परियोजनाएं प्रस्तावना विज्ञान में ज्ञान के विस्तार और परिणामस्वरूप श्िाक्षा प(ति में परिवतर्न के कारण शैक्षण्िाक विध्ियों में बदलाव आया है। अब पढ़ाने के लिए पुरातन प्रवचन विध्ि के स्थान पर खोज परक और विचार विमशर् की वििायों को अध्िक महत्व दिया जाता है। हायर सेवेंफडरी स्तर पर विज्ञान श्िाक्षण में परियोजना - कायर् सम्िमलित करके एक नया आयाम जोड़ दिया गया है। परियोजना द्वारा श्िाक्षा देना व्यैक्ितक श्िाक्षण तकनीक है यह विद्याथीर् को समस्या के निधर्रण, अपनी कायर् योजना बनाने, उचित संसाधन ढूंढ़नें, अपनी योजना को वि्रफयान्िवत करने और निष्कषर् निकालने का अवसर देती हैं इस प्रकार से विद्याथीर् आधरभूत वैज्ञानिक सि(ांतों, विध्ियों और प्रवि्रफयाओं से परिचित होते हैं और वैज्ञानिक खोज के विभ्िान्न पक्षों का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करते हैं। इस प्रकार से परियोजना कायर् सहायक होता है - ;कद्ध विज्ञान में अभ्िारूचि के उद्दीपन में ;खद्ध वैज्ञानिक जिज्ञासा उत्पन्न करने में ;गद्ध स्वतंत्रा विवेचनात्मक सोच उत्पन्न करने में ;घद्ध विज्ञान के क्षेत्रा के विभ्िान्न साध्नों और तकनीकों के उपयोग का अनुभव देने में और ;चद्ध आत्मविश्वास उत्पन्न करने में। इसलिए वतर्मान में विज्ञानश्िाक्षण में और अध्िक परियोजना कायर् को प्रोत्साहन देने की प्रवृिा है। किसी भी प्रकार की खोजबीन, जो पुस्तकालय, प्रयोगशाला, कायर्क्षेत्रा अथवा घर में प्रतिपादित, योजनाब( और कायार्न्िवत की गइर् हो, खोज परक परियोजना होती है। परियोजना इतनी आसान हो सकती है कि खनिजों के नमूने एकत्रा किए जाएं और यह इतनी कठिन हो सकती है जिसमें किसी रसायन के उत्पादन की परिस्िथति के अनुवूफल प्रवि्रफया खोजी जाए। वुफछ परियोजनाएं पूणर्तः सै(ांतिक हो सकती हैं और इनमें केवल पुस्तकालय में कायर् की आवश्यकता होती है। अन्यों में प्रयोगशाला में प्रायोगिक कायर् की आवश्यकता पड़ सकती है। विज्ञान का प्रायोगिक कायर् विद्याथ्िार्यों को अनेकों वैज्ञानिक उपकरणों, साध्नों और बौिक वुफशलता से परिचित करता है। परियोजना का चुनाव करना सामान्यतः परियोजना का चुनाव विद्याथ्िार्यों द्वारा किया जाना चाहिए। परियोजना का विचार कक्षा में विषय पढ़ते समय, विभ्िान्न परियोजनाओं की रिपोटर् पढ़ते समय, विज्ञान समाचारों से, विज्ञान पत्रिाकाओं के लेख पढ़ते समय इत्यादि से प्राप्त होता है। कभी - कभी विज्ञान परियोजना का विचार कक्षा में उन विषयों पर विचार विमशर् करते समय उत्पन्न हो सकता है जहाँ परीक्षण, परिमाण और व्याख्या की आवश्यकता होती है। परियोजनाओं के लिए विचार प्राप्त करने के लिए विज्ञान की वुफछ पत्रिाकाएँ हैं - ;कद्ध जनर्ल आॅपफ केमिकल ऐजुकेशन ;खद्ध वैफमेस्ट्री ऐजुकेशन ;गद्ध ऐजुकेशन इन केमेस्ट्री ;घद्ध न्यू सांइटिस्ट ;चद्ध स्वूफल साइंस ;छद्ध स्वूफल साइंस रिव्यू ;जद्ध साइंस ;झद्ध साइंटिपिफक अमेरिकन ;टद्ध स्वूफल साइंस रिसोर्स लेटर इत्यादि। एक बार परियोजना कायर् प्रारंभ होने के पश्चात इससे नए शीषर्क और विचार प्राप्त हो सकते हैं। यदि उपरोक्त वैज्ञानिक साहित्य आसानी से उपलब्ध् हो तब भी यह मान लेना उचित नहीं है कि विद्याथीर् सहजता से कायर् प्रारंभ कर पाएंगे। वैज्ञानिक पत्रिाकाओं की उपरोक्त सूची में से अध्िकतर भारतीय स्वूफलों में उपलब्ध् नहीं होते अतः विद्याथ्िार्यों को श्िाक्षकों के मागर्दशर्न की आवश्यकता होती है। यदि वुफछ विद्याथ्िार्यों को परियोजना के लिए विचार न मिलें तो श्िाक्षक परियोजनाओं के सुझाव के लिए सूची दे सकते हैं या विद्याथ्िार्यों को विज्ञान मेलों में यह दिखाने के लिए ले जा सकते हैं कि दूसरे विद्याथीर् क्या कर रहे हैं। परियोजनाओं पर कायर् करने के लिए रूपरेखा नीचे दी गइर् है - 1. परियोजना का शीषर्क 2. परियोजना का उद्देश्य और महत्व 3. परियोजना की कायर् योजना का संक्ष्िाप्त विवरण परियोजना का शीषर्क इस प्रकार से लिखा जाना चाहिए कि परियोजना का उद्देश्य और महत्व साप़्ाफ हो। दूसरे शब्दों में परियोजना का शीषर्क और उद्देश्य रुचि और जिज्ञासा उत्पन्न करने वाले होने चाहिए। परियोजना के कायर् की रूपरेखा विद्याथ्िार्यों को कायर् प्रारंभ करने में सहायता करती है। यह विवाद का विषय हो सकता है कि परियोजना के लिए विचारों का सुझाव देने से परियोजना कायर् का मौलिकता नामक मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है, परन्तु विद्याथ्िार्यों को मागर्दशर्न देना प्रत्येक विद्याथीर् को किसी उद्देश्य के लिए पहली बार प्रारंभ करने को प्रेरित करने के लिए संपूणर्तः वैज्ञानिक और आवश्यक है। सेन्ट्रल बोडर् आॅपफ सेवेंफड्री ऐजुकेशन ने परियोजना कायर् के लिए दस घंटे ;पीरियडद्ध का समय निधर्रित किया है। विद्याथीर् सत्रा के शुरू होते ही कायर् प्रारंभ कर सकते हैं और इसे चरणों में पूरा करके परियोजना रिपोटर् सत्रा के अन्त में प्रस्तुत कर सकते हैं। यह परियोजना कायर् के निविर्ध्न संचालन के लिए एक आवश्यक कारक है। विद्याथीर् को परियोजना कायर् की योजना बहुत पहले बनाकर इसकी रूपरेखा पर श्िाक्षक से विचार विमशर् कर लेना चाहिए। यदि किसी उपकरण अथवा यंत्रा का काम चलाने के लिए प्रबंध् न करना हो या प्रयोगशाला में कोइर् रसायन उपलब्ध् न हो तो श्िाक्षक की सहायता ली जा सकती है। यदि तकनीक अथवा अकादमिक मागर्दशर्न की आवश्यकता हो तो न केवल रसायन के संबंध्ित श्िाक्षक से अपितु भौतिकी और विज्ञान के अन्य श्िाक्षकों की सहायता भी ली जा सकती है। जहाँ तक संभव हो, ऐसी परियोजना का चुनाव करना चाहिए जिसकी आवश्यक सामग्री ;उपकरण, यंत्रा, रसायन इत्यादिद्ध आसानी से उपलब्ध् हो। यदि रसायन या उपकरण काम चलाउफ अथवा मूल उपकरण प्रयोगशाला में उपलब्ध् न हों और विद्याथीर् परियोजना कायर् के लिए इतना उत्सुक हो कि इसे खरीदना चाहे और यह उसकी सामथ्यर् में हो तो वह खरीद सकता है। विद्याथ्िार्यों को बहुत खचीर्ली परियोजनाओं को लेने से मना करना चाहिए। प्रभावी परियोजना कायर् का अभ्िागम विषयोन्मुख न होकर एकीवृफत होना चाहिए। प्रयोगशाला में परियोजना कायर् करने के लिए बड़े और अलग स्थान की आवश्यकता हो सकती है। ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि दिए गए समय में सभी विद्याथीर् प्रयोगशाला में कायर् न करें। वुफछ विद्याथीर् पुस्तकालय में संदभर् - पुस्तवेंफ इकट्टòी करें जबकि अन्य विद्याथीर् प्रयोगों की रूपरेखा तैयार करें। संक्षारण और किणवन इत्यादि जैसी लम्बे समय तक चलने वाले प्रयोगों को करने में वुफछ समस्याएं आ सकती हैं। इसके लिए सुझाव है कि प्रयोगशाला में एक अलग मेश हो जिस पर लम्बे समय तक चलने वाले प्रयोग व्यवस्िथत किए जा सवेंफ। परियोजना से संबंध्ित वुफछ रसायन और उपकरणों को व्यवस्िथत करने के लिए विद्याथ्िार्यों का नामलिखे गत्ते के डिब्बों का प्रयोग किया जा सकता है। यदि खाली बोतलें उपलब्ध् हों तो रसायनों को रखने के काम में लाइर् जा सकती हैं। परियोजना कायर् के अवलोकलनों को रिकाडर् करना अत्यंत आवश्यक होता है। विद्याथ्िार्यों को प्रोत्साहित करना चाहिए कि वे नकारात्मक परिणामों को भी रिकाडर् करें। परियोजना की रिपोटर् लिखने के लिए एक सामान्य रूप रेखा नीचे दी गइर् है। इसमें निम्नलिख्िात बिंदु होने चाहिए - 1.परियोजना का शीषर्क जिससे उद्देश्यों की झलक मिलती हो। 2.जाँच के सि(ांत 3.आवश्यक उपकरण और रसायन 4.यदि कोइर् कामचलाउफ व्यवस्था की गइर् हो तो उसका उल्लेख 5.प्रवि्रफया 6.अवलोकन और परिकलन 7.परिणाम और वे तवर्फ जो परिणामों का आधर हों। 8.सावधनियाँ 9.आगे जाँच के लिए यदि कोइर् सुझाव हो। उपरोक्त रूपरेखा को स्पष्ट करने के लिए एक परियोजना रिपोटर् का नमूना अन्त में दिया गया है। यह ध्यान रहे कि परियोजना रिपोटर् का नमूना परियोजना लिखते समय विद्याथ्िार्यों के मागर्दशर्न के लिए है। यह सवा±गीण नहीं है और इसमें और सुधर किए जा सकते हैं। वुफछ परियोजनाओं की संक्ष्िाप्त रूपरेखा पुस्तक में दी गइर् है। शीषर्क जल में सल्पफाइड आयन की सांद्रता ज्ञात करके जीवाणु द्वारा जल प्रदूषण का परीक्षण करना और प्रदूषण का कारण जानना। उद्देश्य विभ्िान्न स्रोतों से प्राप्त जल के नमूनों में सल्पफाइड आयन की सांद्रता निधर्रित करके जीवाणु प्रदूषण ज्ञात करना। पृष्ठभूमि जल में सल्पफाइड आयनों की उपस्िथति तब होती है जब अवायवीय जीवाणु जैव द्रव्यों का अपघटन करते हैं अथवा सल्पेफटों को अपचित करते हैं। यह ठहरे हुए जल में पाए जाते हैं। सामान्यतः कागश की मिल, गैस उद्योग, चमर् उद्योग, सीवर और दूसरे रासायनिकउद्योग इस प्रकार के जीवाणुओं की बढ़वार के लिए उत्तरादायी होते हैं। संक्ष्िाप्त प्रवि्रफया नमूने एकत्रिात करना सल्पफाइड आसानी से आक्सीवृफत हो जाते हैं अतः नमूना लेते समय सावधानी रखनी चाहिए कि वायु को नाइट्रोजन अथवा काबर्न डाइआॅक्साइड जैसी गैसों द्वारा निकाल दिया जाएपरन्तु नमूना एकत्रा करते ही ‘स्िथर’ कर देना सवोर्त्तम होता है। यह ब्क.र्द ऐसीटेट विलयन मिलाकर किया जा सकता है। इसके लिए 80 उस् जल में 20 उस् ब्क.र्द ऐसीटेट विलयन मिला कर वुफल 100 उस् आयतन प्राप्त करें। ब्क.र्द ऐसीटेट विलयन बनाने के लिए 50 ह वैफडमियम और 50 ह िांक ऐसीटेट को 1ण्0 स् जल में घोलें। यदि नमूना अम्लीय प्रवृफति का हो तो पहले इसे क्षारक के आध्िक्य से उदासीन कर लें। ‘स्िथर’ किए गए विलयन का अनुमापन एक अनुमापन फ्रलास्क में ‘स्िथर’ किए गए नमूने के 100 उस् लेकर 0ण्025 ड आयोडीन विलयन के 20 उस्मिलाकर तुरंत ;1रू1द्ध भ्ब्स के 15 उस् मिलाएं। आयोडीन के आध्िक्य को 0ण्05 ड छं2ै2व्3 द्वारा अनुमापित करें। स्टाचर् को सूचक की तरह अंत्य - बिंदु के पास मिलाएं। भ्ै से अभ्िावि्रफया में प्रयुक्त हुइर् आयोडीन की मात्रा से मूल2नमूनों में उपस्िथत सल्पफाइड आयनों की मात्रा की गणना करें। यदि रिक्त अनुमापन के आंकड़े उपलब्ध् हों तो उन्हें गणना से प्राप्त मात्रा में से घटाएं। शीषर्क जल शुिकरण की विध्ियों का अध्ययन। उद्देश्य ऽ शुिकरण की विभ्िान्न विध्ियों में उपयुक्त सि(ांत का अध्ययन। ऽ विभ्िान्न विध्ियों से प्राप्त शु(ता के स्तर का अध्ययन। ऽ शुिकरण की विभ्िान्न विध्ियों के लाभ और हानि का अध्ययन। ऽ शु( जल के विशेष उपयोगों को ज्ञात करना। पृष्ठभूमि विभ्िान्न प्रावृफतिक स्रोतों से प्राप्त जल की शु(ता भ्िान्न - भ्िान्न होती है। प्रदूषण और अशु(ता का प्रकार उस स्रोत पर निभर्र होता है जिससे जल प्राप्त किया गया हो। पेय जल के अतिरिक्त हमें शु( जल की आवश्यकता दूसरे अनेकों प्रयोजनों के लिए होती है उदाहरणाथर्, रासायनिक विश्लेषण के लिए। जल शुिकरण की कइर् विध्ियाँ उपलब्ध् हैं। यह अशुि और प्रदूषण को अलग - अलग स्तर तक निकालती हैं। इन विध्ियों को प्रयुक्त करने के वुफछ लाभ और हानियाँ हैं। शुिकरण की विभ्िान्न विध्ियों की तुलना से विशेष कायर् के लिए विशेष शु(ता वाला जल प्राप्त करने की जानकारी प्राप्त होगी। प्रवि्रफया विद्याथीर् आसपास की बस्ती में उपयोग में ली जा रही विभ्िान्न तकनीकों को जानने के लिए सवेर्क्षण कर सकते हैं। विशेष शु(ता के जल का उपयोग जानने के लिए वे साहित्य का सवेर्क्षण कर सकते हैं और उद्योगों का भ्रमण कर सकते हैं। परियोजना के विभ्िान्न पक्षों का अध्ययन करने के लिए विद्याथीर् समूहों में कायर् कर सकते हैं। शीषर्क विभ्िान्न स्थानीय परिवतर्न की स्िथतियों में पेय जल में कठोरता, आयरन, फ्रलुओराइड, इत्यादि की उपस्िथति की जाँच करना और यदि अनुमत मात्रा से अध्िक उपस्िथत हों तो कारण का अध्ययन करना। उद्देश्य ऽ जल के विभ्िान्न नमूनों में कठोरता, आयरन, फ्रलुओराइड और क्लोराइड इत्यादि की जाँच करना। ऽ जल में उपरोक्त आयनों के आने के स्थानीय स्रोतों की जानकारी प्राप्त करना। ऽ यदि आयन अनुमत मात्रा से अध्िक हों तो उनके स्वास्थ्य पर प्रभाव का अध्ययन करना। ऽ यह जानकारी प्राप्त करना कि क्या ऐसी ही समस्या बस्ती अथवा उसके आसपास हैं? पृष्ठभूमि पेय जल की गुणवत्ता का मनुष्य के स्वास्थ्य और जीवन से सीध संबंध् है। यदि लोह,फ्रलुओराइड और क्लोराइड इत्यादि अनुमत मात्रा से अध्िक मात्रा में उपस्िथत हों तोस्वास्थ्य की अनेक समस्याएं उत्पन्न कर सकते हैं। उदाहरणाथर् यदि फ्रलुओराइड की मात्राअनुमत मात्रा से अध्िक हो तो स्थानीय लोगों को फ्रलुओरोसिस हो सकता है। जल की कठोरता, वैफल्िसयम और मैग्नीश्िायम आयनों के कारण होती है। यह सवर्विदित है कठोर जल धुलाइर् के कायर् के लिए उपयुक्त नहीं होता अतः आयनों की मात्रा और प्रकार को जानना अत्यन्त आवश्यक है। प्रवि्रफया विद्याथीर् विभ्िान्न स्रोतों से जल के नमूने एकत्रा कर सकते हैं। वे विश्लेषण की सामान्य प्रवि्रफया द्वारा विभ्िान्न आयनों की उपस्िथति ज्ञात कर सकते हैं। जल की संपूणर् कठोरता का दृआकलन संवुफलमितीय अनुमापन की मानक प्रवि्रफया द्वारा किया जा सकता है। ब्सदृए थ्और थ्म2़ आयनों का आकलन करना इस स्तर पर कठिन होगा अतः मात्रात्मक आंकड़े प्राप्त करने के लिए मानक प्रयोगशालाओं की सहायता ली जा सकती है। शीषर्क कपड़ा धेने के विभ्िान्न साबुनों की पेफनन क्षमता की जाँच और उनकी पेफनन क्षमता पर सोडियम काबोर्नेट मिलाने का प्रभाव। उद्देश्य साबुनों की पेफनन क्षमता और उनकी पेफनन क्षमता पर सोडियम काबोर्नेट मिलाने के प्रभाव का अध्ययन। संक्ष्िाप्त प्रवि्रफया साबुन के 1ह नमूने को 100 उस् आसुत जल में पूणर्तः घोल लें। एक क्वथन नली में 10 उस् साबुन का विलयन लेकर इसके मुँह को कावर्फ से बंद कर दें और विलयन को 20 बराबर झटके देकर हिलाएं जिससे पेफन एक समान बढ़ंे। क्वथन नली की लंबाइर् वहाँ तक नापें जहाँ तक पेफन उठा है। इसी प्रकार से दूसरे साबुनों के साथ प्रयोग को दोहराएं। प्रत्येक साबुन के उपरोक्त विलयन के 50 उस् में अलग - अलग 0.5 ह सोडियम काबोर्नेट घोलें। अब क्वथन नली में 10 उस् विलयन लेकर बराबर बार ;उदाहरण 20 एक से झटकेद्ध हिलाएं। जहाँ तक पेफन उठे वहाँ तक लंबाइर् नापें। साबुनों के अन्य विलयनों के साथ प्रयोग दोहराएं। अवलोकनों को सारणीब( करें। सोडियम काबोर्नेट मिलाने के बाद और पहले विभ्िान्न साबुनों से उठे पेफन की उफँचाइर् की तुलना करें और निष्कषर् निकालें। शीषर्क चाय की पिायों के विभ्िान्न नमूनों की अम्लीयता और इन पिायों से बनी चाय के रंग में अन्तर के कारण का अध्ययन। उद्देश्य चाय के विभ्िान्न नमूनों में अम्लों की सांद्रता का पता लगाना और निष्कषर् के रंग पर अम्ल अथवा क्षार मिलाने के प्रभाव का अध्ययन। संक्ष्िाप्त प्रवि्रफया ;कद्ध चाय में उपस्िथत अम्लों की सांद्रता पता लगाना 200 उस् आसुत जल में चाय की पिायों के 10 ह नमूने का निष्कषर् बनाएं। इसके लिएचाय की पत्ती के अलग - अलग नमूनों को निधर्रित समय तक आसुत जल के साथ उबालें। चाय का 5 उस् निष्कषर् शंक्वाकार फ्रलास्क में लेकर 20 उस् आसुत जल से तनुवृफत डकरें। विलयन को एकसार मिलाने के लिए अच्छी तरह हिलाएं और छंव्भ् तथा50प़्ाफीनाॅफ्रथेलीन सूचक का प्रयोग करके इसे अनुमापित करें। चाय के विभ्िान्न नमूनों में अम्लों की सांद्रता की गणना मोलरता में करें। यदि चाय के रंग से कोइर् समस्या हो तोनिष्कषर् को ब्यूरेट में लें और सोडियम हाइड्राॅक्साइड विलयन को शंक्वाकार फ्रलास्क मेंलें। यदि सोडियम हाइड्राॅक्साइड विलयन शंक्वाकार फ्रलास्क में लिया जाए तो रंग परिवतर्न गुलाबी से रंगहीन की ओर होगा। ;खद्ध चाय के निष्कषर् के रंग पर अम्लों और क्षारकों का प्रभाव निस्यंद पत्रा की चार पिðयाँ लेकर उन्हें ‘क’, ‘ख’, ‘ग’, ‘घ’ और ‘च’ नामांकित करें। सभी पिðयों को चाय के निष्कषर् के किसी एक नमूने में डुबाएं और निकाल लें। अब ‘क’, ‘ख’, ‘ग’, एवं ‘घ’ पिðयों पर व्रफमशः तनु भ्ब्स, ऐसीटिक अम्ल विलयन, छंव्भ् विलयन डाले। इन पिðयों के रंग में परिवतर्न की तुलना ‘घ’ पट्टðी के रंग से करें। इस प्रयोग को चाय के निष्कषर् के अन्य नमूनों के साथ दोहराएं। शीषर्क विभ्िान्न द्रवों के वाष्पन की दर का अध्ययन। उद्देश्य विभ्िान्न द्रवों की वाष्पन दर और उनकी रासायनिक संरचना के मध्य संबंध् का अध्ययन। संक्ष्िाप्त प्रवि्रफया पाँच सापफ और शुष्क तोलने की नलियाँ लेकर उन्हें ‘क’, ‘ख’, ‘ग’, ‘घ’ और ‘च’ नामांकित करें। प्रत्येक तोलने की नली को इसके ढक्कन के साथ तोलें। अब अलग - अलग तोलने की नली में अलग - अलग 10 उस् द्रव ;ऐथेनाॅल, इर्थर, टेट्राक्लोरोमेथेन, ऐसीटोन इत्यादिद्ध लें। प्रत्येक तोलने की नली को दोबारा तोलें और प्रत्येक तोलने की नली में लिए गए द्रव का द्रव्यमान ज्ञात करें। तोलने की नलियों के ढक्कन हटा दें और उन्हें एक घंटे तक कक्ष ताप पर रहने दें। ठीक एक घंटे बाद प्रत्येक तोलने की नली को ढक्कन लगाकर बंद कर दें और उन्हें एक - एक करके तोल लें। प्रत्येक द्रव के घटे द्रव्यमान को परिकलित करें। प्रत्येक द्रव के वाष्पन के लिए ताप और सतह का क्षेत्रापफल समान होना चाहिए। प्रत्येक द्रव के वाष्पन की दर ग्राम प्रति सेवंफड में पता लगाएं। द्रवों के वाष्पन की दर को उनकी रासायनिक संरचना और आंतरा - आण्िवक/अंतरा - आण्िवक वलों के मध्य विभ्िान्नता से संब( करिए। शीषर्क रेशों की तनन क्षमता पर अम्लों और क्षारों का प्रभाव। उद्देश्य विभ्िान्न प्रकार के रेशों की तनन क्षमता पर अम्लों और क्षारों के प्रभाव का अध्ययन करना। संक्ष्िाप्त प्रवि्रफया रेशे की तनन क्षमता को उस न्यूनतम भार द्वारा मापा जाता है जो इसे तोड़ने के लिए आवश्यक है। इसे निम्नलिख्िात प्रकार से किया जा सकता है। लगभग 20 बउ लंबाइर् का एक धगा लें और इसके एक सिरे को लोहे के स्टैंड पर स्िथर की गइर् वलय पर बाँध् दे और दूसरे सिरे को एक हैंगर से बाँध् दें जिस से भार लटका हो। हैंगर पर भार बढ़ाएं और धगा तोड़ने के लिए आवश्यक न्यूनतम भार ज्ञात करें। समान लंबाइर् और मोटाइर् के परन्तु अलग - अलग पदाथर् के ;उदाहरणाथर्: रूइर्, उफन, रेशम, टेरीलीन इत्यादिद्ध धगे लेकर प्रयोग को दोहराएं। यह भार रेशे की तनन क्षमता का माप है।रेशे की तनन क्षमता पर अम्लों और क्षारों के प्रभाव का निधर्रण उन्हें एक समान सांद्रता के तनु भ्ब्स और तनु छंव्भ् विलयन में अलग - अलग बराबर समय के लिए डुबोकर किया जा सकता है। थोड़े और निश्िचत समय के बाद, रेशों को विलयन से निकाल कर जल से धेकर सुखा लिया जाता है। इसके बाद इन धगों को तोड़ने के लिए आवश्यक न्यूनतम भार को ज्ञात किया जाता है। यह भार रेशे की अम्ल अथवा क्षार से वि्रफया के बाद तनन क्षमता का माप है। अपने अवलोकनों की व्याख्या रेशे के पदाथर् की रासायनिक संरचना के आधर पर कीजिए। शीषर्क सब्िशयों और पफलों में उपस्िथत अम्लों और खनिजों का अध्ययन। उद्देश्य ;कद्ध विभ्िान्न सब्िशयों और पफलों में उपस्िथत अम्लों की संपूणर् मात्रा ज्ञात करना। ;खद्ध सब्िशयों और पफलों में आयरन, काबोर्हाइड्रेट, प्रोटीन और शवर्फरा इत्यादि की उपस्िथति का पता लगाना। संक्ष्िाप्त प्रवि्रफया ;कद्ध अम्ल का अंश ;सेब, संतरा, आँवला, नींबू, गाजर, गन्ना इत्यादिद्ध वुफछ पफलों और सब्िजयों को दबाकर रूप निकालें। रसों को अलग - अलग पात्रों में रखें। विभ्िान्न नमूनों की चभ् ज्ञात करें। रसों को डध्100 पोटैश्िायम हाइड्राॅक्साइड से अनुमापित करके अम्ल की मात्रा ज्ञात करें। इसके लिए पफीनाॅल.फ्रथेलीन को सूचक की तरह प्रयुक्त करें। यदि रसों का रंग गहरा हो ़तो पयार्प्त मात्रा में आसुत जल मिलाकर तनुवृफत कर लें जिससे अनुमापन में सुस्पष्ट अंत्यबिंदु प्राप्त किया जा सके। रसों के अम्ल मान की तुलना करके उनमें अम्ल के अंश की तुलना करें। पफलों और सब्िजयों में उपस्िथत अम्ल को उदासीन करने के लिए आवश्क पोटैश्िायम हाइड्राॅक्साइड की मिलिग्राम में मात्रा अम्लमान कहलाती है। ;खद्ध आयरन, काबोर्हाइड्रेट, प्रोटीन और शवर्फरा का अंश सब्िशयों और पफलों के रस में आयरन की उपस्िथति ज्ञात करने के लिए रस को सांद्र भ्छव्3 अम्ल के साथ वुफछ समय तक गरम करने के पश्चात आयरन का परीक्षण करें। काबोर्हाइड्रेट ;स्टाचर्द्ध प्रोटीन एवं शवर्फरा को सामान्य परीक्षणों द्वारा पहचाना जा सकता है। शीषर्क एक ही सजातीय श्रेणी के काबर्निक यौगिकों की श्यानता में ;कद्ध आण्िवक द्रव्यमान और ;खद्ध काबर्न शंृखला की संरचना के साथ परिवतर्न का अध्ययन। पृष्ठभूमि शहद और मोबिल आॅयल जैसे वुफछ द्रव बहुत ध्ीरे बहते हैं जबकि जल और मिट्टðी के तेल जैसे दूसरे द्रव तेजी से बहते हैं। जो द्रव ध्ीरे बहते हैं उन्हें श्यान द्रव कहते हैं और दूसरे जो जल्दी बहते हैं अश्यान द्रव कहलाते हैं। किसी द्रव का बहाव के प्रति प्रतिरोध् श्यानता कहलाता है। श्यानता द्रव में उपस्िथत अंतराआण्िवक बलों से संबंध्ित होती है।अंतराआण्िवक बलों के परिमाण में विभ्िान्नता के कारण द्रवों की श्यानता में भ्िान्नता होती है। किसी विशेष सजातीय श्रेणी के सजातियों और समावयवियों की श्यानता की तुलना करके उनमें उपस्िथत अंतराआण्िवक बलों का बोध् हो जाता है। उद्देश्य इस परियोजना का उद्देश्य ;कद्ध श्यानता एवं आण्िवक द्रव्यमान तथा ;खद्ध श्यानता एवं काबर्न शंृखला की प्रवृफति मंे संबंध् स्थापित करना है। सि(ांत द्रव का बहाव के प्रति प्रतिरोध् श्यानता गुणांक द्वारा मापा जा सकता है जिसे निम्नलिख्िात प्रकार से परिभाष्िात करते हैं - किसी द्रव का निश्िचत ताप पर श्यनता गुणांक वह स्थाइर् बल होता है, जो इकाइर् दूरी पर स्िथत द्रव की ऐसी दो परतों के मध्य, जिनका इकाइर् क्षेत्रापफल संपवर्फ में हो, श्यानता का अंतर इकाइर् रखने के लिए आवश्यक होता है। श्यानता गुणांक को ओस्टवाल्ड श्यानता ऽ ऐसीटोन और ऐल्कोहाॅल कीमापी द्वारा मापा जाताा है। दो द्रवों के लिए, जिनके श्यानता गुणांक η1 औरη2 हों, बहाव बोतलों को खुला न छोड़ें क्योंकिका समय ;सेवंफड मेंद्ध जएवंजहों तथा जिनका घनत्व व्रफमशः कऔर कहो तो इनमें12 12 ये ज्वलनशील होते हैं।निम्नलिख्िात संबंध् होता है - ऽ बोतलों को ज्वाला से दूर रखें। η क × जऽ प्रयोग करने के पश्चात् अपने1 11त्र हाथों को धेएं।η क × ज2 22 ऽ सुरक्षा - चश्मा पहनें। अतः यदि एक द्रव की श्यानता ज्ञात हो तो दूसरे की श्यानता ज्ञात की जा सकती है। आवश्यक सामग्री ओस्टवाल्ड श्यानतामापी, स्टाॅप वाॅच, बीकर ;250 उस्द्धए पिपेट, मापक सिलेंडर, मिट्टðी का तेल, पेट्रोल, डीशल, मेथ्िाल ऐल्कोहाॅल, एथ्िाल ऐल्कोहाॅल, प्रोपिल ऐल्कोहाॅल, आइसोप्रोपिल ऐल्कोहाॅल, ब्यूटिल ऐल्कोहाॅल, ऐमिल ऐल्कोहाॅल। प्रवि्रफया श्यानतामापी को धेकर ऐल्कोहाॅल से खंगालने के बाद सुखा लिया गया। इसमें प्रेक्षण के अंतगर्त आने वाले द्रव के 10 उस् भरने के बाद श्यानतामापी पर बने दो निशानों के मध्य द्रव के बहने में लगने वाले समय को स्टाॅप वाॅच की सहायता से नोट किया। इन प्रेक्षणों को सारणी.प् एवं प्प् में रिकाॅडर् किया। विभ्िान्न द्रवों की श्यानता की गणना सि(ांत शीषर्क के अंतगर्त दिए गए सूत्रा के अनुसार की गइर्। प्रेक्षण एवं गणना कक्ष ताप त्र 23°ब् सारणी - प् ऐल्कोहाॅलों के लिए अलग क्षमता का श्यानतामापी प्रयुक्त किया गया। सारणी - प्प् ’ यदि ऐल्कोहाॅल के सजात/समावयव उपलब्ध् न हों तो दूसरे उपयुक्त यौगिक जो उपलब्ध् हों और जिन्हें आसानी से प्रबन्िध्त किया जा सके, प्रयोग में लाए जा सकते हैं। ’’ सारणी में बहाव के लिए रिकाॅडर् किए गए समय किसी श्यानतामापी के लिए विशेष होते है अतः इन्हें मानक मान नहीं मानना चाहिए। गणना सारणी - प् से देखा जा सकता है कि विभ्िान्न हाइड्रोकाबर्नों की श्यानताμयानी पेट्रोल, मिट्टðी का तेल और डीशल आॅयल की औसत श्यानता व्रफमशः 6.4, 16.4 और 18.0 है। इनका द्रव्यमान पेट्रोल से डीशल आॅयल की ओर बढ़ता है अतः यह इंगित करता है कि आण्िवक द्रव्यमान बढ़ने के साथ श्यानता भी बढ़ती है। नौ एल्कोहाॅलों की श्यानता निधर्रित की गइर् और इनके मान सारणी - प्प् में दिए गए हैं। एल्कोहाॅलों की श्यानता आण्िवक द्रव्यमान बढ़ने के साथ बढ़ती है, जैसा कि मेथेनाॅल, एथेनाॅल, प्रोपेन - 1 - आॅल, ब्यूटेन - 1 - आॅल की श्यानताओं से देखा जा सकता है जो व्रफमशः 34.8, 38.4 और 78.8 मिलीप्वाॅश हैं। यह प्रदश्िार्त करता है कि काबर्न शृंखला में शंृखलन बढ़ने से श्यानता बढ़ती है। आगे की जाँच - पड़ताल के लिए सुझाव उपयुक्त यौगिकों का प्रयोग करके अंतराआण्िवक बलों के साथ श्यानता में परिवतर्न का अध्ययन किया जा सकता है। संदभर् पुस्तक ज्ञम्म्छ।छए ब्ण्ॅण्य ॅववकए श्रण्भ्ण्ए ळमदमतंस ब्ीमउपेजतलण् प्टजी म्कण्ए भ्ंतचमत - त्वू च्नइसपेीमते प्दबण् छमू ल्वताण्

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