लेखांकन के सै(ांतिक आधर 2 अध्िगम उद्देश्य इस अध्याय के अध्ययन के उपरांत आप - ऽ लेखांकन के सै(ांतिक आधार की आवश्यकता को पहचान पाएंगेऋ ऽ सामान्यतः मान्य लेखांकन सि(ांतों का वणर्न कर पाएंगे। ऽ आधरभूत लेखांकन संकल्पनाओं का अथर् व उद्देश्य विस्तारपूवर्क बता पाएंगेऋ ऽ इंडियन इंस्िटट्यूट आॅपफ चाटर्डर् अकाउंटेंट्स द्वारा जारी लेखांकन प्रभावों की गणना कर पाएंगेऋ ऽ लेखांकन तंत्रा का वणर्न कर पाएंगेऋ ऽ लेखांकन के विभ्िान्न आधारों को स्पष्ट कर पाएंगे। जैसा कि हमने पिछले अध्याय में चचार् की थी, कि लेखांकनमूलतः वित्तीय प्रकृति के लेन - देनों व घटनाओं के अभ्िालेखन, वगीर्करण व संक्ष्िाप्ितकरण के साथ - साथ उनके परिणामों की व्याख्या से भी संबंध्ित है। इसका उद्देश्य व्यावसायिक सूचना केप्रयोग करने वाले विभ्िान्न उपयोगकत्तार्ओं जैसे - स्वामी, प्रबन्ध्कों,कमर्चारियों, निवेशकत्तार्ओं, देनदारों, माल व सेवाओं के पूतिर्कारों,कर अध्िकारियों आदि को महत्त्वपूणर् निणर्य लेने में मदद करनाहै। उदाहरणाथर् - निवेशकत्तार्ओं की रुचि यह जानने में हो सकती है कि एक दी हुइर् समयावध्ि में किसी व्यवसाय विशेष के लाभ अथवा हानि की क्या स्िथति थी, साथ ही निणर्य लेने के लिए वह इसकी तुलना किसी दूसरे समान व्यवसाय के प्रदशर्न से भी कर सकते हैं। इस प्रकार व्यावसायिक सूचनाओं के लिए विभ्िान्नउपयोगकत्तार् उपयुक्त, आवश्यक व भरोसे योग्य सूचनाओं की प्राप्ित के लिए लेखाशास्त्रा की ओर ही देखते हैं।लेखांकन सूचनाओं को इसके बाह्य व आंतरिक उपयोगकत्तार्ओं के लिए अथर्पूणर् बनाने के लिए यह महत्त्वपूणर् है कि यह सूचनाएं न केवल विश्वसनीय हों बल्िक तुलनीय भी हों। सूचनाओं की तुलनात्मकता की आवश्यकता दो कारणों से है - पहला अन्तर - पफमिर्य तुलना अथार्त् यह देखने के लिए कि एक पफमर् ने उसी प्रकार की अन्य पफमो± की तुलना में वैफसा प्रदशर्न किया है। दूसरा अन्तः समयावध्ि तुलना अथार्त् इस आकलन के लिए कि इस वषर् पफमर् का प्रदशर्न अन्य पूवर् वषो± की तुलना में वैफसा रहा है। यह तभीसंभव है जब वित्तीय प्रलेखों द्वारा प्रदत्त सूचनाएं कुछ समनुरूप लेखांकन नीतियों, सि(ांतों व ियानुभवों पर आधरित हों। यह समनुरूपता लेखांकन को सम्पूणर् प्रिया में लेखे योग्य लेने - देन अथवा घटना की पहचान से लेकर लेखा - पुस्तकों में उसके मापन, अभ्िालेखन, संक्ष्िाप्ितकरण व परिणामों की उस व्याख्या तक जो कि निहित हित वाले समूहों को संप्रेष्िात होगी, में होनी चाहिए। इसी कारण लेखांकन के सम्पूणर् सै(ांतिक आधारके विकास की आवश्यकता महसूस होती है। लेखांकन के सै(ांतिक आधर को अध्िक महत्त्व इसलिए दिया जाता है क्योंकि कोइर् भी विषय परिपक्व सै(ांतिक आधर के अभाव में विकसित नहीं हो सकता। लेखांकन के सै(ांतिक आधरों में वषो± की समयावध्ि में विकसित वह सभी सि(ांत, अवधारणाएं, नियम व निदेश्िाकाएं आती हैं जो कि लेखांकन प(ति में समनुरूपता व एकरूपता लाकर लेखांकन सूचना कोउसके विभ्िान्न उपयोगकत्तार्ओं के लिए अध्िकाध्िक उपयोगी बनाते हैं। इसके अतिरिक्त विभ्िान्न लेखाकारों ्की लेखांकन प(तियों में समानता व एकरूपता लाने के लिए इंस्टीट्यूट आॅपफ चाटर्डर् अकांउटेंटस आॅपफ इंडिया ;प्ब्।प्द्ध जो कि देश में लेखांकन नीति के मानक स्थापित करने का नियामक निकाय है, समय - समय पर लेखांकन मानक जारी करता रहा है। जो कि अध्याय में आगे वण्िार्त है। 2ण्1 सामान्यतः मान्य लेखांकन सि(ान्त ;ळ।।च्द्ध लेखांकन अभ्िालेखों में समनुरूपता व एकरूपता लाने के लिए कुछ सि(ान्तों व नियमों का विकासकिया गया है जिन्हें इस पेशे से जुडे़ सभी लेखाकारों की सामान्य स्वीकृति प्राप्त है। इन नियमों को विभ्िान्न नामों जैसे - सि(ांत, संकल्पना, परिपाटी, अवधरणा, परिकल्पनाएं, संशोध्क सि(ांत आदि से जाना जाता है। ए.आइर्.सी.पी.ए. द्वारा सि(ान्त शब्द को इस प्रकार परिभाष्िात किया गया है फ्कोइर् साधरण कानून या अपनाया गया नियम अथवा ज्ञापित िया निदेर्शक, प्रशस्त आधर अथवा आचरण व अभ्यासय् तथा फ्सामान्यतःय् का अथर् सामान्य भाव में अथार्त् कइर् व्यक्ितयों, परिस्िथतियों व व्यवहारों से संबंध्ि त है। इसलिए सामान्यतः मान्य सि(ांतों ;ळ।।च्द्ध से तात्पयर् वित्तीय विवरणों के लेखन व निमार्ण एवं प्रस्तुतिकरण में एकरूपता लाने के उद्देश्य से प्रयुक्त उन सभी नियमों व निदेर्शक ियाओं से है जिनका प्रयोग व्यावसायिक लेन - देनों के अभ्िालेखन व प्रस्तुतिकरण के लिए किया जाता है। उदाहरणके लिए एक महत्त्पूणर् नियम के अनुसार लेखों में सभी लेन - देनों का लेखा ऐतिहासिक लागत पर किया जाता है साथ ही इन लेन - देनों का सत्यापन मुद्रा भुगतान से प्राप्त नकद रसीद द्वारा होना भी आवश्यक है। ऐसा करने से अभ्िालेखन प्रिया वस्तुनिष्ठ बनती है तथा लेखांकन विवरण विभ्िान्नउपयोगकत्तार्ओं द्वारा अध्िक स्वीकायर् हो जाते हैं। सामान्यतः मान्य लेखांकन सि(ांतों का विकास एक लम्बी अवध्ि में पूवर् अनुभवों, प्रयोगों अथवा परम्पराओं, व्यक्ितयों एवं पेशेवर निकायों के विवरणों एवं सरकारी एजेन्िसयों द्वारा नियमन के आधर परहुआ है तथा यह अध्िकांश पेशेवर लेखाकारों द्वारा सामान्य रूप से स्वीकृत है। लेकिन यह नियम स्िथरप्रकृति के नहीं हैं। यह उपयोगकत्तार्ओं की आवश्कताओं, वैधनिक, सामाजिक तथा आथ्िार्क वातावरण से प्रभावित हो निरंतर परिवतिर्त होते रहते हैं। इन्हीं सि(ांतों को संकल्पना व परिपाटी भी कहते हैं। संकल्पना शब्द से तात्पयर् उस आवश्यक परिकल्पना अथवा विचार से है जो लेखांकन अभ्यास के लिए आधरभूत है तथा परिपाटी शब्द लेखा विवरणों के प्रस्तुतीकरण की निदेर्शक परंपराओं का द्योतक है। व्यवहार में समान नियम एवं दिशा निदेर्श की व्याख्या कोइर् लेखक संकल्पना के रूप में तो कोइर् अभ्िाधरणा के रूप में तो कोइर् परिपाटी के रूप में करता है। इसी कारण विद्याथीर् इससे कभी - कभी भ्रमित हो जाते हैं। इन सपरिभाष्िाक शब्दोंके शब्दाथर् पर जाने के स्थान पर इनके व्यावहारिक उपयोग पर ध्यान देना अध्िक महत्त्वपूणर् है। व्यवहार में यह पाया गया है कि सि(ांत, अभ्िाधरणा, परिपाटी, संशोध्क सि(ांत, अवधरणा इत्यादि शब्दों का प्रयोग अदल - बदल कर किया जाता है। इसलिए प्रस्तुत अध्याय में इन सब की व्याख्या आधारभूत लेखांकन संकल्पनाओं के रूप में ही आगे की जा रही है। 2ण्2 आधरभूत लेखांकन संकल्पनाएं आधरभूत लेखांकन संकल्पनाओं से तात्पयर् उस आधरभूत भाव या मूलभूत अवधरणा से है जो वित्तीय लेखांकन के सि(ांतों व अभ्यास में निहित हैं। साथ ही यह वह वृहद् कायर् संबंधी नियम है जिन्हें लेखांकन पेशे से जुड़े व्यक्ितयों ने लेखांकन संबंध्ी ियाओं को करने के लिए विकसित किया है।महत्त्पूणर् संकल्पनाओं की सूची नीचे दी गइर् हैः ऽ व्यापारिक इकाइर् ऽ आगम व्यय मिलान ऽ मुद्रा मापन ऽ पूणर् प्रस्तुतिकरण ऽ सतत् व्यापार ऽ समनुरूपता ऽ लेखांकन अवध्ि ऽ रूढि़वादिता ;विवेकशीलताद्ध ऽ लागत ऽ सारता ऽ द्विपक्षीयता ऽ वस्तुनिष्ठता ऽ आगम मान्यता 2ण्2ण्1 व्यावसायिक इकाइर् संकल्पना इस संकल्पना के अनुसार व्यवसाय का अपने स्वामी से पृथक एवं स्वंतत्रा अस्ितत्व है, अथार्त् लेखांकन के उद्देश्य से व्यवसाय व उसके स्वामी को दो पृथक अस्ितत्व वाली इकाइयां माना जाएगा। इसी दृष्िटकोण को ध्यान में रखते हुए जब कोइर् व्यक्ित व्यवसाय में पूँजी लगाता है तो लेखांकन अभ्िालेखों में इसे व्यापार की स्वामी के प्रति देनदारी के रूप में दशार्या जाता है। यहाँ ऐसा माना जाता है कि एक पृथक इकाइर् ;स्वामीद्ध दूसरी पृथक इकाइर् को व्यवसाय के लिए ध्न दे रहा है। इसी प्रकार जब स्वामी व्यवसाय से कुछ ध्न अपने व्यक्ितगत प्रयोग के लिए आहरित करता है तो उसे स्वामी की पँूजी में कमी माना जाता है। परिणामतः व्यवसाय की देनदारियों में कमी आती है। व्यवसाय में लेखांकन अभ्िालेख व्यापार के दृष्िटकोण से अभ्िालिख्िात किए जाते हैं न कि स्वामीकी दृष्िट से। इसी कारण व्यापार की परिसंपिायों व देनदारियों का अभ्िालेखन व प्रतिवेदन करते समयस्वामी की व्यक्ितगत परिसंपिायों व देयताओं की गणना नहीं की जाती। साथ ही स्वामी के व्यक्ितगत लेन - देनों का अभ्िालेखन व्यापार के खातों में तब तक नहीं होता जब तक उनका प्रभाव व्यवसाय के ध्न के अन्तगर्मन या बहिर्गमन पर न पड़ता हो। 2ण्2ण्2 मुद्रा मापन संकल्पना मुद्रा मापन की संकल्पना यह उल्लेख करती है कि किसी संगठन में केवल उन्हीं लेन - देनों या घटनाओं, ;जिनका लेखन मुद्रा के रूप में किया जा सकता है, जैसे - वस्तुओं का विक्रय, व्ययों का भुगतान अथवा किसी आय की प्राप्ित आदिद्ध का ही अभ्िालेखन लेखा - पुस्तकों में किया जाएगा। वह सभी लेन - देन या घटनाएं जिनको मुद्रा के रूप में प्रदश्िार्त नहीं किया जा सकता जैसे - प्रबन्धक की नियुक्ित या संगठन के मानव संसाध्न की योग्यताएं अथवा शोध् विभाग की सृजनशीलता व साधरणजन मेंसंगठन की प्रतिष्ठा आदि महत्त्वपूणर् सूचनाएं व्यापार के लेखांकन अभ्िालेखों में स्थान प्राप्त नहीं करते। मुद्रा माप संकल्पना का एक अन्य महत्त्पूणर् पक्ष यह है कि लेन - देनों का अभ्िालेखन केवल मौिक इकाइयों में ही किया जाता है न कि भौतिक इकाइयों में उदाहरण के लिए किसी संगठन के पास किसी दिन विशेष को - एक पफैक्टरी 2 एकड़ भूमि के भाग पर स्िथत हो सकती है, कायार्लय के भवन में 10 कमरे हो सकते हैं, 30 पसर्नल कंप्यूटर, कायार्लय में 30 कुसिर्यां व मेजें, बैंक में 5 लाख रुपये तथा 20 टन भार का कच्चा माल व 100 डिब्बे तैयार माल हो सकता हैै। इन सभी परिसंपिायों कीअभ्िाव्यक्ित भ्िान्न - भ्िान्न इकाइयों में है इसलिए इन सब को जोड़कर हम व्यवसाय की कुल परिसंपिा केविषय में कोइर् महत्त्वपूणर् निष्कषर् प्राप्त नहीं कर सकते। इसीलिए लेखांकन के उद्देश्य से इन सभी की अभ्िाव्यक्ित मौिक इकाइयों, अथार्त् रुपये व पैसे में की जाती है। उपरोक्त उदाहरण में हम यह कह सकते हैं कि पफैक्टरी की भूमि का मूल्य 2 करोड़ रु., कायर्लय भवन का मूल्य 1 करोड़ रु., कंप्यूटर का मूल्य 15 लाख रु., कायार्लय की कुसीर् मेजों का मूल्य 2 लाख रु., कच्चे माल का मूल्य 33 लाख रु. व निमिर्त माल का मूल्य 4 लाख रु. है। इस प्रकार इस व्यवसाय की कुल परिसंपिायों का मूल्य 3 करोड़ 59 लाख रुपये है। इसी प्रकार अन्य सभी लेन - देनों का अभ्िालेखन भी रुपये व पैसे में ही किया जाता है। मुद्रा मापन की संकल्पना सीमाओं से मुक्त नहीं हैं। कुछ समय के पश्चात मूल्यों में परिवतर्नों के कारण मुद्रा की क्रय शक्ित में परिवतर्न होता रहता है। आज बढ़ते हुए मूल्यों के कारण रुपये का मूल्य आज से दस वषर् पूवर् के मूल्य की तुलना में कापफी कम है। इसलिए तुलन पत्रा में जबहम अलग - अलग समय पर खरीदी गइर् परिसंपिायों का क्रय मूल्य जोड़ते हैं - जैसे कि 1995 में खरीदा गया 2 करोड़ का भवन, 2005 में खरीदा गया 1 करोड़ का संयन्त्रा तो हम मूलतः दो भ्िान्न तथ्यों के मूल्यों को जोड़ रहे हैं जबकि इन्हें एक वगर् में नहीं रखा जा सकता है। क्योंकि स्िथति विवरण में मुद्रा के मूल्य में आ रहे परिवतर्नों को प्रतिबिम्िबत नहीं किया जाता इसलिए यह लेखांकन आंकड़े बहुध व्यापार का सत्य व सही स्वरूप प्रस्तुत नहीं कर पाते। 2ण्2ण्3 सतत् व्यापार संकल्पना इस संकल्पना के अनुसार ऐसा माना जाता है कि व्यवसाय लम्बे समय तक चलेगा या यह भी कहाजा सकता है कि उसका परिसमापन पूवार्नुमानित भविष्य में नहीं होगा। यह एक महत्त्पूणर् अवधरणाहै क्योंकि यह परिसंपिायों को तुलन पत्रा में अपने क्रय मूल्य पर दिखाने का आधर प्रदान करतीहै। एक परिसंपिा को हम फ्सेवाओं का पुलिंदाय् के रूप में भी परिभाष्िात कर सकते हैं। उदाहरण के लिए जब हम 50ए000 रु. में एक कंप्यूटर खरीदते हैं तथा उसका अनुमानित जीवन पांच वषो± तक मानते हैं तो इसका अथर् है कि हमने उससे प्राप्त होने वाली सेवाओं का इतने वषोर्ं में मूल्य चुकाया है। इसलिए यह उचित नहीं होगा कि हम इस कंप्यूटर के पूरे मूल्य को खरीद के वषर् की आगम पर ही प्रभार मानें। इसके बजाए इस पूरे खचेर् को इसके इस्तेमाल के वषर् अंतराल पर बांट कर ही विभ्िान्न वषो± के आमद पर प्रभार माना जाएगा। यह अवधरणा हमें व्यापार की निरंतरता केकारण यह अनुमति देती है कि संपिा के कुल मूल्य में से केवल वह मूल्य जो उस वषर् विशेष की आमद को अजिर्त करने में उपयोग में लाया गया है उस वषर् विशेष के आमद में से घटायाजाए व परिसंपिा के शेष मूल्य को परिसंपिा की अनुमानित आयु के अन्य वषो± पर हस्तांतरित कर दिया जाए। इसलिए हम प्रत्येक वषर्, पांच वषो± तक लाभ - हानि खाते से 10ए000 रु. प्रभारित करेंगे। यदि निरंतरता की यह अवधरणा न होती तो पूरा मूल्य 50ए000 रु. ;प्रस्तुत उदाहरणद्ध उसी वषर्के आमद से लिया जाता जिसमें परिसंपिा क्रय की गइर् थी। 2ण्2ण्4 लेखांकन अवध्ि संकल्पना लेखांकन अवध्ि से तात्पयर् समय के उस विस्तार से है जिसके अंत में व्यावसायिक संगठन वित्तीय विवरण बनाता है। इन विवरणों द्वारा ही वास्तव में यह पता चलता है कि उस अवध्ि विशेष में व्यवसाय ने लाभोंका अजर्न किया है या उसे हानियाँ उठानी पड़ी हैं, व्यवसाय की परिसंपिायों तथा देयताओं आदि कीस्िथति क्या है? इस प्रकार की सूचना की विभ्िान्न उपयोगकत्तार्ओं को विभ्िान्न उद्देश्यों के लिए नियमितसमय अन्तराल पर आवश्यकता होती रहती है क्योंकि कोइर् भी पफमर् अपने वित्त संबंिात परिणामों को जानने के लिए लम्बे समय तक इन्तजार नहीं कर सकती। इसका कारण है कि इसी सूूचना के आधर पर नियमित समय अन्तराल पर विभ्िान्न निणर्य लेने होते हैं। इसलिए एक निश्िचत अंतराल, जो सामान्यतः एक वषर्होता है, के बाद वित्तीय विवरणों का निमार्ण किया जाता है ताकि सभी उपयोगकतार्ओं को समय से सभी सूचनाएं उपलब्ध् कराइर् जा सवेंफ। यह समय अंतराल लेखांकन अवध्ि कहलाता है। कंपनी अिानियम 1956 व आयकर अध्िनियम के अनुसार भी आय विवरण को वाष्िार्क रूप में बनाना आवश्यक है। जबकि कुछपरिस्िथतियों में अंतरिम वित्तीय विवरण बनाना भी आवश्यक होता है - उदाहरणाथर् किसी साझेदार कीनिवृिा की स्िथति में लेखांकन अवध्ि बारह मास से भ्िान्न हो सकती है। साथ ही कुछ कंपनियां जिनके अंश स्टाॅक एक्सचेंज में सूचीब( होते हैं उन्हें अपने परिणामों की त्रौमासिक रिपोटर् का प्रकाशन करना पड़ताहै। ताकि वह हर तिमाही अपने संगठन की लाभ अजर्न क्षमता व वित्तीय स्िथति का आकलन कर सवेंफ। 2ण्2ण्5 लागत संकल्पना लागत संकल्पना की मुख्य आवश्यकता है कि सभी परिसंपिायों को पुस्तकों में उनके क्रय मूल्यपर ही अभ्िालिख्िात किया जाए। इस क्रय मूल्य में परिसंपिा का प्राप्ित मूल्य, परिवहन व्यय, स्थापनाव्यय व किये गये व्यय सम्िमलित हैं जो उस परिसंपिा को काम में लाने योग्य बनाने के लिए किये जाते हैं। इस बात को समझने के लिए आइये, मानें कि जून 2005 में मै. श्िावा एन्टरप्राइस ने एक पूवर्प्रयुक्त प्लांट 50 लाख रुपये में खरीदा। मै. श्िावा एन्टरप्राशेश कपड़े धेने का पाउडर बनाते हैं। पफैक्टरी तक ले जाने के लिए संयन्त्रा के परिवहन पर 10ए000 रु. व्यय किए गए। इसके अतिरिक्त संयन्त्रा को चालू हालत में लाने के लिए मरम्मत पर 15ए000 रु. व स्थापना पर 25ए000 रु. व्यय किए गए। संयन्त्रा का कुल मूल्य 50ए50ए000 रु. होगा जो कि इन सब व्ययों का जोड़ है तथा लेखा - पुस्तकों में संयन्त्रा इसी मूल्य पर अभ्िालिख्िात किया जाएगा। इस संकल्पना के अनुसार लागत की प्रकृति ऐतिहासिक है जो कि परिसंपिा की प्राप्ित की तिथ्िा को भुगतान की गइर् राश्िा द्वारा व्यक्त की जाती है तथा यह वषो± के अन्तराल में भी बदलती नहीं है। उदाहरणाथर् यदि पफमर् द्वारा कोइर् भवन 2ण्5 करोड़ का क्रय किया गया था तो आने वाले वषो± में भी उसका क्रय मूल्य यही रहेगा बदलेगा नहीं चाहे उसका बाशार मूल्य कितना भी क्यों न बदल जाए। ऐतिहासिक लागत का चुनाव अभ्िालेखन में वस्तुनिष्ठता लाता है क्योंकि इस लागत को क्रय प्रलेखों से सत्यापित किया जा सकता है। दूसरी ओर बाशार मूल्य के आधर पर अभ्िालेखन विश्वसनीय नहीं होगा क्योंकि बाशार मूल्य में समय - समय पर परिवतर्न होते रहते हैं। इसलिए एक समय के मूूल्य व दूसरे समय के मूल्य की तुलना में कठिनाइर्यों का सामना करना पडे़गा। ऐतिहासिक लागत के आधर पर लेखांकन की एक महत्त्वपूणर् सीमा है कि यह व्यवसाय के वास्तविक मूल्य का प्रदशर्न नहीं करता इसलिए सदैव कुछ गुप्त लाभों की संभावना बनी रहती है।मूल्य वृि के समय में बाशार मूल्य छविलेखा पुस्तकों मंे दिखाए गये मूल्य से अध्िक है तो परिसंपिायों के उँचे प्रतिस्थापन मूल्य व कुछ गुप्त लाभ होने की संभावना बन जाती है। स्वयं जाँचिए . 1 सही उत्तर का चुनाव करें 1ण् किसी इकाइर् के जीवन काल में जिस मूल संकल्पना पर आधरित वित्तीय विवरण बनाए जाते हैं वह हैं√ ;कद्धविवेकशीलता ;खद्ध आगम व्यय मिलान ;गद्धलेखांकन अवध्ि ;घद्ध कोइर् नहीं 2ण् जब दो व्यवसायों से संबंध्ित सूचनाओं को समान प्रकार से तैयार किया जाता है तो वह सूचनाएं प्रदश्िार्त करती हैं√ ;कद्धजाँच योग्यता ;खद्ध उपयुक्तता ;गद्धप्रासंगिकता ;घद्ध कोइर् नहीं 3ण् वह संकल्पना, जिसके अनुसार व्यावसायिक इकाइर् को निकट भविष्य में न तो बेचा जाएगा व न ही उसका परिसमापन होगा, कहलाती है√ ;कद्धसतत् व्यापार ;खद्ध आथ्िार्क इकाइर् ;गद्धमौिक इकाइर् ;घद्ध कोइर् नहीं 4ण् लेखांकन सूचना कोे निणर्य में आवश्यक बनाने वाला प्राथमिक गुण है√ ;कद्धप्रासंगिकता व पूवार्ग्रह मुक्ित ;खद्ध विश्वसनीयता व तुलनीयता ;गद्धतुलनीयता व समनुरूपता ;घद्ध कोइर् नहीं 2ण्2ण्6 द्विपक्षीय संकल्पना द्विपक्षीय पक्ष लेखांकन का मूलभूत व आधरभूत सि(ांत है। यह व्यवसाय के लेन - देनों को लेखांकन पुस्तकों में अभ्िालेख्िात करने का आधर प्रदान करता है। इस संकल्पना के अनुसार व्यवसाय के प्रत्येक लेन - देन का प्रभाव किन्हीं दो स्थानों पर पड़ता है अथार्त् प्रत्येक लेन - देन का अभ्िालेखन दो स्थानों पर किया जाता है। दूसरे शब्दों में किसी भी लेन - देन के अभ्िालिेखन के लिए दो खाते होंगे। इसे एक उदाहरण के द्वारा समझाया जा सकता है। मान लीजिए राम ने 50ए00ए000 रु. का निवेश करएक व्यवसाय प्रारंभ किया। राम द्वारा व्यवसाय में लगाए गए पैसे से व्यवसाय की परिसंपिायों में 50ए00ए000 रु. से वृि हो जाएगी साथ ही स्वामी की पूँजी में भी 50ए00ए000 रु. से वृि होगी। आप देखेंगे कि इस व्यवहार से दो खाते रोकड़ खाता व पूँजी खाता, प्रभावित होंगे। इस बात को और अच्छी तरह समझने के लिए आइये एक उदाहरण लें। एक पफमर् ने 10ए00ए000 रु. मूल्य का माल नकद खरीदा। इस लेन - देन के परिणामस्वरूप एक तरपफ परिसंपिायों ;माल के स्टाॅकद्धमें वृि होगी तो दूसरी तरपफ दूसरी परिसंपिा ;नकदद्ध में कमी आएगी। इसी प्रकार यदि पफमर् मै. रिलाएबल इंडस्ट्रीज से 30ए00ए000 रु. मूल्य की कोइर् मशीन उधर खरीदती है तो इस लेन - देन के प्रभाव स्वरूपपरिसंपिायों ;मशीनद्ध में जहाँ एक ओर वृि होगी वहीं देयताओं ;लेनदारद्ध में भी वृि होगी। सभी लेन - देनों में इसी प्रकार का दोहरा प्रभाव दृष्िटगोचर होता है इसलिए लेखांकन की इस संकल्पना को द्विपक्षीय संकल्पना कहते हैं। इस संकल्पना को लेखांकन के अधरभूत समीकरण के रूप में भी प्रदश्िार्त किया जा सकता है जो कि निम्न प्रकार हैः परिसंपिायां त्र देयताएँ ़ पूँजी दूसरे शब्दों में इस समीकरण के अनुसार व्यवसाय की परिसंपिायों का मूल्य सदैव स्वामी व बाहरी लेनदारों की दावेदारियों के बराबर होता है। स्वामी की दावेदारी को पूँजी ;स्वामित्व पूँजीद्ध नाम से जाना जाता है तथा लेनदारों की दावेदारीको देयताओं ;ट्टण पूँजीद्ध के नाम से। लेन - देन का दोहरा प्रभाव इन परिसंपिायों व देयताओं आदि पर कुछ इस प्रकार पड़ता है कि समीकरण सदैव सम ही रहता है। इसलिए आवश्यक है कि लेन - देनों का अभ्िालेखन सावधनी पूवर्क ठीक - ठीक दो खातों में किया जाए। वास्तव में यह संकल्पना लेखांकन की द्विअंकन प्रणाली का मूल है, और इसी संकल्पना के आधर पर अध्याय - 3 में द्विअंकन लेखांकन समझाया गया है। 2ण्2ण्7 आगम मान्यता संकल्पना इस संकल्पना के अनुसार किसी भी आगम को लेखा पुस्तकों में तब तक अभ्िालिख्िात नहीं करना चाहिए जब तक वह वास्तविक रूप में प्राप्त न हो जाए। यह विचार मस्ितष्क में दो प्रश्नों को जन्म देता है प्रथम, ‘आगम’ किसे कहेंगे व दूसरा कि, आगम को मान्य किस समय मानेंगे। आइये पहले प्रश्न को पहले लें, आगम से तात्पयर् रोकड़ के उस कुल अन्तरप्रवाह से है, ;पद्ध जो व्यवसाय द्वारा वस्तुओं व सेवाओं के विक्रय से प्राप्त होता है, ;पपद्ध व्यवसाय के संसाध्नों का दूसरे लोगों द्वारा उपयोग के बदले प्राप्ितयां जैसे - ब्याज, राॅयल्टी, लाभांश आदि से दूसरे, आगम को मान्य तभी माना जाता है जब उसकी प्राप्ित पर व्यवसाय का विध्िसम्मत अिाकार हो जाता है, अथार्त् जब वस्तुओं का विक्रय हो गया हो या सेवाएँ प्रदान कर दी गइर् हों। इसीलिए उधर विक्रय को आगम विक्रय की तिथ्िा से मान लिया जाता है, न कि उस तिथ्िा से जब क्रयकतार् ने रोकड़ का भुगतान किया हो। किराया, कमीशन, ब्याज इत्यादि आयों को समय के आधर पर मान्य माना जाता है। उदाहरणाथर्, माचर् 2005 मास का किराया, चाहे वह अप्रैल में प्राप्त हो, उसका लेखांकन माचर् 2005 को समाप्त होने वाले लेखा वषर् के लाभ - हानि खाते में ही होगा न कि अप्रैल 2005 से प्रारम्भ वित्तीय वषर् में इसी प्रकार यदि अप्रैल 2005 में प्राप्त होने वाला कोइर् ब्याज समय से पूवर् माचर् 2005 में ही प्राप्त कर लिया गया है तो उसका लेखा माचर् 2005 के वित्तीय विवरणों में न होकर माचर् 2006 के वित्तीय विवरणों में होगा। आगम मान्यता की इस सामान्य संकल्पना के कुछ अपवाद भी हैं - विनिमार्ण अनुबंध् जिन पर कायर् पूरा होने में 2.3 वषो± का समय लगता है। उस स्िथति में, कुल आगम को, कायर् समाप्ित की अनुपातिक रूप में अजिर्त आगम मान लिया जाता है, इसी प्रकार जब किराया विक्रय प(ति द्वारा वस्तुओं का विक्रय होता है तो एकत्रा किश्तें ही मान्य आगम मान ली जाती हैं। 2ण्2ण्8 आगम व्यय मिलान संकल्पना यह जानने की प्रिया में, कि एक दिए गए अंतराल में व्यवसाय ने लाभ अजिर्त किया है या उसे हानियाँ उठानी पड़ी हैं, हम उस अन्तराल विशेष के आगमों में से व्ययों को घटाते हैं। आगम मिलान संकल्पना में लेखांकन के इसी पक्ष पर बल दिया जाता है। इस संकल्पना के अनुसार अवध्ि विशेष मे अजिर्त आगमों का मिलान उसी अवध्ि के व्ययों से किया जाना चाहिए। जैसा कि पहले ही समझाया जा चुका है कि आगम को मान्य या अजिर्त तभी मान लिया जाता है जब विक्रय हो जाता है या सेवा प्रदान कर दी जाती है न कि जब उसके प्रतिपफल के रूप में रोकड़ प्राप्त की जाती है। इसी प्रकार एक व्यय को भी तभी खचर् मान लिया जाता है जब उससे किसी संपिा या आगम का अजर्न हो गया हो, न कि जब उस पर रोकड़ का भुगतान हुआ। उदाहरणाथर् वेतन, किराया, बीमा आदि का व्यय जिस समय वह देय है के अनुसार ही खचर् मान लिया जाता है न कि जब वास्तविक रूप मेंइनका भुगतान किया जाए। इसी प्रकार स्िथर संपिायों पर ”्रास निकालने के लिए संपिा के मूल्य को उसकी उपयोगिता के वषो± से भाग दिया जाता है। आइये अब यह समझें कि माल के मूल्य का उससे अजिर्त विक्रय आगम से किस प्रकार मिलान किया जाता है। वषर् विशेष के लाभ या हानि का पता लगाते समय हमें उस वषर् विशेष में उत्पादित या खरीदी सभी वस्तुओं की लागत का आकलन करने के स्थान पर केवल बेची गइर् वस्तुओं की लागत को ध्यान में रखना चाहिए। इसी उद्देश्य से वह वस्तुएं जो बच गइर् हो या अभी नहीं बिकीहै, की लागत को कुल खरीदी या उत्पादित वस्तुओं की लागत में से घटा देना चाहिए। आप वित्तीय विवरणों से संबंध्ित अध्याय में इस विषय में विस्तार से पढ़ेंगे। अंत में आगम व्यय मिलान संकल्पना के अनुसार किसी वषर् विशेष के लाभ या हानि की गणना करने के लिए उस अवध्ि के सभी आगम चाहे उनके बदले रोकड़ मिली है या नहीं तथा सभी व्यय चाहे उनके बदले रोकड़ भुगतान हुआ है या नहीं का अभ्िालेखन आवश्यक है। 2ण्2ण्9 पूणर् प्रस्तुतिकरण संकल्पना वित्तीय विवरणों द्वारा उपलब्ध् कराइर् गइर् सूचना का प्रयोग विभ्िान्न प्रयोगकत्तार् जैसे - निवेशक, )णदाता, माल की पूतिर् करने वाले समूह व अन्य अपने विभ्िान्न निणर्यों के लिए करते हैं। संगठन के निगमित प्रकार में व्यवसाय के स्वामियों का समूह उसका प्रबन्ध् कर रहे समूह से भ्िान्न होता है। इसलिएविभ्िान्न हित समूूहों की वित्तीय सूचना के संप्रेषण के रूप में वित्तीय विवरण एक मात्रा विकल्प है।इसलिए यह और भी आवश्यक हो जाता है कि विभ्िान्न वित्तीय निणर्यों में सहायक भूमिका निभानेवाले यह वित्तीय विवरण सही, पयार्प्त व पूणर् सूचनाओं को प्रस्तुत करें। इस संकल्पना के अनुसार व्यवसाय के वित्तीय प्रदशर्न से जुड़े सभी सारपूणर् व आवश्यक तथ्योंका उल्लेख वित्तीय विवरण में टिप्पण्िायों, पाद - टिप्पण्िायों के रूप में कर देना चाहिए। ताकि इन सूचनाओं के प्रयोगकत्तार् व्यवसाय के संबंध् में निणर्य लेते समय व्यवसाय की लाभाजर्न क्षमता ववित्तीय सक्षमता के बारे में मूल्यांकन सही प्रकार कर सकें। लेखांकन संबंध्ी सूचनाओं के सारपूणर् प्रस्तुतिकरण को सुनिश्िचत करने के लिए कंपनी अिानियम 1956 में कम्पनी में, लाभ - हानि खाते व स्िथति विवरण के सम्पूणर् प्रारूप दिए गए हैं तथा वित्तीय विवरणों को बनाते समय इन्हीं प्रारूपों को पालन करना वैधनिक रूप से आनिवायर् है। सेबी जैसे नियामक निकाय भी कंपनियों को अपनी लाभाजर्न क्षमता व स्िथति के विवरण के सही व पूरे प्रस्तुतिकरण का ही आदेश देते हैं। 2ण्2ण्10 समनुरूपता की संकल्पना किसी भी व्यवसाय द्वारा वित्तीय विवरणों में निहित सूचनाएं व्यवसाय संचालन के प्रयोग परिणामों तक पहुँचने में उपयोगी तभी हो सकती हैं जब उनका तुलनात्मक अध्ययन संभव हो। यह तुलनाविभ्िान्न वषो± के वित्तीय विवरणों से भी हो सकती है और एक जैसा व्यापार करने वाले विभ्िान्न व्यवसायों के मध्य भी। इसलिए दोनों ही प्रकार की तुलनाएं वांछनीय हैं चाहे वह अन्तर - अवध्ि में हो या अन्तर - पफमिर्य। यह तभी संभव है जब पफमर् द्वारा अपने खातों के लेखांकन में प्रयोग लाइर् जाने वाली नीतियों व अभ्यासों में लंबे समय तक समानता व समनुरूपता अपनाइर् जाए। इस बात को समझने के लिए मान लीजिए एक निवेशक व्यवसाय विशेष के वतर्मान वषर् केवित्तीय प्रदशर्न की तुलना पिछले वषर् के प्रदशर्न से करना चाहता है। इसके लिए वतर्मान वषर् के शु( लाभ की तुलना पिछले वषर् के शु( लाभ से कर सकता है। लेकिन यदि पिछले वषर् ”ास के निधर्रण की लेखांकन नीति व इस वषर् की नीति में अंतर है तो क्या यह लाभ तुलनीय होंगे। यही स्िथति तब भी उत्पन्न हो सकती है यदि दोनों वषो± में स्टाॅक के मूल्यांकन के लिए भी अलग - अलग विध्ियों का प्रयोग किया गया है। इसी कारण यह अति आवश्यक है कि समनुरूपता की संकल्पना का पालन हो ताकि दो भ्िान्न लेखांकन अवध्ियों के परिणामों की तुलना की जा सके। समनुरूपता व्यक्ितगत आग्रह का भी निराकरण करती है तथा परिणामों को तुलनीय बनाती है। इसी प्रकार दो व्यवसायों के वित्तीय परिणामों की तुलना भी तभी संभव है यदि दोनों ने वित्तीय विवरणों के निमार्ण के लिए लेखांकन के समान तरीके व नीतियों का पालन किया हो। ऐसा नहीं है कि समनुरूपता की संकल्पना लेखांकन नीतियों में परिवतर्न वजिर्त करती हो लेकिन यह आवश्यक है कि इनमें किसी भी परिवर्तन की सम्पूणर् सूचना विवरणों में उपलब्ध् हो तथा इनके कारण परिणामों पर पड़ने वाले प्रभाव में स्पष्ट रूप से इंगित किए जाए। 2ण्2ण्11 रूढि़वादिता की संकल्पना यह संकल्पना ;जिसे विवेकशीलता संकल्पना भी कहते हैंद्ध सावधनी से खेलने की नीति पर आधारित है तथा लेन - देनों को लेखा - पुस्तकों में अभ्िालिख्िात करते समय सावधनी व विवेक के प्रयोग का निदेर्श देती है। इसके अनुसार व्यापार की आय का ब्यौरा बनाते समय ऐसी सावधानी बरतनी चाहिए कि व्यापार के लाभ अनावश्यक रूप से बढ़े हुए न दिखें। यदि आय का निधार्रण करते समय अिाक लाभ उल्लेख्िात होगें तो पूँजी में से लाभांशों का वितरण करना पड़ेगा जो कि न तो उचित है और यह व्यापार की पूँजी में भी कमी लाएगा। इस संकल्पना के अनुसार समस्त लाभों का लेखा - पुस्तकों में तब तक नहीं करना चाहिए जब तक की वह अजिर्त न हो लेकिन वह सभी हानियां जिनकी यदि दूरस्थ संभावना भी हो, तो उनके लिए लेखा पुस्तकों में पयार्प्त प्रावधन कर लेना चाहिए। अंतिम स्टाॅक का मूल्यांकन वास्तविक मूल्य व बाशार मूल्य में से जो कम है उस पर करना तथा संदिग्ध् )णों के लिए आरंभ से ही प्रावधान,देनदारों के लिए छूट का प्रावधन, अमूतर् संपिायों ख्याति, पेटेंट आदि का सामयिक अपलेखन आदि इसी संकल्पना के उपयोग के उदाहरण हैं। इसी कारण यदि बाशार में क्रय किए गए माल का मूल्य कम हो गया है तो लेखा - पुस्तकों में उसे खरीद के मूल्य पर ही दिखाया जाएगा इसके विपरीत यदि बाशार में माल का मूल्य बढ़ गया है तो लाभ का कोइर् लेखा तब तक नहीं किया जाएगा जब तक की माल को बेच न लिया जाय। इसलिए यह अभ्िागम जिसमें हानियों के लिए प्रावधन आवश्यक है लेकिन लाभों की पहचान तब तक नहीं होती जब तक की उनका वास्तविक अजर्न न हो, विवेकशीलतापूणर् लेखांकन कहलाता है। यह शायद लेखाकारों के निराशापूणर् दृष्िटकोण की ओर इशारा करता है, लेकिन यह व्यवसाय की अनिश्िचतताओं से निपटने तथा देनदारों के हितों की पफमर् कीपरिसम्पिायों के अवांछनीय वितरण से सुरक्षा प्रदान करने की कारगर विध्ि है। पिफर भी जानबूझकरपरिसम्पिायों को कम मूल्य पर आंकने की प्रवृिा को हतोत्साहित करना चाहिए क्योेंकि इसके परिणामस्वरूप छुपे हुए लाभ अथार्त गुप्त कोषों का निमार्ण हो जाएगा। 2ण्2ण्12 सारता की संकल्पना इस संकल्पना के अनुसार लेखांकन करते समय केवल महत्त्वपूणर् तथ्यों पर ही ध्यान केन्िद्रत करनाचाहिए। ऐसे तथ्यों का लेखांकन या प्रस्तुतिकरण जो कि आय के निधार्रण में महत्त्वपूणर् नहीं है उनके लेखांकन में प्रयासों को व्यथर् नहीं करना चाहिए। यहाँ प्रश्न यह उठता है किन तथ्यों को सारपूणर्तथ्य या महत्त्वपूणर् तथ्य कहेंगे, यह निभर्र करेगा कि उस तथ्य की प्रकृति क्या है व उसमें निहितध्नराश्िा कितनी है। कोइर् भी ऐसा तकर् संगत तथ्य जो सूचना के किसी उपयोगकत्तार् के निणर्य को प्रभावित करने में सक्षम है तो वह सार तथ्य माना जाएगा। उदाहरणाथर् यदि थ्िाएटर में दशर्कों के बैठने की क्षमता बढ़ाने के लिए ध्न राश्िा का व्यय किया गया है तो यह एक ऐसा तथ्य है जो भविष्य में व्यवसाय की आय क्षमता में वृि करेगा। इसी प्रकार ”ास गणना की विध्ि में परिवतर्न या कोइर् ऐसी देनदारी जिसका भुगतान भविष्य में करना पड़ सकता है, ऐसे तथ्य हैं जिनकी सूचनाउपयोगकत्तार् के लिए महत्त्वपूणर् होगी। इसलिए ऐसे सभी सार तथ्यों के बारे में सूचना का प्रकटीकरणवित्तीय विवरणों व उनके साथ जुड़ी टिप्पण्िायों के माध्यम से सूचना के उपयोगकत्तार्ओं तक पहुँचना चाहिए जिससे कि वे सूचना - आधरित निणर्य ले सके। कुछ परिस्िथतियों में लेन - देन में इतनी कम ध्न राश्िा का प्रयोग हुआ होता है कि लेखांकन नियमों के बहुत कड़ाइर् से प्रयोग की आवश्यकता ही नहीं होती। उदाहरण के लिए लिखाइर् मिटाने के लिए रबड़ों, पेन्िसलों, पफुट्टों आदि के स्टाॅकको परिसम्पिायों में नहीं दिखाया जाता। किसी वषर् विशेष में स्टेशनरी का जितना भी सामान खरीदा जाता है उसे उसी वषर् का व्यय माना जाता है, चाहे उस पूरे का उपभोग हो गया है या नहीं इस व्यय को आगम व्यय मानकर उस वषर् विशेष के लाभ - हानि खाते में व्यय की तरह लिखा जाता है। 2ण्2ण्13 वस्तुनिष्ठता की संकल्पना इस संकल्पना के अनुसार प्रत्येक लेने - देन को वस्तुनिष्ठ प्रकार से अभ्िालिख्िात करने की अपेक्षा की जाती है। लेखांकन को लेखाकार व अन्य प्रभावशाली व्यक्ितयों के पूवार्ग्रहों से मुक्त होना चाहिए। यह तभी संभव है यदि प्रत्येक लेन - देन को उसके सहायक दस्तावेज या प्रमाणक द्वारा सत्यापित किया जा सके। उदाहरण के लिए नकद खरीद के लेन - देन का सत्यापन उसके नकद भुगतान से प्राप्त नकद रसीद से किया जा सकता है और उधर खरीद को बीजक अथवा डिलिवरी चालान द्वारा सत्यापित किया जा सकता है। उसी प्रकार किसी मशीन की खरीद पर भुगतान के समय प्राप्त नकद रसीद उस मशीन की लागत का दस्तावेजी साक्ष्य बनकर उस लेन - देन को सत्यापित करने का वस्तुनिष्ठ आधर प्रदान करती है। ऐतिहासिक लागत को लेखांकन का आधर मानने का एक कारण यह है कि इससे लेन - देन को वस्तुनिष्ठ तरीके से अभ्िालेख्िात कर इस संकल्पना को व्यवहार में लाना व पालन करना संभव होपाता है। जैसा कि उफपर कहा जा चुका है कि किसी संपिा के मूल्य का सत्यापन उसके नकद भुगतान पर प्राप्त रसीद द्वारा आसानी से किया जा सकता है लेकिन उसके बाशार मूल्य का अनुमान लगानासंभव नहीं है। वास्तविक रूप में बाशार में उस संपिा विशेष को बेचे बिना यह संभव नहीं है। क्योंकि बाजार मूल्य न केवल एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्िान्न होगा बल्िक एक व्यक्ित से दूसरे व्यक्ित के लिए भी यह अलग - अलग ही होगा और ऐसे में वस्तुनिष्ठता का पालन असंभव हो जाएगा। स्वयं जाँचिए - 2 रिक्त स्थानों को सही शब्दों से भरो 1ण् एक ही समय की आगम व व्ययों को पहचानना ............. संकल्पना कहलाता है। 2ण् लेखापालों द्वारा अनिश्िचतताओं को समाप्त करने की प्रवृिा के अन्तगर्त संपिायों व आमद को कम मूल्य पर तथा देनदारियों व व्ययों को अध्िक मूल्य पर दशार्ने वाली संकल्पना ...........................है। 3ण् विक्रय के समय ही आमद की मान्यता .............. की संकल्पना पर आधरित है। 4ण् .................. संकल्पना के अनुसार विभ्िान्न लेखांकन वषो± में समान लेखांकन विध्ियों का प्रयोग करना चाहिए। 5ण् .................. संकल्पना के अनुसार लेखांकन लेन - देनों को लेखापाल व अन्य व्यक्ितयों के पूवार्ग्रह से मुक्त होना चाहिए। 2ण्3 लेखांकन प्रणालियां लेखांकन की प्रणालियों को सामान्यतः दो प्रकारों में बांटा जाता है - द्विअंकन प्रणाली व एकल अंकन प्रणाली। द्विअंकन प्रणाली लेन - देनों के अभ्िालेखन की द्विपक्षीय संकल्पना पर आधरित है। इसके अनुसार प्रत्येक लेन - देन के व्यवसाय पर दो प्रकार के प्रभाव होते हैं, एक लाभ लेने का व दूसरा लाभ देने का। इसीलिए यह दो खातों को प्रभावित करते हुए बही खाते में दो स्थानों पर अभ्िालिख्िात होती है। प्रत्येक लेन - देन का लेखा इस सि(ांत पर आधरित होता है कि हर एक सौदे को नाम पक्ष तथा उसके तदानुरूप जमा पक्ष की ओर अभ्िालिख्िात किया जाए। इसलिए यदि एक खाते के नाम पक्ष में प्रविष्िट हुइर् है तो किसी खाते के जमा पक्ष में अवश्य प्रविष्िट होगी। द्विअंकन एक सम्पूणर् प्रणाली है क्योंकि इसके अन्तगर्त प्रत्येक लेन - देन के दोनों पक्षों का लेखा किया जाता है। यह प्रणाली इसलिए भी अध्िक पूणर् व विश्वसनीय है क्योंकि इसमें धेखे व व्यापार की संपिायों के दुरुपयोग की संभावना कम से कम होती है। खातों में होने वाली गण्िातीय अशुियों को तलपट बनाकर सुधरा जा सकता है। बड़े संगठन व छोटे संगठन दोनों ही लेखांकन की इस प्रणाली को सहजतापूवर्क अपना सकते हैं। एकल अंकन प्रणाली वित्तीय प्रलेखों को अभ्िालिख्िात करने की सम्पूणर् प्रणाली नहीं है। क्योंकि यह प्रत्येक लेन - देन का द्विपक्षीय लेखांकन नहीं करती। इस प्रणाली के अन्तगर्त सभी खातों को बनाने के बजाए केवल व्यक्ितगत खाते व रोकड़ बही को ही बनाया जाता है। वास्तविक रूप में लेखांकन की इस प्रणाली में अभ्िालेखन की समरूपता का अभाव होने के कारण इसे प्रणाली कहना भी गलत है। क्योंकि इसमें कुछ लेने - देनों का केवल एक पक्ष ही अभ्िालिख्िात किया जाता है कुछ लेन - देनों के दोनों पक्षों का इस प्रणाली में जो खाते रखे जाते हैं वह अध्ूरे एवं अव्यवस्िथत होते हैं इसलिए यह प्रणाली विश्वसनीय नहीं होती। लेकिन इसकी सरलता व लोचशीलता के कारण कुछ छोटे व्यापारी इसी प्रणाली को अपनाते हैं ;आप इसके बारे में विस्तार से इसी पुस्तक में आगे पढ़ेंगेद्ध। 2ण्4 लेखांकन के आधर मान्यता के समय के आधर पर लेखांकन में आगम व लागतों को मूलतः दो मुख्य आधरों पर लेखांकित किया जाता है। ;पद्ध नकद आधर, और ;पपद्ध उपाजर्न आधर। नकद आधर पर लेखांकन करते समय लेखा - पुस्तकों में लेन - देनों की प्रविष्िट नकद के भुगतान या प्राप्ित के समय ही की जाती है न कि उनके देय या प्राप्त हो जाने पर ही। उदाहरण के लिए यदि दिसंबर 2005 में दिया जाने वाला कायार्लय का किराया जनवरी 2006 में दिया गया तो उसका अभ्िालेखन जनवरी 2006 में ही किया जायेगा। इसी प्रकार जिन वस्तुओं का विक्रय जनवरी 2006 में हुआ था तथा उन पर विक्रय मूल्य अप्रैल 2006 में प्राप्त हुआ है तो उनका लेखांकन अप्रैल 2006 में ही होगा। इस प्रकार यह प्रणाली, आगम व्यय मिलान संकल्पना में वण्िार्त सि(ांत कि ‘समय विशेष की लागतों का मिलान उस समय की आगम के साथ ही होना चाहिए’, से मेल नहीं खाती। इस कारण आसान होने पर भी यह प्रणाली अध्िकतर संगठनों के लिए उचित नहीं है क्योंकि लाभ की गणना के लिए संगठन को एक अवध्ि विशेष के लेन - देनों के आधर के स्थान पर वुफल रोकड़ प्राप्ितयों में से भुगतानों के शेष पर की जाती है। लेखांकन यदि उपाजर्न आधर पर किया जाए तो आगम व लागतों को लेन - देन के समय ही मान्यता दी जाती है न कि उनके वास्तविक प्राप्ित या भुगतान के समय। नकद प्राप्ित व नकद प्राप्ित के अध्ि कार और नकद भुगतान व नकद भुगतान के वैधनिक अनिवायर्ता के बीच अंतर किया जाता है। इसलिए इस प्रणाली के अनुसार लेन - देन के मौिक प्रभाव का लेखा खातों में इसके उपाजर्न के समय के अनुसार किया जाता है न कि इसके बदले में वास्तविक मौिक विनिमय के समय। यह व्यवसाय के लाभ की गणना का अध्िक श्रेष्ठ आधर है क्योंकि इसके अनुसार आगम व व्ययों का मिलान संभव है। उदाहरणाथर् बेचे गए माल की लागत का मिलान उपयोग किए गए कच्चे माल से किया जा सकता है। 2ण्5ण् लेखांकन मानक जैसा कि पहले ही वणर्न किया जा चुका है कि सामान्यतः मान्य लेखांकन सि(ान्तों को आधारभूतलेखांकन संकल्पनाओं के रूप में लेखापालों द्वारा मान्यता प्राप्त है क्योंकि यह वित्तीय विवरणों में एकरूपता व तुलनीयता प्रदान करते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य लेखांकन सूचनाओं की इसके विभ्िान्नउपयोगकत्तार्ओं के लिए उपयोगिता में वृि करना है। लेकिन समस्या यह है कि यह ळ।।च् एक ही लेन - देन के लिए कइर् विकल्पों का अनुमोदन करते हैं उदाहरण के लिए स्टाॅक के मूल्यांकन की कइर् विध्ियां मान्य हैं और व्यावसायिक इकाइर् किसी भी विध्ि से इसका मूल्यांकन करने केलिए स्वतंत्रा है। यह सूचना बाह्य उपयोगकत्तार्ओं के लिए समस्या खड़ी कर सकती है क्योंकि पिफरसूचना की न तो अन्तर - पफमिर्य तुलना हो पाएगी और न ही उसमें एकरूपता ही होगी। इसलिए वित्तीय सूचनाओं के प्रतिवेदन में समनुरूपता व एकरूपता लाना आवश्यक है। इसी आवश्यकता को समझते हुए इंस्िटट्यूट आॅपफ चाटर्डर् अकांउन्टेंट्स आॅपफ इंडिया ;प्ब्।प्द्ध ने अप्रैल 1ए977 में लेखांकन मानकों को विकसित करने के लिए लेखांकन मानक बोडर् की स्थापना की। इस बोडर् का मुख्य कायर् उन क्षेत्रों की पहचान करना है जहाँ लेखाविध्ियों में समरूपता की आवश्यकता है। पिफर सरकारी, सावर्जनिक क्षेत्रा के उपक्रमों, औद्यौगिक व अन्य संगठनों के प्रतिनिध्ि यों से विचारविमशर् कर मानकों का विकास करना है। ले.मा.बो.;।ैठद्ध इन मानकों को बनाते समय अन्तरार्ष्ट्रीय मानक निधर्रण निकाय के निदेर्शों को भी ध्यान में रखता है क्योंकि भारतीय बोडर् अन्तरार्ष्ट्रीय बोडर् का सदस्य है। ले.मा.बो.;।ैठद्ध मानक का खाका बना कर प्ब्।प् में जमा करवाताहै जो इस पर अंतिम निणर्य लेकर इसके वित्तीय विवरणों में प्रयोग की घोषणा जारी करते हैं। ले.मा.बो.;।ैठद्ध मानकों का आवध्िक मूल्यांकन भी करता है। लेखांकन मानक लेखांकन के नियमों, निदेर्शों व अभ्यासों के संबंध् में वह लिख्िात वाक्यांश हैजो लेखांकन सूचना के प्रयोगकत्तार्ओं के लिए वित्तीय विवरणों में समरूपता व एकरूपता लाते हैं। लेकिन यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि मानकों की आड़ में देश विशेष के व्यावसायिक वातावरण में प्रचलित कानून, परंपराओं आदि की अवहेलना नहीं की जा सकती। इंस्टीट्यूट यह सतत प्रयास करता है कि लेखांकन पेशे से जुड़े लोग इन लेखांकन मानकों काप्रयोग करें ताकि वित्तीय विवरणों के प्रदशर्न में समानता लाइर् जा सके। अभी आरंभ्िाक वषोर् में यहमानक सुझावात्मक प्रकृति के हैं। एक बार जब इनकी आवश्कता को लेकर लोग जागरूक हो जाएंगे तो ऐसे कदम भी उठाए जाएंगे जिससे इन मानकों का प्रयोग आवश्यक हो जाएगा। सभी कंपनियों के लिए इन्हें मानना आवश्यक होगा और यदि इनका पालन नहीं हुआ होगा तो कंपनी को न केवलउसका कारण स्पष्ट करना होगा बल्िक उसके वित्तीय प्रभाव का उल्लेख भी करना होगा। लेखांकन मानकों की सूची परिश्िाष्ट में उपलब्ध् है। इस अध्याय में प्रयुक्त मूल शब्द ऽ लागत ऽ पूणर् प्रस्तुतिकरण ऽ मिलान ऽ सामान्यतः मान्य ऽ सारता ऽ आगम मान्यता ऽ वस्तुनिष्ठता ऽ कायार्त्मक निदेर्श ऽ समनुरूपता ऽ लेखांकन अवध्ि ऽ द्विपक्षता ऽ मुद्रा माप ऽ रूढि़वादिता ;विवेकशीलताद्ध ऽ लेखांकन संकल्पना ऽ सतत् व्यापार ऽ लेखांकन सि(ांत ;ळ।।च्द्ध ऽ तुलनीयता अध्िगम उद्देश्यों के संदभर् में सारांश 1ण् सामान्यतः मान्य लेखांकन सि(ांतः सामान्यतः मान्य सि(ान्तों से तात्पयर् वित्तीय विवरणों के लेखन व प्रस्तुतिकरण में एकरूपता लाने के उद्देश्य से प्रयुक्त उन सभी नियमों व निदेर्शक ियाओं से है जिनका प्रयोग व्यावसायिक लेन - देनों के अभ्िालेखन व प्रस्तुति के लिए किया जाता है। इन्हीें सि(ान्तों को संकल्पना व प्रथाएं भी कहते हैं। व्यवहार में संकल्पना, अवधरणा, अभ्िाधरणा, सि(ान्त, संशोध्क सि(ान्त आदि शब्दों का प्रयोग अदल - बदल कर एक दूसरे के स्थान पर किया जाता है इसलिए प्रस्तुत पुस्तक में इन्हें आधरभूत लेखांकन संकल्पनाएं ही कहा गया है। 2ण् आधरभूत सै(ान्ितक संकल्पनाएंः आधरभूत लेखांकन संकल्पनाओं से तात्पयर् उन आधरभूत या मूलभूतअवधरणाओं से है जो वित्तीय लेखांकन के सि(ांतों व अभ्यास में निहित हैं साथ ही यह वह वृहद् कायर् संबंध्ी नियम है जिन्हें लेखांकन ियाओं के लिए प्रयोग में लाया जाता है। 3ण् व्यावसायिक इकाइर्ः इस संकल्पना के अनुसार व्यवसाय का अपने स्वामी से पृथक एंव स्वतंत्रा अस्ितत्व लेखांकन के उद्देश्य से व्यवसाय व उसके स्वामी को दो पहै, अथार्त्ृथक अस्ितत्व वाली इकाइयां माना जाएगा। 4ण् मुद्रा मापनः मुद्रा मापन की संकल्पना के अनुसार संगठन की लेखांकन पुस्तकों में केवल उन्हीं लेन - देनों व घटनाओं का वणर्न अथवा लेखांकन होगा जिनकी प्रस्तुति मुद्रा की इकाइयों के रूप में हो सकती है साथ ही लेन - देनों का ब्यौरा केवल मौिक इकाइयों में रखा जाएगा न की भौतिक इकाइयों में। 5ण् सतत् व्यापारः इस संकल्पना के अनुसार ऐसा माना जाता है कि व्यवसाय लम्बे समय तक चलेगा तथा निकट भविष्य में उसका परिसमापन नहीं होगा। 6ण् लेखांकन अवध्िः लेखांकन अवध्ि संकल्पना से तात्पयर् समय के उस विस्तार से है जिसके अंत मेंव्यावसायिक संगठन वित्तीय विवरण बनाता है। इन विवरणों द्वारा ही वास्तव में यह पता चलता है कि उस अवध्ि विशेष में व्यवसाय ने लाभों का अजर्न किया है या उसे हानियां उठानी पड़ी हैं इस अवध्िके अन्त में व्यवसाय की परिसंपिायों तथा देनदारियों आदि की स्िथति क्या है। 7ण् लागत संकल्पनाः लागत संकल्पना के अनुसार सभी परिसंपिायों को लेखा पुस्तकों में उनके लागतमूल्य पर ही अभ्िालिख्िात किया जाना चाहिए। इस मूल्य में परिसंपिा का प्राप्ित मूल्य, परिवहन व्यय,स्थापना व्यय तथा वह सभी व्यय शामिल है, जो उस परिसंपिा को काम में लाने योग्य बनाने के लिए किए जाते हैं। 8ण् द्विपक्षीय संकल्पनाः इस संकल्पना के अनुसार प्रत्येक लेन - देन के व्यवसाय के विभ्िान्न खातों पर दोहरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए उसका अभ्िालेखन दो स्थानों पर होना चाहिए। इस सि(ान्त को साधरणतः एक आधरभूत समीकरण के रूप में भी वण्िार्त किया जाता है। परिसंपिायां त्र देयताएं ़ पूँजी 9ण् आगम मान्यताः इस संकल्पना के अनुसार किसी व्यावसायिक लेन - देन से प्राप्त आगम को लेखा पुस्तकों में तभी लिखना चाहिए जब उसकी प्राप्ित पर व्यवसाय का विध्िसम्मत अध्िकार हो जाए। आगम सेतात्पयर्, व्यवसाय द्वारा प्रदत्त वस्तुओं के विक्रय अथवा सेवाओं से उत्पन्न नकद/रोकड़ के सकल अन्तर्वाह एवं ब्याज राॅयल्टी एवं लाभांश की अन्य लोगों द्वारा उद्यम के संसाध्नों के प्रयोग के बदले, प्राप्ित से है। 10ण् आगम - व्यय मिलानः इस संकल्पना में लेखांकन अवध्ि विशेष में अजिर्त आगमों का मिलान उसी अवध्ि के व्ययों से करने पर बल दिया जाता है। इसी के परिणामस्वरूप इन आगमों को अजिर्त करने के लिए जो व्यय किये गये हैं वह उसी लेखावषर् से संबंध्ित होने चाहिए। 11ण् पूणर् प्रस्तुतिकरणः इस संकल्पना के अनुसार व्यवसाय के वित्तीय प्रदशर्न से जुड़े सभी आवश्यक वभौतिक तथ्यों का वित्तीय विवरणों एवं पद टिप्पणी में पूरा - पूरा प्रस्तुतिकरण आवश्यक है। 12ण् समनुरूपताः वित्तीय विवरणों में अन्तर - आवध्िक व अन्तर - पफमिर्य तुलनीयता के लिए यह आवश्क है कि किसी एक समय में व्यवसाय में लेखांकन के समान अभ्यासों व नीतियों का प्रयोग समान हो। तुलनीयता तभी संभव होती है जब कि तुलना की अवध्ि में विभ्िान्न इकाइयां अथवा एक ही इकाइर् विभ्िान्न समयाविध्ि में समान लेखांकन सि(ांत को समान रूप से प्रयोग कर रही हो। 13ण् विवेकशीलताः इस संकल्पना के अनुसार व्यावसायिक लेन - देनों का लेखांकन इस प्रकार होना चाहिए कि लाभ को अनावश्यक रूप से बढ़ा कर न दिखाया जाए। सभी अनुमानित हानियों के लिए प्रावध् ान कर लिया जाए लेकिन अनुमानित लाभों पर ध्यान न दिया जाए। 14ण् सारताः इस संकल्पना के अनुसार लेखांकन करते समय केवल महत्त्वपूणर् तथ्यों पर ही ध्यान केन्िद्रत करना चाहिए। यदि तथ्य किसी विवेकशील निवेशक अथवा लेनदार के निणर्य को प्रभावित कर सकताहै तो यह सार तथ्य माना जाएगा तथा इसे वित्तीय विवरणों में दिखाया जायेगा। 15ण्वस्तुनिष्ठताः इस संकल्पना के अनुसार लेन - देनों का लेखांकन इस प्रकार होना चाहिए कि वह लेखापालों व अन्य व्यक्ितयों के पूवार्ग्रहों से मुक्त हो। 16ण् लेखांकन प्रणालियांः व्यापारिक लेन - देनों के प्रलेखन की दो प्रणालियां होती हैं - द्विअंकन प्रणाली व एकल अंकन प्रणाली। द्विअंकन प्रणाली के अंतगर्त प्रत्येक लेन - देनों का प्रलेखन दो स्थानों पर किया जाता है जबकि एकल अंकन प्रणाली को अपूणर् लेखा कहते हैं। 17ण्लेखांकन के आधरः मान्यता के आधर पर लेखांकन में आगमों व लागतों को मूलतः दो मुख्य आध् ारों पर लेखांकित किया जाता है - नकद आधर व उपाजर्न आधर। नकद आधर पर लेखांकन करते समय लेखा पुस्तकों में लेन - देनों की प्रविष्िट नकद के भुगतान या प्राप्ित के समय ही की जाती है। जबकि उपाजर्न आधर पर किया जाए तो आगम व लागतों को लेन - देन के समय ही मान्यता दी जाती है न कि उनके भुगतान के समय। 18ण् लेखांकन मानकः लेखांकन मानक लेखांकन के नियमों, निदेर्शों व अभ्यासों के संबंध् में वह लिख्िातवाक्यांश है जो लेखांकन सूचना के प्रयोगकत्तार्ओं के लिए वित्तीय विवरणों में समनुरूपता व एकरूपता लाते हैं। लेकिन मानकों की आड़ में देश के व्यावसायिक वातावरण, प्रचलित कानून, परंपराओं आदि की अवहेलना नहीं की जा सकती। अभ्यास के लिये प्रश्न लघु उत्तरीय प्रश्न 1ण् एक व्यावसायिक इकाइर् सतत् इकाइर् रहेगी। एक लेखाकार की यह परिकल्पना क्यों आवश्यक है? 2ण् आमद को मान्य कब माना जाएगा। क्या इसके सामान्य नियम के कुछ अपवाद भी हैं? 3ण् आधरभूत लेखांकन समीकरण क्या है? 4ण् आगम मान्यता संकल्पना यह निधर्रित करती है कि किसी लेखावषर् के लिए लाभ अथवा हानि की गणना करने के लिए ग्राहकों को उधर बेचे गये माल को विक्रय में सम्िमलित करना चाहिए। निम्न में से कौन सा व्यवहार में यह निश्िचत करने के लिए उपयोग किया जाता है कि किसी अवध्ि में किसी लेन - देन को कब सम्िमलित किया जाए। वस्तुओं के - ;अद्धप्रेषण पर ;सद्ध बीजक भेज देने पर ;वद्धसुपुदर्गी पर ;दद्ध भुगतान प्राप्त होने पर अपने उत्तर का कारण भी दें। 5ण् संकल्पना पहचानिए ;पद्ध यदि एक पफमर् को यह लगता है कि उसके कुछ देनदार भुगतान नही कर पाएंगे तो ऐसे में अनुमानित हानियों के लिए यदि वह पहले से ही लेखा - पुस्तकों में प्रावधन कर लेती है तो यह ..........संकल्पना का उदाहरण है। ;पपद्ध व्यवसाय का अस्ितत्व अपने स्वामी से भ्िान्न है तथ्य का सवर्श्रेष्ठ उदाहरण .................... संकल्पना है। ;पपपद्ध प्रत्येक वस्तु जिसका स्वामी पफमर् है का स्वामित्व किसी और व्यक्ित के पास भी है। यह संयोग ........................................ संकल्पना में वण्िार्त है। ;पअद्ध यदि संपिायों पर मूल्य ”्रास की गणना के लिए सीध्ी रेखा विध्ि का प्रयोग किया गया है तो ................. संकल्पना के अनुसार इसी विध्ि का प्रयोग अगले वषर् भी किया जाना चाहिए। ;अद्ध एक पफमर् के पास ऐसा स्टाॅक जिसकी बाशार में माँग है। परिणामतः बाशार में उस माल का मूल्य बढ़ गया है। साधरण लेखांकन प(ति में हम इस मूल्य वृि पर ............... संकल्पना के अन्तगर्त ध्यान नहीं देंगे। ;अपद्ध यदि किसी पफमर् को वस्तुओं के विक्रय का आदेश मिलता है तो ...................... संकल्पना के अन्तगर्त उसको कुल विक्रय के आंकड़ों में सम्िमलित नही किया जाएगा। ;अपपद्ध किसी पफमर् का प्रबन्ध्क बहुत अकुशल है लेकिन लेखाकार इस महत्त्पूणर् तथ्य को लेखा - पुस्तकों में .................. संकल्पना के कारण वण्िार्त नहीं कर सकता। निबन्धत्मक प्रश्न 1ण् ‘‘साधरणतः लेखांकन संकल्पनाओं व लेखांकन मानकों को वित्तीय लेखांकन का सार कहा जाता है’’। टिप्पणी कीजिए। 2ण् वित्तीय लेखांकन में समनुरूप आधरों का पालन क्यों आवश्यक है? 3ण् एक लेखापाल के लिए लाभों का अनुमान जरूरी नहीं है अपितु प्रत्येक लाभ का प्रावधन अति आवश्यक है। इस तथ्य का अनुमोदन करने वाली संकल्पना की विवेचना कीजिए। 4ण् आगम व्यय मिलान संकल्पना से आप क्या समझते हैं? एक व्यवसाय के लिए इसका पालन क्यों आवश्यक है? 5ण् मुद्रा मापन संकल्पना का क्या अभ्िाप्राय है? वह एक तत्व बताइये जिसके कारण एक वषर् के मुद्रा मूल्यों की तुलना दूसरे वषर् के मुद्रा मूल्यों से करने में कठिनाइर् आ सकती है? परियोजना कायर् ियाकलाप - 1 1ण् रुचिका के पिता उपहार की वस्तुओं के व्यापार में लगे एकल व्यापारी हैं जिनके व्यवसाय का नाम‘Úेन्डस् गिफ्रट्स’ है। वित्तीय विवरण बनाने के समय उनके लेखापाल श्री गोयल अस्वस्थ होने के कारणअवकाश पर चले गए। रूचिका के पिता ने वित्तीय बैंक से 5 लाख के )ण के लिए आवेदन दियाथा। इसलिए उन्हें अपनी पफमर् के वित्तीय विवरणों को बैंक में जमा करना था। इस अचानक आइर् आवश्यकता के कारण रुचिका, जो कि विद्यालय में लेखांकन की छात्रा थी, ने अपने पिता की सहायता करने का निणर्य लिया। खातों का विस्तृत विश्लेषण करने पर बैंक अध्िकारी ने पाया कुछ समय पूवर् 7 लाख रुपये में खरीदे गए भवन का मूल्य खातों में अब 20 लाख रुपये, जो कि इसका वतर्मान बाशार मूल्य था, दिखाया गया था। पिछले वषर् की तुलना स्टाॅक के मूल्यांकन की विध्ि में भी परिवतर्न कर दिया गया था। जिस कारण स्टाॅक के मूल्य में 15 प्रतिशत की वृि हो गइर् थी। साथ ही एक कंप्यूटर जिसकी कुल कीमत 70ए000 रु. थी और जिसका अनुमानित जीवन पांच वषर् है, का पूरा मूल्य इसी वषर् के लाभों में से घटा दिया गया है जबकि उसका प्रयोग व्यावसायिक नहीं बल्िक व्यक्ितगत कायो± के लिए किया जाता है। बैंक अध्िकारी ने रुचिका द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों को विश्वसनीय नही माना। रुचिका को लेखांकन की आधारभूत संकल्पनाओं संबंध्ी अपनी त्राुटियों को सुधरने के लिए सुझाव दिया। 2ण् एक व्यापारी ने एक ग्राहक को घटिया माल भेज दिया। इसलिए ग्राहक ने न्यायालय में व्यापारी पर दावा कर दिया। यह तो निश्िचत है कि न्यायालय ग्राहक के पक्ष में ही निणर्य देगा लेकिन व्यापारी को उसके नुकसान की क्षतिपूतिर् की राश्िा का भुगतान करना होगा। लेकिन यह निश्िचत नहीं है कि वह क्षतिपूतिर् की रकम कितनी होगी। लेखांकन वषर् अपनी समाप्ित पर है और लेखा - पुस्तकों में लाभ निधर्रित करने की प्रिया भी आरंभ हो चुकी है। व्यापारी को लेखापाल ने यह सुझाव दिया है कि क्षतिपूतिर् के लिए देय राश्िा का वास्तविक मूल्य ज्ञात नहीं है इसलिए लेखा - पुस्तकों में उसके लिएकिसी भी प्रावधन की आवश्यकता नहीं है। क्या लेखापाल का सुझाव उचित है? अपने उत्तर के पक्ष में तकर् दें। ;1द्ध स्वयं जाँचिए - 1 1ण् ;गद्ध 2ण् ;घद्ध 3ण् ;कद्ध 4ण् ;खद्ध ;2द्ध स्वयं जाँचिए - 2 1ण् आगम व्यय मिलान 2ण् विवेकशीलता 3ण् आगम मान्यता 4ण् सपनुरूपता 5ण् वस्तुनिष्ठता परिश्िाष्ट लेखांकन मानक ;ले.मा.द्ध आइर्.सी.ए.आइर् ;प्ब्।प्द्ध द्वारा निम्नलिख्िात मानक जारी किए गए ले.मा.1 लेखांकन नीतियों का प्रकटीकरण ले.मा.2 स्टाॅक का मूल्यांकन ले.मा.3 नकद/रोकड़ प्रवाह विवरण ले.मा.4 तुलन - पत्रा की तिथ्िा के पश्चात् हुए आकस्िमक व्यय तथा घटनाएं ले.मा.5 अवध्ि का शु( लाभ या हानि, पूवर्वतीर् अवध्ि मदें और लेखांकन नीतियों में परिवतर्न ले.मा.6 मूल्य ”ास लेखांकन ले.मा.7 निमार्ण प्रसंविदे ले.मा.8 शोध् व विकास के लिए लेखांकन ले.मा.9 आगम मान्यता ले.मा.10 स्थायी परिसंपिायों का लेखांकन ले.मा.11 विदेशी मुद्रा विनिमय दरों में परिवतर्न के प्रभावों का लेखांकन ले.मा.12 सरकारी अनुदानों का लेखांकन ले.मा.13 निवेश के लिए लेखांकन ले.मा.14 समामेलन का लेखांकन ले.मा.14 नियोक्ता के वित्तीय विवरणों में सेवानिवृिा लाभों का लेखांकन ;संशोध्न उपरांत इसका नाम बदलकर फ्कमर्चारी लाभय् कर दिया गया हैद्ध ले.मा.14 )ण लागत ले.मा.14 खंडित प्रतिवेदन ले.मा.14 संबंध्ित पाटीर् प्रकटीकरण ले.मा.14 लीज ;पट्टाद्ध ले.मा.20 प्रतिअंश उपाजर्न ले.मा.21 समाहित वित्तीय विवरण ले.मा.22 आय पर कर का लेखांकन ले.मा.23 सहयोगी पफमो± में निवेश का समाहित वित्तीय विवरणों में लेखांकन ले.मा.24 विच्िछन्न प्रियाएं ले.मा.28 अंतरिम वित्तीय प्रतिवेदन ले.मा.26 अमूतर् परिसंपिायां ले.मा.27 संयुक्त उपक्रमों में हितों का वित्तीय प्रतिवेदन ले.मा.28 परिसंपिायों को क्षति ले.मा.29 संभाव्य देनदारियों व संभाव्य परिसंपिायों के लिए प्रावधन

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