानकर इसके मूल्यों में परिवतर्न की भविष्यवाणी करनी आवश्यक होती है। इनमें और ऐसी अनेक अन्य स्िथतियों में यह जानना अभीष्ट होता है कि एक प्राचल में दूसरे किसी प्राचल के सापेक्ष परिवतर्न किस प्रकार होता है? परिभाषा के प्रांत के प्रदत्त बिंदु पर पफलन का अवकलज इस विषय का मुख्य उद्देश्य है। परिभाषा1 मान लीजिए िएक वास्तविक मानीय पफलन है और इसकी परिभाषा के प्रांत में एक बिंदु ं है। ं पर िका अवकलज ंी ;द्ध ि; ़ द्ध−ंिसपउ ी→0 ी से परिभाष्िात है बशतेर् कि इस सीमा का अस्ितत्व हो। ं पर ;िगद्ध का अवकलज ि ;ंद्ध से निरूपित होता है। अवलोकन कीजिए कि ि ;ंद्धए ं पर ग के सापेक्ष परिवतर्न का परिमाण बताता है। उदाहरण 5 ग त्र 2 पर पफलन ;िगद्धत्र 3ग का अवकलज ज्ञात कीजिए। ि;2 ़ीद्ध− ि2 32 ़ी −32;द्ध ;द्ध;द्ध हल हम पाते हैं िश्2;द्धत्र सपउ त्र सपउ ी→0 ीी→0 ी 63़− ी 63ी त्र सपउ त्रसपउ त्रसपउ3 त्र3ण् ी→0 ीी→0 ीी→0 अतः ग त्र 2 पर पफलन 3ग का अवकलज 3 है। उदाहरण 6 ग त्र दृ1 पर पफलन ;िगद्धत्र 2ग2़ 3ग दृ 5 का अवकलज ज्ञात कीजिए। यह भी सि( कीजिए कि ि′ ;0द्ध ़ 3 ि′ ; दृ1द्ध त्र 0ण् हल हम पहले ग त्र 0 और ग त्र दृ1 पर ;िगद्ध का अवकलज ज्ञात करते हैं। हम पाते हैं कि सपउ ;1 ीद्ध ि;1द्धि−़− − ;द्ध− त्रिश्1ी→0 ी 21 ी 231 ी 5 21231 5−़ ़−़−− − ़−− ⎡; द्ध ; द्ध⎤⎡ ;द्ध ;द्ध ⎤ ⎣ ⎦⎣ ⎦त्र सपउ ी→0 ी 2ी2 −ी त्र सपउ त्रसपउ ;2ी −त्र 20 11द्ध ;द्ध −त्र−1 ी→0 ीी→0 ि;0 ़− ीद्ध ि;0द्धऔर िश्0;द्धत्र सपउ ी→0 ी ⎡ ⎤⎡ ⎤20;़ीद्ध; 2 ़30 ़−− ीद्ध5 20 ;द्ध ;द्ध 2 ़30 −5⎣ ⎦⎣ ⎦त्र सपउ ी→0 ी 2ी2 ़3ी त्र सपउ त्रसपउ ;2ी ़3 त्र20 3द्ध ;द्ध ़त्र 3 ी→0 ीी→0 स्पष्टतः िश्0;द्ध़3 िश् −त्र 01;द्ध टिप्पणी इस स्िथति में ध्यान दीजिए कि एक बिंदु पर अवकलज का मान प्राप्त करने में सीमा ज्ञात करने के विविध् नियमों का प्रभावकारी प्रयोग सम्िमलित है। निम्नलिख्िात इसको स्पष्ट करता हैः उदाहरण 7 ग त्र 0 पर ेपद ग का अवकलज ज्ञात कीजिए। हल मान लीजिए ;िगद्ध त्र ेपद गण् तब ि;0 ़−ीद्ध ;द्ध ि0 ेपद0 ;़ −ीद्धेपद0 ेपद ;द्ध ीि;0द्धत्र सपउ त्र सपउ त्र सपउ त्र1 ी→0 ीी→0 ीी→0 ी उदाहरण 8 गत्र 0 और गत्र 3 पर पफलन ;िगद्धत्र 3 का अवकलज ज्ञात कीजिए। हल क्योंकि अवकलज पफलन में परिवतर्न को मापता है, सहजरूप से यह स्पष्ट है कि अचर पफलन का प्रत्येक बिंदु पर अवकलन शून्य होना चाहिए। इसे, वास्तव में, निम्नलिख्िात परिकलन से बल मिलता है। ;ि0 ़ द्ध− 0 33ी ि;द्ध − 0श्ि0;द्धत्रसपउ त्रसपउ त्रसपउ त्र0 ण् ी→0 ीी→0 ीी→0 ी ;3 ़ी िद्ध− 3 33ि;द्ध −इसी प्रकार श्ि3;द्धत्र सपउ ी त्रसपउ ी त्र0ण् ी→0 ी→0 अब हम एक बिंदु पर पफलन के अवकलज की ज्यामितीय व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। मान लीजिए लत्र ;िगद्ध एक पफलन है और मान लीजिए इस पफलन के आलेख पर च् त्र ;ंए ;िंद्धद्ध और फ त्र ;ं़ ीए ;िं़ ीद्ध दो परस्पर निकट बिंदु हैं। आवृफति 13ण्11 अब स्वयं व्याख्यात्मक है।हम जानते हैं कि ;िंी ंि द्ध−′;द्धत्रसपउ ंि ़ ;द्ध ी→0 ी त्रिाभुज च्फत्ए से यह स्पष्ट है कि वह अनुपात जिसकी सीमा हम ले रहे हैं, यथाथर्ता से जंद ;फच्त्द्ध के बराबर है जो कि जीवा च्फ का ढाल है। सीमा लेने की प्रिया में, जब ीए 0 की ओर अग्रसर होता है, बिंदु फए च् की ओर अग्रसर होता है और हम पाते हैं अथार्त् ंिी ंि ;़द्ध− ;द्ध फत्सपउ त्रसपउ ी→0 ी फ→च् च्त् यह इस तथ्य के तुल्य है कि जीवा च्फए वक्र लत्र ;िगद्ध के बिंदु च् पर स्पशीर् की ओर अग्रसर होती है। अतः ′;द्धत्रजंद ψंिण् एक दिए पफलन विेफ लिए हम प्रत्येक बिंदु पर अवकलज ज्ञात कर सकते हैं। यदि प्रत्येक बिंदु पर अवकलज का अस्ितत्व है तो यह एक नये पफलन को परिभाष्िात करता है जिसे पफलन किा अवकलज कहा जाता है औपचारिक रूप से हम एक पफलन के अवकलज को निम्नलिख्िात प्रकार परिभाष्िात करते हैं। परिभाषा 2 मान लीजिए कि िएक वास्तविक मानीय पफलन है, तो गी ;द्ध ि; ़ द्ध−गिसपउ ी→0 ी से परिभाष्िात पफलन, जहाँ कहीं सीमा का अस्ितत्व है, को ग पर िका अवकलज परिभाष्िात किया जाता है और ि;गद्ध से निरूपित किया जाता है। अवकलज की इस परिभाषा को अवकलज का प्रथम सि(ांत भी कहा जाता है। गिी −गिसपउ ;़द्ध ;द्ध इस प्रकार ि ;गद्ध त्र ी→0 ी स्पष्टतः ि ;गद्ध की परिभाषा का प्रांत वही है जहाँ कहीं उपयुर्क्त सीमा का अस्ितत्व है। एक क गपफलन के अवकलज के विभ्िान्न संकेतन हैं। कभी - कभी ि;गद्ध को ; ि;द्धद्धसे निरूपित कियाकग कलजाता है यदि ल त्र ;िगद्धए तो यह कग से निरूपित किया जाता है। इसे ल या ;िगद्ध के सापेक्ष अवकलज के रूप में उल्लेख्िात किया जाता है इसे क् ; ि;गद्ध द्ध से भी निरूपित किया जाता है। क क ि⎛क ि⎞गि याइसके अतिरिक्त ग त्र ं पर िके अवकलज को कग ;द्ध या ⎜⎟ से भी ं कगं कग ⎝⎠गत्रं निरूपित किया जाता है। उदाहरण 9 ;िगद्ध त्र 10 ग का अवकलज ज्ञात कीजिए। ि; ़ द्ध−गि 10 ग ़ी −10;गद्धगी ;द्ध ;द्धहल हम पाते हैं ि ;गद्धत्र सपउ त्र सपउ ी→0 ीी→0 ी त्र सपउ 10ी त्र ;द्ध 10 सपउ 10 त्र ी→0 ीी→0 उदाहरण 10 ;िगद्धत्र ग2 का अवकलज ज्ञात कीजिए। गी ;द्ध ि; ़ द्ध−गि हल हम पाते हैं ि;गद्ध त्र सपउ ी→0 ी ;ग ़ीद्ध2 −;गद्ध2 त्र सपउ त्र सपउ ;ी ़2गद्धत्र2ग ी→0ी→0 ी उदाहाण 11 एक अचर वास्तविक संख्या ंके लिए, अचर पफलन ;िगद्ध त्र ंका अवकलज ज्ञात कीजिए। गिी गि ;़द्ध− ;द्ध हल हम पाते हैं ि;गद्ध त्र सपउ ी→0 ी − त्र सपउ ं त्रसपउ 0 त्र0 क्योंकि ी≠0ी→0 ीी→0 ी 1उदाहरण 12 ;िगद्ध त्र का अवकलज ज्ञात कीजिए।ग;िगी गि द्ध−़ ;द्ध हल हम पाते हैं ि;गद्ध त्र सपउ ी→0 ी 11 दृ ;ग़ीद्ध गसपउ त्र ी→0 ी 1 ⎡ग−;गीद्ध⎤़सपउ ⎢⎥त्र 0 ी गगी ी→ ⎢⎣ ;़द्ध⎥⎦ 1 ⎡−ी ⎤−1 1सपउ ⎢⎥ सपउ −त्र त्र त्र ी→0 ीग;गी द्ध ी→0 ग;़द्ध 2़ गी⎢⎥ ग⎣⎦ 13ण्5ण्1 पफलनों के अवकलज का बीजगण्िात ;।सहमइतं व िकमतपअंजपअम व िनिदबजपवदेद्ध क्योंकि अवकलज की यथाथर् परिभाषा में सीमा निश्चय ही सीध्े रूप मंे सम्िमलित है, हम अवकलज के नियमों के निकटता से सीमा के नियमों के अनुगमन की आशा करते हैं। हम इनको निम्नलिख्िात प्रमेयों में पाते हैंः प्रमेय 5 मान लीजिए अिौर हदो ऐसे पफलन हैं कि उनके उभयनिष्ठ प्रांत में उनके अवकलन परिभाष्िात हैं, तब ;पद्ध दो पफलनों के योग का अवकलज उन पफलनों के अवकलजों का योग है। क ककगिहग ;द्ध ⎡ ;द्ध ;द्ध ़ ग⎤त्र ;िद्ध ़ हग⎣⎦कग कगकग ;पपद्ध दो पफलनों के अंतर का अवकलज उन पफलनों के अवकलजों का अंतर है। क कक⎡ ि;द्ध ;द्ध ग −हग ⎤त्र ि;द्धग − ;द्ध हग ⎣⎦कग कगकग ;पपपद्ध दो पफलनों के गुणन का अवकलज निम्नलिख्िात गुणन नियम ;चतवकनबज तनसमद्ध से दिया गया हैः कक क ग ण् हग ;द्ध ग हग ;द्ध⎡ ि;द्ध ;द्धग ⎤त्र ि;द्धण् हग ़ ि;द्धण् ⎣⎦कग कग कग ;पअद्ध दो पफलनों के भागपफल का अवकलज निम्नलिख्िात भागपफल नियम ;ुनवजपमदज तनसमद्ध से दिया गया है ;जहाँ कहीं हर शून्येतर हैद्ध क क;द्धण् ;द्ध −गि ;द्ध गिहग ;द्ध हग क ⎛ ि;द्धग ⎞ कग कग त्र⎜ ⎟ 2कग ⎝ ;द्ध ;द्ध;द्धहग ⎠ हग इनकी उपपिा सीमाओं की तुल्य रूप प्रमेयों से आवश्यकीय रूप से अनुसरण करती हैं। हम इन्हें यहाँ सि( नहीं करेंगे। सीमाओं की स्िथति की तरह यह प्रमेय बतलाता है कि विशेष प्रकार के पफलनों के अवकलज कैसे परिकलित किए जाते हैं। प्रमेय के अंतिम दो कथनों को निम्नलिख्िात ढंग से पुनः कहा जा सकता है जिससे उनके पुनस्मर्रण करने में आसानी से सहायता मिलती है। मान लीजिए न त्र ि;द्धग और अ त्र ह ;गद्ध तब ′;द्धनअ त्र नअ′़नअ ′ यह पफलनों के गुणन के अवकलन के लिए स्मपइदपज्र नियम या गुणन नियम उल्लेख्िात होता है। इसी प्रकार, भागपफल नियम है ′ न नअ′−नअ ′⎛⎞ ⎜⎟2 त्र अअ⎝⎠ अब, आइए हम वुफछ मानक पफलनों के अवकलनों को लें। यह देखना सरल है कि पफलन ि;गद्धत्र ग का अवकलज अचर पफलन 1 है। यह है क्योंकि गिीग ग ़−़−ि; द्ध;द्ध ीगि;गद्ध त्र सपउ त्र सपउ ी→0 ीी→0 ी सपउ1 त्र1त्र ी→0 हम इसका और उपयुर्क्त प्रमेय का प्रयोग ;िगद्ध त्र 10ग त्र ग ़ ग ़ ण्ण्ण् ़ ग ;10 पदद्ध ;उपयुर्क्त प्रमेय के ;पद्ध सेद्ध के अवकलज के परिकलन में करते हैं क ि;द्धकग कग त्रकग ;ग ण्ण्ण़़्गद्ध;10 पदद्ध कक त्र ग ़ण्ण्ण् ़ग ;10 पदद्धकग कग त्र ़़ ;10 पदद्ध त्र 10ण्1 ण्ण्ण् 1 हम ध्यान देते हैं कि इस सीमा का मान गुणन सूत्रा के प्रयोग से भी प्राप्त किया जा सकता है। हम लिखते हैं, ;िगद्ध त्र 10ग त्र नअए जहाँ न लिखते हैं जहाँ न प्रत्येक जगह मान 10 लेकर अचर पफलनहै और अ;गद्धत्र गण् यहाँ हम जानते हैं कि न का अवकलज 0 के बराबर है साथ ही अ;गद्धत्र ग का अवकलज 1 के बराबर है। इस प्रकार गुणन नियम से, हम पाते हैं ′′ि′;गद्धत्र 10ग त्रनअ त्रनअ ′़नअ ′त्र0ण्ग ़10ण्1 त्र10 इसी आधर पर ;िगद्धत्र ग2 के अवकलज का मान प्राप्त किया जा सकता है। हम पाते हैं ;िगद्धत्र ग2त्र ग ण्ग और अतः ; द्ध;द्धककिक क त्र गण्गग ण् ;द्ध; द्ध त्र ;द्धग ण् ़गगकगकग कग कग त्र 1ण्ग ़गण्1 त्र2ग अध्िक व्यापक रूप से हम निम्नलिख्िात प्रमेय पाते हैंः प्रमेय 6 किसी ध्न पूणा±क द के लिए ;िगद्धत्र गद का अवकलज दगद दृ 1 है। उपपिा अवकलज पफलन की परिभाषा से, हम पाते हैं दि;़ द्ध−गि गद −गगी ;द्ध ;़ीद्धगिश्;द्धत्रसपउ त्रसपउ ण् ी→0 ीी→0 ी द ददद−1 ददद्विपद प्रमेय कहता है कि ;ग ़ ीद्धद त्र ब्0 द्धग ़ ब् गी ण्ण्ण् ; द और; ;द्ध 1 ़़ ब् द्धी ;ग ़ ीद्धद दृ गद त्र ी;दगद दृ 1 ़ण्ण्ण् ़ ीद दृ 1द्ध इस प्रकार दद−1 द−1दक ि;द्धग सपउ ;ग ़ीद्ध−ग ीदग ;़ण्ण्ण्ण् ़ी द्ध त्र त्र सपउ कग ी→0 ीी→0 ी द−1 द−1 त्र सपउ ;दग ़़ी ए त्र द 1ण्ण्ण् द्ध−दगी→0 विकल्पतः हम इसको द पर आगमन और गुणन सूत्रा से भी निम्न प्रकार सि( कर सकते हैंः द त्र 1 के लिए यह सत्य है जैसा कि पहले दिखाया जा चुका है कगद क ण् द−1;द्धत्र ;गग द्धकग कग कद−1 कद−1 त्र ;द्धण्; द्ध़गण् ;ग द्धगग ;गुणन सूत्रा सेद्धकग कग द−1 द−2त्र 1ण्ग ़गण्;;द −1द्धग द्ध;आगमन परिकल्पना सेद्ध द−1 द−1 द−1त्र ग ़;द −1द्धग त्रदग टिप्पणी उपयुर्क्त प्रमेय गएकी सभी घातों के लिए सत्य है अथार्त् द कोइर् भी वास्तविक संख्या हो सकती है। ;लेकिन हम इसको यहाँ सि( नहीं करेंगेद्ध 13ण्5ण्2 बहुपदों और त्रिाकोणमितीय पफलनों के अवकलज ;क्मतपअंजपअम व िचवसलदवउपंसे ंदक जतपहवदवउमजतपब निदबजपवदेद्ध हम निम्नलिख्िात प्रमेय से प्रारंभ करेंगे जो हमको बहुपदीय पफलनों के अवकलज बतलाती है। दद−1प्रमेय 7 मान लीजिए ;िगद्ध त्र ंग ंग ़ण्ण्ण्ण् ़ंग ़ं एक बहुपदीय पफलन है जहाँ ंपेद ़द−1 10 सभी वास्तविक संख्याएँ हैं और ं≠0 तब अवकलज पफलन इस प्रकार दिया जाता हैःद क ि;द्धग द−1 ग−2त्रदं ग द ़;द −1द्धंद−1ग ़़ ़ंण्ण्ण् 2ंगकग 21 इस प्रमेय की उपपिा प्रमेय 5 और प्रमेय 6 के भाग ;पद्ध को मात्रा साथ रखने से प्राप्त की जा सकती है। उदाहरण 13 6ग100 दृ ग55 ़ ग के अवकलज का परिकलन कीजिए। हल उपयुर्क्त प्रमेय का सीध अनुप्रयोग बतलाता है कि उपयुर्क्त पफलन का अवकलज 99 54 600ग −55 ग ़1 है। उदाहरण 14 ग त्र 1 पर ;िगद्धत्र 1 ़ ग ़ ग2़ ग3 ़ण्ण्ण् ़ ग50 का अवकलज ज्ञात कीजिए। ण् हल उपयुर्क्त प्रमेय 6 का सीध अनुप्रयोग बतलाता है कि उपयुर्क्त पफलन का अवकलज 1 ़ 2ग ़ 3ग2 ़ ण् ण् ण् ़ 50ग49 है। ग त्र 1 पर इस पफलन का मान 1 ़ 2;1द्ध ़ 3;1द्ध2 ़ ण्ण् ण् ़ 50;1द्ध49 ;द्ध51 50 ;द्धत्र 1 ़ 2 ़ 3 ़ ण् ण् ण् ़ 50 त्र त्र 1275 है।2ग ़1उदाहरण 15 ;िगद्धत्र का अवकलज ज्ञात कीजिए।ग हल यह पफलन ग त्र 0 के अतिरिक्त प्रत्येक के लिए परिभाष्िात है। हम यहाँ न त्र ग ़ 1 और अ त्र ग लेकर भागपफल नियम का प्रयोग करते हैं। अतः न´ त्र 1 और अ´ त्र 1 इसलिए क ि;द्धग कग 1 कन 1 ग −ग ़11 ⎛़⎞ ⎛⎞ नअ′−नअ ′ ;द्ध; द्ध 1 त्रत्र त्रत्र⎜⎟ ⎜⎟ 2 त्र 2 − 2कग कग ⎝ ग कग ⎝⎠ ग⎠ अअ ग उदाहरण 16 ेपद ग के अवकलज का परिकलन कीजिए। हल मान लीजिए ;िगद्ध त्र ेपद गए तब क ि;द्धग ;गीद्ध− ि;गद्ध ेपद ;गीद्ध−ेपद ;द्धि़़ ग त्र सपउ त्रसपउ कग ी→0 ीी→0 ी ⎛2ग ़ी ⎞ ⎛⎞ ी2बवे ेपद ⎜ ⎟⎜⎟ ⎝ 2 ⎠ 2त्र ⎝⎠; ेपद । दृ ेपद ठ के सूत्रा का प्रयोग करकेद्धसपउ ी→0 ी ीेपद ⎛ ी ⎞ 2सपउ बवे ग ़ ण्सपउ त्रबवे गण्1 त्रबवे ग⎜⎟त्र ी→02 ⎠ी→0 ी ण्⎝ 2 उदाहरण 17 जंद ग के अवकलज का परिकलन कीजिए। हल मान लीजिए ;िगद्ध त्र जंद गए तब क ि;द्धग ि;़ द्ध− ि;द्ध जंद गीद्धगी ग ;़ −जंद ;द्ध ग त्र सपउ त्रसपउ कग ी→0 ीी→0 ी 1 ⎡ेपद ;गी़द्ध ेपद ग ⎤ सपउ −त्र ी→0 ी ⎢⎢ बवे ;ग ़ीद्ध बवे ग ⎥⎥ ⎣⎦ ⎡ेपद ;ग ़ीद्धबवे ग −बवे ;ग ़ीद्धेपद ग ⎤ सपउ ⎢⎥त्र ी→0 ⎢ ी बवे ;ग ़ीद्धबवे ग ⎥⎦⎣ ेपद;ग ़−द्ध त्र सपउ ीग ;ेपद ;। ़ ठद्ध के सूत्रा का प्रयोग करकेद्धी→0 ीबवे ;ग ़ीद्धबवे ग ेपद ी 1सपउ ण्सपउ त्र ी→0 ीी→0 बवे ;ग ़ीद्धबवे ग 121ण् 2 त्रेमब ग बवे ग त्र उदाहरण 18 ;िगद्ध त्र ेपद2 ग के अवकलज का परिकलन कीजिए। हल हम इसका मान प्राप्त करने के लिए स्मपइदपज्र गुणन सूत्रा का प्रयोग करते हंै। क ि;द्धकग त्र ;ेपद ग ेपद गद्धकगकग त्र ;ेपद गद्ध′ ेपद ग ़ ेपद ग ;ेपद गद्ध′ त्र ;बवे गद्ध ेपद ग ़ ेपद ग ;बवे गद्ध त्र 2ेपद ग बवे ग त्र ेपद 2गण् प्रश्नावली 13ण्2 1ण् ग त्र 10 पर ग2दृ 2 का अवकलज ज्ञात कीजिए। 2ण् ग त्र स00 पर 99ग का अवकलज ज्ञात कीजिए। 3ण् ग त्र 1 पर ग का अवकलज ज्ञात कीजिए। 4ण् प्रथम सि(ांत से निम्नलिख्िात पफलनों के अवकलज ज्ञात कीजिएः 3;पद्ध ग −27 ;पपद्ध ;ग −1द्ध;ग −2द्ध 1 ग ़1;पपपद्ध 2 ;पअद्धग ग −1 10099 2गग ग ग त्र ़़ण्ण्ण् ़ ग 15ण् पफलन ि;द्ध ़़ 100 99 2 के लिए सि( कीजिए कि ि′;1100 द्धत्र ि′;0द्धण् दद−12 द−2 द−1 द6ण् किसी अचर वास्तविक संख्या ं के लिए ग ़ंग ़ंग ़ण्ण्ण् ़ंग ़ं का अवकलज ज्ञात कीजिए 7ण् किन्हीं अचरों ं और इए के लिए,22 ग −ं;पद्ध ;ग −ंग −इद्ध ;द्धद्ध; ;पपद्ध ंग ़इ ;पपपद्ध ग −इ के अवकलज ज्ञात कीजिए। गद−ंद 8ण् किसी अचर ंके लिए का अवकलज ज्ञात कीजिए।ग−ं 9ण् निम्नलिख्िात के अवकलज ज्ञात कीजिएः 3;पद्ध 2 4 ग− ;पपद्ध ; द्ध; द्ध35 3 1 1ग ग ग़ − − ;पपपद्ध ; द्ध3 53ग ग− ़ ;पअद्ध ; द्ध5 9ग 36ग−− ;अद्ध ; द्ध4 534ग ग− −− ;अपद्ध 2 − 2ग ग़13ग−1 10ण् प्रथम सि(ांत से बवे गका अवकलज ज्ञात कीजिए। 11ण् निम्नलिख्िात पफलनों के अवकलज ज्ञात कीजिए। ;पद्ध ेपद गबवे ग ;पपद्ध ेमब ग ;पपपद्ध 5ेमब ग़4बवे ग ;पअद्ध बवेमब ग ;अद्ध 3बवज ग़5बवेमब ग ;अपद्ध 5ेपद ग−6बवे ग़7 ;अपपद्ध 2जंद ग−7ेमब ग विविध् उदाहरण उदाहरण 19 प्रथम सि(ांत से किा अवकलज ज्ञात कीजिए जहाँ इिस प्रकार प्रदत्त हैः 2ग़31;पद्ध ;िगद्ध त्र ;पपद्ध ;िगद्ध त्र ग़ ग−2 ग हल ;पद्ध ध्यान दीजिए कि पफलन गत्र 2 पर परिभाष्िात नहीं है। लेकिन, हम पाते हैं ;़ द्ध़3 ;़द्ध ;द्ध ़−2 ग−2 2 गी 2ग़3 गि ी −गि ′;द्ध सपउ त्र गी − गित्र सपउ ी→0 ीी→0 ी ;2ग़2ी़3द्ध; ग−2 −2ग़3द्ध; गी 2द्ध; ़− द्ध त्र सपउ ;−2द्ध; गी ी→0 ीग ़− 2द्ध ;2ग़3द्ध; ग−2 ़2 ;−2 −2ग़3द्ध; ग−2 −ीग ़3द्धद्ध ीग द्ध; द्ध; 2 त्र सपउ ;−2द्ध; गी ी→0 ीग ़− 2द्ध दृ7 7सपउ त्र−त्र 2ी→0 ;ग−2द्ध; गी ़− 2द्ध;ग−2द्धपुनः ध्यान दीजिए कि गत्र 2 पर पफलन िभी परिभाष्िात नहीं है। ;पपद्ध गत्र 0 पर पफलन परिभाष्िात नहीं है। लेकिन, हम पाते हैं ⎛ 1 ⎞⎛ 1 ⎞गी़़ ग−़ ⎜ ⎟⎜ ⎟़− ग⎠गिी गि ; द्ध;द्ध ⎝ ग़ी⎠⎝ ि;गद्धत्र सपउ त्रसपउ ी→0 ीी→0 ी 1 ⎡ 11 ⎤सपउ ी़−त्र ⎢⎥ी→0 ी गीग⎣़ ⎦ ⎛⎤1 ⎡ गगी −−⎤ 1 ⎡ 1 ⎞ सपउ ⎢ी़ ⎥त्रसपउ ⎢ी⎜1− ⎟⎥त्र ी→0 ⎣ ग; द्ध ़ ⎥⎦ी→0 ⎢⎣⎜⎝ ग; द्ध ़ ⎟⎠⎥⎦ी⎢ गीी गी ⎡ 1 ⎤ 1 त्र सपउ ⎢1 − ⎥त्र1 −2ी→़0 ⎢⎣ गगी ; द्ध ⎥⎦ ग पुनः ध्यान दीजिए कि गत्र 0 पर पफलन िपरिभाष्िात नहीं है। उदाहरण 20 प्रथम सि(ांत से पफलन ;िगद्ध का अवकलज ज्ञात कीजिए जहाँ ;िगद्ध ;पद्ध ेपद ग़बवे ग ;पपद्ध गेपद ग गिी गि ़− ; द्ध;द्ध हल ;पद्ध हम पाते हैं, श्ि;गद्धत्र ी ;द्धबवे ;गी द्ध ग−बवे ेपद गी ़− ेपद ़़ ग त्र सपउ ी→0 ी ेपद गबवे ी़बवे गेपद ी़बवे गबवे ी−ेपद गेपद ी−ेपद ग−बवे ग त्र सपउ ी→0 ी ; ग−ेपद गद्ध़ेपद ग;बवे ी1द्धबवे ग;बवे ी−1द्धेपदी बवे −़ त्र सपउ ी→0 ी ेपद ी ;बवे ी−1द्ध;बवे ी−1द्धत्र सपउ ;बवे ग−ेपद गद्ध़सपउेपद ग ़सपउ बवे ग ी→0 ीी→0 ीी→0 ी त्र बवे गदृ ेपद ग गीगि ग ़ी ेपद गी गेपद ि़− ़− ग;द्ध;द्ध ;द्ध;द्ध ;पपद्ध िश्;गद्धत्र सपउ त्रसपउ ी→0 ीी→0 ी ;ग ़ीद्ध;ेपद ग बवे ी ़ेपद ी बवे गद्ध−गेपद ग त्र सपउ ी→0 ी ेपद ग;बवे ी 1द्धग बवे गेपद ी ़ी;ेपद ग बवे ी ़ेपद ी बवे गद्धग −़ त्र सपउ ी→0 ी गेपद ग;बवे ी −1द्ध ेपद ी ी→0 ;द्धत्र सपउ ़सपउ ग बवे ग ़सपउ ेपद ग बवे ी ़ेपद ी बवे ग ी→0 ी ीी→0 त्र ग बवे ग ़ ेपद ग उदाहरण 21 ;पद्ध ;िगद्ध त्र ेपद 2ग ;पपद्ध ह;गद्ध त्र बवज ग के अवकलज का परिकलन कीजिए। हल ;पद्ध त्रिाकोणमिति सूत्रा ेपद 2ग त्र 2 ेपद ग बवे ग का पुनस्मर्रण कीजिए। इस प्रकार क ि;द्धगक क त्र ;2ेपद गबवे गद्धत्र2 ;ेपद गबवे गद्धकगकग कग ⎡′ ′⎤ ⎢; द्ध बवे ग ़ेपद ग;द्ध बवे ग ⎥2 ेपद गत्र ⎣⎦ 222बवे ;⎤ 2बवे ; गत्र ⎡;गद्धबवे ग ़ेपद ग −ेपद गद्धत्र ग −ेपद द्ध⎣⎦बवे ग;पपद्ध परिभाषा से,ह;गद्ध त्र बवज ग त्र हम भागपफल सूत्रा का प्रयोग इस पफलन पर करेंगे, जहाँ कहींेपद ग कहक क बवे ;बवे द्ध ;ेपद गद्ध ;बवे गद्ध;ेपद गद्ध⎛ ग ⎞ ग ′− ′ यह परिभाष्िात है। त्र ;बवज गद्ध त्र⎜ ⎟त्र कगकग कग ⎝ेपद ग ⎠ ;ेपद गद्ध2 ;−ेपद गग − गद्ध;ेपद द्ध ;बवे द्ध;बवे गद्धत्र ;ेपद गद्ध2 ेपद 2 ग ़बवे 2 ग 2त्र − त्र−बवेमब ग ेपद2 ग 1विकल्पतः इसको ध्यान देकर कि बवज ग त्र ए परिकलित किया जा सकता है। यहाँ हम इस तथ्यजंद ग का प्रयोग करते हैं कि जंद ग का अवकलज ेमब2 ग है जो हमने उदाहरण 17 में देखा है और साथ ही अचर पफलन का अवकलज 0 होता है। कहक क ⎛ 1 ⎞;बवज गद्ध त्र त्र ⎜⎟कगकग कग ⎝जंद ग ⎠ ′′;1द्ध ;जंद गद्ध ;1द्ध;जंद − गद्ध त्र ;जंद गद्ध2 ;0द्ध;जंद गद्ध ;ेमब गद्ध2− त्र ;जंद गद्ध2 −ेमब 2 ग 2 त्र 2 त्र−बवेमब ग जंद ग ग5 −बवे गग ़बवे गउदाहरण 22 ;पद्ध ;पपद्धेपद ग जंद ग का अवकलज ज्ञात कीजिए। ग5 −बवे ग हल ;पद्ध मान लीजिए ;द्ध त्रीग ण् जहाँ कहीं भी यह परिभाष्िात है, हम इस पफलन परेपद ग भागपफल नियम का प्रयोग करेंगे। ′′;ग5 −बवे गद्ध ेपद ग −;ग5 −बवे गद्ध;ेपद गद्ध′;द्ध 2ीग त्र ;ेपद गद्ध ;5ग4 ़ेपद गद्धेपद ग −;ग5 −बवे गद्धबवे ग त्र ेपद2 ग −ग5 बवे ग ़5ग4 ेपद ग ़1 त्र ;ेपद गद्ध2 ग ़बवे ग;पपद्ध हम पफलन पर भागपफल नियम का प्रयोग करेंगे जहाँ कहीं भी यह परिभाष्िात है।जंद ग ′′ ′;द्ध;ग ़ बवे गद्ध जंद ग − ;ग ़ बवे गद्ध;जंद गद्धीगत्र 2;जंद गद्ध ;1 − ेपद गद्ध जंद ग − ;ग ़ बवे गद्धेमब 2 ग त्र ;जंद गद्ध2 अध्याय 13 पर विविध् प्रश्नावली 1ण् प्रथम सि(ांत से निम्नलिख्िात पफलनों का अवकलज ज्ञात कीजिएः;पद्ध ;पपद्ध ग − ;पपपद्ध ेपद ;ग ़ 1द्ध ;पअद्ध बवे ;ग दृ द्ध−ग ;द्ध− 1 8 π निम्नलिख्िात पफलनों के अवकलज ज्ञात कीजिए ;यह समझा जाय कि ंए इए बए कए चए ुए त और े निश्िचत शून्येतर अचर हैं और उ तथा द पूणा±क हैं।द्धरू ⎛ त ⎞़2ण् ;ग ़ ंद्ध 3ण् ;चग ़ ुद्ध ⎜ े ⎟ 4ण् ;ंग ़ इद्ध; बग ़ क द्ध2 ⎝ ग ⎠ 11़ंग ़ इग 1 5ण्6ण् 7ण् बग ़ क 1 ंग2 ़ इग ़ ब1− ग ंग ़ इ चग2 ़ ुग ़ त ंइ 8ण् 2 9ण् 10ण् 4 − 2 ़ बवे ग चग ़ ुग ़ त ंग ़ इ गग दउ11ण् 4 ग − 2 12ण् ;ंग ़ इद्धद 13ण् ;ंग ़ इद्ध; बग ़ कद्ध बवे ग14ण् ेपद ;ग ़ ंद्ध 15ण् बवेमब ग बवज ग 16ण् 1ेपद ग़ ेपद ग ़ बवे ग ेमब ग −117ण् 18ण् 19ण् ेपददगेपद ग − बवे ग ेमब ग ़1 ंइ़ ेपद ग ेपद; ग ़ ंद्ध20ण् 21ण् 22ण् ग4;5ेपद ग − 3बवे गद्धबक़ बवे ग बवे ग 2 223ण् ; ग ़1बवे ग 24ण् ;ंग ़ ेपद गद्ध; च ़ ु बवे गद्धद्ध π2 ⎛⎞ गबवे 4ग़5ेपद ग ⎜⎟गग 26ण् 27ण् ⎝⎠25ण् ;ग़बवे द्ध;−जंद गद्ध 4 3ग़7बवे ग ेपद ग गग28ण् 29ण् ;ग़ेमब द्ध;−जंद गद्ध 30ण्1जंद ़ ग गग ेपददग सारांश ऽ पफलन का अपेक्ष्िात मान जो एक बिंदु के बाईं ओर के बिंदुओं पर निभर्र करता है, बिंदु पर पफलन के बाएँ पक्ष की सीमा ;स्मजि ींदकमक सपउपजद्ध को परिभाष्िात करता है।इसी प्रकार दाएँ पक्ष की सीमा ;त्पहीज ींदकमक सपउपजद्ध। ऽ एक बिंदु पर पफलन की सीमा बाएँ पक्ष और दाएँ पक्ष की सीमाओं से प्राप्त उभयनिष्ठ मान हैं यदि वे संपाती हों। ऽ यदि किसी बिंदु पर बाएँ पक्ष और दाएँ पक्ष की सीमाएँ संपाती न हों तो यह कहा जाता है कि उस बिंदु पर पफलन की सीमा का अस्ितत्व नहीं है। ऽ एक वास्तविक संख्या ंऔर एक पफलन गि→ं;िगद्ध और िके लिए सपउ ;ंद्ध समान नहीं भी हो सकते ;वास्तव में, एक परिभाष्िात हो और दूसरा नहींद्ध ऽ पफलनांे अिौर हके लिए निम्नलिख्िात लागू होते हैंः सपउ गंख्→ सपउ ख्गं→ ;द्ध ±;द्ध गगि ह; द्धण् गह;द्ध ,गि त्रसपउ , गं → त्रसपउ िगं → ;िद्ध ±सपउ हगग ;द्ध गं→ ; द्धण्सपउ ह;द्ध गग गं→ सपउ ;िद्ध ग⎡गि;द्ध ⎤गंसपउ त्र→⎢⎥ गं⎣ह;द्ध ⎦सपउ ग→ गह;द्ध गं→ ऽ निम्नलिख्िात वुफछ मानक सीमाएँ हैं। गं द−दद−1सपउ त्रदं गंग−ं→ ेपद गसपउ त्र1 ग→0 ग 1बवे ग−सपउ त्र0 ग→0 ऽ ं पर पफलन िका अवकलज ि;ंी़−द्ध ि;द्ध ंंि′;द्धत्रसपउ से परिभाष्िात होता है।ी→0 ी ऽ प्रत्येक बिंदु पर अवकलज, अवकलज पफलन ;द्ध ि;गीद्ध ि;द्ध क िग ़− ग′त्रगि;द्ध त्रसपउ से परिभाष्िात होता है।कग ी→0 ी ऽ पफलनों न और अ के लिए निम्नलिख्िात लागू होता हैः ±′ ′ ′त्र± ;द्धत्रनअ़′ ;नअद्ध नअ नअ ′′ नअ′ ⎛⎞न नअ ′−नअ ′ त्र⎜⎟2अअ⎝⎠ बशतेर् सभी परिभाष्िात हैं। ऽ निम्नलिख्िात वुफछ मानक अवकलज हैंः कगद द−1;द्धत्रदग कग क ;ेपद गद्ध त्रबवे गकग क ;बवे गद्ध त्र−ेपद ग कग ऐतिहासिक पृष्ठभूमि गण्िात के इतिहास में कलन के अन्वेषण के श्रेय की भागीदारी हेतु दो नाम प्रमुख हंै प्ेेंब छमूजवद ;1642 दृ 1727द्ध और ळण्ॅण् स्मपइदपज्र ;1646 दृ 1717द्धण् सत्राहवीं शताब्दी में दोनों ने स्वतंत्राता पूवर्क कलन का अन्वेषण किया। कलन के आगमन के बाद इसके आगामी विकास हेतु अनेक गण्िातज्ञों ने योगदान किया। परिशु( संकल्पना का मुख्य श्रेय महान गण्िातज्ञों ।ण्स्ण्ब्ंनबीलए श्रण्स्ण्स्ंहतंदहम और ज्ञंतस ॅमपमत ेजतंेे को प्राप्त है। ब्ंनबील ने कलन को आधर दिया जिसको अब हम व्यापकतः पाठ््य पुस्तकों में स्वीकार कर चुके हैं। ब्ंनबील ने क्श्।सउइमतज की सीमा संकल्पना के प्रयोग के द्वारा अवकलज की परिभाषा दी। सीमा कीश्ष्ि;गद्ध के लिए ल’, फ्निदबजपवद कमतपअमष्मय् नाम दिया। 1900 से पूवर् यह सोचा जाता था कि कलन को पढ़ाना बहुत कठिन है, इसलिए कलन युवाओं की पहुँच से बाहर थी। लेकिन ठीक 1900 में इंगलैंड में श्रवीद च्मततल एवं अन्य ने इस विचार का प्रचार करना प्रारंभ किया कि कलन की मुख्य विध्ियाँ और धरणाएँ सरल हैं और स्वूफल स्तर पर भी पढ़ाया जा सकता है। थ्ण्स्ण् ळतपपििद ने कलन के अध्ययन को प्रथम वषर् के छात्रों से प्रारंभ करके नेतृत्व प्रदान किया। उन दिनों यह बहुत चुनौतीपूणर् कायर् था। आज न केवल गण्िात अपितु अनेक अन्य विषयों जैसे भौतिकी, रसायन विज्ञान, अथर्शास्त्रा, जीवविज्ञान में कलन की उपयोगिता महत्वपूणर् है। कृ ऽ कृ

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Ganit

अध्याय 13

सीमा और अवकलज

(Limits and Derivatives)

"With the Calculus as a key, Mathematics can be successfully applied to the explanation of the course of Nature- Whitehead"

13.1 भूमिका  (Introduction)

यह अध्याय कलन की एक भूमिका है। कलन गणित की वह शाखा है जिसमें मुख्यतः प्रांत में बिंदुओं के परिवर्तन से फलन के मान में होने वाले परिवर्तन का अध्ययन किया जाता है। पहले हम अवकलज का (वास्तविक रूप से परिभाषित किए बिना) सहजानुभूत बोध (Intuitive idea) कराते हैं। तदेपरांत हम सीमा की सहज परिभाषा देंगे और सीमा के बीजगणित का कुछ अध्ययन करेंगे। इसके बाद हम अवकलज की परिभाषा करने के लिए वापस आएँगे और अवकलज के बीजगणित का कुछ अध्ययन करेंगे। हम कुछ विशेष मानक फलनों के अवकलज भी प्राप्त करेंगे।

Sir Issac Newton

(1642-1727 A.D.)


13.2 अवकलजों का सहजानुभूत बोध (Intuitive Idea of Derivatives)

भौतिक  प्रयोगों ने अनुमोदित किया है कि पिंड एक खड़ी/ऊँची चट्टान से गिरकर t सेकंडों में 4.9t2 मीटर दूरी तय करता है अर्थात् पिंड द्वारा मीटर में तय की गई दूरी (s) सेकंडों में मापे गए समय (t) के एक फलन के रूप में s = 4.9t2 से दी गई है।

संलग्न सारणी 13.1 में एक खड़ी/ऊँची चट्टान से गिराए गए एक पिंड के सेकंडों में विभिन्न समय (t) पर मीटर में तय की दूरी (s) दी गई है।

इन आँकड़ों से समय t = 2 सेकंड पर पिंड का वेग ज्ञात करना ही उद्देश्य है। इस समस्या तक पहुँचने के लिए t = 2 सेकंड पर समाप्त होने बाले विविध समयांतरालों पर माध्य वेग ज्ञात करना एक ढंग है और आशा करते हैं कि इससे t = 2 सेकंड पर वेग के बारे में कुछ प्रकाश पड़ेगा।

t = t1 और t = t2 के बीच माध्य वेग t = t1 और t = t2 सेकंडों के बीच तय की गई दूरी को (t2– t1) से भाग देने पर प्राप्त होता है। अतः प्रथम 2 सेकंडों में माध्य वेग


सारणी 13.1

tb1

त्र्

=

इसी प्रकार, t = 1 और t = 2 के बीच माध्य वेग

=

इसी प्रकार विविध के लिए t = t1 और t = 2 के बीच हम माध्य वेग का परिकलन करते हैं। निम्नलिखित सारणी 13.2,
t
= t1 सेकंडों और t = 2 सेकंडों के बीच मीटर प्रति सेकंड में माध्य वेग (v) देती है।

सारणी 13.2

tb2


इस सारणी से हम अवलोकन करते हैं कि माध्य वेग धीरे-धीरे बढ़ रहा है। जैसे-जैसे t = 2 पर समाप्त होने वाले समयांतरालोंको लघुत्तर बनाते जाते हैं हम देखते हैं कि t = 2 पर हम वेग का एक बहुत अच्छा बोध कर पाते हैं। आशा करते हैं कि 1.99 सेकंड और 2 सेकंड के बीच कुछ अप्रत्याशित घटना न घटे तो हम निष्कर्ष निकालते हैं कि t = 2 सेकंड पर माध्य वेग 19.55 मी/से से थोड़ा अधिक है।

इस निष्कर्ष को निम्नलिखित अभिकलनों के समुच्चय से किंचित बल मिलता है। t = 2 सेकंड से प्रारंभ करते हुए विविध समयांतरालों पर माध्य वेग का परिकलन कीजिए। पूर्व की भाँति t = 2 सेकंड और t = t2 सेकंड के बीच माध्य वेग (v)

=

=

=

निम्नलिखित सारणी 13.3, t = 2 सेकंडों और t2 सेकंड के बीच मीटर प्रति सेकंड में माध्य वेग v देती हैः

सारणी 13.3

tb3

यहाँ पुनः हम ध्यान देते हैं कि यदि हम t = 2, से प्रारंभ करते हुए लघुत्तर समयान्तरालों को लेते जाते हैं तो हमें t = 2 पर वेग का अधिक अच्छा बोध होता है।

अभिकलनों के प्रथम समुच्चय में हमने t = 2 पर समाप्त होने वाले बढ़ते समयान्तरालों में माध्य वेग ज्ञात किया है और तब आशा की है कि t = 2 से किंचित पूर्व कुछ अप्रत्याशित घटना न घटे। अभिकलनों के द्वितीय समुच्चय में t = 2 पर अंत होने वाले घटते समयांतरालोें में माध्य वेग ज्ञात किया है और तब आशा की है कि t = 2 के किंचित बाद कुछ अप्रत्याशित घटना न घटे। विशुद्ध रूप से भौतिकीय आधार पर माध्य वेग के ये दोनों अनुक्रम एक समान सीमा पर पहुँचने चाहिए हम निश्चित रूप से निष्कर्ष निकालते हैं कि t = 2 पर पिंड का वेग 19.551 मी/से और 19.649 मी/से के बीच है। तकनीकी रूप से हम कह सकते हैं कि t = 2 पर तात्कालिक वेग 19.551 मी/से. और 19.649 मी/से. के बीच है। जैसा कि भली प्रकार ज्ञात है कि वेग दूरी के परिवर्तन की दर है। अतः हमने जो निष्पादित किया, वह निम्नलिखित है। "विविध क्षण पर दूरी में परिवर्तन की दर का अनुमान लगाया है। हम कहते हैं कि दूरी फलन s = 4.9t2 का t = 2 पर अवकलज 19.551 और 19.649 के बीच में है।"

आकृति 13.1

इस सीमा की प्रक्रिया की एक विकल्प विधि आकृति 13.1 में दर्शाई गई है। यह बीते समय (t) और चट्टान के शिखर से पिंड की दूरी (s) का आलेख है। जैसे-जैसे समयांतरालों के अनुक्रम h1, h2, ..., की सीमा शून्य की ओर अग्रसर होती है वैसे ही माध्य वेगों के अग्रसर होने की वही सीमा होती है जो


के अनुपातों के अनुक्रम की होती है, जहाँ C1B1 = s1s0 वह दूरी है जो पिंड समयांतरालों
h
1 = AC1 में तय करता है, इत्यादि। आकृति 13.1 से यह निष्कर्ष निकलना सुनिश्चित है कि यह बाद की अनुक्रम वक्र के बिंदु A पर स्पर्शरेखा के ढाल की ओर अग्रसर होती है। दूसरे शब्दों में, t = 2 समय पर पिंड का तात्कालिक वेग वक्र s = 4.9t2 के t = 2 पर स्पर्शी के ढाल के समान है।

13.3 सीमाएँ (Limits)

उपर्युक्त विवेचन इस तथ्य की ओर स्पष्टतया निर्दिष्ट करता है कि हमें सीमा की प्रक्रिया और अधिक स्पष्ट रूप से समझने की आवश्यकता है। हम सीमा की संकल्पना से परिचित होने के लिए कुछ दृष्टांतों (illustrations) का अध्ययन करते हैं।

फलन f(x) = x2 पर विचार कीजिए। अवलोकन कीजिए कि जैसे-जैसे x को शून्य के
अधिक निकट मान देते हैं,
f(x) का मान भी 0 की ओर अग्रसर होता जाता है। (देखें आकृति 2.10 अध्याय 2) हम कहते है

(इसे f (x) की सीमा शून्य है, जब x शून्य की ओर अग्रसर होता है, पढ़ा जाता है) f (x) की सीमा, जब x शून्य की ओर अग्रसर होता है, को एेसे समझा जाए जैसे x = 0 पर f (x) का मान होना चाहिए।

व्यापक रूप से जब x a, f (x) l, तब l को फलन f (x) की सीमा कहा जाता है और इसे इस प्रकार लिखा जाता है .

फलन g(x) = |x|, x 0 पर विचार कीजिए। ध्यान दीजिए कि g(0) परिभाषित नहीं है। x के 0 के अत्यधिक निकट मानों के लिए g(x) के मान का परिकलन करने के लिए हम देखते हैं कि g(x) का मान 0 की ओर अग्रसर करता है। इसलिए g(x) = 0. x 0 के लिए y = |x| के आलेख से यह सहजता से स्पष्ट होता है। (देखें आकृति 2.13 अध्याय 2)

निम्नलिखित फलन पर विचार कीजिएः .

x के 2 के अत्यधिक निकट मानों (लेकिन 2 नहीं) के लिए h(x) के मान का परिकलन कीजिए। आप स्वयं को स्वीकार कराइए कि सभी मान 4 के निकट हैं। यहाँ (आकृति 13.2) में दिए फलन
y
= h(x) के आलेख पर विचार करने से इसको किंचित बल मिलता है।

आकृति 13.2

इन सभी दृष्टांतों से एक दिए मान x = a पर फलन के जो मान ग्रहण कर ने चाहिए वे वास्तव में इस पर
आधारित नहीं हैं कि
x कैसे a की ओर अग्रसर होता है। ध्यान दीजिए कि x के संख्या a की ओर अग्रसर होने के लिए या तो बाईं ओर या दाईं ओर है, अर्थात् x के निकट सभी मान या तो a से कम हो सकते हैं या a से अधिक हो सकते हैं। इससे स्वाभाविक रूप से दो सीमाएँ - बाएँ पक्ष की सीमा और दाएँ पक्ष की सीमा प्रेरित होती है। फलन f के दाएँ पक्ष की सीमा f(x) का वह मान है जो f(x) के मान से आदेशित होता है जब x, a के दाईं ओर अग्रसर होता है। इसी प्रकार बाएँ पक्ष की सीमा। इसके दृष्टांत के लिए, फलन पर विचार कीजिए

आकृति 13.3

आकृति 13.3 में इस फलन का आलेख दर्शाया गया है यह स्पष्ट है कि 0 पर f का मान x 0 के लिए f (x) के मान से पर निर्भर करता है जो कि 1 के समान है अर्थात् शून्य पर f (x) के बाएँ पक्ष की सीमा है। इसी प्रकार 0 पर f का मान x > 0 के लिए f (x) के मान पर निर्भर करता है, 2 है अर्थात् 0 के दाएँ पक्ष की सीमा है। इस स्थिति में बाएँ और दाएँ पक्ष की सीमाएँ भिन्न-भिन्न हैं और अतः हम कह सकते हैं कि जब x शून्य की ओर अग्रसर होता है तब f (x) की सीमा अस्तित्वहीन है। (भले ही फलन 0 पर परिभाषित है।)


सारांश

हम कहते हैं कि f(x), x = a पर f (x) का अपेक्षित (expected) मान हैं, जिसने x के बाईं अोर निकट मानों के लिए f (x) को मान दिए हैं। इस मान को a पर f (x) की बाएँ पक्ष की सीमा कहते हैं।

हम कहते हैं कि, x = a पर f (x) का अपेक्षित मान है जिसमें x के a के दाईं ओर के निकट मानों के लिए f(x) के मान दिए हैं। इस मान को a पर f (x) की दाएँ पक्ष की सीमा कहते हैं।

यदि दाएँ और बाएँ पक्ष की सीमाएँ संपाती हों तो हम इस उभयनिष्ठ मान को x = a पर f(x) की सीमा कहते हैं और इसे f(x) से निरूपित करते हैं।

यदि दाएँ और बाएँ पक्ष की सीमाएँ संपाती नहीं हों तो यह कहा जाता है कि x = a पर f(x) की सीमा अस्तित्वहीन है।

दृष्टांत 1 (Illustration 1) फलन f(x) = x + 10 पर विचार कीजिए। हम x = 5 पर फलन की सीमा ज्ञात करना चाहेंगे। आइए, हम 5 के अत्यंत निकट x के मानों के लिए f के मान का परिकलन करें। 5 के अत्यंत निकट बाईं ओर कुछ बिंदु 4.9, 4.95, 4.994, 4.995... इत्यादि हैं। इन बिंदुओं पर f(x) के मान नीचे सारणीबद्ध हैं। इसी प्रकार, 5 के अत्यंत निकट और दाईं ओर वास्तविक संख्याएँ 5.001, 5.01, 5.1 भी हैं। इन बिंदुओं पर भी फलन के मान सारणी 13.4 में दिए हैं।


सारणी 13.4

tb4

सारणी 13.4 से हम निगमित करते हैं कि f(x) का मान 14.995 से बड़ा और 15.001 से छोटा है, यह कल्पना करते हुए कि x = 4.995 और 5.001 के बीच कुछ अप्रत्याशित घटना घटित न हो। यह कल्पना करना तर्कसंगत है कि 5 के बाईं ओर की संख्याओं के लिए x = 5 पर f (x) का मान 15 है अर्थात्

इसी प्रकार, जब x, 5 के दाईं ओर अग्रसर होता है, f का मान 15 होना चाहिए अर्थात्

अतः यह संभाव्य है कि f के बाएँ पक्ष की सीमा और दाएँ पक्ष की सीमा, दोनों 15 के बराबर हैं। इस प्रकार

सीमा 15 के बराबर होने के बारे में यह निष्कर्ष फलन के आलेख जो आकृति 2.9(ii) अध्याय 2 में दिया है, को देखकर किंचित बल देता है। इस आकृति में हम ध्यान देते हैं कि जैसे-जैसे x, 5 के या तो दाईं ओर या बाईं ओर अग्रसर हो, फलन f (x) = x + 10 का आलेख बिंदु (5, 15) की ओर अग्रसर होता जाता हैं। हम देखते हैं कि x = 5 पर भी फलन का मान 15 के बराबर
होता है।

दृष्टांत 2 फलन f(x) = x3 पर विचार कीजिए। आइए हम x = 1 पर इस फलन की सीमा ज्ञात करने का प्रयास करें। पूर्ववर्ती स्थिति की तरह बढ़ते हुए हम x के 1 के निकट मानों के लिए f(x) के मानों को सारणीबद्ध करते हैं। इसे सारणी 13.5 में दिया गया हैः

सारणी 13.5

tb5

इस सारणी से हम निगमन करते हैं कि x = 1 पर f का मान 0.997002999 से अधिक और 1.003003001 से कम है, यह कल्पना करते हुए कि x = 0.999 और 1.001. के बीच कुछ अप्रत्याशित घटना घटित न हो। यह मानना तर्कसंगत है कि x = 1 का मान 1 के बाईं ओर की संख्याओं पर निर्भर करता है अथ्ााρत्

eq1

इसी प्रकार, जब x, 1 के दाईं ओर अग्रसर होता है, तो f का मान 1 होना चाहिए अर्थात्

.

अतः, यह संभाव्य है कि बाएँ पक्ष की सीमा और दाएँ पक्ष की सीमा दोनों 1 के बराबर हों। इस प्रकार

.

सीमा 1 के बराबर होने का यह निष्कर्ष फलन के आलेख जो आकृति 2.11, अध्याय 2 में दिया है, को देखकर किंचित बल देता है। इस आकृति में हम ध्यान देते हैं कि जैसे-जैसे x, 1 के या तो दाईं ओर या बाईं ओर अग्रसर हो, फलन f(x) = x3 का आलेख बिंदु (1, 1) की ओर अग्रसर होता जाता है।

हम पुनः अवलोकन करते हैं कि x = 1 पर फलन का मान भी 1 के बराबर है।

दृष्टांत 3 फलन f(x) = 3x पर विचार कीजिए। आइए, x = 2 पर इस फलन की सीमा ज्ञात करने का प्रयास करें। निम्नलिखित सारणी 13.6 स्वतः स्पष्ट करती है।

सारणी 13.6

tb6


पूर्ववत हम अवलोकन करते हैं कि x या तो बाएँ या दाएँ 2 की ओर अग्रसर होता है, f(x) का मान 6 की ओर अग्रसर होता हुआ प्रतीत होता है। हम इसे, इस प्रकार अभिलेखित कर सकते
हैं कि

आकृति 13.4 में प्रदर्शित इसका आलेख इस तथ्य को बल देता है।

यहाँ पुनः हम ध्यान देते हैं कि x = 2 पर फलन का मान x = 2 पर सीमा के संपाती है।

आकृति 13.4

दृष्टांत 4 अचर फलन f(x) = 3 पर विचार कीजिए। आइए हम x = 2 पर इसकी सीमा ज्ञात करने का प्रयास करें। यह फलन अचर फलन होने के कारण सर्वत्र एक ही मान (इस स्थिति में 3) प्राप्त करता है अर्थात् 2 के अत्यंत निकट बिंदुओं के लिए इसका मान 3 है। अतः

f(x) = 3 का आलेख हर हालत में (0, 3) से जाने वाली x-अक्ष के समांतर रेखा है और आकृति 2.9, अध्याय 2 में दर्शाया गया है। इससे यह भी स्पष्ट है कि अभीष्ट सीमा 3 है तथ्यतः यह सरलता से अवलोकित होता है कि किसी वास्तविक संख्या a के लिए

दृष्टांत 5 फलन f(x) = x2 + x पर विचार कीजिए। हम ज्ञात करना चाहते हैं। हम
x =
1 के निकट f(x) के मान सारणी 13.7 में सारणीबद्ध करते हैंः

सारणी 13.7

tb7


इससे यह तर्कसंगत निगमित होता है कि

.

आकृεत 13.5 में दर्शाए f(x) = x2 + x के आलेख से यह स्पष्ट है कि जैसे-जैसे x, 1 की ओर अग्रसर होता है, आलेख (1, 2) की ओर अग्रसर होता जाता है।

आकृति 13.5

अतः हम पुनः प्रेक्षण करते हैं कि

f (x) = f (1)

अब, निम्नलिखित तीन तथ्यों को आप स्वयं को स्वीकार कराएँ

तब .

तथा .

दृष्टांत 6 फलन f(x) = sin x पर विचार कीजिए। हमारी में रुचि है जहाँ कोण रेडियन में मापा गया है। यहाँ, हमने के निकट f(x) के मानों (निकटतम) को सारणीबद्ध किया है।

सारणी 13.8

tb8

इससे हम निगमन कर सकते हैं कि

इसके अतिरिक्त, यह f(x) = sin x के आलेख से पुष्ट होता है जो आकृति 3.8 अध्याय 3 में दिया है। इस स्थिति में भी हम देखते हैं कि sin x = 1.


दृष्टांत 7 फलन f(x) = x + cos x पर विचार कीजिए। हम f (x) ज्ञात करना चाहते हैं।

यहाँ हमने 0 के निकट f(x) के मान (निकटतम) सारणीबद्ध किए हैंः (सारणी 13.9).

सारणी 13.9

tb9


सारणी 13.9, से हम निगमन कर सकते हैं कि

इस स्थिति में भी हम प्रेक्षण करते हैं कि f (x) = f (0) = 1.

अब, क्या आप स्वयं को स्वीकार करा सकते हैं कि

वास्तव में सत्य है?


दृष्टांत 8 के लिए, फलन पर विचार कीजिए। हम f (x) ज्ञात करना चाहते हैं।

यहाँ, हम अवलोकन करते हैं कि फलन का प्रांत सभी धनात्मक वास्तविक संख्याएँ हैं। अतः जब हम f(x) के मान सारणीबद्ध करते हैं, x शून्य के बाईं ओर अग्रसर होता है, का कोई अर्थ नहीं है। नीचे हम 0 के निकट x के धनात्मक मानों के लिए फलन के मानों को सारणीबद्ध करते हैं (इस सारणी में n किसी धन पूर्णांक को निरूपित करता है।

नीचे दी गई सारणी 13.10 से, हम देखते हैं कि जब x, 0 की ओर अग्रसर होता है, f(x) बड़ा और बड़ा होता जाता है। यहाँ इसका अर्थ है कि, f(x) का मान किसी दी संख्या से भी बड़ा किया जा सकता है।

सारणी 13.10

tb10

गणितीय रूप से, हम कह सकते हैं

हम टिप्पणी भी करते हैं कि इस पाठ्यक्रम में हम इस प्रकार की सीमाओं की चर्चा नहीं करेंगे।

दृष्टांत 9 हम , ज्ञात करना चाहते हैं, जहाँ

पहले की तरह हम 0 के निकट x के लिए f(x) की सारणी बनाते हैं। प्रेक्षण करते हैं कि x के ऋणात्मक मानों के लिए हमें x – 2 का मान निकालने की आवश्यकता है और x के धनात्मक मानों के लिए x + 2 का मान निकालने की आवश्यकता होती है।

सारणी 13.11

tb11


सारणी 13.11 की प्रथम तीन प्रविष्टियों से, हम निगमन करते हैं कि फलन का मान –2 तक घट रहा है और

सारणी की अंतिम तीन प्रविष्टियों से, हम निगमन करते हैं कि फलन का मान 2 तक बढ़ रहा है और अतः

क्योंε 0 पर बाएँ और दाएँ पक्षों की सीमाएँ संपाती नहीं हैं, हम कहते हैं कि 0 पर फलन की सीमा अस्तित्वहीन है।

इस फलन का आलेख आकृति 13.6 में दिया है यहाँ, हम टिप्पणी करते हैं कि x = 0 पर फलन का मान पूर्णतः परिभाषित है और, वास्तव में, 0 के बराबर है, परंतु x = 0 पर फलन की सीमा परिभाषित भी नहीं है।

आकृति 13.6

दृष्टांत 10 एक अंतिम दृष्टांत के रूप में, हम , ज्ञात करते हैं जबकि

सारणी 13.12

tb12

पहले की तरह, 1 के निकट x के लिए हम f(x) के मानों को सारणीबद्ध करते हैं। 1 से कम x के लिए f(x) में मानों से, यह प्रतीत होता है कि x = 1 पर फलन का मान 3 होना चाहिए अर्थात्

इसी प्रकार, 1 से बड़े x के लिए f(x) के मानों से आदेशित f(x) का मान 3 होना चाहिए, अर्थात्

.

परंतु तब बाएँ और दाएँ पक्षों की सीमाएँ संपाती हैं और अतः .

आकृति 13.7

आकृति 13.7 में फलन का आलेख सीमा के बारे में हमारे निगमन को बल देता है। यहाँ, हम ध्यान देते हैं कि व्यापक रूप से, एक दिए बिंदु पर फलन का मान और इसकी सीमा भिन्न-भिन्न हो सकते हैं (भले ही दोनों परिभाषित हों।)

13.3.1 सीमाओं का बीजगणित (Algebra of limits)

उपर्युक्त दृष्टांतों से, हम अवलोकन कर चुके हैं कि सीमा प्रक्रिया योग, व्यवकलन, गुणा और भाग का पालन करती है जब तक कि
विचाराधीन फलन और सीमाएँ सुपरिभाषित हैं। यह संयोग नहीं है। वास्तव में, हम इनको बिना उपपत्ति के प्रमेय के रूप में अौपचारिक रूप देते हैं।

प्रमेय 1 मान लीजिए कि f और g दो फलन एेसे हैं कि f (x) और g(x) दोनों का अस्तित्व है। तब

(i) दो फलनों के योग की सीमा फलनों की सीमाओं का योग होता है, अर्थात्

[f(x) + g (x)] = f(x) + g(x).

(ii) दो फलनों के अंतर की सीमा फलनों की सीमाओं का अंतर होता है, अर्थात्

[f(x) g(x)] = f(x) g(x).

(iii) दो फलनों के गुणन की सीमा फलनों की सीमाओं का गुणन होता है, अर्थात्

[f(x) . g(x)] = f(x). g(x).

(iv) दो फलनों के भागफल की सीमा फलनों की सीमाओं का भागफल होता है, (जबकि हर शून्येतर होता है), अर्थात्

टिप्पणी विशेष रूप से स्थिति (iii) की एक विशिष्ट स्थिति में जब g(x) एक एेसा अचर फलन है कि किसी वास्तविक संख्या के लिए g(x) = हम पाते हैं

.

अगले दो अनुच्छेदों में, हम दृष्टांत देंगे कि इस प्रमेय को विशिष्ट प्रकार के फलनों की सीमाओं के मान प्राप्त करने में कैसे प्रयोग किया जाता है।

13.3.2 बहुपदों और परिमेय फलनों की सीमाएँ (Limits of polynomials and rational functions) 

n घात का एक फलन f(x) बहुपदीय फलन कहलाता है, यदि f(x) = a0 + a1x + a2x2 +. . . + anxn, जहाँ ais एेसी वास्तविक संख्याएँ हैं कि किसी प्राकृत संख्या n के लिए an 0

हम जानते हैं कि x = a. अतः

n पर आगमन का सरल अभ्यास हमको बताता है कि

अब, मान लीजिए एक बहुपदीय फलन है। प्रत्येक को एक फलन जैसा विचारते हुए, हम पाते हैं कि

=

=

=

=

=

(सुनिश्चित करें कि आपने उपर्युक्त में प्रत्येक चरण का औचित्य समझ लिया है।)

एक फलन f एक परिमेय फलन कहलाता है यदि f(x) = , जहाँ g(x) और h(x) एेसे बहुपद हैं कि h(x) 0. तो

यद्यपि, यदि h(a) = 0, दो स्थितियाँ हैं – (i) जब g(a) 0 और (ii) जब g(a) = 0. पूर्व की स्थिति में हम कहते हैं कि सीमा का अस्तित्व नहीं है। बाद की स्थिति में हम

g(x) = (xa)k g1 (x), जहाँ k, g(x) में (xa) की महत्तम घात है। इसी प्रकार

h(x) = (xa) lh1 (x) क्योंकि h (a) = 0. अब, यदि k > l, हम पाते हैं

=

=

यदि k < l, तो सीमा परिभाषित नहीं है।

उदाहरण 1 सीमाएँ ज्ञात कीजिएः

(i) (ii)

(iii) .

हल अभीष्ट सभी सीमाएँ कुछ बहुपदीय फलनों की सीमाएँ हैं। अतः सीमाएँ प्रदत्त बिंदुओं पर फलनों के मान हैं। हम पाते हैं

(i) [x3 x2 + 1] = 13 – 12 + 1 = 1

(ii)

(iii) = 1 + (–1) + (–1)2 + ... + (–1)10

= 1 – 1 + 1 + ... + 1 = 1.

उदाहरण 2 सीमाएँ ज्ञात कीजिएः

(i) (ii)

(iii) (iv)

(v) .

हल सभी विचाराधीन फलन परिमेय फलन हैं। अतः, हम पहले प्रदत्त बिंदुओं पर इन फलनों के मान प्राप्त करते हैं। यदि यह , के रूप का है, हम गुणनखंडों, जो सीमा के का रूप होने का कारण है, को निरस्त करते हुए फलनों को पुनः लिखते हैं।

(i) हम पाते हैं

(ii) 2 पर फलन का मान प्राप्त करने पर हम इसे का रूप में पाते हैं। अतः

= = क्योंकि x 2

= .

(iii) 2 पर फलन का मान प्राप्त करने पर, हम इसे के रूप में पाते हैं, अतः

=

=

जोकि परिभाषित नहीं है।

(iv) 2 पर फलन का मान प्राप्त करने पर, हम इसे के रूप में पाते है। अतः

=

= .

(v) पहले हम फलन को परिमेय फलन जैसा पुनः लिखते हैं।

=

=

=

=

1 पर फलन का मान प्राप्त करने पर हम का रूप पाते हैं। अतः

=

=

= = = 2.

हम टिप्पणी करते हैं कि उपर्युक्त मान प्राप्त करने में हमने पद (x – 1) को निरस्त किया क्योंकि .

एक महत्वपूर्ण सीमा का मान प्राप्त करना, जो कि आगे परिणामों में प्रयुक्त होगी, नीचे एक प्रमेय के रूप में प्रस्तुत है।

प्रमेय 2 किसी धन पूर्णांक n के लिए,

.

टिप्पणी उपर्युक्त प्रमेय में सीमा हेतु व्यंजक सत्य है जबकि n कोई परिमेय संख्या है और
a
धनात्मक है।

उपपत्ति (xnan) को (xa), से भाग देने पर, हम देखते हैं कि

xn an = (xa) (xn–1 + xn–2 a + xn–3 a2 + ... + x an–2 + an–1)

इस प्रकार (xn–1 + xn–2 a + xn–3 a2 + ... + x an–2 + an–1)

= an – l + a an–2 +. . . + an–2 (a) +an–l

= an–1 + an – 1 +...+an–1 + an–1 (n पद)

=

उदाहरण 3 मान ज्ञात कीजिए

(i) (ii)

हल (i) हमारे पास है

=

=

= 15 (1)14 ÷ 10(1)9 (उपर्युक्त प्रमेय से)

= 15 ÷ 10

(ii) y = 1 + x, जिससे जैसे तब

=

=

= (उपर्युक्त टिप्पणी से) =


13.4. त्रिकोणमितीय फलनों की सीमाएँ (Limits of Trigonometric Functions)

व्यापक रूप से, फलनों के बारे में निम्नलिखित तथ्य (प्रमेयों के रूप में कहे गए) कुछ त्रिकोणमितीय फलनों की सीमाओं का परिकलन करने में सुलभ हो जाते हैं।

प्रमेय 3 मान लीजिए समान प्रांत वाले दो वास्तविक मानीय फलन f और एेसे हैं कि परिभाषा के प्रांत में सभी x के लिए f (x) g( x) किसी a के लिए यदि f(x) और g(x) दोनों का अस्तित्व है तो f(x) g(x) इसे आकृति 13.8 में चित्र से स्पष्ट किया गया है।

आकृति 13.8

प्रमेय 4 सैंडविच प्रमेय (Sandwich Theorem) मान लीजिए f, g और h वास्तविक मानीय फलन एेसे हैं कि परिभाषा के सर्वनिष्ठ प्रांतों के सभी x के लिए f (x) g( x) h(x). किसी वास्तविक संख्या a के लिए यदि f(x) = l
=
h(x), तो g(x) = l. इसे
आकृति
13.9 में चित्र से स्पष्ट किया गया है।

त्रिकोणमितीय फलनों से संबंधित निम्नलिखित महत्वपूर्ण असमिका की एक सुंदर ज्यामितीय उपपत्ति नीचे प्रस्तुत हैः

eq2

आकृति 13.9

उपपत्ति हम जानते हैं कि sin (– x) = – sin x और cos( – x) = cos x. अतः eq5 के लिए असमिका को सिद्ध करने के लिए यह पर्याप्त है।

आकृति 13.10

आकृति 13.10, में एेसे इकाई वृत्त का केंद्र O है। कोण AOC, x रेडियन का है और eq5 । रेखाखंड BA और CD, OA के लंबवत हैं। इसके अतिरिक्त AC को मिलाया गया है। तब OAC का क्षेत्रफल < वृत्तखंड क्षेत्रफल < OAB का क्षेत्रफल

अर्थात् eq3.

अर्थात् CD < x . OA < AB. OCD में

sin x = (चूँकि OC = OA) और अतः CD = OA sin x. इसके अतिरिक्त

tan x =और अतः AB = OA tan x. इस प्रकार

OA sin x < OA x < OA. tan x.

क्योंकि लंबाई OA धनात्मक है, हम पाते हैं

sin x < x < tan x.

क्योंकि 0 < x <eq4, sin x धनात्मक है और इस प्रकार sin x, से सभी को भाग देने पर, हम पाते हैं

1<­ सभी का व्युत्क्रम करने पर, हम पाते हैं

उपपत्ति पूर्ण हुई।

प्रमेय 5 निम्नलिखित दो महत्वपूर्ण सीमाएँ हैंः

(i) (ii)

उपपत्ति (i) (*) में असमिका (Inequality) के अनुसार फलन , फलन cos x और अचर फलन जिसका मान 1 हो जाता है, के बीच में स्थित है।

इसके अतिरिक्त क्योंकि cos x = 1, हम देखते हैं कि प्रमेय के (i) की उपपत्ति सैंडविच प्रमेय से पूर्ण है।

(ii) को सिद्ध करने के लिए, हम त्रिकोणमिति सर्वसमिका 1 – cos x = 2 sin2का प्रयोग करते हैं, तब =

=

अवलोकन कीजिए कि हमने अस्पष्ट रूप से इस तथ्य का प्रयोग किया है कि , के तुल्य है। इसको y = रखकर प्रमाणित किया जा सकता है।

उदाहरण 4 मान ज्ञात कीजिएः (i) (ii)

हल (i) =

=

=

= 2.1.1 = 2 (जब x 0, 4x 0 तथा 2x 0)

हमारे पास है (ii) = = = 1.1 = 1

एक सामान्य नियम, जिसको सीमाओं का मान निकालते समय ध्यान में रखने की आवश्यकता है, निम्नलिखित हैः

माना कि सीमा का अस्तित्व है और हम इसका मान ज्ञात करना चाहते हैं। पहले हf (a) और g(a) के मानों को जाँचें। यदि दोनों शून्य हैं, तो हम देखते हैं कि यदि हम उस गुणनखंड को प्राप्त कर सकते हैं जो पद समाप्त होने का कारण है, अर्थात् देखें यदि हम
f
(x) = f1 (x) f2(x) लिख सकें जिससे f1 (a) = 0 और f2 (a) 0 । इसी प्रकार g(x) = g1 (x) g2(x),लिखते हैं जहाँ g1(a) = 0 और g2(a) 0. f(x) और g(x) में से उभयनिष्ठ गुणनखंड (यदि संभव है) तो निरस्त कर देते हैं और

, जहाँ q(x) 0 लिखते हैं ,


तब


प्रश्नावली 13.1

प्रश्न 1 से 22 तक निम्नलिखित सीमाओं के मान प्राप्त कीजिएः

1. 2. 3.

4. 5. 6.

7. 8. 9.

10. 11.

12. 13. 14.

15. 16. 17.

18. 19.

20. ,

21. 22.

23. और , ज्ञात कीजिए, जहाँ

24. , ज्ञात कीजिए, जहाँ

25. , का मान प्राप्त कीजिए, जहाँ

26. , ज्ञात कीजिए, जहाँ

27. , ज्ञात कीजिए, जहाँ

28. मान लीजिए

और यदि f (x) = f (1) तो a और b के संभव मान क्या हैं?

29. मान लीजि a1, a2, . . ., an अचर वास्तविक संख्याएँ र एक ηलन से परिभाषित है। f (x) क्या है?

किसी a a1, a2, ..., an, के लिए f (x) का परिकलन कीजिए।

30. यदि .

तो a के किन मानों के लिए f (x) का अस्तित्व है?

31. यदि फलन f(x), , को संतुष्ट करता है, तो का मान प्राप्त कीजिए।

32. किन पूर्णांकों m और n के लिए और दोनों का अस्तित्व है, यदि


13.5 अवकलज (Derivatives)

हम अनुच्छेद 13.2, में देख चुके हैं कि विविध समयांतरालों पर पिंड की स्थिति को जानकर उस दर को ज्ञात करना संभव है जिससे पिंड की स्थिति परिवर्तित हो रही है। समय के विविध क्षणों पर एक निश्चित प्राचल (parameter) का जानना और उस दर को ज्ञात करने का प्रयास करना जिससे इसमें परिवर्तन हो रहा है, अत्यंत व्यापक रुचि का विषय है। वास्तविक जीवन की अनेक स्थितियाँ होती हैं जिनमें एेसी प्रक्रिया कार्यान्वित करने की आवश्यकता होती है। उदाहरणतः एक टंकी के रख-रखाव करने वाले व्यक्ति के लिए समय के अनेक क्षणों पर पानी की गहराई जानकर यह जानना आवश्यक होता है कि टंकी कब छलकने लगेगी, विविध समयों पर राकेट की ऊँचाई जानकर राकेट वैज्ञानिकों को उस यथार्थ वेग के परिकलन की आवश्यकता होती है जिससे उपग्रह का राकेट से प्रक्षेपण आवश्यक हो। वित्तीय संस्थानों को किसी विशेष स्टाक के वर्तमान मूल्य जानकर इसके मूल्यों में परिवर्तन की भविष्यवाणी करनी आवश्यक होती है। इनमें और एेसी अनेक अन्य स्थितियों में यह जानना अभीष्ट होता है कि एक प्राचल में दूसरे किसी प्राचल के सापेक्ष परिवर्तन किस प्रकार होता है? परिभाषा के प्रांत के प्रदत्त बिंदु पर फलन का अवकलज इस विषय का मुख्य उद्देश्य है।

परिभाषा 1 मान लीजिए f एक वास्तविक मानीय फलन है और इसकी परिभाषा के प्रांत में एक बिंदु a है। a पर f का अवकलज

से परिभाषित है बशर्ते कि इस सीमा का अस्तित्व हो। a पर f(x) का अवकलज f’ (a) से निरूपित होता है।

अवलोकन कीजिए कि f (a), a पर x के सापेक्ष परिवर्तन का परिमाण बताता है।

उदाहरण 5 x = 2 पर फलन f(x) = 3x का अवकलज ज्ञात कीजिए।

हल हम पाते हैं = =

= .

अतः x = 2 पर फलन 3x का अवकलज 3 है।

उदाहरण 6 x = –1 पर फलन f(x) = 2x2 + 3x – 5 का अवकलज ज्ञात कीजिए। यह भी सिद्ध कीजिए कि f (0) + 3f ( –1) = 0.

हल हम पहले x = 0 और x = –1 पर f(x) का अवकलज ज्ञात करते हैं। हम पाते हैं कि

=

=

=

और =

=

=

स्पष्टतः

टिप्पणी इस स्थिति में ध्यान दीजिए कि एक बिंदु पर अवकलज का मान प्राप्त करने में सीमा ज्ञात करने के विविध नियमों का प्रभावकारी प्रयोग सम्मिलित है। निम्नलिखित इसको स्पष्ट करता हैः

उदाहरण 7 x = 0 पर sin x का अवकलज ज्ञात कीजिए।

हल मान लीजिए f(x) = sin x. तब

f(0) = = =

उदाहरण 8 x = 0 और x = 3 पर फलन f(x) = 3 का अवकलज ज्ञात कीजिए।

हल क्योंकि अवकलज फलन में परिवर्तन को मापता है, सहजरूप से यह स्पष्ट है कि अचर फलन का प्रत्येक बिंदु पर अवकलन शून्य होना चाहिए। इसे, वास्तव में, निम्नलिखित परिकलन से बल मिलता है।

= .

इसी प्रकार = .

अब हम एक बिंदु पर फलन के अवकलज की ज्यामितीय व्याख्या प्रस्तुत करते हैं।

आकृति 13.11

मान लीजिए y = f(x) एक फलन है और मान लीजिए इस फलन के आलेख पर P = (a, f(a)) और
Q = (
a + h, f(a + h) दो परस्पर निकट बिंदु हैं। आकृति 13.11 अब स्वयं व्याख्यात्मक है। हम जानते हैं कि

त्रिभुज PQR, से यह स्पष्ट है कि वह अनुपात जिसकी सीमा हम ले रहे हैं, यथार्थता से
tan (QPR) के बराबर है जो कि जीवा PQ का ढाल है। सीमा लेने की प्रक्रिया में, जब h, 0 की ओर अग्रसर होता है, बिंदु Q, P ी ओर अग्रसर होता है और हम पाते हैं अर्थात्

यह इस तथ्य के तुल्य है कि जीवा PQ, वक्र y = f(x) के बिंदु P पर स्पर्शी की ओर अग्रसर होती है। अतःeq6

एक दिए फलन f के लिए हम प्रत्येक बिंदु पर अवकलज ज्ञात कर सकते हैं। यदि प्रत्येक बिंदु पर अवकलज का अस्तित्व है तो यह एक नये फलन को परिभाषित करता है जिसे फलन f का अवकलज कहा जाता है औपचारिक रूप से हम एक फलन के अवकलज को निम्नलिखित प्रकार परिभाषित करते हैं।

परिभाषा 2 मान लीजिए कि f एक वास्तविक मानीय फलन है, तो

से परिभाषित फलन, जहाँ कहीं सीमा का अस्तित्व है, को x पर f का अवकलज परिभाषित किया जाता है और f(x) से निरूपित किया जाता है। अवकलज की इस परिभाषा को अवकलज का प्रथम सिद्धांत भी कहा जाता है।

इस प्रकार f (x) =

स्पष्टतः f (x) की परिभाषा का प्रांत वही है जहाँ कहीं उपर्युक्त सीमा का अस्तित्व है। एक फलन के अवकलज के विभिन्न संकेतन हैं। कभी-कभी f(x) को से निरूपित किया जाता है यदि y = f(x), तो यह से निरूपित किया जाता है। इसे y या f(x) के सापेक्ष अवकलज के रूप में उल्लेखित किया जाता है इसे D (f (x) ) से भी निरूपित किया जाता है।

इसके अतिरिक्त x = a पर f के अवकलज को या से भी निरूपित किया जाता है।

उदाहरण 9 f(x) = 10 x का अवकलज ज्ञात कीजिए।

हल हम पाते हैं f (x) = =

= =

उदाहरण 10 f(x) = x2 का अवकलज ज्ञात कीजिए।

हल हम पाते हैं f(x) =

= =

उदाहाण 11 एक अचर वास्तविक संख्या a के लिए, अचर फलन f(x) = a का अवकलज ज्ञात कीजिए।

हल हम पाते हैं f(x) =

= क्योंकि

उदाहरण 12 f(x) = का अवकलज ज्ञात कीजिए।

हल हम पाते हैं f(x) =

=

=

= = =


13.5.1 फलनों के अवकलज का बीजगणित (Algebra of derivative of functions) 

क्योंकि अवकलज की यथार्थ परिभाषा में सीमा निश्चय ही सीधे रूप में सम्मिलित है, हम अवकलज के नियमों के निकटता से सीमा के नियमों के अनुगमन की आशा करते हैं। हम इनको निम्नलिखित प्रमेयों में पाते हैंः

प्रमेय 5 मान लीजिए f और g दो एेसे फलन हैं कि उनके उभयनिष्ठ प्रांत में उनके अवकलन परिभाεत हैं, तब

(i) दो फलनों के योग का अवकलज उन फलनों के अवकलजों का योग है।

(ii) दो फलनों के अंतर का अवकलज उन फलनों के अवकलजों का अंतर है।

(iii) दो फलनों के गुणन का अवकलज निम्नलिखित गुणन नियम (product rule) से दिया गया हैः

(iv) दो फलनों के भागफल का अवकलज निम्नलिखित भागफल नियम (quotient rule) से दिया गया है (जहाँ कहीं हर शून्येतर है)

इनकी उपपत्ति सीमाओं की तुल्य रूप प्रमेयों से आवश्यकीय रूप से अनुसरण करती हैं। हम इन्हें यहाँ सिद्ध नहीं करेंगे। सीमाओं की स्थिति की तरह यह प्रमेय बतलाता है कि विशेष प्रकार के फलनों के अवकलज कैसे परिकलित किए जाते हैं। प्रमेय के अंतिम दो कथनों को निम्नलिखित ढंग से पुनः कहा जा सकता है जिससे उनके पुनर्स्मरण करने में आसानी से सहायता मिलती है।

मान लीजिए और = g (x) तब

=

यह फलनों के गुणन के अवकलन के लिए Leibnitz नियम या गुणन नियम उल्लेखित होता है। इसी प्रकार, भागफल नियम है

=

अब, आइए हम कुछ मानक फलनों के अवकलनों को लें। यह देखना सरल है कि फलन
f(x) = x का अवकलज अचर फलन 1 है। यह है क्योंकि

f(x) = =

=

हम इसका और उपर्युक्त प्रमेय का प्रयोग f(x) = 10x = x + x + ... + x (10 पद)

(उपर्युक्त प्रमेय के (i) से) के अवकलज के परिकलन में करते हैं

= (10 पद)

= (10 पद)

= (10 पद) = 10.

हम ध्यान देते हैं कि इस सीमा का मान गुणन सूत्र के प्रयोग से भी प्राप्त किया जा सकता है। हम लिखते हैं, f(x) = 10x = uv, जहाँ u लिखते हैं जहाँ u प्रत्येक जगह मान 10 लेकर अचर फलन है और v(x) = x. यहाँ हम जानते हैं कि u का अवकलज 0 के बराबर है साथ ही v(x) = x का अवकलज 1 के बराबर है। इस प्रकार गुणन नियम से, हम पाते हैं

=

इसी आधार पर f(x) = x2 के अवकलज का मान प्राप्त किया जा सकता है। हम पाते हैं
f
(x) = x2 = x .x और अतः

=

=

अधिक व्यापक रूप से हम निम्नलिखित प्रमेय पाते हैंः

प्रमेय 6 किसी धन पूर्णांक n के लिए f(x) = xn का अवकलज nxn – 1 है।

उपपत्ति अवकलज फलन की परिभाषा से, हम पाते हैं

=.

द्विपद प्रमेय कहता है कि (x + h)n = और

(x + h)n xn = h(nxn – 1 +... + hn – 1) इस प्रकार

= =

= , =

विकल्पतः हम इसको n पर आगमन और गुणन सूत्र से भी निम्न प्रकार सिद्ध कर सकते हैंः n = 1 के लिए यह सत्य है जैसा कि पहले दिखाया जा चुका है

=

= (गुणन सूत्र से)

= (आगमन परिकल्पना से)

=

टिप्पणी उपर्युक्त प्रमेय x,की सभी घातों के लिए सत्य है अर्थात् n कोई भी वास्तविक संख्या हो सकती है। (लेकिन हम इसको यहाँ सिद्ध नहीं करेंगे)

13.5.2 बहुपदों और त्रिकोणमितीय फलनों के अवकलज (Derivative of polynomials and trigonometric functions) 

हम निम्नलिखित प्रमेय से प्रारंभ करेंगे जो हमको बहुपदीय फलनों के अवकलज बतलाती है।

प्रमेय 7 मान लीजिए eq7 एक बहुपदीय फलन है जहाँ ais सभी वास्तविक संख्याएँ हैं और an 0 तब अवकलज फलन इस प्रकार दिया जाता हैः

इस प्रमेय की उपपत्ति प्रमेय 5 और प्रमेय 6 के भाग (i) को मात्र साथ रखने से प्राप्त की जा सकती है।

उदाहरण 13 6x100x55 + x के अवकलज का परिकलन कीजिए।

हल उपर्युक्त प्रमेय का सीधा अनुप्रयोग बतलाता है कि उपर्युक्त फलन का अवकलज है।

उदाहरण 14 x = 1 पर f(x) = 1 + x + x2 + x3 +... + x50 का अवकलज ज्ञात कीजिए। .

हल उपर्युक्त प्रमेय 6 का सीधा अनुप्रयोग बतलाता है कि उपर्युक्त फलन का अवकलज
1 + 2
x + 3x2 + . . . + 50x49 है। x = 1 पर इस फलन का मान 1 + 2(1) + 3(1)2 + .. . + 50(1)49 = ­1 + 2 + 3 + . . . + 50 = = 1275 है।

उदाहरण 15 f(x) = का अवकलज ज्ञात कीजिए।

हल यह पηलन x = 0 के अतिरिक्त प्रत्येक के लिए परिभाषित है। हम यहाँ u = x + 1 और v = x लेकर भागफल नियम का प्रयोग करते हैं। अतः u´ = 1 और v´ = 1 इसलिए

उदाहरण 16 sin x के अवकलज का परिकलन कीजिए।

हल मान लीजिए f(x) = sin x, तब

=

= ( sin A – sin B के सूत्र का प्रयोग करके)

= .

उदाहरण 17 tan x के अवकलज का परिकलन कीजिए।

हल मान लीजिए f(x) = tan x, तब

=

=

=

= (sin (A + B) के सूत्र का प्रयोग करके)

=

=

उदाहरण 18 f(x) = sin2 x के अवकलज का परिकलन कीजिए।

हल हम इसका मान प्राप्त करने के लिए Leibnitz गुणन सूत्र का प्रयोग करते हैं।

= (sin x sin x)

= (sin x) sin x + sin x (sin x)

= (cos x) sin x + sin x (cos x)

= 2sin x cos x = sin 2x.


प्रश्नावली 13.2

1. x = 10 पर x2 – 2 का अवकलज ज्ञात कीजिए।

2. x = 1 पर x का अवकलज ज्ञात कीजिए।

3. x = l00 पर 99x का अवकलज ज्ञात कीजिए।

4. प्रथम सिद्धांत से निम्नलिखित फलनों के अवकलज ज्ञात कीजिएः

(i) (ii)

(iii) (iv)

5. फलन

के लिए सिद्ध कीजिए कि .

6. किसी अचर वास्तविक संख्या a के लिए का अवकलज ज्ञात कीजिए

7. किन्हीं अचरों a और b, वेη लिए,

(i) (ii) (iii)

के अवकलज ज्ञात कीजिए।

8. किसी अचर a के लिए का अवकलज ज्ञात कीजिए।

9. निम्नलिखित के अवकलज ज्ञात कीजिएः

(i) (ii)

(iii) (iv)

(v) (vi)

10. प्रथम सिद्धांत से cos x का अवकलज ज्ञात कीजिए।

11. निम्नलिखित फलनों के अवकलज ज्ञात कीजिए।

(i) (ii) (iii)

(iv) cosec x (v)

(vi) (vii)


विविध उदाहरण

उदाहरण 19 प्रथम सिद्धांत से f का अवकलज ज्ञात कीजिए जहाँ f इस प्रकार प्रदत्त हैः

(i) f (x) = (ii) f (x) =

हल (i) ध्यान दीजिए कि फलन x = 2 पर परिभाषित नहीं है। लेकिन, हम पाते हैं

=

=

=

पुनः ध्यान दीजिए कि x = 2 पर फलन भी परिभाषित नहीं है।

(ii) x = 0 पर फलन परिभाषित नहीं है। लेकिन, हम पाते हैं

=

=

=

=

पुनः ध्यान दीजिए कि x = 0 पर फलन परिभाषित नहीं है।

उदाहरण 20 प्रथम सिद्धांत से फलन f(x) का अवकलज ज्ञात कीजिए जहाँ f(x)

(i) (ii)

हल (i) हम पाते हैं,

=

=

=

=

= cos x – sin x

(ii) =

=

=

=

= x cos x + sin x

उदाहरण 21 (i) f(x) = sin 2x (ii) g(x) = cot x

के अवकलज का परिकलन कीजिए।

हल (i) त्रिकोणमिति सूत्र sin 2x = 2 sin x cos x का पुनर्स्मरण कीजिए। इस प्रकार

=

=

= =

(ii) परिभाषा से, g(x) = हम भागफल सूत्र का प्रयोग इस फलन पर करेंगे, जहाँ कहीं यह परिभाषित है। = =

=

विकल्पतः इसको ध्यान देकर कि , परिकलित किया जा सकता है। यहाँ हम इस तथ्य का प्रयोग करते हैं कि tan x का अवकलज sec2 x है जो हमने उदाहरण 17 में देखा है और साथ ही अचर फलन का अवकलज 0 होता है।

= 

=

=

=

उदाहरण 22 (i)  (ii)  

का अवकलज ज्ञात कीजिए।

हल (i) मान लीजिए  जहाँ कहीं भी यह परिभाषित है, हम इस फलन पर भागफल नियम का प्रयोग करेंगे।

 

=

(ii) हम फलन   पर भागफल नियम का प्रयोग करेंगे जहाँ कहीं भी यह परिभाषित है।

= 



अध्याय 13 पर विविध प्रश्नावली

1. प्रथम सिद्धांत से निम्नलिखित फलनों का अवकलज ज्ञात कीजिएः

(i) (ii) (iii)sin (x + 1)  (iv) cos (x)

निम्नलिखित फलनों के अवकलज ज्ञात कीजिए (यह समझा जाय कि a, b, c, d, p, q, r और s निश्चित शून्येतर अचर हैं और m तथा n पूर्णांक हैं।):

2. (x + a) 3. (px + q 4. 

5.  6.  7.  

8.  9.  10.

11.  12.   13. 

14. sin (x + a) 15. cosec x cot x 16. 

17.  18.  19. 

20.  21.  22.  23.  24.

25.  26.  27. 

28. 29.   30. 


सारांश

  • लन का अपेक्षित मान जो एक बिंदु के बाईं ओर के बिंदुओं पर निर्भर करता है, बिंदु पर फलन के बाएँ पक्ष की सीमा (Left handed limit) को परिभाषित करता है। इसी प्रकार दाएँ पक्ष की सीमा (Right handed limit)।
  • एक बिंदु पर फलन की सीमा बाएँ पक्ष और दाएँ पक्ष की सीमाओं से प्राप्त उभयनिष्ठ मान हैं यदि वे संपाती हों।
  • यदि किसी बिंदु पर बाएँ पक्ष और दाएँ पक्ष की सीमाएँ संपाती न हों तो यह कहा जाता है कि उस बिंदु पर फलन की सीमा का अस्तित्व नहीं है।
  • एक वास्तविक संख्या a और एक फलन f के लिए   f(x) और f (a) समान नहीं भी हो सकते (वास्तव में, एक परिभाषित हो और दूसरा नहीं)
  • फलनाें f और g के लिए निम्नलिखित लागू होते हैंः



  • निम्नलिखित कुछ मानक सीमाएँ हैं।



  • a पर फलन f का अवकलज

से परिभाषित होता है।

  • प्रत्येक बिंदु पर अवकलज, अवकलज फलन

से परिभाषित होता है।

  • फलनों u और v के लिए निम्नलिखित लागू होता हैः


 बशर्ते सभी परिभाषित हैं।

निम्नलिखित कुछ मानक अवकलज हैंः




एेतिहासिक पृष्ठभूमि

गणित के इतिहास में कलन के अन्वेषण के श्रेय की भागीदारी हेतु दो नाम प्रमुख हैं Issac Newton (1642 – 1727) और G.W. Leibnitz (1646 – 1717). सत्रहवीं शताब्दी में दोनों ने स्वतंत्रता पूर्वक कलन का अन्वेषण किया। कलन के आगमन के बाद इसके आगामी विकास हेतु अनेक गणितज्ञों ने योगदान किया। परिशुद्ध संकल्पना का मुख्य श्रेय महान गणितज्ञों A.L.Cauchy, J.L.Lagrange और Karl Weier strass को प्राप्त है। Cauchy ने कलन को आधार दिया जिसको अब हम व्यापकतः पाठ््य पुस्तकों में स्वीकार कर चुके हैं। Cauchy ने D'Almbert की सीमा संकल्पना के प्रयोग के द्वारा अवकलज की परिभाषा दी। सीमा की परिभाषा से प्रारंभ करते हुए = 0 के लिए की सीमा जैसे उदाहरण दिए। उन्होंने लिखा और के लिए सीमा को 'f "(x) के लिए y’, "function derive’e" नाम दिया।

1900 से पूर्व यह सोचा जाता था कि कलन को पढ़ाना बहुत कठिन है, इसलिए कलन युवाओं की पहुँच से बाहर थी। लेकिन ठीक 1900 में इंगलैंड में John Perry एवं अन्य ने इस विचार का प्रचार करना प्रारंभ किया कि कलन की मुख्य विधियाँ और धारणाएँ सरल हैं और स्कूल स्तर पर भी पढ़ाया जा सकता है। F.L. Griffin ने कलन के अध्ययन को प्रथम वर्ष के छात्रों से प्रारंभ करके नेतृत्व प्रदान किया। उन दिनों यह बहुत चुनौतीपूर्ण कार्य था।

आज न केवल गणित अपितु अनेक अन्य विषयों जैसे भौतिकी, रसायन विज्ञान, अर्थशास्त्र, जीवविज्ञान में कलन की उपयोगिता महत्वपूर्ण है।

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