™डंजीमउंजपबे पे जीम फनममद व िैबपमदबमे ंदक ।तपजीउमजपब पे जीम फनममद व िडंजीमउंजपबेण् दृ ळ।न्ैै ऽ 5ण्1 भूमिका ;प्दजतवकनबजपवदद्ध पिछली कक्षाओं में हमने एक और दो चर की एक घातीय समीकरणों का तथा एक चर की द्विघातीय समीकरणों का अध्ययन किया है।हमने देखा है कि समीकरण ग2 ़ 1 त्र 0 का कोइर् वास्तविक हल नहींहै क्योंकि ग2 ़ 1 त्र 0 से हमें ग2 त्र दृ 1 प्राप्त होता है और प्रत्येक वास्तविक संख्या का वगर् श्रेणेतर होता है इसलिए वास्तविक संख्याप्रणाली को बृहद प्रणाली के रूप में बढ़ाने की आवश्यकता है जिससेकि हम समीकरण ग2 त्र दृ 1 का हल प्राप्त कर सकें। वास्तव में, मुख्यउद्देश्य समीकरण ंग2 ़ इग ़ ब त्र 0 का हल प्राप्त करना है, जहाँ क् त्र इ2 दृ 4ंब ढ 0 हैए जोकि वास्तविक संख्याओं की प्रणाली में संभव नहीं है। ;1805.1865 ।ण्क्ण्द्ध5ण्2 सम्िमश्र संख्याएँ ;ब्वउचसमग छनउइमतेद्ध हम कल्पना करें कि −1 संकेतन प से निरूपित है। तब हमें प2 त्र−1 प्राप्त होता है। इसका तात्पयर् है कि पए समीकरण ग2 ़ 1 त्र 0 का एक हल है। ं ़ पइ के प्रारूप की एक संख्या जहाँ ं और इ वास्तविक संख्याएँ हैं, एक सम्िमश्र संख्या 1 परिभाष्िात करती है। उदाहरण के लिए, 2 ़ प3ए ;दृ 1द्ध ़ प 3ए 4 ़प⎜⎛− ⎟⎞ सम्िमश्र संख्याएँ हैं।⎝11 ⎠ सम्िमश्र संख्या ्र त्र ं ़ पइ के लिए, ं वास्तविक भाग कहलाता है तथा त्म्र द्वारा निरूपित किया जाता है और इ काल्पनिक भाग कहलाता है तथा प्उ्र द्वारा निरूपित किया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि ्र त्र 2 ़ प5ए तब त्म्र त्र 2 और प्उ्र त्र 5 दो सम्िमश्र संख्याएँ ्र1 त्र ं ़ पइ तथा ्र2 त्र ब ़ पक समान होंगी यदि ं त्र ब और इ त्र कण् उदाहरण 1 यदि 4ग ़ प;3ग दृ लद्ध त्र 3 ़ प ;दृ 6द्धए जहाँ ग और ल वास्तविक संख्याएँ हैं, तब ग और ल ज्ञात कीजिए। हल हमें दिया है 4ग ़ प ;3ग दृ लद्ध त्र 3 ़ प ;दृ 6द्ध ण्ण्ण् ;पद्ध दोनों ओर के वास्तविक तथा काल्पनिक भागों को समान लेते हुए, हमें प्राप्त होता है, 4ग त्र 3ए 3ग दृ ल त्र दृ 6ए 3 33जिन्हें युगपत् हल करने पर, ग त्र 4 और ल त्र 4 5ण्3 सम्िमश्र संख्याओं का बीजगण्िात ;।सहमइतं व िब्वउचसमग छनउइमतेद्ध इस भाग में, हम सम्िमश्र संख्याओं के बीजगण्िात का विकास करेंगे। 5ण्3ण्1 दो सम्िमश्र, संख्याओं का योग ;।ककपजपवद व िजूव बवउचसमग दनउइमतेद्ध यदि ्र1 त्र ं ़ पइ और ्र2 त्र ब ़ पक कोइर् दो सम्िमश्र संख्याएँ हैं। तब ्र1 ़ ्र2 के योग को निम्नलिख्िात रूप से परिभाष्िात किया जाता हैः ्र ़ ्र त्र ;ं ़ बद्ध ़ प ;इ ़ कद्धए जो कि पुनः एक सम्िमश्र संख्या है।1 2उदाहरण के लिए, ;2 ़ प3द्ध ़ ;दृ 6 ़प5द्ध त्र ;2 दृ 6द्ध ़ प ;3 ़ 5द्ध त्र दृ 4 ़ प 8 सम्िमश्र संख्याओं के योग निम्नलिख्िात प्रगुणों को संतुष्ट करते हैं। ;पद्ध संवरक नियम दो सम्िमश्र संख्याओं का योगपफल एक सम्िमश्र संख्या होती है, अथार्त सारी सम्िमश्र सख्याओं ्रतथा ्र के लिए, ्र ़ ्र एक सम्िमश्र संख्या है।1212;पपद्ध क्रम विनिमय नियम किन्हीं दो सम्िमश्र संख्याओं ्र तथा ्र के लिए12्र ़ ्र त्र ्ऱ ्र1 221 ;पपपद्ध साहचयर् नियम किन्हीं तीन सम्िमश्र संख्याओं ्र1ए ्र2 तथा ्र3 के लिए ;्र1 ़ ्र2द्ध ़ ्र3 त्र ्र1 ़ ;्र2 ़ ्र3द्धण् ;पअद्ध योगात्मक तत्समक का अस्ितत्व सम्िमश्र संख्या 0़ प 0 ;0 के द्वारा दशार्या जाता हैद्ध, योगात्मक तत्समक अथवा शून्य सम्िमश्र संख्या कहलाता है जिससे कि प्रत्येक सम्िमश्र संख्या ्रए ्र ़ 0त्र ्रण् ;अद्ध योगात्मक प्रतिलोम का अस्ितत्व प्रत्येक सम्िमश्र संख्या ्र त्र ं ़ पइए के लिए हमें सम्िमश्र संख्या दृ ं ़ प;दृ इद्ध ;दृ ्र के द्वारा दशार्या जाता हैद्ध प्राप्त होती है, जोकि योगात्मक प्रतिलोम अथवा ्र का )ण कहलाता है। हम प्रेक्ष्िात करते हैं कि ्र ़ ;दृ्रद्ध त्र 0 ;योगात्मक तत्समकद्ध। 5ण्3ण्2 दो सम्िमश्र संख्याओं का अंतर ;क्पमिितमदबम व िजूव बवउचसमग दनउइमतेद्ध किन्हीं दी गइर् सम्िमश्र संख्याओं ्र1 और ्र2 का अंतर ्र1 दृ ्र2 निम्न प्रकार से परिभाष्िात किया जाता हैः ्र1 दृ ्र2 त्र ्र1 ़ ;दृ्र2द्ध उदाहरणाथर् ;6 ़ 3पद्ध दृ ;2 दृ पद्ध त्र ;6 ़ 3 पद्ध ़ ;दृ2 ़ पद्ध और ;2 दृ पद्ध ़ ;दृ 6 दृ 3 पद्ध त्र दृ 4 दृ 4 प 5ण्3ण्3 सम्िमश्र संख्याओं का गुणन ;डनसजपचसपबंजपवद व िजूव बवउचसमग दनउइमतेद्ध मान लीजिए ्र1 त्र ं ़ पइ तथा ्र2 त्र ब ़ पक कोइर् दो सम्िमश्र संख्याएँ हैं। तब गुणनपफल ्र1ण््र2 निम्नलिख्िात रूप से परिभाष्िात किया जाता हैः ्र1 ्र2 त्र ;ंब दृ इकद्ध ़ प;ंक ़ इबद्ध उदाहरण के लिएए ;3 ़ प5द्ध ;2 ़ प6द्ध त्र ;3 × 2 दृ 5 × 6द्ध ़ प;3 × 6 ़ 5 × 2द्ध त्र दृ 24 ़ प28 सम्िमश्र संख्याओं के गुणन की संिया में निम्नलिख्िात प्रगुण होते हैंः ;पद्ध संवरक नियम दो सम्िमश्र संख्याओं का गुणनपफल, एक सम्िमश्र संख्या होती है, सारी सम्िमश्र संख्याओं ्र1 तथा ्र2 के लिए, गुणनपफल ्र1ए ्र2 एक सम्िमश्र संख्या होती है। ;पपद्ध क्रम विनिमय नियम किन्हीं दो सम्िमश्र संख्याओं ्र तथा ्र के लिए,12्र1 ्र2 त्र ्र2 ्र1 ;पपपद्ध साहचयर् नियम किन्हीं तीन सम्िमश्र संख्याओं ्र1ए ्र2 तथा ्र3 के लिए ;्र्रद्ध ्र त्र ्र ;्र्रद्ध123123;पअद्ध गुणात्मक तत्समक का आस्ितत्व सम्िमश्र संख्या 1 ़ प 0 ;1 के द्वारा दशार्या जाता हैद्धए गुणात्मक तत्समक अथवा एकल सम्िमश्र संख्या कहलाता है जिससे कि प्रत्येक सम्िमश्र संख्या ्र के लिए ्रण्1 त्र ्र ;अद्ध गुणात्मक प्रतिलोम का अस्ितत्व प्रत्येक शून्येत्तर सम्िमश्र संख्या ्र त्र ं ़ पइ ं दृइ 1;ं ≠ 0ए इ ≠ 0द्ध के लिए, हमें सम्िमश्र संख्या 22 ़ प 2 2 ; अथवा ं ़ इं ़इ्र ्रदृ1 के द्वारा दशार्या जाता हैद्ध प्राप्त होती है, ्र की गुणात्मक प्रतिलोम कहलाती है जिससे कि ्रण् 1 त्र1 ;गुणात्मक तत्समकद्ध्र ;अपद्ध बंटन नियम किन्हीं तीन सम्िमश्र संख्याओं ्र1ए ्र2ए ्र के लिए3;ंद्ध ्र ;्र ़ ्रद्ध त्र ्र्र ़ ्र्र;इद्ध ;्र ़ ्रद्ध ्र त्र ्र्र ़ ्र्र1231213 1 231323 5ण्3ण्4 दो सम्िमश्र संख्याओं का भागपफल ;क्पअपेपवद व िजूव बवउचसमग दनउइमतेद्ध किन्हीं दो ्र दी हुइर् सम्िमश्र संख्याओं ्र1 तथा ्र2 के लिए, जहाँ ्र2 ≠ 0ए भागपफल ्र 12 निम्नलिख्िात प्रकार से ्र 1 त्र्रपरिभाष्िात किया जाता है 11 ्र्र22 उदाहरण के लिए, मान लिया ्र1 त्र 6 ़ 3प और ्र2 त्र 2 दृ प ⎛ 2 −−;द्ध⎞1्र1 ⎛ 1 ⎞ तब 63द्ध प त्र ;63़पद्ध 22 2 त्र⎜़× ⎜़प ⎟ ्र 2 −प ⎟⎜ 1 ़−;द्ध⎟⎠2 ⎝ ⎠⎝22 ़−;द्ध 21 ⎛2 ़प ⎞ त्र ;63़पद्ध⎜ ⎟⎝5 ⎠ त्र 1 ⎡−़ 12 3 प;66द्धत्र 1 ;9 ़ पद्ध़⎤12⎣⎦55 5ण्3ण्5 प की घात ;च्वूमत व िप द्ध हमें ज्ञात हैं: 232 422प त्रपप त्र;द्ध1 प त्र−प ए प त्र−1− ;द्धप त्र;द्धत्र1 522 623प त्रपप त्र−1 प त्रप ए प त्रप त्र−1 त्र−1 इत्यादि,;द्ध2 ;द्ध ;द्ध3 ;द्ध −11 पप −21 1इसी प्रकार हम और भी प्राप्त करते हैंः प त्र×त्र त्र−पए प त्र 2 त्र त्र−1ए पप −1 प −1 −31 1 पप −4 11प त्र त्र ×त्रत्रपए प त्र त्रत्र 1 प3 −पप 1 प41 सामान्य रूप से, किसी पूणा±क ा के लिए, प4ा त्र 1ए प4ा ़ 1 त्र पए प4ा ़ 2 त्र दृ1ए प4ा ़ 3 त्र दृ प 5ण्3ण्6 एक )ण वास्तविक संख्या के वगर्मूल ;ज्ीम ेुनंतम तववजे व िं दमहंजपअम तमंस दनउइमतद्ध ज्ञात हैः प2 त्र दृ1 और ; दृ पद्ध2 त्र प2 त्र दृ 1ण् इसलिए दृ 1 के वगर्मूल प और दृ प हैं। यद्यपि चिÉ का अथर् हमारे लिए केवल प होगा। अब हम देख सकते हैं कि प और दृप दोनों समीकरण ग2 ़ 1 त्र 0 अथवा ग2 त्र दृ1 के हल हैं। इसी प्रकार, ;3 पद्ध2 त्र;3द्ध2 प2 त्र 3 ;दृ 1द्ध त्र दृ 3 और ;−3पद्ध2 त्र ;−3द्ध2 प2 त्र दृ 3 इसलिए दृ 3 के वगर्मूल 3 प और −3 प हैं। पिफर से केवल 3 प को दशार्ने के लिए ही प्रतीक −3 का प्रयोग किया जाता है, अथार्त् −3 त्र 3 प ण् सामान्यतया यदि ं एक ध्नात्मक वास्तविक संख्या है, तब −ं त्र ं −1 त्र ंप ए हम जानते हैं कि सभी ध्नात्मक वास्तविक संख्याओं ं और इ के लिए परिणाम तब भी सत्य होगा, जब ं झ 0ए इ ढ 0 या ं ढ0ए इ झ0ण् क्या होगा ? यदि ं ढ 0ए इ ढ0ए हम इसकी जाँच करते हैं नोट कीजिए कि प2 त्र −1 −1 त्र −−1 त्र;द्ध; 1द्ध1 त्र 1 जोकि इस बात का विरोधभास है कि प2 त्र दृ1 इसलिए, यदि ं और इ दोनों )ण वास्तविक संख्याएँ हैं। आगे यदि ं और इ दोनों में से कोइर् भी शून्य है, तब स्पष्ट रूप से 5ण्3ण्7 तत्समक ;प्कमदजपजपमेद्ध हम निम्नलिख्िात तत्समक को सि( करते हैंः किन्हीं सम्िमश्र संख्याओं ्र और ्र के लिए12; ्र ़ ्रद्ध2 त्र ्र2 ़ ्र2 ़ 2्र्र1 2 1212 उपपिा हमें प्राप्त होता है, ; ्र1 ़ ्र2 द्ध2 त्र ; ्र1 ़ ्र2 द्ध ; ्र1 ़ ्र2 द्ध त्र ;्र ़ ्रद्ध ्ऱ ;्र ़ ्रद्ध ्र;बंटन नियमद्ध1 21122 त्र ्र2 ्र्र ्र्र ्र2 ;बंटन नियमद्ध1 2112 2 त्र ्र2 ्र्र ्र्र ्र2 ;गुणन का क्रम विनिमय नियमद्ध1 1212 2 त्र ्र2 ़2्र्र ़्र2 1 122 इसी भाँति हम निम्नलिख्िात तत्समकों को सि( कर सकते हैंः 2;पद्ध ;्र1 −्र2 द्धत्र − 12 2 ्र्र 12 ़्र22्र 3 2 23;पपद्ध ;्र ़्र 3 ्र 3्र्र ़3्र्र द्धत्ऱ ़्र12 1 12122 32 23;पपपद्ध ;्र −्र 3 ्र 3्र्र ़3्र्र द्धत्र− −्र12 1 12122 22;पअद्ध ्रदृ्र त्र;्र ़्र द्ध;्र दृ्र द्ध1 2 1212 वास्तव में बहुत से दूसरे तत्समकों को जोकि सभी वास्तविक संख्याओं के लिए सत्य हैं, सभी सम्िमश्र संख्याओं की सत्यता के लिए सि( किया जा सकता है। उदाहरण 2 निम्नलिख्िात को ं ़ पइ के रूप में व्यक्त करेंः ⎛−1 ⎞3 ; द्ध−प ⎛ ⎞ ⎜ ⎟1 −प 2प;पद्ध 5 प ;पपद्ध ;द्ध;द्ध⎜ प ⎟⎝⎠ 8 ⎝ 8 ⎠ −52 − 55− ⎛⎞ ⎜⎟हल ;पद्ध ;द्ध5प 1 प त्र प त्र 5 ;द्ध−1 त्र त्र ़प08⎝⎠88 88 ⎛ 1 ⎞3 1 5121−प 2प −प 2××प पप त्र प;पपद्ध ;द्ध;द्ध ⎜ ⎟त्र त्र ;द्ध2 ⎝ 8 ⎠88××8 256 256 उदाहरण 3 ;5 दृ 3पद्ध3 को ं ़ इप के रूप में व्यक्त करेंः हल हमें प्राप्त है, ;5 दृ 3पद्ध3 त्र53 दृ 3 × 52 × ;3पद्ध ़ 3 × 5 ;3पद्ध2 दृ ;3पद्ध3 त्र 125 दृ 225प दृ 135 ़ 27प त्र दृ 10 दृ 198प उदाहरण 4 ;−3 ़− 2 द्ध;23 −पद्धको ं ़ पइ के रूप में व्यक्त करें। हल हमें प्राप्त है ;−3 ़− 2 द्ध;23 −पद्धत्र ;−3 ़ 2 पद्ध;23 −पद्ध −़ ;़22 द्धप31 त्र −़63प ़26प −2 प2 त्र ;62 द्ध़ 5ण्4 सम्िमश्र संख्या का मापांक और संयुग्मी ;ज्ीम डवकनसने ंदक जीम ब्वदरनहंजम व िं ब्वउचसमग छनउइमतद्ध मान लीजिए ्र त्र ं ़ पइ एक सम्िमश्र संख्या है। तब ्र का मापांक, जो द्य ्र द्य द्वारा दशार्या जाता है, को )णेत्तर वास्तविक संख्या 2 ़2 द्वारा परिभाष्िात किया जाता है अथार्त् द्य ्र द्य त्र 2 ़2 औरंइ ंइ ्र का संयुग्मी, जो ्र द्वारा दशार्या जाता है, सम्िमश्र संख्या ं दृ पइ होता है, अथार्त् ्र त्र ं दृ पइ उदाहरण के लिए, ़त्र 32 ़12 त्र10 ए3 प25−प त्र 22 ़− ; 5द्ध 2 त्र 29 ए 3 प त्ऱ 5 −− त्र 3प दृ 5और 3 ़त्र −प ए 25−प 2 प ए 35पहम प्रेक्ष्िात करते हैं कि )णेत्तर सम्िमश्र संख्या ्र त्र ं ़ पइ का गुणात्मक प्रतिलोम 1 ं −इ − ्रंपइ ्रदृ1त्र त्र ़प त्र त्र 2 , होता है2222 22 ्रंपइं ़इं ़इं ़़ इ 2अथार्त् ्र्र त्र्र अग्रतः किन्हीं दो सम्िमश्र संख्याओं ्र1 एवं ्र2 के लिए निम्नलिख्िात निष्कषोंर् को सुगमता से व्युत्पन्न किया जा सकता हैः ्र्र 11 त्र;पद्ध ्र्र त्र्र ्र ;पपद्ध ए यदि ्र ≠012 1 2 2्र ्र2 2 ;पपपद्ध ्र्र त्र्र्र ;पअद्ध ्र ±्र त्र्र ±्र1212 1212 ⎛्र ⎞ ्र1 त्र 1;अद्ध ⎜⎟ यदि ्र2 ≠ 0ण् ्र्र⎝ 2 ⎠ 2 उदाहरण 5 2 दृ 3प का गुणात्मक प्रतिलोम ज्ञात कीजिए। हल मान लिया ्र त्र 2 दृ 3प 22तब ्र त्र 2 ़ 3प और ्र 2 त्र2 ़− ; 3द्ध त्र13 इसलिए, 2 दृ 3प का गुणात्मक प्रतिलोम ्र 23़प 23 ्रदृ1 त्रत्र त्ऱ प प्राप्त होता है।्र 2 13 13 13 ऊपर दिया गया सारा हल निम्नलिख्िात ढंग से भी दिखाया जा सकता हैः 12 ़3प 23़प 2 ़3प 23 ्रदृ1 त्र त्र त्र 2 2 त्र त्ऱ प 2 −3प ;2 −3 द्ध;2 ़प 2 −;3 द्ध प 13 13प 3द्ध 13 उदाहरण 6 निम्नलिख्िात को ं ़ पइ के रूप में व्यक्त करें। 5 ़ 2प पदृ35;पद्ध ;पपद्ध1− 2प 5 ़ 2प 5 ़ 2प 1़ 2 55 प ़ 2प −2प ़ 2 हल ;पद्ध त्र × त्र द्ध21−2प 1− 2प 1़ 2प 1−;2प 36़ 2प 3;1 ़2 2द्ध प त्र त्र त्र 12़ 2प 12 3़−351 11 पप ;पपद्ध प त्रत्र त्र× त्र त्रप3517 2प 2 −पप −पप;द्धप प्रश्नावली 5ण्1 प्रश्न 1 से 10 तक की सम्िमश्र संख्याओं में प्रत्येक को ं ़ पइ के रूप में व्यक्त कीजिए। ⎛5 प1ण् ;द्धप ⎜−3 ⎞⎟ 2ण् प 9 ़प19 3ण् प −39 ⎝ 5 ⎠ 4ण् 3;7 ़ प7द्ध ़ प ;7 ़ प7द्ध 5ण् ;1 दृ पद्ध दृ ; दृ1 ़ प6द्ध ⎛12 ⎞⎛ 5 ⎞ ⎡⎛17 ⎞⎛ 1 ⎞⎤ ⎛ 4 ⎞़प −4 ़प ़प ़4 ़प −− ़ प6ण् ⎜ ⎟⎜ ⎟ 7ण् ⎢⎜ ⎟⎜ ⎟⎥⎜⎟⎝55 ⎠⎝ 2 ⎠ ⎣⎝33 ⎠⎝ 3 ⎠⎦ ⎝ 3 ⎠ ⎛1 ⎞3 ⎛21 3 8ण् ;1 दृ पद्ध4 9ण् ⎜़3प ⎟ 10ण् ⎜−− प ⎟⎞ ⎝3 ⎠⎝ 3 ⎠ प्रश्न 11 से 13 की सम्िमश्र संख्याओं में प्रत्येक का गुणात्मक प्रतिलोम ज्ञात कीजिए। 11ण् 4 दृ 3प 12ण् 53़प 13ण् दृ प 14ण् निम्नलिख्िात व्यंजक को ं ़ पइ के रूप में व्यक्त कीजिएः ;3 ़प 5 द्ध;3 −प 5 द्ध ;3 ़ 2 पद्ध−;3 −प 2 द्ध 5ण्5 आगर्ंड तल और ध््रुवीय निरूपण ;।तहंदक च्संदम ंदक च्वसंत त्मचतमेमदजंजपवदद्ध जैसा कि हम पहले से ही जानते हैं कि वास्तविक संख्याओं ;गए लद्ध के प्रत्येक क्रमित युग्म के संगत, हमें ग्ल् तल में दो पारस्परिक लंब रेखाओं के संदभर् में जिन्हें गदृ अक्ष ल दृ अक्ष द्वारा जाना जाता है, एक अद्वितीय बिंदु प्राप्त होता है। अथार्त् सम्िमश्र संख्या ग ़ पल का जो क्रमित युग्म ;गएलद्ध के संगत है, तल में एक अद्वितीय बिंदु ;गए लद्ध के रूप में ज्यामितीय निरूपण किया जा सकता है। यह कथन विलोमतः सत्य है। कुछ सम्िमश्र संख्याओं जैसे 2 ़ 4पए दृ2 ़ 3पए 0 ़ 1पए 2 ़ 0पए दृ5 दृ2प और 1दृ2प को जोकि क्रमित युग्मों ;2ए 4द्धए ;दृ2ए3द्धए ;0ए1द्धए ;2ए0द्धए ;दृ5एदृ2द्ध और ;1ए दृ2द्ध के संगत हैं, आवृफति 5ण्1 में बिंदुओं ।ए ठए ब्ए क्ए म् और थ् द्वारा ज्यामितीय निरूपण किया गया है। आवृफति 5ण्1 तल, जिसमें प्रत्येक बिंदु को एक सम्िमश्र संख्या द्वारा निदिर्ष्ट किया गया है, सम्िमश्र तल या आगर्ंड तल कहलाता है। आगर्ंड तल में सम्िमश्र संख्या ;ग ़ पलद्ध का मापांक बिंदु च्;गएलद्ध से मूल बिंदु व्;0ए0द्ध के बीच की दूरी द्वारा प्राप्त होता है ;आवृफति 5.2द्ध। गदृअक्ष पर बिंदु, सम्िमश्र संख्याओं ं ़ प0 रूप के संगत होते हैं और लदृअक्ष पर बिंदु, सम्िमश्र संख्याओं 0 ़ पइ रूप के संगत होते हैं। आगर्ंड तल में गदृअक्ष और लदृअक्ष क्रमशः वास्तविक अक्ष और काल्पनिक अक्ष कहलाते हैं। आगर्ंड तल में सम्िमश्र संख्या ्र त्र ग ़ पल और इसकी संयुग्मी ्र त्र ग दृ पल को बिंदुओं च्;गए लद्ध और फ;गए दृलद्ध के द्वारा निरूपित किया गया है। ज्यामितीय भाषा से, बिंदु ;गए दृलद्ध वास्तविक अक्ष के सापेक्ष बिंदु ;गए लद्ध का दपर्ण प्रतिबिंब कहलाता है ;आवृफति 5.3द्ध। आवृफति 5.3 5.5.1 एक सम्िमश्र संख्या का ध््रुवीय निरूपण ;च्वसंत तमचतमेमदजंजपवद व िं बवउचसमग दनउइमतद्ध माना कि बिंदु च्ण् )णेत्तर सम्िमश्र संख्या ्र त्र ग ़ पल का निरूपण करता है। माना कि दिष्ट रेखाखंड व्च् की लंबाइर् त है और θ वह कोण है जो व्च्ए गदृअक्ष की ध्नात्मक दिशा के साथ बनाता है। हम ध्यान दें कि च् वास्तविक संख्याओं के क्रमित युग्म ; तए θ द्ध से अद्वितीय रूप से निधार्रित किया जाता है। ; तए θ द्ध बिंदु च् के ध््रुवीय निदेर्शांक कहलाते हैं आवृफति 5.4 देख्िाए। हम मूल बिंदु को ध््रुव तथा ग दृअक्ष की ध्न दिशा को प्रारंभ्िाक रेखा मानते हैं। यहाँ ग त्र त बवे θए ल त्र त ेपद θ और इसलिए ्र त्र त ;बवे θ ़ प ेपद θद्धए सम्िमश्र संख्या का ध््रुवीय रूप कहलाता है। यहाँ त त्र ग2 ़ल2 त्रको ्र्र आवृफति 5.4 का मापांक कहते हैं और θ, सम्िमश्र संख्या का कोणांक या आयाम कहलाता है तथा कोणांक ्र से निरूपित होता है। किसी सम्िमश्र संख्या ्र ≠ 0, 0 ≥θ ढ 2π में θ का केवल मान संगत हैं। पिफर भी, 2π की लंबाइर् के किसी दूसरे, अंतराल के लिए, उदाहरण के तौर पर दृ π ढ θ≤ π इस प्रकार का एक अंतराल हो सकता है। हम θ का ऐसा मान, जिसमें की दृ π ढ θ≤ πए ्र का मुख्य आयाम कहलाता है और ंतह ्र से निरूपित किया जाता है। आवृफति 5.5 और 5.6 देख्िाए। 2्र त्ऱउदाहरण 7 सम्िमश्र संख्या 1 प 3 को ध््रुवीय रूप में निरूपित कीजिए। हल माना 1 त्र त बवे θए 3त्र त ेपद θ दोनों तरपफ का वगर् करके और जोड़ने पर हमें प्राप्त है, 22 2त ;बवे θ़ेपद θद्धत्र4 अथार्त् त त्र 42 ;प्रतिदशर् रूप से, त झ0द्धत्रइसलिए बवे θ त्र 1 ए ेपद θ त्र 3 22 πइनसे प्राप्त होता है θत्र 3 आवृफति 5ण्7 ⎛ ππ⎞ ्र त्र2बवे ़पेपद इसलिए अपेक्ष्िात ध््रुवीय रूप ⎜⎟⎝ 33 ⎠ सम्िमश्र संख्या संख्या को आवृफति 5ण्7 में दशार्या गया है। −16 उदाहरण 8 सम्िमश्र संख्या को ध््रुवीय रूप में रूपांतरित कीजिए।1़प 3 −16 −16 1−प 3× 1़प 31़प 31−प 3हल दी हुइर् सम्िमश्र संख्या त्र −16 1 ;−प 3 −16 1 −प 3द्धद्धत्र ; त्र ़1−;प 3द्ध2 13 आवृफति 5ण् 8 त्र −41−प 3द्धत्र4 प43 ;आवृफति 5ण्8द्ध−़ ; माना दृ 4 त्र त बवे θए 43त्र त ेपद θ 22 2दोनों ओर वगर् करके और जोड़ने पर हमें प्राप्त होता है 16 ़ 48 त्र त ;बवे θ ़ेपद θद्ध जिससे हमें प्राप्त होता है, त2 त्र 64ए अथार्त् त त्र 8 1 3 π 2πθत्र π दृत्रइसलिए, बवे θ त्र − ए ेपद θ त्र 22 33 ⎛ 2π 2π⎞इसलिए, आवश्यक ध््रुवीय रूप त्र 8बवे ़प ेपद ⎜⎟⎝ 33 ⎠ प्रश्नावली 5ण्2 प्रश्न 1 से 2 तक सम्िमश्र संख्याओं में प्रत्येक का मापांक और कोणांक ज्ञात कीजिएः 1ण् ्र त्र दृ 1 दृ प 3 2ण् ्र त्र दृ 3 ़ प प्रश्न 3 से 8 तक सम्िमश्र संख्याओं में प्रत्येक को ध््रुवीय रूप में रूपांतरित कीजिएः 3ण् 1 दृ प 4ण् दृ 1 ़ प 5ण् दृ 1 दृ प 6ण् दृ 3 7ण् 3 ़ प 8ण् प 5ण्6 द्विघातीय समीकरण ;फनंकतंजपब म्ुनंजपवदेद्ध हमें पहले ही द्विघातीय समीकरणों के बारे में जानकारी है और हमने उनकों वास्तविक संख्याओं के समुच्चय में उन स्िथतियों में हल किया है जहाँ विविक्तकर ≥ 0 है। अब हम निम्नलिख्िात द्विघातीय समीकरण के बारे में विचार करते हैंः ंग2 ़ इग ़ ब त्र 0 जिसमें ंए इए ब वास्तविक गुणांक हैं और ं ≠ 0 मान लीजिए कि इ2 दृ 4ंब ढ 0 हम जानते हैं कि हम सम्िमश्र संख्याओं के समुच्चय में )णात्मक वास्तविक संख्याओं के वगर्मूल निकाल सकते हैं। इसलिए उपयुर्क्त समीकरण के हल सम्िमश्र संख्याओं के समुच्चय में हैं जोकि ग त्र−±इइ2 −4ंब त्र इ 4ंब −इ2 प द्वारा प्राप्त होते हैं।−± 2ं 2ं यहाँ पर, कुछ लोग यह जानने के लिए उत्सुक होंगे, कि किसी समीकरण में कितनेमूल होंगे? इस संदभर् में, निम्नलिख्िात प्रमेय को उल्लेख ;बिना उपपिाद्ध के किया गया है जिसे ‘बीजगण्िात की मूल प्रमेय’ के रूप में जाना जाता है। फ्एक बहुपद समीकरण का कम से कम एक मूल होता हैय्। इस प्रमेय के पफलस्वरूप हम निम्नलिख्िात महत्त्वपूणर् परिणाम पर पहँचते हैं। फ्द घात की एक बहुपद समीकरण में द मूल होते हैं।य् उदाहरण 9 ग2 ़ 2 त्र 0 को हल कीजिए। हल: हमें दिया है ग2 ़ 2 त्र 0 या ग2 त्र दृ 2 अथार्त् ग त्र ±−2 त्र ± 2 प उदाहरण 10 ग2 ़ ग ़ 1त्र 0 को हल कीजिए। हल यहाँ इ2 दृ 4ंब त्र 12 दृ 4 × 1 × 1 त्र 1 दृ 4 त्र दृ 3 −±− 13 −± 3इसलिए, इसके हल ग त्र त्र 1 प हैं21 2× उदाहरण 11 5ग2 ़़5 त्र0 को हल कीजिए।गहल यहाँ, समीकरण का विविक्तकर 12 −×5 ×5 त्र 1 दृ 20 त्र दृ 19 है।4 −±− 1 19 −± 19 1 पइसलिए हल त्रहै।25 25 प्रश्नावली 5ण्3 निम्नलिख्िात समीकरणों में से प्रत्येक को हल कीजिएः 1ण् ग2 ़ 3 त्र 0 2ण् 2ग2 ़ ग ़ 1 त्र 0 3ण् ग2 ़ 3ग ़ 9 त्र 0 4ण् दृ ग2 ़ ग दृ 2 त्र 0 5ण् ग2 ़ 3ग ़ 5 त्र 0 6ण् ग2 दृ ग ़ 2 त्र 0 7ण् 2ग2 ़़ग2 त्र0 8ण् 3ग2 −2ग ़33 त्र0 21 2 ग गत्र0 ग ़ 10़त्र ग ़़9ण् 10ण्22 विविध् उदाहरण ;3−2 द्ध;2 ़3द्ध पप उदाहरण 12 का संयुग्मी ज्ञात कीजिए।;1 ़2 द्ध;2 प −पद्ध ;3−2 द्ध;2 ़3द्ध 69़−़ प 4प 6 12़5प 4 −3पपप हल यहाँ त्र त्र ×;1़2 द्ध;2 प −पद्ध2 −़ ़प 42 ़प 4प 43 −3प 48−36प ़20प ़15 6316 − प 63 16 त्र त्र त्र − प 16 ़9 25 25 25 ;3−2 द्ध;2 प ़3द्ध प 63 16 इसलिए का संयुग्मी, ़ प है।;1 ़2 द्ध;2 प −पद्ध 25 25 उदाहरण 13 निम्नलिख्िात सम्िमश्र संख्याओं का मापांक एवं कोणांक ज्ञात कीजिए। 1़प 1;पद्ध ;पपद्ध1−प 1़प 1़प 1़़ प 1−1़2प हल हमें प्राप्त है, त्र प ×1 त्रत्रप त्र 0 ़ प1−प 1 प 1 प 11 ़−़ अब, 0 त्र त बवे θए1 त्र त ेपद θ दोनों ओर वगर् करके जोड़ते हुए हमें प्राप्त होता है, त2 त्र 1 अथार्त् त त्र 1 तथा बवे θ त्र 0ए ेपद θ त्र 1 इसलिएए θ त्र π 2 1़प πइस प्रकार का मापांक 1 है तथा कोणांक होगा।1−प 211−प 1−प 1 प त्र त्रत्र−;पपद्ध 1 प ;1 पद्ध;1 पद्ध1़122़ ़− 11मान लीजिए 2त्र त बवे θए दृ 2 त्र त ेपद θ भाग ;पद्ध की तरह हम प्राप्त करते हैं, 11 1 ऋत त्र 2 ए बवे θ त्र 2ए ेपद θ त्र 2 इसलिए θ त्र−π 4 11 −πका मापांक तथा कोणांक है।1़प 24 ंपइ ़ उदाहरण 14 यदि ग ़ पल त्र − है तोए सि( कीजिए कि ग2 ़ ल2 त्र 1ंपइ 22 22;ंपइ ़द्ध; ़द्ध ं −़इ 2ंइप ं −इ 2ंइ हल हमें प्राप्त है, ग ़ पल त्र ंपइ त्र 22 त्र 22 22 प;ंपइ द्ध; ं ़पइ द्ध इं ़़ ं− ं ़इ ़इ ं2 −इ22ंइ इसलिए, ग दृ पल त्र 22 − 22 प ं ़इं ़इ 2 22 22;ं −इ द्ध4ंइ ़इस प्रकार ग2 ़ ल2 त्र ;ग ़ पलद्ध ;ग दृ पलद्ध त्र222 222;ं ़इ द्ध;ं ़इ द्ध 2 22;ं ़इ द्ध त्र 2 22 त्र 1;ं ़इ द्ध उदाहरण 15 θ का वास्तविक मान बताइए, जबकि 32 ेपदθ़ प मात्रा वास्तविक है।12 ेपदθ− प 32 ेपदθ ;3़ प ़ 2 ेपदθद्ध़ प 2 ेपदθद्ध;1 प हल हमें प्राप्त है, त्र 12 ेपदθ ;1 − प ़ 2 ेपदθद्ध− प 2 ेपदθद्ध;1 प 3़6 ेपदθ़2 ेपदθदृ4ेपद 2θपप त्र 1़4ेपद 2θ 34ेपद − 2θ 8ेपदθप़त्र2 214ेपद ़ θ 14ेपद θ़ दिया हुआ है कि सम्िमश्र संख्या वास्तविक है। 8ेपदθइसलिए 2 त्र 0 अथार्त् ेपद θ त्र 014ेपद θ़अत θ त्र दπए द ∈ र्ण् प −1उदाहरण 16 सम्िमश्र संख्या ्र त्र को ध््रुवीय रूप में परिवतिर्त कीजिए।ππ बवे ़प ेपद 33 प −1 हल हमें प्राप्त है, ्र त्र1 ़22 2 प ़ 3 −1़ 3पद्ध 31 3 ़1−2;प −1द्ध 1− 3प ;त्र ×त्र त्र ़ प 1़ 3प 1−3प 13़ 22 31− 3 ़1 त्रतबवेएθ त्रतेपदθमान लीजिए 22 दोनों ओर वगर् करके, जोड़ते हुए हमें प्राप्त होता है, 2 ⎛ 31−⎞2 ⎛ 3 ़1⎞22 ⎛⎜;3द्ध2 ़1⎟⎞ ×तत्ऱ त्र ⎝⎠24⎜⎟⎜⎟ त्रत्र222⎝ ⎠⎝ ⎠ 44 अथार्त् तइससे 31− 3 ़1 बवेθत्र ऐपदθत्र प्राप्त होता है22 22 ππ5πइसलिए θत्ऱत्र ;क्यों ?द्ध46 12 ⎛ 5π 5π⎞अथार्त्, 2बवे ़पेपद⎜⎟ध््रुवीय रूप है।⎝ 12 12 ⎠अध्याय 5 पर विविध् प्रश्नावली 1 25⎡18 ⎛⎞⎤3 1ण् ⎢प़⎜⎟⎥ का मान ज्ञात कीजिए।प⎢ ⎝⎠⎥⎣⎦2ण् किन्हीं दो सम्िमश्र संख्याओं ्रऔर ्रके लिए, सि( कीजिएः12ण्त्म ;्र्रद्ध त्र त्म्रत्म्रदृ प्उ्रप्उ्र121212 ⎛ 12 ⎞⎛3 −4प⎞3ण् ⎜ −⎟⎜ ⎟ को मानक रूप में परिवतिर्त कीजिए।⎝14प1़प⎠⎝5 ़प⎠− 22ंप−इ 22 ंइ−त्र4ण् यदि गपल , तो सि( कीजिए कि ;गल2द्ध 22बप−क बक 5ण् निम्नलिख्िात को ध््रुवीय रूप में परिवतिर्त कीजिएः 17प़ 13प़;पद्ध 2 ;पपद्ध; द्ध−पप2 1दृ2 प्रश्न 6 से 9 में दिए गए प्रत्येक समीकरण को हल कीजिएः 20 36ण् 3ग2 −4ग़त्र0 7ण् ग2 −2ग़त्र0 32 8ण् 27ग2 −10 ग ़1 त्र0 9ण् 21ग2 −28ग ़त्र 10 0 ्र्र 1़़1210ण् यदि ्र1 त्र 2 दृ पए ्र2 त्र 1 ़ पए का मान ज्ञात कीजिए।1दृ 2 ़प्र्र 2 22;ग ़प द्ध ;ग ़1द्ध 11ण् यदि ं ़ पइ त्र ए सि( कीजिए कि, ं2 ़ इ2 त्र 2ग2 ़1 ;2ग2 ़1द्ध2 12ण् माना ्र त्र 2 दृ पए ्र त्र दृ2 ़ पए निम्न का मान निकालिए।12⎛्र्र ⎞⎛1 ⎞;पद्ध त्म⎜12 ⎟ ;पपद्ध प्उ⎜⎟ ्र ्र्र ⎝1 ⎠⎝11 ⎠ 12प़13ण् सम्िमश्र संख्या 13प का मापांक और कोणांक ज्ञात कीजिए।−14ण् यदि ;ग दृ पलद्ध ;3 ़ 5पद्धए दृ6 दृ 24प की संयुग्मी है तो वास्तविक संख्याएँ ग और ल ज्ञात कीजिए। 1़प 1−प−15ण् का मापांक ज्ञात कीजिए।1−प 1़प नअ 16ण् यदि ;ग ़ पलद्ध3 त्र न ़ पअए तो दशाइर्ए कि ़त्र4;ग2दृ ल2द्धगल βαदृ 17ण् यदि α और β भ्िान्न सम्िमश्र संख्याएँ हैं जहाँ β त्र1ए तब का मान ज्ञात कीजिए।1 दृαβ ग ग18ण् समीकरण त्र2 के शून्येत्तर पूणार्ंक मूलों की संख्या ज्ञात कीजिए।1 दृप 19ण् यदि ;ं ़ पइद्ध ;ब ़ पकद्ध ;म ़ पद्धि ;ह ़ पीद्ध त्र । ़ पठ है तो दशार्इए कि ;ं2 ़ इ2द्ध ;ब2 ़ क2द्ध ;म2 ़ ि2द्ध ;ह2 ़ ी2द्ध त्र ।2 ़ ठ2 ⎛1 ़प ⎞उ 20ण् यदि ⎜1 दृप ⎟त्र1ए तो उ का न्यूनतम पूणार्ंक मान ज्ञात कीजिए।⎝ ⎠ सारांश ऽ ं ़ पइ के प्रारूप की एक संख्या, जहाँ ं और इ वास्तविक संख्याएँ हैं, एक सम्िमश्र संख्या कहलाती है, ं सम्िमश्र संख्या का वास्तविक भाग और इ इसका काल्पनिक भाग कहलाता है। ऽ माना ्र1 त्र ं ़ पइ और ्र2 त्र ब ़ पक, तब ;पद्ध ्र1 ़ ्र2 त्र ;ं ़ बद्ध ़ प ;इ ़ कद्ध ;पपद्ध ्र1 ्र2 त्र ;ंब दृ इकद्ध ़ प ;ंक ़ इबद्ध ऽ किसी शून्येत्तर सम्िमश्र संख्या ्र त्र ं ़ पइ ;ं ≠ 0ए इ ≠ 0द्ध के लिए, एक सम्िमश्र संख्या ं −इ 1 22 ़प 2 2ए का अस्ितत्व होता है, इसे या ्रदृ1 द्वारा निदिर्ष्ट किया जाता हैं ़इं ़इ ्र ⎛ ं2 −इ ⎞ और ्र का गुणात्मक प्रतिलोम कहलाता है जिससे कि ;ं ़ पइद्ध ⎜ 22 ़प 22 ⎟ ं ़इं ़इ⎝ ⎠ त्र 1 ़ प0 त्र1 प्राप्त होता है। ऽ किसी पूणा±क ा के लिएए प4ा त्र 1ए प4ा ़ 1 त्र पए प4ा ़ 2 त्र दृ 1ए प4ा ़ 3 त्र दृ प ऽ सम्िमश्र संख्या ्र त्र ं ़ पइ का संयुग्मी ्र द्वारा निदिर्ष्ट किया जाता है और ्र त्र ं दृ पइ द्वारा दशार्या जाता है। ऽ सम्िमश्र संख्या ्र त्र ग ़ पल का ध््रुवीय रूप त ;बवे θ ़ प ेपद θद्धए है, जहाँ त त्र ग2 ़ल2 ;्र का मापांकद्ध और बवेθ त्र ग ए ेपदθ त्र ल ;θए ्र का कोणांक कहलाता है।द्ध θ का ततमान, जिससे कि दृ π ढ θ≤πए ्र का प्रमुख कोणांक कहलाता है। ऽ एक द घातवाले बहुपद समीकरण के द मूल होते हैं। ऽ एक द्विघातीय समीकरण ंग2 ़ इग ़ ब त्र 0ए जहाँ ंए इए ब ∈ त्ए ं ≠ 0ए इ2 दृ 4ंब ढ 0ए इ 4ंब −इ2 के हल ग त्र −± प के द्वारा प्राप्त होते हैं।2ं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि यूनानियों ने इस तथ्य को पहचाना था कि एक )ण संख्या के वगर्मूल का वास्तविक संख्या प(ति में कोइर् अस्ितत्व नहीं है परंतु इसका श्रेय भारतीय गण्िातज्ञ डंींअपतं ;850 इर्॰द्ध को जाता है जिन्होंने सवर्प्रथम इस कठिनाइर् का स्पष्टतः उल्लेख किया। फ्उन्होंने अपनी वृफति ‘गण्िात सार संग्रह’में बताया कि )ण ;राश्िाद्ध एक पूणर्वगर् ;राश्िाद्ध नहीं है, अतः इसका वगर्मूल नहीं होता है।’’ एक दूसरे भारतीय गण्िातज्ञ ठींेांतं ने 1150 इर्॰ में अपनी वृफति ‘बीजगण्िात’ में भी लिखा है, फ्)ण राश्िा का कोइर् वगर्मूल नहीं होता है क्योंकि यह एक वगर् नहीं है।य् ब्ंतकंद ;1545 इ॰द्ध ने ग ़ ल त्र 10ए गल त्र 40 को हल करने में उत्पन्न समस्या पर ध्यान दिया। उन्होंने ग त्र 5 ़ तथा ल त्र 5 दृ −15 इसके हल के रूप में ज्ञात किया जिसे उन्होंने स्वयं अमान्यकर दिया कि ये संख्याएँ व्यथर् ;नेमसमेेद्ध हैं। ।सइमतज ळपतंतक ;लगभग 1625 इर्॰द्ध ने )ण संख्याओं के वगर्मूल को स्वीकार किया और कहा कि, इससे हम बहुपदीय समीकरण की जितनी घात होगी, उतने मूल प्राप्त कराने में सक्षम होंगे। म्नसमत ने सवर्प्रथम −1 को प संकेतन प्रदान किया तथा ॅण्त्ण् भ्ंउपसजवद ;लगभग 1830 इर्॰द्ध ने एक शु( गण्िातीय परिभाषा देकर और तथाकथ्िात ‘काल्पनिक संख्या’ के प्रयोग को छोड़ते हुए सम्िमश्र संख्या ं ़ पइ को वास्तविक संख्याओं के क्रमित युग्म ;ंए इद्ध के रूप में प्रस्तुत किया। कृ ऽ कृ

>5>

Ganit





 अध्याय 5

सम्मिश्र संख्याएँ और द्विघातीय समीकरण (Complex Numbers and Quadratic Equations)

"Mathematics is the Queen of Sciences and Arithmetic is the Queen of Mathematics. – Gauss "

5.1 भूमिका (Introduction)

Img01

पिछली कक्षाओं में हमने एक और दो चर की एक घातीय समीकरणों का तथा एक चर की द्विघातीय समीकरणों का अध्ययन किया है। हमने देखा है कि समीकरण x2 + 1 = 0 का कोई वास्तविक हल नहीं है क्योंकि x2 + 1 = 0 से हमें x2 = – 1 प्राप्त होता है और प्रत्येक वास्तविक संख्या का वर्ग श्रेणेतर होता है इसलिए वास्तविक संख्या प्रणाली को बृहद प्रणाली के रूप में बढ़ाने की आवश्यकता है जिससे कि हम समीकरण x2 = – 1 का हल प्राप्त कर सकें। वास्तव में, मुख्य उद्देश्य समीकरण ax2 + bx + c = 0 का हल प्राप्त करना है, जहाँ
D =
b2 – 4ac < 0 है, जोकि वास्तविक संख्याओं की प्रणाली में संभव नहीं है।

5.2 सम्मिश्र संख्याएँ (Complex Numbers)

हम कल्पना करें कि संकेतन i से निरूपित है। तब हमें प्राप्त होता है। इसका तात्पर्य है कि i, समीकरण x2 + 1 = 0 का एक हल है।

a + ib के प्रारूप की एक संख्या जहाँ a और b वास्तविक संख्याएँ हैं, एक सम्मिश्र संख्या परिभाषित करती है। उदाहरण के लिए, 2 + i3, (– 1) + , सम्मिश्र संख्याएँ हैं।

सम्मिश्र संख्या z = a + ib के लिए, a वास्तविक भाग कहलाता है तथा Rez द्वारा निरूपित किया जाता है और b काल्पनिक भाग कहलाता है तथा Imz द्वारा निरूपित किया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि z = 2 + i5, तब Rez = 2 और Imz = 5 दो सम्मिश्र संख्याएँ z1 = a + ib तथा z2 = c + id समान होंगी यदि a = c और b = d.

उदाहरण 1 यदि 4x + i(3x y) = 3 + i (– 6), जहाँ x और y वास्तविक संख्याएँ हैं, तब x और y ज्ञात कीजिए।

हल हमें दिया है

4x + i (3x y) = 3 + i (– 6) ... (i)

दोनों ओर के वास्तविक तथा काल्पनिक भागों को समान लेते हुए, हमें प्राप्त होता है,

4x = 3, 3x y = – 6,

जिन्हें युगपत् हल करने पर, और

5.3 सम्मिश्र संख्याओं का बीजगणित (Algebra of Complex Numbers)

इस भाग में, हम सम्मिश्र संख्याओं के बीजगणित का विकास करेंगे।

5.3.1 दो सम्मिश्र, संख्याओं का योग (Addition of two complex numbers) 

यदि z1 = a + ib और z2 = c + id कोई दो सम्मिश्र संख्याएँ हैं। तब z1 + z2 के योग को निम्नलिखित रूप से परिभाषित किया जाता हैः

z1 + z2 = (a + c) + i (b + d), जो कि पुनः एक सम्मिश्र संख्या है।

उदाहरण के लिए, (2 + i3) + (– 6 +i5) = (2 – 6) + i (3 + 5) = – 4 + i 8

सम्मिश्र संख्याओं के योग निम्नलिखित प्रगुणों को संतुष्ट करते हैं।

(i) संवरक नियम दो सम्मिश्र संख्याओं का योगफल एक सम्मिश्र संख्या होती है, अर्थात सारी सम्मिश्र सख्याओं z1 तथा z2 के लिए, z1 + z2 एक सम्मिश्र संख्या है।

(ii) क्रम विनिमय नियम किन्हीं दो सम्मिश्र संख्याओं z1 तथा z2 के लिए

z1 + z2 = z2 + z1

(iii) साहचर्य नियम किन्हीं तीन सम्मिश्र संख्याओं z1, z2 तथा z3 के लिए

(z1 + z2) + z3 = z1 + (z2 + z3).

(iv) योगात्मक तत्समक का अस्तित्व सम्मिश्र संख्या 0 + i 0 (0 के द्वारा दर्शाया जाता है), योगात्मक तत्समक अथवा शून्य सम्मिश्र संख्या कहलाता है जिससे कि प्रत्येक सम्मिश्र संख्या z, z + 0 = z.

(v) योगात्मक प्रतिलोम का अस्तित्व प्रत्येक सम्मिश्र संख्या z = a + ib, के लिए हमें सम्मिश्र संख्या a + i(– b) (– z के द्वारा दर्शाया जाता है) प्राप्त होती है, जोकि योगात्मक प्रतिलोम अथवा z का ऋण कहलाता है। हम प्रेक्षित करते हैं कि z + (–z) = 0 (योगात्मक तत्समक)

5.3.2 दाे सम्मिश्र संख्याओं का अंतर (Difference of two complex numbers) 

किन्हीं दी गई सम्मिश्र संख्याओं z1 और z2 का अंतर z1 z2 निम्न प्रकार से परिभाषित किया जाता हैः

z1 – z2 = z1 + (–z2) उदाहरणार्थ (6 + 3i) – (2 – i) = (6 + 3 i) + (–2 + i) और (2 – i) + (– 6 – 3 i) = – 4 – 4 i

5.3.3 सम्मिश्र संख्याओं का गुणन (Multiplication of two complex numbers) 

मान लीजिए z1 = a + ib तथा z2 = c + id कोई दो सम्मिश्र संख्याएँ हैं। तब गुणनफल z1.z2 निम्नलिखित रूप से परिभाषित किया जाता हैः

z1 z2 = (ac bd) + i(ad + bc)

उदाहरण के लिए, (3 + i5) (2 + i6) = (3 × 2 – 5 × 6) + i(3 × 6 + 5 × 2) = – 24 + i28

सम्मिश्र संख्याओं के गुणन की संक्रिया में निम्नलिखित प्रगुण होते हैंः

(i) संवरक नियम दो सम्मिश्र संख्याओं का गुणनफल, एक सम्मिश्र संख्या होती है, सारी सम्मिश्र संख्याओं z1 तथा z2 के लिए, गुणनफल z1, z2 एक सम्मिश्र संख्या होती है।

(ii) क्रम विनिमय नियम किन्हीं दो सम्मिश्र संख्याओं z1 तथा z2 के लिए,

z1 z2 = z2 z1

(iii) साहचर्य नियम किन्हीं तीन सम्मिश्र संख्याओं z1, z2 तथा z3 के लिए

(z1 z2) z3 = z1 (z2 z3)

(iv) गुणात्मक तत्समक का आस्तित्व सम्मिश्र संख्या 1 + i 0 (1 के द्वारा दर्शाया जाता है), गुणात्मक तत्समक अथवा एकल सम्मिश्र संख्या कहलाता है जिससे कि प्रत्येक सम्मिश्र संख्या z के लिए z.1 = z

(v) गुणात्मक प्रतिलोम का अस्तित्व प्रत्येक शून्येत्तर सम्मिश्र संख्या z = a + ib  (a 0, b 0) के लिए, हमें सम्मिश्र संख्या (अथवा  z–1 के द्वारा दर्शाया जाता है) प्राप्त होती है, z की गुणात्मक प्रतिलोम कहलाती है जिससे कि (गुणात्मक तत्समक)

(vi) बंटन नियम किन्हीं तीन सम्मिश्र संख्याओं z1, z2, z3 के लिए

(a) z1 (z2 + z3) = z1 z2 + z1 z3

(b) (z1 + z2) z3 = z1 z3 + z2 z3

5.3.4 दो सम्मिश्र संख्याओं का भागफल (Division of two complex numbers) 

किन्हीं दो दी हुई सम्मिश्र संख्याओं z1 तथा z2 के लिए, जहाँ z2 0, भागफल निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया जाता है

उदाहरण के लिए, मान लिया z1 = 6 + 3i और z2 = 2 – i

तब =

=

=

5.3.5 i की घात (Power of i ) हमें ज्ञात हैं:

,

, इत्यादि,

इसी प्रकार हम और भी प्राप्त करते हैंः 

सामान्य रूप से, किसी पूर्णांक k के लि, i4 = 1, i4 + 1 = i, i4 + 2 = –1, i4 + 3 = – i

5.3.6 एक ऋण वास्तविक संख्या के वर्गमूल (The square roots of a negative real number)

ज्ञात हैः i2 = –1 और ( – i)2 = i2 = – 1. इसलिए – 1 के वर्गमूल i और i हैं।

यद्यपि चिह्न , का अर्थ हमारे लिए केवल i होगा।

अब हम देख सकते हैं कि i और i दोनों समीकरण x2 + 1 = 0 अथवा x2 = –1 के हल हैं।

इसी प्रकार, i2 = 3 (– 1) = – 3

और = i2 = – 3

इसलिए – 3 के वर्गमूल और हैं।

फिर से केवल को दर्शाने के लिए ही प्रतीक का प्रयोग किया जाता है, अर्थात् = .

सामान्यतया यदि a एक धनात्मक वास्तविक संख्या है, तब = = ,

हम जानते हैं कि सभी धनात्मक वास्तविक संख्याओं a और b के लिए Img02 यह परिणाम तब भी सत्य होगा, जब a > 0, b < 0 या a < 0, b > 0.

क्या होगा ? यदि a < 0, b < 0, हम इसकी जाँच करते हैं

नोट कीजिए कि i2 Img03 = 1 जोकि इस बात का विरोधाभास है कि i2 = –1

इसलिए,Img04यदि a और b दोनों ऋण वास्तविक संख्याएँ हैं।

आगे यदि a और b दोनों में से कोई भी शून्य है, तब स्पष्ट रूप सेImg02 = 0

5.3.7 तत्सम (Identities) 

हम निम्नलिखित तत्समक को सिद्ध करते हैंः

किन्हीं सम्मिश्र संख्याओं z1 और z2 के लिए

( z1 + z2 )2 = z12 + z22 + 2z1z2

उपपεत्त हमें प्राप्त होता है, ( z1 + z2 )2 = ( z1 + z2 ) ( z1 + z2 )

= (z1 + z2) z1+ (z1 + z2) z2 (बंटन नियम)

= (बंटन नियम)

= (गुणन का क्रम विनिमय नियम)

=

इसी भाँति हम निम्नलिखित तत्समकों को सिद्ध कर सकते हैंः

(i)

(ii)

(iii)

(iv)

वास्तव में बहुत से दूसरे तत्समकों को जोकि सभी वास्तविक संख्याओं के लिए सत्य हैं, सभी सम्मिश्र संख्याओं की सत्यता के लिए सिद्ध किया जा सकता है।

उदाहरण 2 निम्नलिखित को a + ib के रूप में व्यक्त करेंः

(i) (ii)

हल (i) = = ==

(ii) = =

उदाहरण 3 (5 – 3i)3 को a + bi के रूप में व्यक्त करेंः

हल हमें प्राप्त है, (5 – 3i)3 = 53 – 3 × 52 × (3i) + 3 × 5 (3i)2 – (3i)3

= 125 – 225i – 135 + 27i = – 10 – 198i

उदाहरण 4 को a + ib के रूप में व्यक्त करें।

हल हमें प्राप्त है =

= =

5.4  सम्मिश्र  संख्या का मापांक और संयुग्मी (The Modulus and the Conjugate of a Complex Number)

मान लीजिए z = a + ib एक सम्मिश्र संख्या है। तब z का मापांक, जो | z | द्वारा दर्शाया जाता है, को ऋणेत्तर वास्तविक संख्याImg05 द्वारा परिभाषित किया जाता है अर्थात् | z | =Img05और z का संयुग्मी, जोImg06द्वारा दर्शाया जाता है, सम्मिश्र संख्या a – ib होता है, अर्थात् = a – ib

उदाहरण के लिए,,,

और , , = 3i – 5

हम प्रेक्षित करते हैं कि ऋणेत्तर सम्मिश्र संख्या z = a + ib का गुणात्मक प्रतिलोम

z–1 = = = = , होता है

अर्थात् z

अग्रतः किन्हीं दो सम्मिश्र संख्याओं z1 एवं z2 के लिए निम्नलिखित निष्कर्षों को सुगमता से व्युत्पन्न किया जा सकता हैः

(i) 

(ii), यदि

(iii) 

(iv)

(v) यदि z2 0.

उदाहरण 5 2 – 3i का गुणात्मक प्रतिलोम ज्ञात कीजिए।

हल मान लिया z = 2 – 3i

तब = 2 + 3i और

इसलिए, 2 – 3i का गुणात्मक प्रतिलोम

z–1प्राप्त होता है।

ऊपर दिया गया सारा हल निम्नलिखित ढंग से भी दिखाया जा सकता हैः

z–1 = =

उदाहरण 6 निम्नलिखित को a + ib के रूप में व्यक्त करें।

(i) 

(ii) i–35

हल (i) = =

= =

(ii) =

प्रश्नावली 5.1

प्रश्न 1 से 10 तक की सम्मिश्र संख्याओं में प्रत्येक को a + ib के रूप में व्यक्त कीजिए।

1. 

2. 

3.

4. 3(7 + i7) + i (7 + i7) 

5. (1 – i) – ( –1 + i6)

6.  

7.

8. (1 – i)4 

9. 

10.

प्रश्न 11 से 13 की सम्मिश्र संख्याओं में प्रत्येक का गुणात्मक प्रतिलोम ज्ञात कीजिए।

11. 4 – 3i 

12. 

13. i

14. निम्नलिखित व्यंजक को a + ib के रूप में व्यक्त कीजिएः

5.5 आर्गंड तल और ध्रुवीय निरूपण (Argand Plane and Polar Representation)

जैसा कि हम पहले से ही जानते हैं कि वास्तविक संख्याओं (x, y) के प्रत्येक क्रमित युग्म के संगत, हमें X Y तल में दो पारस्परिक लंब रेखाओं के संदर्भ में जिन्हें x– अक्ष y – अक्ष द्वारा जाना जाता है, एक अद्वितीय बिंदु प्राप्त होता है। अर्थात् सम्मिश्र संख्या x + iy का जो क्रमित युग्म (x,y) के संगत है, तल में एक अद्वितीय बिंदु (x, y) के रूप में ज्यामितीय निरूपण किया जा सकता है। यह कथन विलोमतः सत्य है।

आकृति 5.1

कुछ सम्मिश्र संख्याओं जैसे 2 + 4i,–2 + 3i, 0 + 1i, 2 + 0i, –5 –2i और 1–2i को जोकि क्रमित युग्मों (2, 4), (–2,3), (0,1), (2,0), (–5,–2) और (1, –2) के संगत हैं, आकृति 5.1 में बिंदुओं A, B, C, D, E और F द्वारा ज्यामितीय निरूपण किया गया है।

तल, जिसमें प्रत्येक बिंदु को एक सम्मिश्र संख्या द्वारा निर्दिष्ट किया गया है, सम्मिश्र तल या आर्गंड तल कहलाता है।

आर्गंड तल में सम्मिश्र संख्या (x + iy) का मापांक बिंदु P(x,y) से मूल बिंदु O(0,0) के बीच की दूरी द्वारा प्राप्त होता है (आकृति 5.2)।

आकृति 5.2

xअक्ष पर बिंदु, सम्मिश्र संख्याओं a + i0 रूप के संगत होते हैं और y–अक्ष पर बिंदु, सम्मिश्र संख्याओं 0 + ib रूप के संगत होते हैं। आर्गंड तल में x–अक्ष और y–अक्ष क्रमशः वास्तविक अक्ष और काल्पनिक अक्ष कहलाते हैं।

आर्गंड तल में सम्मिश्र संख्या z = x + iy और इसकी संयुग्मीImg06= x – iy को बिंदुओं P(x, y) और Q(x, –y) के द्वारा निरूपित किया गया है। ज्यामितीय भाषा से, बिंदु (x, –y) वास्तविक अक्ष के सापेक्ष बिंदु (x, y) का दर्पण प्रतिबिंब कहलाता है (आकृति 5.3)।

आकृति 5.3

5.5.1 एक सम्मिश्र संख्या का ध्रुवीय निरूपण (Polar representation of a complex number) 

माना कि बिंदु P. ऋणेत्तर सम्मिश्र संख्या z = x + iy का निरूपण करता है। माना कि दिष्ट रेखाखंड OP की लंबाई r है और θ वह कोण है जो OP, xअक्ष की धनात्मक दिशा के साथ बनाता है।

हम ध्यान दें कि P वास्तविक संख्याओं के क्रमित युग्म ( r, θ ) से अद्वितीय रूप से निर्धारित किया जाता है। ( r, θ ) बिंदु P के ध्रुवीय निर्देशांक कहलाते हैं आकृति 5.4 देखिए।

 

आकृति 5.4

हम मूल बिंदु को ध्रुव तथा x अक्ष की धन दिशा को प्रारंभिक रेखा मानते हैं।

यहाँ x = r cos θ, y = r sin θ और इसलिए z = r (cos θ + i sin θ), सम्मिश्र संख्या का ध्रुवीय रूप कहलाता है। यहाँ को z का मापांक कहते हैं और θ, सम्मिश्र संख्या का कोणांक या आयाम कहलाता है तथा कोणांक z से निरूपित होता है।

किसी सम्मिश्र संख्या z 0, 0 θ < 2π में θ का केवल मान संगत हैं। फिर भी, 2π की लंबाई के किसी दूसरे, अंतराल के लिए, उदाहरण के तौर पर π < θ π इस प्रकार का एक अंतराल हो सकता है। हम θ का एेसा मान, जिसमें की π < θ π, z का मुख्य आयाम कहलाता है और arg z से निरूपित किया जाता है। आकृति 5.5 और 5.6 देखिए।

Img07

उदाहरण 7 सम्मिश्र संख्या को ध्रुवीय रूप में निरूपित कीजिए।

हल माना 1 = r cos θ, = r sin θ

दोनों तरफ का वर्ग करके और जोड़ने पर हमें प्राप्त है,

Img08

आकृति 5.7

अर्थात् (प्रतिदर्श रूप से, r >0)

इसलिए Img09

इनसे प्राप्त होता है 

इसलिए अपेक्षित ध्रुवीय रूपImg10

सम्मिश्र संख्या संख्या को आकृति 5.7 में दर्शाया गया है।

उदाहरण 8 सम्मिश्र संख्या को ध्रुवीय रूप में रूपांतरित कीजिए।

हल दी हुई सम्मिश्र संख्या =

आकृति 5. 8

=

= (आकृति 5.8)

माना – 4 = r cos θ, = r sin θ

दोनों ओर वर्ग करके और जोड़ने पर हमें प्राप्त होता है 16 + 48 =Img11

जिससे हमें प्राप्त होता है, r2 = 64, अर्थात् r = 8

इसलिए, cos θ =, sin θ =Img12 

इसलिए, आवश्यक ध्रुवीय रूप =Img13

प्रश्नावली 5.2

प्रश्न 1 से 2 तक सम्मिश्र संख्याओं में प्रत्येक का मापांक और कोणांक ज्ञात कीजिएः

1. z = – 1 –  

2. z = – + i

प्रश्न 3 से 8 तक सम्मिश्र संख्याओं में प्रत्येक को ध्रुवीय रूप में रूपांतरित कीजिएः

3. 1 – i 

4. – 1 + i 

5. – 1 – i

6. – 3 

7. + i 

8. i

5.6 द्विघातीय समीकरण (Quadratic Equations)

हमें पहले ही द्विघातीय समीकरणों के बारे में जानकारी है और हमने उनको वास्तविक संख्याओं के समुच्चय में उन स्थितियों में हल किया है जहाँ विविक्तकर 0 है। अब हम निम्नलिखित द्विघातीय समीकरण के बारे में विचार करते हैंः

ax2 + bx + c = 0 जिसमें a, b, c वास्तविक गुणांक हैं और a 0

मान लीजिए कि b2 4ac < 0

हम जानते हैं कि हम सम्मिश्र संख्याओं के समुच्चय में ऋणात्मक वास्तविक संख्याओं के वर्गमूल निकाल सकते हैं। इसलिए उपर्युक्त समीकरण के हल सम्मिश्र संख्याओं के समुच्चय में हैं जोकिImg14 द्वारा प्राप्त होते हैं।

टिप्पणी यहाँ पर, कुछ लोग यह जानने के लिए उत्सुक होंगे, कि किसी समीकरण में कितने मूल होंगे? इस संदर्भ में, निम्नलिखित प्रमेय को उल्लेख (बिना उपपत्ति) के किया गया है जिसे ‘बीजगणित की मूल प्रमेय’ के रूप में जाना जाता है।

"एक बहुपद समीकरण का कम से कम एक मूल होता है"।

इस प्रमेय के फलस्वरूप हम निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण परिणाम पर पहँचते हैं।

"n घात की एक बहुपद समीकरण में n मूल होते हैं।"

उदाहरण 9 x2 + 2 = 0 को हल कीजिए।

हल: हमें दिया है x2 + 2 = 0

या x2 = – 2

अर्थात् x = =i

उदाहरण 10 x2 + x + 1= 0 को हल कीजिए।

हल यहाँ b2 – 4ac = 12 – 4 × 1 × 1 = 1 – 4 = – 3

इसलिए, इसके हल x =हैं

उदाहरण 11 को हल कीजिए।

हल यहाँ, समीकरण का विविक्तकर = 1 – 20 = – 19 है।

इसलिए हल है।

प्रश्नावली 5.3

निम्नलिखित समीकरणों में से प्रत्येक को हल कीजिएः

1. x2 + 3 = 0 

2. 2x2 + x + 1 = 0 

3. x2 + 3x + 9 = 0

4. x2 + x – 2 = 0 

5. x2 + 3x + 5 = 0 

6. x2 x + 2 = 0

7. 

8.

9. 

10.

विविध उदाहरण

उदाहरण 12 का संयुग्मी ज्ञात कीजिए।

हल यहाँ = =

= =

इसलिए का संयुग्मी, है।

उदाहरण 13 निम्नलिखित सम्मिश्र संख्याओं का मापांक एवं कोणांक ज्ञात कीजिए।

(i) (ii)

हल हमें प्राप्त है,== 0 + i

अब, 0 = r cos θ, 1 = r sin θ

दोनों ओर वर्ग करके जोड़ते हुए हमें प्राप्त होता है, r2 = 1 अर्थात् r = 1 तथा

cos θ = 0, sin θ = 1

इसलिए, Img15

इस प्रकार का मापांक 1 है तथा कोणांकImg16 होगा।

(ii)

मान लीजिए = r cos θ, – = r sin θ

भाग (i) की तरह हम प्राप्त करते हैं,

r =, cos θ =, sin θ =

इसलिए Img17

का मापांक तथा कोणांकImg18 है।

उदाहरण 14 यदि x + iy = है तो, सिद्ध कीजिए कि x2 + y2 = 1

हल हमें प्राप्त है, x + iy = = =

इसलिए, x iy =

इस प्रकार x2 + y2 = (x + iy) (x iy) =

= = 1

उदाहरण 15 θ का वास्तविक मान बताइए, जबकि

Img19 मात्र वास्तविक है।

हल हमें प्राप्त है, Img20

Img21

दिया हुआ है कि सम्मिश्र संख्या वास्तविक है।

इसलिए  Img22 अर्थात् sin θ = 0

अत θ = nπ, n Z.

उदाहरण 16 सम्मिश्र संख्याImg23 को ध्रुवीय रूप में परिवर्तित कीजिए।

हल हमें प्राप्त है, z =

= =

मान लीजिए Img24

दोनों ओर वर्ग करके, जोड़ते हुए हमें प्राप्त होता है,

=

अर्थात् r इससे

Img25 प्राप्त होता है

इसलिए Img26 (क्यों ?)

अर्थात्,  Img27 ध्रुवीय रूप है।

अध्याय 5 पर विविध प्रश्नावली

1. का मान ज्ञात कीजिए।

2. किन्हीं दो सम्मिश्र संख्याओं z1 और z2 के लिए, सिद्ध कीजिएः

Re (z1 z2) = Rez1 Rez2 – Imz1 Imz2.

3. को मानक रूप में परिवर्तित कीजिए।

4. यदि , तो सिद्ध कीजिए कि

5. निम्नलिखित को ध्रुवीय रूप में परिवर्तित कीजिएः

(i) (ii)

प्रश्न 6 से 9 में दिए गए प्रत्येक समीकरण को हल कीजिएः

6.  

7.

8.  

9.

10. यदि z1 = 2 – i, z2 = 1 + i, का मान ज्ञात कीजिए।

11. यदि a + ib =, सिद्ध कीजिए कि, a2 + b2 =

12. माना z1 = 2 – i, z2 = –2 + i, निम्न का मान निकालिए।

(i) (ii)

13. सम्मिश्र संख्या का मापांक और कोणांक ज्ञात कीजिए।

14. यदि (x iy) (3 + 5i), –6 – 24i की संयुग्मी है तो वास्तविक संख्याएँ x और y ज्ञात कीजिए।

15. का मापांक ज्ञात कीजिए।

16. यदि (x + iy)3 = u + iv, तो दशाईए कि

17. यदि α और β भिन्न सम्मिश्र संख्याएँ हैं जहाँImg28, तबImg29 का मान ज्ञात कीजिए।

18. समीकरण के शून्येत्तर पूर्णांक मूलों की संख्या ज्ञात कीजिए।

19. यदि (a + ib) (c + id) (e + if) (g + ih) = A + iB है

तो दर्शाइए कि (a2 + b2) (c2 + d2) (e2 + f 2) (g2 + h2) = A2 + B2

20. यदि, तो m का न्यूनतम पूर्णांक मान ज्ञात कीजिए।


सारांश

  • a + ib के प्रारूप की एक संख्या, जहाँ a और b वास्तविक संख्याएँ हैं, एक सम्मिश्र संख्या कहलाती है, a सम्मिश्र संख्या का वास्तविक भाग और b इसका काल्पनिक भाग कहलाता है।
  • माना z1 = a + ib और z2 = c + id, तब

(i) z1 + z2 = (a + c) + i (b + d)

(ii) z1 z2 = (ac bd) + i (ad + bc)

  • किसी शून्येत्तर सम्मिश्र संख्या z = a + ib (a 0, b 0) के लिए, एक सम्मिश्र संख्या, का अस्तित्व होता है, इसे या z–1 द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है और z का गुणात्मक प्रतिलोम कहलाता है जिससे कि (a + ib) = 1 + i0 =1 प्राप्त होता है।
  • किसी पूर्णांक k के लिए, i4 = 1, i4 + 1 = i, i4 + 2 = – 1, i4 + 3 = – i
  • सम्मिश्र संख्या z = a + ib का संयुग्मी द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है और = a ib द्वारा दर्शाया जाता है।
  • सम्मिश्र संख्या z = x + iy का ध्रुवीय रूप r (cos θ + i sin θ), है, जहाँ r = (z का मापांक) और cosθ =, sinθ = (θ, z का कोणांक कहलाता है।) θ का मान, जिससे कि π < θ π, z का प्रमुख कोणांक कहलाता है।
  • एक n घातवाले बहुपद समीकरण के n मूल होते हैं।
  • एक द्विघातीय समीकरण ax2 + bx + c = 0, जहाँ a, b, c R, a 0, b2 – 4ac < 0, के हल x = i के द्वारा प्राप्त होते हैं।

एेतिहासिक पृष्ठभूमि

यूनानियों ने इस तथ्य को पहचाना था कि एक ऋण संख्या के वर्गमूल का वास्तविक संख्या पद्धति में कोई अस्तित्व नहीं है परंतु इसका श्रेय भारतीय गणितज्ञ Mahavira (850 ई॰) को जाता है जिन्होंने सर्वप्रथम इस कठिनाई का स्पष्टतः उल्लेख किया। "उन्होंने अपनी कृति ‘गणित सार संग्रह’ में बताया कि ऋण (राशि) एक पूर्णवर्ग (राशि) नहीं है, अतः इसका वर्गमूल नहीं होता है।’’ एक दूसरे भारतीय गणितज्ञ Bhaskara ने 1150 ई॰ में अपनी कृति ‘बीजगणित’ में भी लिखा है, "ऋण राशि का कोई वर्गमूल नहीं होता है क्योंकि यह एक वर्ग नहीं है।" Cardan (1545 इ॰) ने x + y = 10, xy = 40 को हल करने में उत्पन्न समस्या पर ध्यान दिया। उन्होंने x = 5 + तथा y = 5 – इसके हल के रूप में ज्ञात किया जिसे उन्होंने स्वयं अमान्यकर दिया कि ये संख्याएँ व्यर्थ (useless) हैं। Albert Girard (लगभग 1625 ई॰) ने ऋण संख्याओं के वर्गमूल को स्वीकार किया और कहा कि, इससे हम बहुपदीय समीकरण की जितनी घात होगी, उतने मूल प्राप्त कराने में सक्षम होंगे। Euler ने सर्वप्रथम को i संकेतन प्रदान किया तथा W.R. Hamilton (लगभग 1830 ई॰) ने एक शुद्ध गणितीय परिभाषा देकर और तथाकथित ‘काल्पनिक संख्या’ के प्रयोग को छोड़ते हुए सम्मिश्र संख्या a + ib को वास्तविक संख्याओं के क्रमित युग्म (a, b) के रूप में प्रस्तुत किया।

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