वि है। प्रयोगशाला कायर् से रासायनिक परिघटनाओं को प्रयोगशाला की नियंत्रिात परिस्िथतियों में जाँच पड़ताल की वििा द्वारा परखने का अवसर मिलता है। दूसरे शब्दों में, इससे आपको जिज्ञासु प्रेक्षक बनने और परिणाम निकालने का भरपूर अवसर मिलता है। प्रयोगशाला कायर् का प्रश्िाक्षण, उपकरणों एवं उपस्करों को संभालने एवं संचालित करने की निपुणता प्राप्त करने और प्रयोग करने में सहायक होता है। इस प्रकार से, प्रायोगिक कायर् वैज्ञानिक दृष्िटकोण के उत्थान और सहयोगी आचार - व्यवहार अपनाने में सहायता करता है। प्रयोगशाला में कायर् करना विलक्षण और सृजनात्मक विचारों को वि्रफयान्िवत करके साकार करने का आधार प्रदान करता है। प्रयोगशाला में कायर् प्रारंभ करके वैज्ञानिक वििायों से परिचित होने तथा प्रायोगिक दक्षता प्राप्त करने से पहले, आपको रसायन प्रयोगशाला से भली - भाँति परिचित होना चाहिए। आपको प्रयोगशाला और अपनी कायर् करने की मेज पर उपलब्ध सुविधाओं पर ध्यान देना चाहिए। आप देखेंगे कि आपकी मेज पर एक पानी का नल, गैस - टैप, बुन्सेन बनर्र/स्िपरिट लैम्प/मिट्टðी के तेल का लैम्प, अभ्िाकमर्क शेल्पफ और वूफड़ा पेंफकने के लिए एक वूफडे़दान की व्यवस्था है। आप पाएंगे कि वुफछ अभ्िाकमर्क मेज की शेल्पफ पर रखे हैं जबकि वुफछ अभ्िाकमर्क दीवारों में बनी शेल्पफ पर रखे हैं। मेज की शेल्पफ पर रखे अभ्िाकमर्कों की बार - बार आवश्यकता पड़ती है जबकि दीवार की शेल्पफ पर रखे अभ्िाकमर्क उपयोग में कम आते हैं। मेज पर उपलब्ध सुविधाओं के अतिरिक्त आप देखेंगे कि दरवाजों और ख्िाड़कियों के सामने वाली दीवार के उफपरी भाग में छत से थोड़ा नीचे रेचक पंखे ;म्गींनेज ंिदद्ध लगे हैं। इससे हानिकारक ध्ूम निकालने और प्रयोगशाला में ताशी हवा के संचालन में मदद मिलती है। इसी प्रयोजन से प्रयोगशाला में पयार्प्त संख्या में ख्िाड़कियाँ भी होती हैं। इन्हें प्रयोगशाला में कायर् करते समय खुला रखें। प्रयोगशाला में ऐसे प्रयोग करने के लिए, जिनमें धूम उत्पन्न होते हैं, एक धूम धानी की व्यवस्था होती है। यह दृढ़ परामशर् दिया जाता है कि आप अपनी रसायन प्रयोगशाला, प्रयोगशाला की प्रवि्रफयाओं और कायर्वििायों तथा विशेष रूप से प्रयोगशाला में कायर् करते समय ली जाने वाली सावधानियों से पूणर्तः परिचित हों। रसायन प्रयोगशाला का वातावरण इस अभ्िाप्राय में वुफछ विशेष होता है कि यह आनंद, खोज और श्िाक्षा का स्थल हो सकता है। यह वुंफठा और खतरे की जगह भी बन सकता हैμ यदि आप बिना तैयारी के आएं एवं महत्वपूणर् आँकड़ों को ठीक से न लिखें, तो वुंफठा स्थल और यदि आप खतरनाक प्रयोगों को करते हुए सावधानियों का ठीक से ध्यान न रखें, तो खतरे की जगह। प्रयोगशाला कायर् के मूलभूत सि(ांतों में दक्ष होने के लिए आपको उपस्करों को संचालित करना अवश्य सीखना चाहिए और सुरक्षा उपायों तथा अच्छे प्रयोगशाला आचरण से अवगत होना चाहिए। प्रयोगशाला में कायर् करने के लिए प्रवेश करने से पहले आप अपने आप को व्यवस्िथत करें और प्रयोगशाला कायर् से पहले की तैयारी और प्रायोगिक वि्रफयावििा से पूणर्तः अवगत हो लें जिससे आपका कायर् अव्यवस्िथत न हो। यदि समूह में प्रयोग करने की आवश्यकता न हो तो अकेले ही प्रयोग करें। कायर् करते समय अपनी विचारशीलता और सहजबुि का प्रयोग करें। यह व्यवहार, वैज्ञानिक दृष्िटकोण प्राप्त करने की मूलभूत आवश्यकता है। प्रयोगशाला की काॅपी में प्रयोगों का विवरण लिखें। इसके लिए कागज केटुकड़ों और खुले कागजों का उपयोग न करें। सोचें और ऐसे महत्वपूणर् प्रश्नों के उत्तर जानने की कोश्िाश करें जिनसे आपको उन सि(ांतों का ज्ञान प्राप्त हो जिन पर वि्रफयावििा आधारित है। वैज्ञानिक विचार विमशर् से बहुत वुफछ सीखते हैं। इसी प्रकार से आप भी अपने श्िाक्षकों और सहपाठियों के साथ विचार - विमशर् से लाभान्िवत हो सकते हैं। किसी संदेह की स्िथति में पुस्तकों का उपयोग करें क्योंकि पुस्तवेंफ सहपाठियों की तुलना में सूचनाका अिाक विश्वसनीय, संपूणर् एवं उत्तम ड्डोत हैं। अन्यथा अपने श्िाक्षक से पूछें। सुरक्षा नियमों को यह सुनिश्िचत करने के लिए बनाया गया है कि प्रयोगशाला कायर् करते समय आप और आपके साथी सुरक्ष्िात रहें। आपको सदैव सुरक्षा नियमों का पालन करना चाहिए और प्राथमिक - उपचार के बक्से, आग बुझाने के उपकरण इत्यादि की उपलब्धता के स्थल का ध्यान रखना चाहिए। प्रयोगशाला की किसी चीज को कभी न चखें ;प्रयोगशाला के विषैले पदाथो± पर हमेशा ‘विष’ नहीं लिखा होता।द्ध प्रयोगशाला को भोजन - स्थल न बनाएं। प्रयोगशाला के काँच के उपकरणों का उपयोग कभी - भी खाने - पीने के लिए न करें। प्रयोगशाला में अकेले कायर् न करें। यदि अिाक देर तक कायर् करना आवश्यक हो तो अपने श्िाक्षक से अनुमति प्राप्त कर लें। निम्नलिख्िात व्यवहार आपको प्रयोगशाला तकनीक में दक्षता प्राप्त करने का मागर्दशर्न देने हेतु लिखे जा रहे हैं जिससे प्रयोगशाला एक सुखद कायर्स्थल हो। आपको निम्नलिख्िात प्रवि्रफयाओं का पालन करना चाहिए - ऽ प्रयोगशाला में कायर् करते समय सुरक्षा - चश्मा, कोट और जूते पहनें। ऽ किसी भी अभ्िाकमर्क बोतल में रखे पदाथर् का उपयोग करने से पहले उस पर लगे नाम - पत्रा को ध्यानपूवर्क पढ़ कर जांच लें। ऽ वि्रफयावििायों और सावधानियों को ध्यानपूवर्क पढे़ें और उनका अनुसरण करें। ऽ कायर् करने की मेज पर अभ्िाकमर्क की बोतल छोड़ देना खराब आचरण हैऋ कायर् समाप्त होते ही तुरन्त बोतल पर ठीक से ढक्कन लगाएं और शेल्पफ पर यथास्थान रखें। ऽ यदि आपके कायर्स्थल पर अभ्िाकमर्क की कोइर् बोतल खाली हो तो प्रयोगशाला परिचारक से इसे भरने के लिए कहें। ऽ यदि आपको दीवार की शेल्पफ से किसी अभ्िाकमर्क की आवश्यकता हो तो परखनली अथवा बीकर को वहाँ ले जाएं। बोतल को अपने कायर्स्थल पर ले कर न आएं। ऽ जब तक आपको सलाह न दी गइर् हो, अिाक अभ्िाकमर्क का उपयोग न करें। ऽ अप्रयुक्त रसायनों को भंडारण बोतल में वापस कभी न डालें। यदि आपसे पदाथर् को सही बोतल में वापिस डालने में कोइर् गलती हो गइर् तो दूसरे विद्याथ्िार्यों का प्रयोग बिगड़ सकता है। ऽ जब तक प्रयोग में आवश्यक न हो, रसायनों को न मिलाएं। इस नियम का पालन न करने से भयंकर दुघर्टना की संभावना हो सकती है। ऽ भंडारित विलयनों और अभ्िाकमर्क बोतलों से अभ्िाकमर्क निकालने के लिए केवल अच्छी तरह सापफ करे गए ड्राॅपर, स्पैचुला या पिपेट इत्यादि का ही प्रयोग करें। ऽ बोतल के डाट को मेज पर न रखें। इस पर अशुियाँ चिपक सकती हैं और बोतल की सामग्री दूष्िात हो सकती है। जब कभी आपको किसी बोतल से अभ्िाकमर्क लेना हो तो बोतल को एक हाथ से उठाएं और डाट को दूसरे हाथ से निकालें या लगाएं तथा सापफ ग्लेश टाइल पर रखें। सूखे ठोस अभ्िाकमर्कों को निकालने के लिए स्पैचुला का प्रयोग करें और इन्हें, वाॅच ग्लास पर रखें, कभी भी पिफल्टर पत्रा का उपयोग न करें। अभ्िाकमर्कों को कभी भी अपनी हथेली पर न रखें और न ही उंगलियों से छुएं। ऽ माचिस की तीली, लिटमस पेपर, टूटा काँच का उपकरण, पिफल्टर पेपर या अन्य कोइर् अघुलनशील पदाथर् ¯सक मंे अथवा पफशर् पर कभी न पेफवेंफ। अपनी सीट पर उपलब्ध वूफड़ेदान का उपयोग करें। केवल अपश्िाष्ट तरल ही नल से बहते पानी के साथ ¯सक में पेंफकने चाहिए जिससे कोइर् गन्ध न आए और वुफछ भी ¯सक में न चिपके तथा तरल पदाथर् पानी के साथ बह जाएं। ऽ जल तथा गैस का अपव्यय न करें। जब कभी नलों का उपयोग न हो रहा हो तो इन्हें बंद कर दें। यदि वुफछ गरम न हो रहा हो तो प्रदीप्त बनर्र को जाली के नीचे न छोड़ें। उसे बुझा दें। ऽ गरम उपकरणों को सीधे कायर् करने की मेज पर नहीं रखना चाहिए क्योंकि इससे मेज खराब हो सकती है। इन्हें ग्लेश टाइल अथवा जाली पर रखें। ऽ मोटे काँच से बने उपकरण जैसे अंशांविफत सि¯लडर ;हतंकनंजमक बलसपदकमतद्ध,बोतलें, मापक फ्रलास्क ;उमंेनतपदह सिंेाद्ध इत्यादि सीधे ज्वाला पर गरम न करें क्योंकि यह टूट जाते हैं। इसके अतिरिक्त गरम करने से काँच विवृफत हो जाता है तथा नापने के उपकरण पर लगे अंशाकन प्रामाण्िाक नहीं रह जाते। यदि परखनली को उसमें भरे हुए द्रव की सतह से उफपर गरम करा जाए तो यह टूट सकती है। व्रूफसिबल तप्त लाल होने तक गरम की जा सकती हैं। ऽ द्रव से भरी परखनली का मुँह अपनी या अपने पड़ोसी की ओर करके गरम न करें क्योंकि सामग्री के छिटककर निकलने से आपको या आपके पड़ोसी को नुकसान पहुँच सकता है ;चित्रा 1.1द्ध। ऽ कायर् समाप्त होते ही सभी उपकरण सापफ करके यथास्थान रख दें। गंदा कायर्स्थल और उपकरण, लापरवाही की आदत की ओर इंगित करते हैं तथा इनसे प्रयोग की सपफलता बािात होती है। चित्रा 1.1 - परखनली में विलयन गरम करने की सही वििा काँच के सापफ होने का संकेत यह है कि धोने के बाद इसे पकड़ने से पानी बह जाता है और बूंदें सतह पर चिपकी नहीं रहतीं। यदि बूंदें काँच की सतह पर चिपकी रह जाएं तो इसका अथर् है कि उपकरण चिकना है। उस स्िथति में इसे 5ः छंव्भ् विलयन अथवा साबुन से धोना चाहिए और पिफर अच्छी तरह पानी से धो लेना चाहिए। यदि यह अब भी गंदा हो या कोइर् दाग लगा रह गया हो तो सापफ करने के लिए गरम सांद्र नाइटिªक अम्ल का उपयोग करना चाहिए। यदि धब्बा पिफर भी सापफ न हुआ हो तो व्रफोमिक अम्ल;जिसे व्रफोमोसल्फ्रयूरिक अम्ल भी कहते हैंद्ध का उपयोग किया जा सकता है। एक लिटर व्रफोमिक अम्ल बनाने के लिए 100 ह पोटैश्िायम डाइव्रफोमेट को एक लिटर सांद्रसल्फ्रयूरिक अम्ल में घोला जाता है। यह अत्यिाक संक्षारक द्रव होता है और इसके त्वचा अथवा कपड़ों के संपवर्फ में आने से बचाव के लिए प्रत्येक सावधानी बरतनी चाहिए। ऽ ऐसे प्रयोग करने के लिए जिनमें विषैले तथा जलन उत्पन्न करने वाले धूम निकलते हों, धूम धानी का उपयोग करना चाहिए। ऽ प्रयोगशाला में कायर् करते हुए दरवाजे और ख्िाड़कियाँ खुली रखें और रेचक पंखा चला दें जिससे विषैले धूम तेशी से ख्िांच कर बाहर निकल जाएं तथा शु( वायु के संचार में सहायता मिले। ऽ यदि आप उपरोक्त अनुमत और निष्िा( व्यवहारों का अनुसरण करेंगे तो निश्िचत ही आपका मूलभूत वैज्ञानिक तकनीकों को सीखने का अनुभव सुखद होगा। आगे के पृष्ठों में आपको रसायन प्रयोगशाला में कायर् करने के लिए आवश्यक प्रयोगशाला उपस्करों, वि्रफयावििायों और तकनीकों से अवगत कराया जाएगा। आइए हम रसायन में प्रयुक्त होने वाली विश्लेषण की विध्ियों के परिचय से प्रारंभ करें। तत्वों और उनके यौगिकों की पहचान भौतिक गुणों जैसे भौतिक अवस्था, रंग, गंध, चमक, गलनांक, क्वथनांक, उफध्वर्पातन, गरम करने पर ज्वाला को रंग प्रदान करना, कठोरता, वि्रफस्टलीय अथवा अवि्रफस्टलीय अवस्था, जल और अन्य विलायकों में विलेयता इत्यादि के आधार पर की जाती हैऋ परन्तु कभी - कभी केवल भौतिक अवस्था के आधार पर पदाथर् की पहचान करना असंभव होता है, इसलिए पदाथर् की पहचान के लिए रासायनिक वििायाँ जैसे क्षार, अम्ल, आॅक्सीकरण कमर्क, अपचायी कमर्क और अन्य यौगिकों के साथ अभ्िावि्रफया, काम में ली जाती है। किसी पदाथर् का गुणात्मक और मात्रात्मक रासायनिक संघटन सुनिश्िचत करने के लिए इसका विश्लेषण किया जाता है। इसलिए, विश्लेषण, गुणात्मक अथवा मात्रात्मक हो सकता है। गुणात्मक विश्लेषण पदाथर् में तत्वों का संघटन जानने के लिए किया जाता हैऋ इसमें बनने वाले आयनों और पदाथर् में उपस्िथत अणुओं की पहचान करना शामिल है। गुणात्मक विश्लेषण की वििायाँ अनेक प्रकार की हैं। इनसे हम न केवल उन तत्वों को ज्ञात कर सकते हैं जिनसे पृथ्वी पर उपस्िथत पदाथर् बने हैं, बल्िक पृथ्वी से दूर खगोलीय ¯पडों के संघटन को भी ज्ञात कर सकते हैं, मात्रात्मक विश्लेषण पदाथो± में उपस्िथत अवयवों की मात्रा सुनिश्िचत करने में सहायता करता है। यह उफजार् परिवतर्न इत्यादि को मापने में भी सहायता करता है। गरम करना, छानना, निथारना, आयतन मापना तथा ठोसों और द्रवों को तोलना, आदि प्रयोगशाला की वुफछ ऐसी वि्रफयाविध्ियाँ हैंऋ जिनकी रसायन प्रयोगशाला मंे प्रयोग करते हुए बार - बार आवश्यकता पड़ती है। इस कायर् के लिए आवश्यक वुफछ विशेष उपस्कर चित्रा 1.2 एवं चित्रा 1.3 में दिखाए गए हैं। आप इनके उपयोग के विषय में प्रयोग करते हुए जानेंगे। वुफछ सामान्य उपकरणों के उपयोग के निदेर्श आगे दिए गए हैं। चित्रा 1.2 - प्रयोगशाला के सामान्य उपस्कर चित्रा 1.3 - प्रयोगशाला का काँच का सामान्य उपकरण परखनली विभ्िान्न आयतनों की परखनलियाँ उपलब्ध हैं परन्तु वतर्मान स्तर पर रसायन का प्रयोगात्मक कायर् करने के लिए सामान्यतः 125 उउ ;लंबाइर्द्ध × 15 उउ ;व्यासद्धए 150 उउ ;लंबाइर्द्ध × 15 उउ ;व्यासद्ध तथा 150 उउ ;लंबाइर्द्ध × 25 उउ ;व्यासद्ध की परखनलियाँ प्रयोग में लाइर् जाती हैं। मुँह पर किनारा बनी हुइर् और बिना किनारे वाली परखनलियाँ भी उपलब्ध हैं। कम मोटाइर् की परखनलियाँ ऐसी अभ्िावि्रफयाएं करने के प्रयोग में लाइर् जाती हैं जिनमें गरम करने की आवश्यकता नहीं होती या बहुत कम देर गरम करना होता है। अभ्िावि्रफया करते समय परखनली का केवल एक - तिहाइर् भाग ही भरना चाहिए। बड़े व्यास वाली परखनली को क्वथन नली ;बाॅय¯लग ट्यूबद्ध कहते हैं। इसका प्रयोग तब करते हैं जब अिाक विलयन गरम करने की आवश्यकता होती है। परखनली में कोइर् मिश्रण या विलयन गरम करने के लिए इसे परखनली होल्डर से पकड़ा जाता है। विलयन भरी परखनलियों को सीधा खड़ा रखने के लिए परखनली स्टैंड का प्रयोग करना चाहिए ;चित्रा 1.4द्ध। चित्रा 1.4 - परखनली स्टैंड में रखी परखनलियाँ एवं क्वथन नली ;बाॅय¯लग ट्यूबद्ध फ्रलास्क अध्िकांशतः रसायन प्रयोगशाला में गोल पेंदे के फ्रलास्क, तथा शंक्वाकार फ्रलास्क ;इसेएलेर्नमेयर फ्रलास्क भी कहते हैंद्ध प्रयोग में लाए जाते हैं। यह 5 उस् से 2000 उस् क्षमता तक विभ्िान्न क्षमताओं में उपलब्ध हैं। आकार और प्रकार का चयन अभ्िावि्रफया के प्रकार और प्रयोग में प्रयुक्त होने वाले विलयन की मात्रा पर निभर्र करता है। गोल पेंदेके फ्रलास्क में मिश्रण गरम अथवा पश्चवाह ;तमसिनगद्ध करने के लिए सामान्यतः सीधेही ज्वाला/बालू उफष्मक/जल उफष्मक का प्रयोग किया जाता है। शंक्वाकार फ्रलास्कों का उपयोग कमरे के ताप पर या कम ताप पर प्रयोग करने के लिए किया जाता है। यह विशेषकर आयतनमापी विश्लेषण ;अवसनउमजतपब ंदंसलेपेद्ध के लिए प्रयुक्त होते हैं। बीकर 5 उस् से 2000 उस् तक की क्षमता के बीकर उपलब्ध हैं तथा इन्हें विलयन बनाने, अवक्षेपण अभ्िावि्रफया करने और विलायक का वाष्पन इत्यादि करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है। पृथक्कारी कीप इन्हें अमिश्रणीय द्रवों को पृथक करने के प्रयोग में लाया जाता है। अनेक आमाप और आकार की पृथक्ककारी कीप ;ेमचंतंजपदह निददमसद्ध उपलब्ध हैं ;चित्रा 1.5द्ध। संघनित्रा चित्रा 1.5 - विभ्िान्न आकार की पृथक्कारी कीपसंघनित्रा ;ब्वदकमदेमतद्ध वाष्प को वापस द्रव में संघनित करने के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं। सामान्यतः दो प्रकार के संघनित्रा प्रयोग में लाए जाते हैं, ;कद्ध वायु संघनित्रा ;खद्ध जलसंघनित्रा। वायु संघनित्रा को चित्रा 1.6 ;कद्ध में दिखाया गया है। वायु संघनित्रा विभ्िान्न लम्बाइर् और व्यास की काँच की नली के बने होते हैं। इनसे गरम वाष्प की उफष्मा तेजी से आसपास की वायु को अंतरित हो जाती है और वाष्प संघनित हो जाती है। जल संघनित्रा में एक आंतरिक नली के बाहर जैकेट होती है ;चित्रा 1.6 खद्ध जिसमें जल के परिसंचारण ;बपतबनसंजपवदद्ध के लिए अंतगर्म ;पदसमजद्ध और निकास ;वनजसमजद्धहोते हैं। अंतगर्म को नल से जोड़ा जाता है। इसमें गरम वाष्प की उफष्मा बाहर के जल को अंतरित हो जाती है। वायु संघनित्रा उच्च क्वथनांक वाले द्रवों और विलयनों का पश्चवाह अथवा आसवन करने के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं। कम क्वथनांक वाले द्रवों के लिए जल संघनित्रा का प्रयोग करते हैं। चित्रा 1.6 - ;कद्ध वायु संघनित्रा ;खद्ध जल संघनित्रा घष्िार्त काँच के जोड़ चित्रा 1.9 - द्रवों को अंतरित करने का ढंग यदि द्रव अंतरित करने के लिए ड्रापर का प्रयोग किया जाए तो अंतरित करते समय ड्रापर को पात्रा की सामग्री के सम्पवर्फ में नहीं आना चाहिए। द्रव को ड्रापर से अंतरित करने का सही ढंग चित्रा 1.10 में दिखाया गया है। बोतलों के ड्रापर आपस में बदलने नहीं चाहिए। आजकल ड्रा¯पग बोतलें प्रयोग में लाना अिाक सुरक्ष्िात और सुविधाजनक माना जाता है। प्रयोगशाला में गरम करने के लिए गैस बनर्र, स्िपरिट लैम्प अथवा किरोसीन लैम्प का प्रयोग किया जा सकता है। प्रयोगशाला में अिाकतर प्रयोग में आने वाला गैस बनर्र बुन्सन बनर्र है े;चित्रा 1.11द्ध। बुन्सेन बनर्र के विभ्िान्न भाग चित्रा 1.12 में दिखाए गए हैं। इनका विस्तृत वणर्न आगे दिया गया है - चित्रा 1.10 - ड्रापर से द्रव आंतरित करना बुन्सेन बनर्र ;कद्ध बुन्सेन बनर्र के भाग 1. आधर धातु से बना भारी आधार पाश्वर् नली, जिसे गैस नली कहते हैं, से जुड़ा रहता है। ड्डोत से आइर् गैस, नली द्वारा बनर्र में प्रवेश करती है तथा निपिल अथवा नाॅशॅल नामक छोटे से छिद्र से निकलकर बनर्र की नली में उच्च दाब पर पहुँचती है और बनर्र की नली के उफपरी भाग में जलाइर् जा सकती है। 2. बनर्र नली यह एक लम्बी धात्िवक नली होती है जिसके निचले सिरे के पास दो छिद्र एक - दूसरे के ठीक आमने - सामने स्िथत होते हैं और ये वायु - निकास बनाते हैं। नली को आधार की चूडि़यों पर कसा या खोला जा सकता है। नाॅशॅल से आने वाली गैस वायु निकास से आने वाली वायु से मिश्रित होकर नली के उफपरी छोर पर जलती है। 3. वायु नियंत्राक यह एक छोटा सा बेलनाकार धात्िवक खोल ;ेसममअमद्ध होता है। जिसमें ठीक आमने - सामने दो छिद्र होते हैं। जब इसे बनर्र की नली पर लगा दिया जाता है तो यह बनर्र की नली के वायु निकास को ढक लेती है। निकास से वायु के प्रवाह को नियंत्रिात करने के लिए खोल को घुमा कर छिद्र का आकार समायोजित कर लिया जाता है। चित्रा 1.11 - बुन्सेन बनर्र चित्रा 1.12 - बुन्सेन बनर्र के भाग यदि निकास बंद हो और गैस को जलाया जाए तो ज्वाला बड़ी और दीप्त ;सनउपदवनेद्ध होगी ;धुएं वाली और पीलीद्ध। ज्वाला से निकलता प्रकाश आंश्िाक रूप से जले हुए ईंधन के गरम काबर्न कणों द्वारा विकिरण के कारण होता है। इस स्िथति में ज्वाला का ताप कम होता है। यदि वायु - निकास पर खोल का समायोजन ऐसा प्रारंभ्िाक परिचय हो कि वायु मिश्रित गैस ज्वाला में पहुंचे तो ज्वाला कम दीप्त और अन्त में नीली हो जाती है। जब वायु का प्रवाह ठीक से समायोजित होता है तो ज्वाला का ताप बहुत अिाक हो जाता है। इसे अदीप्त ज्वाला ;दवद.सनउपदवनेद्ध कहते हैं। ज्वाला के विभ्िान्न मंडल ;्रवदमद्ध नीचे चित्रा 1.13 में दिखाए गए हैं। बुन्सेन बनर्र की ज्वाला में स्पष्ट दिखाइर् देने वाले तीन प्रमुख भागों का वणर्न नीचे किया गया है। ;खद्ध बुन्सेन बनर्र की ज्वाला के प्रमुख भाग 1. अंदर का गहरे रंग का शंवुफ, । म् ब् यह ज्वाला का सबसे अंदर वाला गहरे रंग का शंवुफ होता है, जो बनर्र की नली के ठीक उफपर होता है। यह बिना जली गैसों से बना होता है। यह मंडल, ज्वाला का सबसे कम गरम भाग होता है और यहाँ कोइर् दहन नहीं होता। 2. बीच का नीला शंवुफ, । क् ब् म् । यह ज्वाला का बीच वाला भाग होता है। जब वायु - निकास थोड़ा सा बंद होता है तो यह दीप्त हो जाता है। इस भाग की दीप्ित गैस के आंश्िाक दहन से उत्पन्न काबर्न कणों की उपस्िथति के कारण होती है। यह कण तापदीप्त तक गरम होकर चमकने लगते हैं परंतु जलते नहीं। इस भाग में दहन संपूणर् न हो पाने के कारण ताप बहुत अिाक नहीं होता। 3. बाहरी अदीप्त शंवुफ, । ठ ब् क् । यह बैंगनी रंग का बाहरी शंवुफ है। यह ज्वाला का सबसे गरम भाग होता है। यह वायुमंडल के सीधे संपवर्फ में रहता है और इस मंडल में दहन लगभग संपूणर् हो जाता है। बुन्सेन ने ज्वाला के इन तीन प्रमुख भागों में छः मंडल अभ्िानिधार्रित किए हैंμ ;पद्ध उफपर वाला आॅक्सीकरण मंडल ;द्धि इसका स्थान ज्वाला की अदीप्त नोंक पर होता है, जो वायु में रहती है। ज्वाला के भीतरी भागों की अपेक्षा यहाँ आॅक्सीजन का आिाक्य होता है। ताप उतना अिाक नहीं होता जितना कि नीचे वण्िार्त मंडल ;बद्ध में। यह भाग उन आक्सीकरण प्रव्रफमों के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है जिनमें ज्वाला के अिाकतम ताप की आवश्यकता नहीं होती। ;पपद्ध उफपर वाला अपचायी मंडल ;मद्ध यह मंडल अंदर वाले नीले शंवुफ की नोक पर स्िथत होता है और तापदीप्त काबर्न से भरपूर होता है। यह धातु आॅक्साइडों की पपर्टियों को धातु में अपचित करने के लिए विशेष उपयोगी होता है। ;पपपद्ध ज्वाला का सबसे गरम भाग ;कद्ध यह संगलन मंडल है। यह ज्वाला की लगभग एक तिहाइर् उफँचाइर् पर मेन्िटल यानी बाहरी शंवुफ में अंदर और बाहर से लगभग बराबर दूरी पर स्िथत होता है। पदाथर् के संगलन की जाँच इस भाग में की जा सकती है। पदाथो± अथवा पदाथो± के मिश्रण का आपेक्ष्िाक वाष्पन भी इस भाग में जाँचा जा सकता है। ;पअद्ध निचला आॅक्सीकरण मंडल ;बद्ध यह मेन्िटल के बाहरी किनारे पर ज्वाला के निचले भाग में स्िथत होता है और इसे बोरेक्स अथवा सोडियम काबोर्नेट की बीड ;मण्िाकाद्ध में घुले हुए पदाथर् के आॅक्सीकरण के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है। ;अद्ध निचला अपचायी मंडल ;इद्ध यह बाहरी मेन्िटल के भीतरी किनारे पर नीले शंवुफ के पास स्िथत होता है और यहाँ अपचायी गैसें वायु की आॅक्सीजन से मिश्रित होती हैं। यह ;मद्ध से कम शक्ितशाली अपचायी मंडल है और इसे गालित बोरेक्स या ऐसी ही बीड के अपचयन के लिए काम में लाया जा सकता है। ;अपद्ध ज्वाला का न्यूनतम ताप मंडल ;ंद्ध ज्वाला के ;ंद्ध मंडल का ताप न्यूनतम होता है। यह वाष्िपत हो सकने वाले पदाथो± के प्रेक्षण में यह सुनिश्िचत करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है कि वे ज्वाला को रंग प्रदान करते हंै अथवा नहीं। ;गद्ध बुन्सेन बनर्र की ज्वाला का वापस लौटना ;ेजतपापदह इंबाद्ध ज्वाला का वापस लौटना ऐसी परिघटना है जिसमें ज्वाला बनर्र की नली पार करके आधार के पास नाॅशॅल पर जलने लगती है। ऐसा तब होता है जब निकास पूणर्तः खुला होता है। अिाक वायु और कम गैस का प्रवाह ज्वाला को अनियमित कर देता है और यह वापस लौटती है। बनर्र की नली अत्यिाक गरम हो जाती है और इसे छूने से जल सकने की संभावना होती है। यह जुड़ी हुइर् रबर की नली को पिघला भी सकती है। यदि ऐसा हो जाए तो बनर्र बुझाकर नल के नीचे रखकर पानी से ठंडा करें और निकास को कम खुला रखकर इसे दोबारा सुलगाएं। स्िपरिट लैम्प यदि प्रयोगशाला में बुन्सेन बनर्र उपलब्ध न हो तो गरम करने के लिए स्िपरिट लैम्पका उपयोग किया जा सकता है। यह एक ऐसी युक्ित है जिसमें रूइर् के धागे की बत्तीका एक सिरा स्िपरिट के पात्रा में डूबा रहता है और बत्ती का दूसरा सिरा पात्रा के उफपरी छोर पर नाॅॅेफश्िाका वि्रफया शल से बाहर निकला रहता है ;चित्रा 1.14द्ध। व;ब्ंचपससंतल ंबजपवदद्ध द्वारा स्िपरिट बत्ती के उफपरी सिरे पर पहुँच जाती है और जलाइर् जा सकती है। ज्वाला अदीप्त ;घूम रहितद्ध होती है अतः प्रयोगशाला में सभी प्रकार के गरम करने के प्रयोजनों में उपयोग में लाइर् जा सकती है। लैम्प बुझाने केलिए जलती हुइर् बत्ती पर लैम्प का ढक्कन रख देते हैं। जलते हुए बनर्र को कभी भी पूंफककर बुझाने की कोश्िाश न करें। मिट्टðी के तेल से गरम करने का लैम्प राष्ट्रीय शैक्ष्िाक अनुसंधन एवं प्रश्िाक्षण परिषद् ;एन.सी.इर्.आर.टी.द्ध ने मिट्टðी के तेल का एक ऐसा लैम्प विकसित किया है जो स्िपरिट लैम्प का परिवतर्नीय और कम लागत काविकल्प है। इसे ऐसी प्रयोगशालाओं में उफष्मा के ड्डोत के रूप में प्रयोग में लाया जा सकता है जहाँ स्िपरिट और गैस - बनर्र उपलब्ध न हों। मिट्टðी के तेल के लैम्प के भाग चित्रा 1.15 में दिखाए गए हैं। लैम्प की कायर्प्रणाली आधे से अिाक पात्रा को मिट्टðी के तेलसे भर लिया जाता है। बिायों को सुलगाने के लिए बाहरी खोल निकाल दिया जाता है। खोल को यथा स्थानरखने पर चारों बिायों की ज्वालाएं एक साथ मिलकर एक बड़ी घूम रहित नीली ज्वाला बना देती हैं। जलता हुआ बनर्र बाहरी खोल के उफपरी भाग को धातु अथवा ऐस्बेस्टस की शीट से केवल ढक देने से बुझाया जा सकता है। चित्रा 1.15 - मिट्टðी के तेल से गरम करने वाले लैम्प के भाग

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