™डंजीमउंजपबे पे ं उवेज मगंबज ेबपमदबम ंदक पजे बवदबसनेपवदे ंतम बंचंइसम व िंइेवसनजम चतववेिण् दृ ब्ण्च्ण् ैज्म्प्छडम्ज्र् ऽ 8ण्1 भूमिका ;प्दजतवकनबजपवदद्ध पिछली कक्षाओं में हमने सीखा है कि किस प्रकार ं ़ इ तथा ं दृ इ जैसे द्विपदों का वगर् व घन ज्ञात करते हैं। इनके सूत्रों का प्रयोग करके हम संख्याओं के वगो± व घनों का मान ज्ञात कर सकते हैं जैसे ;98द्ध2 त्र ख्;100 दृ 2द्ध,2ए ;999द्ध3 त्र ख्;1000 दृ 1द्ध3,ए इत्यादि। पिफर भी, अध्िक घात वाली संख्याओं जैसे ;98द्ध5ए ;101द्ध6 इत्यादि की गणना, क्रमिक गुणनपफल द्वारा अध्िक जटिल हो जाती है। इस जटिलता को द्विपद प्रमेय द्वारा दूर किया गया। इससे हमें ;ं ़ इद्धद के प्रसार की आसान विध्ि प्राप्त होती है जहाँ घातांक द एक पूणा±क या परिमेय संख्या है। इस अध्याय में हम केवल ध्न पूणा±कों के लिए द्विपद प्रमेय का अध्ययन करेंगें। 8ण्2 ध्न पूणा±कों के लिए द्विपद प्रमेय ;ठपदवउपंस ज्ीमवतमउ वित च्वेपजपअम प्दजमहतंस प्दकपबमेद्ध आइए पूवर् में की गइर् निम्नलिख्िात सवर्समिकाओं पर हम विचार करेंः ;ं ़इद्ध0 त्र 1य ं ़ इ ≠ 0 ;ं ़इद्ध1 त्र ं ़ इ ;ं ़इद्ध2 त्र ं2 ़ 2ंइ ़ इ2 ;ं ़इद्ध3 त्र ं3 ़ 3ं2इ ़ 3ंइ2 ़ इ3 ;ं ़इद्ध4 त्र ;ं ़ इद्ध3 ;ं ़ इद्ध त्र ं4 ़ 4ं3इ ़ 6ं2इ2 ़ 4ंइ3 ़ इ4 इन प्रसारों में हम देखते हैं कि ;पद्ध प्रसार में पदों की वुफल संख्या, घातांक से 1 अध्िक है। उदाहरणतः ;ं़ इद्ध2 के प्रसार में ;ं ़ इद्ध2 का घात 2 है जबकि प्रसार में वुफल पदों की संख्या 3 है। ;पपद्ध प्रसार के उत्तरोत्तर पदों में प्रथम ं की घातें एक के क्रम से घट रही हैं जबकि द्वितीय राश्िा इ की घातें एक के क्रम से बढ़ रही हैं। ;पपपद्ध प्रसार के प्रत्येक पद में ं तथा इ की घातों का योग समान है और ं ़ इ की घात के बराबर है। अब हम ं ़ इ के उपरोक्त विस्तारों में विभ्िान्न पदों के गुणांकों को निम्न प्रकार व्यवस्िथत करते हैं ;आवृफति 8ण्1द्ध आवृफति 8ण्1 क्या हम इस सारणी में अगली पंक्ित लिखने के लिए किसी प्रतिरूप का अवलोकन करते हैं? हाँ। यह देखा जा सकता है कि घात 1 की पंक्ित में लिखे 1 और 1 का योग घात 2 की पंक्ित के लिए 2 देता है। घात 2 की पंक्ित में लिखे 1 और 2 तथा 2 और 1 का योग घात 3 की पंक्ित के लिए 3 और 3 देता है और आगे भी इसी प्रकार 1 पुनः प्रत्येक पंक्ित के प्रारंभ व अंत में स्िथत है। इस प्रिया को किसी भी इच्िछत घात तक के लिए लिखा जा सकता है। हम आवृफति 8ण्2 में दिए गए प्रतिरूप को वुफछ और पंक्ितयाँ लिखकर आगे बढ़ा सकते हैं। पास्कल त्रिाभुज आवृफति 8ण्2 में दी गइर् सारणी को अपनी रूचि के अनुसार किसी भी घात तक बढ़ा सकते हैं। यह संरचना एक ऐसे त्रिाभुज की तरह लगती है जिसके शीषर् पर 1 लिखा है और दो तिरछी भुजाएं नीचे की ओर जा रही हैं। संख्याओं का व्यूह प्रफांसीसी गण्िातज्ञ ठसंपेम च्ंेबंस के नाम पर पास्कल त्रिाभुज के नाम से प्रसि( है। इसे पिंगल के मेरुप्रस्त्रा के नाम से भी जाना जाता है। एक द्विपद की उच्च घातों का प्रसार भी पास्कल के त्रिाभुज के प्रयोग द्वारा संभव है। आइए हम पास्कल त्रिाभुज का प्रयोग कर के ;2ग़3लद्ध5 का विस्तार करें। घात 5 की पंक्ित हैः 1 5 10105 1 इस पंक्ित का, और हमारे परीक्षणों ;पद्धए ;पपद्धए ;पपपद्धए का प्रयोग करते हुए हम पाते हैं कि ;2ग़3लद्ध5 त्र ;2गद्ध5 ़ 5;2गद्ध4 ;3लद्ध ़ 10;2गद्ध3 ;3लद्ध2 ़10 ;2गद्ध2 ;3लद्ध3 ़ 5;2गद्ध;3लद्ध4 ़ ;3लद्ध5 त्र32ग5 ़ 240ग4ल ़ 720ग3ल2 ़ 1080ग2ल3 ़ 810गल4 ़ 243ल5ण् अब यदि हम ;2ग़3लद्ध12ए का प्रसार ज्ञात करना चाहें तो पहले हमें घात 12 की पंक्ित ज्ञात करनी होगी। इसे पास्कल त्रिाभुज की पंक्ितयों को घात 12 तक की सभी पंक्ितयाँ लिख कर प्राप्त किया जा सकता है। यह थोड़ी सी लंबी विध्ि है। जैसा कि आप देखते हैं कि और भी उच्च घातों का विस्तार करने के लिए विध्ि और अध्िक कठिन हो जाएगी। अतः हम एक ऐसा नियम ढूँढने का प्रयत्न करते हैं जिससे पास्कल त्रिाभुज की ऐच्िछक पंक्ित से पहले की सारी पंक्ितयों को लिखे बिना ही, द्विपद के किसी भी घात का विस्तार ज्ञात कर सकें। इसके लिए हम पहले पढ़ चुके ‘संचय’ के सूत्रों का प्रयोग करके, पास्कल त्रिाभुज में लिखी संख्याओं को पुनः लिखते हैं। हम जानते हैं कि दद! ददब्त त्र ए 0 ≤ त ≤ द जहाँ द )णेतर पूणा±क है। ब् त्र1त्र ब्वदत!;द दृ तद्ध! अब पास्कल त्रिाभुज को पुनः इस प्रकार लिख सकते हैं ;आवृफति 8.3द्ध उपरोक्त प्रतिरूप ;चंजजमतदद्ध को देखकर, पूवर् पंक्ितयों को लिखे बिना हम पास्कल त्रिाभुज की किसी भी घात के लिए पंक्ित को लिख सकते हैं। उदाहरणतः घात 7 के लिए पंक्ित होगीः 7ब्7ब्7ब्7ब्7ब्7ब्7ब्7ब्01 2 3 4 5 6 7 इस प्रकार, इस पंक्ित और प्रेक्षण ;पद्धए ;पपद्ध व ;पपपद्धए का प्रयोग करके हम पाते हैं, ;ं़इद्ध7 त्र 7ब्ं7़ 7ब्ं6इ ़ 7ब्ं5इ2 ़ 7ब्ं4इ3 ़ 7ब्ं3इ4 ़ 7ब्ं2इ5 ़ 7ब्ंइ6 ़ 7ब्इ7 0 1234567इन प्रेक्षणों का उपयोग करके एक द्विपद के किसी )णेतर पूणा±क द के लिए प्रसार दिखाया जा सकता है। अब हम एक द्विपद के किसी भी ;)णेतर पूणा±कद्ध घात के प्रसार को लिखने की अवस्था में हैं। 8ण्2ण्1 द्विपद प्रमेय किसी ध्न पूणा±क द के लिए ;ठपदवउपंस जीमवतमउ वित ंदल चवेपजपअम पदजमहमत दद्ध दब्ंदंद.2 इ2ंण्इद.1इद;ं ़ इद्धद त्र ़ दब्ंद.1इ ़ दब् ़ ण्ण्ण़् दब् ़ दब्012द.1द उपपिा इस प्रमेय की उपपिा गण्िातीय आगमन सि(ांत द्वारा प्राप्त की जाती है। मान लीजिए कथन च्;दद्ध निम्नलिख्िात हैः च्;दद्ध रू ;ं ़ इद्धद त्र दब्0ंद ़ दब्1ंद.1इ ़ दब्2ंद.2इ2 ़ ण्ण्ण़् दब् द.1ंण्इद.1 ़ दब् दइद द त्र 1 लेने पर च् ;1द्ध रू ;ं ़ इद्ध1 त्र 1ब्0ं1 ़ 1ब्1इ1 त्र ं ़ इ अतः च् ;1द्ध सत्य है। मान लीजिए कि च् ;ाद्धए किसी ध्न पूणा±क ा के लिए सत्य है, अथार्त्् ;ं़इद्धा त्र ाब्0ंा ़ ाब्1ंा.1इ ़ ाब्2ंा.2इ2 ़ ण्ण्ण़् ाबइा ण्ण्ण् ;1द्ध हम सि( करेंगें कि च्;ा़1द्ध भी सत्य है अथार्त््, ;ं़इद्धा़1ा़1ब्ंा़1ंा.1इ2इा़1त्र ़ ा़1ब्ंाइ ़ ा़1ब् ़ ण्ण्ण़् ा़1ब्012ा़1अबए ;ं़इद्धा़1त्र;ं़इद्ध ;ं़इद्धा ंांइा.1 ़ ाबत्र;ं़इद्ध ;ाब्0 ़ ाब्1ंा.1इ ़ ाब्2ंादृ2इ2़ण्ण्ण् ़ाब.1इाद्ध ख्;1द्ध से, ं2इादृ1 ़ ाब्त्र ाब्ंा़1 ़ ाब्ंाइ ़ ाब्ंादृ1इ2 ़ण्ण्ण़् ाब्ंइा ़ ाब्ंाइ012ादृ1ा0ंा.1इ2 ़ ाब्2इा़1 ़ ाब्1ंादृ2इ3़ ण्ण्ण् ़ ाब.1ंइा ़ ाबख्वास्त्विक गुणा द्वारा, ंा़1त्र ाब् ़ ;ाब़्ाब्द्धंाइ ़ ;ाब़्ाब्द्धंा.1इ2 ़ ण्ण्ण्01021़;ाब़ाब.1द्ध ंइा ़ ाबइा़1 ;समान पदों के समूह बनाकरद्ध ा़1ब्ंा़1इा़1त्र ़ ा़1ब्ंाइ ़ ा़1ब्ंादृ1इ2 ़ ण्ण्ण़् ा़1ब्ंइा ़ ा़1ब्012 ाा़1 ;ा़1ब्0त्र ा़1ब्त्र 1ए ाब़् ाब् और ाब त्र 1त्र ा़1ब़1 का प्रयोग करकेद्धतत.1 त इससे सि( होता है कि यदि च्;ाद्ध भी सत्य है तो च् ;ा़1द्ध सत्य है। इसलिए, गण्िातीय आगमन सि(ांत द्वारा, प्रत्येक ध्न पूणा±क द के लिए च्;दद्ध सत्य है। हम इस प्रमेय को ;ग ़ 2द्ध6 के प्रसार का उदाहरण लेकर समझते हैं। ;ग़2द्ध6 त्र 6ब्ग6 ़ 6ब्ग5ण्2 ़ 6ब्ग422 ़ 6ब्ग3ण्23 ़ 6ब्ग2ण्24 ़ 6ब्गण्25 ़ 6ब्ण्26 0123456त्र ग6 ़ 12ग5 ़60ग4 ़ 160ग3 ़ 240ग2 ़ 192ग ़ 64 इस प्रकारए ;ग़2द्ध6 त्र ग6 ़ 12ग5 ़60ग4 ़ 160ग3 ़ 240ग2 ़ 192ग ़ 64ण् प्रेक्षण ंदइ0ंद.1इ1ंददृतइतंददृदइद1ण् दब्0 ़ दब्1 ़ ण्ण्ण़् दब् ़ ण्ण्ण़्दब्ए जहाँ इ0 त्र 1 त्र ंददृद त द द दद−ााका संकेतन ∑ बंइहै।ा त्र0 अतः इस प्रमेय को इस प्रकार भी लिख सकते हैं। द द द दाा;ंइद्ध त्र∑ बं − इ़ ा त्र0 2ण् द्विपद प्रमेय में आने वाले गुणांक दब् को द्विपद गुणांक कहते हैं।त 3ण् ;ं़इद्धद के प्रसार में पदों की संख्या ;द़1द्ध है अथार्त्् घातांक से 1 अध्िक है। 4ण् प्रसार के उत्तरोत्तर पदों में, ं की घातें एक के क्रम से घट रही हैं। यह पहले पद में दए दूसरे पद में ;ददृ1द्ध और पिफर इसी प्रकार अंतिम पद में शून्य है। ठीक उसी प्रकार इ की घातें एक के क्रम से बढ़ रही हैं, पहले पद में शून्य से शुरू होकर, दूसरे पद में 1 और पिफर इसी प्रकार अंतिम पद में द पर समाप्त होती हैं। 5ण् ;ं़इद्धदए के प्रसार में, ं तथा इ की घातों का योग, पहले पद में द ़ 0 त्र दए दूसरे पद में ;द दृ 1द्ध ़ 1 त्र द और इसी प्रकार अंतिम पद में 0 ़ द त्र द है। अतः यह देखा जा सकता है कि प्रसार के प्रत्येक पद में ं तथा इ की घातों का योग द है। 8ण्2ण्2 ;ं ़ इद्धद के प्रसार की वुफछ विश्िाष्ट स्िथतियाँ ;ैवउम ेचमबपंस बंेमेद्ध ;पद्ध ं त्र ग तथा इ त्र दृलए लेकर हम पाते हैंऋ ;ग दृ लद्धद त्र ख्ग ़ ;दृलद्ध,द त्र दब्0गद ़ दब्1गद.1;दृलद्ध ़ दब्2गददृ2;दृलद्ध2 ़ दब्3गददृ3;दृलद्ध3 ़ ण्ण्ण् ़ दब् द ;दृलद्धद गददृ2ल2गद.3ल3त्र दब्0गद दृ दब्1गददृ1ल ़ दब्2 दृ दब्3 ़ ण्ण्ण् ़ ;दृ1द्धददब् द लद गदगददृ1 ल ़ दब्2गददृ2 ल2दब् लदइस प्रकार ;गदृलद्धद त्र दब्0 दृ दब्1 ़ ण्ण्ण् ़ ;दृ1द्धद द इसका प्रयोग करके हम पाते हैं, ;गदृ2लद्ध5 त्र 5ब्0ग5 दृ 5ब्1ग4 ;2लद्ध ़ 5ब्2ग3 ;2ल2द्ध दृ 5ब्3ग2 ;2लद्ध3 ़ 5ब्4 ग;2लद्ध4 दृ 5ब्5;2लद्ध5 त्र ग5 दृ10ग4ल ़ 40ग3ल2 दृ 80ग2ल3 ़ 80गल4 दृ 32ल5 ;पपद्ध ं त्र 1 तथा इ त्र गए लेकर हम पाते हैं कि, ;1़गद्धद त्र दब्0;1द्धद ़ दब्1;1द्धद.1ग ़ दब्2;1द्धद.2ग2 ़ ण्ण्ण् ़ दब् दगद त्र दब् ़ दब्ग ़ दब्ग2 ़ दब्ग3 ़ ण्ण्ण् ़ दब् गद 0123द इस प्रकारए ;1़गद्धद त्र दब् ़ दब्ग ़ दब्ग2 ़ दब्ग3 ़ ण्ण्ण् ़ दब् गद 0123द विशेषत ग त्र1ए के लिए हम पाते हैं, 2द त्र दब्0 ़ दब्1 ़ दब्2 ़ ण्ण्ण् ़ दब् दण् ;पपपद्ध ं त्र 1 तथा इ त्र दृ गए लेकर हम पाते हैं, ;1दृ गद्धद त्र दब्0 दृ दब्1ग ़ दब्2ग2 दृ ण्ण्ण् ़ ;दृ1द्धददब् दगद विशेषत ग त्र 1ए के लिए हम पाते हैं, 0 त्र दब्0 दृ दब्1 ़ दब्2 दृ ण्ण्ण् ़ ;दृ1द्धददब् द ⎛ 3 ⎞4 उदाहरण 1 ⎜ग2 ़⎟ए ग ≠ 0 का प्रसार ज्ञात कीजिएः⎝ ग ⎠हल द्विपद प्रमेय का प्रयोग करके हमें प्राप्त होता है, 4 2343 3 333⎛2 ⎞ ⎛⎞ ⎛⎞ ⎛⎞⎛⎞ ⎜ग ़⎟त्र 4ब्;ग2द्ध4 ़ 4ब्;ग2द्ध3 ⎜⎟़ 4ब्;ग2द्ध2 ⎜⎟़ 4ब्;ग2द्ध ⎜⎟़ 4ब्⎜⎟01234ग ग गगग⎝⎠ ⎝⎠⎝⎠⎝⎠⎝⎠ 3 9 2781 त्र ग8 ़ 4ण्ग6 ण् ़ 6ण्ग4 ण् 2़ 4ण्ग2ण्3़ 4ग गगग 108 81 त्र ग8 ़ 12ग5 ़ 54ग2 ़ ़4गग उदाहरण 2 ;98द्ध5 की गणना कीजिए। हल हम 98 को दो संख्याओं के योग या अंतर में व्यक्त करते हैं जिनकी घात ज्ञात करना सरल हो, पिफर द्विपद प्रमेय का प्रयोग करते हैं। 98 को 100 दृ 2 लिखने पर, ;98द्ध5 त्र ;100 दृ 2द्ध5 5ब्3त्र 5ब्0 ;100द्ध5 दृ 5ब्1 ;100द्ध4ण्2 ़ 5ब्2 ;100द्ध322 दृ ;100द्ध2 ;2द्ध3 ़ 5ब्4 ;100द्ध ;2द्ध4 दृ 5ब्5 ;2द्ध5 त्र 10000000000 दृ 5 × 100000000 × 2 ़ 10 × 1000000 × 4 दृ 10 ×10000 × 8 ़ 5 × 100 × 16 दृ 32 त्र 10040008000 दृ 1000800032 त्र 9039207968 उदाहरण 3 ;1ण्01द्ध1000000 और 10ए000 में से कौन सी संख्या बड़ी है? हल 1ण्01 को दो पदों में व्यक्त करके द्विपद प्रमेय के पहले वुफछ पदों को लिखकर हम पाते हैं;1ण्01द्ध1000000 त्र ;1 ़ 0ण्01द्ध1000000 त्र 1000000ब्0 ़ 1000000ब्1;0ण्01द्ध ़ अन्य ध्नात्मक पद त्र 1 ़ 1000000 × 0ण्01 ़ अन्य ध्नात्मक पद त्र 1 ़ 10000 ़ अन्य ध्नात्मक पद झ 10000 अतः ;1ण्01द्ध1000000 झ 10000 उदाहरण 4 द्विपद प्रमेय का प्रयोग करके सि( कीजिए कि 6ददृ5द को जब 25 से भाग दिया जाए तो सदैव 1 शेष बचता है। हल दो सख्याओं ं तथा इ के लिए यदि हम संख्याएँ ु तथा त प्राप्त कर सवेंफ ताकि ं त्र इु ़ त तो हम कह सकते हैं कि ं को इ से भाग करने पर ु भजनपफल तथा त शेषपफल प्राप्त होता है। इसी प्रकार यह दशार्ने के लिए कि 6ददृ5द को 25 से भाग करने पर 1 शेष बचता है, हमें सि( करना हैः 6ददृ5द त्र 25ा़1 जहाँ ा एक प्रावृफत संख्या है। हम जानते हैंः ;1 ़ ंद्धद त्र दब्0 ़ दब्1ं ़ दब्2ं2 ़ ण्ण्ण् ़ दब् ंद द ं त्र 5ए के लिए हमें प्राप्त होता है, ;1 ़ 5द्धद त्र दब्0 ़ दब्15 ़ दब्252 ़ ण्ण्ण् ़ दब् द 5द या ;6द्धद त्र 1़5द ़ 52ण्दब्2़ 53ण्दब्3 ़ ण्ण्ण् ़ 5द ़ दब्3या 6द दृ 5द त्र 1़52 ;दब्2 5 ़ ण्ण्ण् ़ 5द.2द्ध या 6द दृ 5द त्र 1़ 25 ;दब्2 ़ 5ण्दब्3 ़ ण्ण्ण् ़ 5द.2द्ध या 6द दृ 5द त्र 25ा़1 जहाँ ात्र दब्2 ़ 5ण्दब्3 ़ ण्ण्ण् ़ 5ददृ2ण् यह दशार्ता है कि जब 6द दृ 5द को 25 से भाग किया जाता है तो शेष 1 बचता है। प्रश्नावली 8ण्1 प्रश्न 1 से 5 तक प्रत्येक व्यंजक का प्रसार कीजिएः 5ण् ⎛ 2 ग ⎞5 1ण् ;1दृ2गद्ध5 2ण् ⎜ दृ ⎟ 3ण् ;2ग दृ 3द्ध6 ⎝ ग 2 ⎠ ⎛ ग 1 ⎞5 ⎛ 1 ⎞6 4ण् ⎜़⎟ 5ण् ⎜ ग ़⎟⎝ 3 ग ⎠⎝ ग ⎠ द्विपद प्रमेय का प्रयोग करके निम्नलिख्िात का मान ज्ञात कीजिए 6ण् ;96द्ध3 7ण् ;102द्ध5 8ण् ;101द्ध4 9ण् ;99द्ध5 10ण् द्विपद प्रमेय का प्रयोग करते हुए बताइए कौन - सी संख्या बड़ी है ;1ण्1द्ध10000 या1000ण् 4;3 ़ 2 द्ध4 ; द्धका विस्तार कीजिए। इसका प्रयोग करके का3211ण् ;ं़इद्ध4 दृ ;ंदृइद्ध4दृदृ मान ज्ञात कीजिए। 12ण् ;ग़1द्ध6 ़ ;गदृ1द्ध6 का मान ज्ञात कीजिए। इसका प्रयोग करके या अन्यथा ; 2़1द्ध6 ़ ; 2 दृ1द्ध6 का मान ज्ञात कीजिए। 13ण् दिखाइए कि 9द़1 दृ 8द दृ 9ए 64 से विभाज्य है जहाँ द एक ध्न पूणा±क है। द तद द त14ण् सि( कीजिए कि ∑3ब् त्र4 तत्र0 8ण्3 व्यापक एवं मध्य पद ;ळमदमतंस ंदक डपककसम ज्मतउेद्ध ंददृ1इ1ण् ;ं ़ इद्धद के द्विपद प्रसार में हमने देखा है कि पहला पद दब्0ंद है, दूसरा पद दब्1है, तीसरा पद दब्ंददृ2इ2 है और आगे इसी प्रकार। इन उत्तरोत्तर पदों के प्रतिरूपों में हम कह2सकते हैं कि ;त ़ 1द्धवां पद दब् ंददृतइत है। ;ं ़ इद्धद का ;त ़ 1द्धवां पद, व्यापक पदत ंद दृ तइत;ळमदमतंस जमतउद्ध कहलाता है। इसे ज् द्वारा लिखते हैं। अतः ज् त्र दब् त़1 त़1त 2ण् ;ं ़ इद्धद के प्रसार के मध्य पद के बारे में हम पाते हैं ;पद्ध यदि द सम ;म्अमदद्ध संख्या है तो प्रसार के पदों की संख्या ;द़1द्ध होगी। क्योंकि द एक वाँ11⎞⎛द ़़सम संख्या हैं इसलिए द ़ 1 एक विषम संख्या होगी। इसलिए मध्य पद ⎜⎟⎝ 2 ⎠ वाँ⎛द ⎞अथार्त्् ⎜़1⎟ पद है।⎝2 ⎠ वाँ⎛8 ⎞उदाहरणाथर्, ;ग ़ 2लद्ध8 के प्रसार में मध्य पद ⎜़1⎟ अथार्त् 5वाँ पद है।⎝2 ⎠ ;पपद्ध यदि द विषम संख्या ;वककद्ध है तो ;द़1द्ध सम संख्या है। इसलिए, प्रसार के दो मध्य पद वावाँँवाँ71⎞⎛़⎛द ़1⎞ 1⎛द ़ ⎞1तथा होंगे। अतः ;2गदृलद्ध7 के प्रसार में मध्य पद़ ⎜⎟⎝⎠2⎜⎟⎝⎠2 ⎜⎝ ⎟⎠2 वाँ⎛़ ⎞अथार्त्् चैथा और ⎜ 71 ़1⎟ अथार्त् पाँचवाँ पद है।⎝ 2 ⎠ 2द वा⎛ 1 ⎛2द ़़1⎞3ण् ⎜ग ़⎟⎞ ए जहाँ ग ≠0 है, के प्रसार में मध्य पद ⎜ 1 ⎟अथार्त् ;द़1द्धवाँ पद है,⎝ ग ⎠⎝ 2 ⎠ क्योंकि 2द सम संख्या है। 1 द⎛⎞ यह 2दब् गद ⎜⎟त्र 2दब् ;अचरद्ध द्वारा दिया जाता है।दग द⎝⎠ यह पद ग से स्वतंत्रा पद ;प्दकमचमदकमदज ज्मतउद्ध या अचर पद ;ब्वदेजंदज जमतउद्ध कहलाता है। उदाहरण 5 यदि ;2़ंद्ध50 के द्विपद प्रसार का सत्राहवाँ और अट्टòारहवाँ पद समान हो तो ं का मान ज्ञात कीजिए। हल ;ग़लद्धद के द्विपद प्रसार में ;त़1द्धवाँ पद हैः ज् त्र दब् गददृतलत त़1त सत्राहवें पद के लिए, त ़ 1 त्र 17ए या त त्र 16 ;2द्ध50दृ16 ं16इसलिए ज्17 त्रज्16़! त्र 50ब्16त्र 50ब्234 ं16ण् 16 इसी प्रकार ज्18 त्र 50ब्17 233 ं17 हमें ज्ञात है कि ज्17 त्रज्18 इसलिए, 50ब्;2द्ध34 ं16 त्र 50ब्;2द्ध33 ं17 16 17 50 34 ं17 ब्16ण्2 या 16त्र 50 33ं ब् ण्217 50ब्16 2 50! 17! 33! या ं त्र त्र ×2 त्र 150ब्17 16!34! × 50! 1ण्3ण्5ण्ण्ण्;2 द 1द्ध उदाहरण 6 दिखाइए कि ;1़गद्ध2द के प्रसार में मध्य पद द!2द गद है, जहाँ द एक ध्न पूणा±क है। जवाँ⎛2द ⎞ हल क्योंकि 2द एक सम संख्या है, इसलिए ;1़गद्ध2द का मध्य पद ⎜़1⎟अथार्त्् ;द़1द्धवाँ ⎝2 ⎠पद है। ;2दद्ध! गदइस प्रकार, मध्य पद ज् त्र2दब् ;1द्ध2ददृद;गद्धद त्र 2दब् गद त्र द़1 ददद!द! 2;2 द −1द्ध ;2 द −2द्ध 4321 दद ण्ण्ण्ण्ण्ण् गत्र !!दद ँ 1ण्2ण्3ण्4ण्ण्ण्;2द − 2द्ध ;2द −1द्ध ;2दद्ध द त्र ग द!द! ख्1ण्3ण्5ण्ण्ण्;2द दृ1द्ध,ख्2ण्4ण्6ण्ण्ण्;2दद्ध,त्रण् गद द!द! ख्1ण्3ण्5ण्ण्ण्;2द −1द्ध,2द ख्1ण्2ण्3ण्ण्ण्द, त्र गद द!द! ख्1ण्3ण्5ण्ण्ण्;2द −1द्ध,द! दद त्र 2ण्ग द!द! 1ण्3ण्5ण्ण्ण्;2द −1द्ध दद त्र2 ग द! उदाहरण 7 ;ग़2लद्ध9 के प्रसार में ग6ल3 का गुणांक ज्ञात कीजिए। हल मान लीजिए ;ग़2लद्ध9 के प्रसार में ग6ल3ए ;त़1द्धवेंपद में आता है। ग9दृ त ण् ग9 दृ तअब ज् त्र 9ब् ;2लद्धत त्र 9ब् 2 त ण् ल त त़1 ततज् तथा ग6ल3 में ग और ल के घातांकों की तुलना करने पर हमें प्राप्त होता है, त त्र 3ण् त़19! 3 ण्ण्987 इसलिए, ग6ल3 का गुणांक त्र 9ब्3 23 त्र ण्2 त्र ण्23 त्र 672ण्3!6! 32ण्उदाहरण 8 ;ग ़ ंद्धद के द्विपद प्रसार के दूसरे, तीसरे और चैथे पद क्रमशः 240, 720 और 1080 हैं। गए ं तथा द ज्ञात कीजिए। हल हमें ज्ञात है कि दूसरा पद ज्2 त्र 240 परंतु ज्2 त्र दब्1गददृ1 ण् ं इसलिए दब्1गददृ1 ण् ं त्र 240 ण्ण्ण् ;1द्ध इसी प्रकार दब्2गददृ2 ं2 त्र 720 ण्ण्ण् ;2द्ध और दब्3गददृ3 ं3 त्र 1080 ण्ण्ण् ;3द्ध ;2द्ध को ;1द्ध से भाग करने पर हमें प्राप्त होता है, दद−22ब्2 गं 720 ;द −1द्ध! ं त्र ण् त्र 6 दद−1 याब्1गं 240 ;द − 2द्ध! ग ं 6 त्रया ण्ण्ण् ;4द्धग ;द − 1द्ध ;3द्ध को ;2द्धए से भाग करने पर, ं 9 त्र ण्ण्ण् ;5द्धग 2;द − 2द्ध 69 त्र;4द्ध व ;5द्ध से, या द त्र 5द −1 2;द − 2द्ध ं 3 अब ;1द्ध से, 5ग4ं त्र 240 और ;4द्ध से, त्र ग 2 इन समीकरणों को हल करने से हम ग त्र 2 और ं त्र 3 प्राप्त करते हैं। उदाहरण 9 यदि ;1़ंद्धद के प्रसार में तीन क्रमागत पदों के गुणांक 1ः 7ः 42 के अनुपात में हैं तो द का मान ज्ञात कीजिए। हल मान लीजिए ;1 ़ ंद्धद के प्रसार में ;त दृ 1द्धवाँए तवाँ तथा ;त ़ 1द्धवाँ पद, तीन क्रमागत पद हैं। ;त दृ 1द्धवाँ पद दब् ंतदृ2 है तथा इसका गुणांक दब् है। इसी प्रकार तवें तथा ;त ़ 1द्धवें पदों के गुणांकतदृ2तदृ2 क्रमशः दब् व दब् हैं। क्योंकि गुणांको का अनुपात 1: 7: 42 है इसलिए हमें प्राप्त होता है,तदृ1तदब्त−21 त्र अथार्त्् द दृ 8त ़ 9 त्र 0 ण्ण्ण् ;1द्ध दब्7त−1 दब्त−17 त्रऔर अथार्त्् द दृ 7त ़ 1 त्र 0 ण्ण्ण् ;2द्ध दब्त 42 समीकरण ;1द्ध व ;2द्ध को हल करने पर हमें द त्र 55 प्राप्त होता है। प्रश्नावली 8ण्2 गुणांक ज्ञात कीजिएः 1ण् ;ग ़ 3द्ध8 में ग5 का 2ण् ;ं दृ 2इद्ध12 में ं5इ7 का निम्नलिख्िात के प्रसार में व्यापक पद लिख्िाएः ;ग2 दृ3ण् लद्ध6 4ण् ;ग2 दृ लगद्ध12ए ग ≠ 0 5ण् ;ग दृ 2लद्ध12 के प्रसार में चैथा पद ज्ञात कीजिए। ⎛ 1 ⎞18 6ण् 9ग − ⎟ के प्रसार में 13वाँ पद ज्ञात कीजिए।⎜⎝ 3 ग ⎠निम्नलिख्िात प्रसारों में मध्य पद ज्ञात कीजिएः 3⎛ ग ⎞7 ⎛ग ⎞10 7ण् ⎜⎜3 −6 ⎟⎟ 8ण् ⎜़9ल ⎟⎝⎠ ⎝3 ⎠ 9ण् ;1 ़ ंद्धउ ़ द के प्रसार में सि( कीजिए कि ंउ तथा ंद के गुणांक बराबर हैं। 10ण् यदि ;ग ़ 1द्धद के प्रसार में ;त दृ 1द्धवाँ ए तवाँ और ;त ़ 1द्धवाँ पदों के गुणांकों में 1: 3: 5 का अनुपात हो, तो द तथा त का मान ज्ञात कीजिए। 11ण् सि( कीजिए कि ;1 ़ गद्ध2द के प्रसार में गद का गुणांक, ;1 ़ गद्ध2ददृ1 के प्रसार में गद के गुणांक का दुगना होता है। 12ण् उ का ध्नात्मक मान ज्ञात कीजिए जिसके लिए ;1 ़ गद्धउ के प्रसार में ग2 का गुणांक 6 हो। विविध् उदाहरण ⎛3 2 16 − ⎞उदाहरण 10 ⎜ग ⎟के प्रसार में ग से स्वतंत्रा पद ज्ञात कीजिए।⎝23ग ⎠6−तत 6 ⎛32 ⎞⎛1 हल हम पाते हैं कि ज् त्रब्त ⎜ग ⎟ ⎜ − ⎞⎟त़1 2 ग⎝ ⎠⎝ 3 ⎠ 6−त त त्र3 ;द्ध6−त ;द्ध−1 ⎛⎞⎛ ⎞ 116ब् ⎛⎞ ग2 त त ⎜⎟ त⎜⎟⎜ ⎟ 2 ग 3⎝⎠ ⎝⎠⎝⎠ त ;3द्ध 62त − − 6 123 त;1द्ध − ब् गत्र त 6−त;2द्ध ग से स्वतंत्रा पद के लिए, पद में ग का घातांक 0 ;होना चाहिएद्ध। अतः 12 दृ 3त त्र 0 या त त्र 4 −;3द्ध 68 5 त्रइस प्रकार 5वाँ पद ग से स्वतंत्रा है। इसलिए अभीष्ट पद त्र ;दृ1द्ध4 6ब्4 64;2द्ध − 12 उदाहरण 11 यदि ;1 ़ ंद्धद के प्रसार में ंत.1ए ंत तथा ंत़1 के गुणांक समांतर श्रेणी में हों तो सि( कीजिए कि द2 दृ द;4त ़ 1द्ध ़ 4त2दृ2 त्र 0 हल हम जानते हैं कि ;1 ़ ंद्धद के प्रसार में ;त ़ 1द्धवाँ पद दब् ंत है। इस प्रकार यह देखा जा सकतात है कि ंतए ;त ़ 1द्धवें पद में आता है। और इसका गुणांक दब् है। इसलिए ंतदृ1ए ंत तथा ंत़1 के गुणांकतक्रमशः दब् तदृ1 ए दब् त तथा दब् त़1 हैं। परंतु ये गुणांक समांतर श्रेणी में हैं। इसलिए दब् तदृ1़ दब् त्र 2दब् त़1 त द! द! द!़त्र2 ×या ;त −1द्ध!;द −त ़1द्ध! ;त ़1द्ध!;द −त −1द्ध! त!;द −तद्ध! 11 या ़;त −1द्ध!;द −त ़1द्ध;द −तद्ध;द −त −1द्ध! ;त ़1द्ध;तद्ध;त −1द्ध!;द −त −1द्ध! 1 त्र2 × त ;त −1द्ध!;द −तद्ध;द −त −1द्ध! 1 ⎡ 11 ⎤ या ⎢ ़⎥;त −1द्ध! ; दत 1द्ध! ⎣;द दृ तद्ध; दत 1द्ध ; ⎦−़ त ़1द्ध ;द्ध −− त 12त्र× ;त −1द्ध! ; दत तद दृ−− 1द्ध!ख् ; तद्ध, 1 12 त्रया ़ ;द −त ़1द्ध ;द −तद्ध त;त ़1द्ध त;द −तद्ध त;त ़1द्ध ़;द −तद्ध;द −त ़1द्ध 2 त्रया ;द −तद्ध;द −त ़1द्धत ;त ़1द्ध त;द −तद्ध या त;त ़ 1द्ध ़ ;द दृ तद्ध ;द दृ त ़ 1द्ध त्र 2 ;त ़ 1द्ध ;द दृ त ़ 1द्ध या त2 ़ त ़ द2 दृ दत ़ द दृ दत ़ त2 दृ त त्र 2;दत दृ त2 ़ त ़ द दृ त ़ 1द्ध या द2 दृ 4दत दृ द ़ 4त2 दृ 2 त्र 0 या द2 दृ द ;4त ़ 1द्ध ़ 4त2 दृ 2 त्र 0 उदाहरण 12 दिखाइए कि ;1 ़ गद्ध2द के प्रसार में मध्य पद का गुणांक, ;1 ़ गद्ध2ददृ1 के प्रसार में दोनों मध्य पदों के गुणांकों के योग के बराबर होता है। हल क्योंकि 2द एक सम संख्या है इसलिए ;1़गद्ध2द के प्रसार में केवल एक मध्य पद है जो कि वाँ⎛2द ⎞ ⎜़1⎟ अथार्त्् ;द ़ 1द्धवाँ पद है।⎝2 ⎠ अब ;द़1द्धवाँ पद 2दब् गद है जिसका गुणांक 2दब् है।ददइसी प्रकार, ;2ददृ1द्ध एक विषम संख्या है इसलिए ;1 ़ गद्ध2ददृ1 के प्रसार के दो मध्य पद वाँवाँ⎛2द −़11⎞⎛2द −़11 ⎞ ⎜⎟ और ⎜़1⎟ अथार्त्् दवाँ और ;द ़ 1द्ध वाँ पद है।⎝ 2 ⎠⎝ 2 ⎠ इन पदों के गुणांक क्रमशः 2ददृ1ब् और 2ददृ1ब् हैं।ददृ1 द इस प्रकार 2ददृ1ब़् 2ददृ1ब्त्र 2दब् ख्क्योंकि दब़् दब् त्र द़1ब् ,ददृ1 ददतदृ1ततयही अभीष्ट है। उदाहरण 13 द्विपद प्रमेय का उपयोग करते हुए गुणनपफल ;1 ़ 2ंद्ध4 ;2 दृ ंद्ध5 में ं4 का गुणांक ज्ञात कीजिए। हल सबसे पहले हम गुणनपफल के प्रत्येक में द्विपद प्रमेय गुणनखंड प्रयोग कर प्रसारण करते हैं। इस प्रकार ;1़2ंद्ध4त्र 4ब़्4ब् ;2ंद्ध ़ 4ब् ;2ंद्ध2 ़ 4ब्;2ंद्ध3़ 4ब् ;2ंद्ध4 0123 4त्र 1़4 ;2ंद्ध़6 ;4ं2द्ध ़ 4 ;8ं3द्ध ़ 16ं4ण् त्र 1़8 ं़24ं2़3 2ं3 ़ 16ं4 और ;2दृंद्ध5त्र 5ब्0 ;2द्ध5 दृ 5ब्1 ;2द्ध4 ;ंद्ध ़ 5ब्2 ;2द्ध3 ;ंद्ध2 दृ 5ब्3 ;2द्ध2 ;ंद्ध3 ़ 5ब्4 ;2द्ध ;ंद्ध4 दृ 5ब्5 ;ंद्ध5 त्र 32 दृ 80ं ़ 80ं2 दृ 40ं3़10ं4 दृ ं5 इस प्रकारए ;1़2ंद्ध4 ;2दृंद्ध5 त्र ;1़8ं ़ 24ं2 ़ 32ं3 ़ 16ं4द्ध ;32दृ80ं ़ 80ं2 दृ 40ं3 ़ 10ं4 दृ ं5द्ध हमें संपूणर् गुणा करने तथा सभी पदों के लिखने की आवश्यकता नहीं है। हम केवल वही पद लिखते हैं जिनमें ं4 आता है। यदि ंतण्ं4दृत त्र ं4 तो यह किया जा सकता है। जिन पदों में ं4 आता है, वे हैंः 1ण्10ं4 ़ ;8ंद्ध ;दृ40ं3द्ध ़ ;24ं2द्ध ;80ं2द्ध ़ ;32ं3द्ध ;दृ80ंद्ध ़ ;16ं4द्ध ;32द्ध त्र दृ 438ं4 अतः गुणनपफल में ं4 का गुणांक दृ 438 है। उदाहरण 14 ;ग़ंद्धद के प्रसार में अंत से तवाँ पद ज्ञात कीजिए। हल ;ग ़ ंद्धद के प्रसार में ;द ़ 1द्ध पद हैं। पदों का अवलोकन करते हुए हम कह सकते हैं कि अंत में पहला पद प्रसार का अंतिम पद हैं अथार्त् ;द ़ 1द्धवाँ पद ;द ़ 1द्ध दृ ;1दृ1द्ध है। अंत से दूसरा पद, प्रसार का दवाँ पद दत्र;द ़ 1द्ध दृ ;2 दृ 1द्ध है। अंत से तीसरा पद, प्रसार का ;ददृ1द्धवाँ पद है और ददृ1 त्र ;द़1द्ध दृ ;3 दृ 1द्धण् इसी प्रकार, अंत से तवाँ पद, प्रसार का ख्;द़1द्ध दृ ;त दृ 1द्ध,वाँ पद अथार्त्् ;ददृ त ़ 2द्धवाँ पद होगा। और प्रसार का ;ददृत़2द्धवाँ पद दब् गतदृ1 ंददृत़1 है।ददृत़1 1 ⎞18⎛उदाहरण 15 ⎜ 3 ग ़ 3 ⎟ ए ग झ 0 के प्रसार में ग से स्वतंत्रा पद ज्ञात कीजिए।⎝ 2 ग ⎠ हल प्रसार का व्यापक पद त18−त ⎛ 1 ⎞ ज् त़1 त्र 18ब्त ; 3 गद्ध⎜ 3 ⎟⎝ 2 ग⎠ 18−त 18 2 त 18 31 1813त्रब्तग ण् त्र ब्त ण्ग त 2त 2तण्ग3 क्योंकि हमें ग से स्वतंत्रा पद ज्ञात करना है अथार्त्् उस पद में ग नहीं है। 18 − 2तइसलिए 3 त्र0 या तत्र 9 1अतः अभीष्ट पद 18ब्9 है।29 ⎛ 3 ⎞उ उदाहरण 16 ⎜ ग− 2 ⎟ ए ग≠ 0ए जहाँ उएक प्रावृफत संख्या है, के प्रसार में पहले तीन पदों के⎝ ग ⎠ गुणांकों का योग 559 है। प्रसार में ग3 वाला पद ज्ञात कीजिए। ⎛ 3 ⎞उ हल ⎜ ग−⎟ के प्रसार के पहले तीन पदों के गुणांक उब्ए ;दृ3द्ध उब् और 9 उब् हैं।2 0 12⎝ ग ⎠ इसलिए दिए गए प्रतिबंध् के अनुसार उब्0 दृ3 उब्1़ 9 उब्2त्र 559ण् 9; 1द्ध उउ−या 1 दृ 3उ़ 2 त्र 559 इससे हमें उत्र 12 ;उएक प्रावृफत संख्या हैद्ध प्राप्त होता है। ⎛ 3 ⎞त 12ब् ग12दृत ⎜− 2 ⎟ 12ब् ण् ग12दृ3तअब ज् त्र त्र ;दृ3द्धत त़1त ⎝ ग ⎠ त क्योंकि हमें ग3 वाला पद चाहिए। अतः 12 दृ 3तत्र 3 या तत्र 3ण् इस प्रकार, अभीष्ट पद त्र 12ब्;दृ3द्ध3 ग3 अथार्त् दृ 5940 ग3 है।3 उदाहरण 17 यदि ;1़गद्ध34 के प्रसार में ;तदृ5द्धवें और ;2तदृ1द्धवें पदों के गुणांक समान हों त ज्ञात कीजिए। हल ;1़गद्ध34 के प्रसार में ;तदृ5द्धवें तथा ;2तदृ1द्धवें पदों के गुणांक क्रमशः 34ब् और 34ब् हैं।तदृ6 2तदृ2क्योंकि वे समान हैं, इसलिए 34ब् 34ब्त्र तदृ62तदृ2 यह तभी संभव है जबकि या तदृ 6 त्र 2तदृ 2 या तदृ6 त्र 34 दृ ;2तदृ 2द्ध हो। ख्इस तथ्य का प्रयोग करके कि यदि दब् त त्रदब् च हो तो त त्र च या त त्र ददृच, इसलिए, हमें त त्र दृ 4 या त त्र 14 प्राप्त हुआ परंतु त प्रावृफत संख्या है और त त्र दृ4 संभव नहीं है। अतः त त्र 14 अध्याय 8 पर विविध् प्रश्नावली 1ण् यदि ;ं ़ इद्धद के प्रसार में प्रथम तीन पद क्रमशः 729, 7290 तथा 30375 हों तो ंए इए और द ज्ञात कीजिए। 2ण् यदि ;3 ़ ंगद्ध9 के प्रसार में ग2 तथा ग3 के गुणांक समान हों, तो ं का मान ज्ञात कीजिए। 3ण् द्विपद प्रमेय का उपयोग करते हुए गुणनपफल ;1़2गद्ध6 ;1दृगद्ध7 में ग5 का गुणांक ज्ञात कीजिए। 4ण् यदि ं और इ भ्िान्न - भ्िान्न पूणा±क हों, तो सि( कीजिए कि ;ंद दृ इदद्ध का एक गुणनखंड ;ं दृ इद्धहै, जबकि द एक ध्न पूणा±क है। ख् संकेत ंद त्र ;ं दृ इ ़ इद्धद लिखकर प्रसार कीजिए।, 5ण् ;3 ़2 द्ध6 −;3 −2 द्ध6 का मान ज्ञात कीजिए। 22 2216ण् ;ं ़ं − ़ द्ध4 ;ं −ं −1द्ध4 का मान ज्ञात कीजिए। 7ण् ;0ण्99द्ध5 के प्रसार के पहले तीन पदों का प्रयोग करते हुए इसका निकटतम मान ज्ञात कीजिए। ⎛41 ⎞द 8ण् यदि ⎜2 ़4 ⎟के प्रसार में आरंभ से 5वें और अंत से 5वें पद का अनुपात 6 रू1 हो⎝ 3 ⎠तो द ज्ञात कीजिए। ⎛ ग 24 9ण् ⎜1 ़−⎞⎟ग ≠ 0 का द्विपद प्रमेय द्वारा प्रसार ज्ञात कीजिए।⎝ 2 ग ⎠10ण् ;3ग2 दृ 2ंग ़ 3ं2द्ध3 का द्विपद प्रमेय से प्रसार ज्ञात कीजिए। सारांश ऽ एक द्विपद का किसी भी ध्न पूणा±क द के लिए प्रसार द्विपद प्रमेय द्वारा किया जाता है। इस प्रमेय के अनुसार ंददृ2इ2ंण्इददृ1;ं ़ इद्धद त्र दब्0ंद ़ दब्1ंददृ1इ ़ दब्2 ़ ण्ण्ण़् दब् ददृ1 ़ दब् दइद ऽ प्रसार के पदों के गुणांकों का व्यवस्िथत क्रम पास्कल त्रिाभुज कहलाता है। ंददृतऽ ;ं ़ इद्धद के प्रसार का व्यापक पद ज्त्र दब्ण्इत है।त़1 त वाँ⎛ द ⎞ ऽ ;ं़इद्धद के प्रसार में, यदि द सम संख्या हो तो मध्य पद ⎜़1⎟ पद है और यदि⎝ 2 ⎠ वाँवाँ⎛ द ़1⎞⎛ द ़1 ⎞ द विषम संख्या है तो दो मध्य पद ⎜⎟ तथा ⎜़1⎟ हैं।⎝ 2 ⎠⎝ 2 ⎠ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि प्राचीन भारतीय गण्िातज्ञ ;ग़लद्धदए 0 ≤ द ≤ 7, के प्रसार में गुणांकों को जानते थे। इर्सा पूवर् दूसरी शताब्दी में पिंगल ने अपनी पुस्तक छंद शास्त्रा ;200इर्॰ पू॰द्ध में इन गुणांकों को एक आवृफति, जिसे मेरुप्रस्त्रा कहते हैं, के रूप में दिया था। 1303इर्॰ में चीनी गण्िातज्ञ ब्ीन.ेीप.ापम के कायर् में भी यह त्रिाभुजाकार विन्यास पाया गया। 1544 के लगभग जमर्न गण्िातज्ञ डपबींमस ैजपचमस ;1486.1567 इर्॰द्ध ने सवर्प्रथम ‘द्विपद गुणांक’ शब्द को प्रारंभ किया। ठवउइमससप ;1572 इर्॰द्ध ने भी, द त्र 1ए2ए ण्ण्ण्ए 7 के लिए तथा व्नहीजतमक ;1631 इर्॰द्ध ने द त्र 1ए 2एण्ण्ण्ए 10 के लिए, ;ं ़ इद्धद के प्रसार में गुणांकों को बताया। पिंगल के मेरुप्रस्त्रा के समान थोड़े परिवतर्न के साथ लिखा हुआ अंकगण्िातीय त्रिाभुज जो पास्कल त्रिाभुज के नाम से प्रचलित है, यद्यपि बहुत बाद में प्रफांसीसी मूल के गण्िातज्ञ ठसंपेम च्ंेबंस ;1623दृ1662 इर्॰द्ध ने बनाया। उन्होंने द्विपद प्रसार के गुणांकों को निकालने के लिए त्रिाभुज का प्रयोग किया। द के पूणा±क मानों के लिए द्विपद प्रमेय का वतर्मान स्वरूप पास्कल द्वारा लिख्िात पुस्तक ज्तंजम कन जतपंदहम ंतपजीउमजपब में प्रस्तुत हुआ जो 1665 में उनकी मृत्यु के बाद प्रकाश्िात हुइर्। कृ ऽ कृ

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Ganit





अध्याय 8

द्विपद प्रमेय (Binomial Theorem)

"  Mathematics is a most exact science and its conclusions are capable of absolute proofs. – C.P. Steinmetz "

8.1 भूमिका (Introduction)

Img01

पिछली कक्षाओं में हमने सीखा है कि किस प्रकार a + b तथा  a b जैसे द्विपदों का वर्ग व घन ज्ञात करते हैं। इनके सूत्रों का प्रयोग करके हम संख्याओं के वर्गों व घनों का मान ज्ञात कर सकते हैं जैसे (98)2 = [(100 – 2)]2, (999)3 = [(1000 – 1)3], इत्यादि।

फिर भी, अधिक घात वाली संख्याओं जैसे (98)5, (101)6 इत्यादि की गणना, क्रमिक गुणनफल द्वारा अधिक जटिल हो जाती है। इस जटिलता को द्विपद प्रमेय द्वारा दूर किया गया।

इससे हमें (a + b)n के प्रसार की आसान विधि प्राप्त होती है जहाँ घातांक n एक पूर्णांक या परिमेय संख्या है। इस अध्याय में हम केवल धन पूर्णांकों के लिए द्विपद प्रमेय का अध्ययन करेंगें।

8.2 धन पूर्णांकों के लिए द्विपद प्रमेय (Binomial Theorem for Positive Integral Indices)

आइए पूर्व में की गई निम्नलिखित सर्वसमिकाओं पर हम विचार करेंः

(a + b)0 = 1; a + b 0

(a + b)1 = a + b

(a + b)2 = a2 + 2ab + b2

(a + b)3 = a3 + 3a2b + 3ab2 + b3

(a + b)4 = (a + b)3 (a + b) = a4 + 4a3b + 6a2b2 + 4ab3 + b4

इन प्रसारों में हम देखते हैं कि

(i) प्रसार में पदों की कुल संख्या, घातांक से 1 अधिक है। उदाहरणतः (a+ b)2 के प्रसार में (a + b)2 का घात 2 है जबकि प्रसार में कुल पदों की संख्या 3 है।

(ii) प्रसार के उत्तरोत्तर पदों में प्रथम a की घातें एक के क्रम से घट रही हैं जबकि द्वितीय राशि b की घातें एक के क्रम से बढ़ रही हैं।

(iii) प्रसार के प्रत्येक पद में a तथा b की घातों का योग समान है और a + b की घात के बराबर है।

अब हम a + b के उपरोक्त विस्तारों में विभिन्न पदों के गुणांकों को निम्न प्रकार व्यवस्थित करते हैं (आकृति 8.1)

आकृति 8-1

क्या हम इस सारणी में अगली पंक्ति लिखने के लिए किसी प्रतिरूप का अवलोकन करते हैं? हाँ। यह देखा जा सकता है कि घात 1 की पंक्ति में लिखे 1 और 1 का योग घात 2 की पंक्ति के लिए 2 देता है। घात 2 की पंक्ति में लिखे 1 और 2 तथा 2 और 1 का योग घात 3 की पंक्ति के लिए 3 और 3 देता है और आगे भी इसी प्रकार 1 पुनः प्रत्येक पंक्ति के प्रारंभ व अंत में स्थित है। इस प्रक्रिया को किसी भी इच्छित घात तक के लिए लिखा जा सकता है।

हम आकृति 8.2 में दिए गए प्रतिरूप को कुछ और पंक्तियाँ लिखकर आगे बढ़ा सकते हैं।

आकृति 8ण्2 पास्कल त्रिभुज

पास्कल त्रिभुज

आकृति 8.2 में दी गई सारणी को अपनी रूचि के अनुसार किसी भी घात तक बढ़ा सकते हैं। यह संरचना एक एेसे त्रिभुज की तरह लगती है जिसके शीर्ष पर 1 लिखा है और दो तिरछी भुजाएं नीचे की ओर जा रही हैं। संख्याओं का व्यूह फ्रांसीसी गणितज्ञ Blaise Pascal के नाम पर पास्कल त्रिभुज के नाम से प्रसिद्ध है। इसे पिंगल के मेरुप्रस्त्र के नाम से भी जाना जाता है।

एक द्विपद की उच्च घातों का प्रसार भी पास्कल के त्रिभुज के प्रयोग द्वारा संभव है। आइए हम पास्कल त्रिभुज का प्रयोग कर के (2x+3y)5 का विस्तार करें। घात 5 की पंक्ति हैः

1   5         10         10        5           1

इस पंक्ति का, और हमारे परीक्षणों (i), (ii), (iii), का प्रयोग करते हुए हम पाते हैं कि

(2x+3y)5 = (2x)5 + 5(2x)4 (3y) + 10(2x)3 (3y)2 +10 (2x)2 (3y)3 + 5(2x)(3y)4 + (3y)5

= 32x5 + 240x4y + 720x3y2 + 1080x2y3 + 810xy4 + 243y5.

अब यदि हम (2x+3y)12, का प्रसार ज्ञात करना चाहें तो पहले हमें घात 12 की पंक्ति ज्ञात करनी होगी। इसे पास्कल त्रिभुज की पंक्तियों को घात 12 तक की सभी पंक्तियाँ लिख कर प्राप्त किया जा सकता है। यह थोड़ी सी लंबी विधि है। जैसा कि आप देखते हैं कि और भी उच्च घातों का विस्तार करने के लिए विधि और अधिक कठिन हो जाएगी।

अतः हम एक एेसा नियम ढूँढने का प्रयत्न करते हैं जिससे पास्कल त्रिभुज की एेच्छिक पंक्ति से पहले की सारी पंक्तियों को लिखे बिना ही, द्विपद के किसी भी घात का विस्तार ज्ञात कर सकें।

इसके लिए हम पहले पढ़ चुके ‘संचय’ के सूत्रों का प्रयोग करके, पास्कल त्रिभुज में लिखी संख्याओं को पुनः लिखते हैं। हम जानते हैं कि

, 0 r n जहाँ n ऋणेतर पूर्णांक है।

अब पास्कल त्रिभुज को पुनः इस प्रकार लिख सकते हैं (आकृति 8ण्3)

आकृति 8.3 पास्कल त्रिभुज

उपरोक्त प्रतिरूप (pattern) को देखकर, पूर्व पंक्तियों को लिखे बिना हम पास्कल त्रिभुज की किसी भी घात के लिए पंक्ति को लिख सकते हैं। उदाहरणतः घात 7 के लिए पंक्ति होगीः

7C0 7C1 7C2 7C3 7C4 7C5 7C6 7C7

इस प्रकार, इस पंक्ति और प्रेक्षण (i), (ii) (iii), का प्रयोग करके हम पाते हैं,

(a+b)7 = 7C0 a7 + 7C1a6b + 7C2a5b2 + 7C3a4b3 + 7C4a3b4 + 7C5a2b5 + 7C6ab6 + 7C7b7

इन प्रेक्षणों का उपयोग करके एक द्विपद के किसी ऋणेतर पूर्णांक n के लिए प्रसार दिखाया जा सकता है। अब हम एक द्विपद के किसी भी (ऋणेतर पूर्णांक) घात के प्रसार को लिखने की अवस्था में हैं।

8.2.1 द्विपद प्रमेय किसी धन पूर्णांक n के लिए (Binomial theorem for any positive integer n)

(a + b)n = nC0an + nC1an-1b + nC2an-2 b2 + ...+ nCn-1a.bn-1 + nCnbn

उपपत्ति इस प्रमेय की उपपत्ति गणितीय आगमन सिद्धांत द्वारा प्राप्त की जाती है।

मान लीजिए कथन P(n) निम्नलिखित हैः

P(n) : (a + b)n = nC0an + nC1an-1b + nC2an-2b2 + ...+ nCn-1a.bn-1 + nCnbn

n = 1 लेने पर

P (1) : (a + b)1 = 1C0a1 + 1C1b1 = a + b

अतः P (1) सत्य है।

मान लीजिए कि P (k), किसी धन पूर्णांक k के लिए सत्य है, अर्थात्

(a+b)k = kC0ak + kC1ak-1b + kC2ak-2b2 + ...+ kCkbk ... (1)

हम सिद्ध करेंगें कि P(k+1) भी सत्य है अर्थात्,

(a+b)k+1 = k+1C0ak+1 + k+1C1akb + k+1C2ak-1b2 + ...+ k+1Ck+1bk+1

अब,

(a+b)k+1 = (a+b) (a+b)k

= (a+b) (kC0ak + kC1ak-1b + kC2ak–2b2+... +kCk-1abk-1 + kCkbk) [(1) से]

= kC0ak+1 + kC1akb + kC2ak–1b2 +...+ kCk–1a2bk–1 + kCkabk + kC0akb

+ kC1ak-1b2 + kC2ak–2b3+ ... + kCk-1abk + kCkbk+1 [वास्त्विक गुणा द्वारा]

= kC0ak+1 + (kC1+kC0)akb + (kC2+kC1)ak-1b2 + ...

+ (kCk+kCk-1) abk + kCkbk+1 (समान पदों के समूह बनाकर)

= k+1C0ak+1 + k+1C1akb + k+1C2 ak–1b2 + ...+ k+1Ckabk + k+1Ck+1 bk+1

(k+1C0= 1, kCr + kCr-1= k+1Cr और kCk = 1= k+1Ck+1 का प्रयोग करके)

इससे सिद्ध होता है कि यदि P(k) भी सत्य है तो P (k+1) सत्य है। इसलिए, गणितीय आगमन सिद्धांत द्वारा, प्रत्येक धन पूर्णांक n के लिए P(n) सत्य है।

हम इस प्रमेय को (x + 2)6 के प्रसार का उदाहरण लेकर समझते हैं।

(x+2)6 = 6C0x6 + 6C1x5.2 + 6C2x422 + 6C3x3.23 + 6C4x2.24 + 6C5x.25 + 6C6.26

= x6 + 12x5 +60x4 + 160x3 + 240x2 + 192x + 64

इस प्रकार, (x+2)6 = x6 + 12x5 +60x4 + 160x3 + 240x2 + 192x + 64.

प्रेक्षण

1. nC0anb0 + nC1an-1b1 + ...+ nCran–rbr + ...+nCnan–nbn, जहाँ b0 = 1 = an–n

का संकेतन है।

अतः इस प्रमेय को इस प्रकार भी लिख सकते हैं।

2. द्विपद प्रमेय में आने वाले गुणांक nCr को द्विपद गुणांक कहते हैं।

3. (a+b)n के प्रसार में पदों की संख्या (n+1) है अर्थात्् घातांक से 1 अधिक है।

4. प्रसार के उत्तरोत्तर पदों में, a की घातें एक के क्रम से घट रही हैं। यह पहले पद में n, दूसरे पद में (n–1) और फिर इसी प्रकार अंतिम पद में शून्य है। ठीक उसी प्रकार b की घातें एक के क्रम से बढ़ रही हैं, पहले पद में शून्य से शुरू होकर, दूसरे पद में 1 और फिर इसी प्रकार अंतिम पद में n पर समाप्त होती हैं।

5. (a+b)n, के प्रसार में, a तथा b की घातों का योग, पहले पद में n + 0 = n, दूसरे पद में (n – 1) + 1 = n और इसी प्रकार अंतिम पद में 0 + n = n है। अतः यह देखा जा सकता है कि प्रसार के प्रत्येक पद में a तथा b की घातों का योग n है।

8.2.2 (a + b)n के प्रसार की कुछ विशिष्ट स्थितियाँ (Some special cases)

(i) a = x तथा b = –y, लेकर हम पाते हैं;

(x y)n = [x + (–y)]n

= nC0xn + nC1xn-1(–y) + nC2xn–2(–y)2 + nC3xn–3(–y)3 + ... + nCn (–y)n

= nC0xn nC1xn–1y + nC2xn–2y2 nC3xn-3y3 + ... + (–1)n nCn yn

इस प्रकार (xy)n = nC0xn nC1xn–1 y + nC2xn–2 y2 + ... + (–1)n nCn yn

इसका प्रयोग करके हम पाते हैं,

(x–2y)5 = 5C0x5 5C1x4 (2y) + 5C2x3 (2y2)

5C3x2 (2y)3 + 5C4 x(2y)4 5C5(2y)5

= x5 –10x4y + 40x3y2 – 80x2y3 + 80xy4 – 32y5

(ii) a = 1 तथा b = x, लेकर हम पाते हैं कि,

(1+x)n = nC0(1)n + nC1(1)n-1x + nC2(1)n-2x2 + ... + nCnxn

= nC0 + nC1x + nC2x2 + nC3x3 + ... + nCnxn

इस प्रकार, (1+x)n = nC0 + nC1x + nC2x2 + nC3x3 + ... + nCnxn

विशेषत x = 1, के लिए हम पाते हैं,

2n = nC0 + nC1 + nC2 + ... + nCn.

(iii) a = 1 तथा b = – x, लेकर हम पाते हैं,

(1– x)n = nC0 nC1x + nC2x2 – ... + (–1)n nCnxn

विशेषत x = 1, के लिए हम पाते हैं,

0 = nC0 nC1 + nC2 – ... + (–1)n nCn

उदाहरण 1 , x 0 का प्रसार ज्ञात कीजिएः

हल द्विपद प्रमेय का प्रयोग करके हमें प्राप्त होता है,

= 4C0(x2)4 + 4C1(x2)3 + 4C2(x2)2 + 4C3(x2) + 4C4

= x8 + 4.x6 . + 6.x4 . + 4.x2.+

= x8 + 12x5 + 54x2 +

उदाहरण 2 (98)5 की गणना कीजिए।

हम 98 को दो संख्याओं के योग या अंतर में व्यक्त करते हैं जिनकी घात ज्ञात करना सरल हो, फिर द्विपद प्रमेय का प्रयोग करते हैं।

98 को 100 – 2 लिखने पर,

(98)5 = (100 – 2)5

= 5C0 (100)5 5C1 (100)4.2 + 5C2 (100)322 5C3 (100)2 (2)3

+ 5C4 (100) (2)4 5C5 (2)5

= 10000000000 – 5 × 100000000 × 2 + 10 × 1000000 × 4 – 10 ×10000
× 8 + 5 × 100 × 16 – 32

= 10040008000 – 1000800032

= 9039207968

उदाहरण 3 (1.01)1000000 और 10,000 में से कौन सी संख्या बड़ी है?

हल 1.01 को दो पदों में व्यक्त करके द्विपद प्रमेय के पहले कुछ पदों को लिखकर हम पाते हैं

(1.01)1000000 = (1 + 0.01)1000000

= 1000000C0 + 1000000C1(0.01) + अन्य धनात्मक पद

= 1 + 1000000 × 0.01 + अन्य धनात्मक पद

= 1 + 10000 + अन्य धनात्मक पद

> 10000

अतः (1.01)1000000 > 10000

उदाहरण 4 द्विपद प्रमेय का प्रयोग करके सिद्ध कीजिए कि 6n–5n को जब 25 से भाग दिया जाए तो सदैव 1 शेष बचता है।

हल दो सख्याओं a तथा b के लिए यदि हम संख्याएँ q तथा r प्राप्त कर सकें ताकि a = bq + r तो हम कह सकते हैं कि a को b से भाग करने पर q भजनफल तथा r शेषफल प्राप्त होता है। इसी प्रकार यह दर्शाने के लिए कि 6n–5n को 25 से भाग करने पर 1 शेष बचता है, हमें सिद्ध करना हैः 6n–5n = 25k+1 जहाँ k एक प्राकृत संख्या है।

हम जानते हैंः (1 + a)n = nC0 + nC1a + nC2a2 + ... + nCnan

a = 5, के लिए हमें प्राप्त होता है,

(1 + 5)n = nC0 + nC15 + nC252 + ... + nCn5n

या (6)n = 1+5n + 52.nC2 + 53.nC3 + ... + 5n

या 6n – 5n = 1+52 (nC2 + nC35 + ... + 5n-2)

या 6n – 5n = 1+ 25 (nC2 + 5 .nC3 + ... + 5n-2)

या 6n – 5n = 25k+1 जहाँ k= nC2 + 5 .nC3 + ... + 5n–2.

यह दर्शाता है कि जब 6n – 5n को 25 से भाग किया जाता है तो शेष 1 बचता है।

प्रश्नावली 8.1

प्रश्न 1 से 5 तक प्रत्येक व्यंजक का प्रसार कीजिएः 5.

1. (1–2x)5 

2.  

3. (2x – 3)6

4.  

5.

द्विपद प्रमेय का प्रयोग करके निम्नलिखित का मान ज्ञात कीजिए

6. (96)3 

7. (102)5 

8. (101)4 

9. (99)5

10. द्विपद प्रमेय का प्रयोग करते हुए बताइए कौन-सी संख्या बड़ी है (1.1)10000 या 1000.

11. (a+b)4 – (ab)4 का विस्तार कीजिए। इसका प्रयोग करके का मान ज्ञात कीजिए।

12. (x+1)6 + (x–1)6 का मान ज्ञात कीजिए। इसका प्रयोग करके या अन्यथा (+1)6 + ( –1)6 का मान ज्ञात कीजिए।

13. दिखाइए कि 9n+1 – 8n – 9, 64 से विभाज्य है जहाँ n एक धन पूर्णांक है।

14. सिद्ध कीजिए कि

8.3 व्यापक एवं मध्य पद (General and Middle Terms)

1. (a + b)n के द्विपद प्रसार में हमने देखा है कि पहला पद nC0an है, दूसरा पद nC1an–1b है, तीसरा पद nC2an–2b2 है और आगे इसी प्रकार। इन उत्तरोत्तर पदों के प्रतिरूपों में हम कह सकते हैं कि (r + 1)वां पद nCranrbr है। (a + b)n का (r + 1)वां पद, व्यापक पद (General term) कहलाता है। इसे Tr+1 द्वारा लिखते हैं। अतः Tr+1 = nCr an – rbr

2. (a + b)n के प्रसार के मध्य पद के बारे में हम पाते हैं

(i) यदि n सम (Even) संख्या है तो प्रसार के पदों की संख्या (n+1) होगी। क्योंकि n एक सम संख्या हैं इसलिए n + 1 एक विषम संख्या होगी। इसलिए मध्य पद वाँ अर्थात् वाँ पद है।

उदाहरणार्थ, (x + 2y)8 के प्रसार में मध्य पद अर्थात् 5वाँ पद है।

(ii) यदि n विषम संख्या (odd) है तो (n+1) सम संख्या है। इसलिए, प्रसार के दो मध्य पद तथा होंगे। अतः (2xy)7 के प्रसार में मध्य पद वाँ अर्थात्् चौथा और वाँ अर्थात् पाँचवाँ पद है।

3. , जहाँ x 0 है, के प्रसार में मध्य पद अर्थात् (n+1)वाँ पद है, क्योंकि 2n सम संख्या है।

यह 2nCnxn = 2nCn (अचर) द्वारा दिया जाता है।

यह पद x से स्वतंत्र पद (Independent Term) या अचर पद (Constant term) कहलाता है।

उदाहरण 5 यदि (2+a)50 के द्विपद प्रसार का सत्रहवाँ और अट्ठारहवाँ पद समान हो तो a का मान ज्ञात कीजिए।

हल (x+y)n के द्विपद प्रसार में (r+1)वाँ पद हैः Tr+1 = nCrxnryr

सत्रहवें पद के लिए, r + 1 = 17, या r = 16

इसलिए T17 = T16+! = 50C16 (2)50–16 a16

= 50C16 234 a16.

इसी प्रकार T18 = 50C17 233 a17

हमें ज्ञात है कि T17 = T18

इसलिए, 50C16 (2)34 a16 = 50C17 (2)33 a17

या Img02

या a = = = 1

उदाहरण 6 दिखाइए कि (1+x)2n के प्रसार में मध्य पद है, जहाँ n एक धन पूर्णांक है।

हल क्योंकि 2n एक सम संख्या है, इसलिए (1+x)2n का मध्य पद वाँ अर्थात्् (n+1)वाँ पद है।

इस प्रकार, मध्य पद Tn+1 = 2nCn(1)2nn(x)n = 2nCnxn =

=

=

Img03. xn

Img04

Img05

=

उदाहरण 7 (x+2y)9 के प्रसार में x6y3 का गुणांक ज्ञात कीजिए।

हल मान लीजिए (x+2y)9 के प्रसार में x6y3, (r+1)वें पद में आता है।

अब Tr+1 = 9Cr x9– r (2y)r = 9Cr 2 r . x9 – r . y r

Tr+1 तथा x6y3 में x और y के घातांकों की तुलना करने पर हमें प्राप्त होता है, r = 3.

इसलिए, x6y3 का गुणांक = 9C3 2 3 = = = 672.

उदाहरण 8 (x + a)n के द्विपद प्रसार के दूसरे, तीसरे और चौथे पद क्रमशः 240, 720 और 1080 हैं। x, a तथा n ज्ञात कीजिए।

हल हमें ज्ञात है कि दूसरा पद T2 = 240

परंतु T2 = nC1xn–1 . a

इसलिए nC1xn–1 . a = 240 ... (1)

इसी प्रकार nC2xn–2 a2 = 720 ... (2)

और nC3xn–3 a3 = 1080 ... (3)

(2) को (1) से भाग करने पर हमें प्राप्त होता है,

या

या ... (4)

(3) को (2), से भाग करने पर,

... (5)

(4) (5) से, या n = 5

अब (1) से, 5x4a = 240 और (4) से,

इन समीकरणों को हल करने से हम x = 2 और a = 3 प्राप्त करते हैं।

उदाहरण 9 यदि (1+a)n के प्रसार में तीन क्रमागत पदों के गुणांक 1: 7: 42 के अनुपात में हैं तो n का मान ज्ञात कीजिए।

हल मान लीजिए (1 + a)n के प्रसार में (r – 1)वाँ, rवाँ तथा (r + 1)वाँ पद, तीन क्रमागत पद हैं।

(r – 1)वाँ पद nCr–2ar–2 है तथा इसका गुणांक nCr–2 है। इसी प्रकार rवें तथा (r + 1)वें पदों के गुणांक क्रमशः nCr–1 nCr हैं। क्योंकि गुणांको का अनुपात 1: 7: 42 है इसलिए हमें प्राप्त होता है,

अर्थात् n – 8r + 9 = 0 ... (1)

और अर्थात् n – 7r + 1 = 0 ... (2)

समीकरण (1) व (2) को हल करने पर हमें n = 55 प्राप्त होता है।

प्रश्नावली 8.2

गुणांक ज्ञात कीजिएः

1. (x + 3)8 में x5 का 

2. (a – 2b)12 में a5b7 का

निम्नलिखित के प्रसार में व्यापक पद लिखिएः

3. (x2 y)6 

4. (x2 yx)12, x 0

5. (x – 2y)12 के प्रसार में चौथा पद ज्ञात कीजिए।

6. के प्रसार में 13वाँ पद ज्ञात कीजिए।

निम्नलिखित प्रसारों में मध्य पद ज्ञात कीजिएः

7.  

8.

9. (1 + a)m+n के प्रसार में सिद्ध कीजिए कि am तथा an के गुणांक बराबर हैं।

10. यदि (x + 1)n के प्रसार में (r – 1)वाँ , rवाँ और (r + 1)वाँ पदों के गुणांकों में 1: 3: 5 का अनुपात हो, तो n तथा r का मान ज्ञात कीजिए।

11. सिद्ध कीजिए कि (1 + x)2n के प्रसार में xn का गुणांक, (1 + x)2n–1 के प्रसार में xn के गुणांक का दुगना होता है।

12. m का धनात्मक मान ज्ञात कीजिए जिसके लिए (1 + x)m के प्रसार में x2 का गुणांक 6 हो।

विविध उदाहरण

उदाहरण 10 के प्रसार में x से स्वतंत्र पद ज्ञात कीजिए।

हल हम पाते हैं कि Tr+1 =

=

=

x से स्वतंत्र पद के लिए, पद में x का घातांक 0 (होना चाहिए)। अतः 12 – 3r = 0 या r = 4

इस प्रकार 5वाँ पद x से स्वतंत्र है। इसलिए अभीष्ट पद = (–1)4 6C4

उदाहरण 11 यदि (1 + a)n के प्रसार में ar-1, ar तथा ar+1 के गुणांक समांतर श्रेणी में हों तो सिद्ध कीजिए कि n2 n(4r + 1) + 4r2–2 = 0

हल हम जानते हैं कि (1 + a)n के प्रसार में (r + 1)वाँ पद nCrar है। इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि ar, (r + 1)वें पद में आता है। और इसका गुणांक nCr है। इसलिए ar–1, ar तथा ar+1 के गुणांक क्रमशः nCr–1 , nCr तथा nCr+1 हैं। परंतु ये गुणांक समांतर श्रेणी में हैं। इसलिए

nCr–1+ nCr+1 = 2nCr

या Img06

या Img07

Img08

या

या

या

या r(r + 1) + (n r) (n – r + 1) = 2 (r + 1) (n r + 1)

या r2 + r + n2 nr + n nr + r2 r = 2(nr r2 + r + n r + 1)

या n2 – 4nr n + 4r2 – 2 = 0

या n2 n (4r + 1) + 4r2 – 2 = 0

उदाहरण 12 दिखाइए कि (1 + x)2n के प्रसार में मध्य पद का गुणांक, (1 + x)2n–1 के प्रसार में दोनों मध्य पदों के गुणांकों के योग के बराबर होता है।

हल क्योंकि 2n एक सम संख्या है इसलिए (1+x)2n के प्रसार में केवल एक मध्य पद है जो कि वाँ अर्थात् (n + 1)वाँ पद है।

अब (n+1)वाँ पद 2nCnxn है जिसका गुणांक 2nCn है।

इसी प्रकार, (2n–1) एक विषम संख्या है इसलिए (1 + x)2n–1 के प्रसार के दो मध्य पद वाँ और वाँ अर्थात् nवाँ और (n + 1) वाँ पद है।

इन पदों के गुणांक क्रमशः 2n–1Cn–1 और 2n–1Cn हैं।

इस प्रकार 2n–1Cn–1 + 2n–1Cn= 2nCn [क्योंकि nCr–1+ nCr = n+1Cr]

यही अभीष्ट है।

उदाहरण 13 द्विपद प्रमेय का उपयोग करते हुए गुणनफल (1 + 2a)4 (2 – a)5 में a4 का गुणांक ज्ञात कीजिए।

हल सबसे पहले हम गुणनफल के प्रत्येक में द्विपद प्रमेय गुणनखंड प्रयोग कर प्रसारण करते हैं। इस प्रकार

(1+2a)4 = 4C0+4C1 (2a) + 4C2 (2a)2 + 4C3 (2a)3+ 4C4 (2a)4

= 1+4 (2a)+6 (4a2) + 4 (8a3) + 16a4.

= 1+8 a+24a2+3 2a3 + 16a4

और (2–a)5 = 5C0 (2)5 5C1 (2)4 (a) + 5C2 (2)3 (a)2 5C3 (2)2 (a)3

+ 5C4 (2) (a)4 5C5 (a)5

= 32 – 80a + 80a2 – 40a3+10a4 a5

इस प्रकार, (1+2a)4 (2–a)5

= (1+8a + 24a2 + 32a3 + 16a4) (32–80a + 80a2 – 40a3 + 10a4 a5)

हमें संपूर्ण गुणा करने तथा सभी पदों के लिखने की आवश्यकता नहीं है। हम केवल वही पद लिखते हैं जिनमें a4 आता है। यदि ar.a4r = a4 तो यह किया जा सकता है। जिन पदों में a4 आता है, वे हैंः

1.10a4 + (8a) (–40a3) + (24a2) (80a2) + (32a3) (–80a) + (16a4) (32) = – 438a4

अतः गुणनफल में a4 का गुणांक – 438 है।

उदाहरण 14 (x+a)n के प्रसार में अंत से rवाँ पद ज्ञात कीजिए।

हल (x + a)n के प्रसार में (n + 1) पद हैं। पदों का अवलोकन करते हुए हम कह सकते हैं कि अंत में पहला पद प्रसार का अंतिम पद हैं अर्थात् (n + 1)वाँ पद (n + 1) – (1–1) है। अंत से दूसरा पद, प्रसार का nवाँ पद n=(n + 1) – (2 – 1) है। अंत से तीसरा पद, प्रसार का (n–1)वाँ पद है और
n–1 = (n+1) – (3 – 1). इसी प्रकार, अंत से rवाँ पद, प्रसार का [(n+1) – (r – 1)]वाँ पद अर्थात्् (n r + 2)वाँ पद होगा।

और प्रसार का (nr+2)वाँ पद nCnr+1 xr–1 anr+1 है।

उदाहरण 15 , x > 0 के प्रसार में x से स्वतंत्र पद ज्ञात कीजिए।

हल प्रसार का व्यापक पद

Tr+1 =

= =

क्योंकि हमें x से स्वतंत्र पद ज्ञात करना है अर्थात् उस पद में x नहीं है।

इसलिए या r = 9

अतः अभीष्ट पद 18C9 है।

उदाहरण 16 , x 0, जहाँ m एक प्राकृत संख्या है, के प्रसार में पहले तीन पदों के गुणांकों का योग 559 है। प्रसार में x3 वाला पद ज्ञात कीजिए।

हल के प्रसार के पहले तीन पदों के गुणांक mC0 , (–3) mC1 और 9 mC2 हैं।

इसलिए दिए गए प्रतिबंध के अनुसार mC0 –3 mC1+ 9 mC2= 559.

या 1 – 3m + इससे हमें m = 12 (m एक प्राकृत संख्या है) प्राप्त होता है।

अब Tr+1 = 12Cr x12–r = 12Cr (–3)r . x12–3r

क्योंकि हमें x3 वाला पद चाहिए। अतः 12 – 3r = 3 या r = 3.

इस प्रकार, अभीष्ट पद = 12C3 (–3)3 x3 अर्थात् – 5940 x3 है।

उदाहरण 17 यदि (1+x)34 के प्रसार में (r–5)वें और (2r–1)वें पदों के गुणांक समान हों r ज्ञात कीजिए।

हल (1+x)34 के प्रसार में (r–5)वें तथा (2r–1)वें पदों के गुणांक क्रमशः 34Cr–6 और 34C2r–2 हैं। क्योंकि वे समान हैं, इसलिए

34Cr–6 = 34C2r–2

यह तभी संभव है जबकि या r – 6 = 2r – 2 या r–6 = 34 – (2r – 2) हो।

[इस तथ्य का प्रयोग करके कि यदि nCr=nCp हो तो r = p या r = np]

इसलिए, हमें r = – 4 या r = 14 प्राप्त हुआ परंतु r प्राकृत संख्या है और r = –4 संभव नहीं है।
अतः
r = 14

अध्याय 8 पर विविध प्रश्नावली

1. यदि (a + b)n के प्रसार में प्रथम तीन पद क्रमशः 729, 7290 तथा 30375 हों तो a, b, और n ज्ञात कीजिए।

2. यदि (3 + ax)9 के प्रसार में x2 तथा x3 के गुणांक समान हों, तो a का मान ज्ञात कीजिए।

3. द्विपद प्रमेय का उपयोग करते हुए गुणनफल (1+2x)6 (1–x)7 में x5 का गुणांक ज्ञात कीजिए।

4. यदि a और b भिन्न-भिन्न पूर्णांक हों, तो सिद्ध कीजिए कि (an bn) का एक गुणनखंड
(
a b)है, जबकि n एक धन पूर्णांक है।

[ संकेत an = (a b + b)n लिखकर प्रसार कीजिए।]

5. का मान ज्ञात कीजिए।

6. का मान ज्ञात कीजिए।

7. (0.99)5 के प्रसार के पहले तीन पदों का प्रयोग करते हुए इसका निकटतम मान ज्ञात कीजिए।

8. यदि के प्रसार में आरंभ से 5वें और अंत से 5वें पद का अनुपात हो तो n ज्ञात कीजिए।

9. x 0 का द्विपद प्रमेय द्वारा प्रसार ज्ञात कीजिए।

10. (3x2 – 2ax + 3a2)3 का द्विपद प्रमेय से प्रसार ज्ञात कीजिए।

सारांश

  • एक द्विपद का किसी भी धन पूर्णांक n के लिए प्रसार द्विपद प्रमेय द्वारा किया जाता है। इस प्रमेय के अनुसार (a + b)n = nC0an + nC1an–1b + nC2an–2b2 + ...+ nCn–1a.bn–1 + nCnbn
  • प्रसार के पदों के गुणांकों का व्यवस्थित क्रम पास्कल त्रिभुज कहलाता है।
  • (a + b)n के प्रसार का व्यापक पद Tr+1 = nCran–r.br है।
  • (a+b)n के प्रसार में, यदि n सम संख्या हो तो मध्य पद वाँ पद है और यदि n विषम संख्या है तो दो मध्य पद वाँ तथा वाँ हैं।

एेतिहासिक पृष्ठभूमि

प्राचीन भारतीय गणितज्ञ (x+y)n, 0 n 7, के प्रसार में गुणांकों को जानते थे। ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में पिंगल ने अपनी पुस्तक छंद शास्त्र (200ई॰ पू॰) में इन गुणांकों को एक आकृति, जिसे मेरुप्रस्त्र कहते हैं, के रूप में दिया था। 1303ई॰ में चीनी गणितज्ञ Chu-shi-kie के कार्य में भी यह त्रिभुजाकार विन्यास पाया गया। 1544 के लगभग जर्मन गणितज्ञ Michael Stipel (1486-1567 ई॰) ने सर्वप्रथम ‘द्विपद गुणांक’ शब्द को प्रारंभ किया। Bombelli (1572 ई॰) ने भी, n = 1,2, ..., 7 के लिए तथा Oughtred (1631 ई॰) ने n = 1, 2,..., 10 के लिए, (a + b)n के प्रसार में गुणांकों को बताया। पिंगल के मेरुप्रस्त्र के समान थोड़े परिवर्तन के साथ लिखा हुआ अंकगणितीय त्रिभुज जो पास्कल त्रिभुज के नाम से प्रचलित है, यद्यपि बहुत बाद में फ्रांसीसी मूल के गणितज्ञ Blaise Pascal
(1623–1662
ई॰) ने बनाया। उन्होंने द्विपद प्रसार के गुणांकों को निकालने के लिए त्रिभुज का प्रयोग किया।

n के पूर्णांक मानों के लिए द्विपद प्रमेय का वर्तमान स्वरूप पास्कल द्वारा लिखित पुस्तक Trate du triange arithmetic में प्रस्तुत हुआ जो 1665 में उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुई।

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