लोकतंत्रा की चुनौतियाँ परिचय पिछले दो वषोर्ं में आपने जितना वुफछ सीखा है उसवफो आधर मानकर यह अंतिम अध्याय लोकतांत्रिाक राजनीति के बुनियादी सवालों के जवाब देने की कोश्िाश करता है, जैसे - हमारे देश और अन्य जगहों पर लोकतंत्रा के सामने क्या - क्या चुनौतियाँ हैं? लोकतांत्रिाक राजनीति को सुधरने के लिए क्या वुफछ किया जा सकता है? हमारी लोकतांत्रिाक व्यवस्था अपने बरताव और नतीजों में किस तरह और अध्िक लोकतांत्रिाक बन सकती है? इस अध्याय में इन सवालों के जवाब नहीं हैं। यह उन तरीकों के बारे में सिप़्ार्फ वुफछ संकेत और इशारे भर करता है जिनसे हम इन चुनौतियों और सुधरों की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। यह अध्याय आपको खुद अपने तरीके तलाशने और चुनौतियों पर जीत पाने का अपना रास्ता ढूँढ़ने तथा लोकतंत्रा वफो अपने ढंग से परिभाष्िात करने का निमंत्राण भी देता है। अध्याय 8 क्या आपको कक्षा - 9 की अपनी राजनीति विज्ञान की पाठ्यपुस्तक का पहला अध्याय याद है? उसमें हमने देखा कि पिछले सौ वषो± में दुनिया - भर में लोकतंत्रा का विस्तार वैफसे हुआ है? उसके बाद की पढ़ाइर् ने हमारी इस शुरुआती राय को पुष्ट ही किया है कि समकालीन विश्व में लोकतंत्रा शासन का एक प्रमुख रूप है। इसे कोइर् गंभीर चुनौती नहीं है और न कोइर् दूसरी शासन प्रणाली इसकी प्रतिद्वंद्वी है। लेकिन लोकतांत्रिाक राजनीति के विभ्िान्न पहलुओं की जब हमने विस्तार से चचार् की तो हमें वुफछ अन्य चीशें भी दिखाइर् दीं। लोकतंत्रा में जितनी सारी संभावनाएँ हैं दुनिया में अभी कहीं भी उन सबका लाभ नहीं उठाया गया है। लोकतंत्रा का कोइर् प्रतिद्वंद्वी नहीं है - इसका यह मतलब भी नहीं कि उसके लिए कोइर् चुनौती ही नहीं है। लोकतंत्रा की अपनी इस किताबी यात्रा के विभ्िान्न पड़ावों पर हमने देखा है कि दुनिया - भर में लोकतांत्रिाक व्यवस्थाओं के सामने गंभीर चुनौतियाँ हैं। ये चुनौतियाँ किसी आम समस्या जैसी नहीं हैं। हम आम तौर पर उन्हीं मुश्िकलों को ‘चुनौती’ कहते हैं जो महत्वपूणर् तो हंै, लेकिन जिन पर जीत भी हासिल की जा सकती है। अगर किसी मुश्िकल के भीतर ऐसी संभावना है कि उस मुश्िकल से छुटकारा मिल सके तो उसे हम चुनौती कहते हैं। एक बार जब हम चुनौती से पार पा लेते हैं तो हम पहले की अपेक्षा वुफछ कदम आगे बढ़ जाते हैं। अलग - अलग देशों के सामने अलग - अलग तरह की चुनौतियाँ होती हैं। आपकी पाठ्यपुस्तक में एक मानचित्रा दिया गया था। इसमें सन् 2000 तक की लोकतांत्रिाक सरकारों को दिखाया गया था। क्या आपको इस मानचित्रा की याद है? तब का यह नक्शा बताता है कि दुनिया के एक चैथाइर् हिस्से में अभी भी लोकतांत्रिाक शासन व्यवस्था नहीं है। इन इलाकों में लोकतंत्रा के लिए बहुत ही मुश्िकल चुनौतियाँ हंै। इन देशों में लोकतांत्रिाक व्यवस्था की तरपफ जाने और लोकतांत्रिाक सरकार गठित करने के लिए शरूरी बुनियादी आधर बनाने की चुनौती है। इनमें मौजूदा गैर - लोकतांत्रिाक शासन व्यवस्था को गिराने, सत्ता पर सेना के नियंत्राण को समाप्त करने और एक संप्रभु तथा कारगर शासन व्यवस्था को स्थापित करने की चुनौती है। अच्छा! तो अब आपसे विदा लेने आपसे पिफर मिलेंगे 11वीं का वक्त आ गया... आगामी परीक्षा में! आप राजनीति विज्ञान के लिए शुभकामनाएँ! को चुन रहे हैं न? अध्िकांश स्थापित लोकतांत्रिाक व्यवस्थाओं के सामने अपने विस्तार की चुनौती है। इसमें लोकतांत्रिाक शासन के बुनियादी सि(ांतों को सभी इलाकों, सभी सामाजिक समूहों और विभ्िान्न संस्थाओं में लागू करना शामिल है। स्थानीय सरकारों को अध्िक अध्िकार - संपन्न बनाना, संघ की सभी इकाइयों के लिए संघ के सि(ांतों को व्यावहारिक स्तर पर लागू करना, महिलाओं और अल्पसंख्यक समूहों की उचित भागीदारी सुनिश्िचत करना आदि ऐसी ही चुनौतियाँ हैं। इसका यह भी मतलब है कि कम से कम ही चीशें लोकतांत्रिाक नियंत्राण के बाहर रहनी चाहिए। भारत और दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्रों में एक अमरीका जैसे देशों के सामने भी यह चुनौती है। तीसरी चुनौती लोकतंत्रा को मशबूत करने की है। हर लोकतांत्रिाक व्यवस्था के सामने किसी न किसी रूप में यह चुनौती है ही। इसमें लोकतांत्रिाक संस्थाओं और बरतावों को मजबूत बनाना शामिल है। यह काम इस तरह से होना चाहिए कि लोग लोकतंत्रा से जुड़ी अपनी उम्मीदों को पूरा कर सवेंफ। लेकिन, अलग - अलग समाजों में आम आदमी की लोकतंत्रा से अलग - अलग अपेक्षाएँ होती हैं इसलिए यह चुनौती दुनिया के अलग - अलग हिस्सों में अलग अथर् और अलग स्वरूप ले लेती है। संक्षेप में कहें तो इसका मतलब संस्थाओं की कायर्प(ति को सुधरना और मशबूत करना होता है ताकि लोगों की भागीदारी और नियंत्राण में वृि हो। इसके लिए प़्ौफसला लेने की प्रवि्रफया पर अमीर और प्रभावशाली लोगों के नियंत्राण और प्रभाव को कम करने की शरूरत होती है। 9वीं कक्षा की और अपनी इस पाठ्यपुस्तक के विभ्िान्न अध्यायों में हमने अनेक उदाहरण और कहानियों की मदद से इन चुनौतियों पर गौर किया है। आइए, लोकतंत्रा की अपनी इस यात्रा के सभी महत्वपूणर् पड़ावों पर लौटेंऋ यादों को ताशा करें और देखें कि इन पड़ावों पर लोकतंत्रा के सामने कौन - कौन सी चुनौतियाँ हैं। टैब - द वैफलगरी सन, केगल काट±ूस पैटिªक वैफपेट - केगल काट±ूस अलग - अलग संदभर्, अलग - अलग चुनौतियाँ इनमें से प्रत्येक काटूर्न लोकतंत्रा की एक चुनौती को दिखाता है। बताएँ कि वह चुनौती क्या है? यह भी बताएँ कि इस अध्याय में चुनौतियों की जो तीन श्रेण्िायाँ बताइर् गइर् हंै, यह उनमें से किस श्रेणी की चुनौती है? मुबारक पिफर चुने गए लोकतंत्रा पर नशर एरेस - बेस्ट लैटिन अमरीका - केगल काटू±स एरेस - केगल काटू±स उदारवादी लैंगिक समानता चुनाव अभ्िायान का पैसा चिले: जनरल पिनोशे की सरकार ¹उदाहरणह् सभी सरकारी संस्थाओं पर नागरिक - नियंत्राण, पहला बहुदलीय चुनाव में हार गइर् लेकिन अनेक चुनाव कराना, निवार्सित नेताओं को स्वदेश बुलाना संस्थाओं पर अभी भी सेना का कब्शा। पोलैंड: सोलिडरिटी की पहली सपफलता के बाद सरकार ने सैनिक शासन लागू कर दिया और सोलिडरिटी पर प्रतिबंध् लगा दिया। घाना: आशादी मिली और एनवू्रफमा राष्ट्रपति चुने गए। म्याँमार: 15 वषोर्ं से श्यादा से सू की नशरबंद, सैनिक शासन को विश्व - स्तर पर मान्यता अंतरार्ष्ट्रीय संगठन: बची रह गइर् एकमात्रा महाशक्ित अमरीका संयुक्त राष्ट्र की परवाह नहीं करता और एकतरप़्ाफा प़्ौफसले करता है। मैक्िसको: पी आर आइर् की पराजय के बाद 2000 मंे दूसरा स्वतंत्रा चुनावऋ पराजित उम्मीदवारों ने चुनावी धँध्ली की श्िाकायत की। चीन: कम्युनिस्ट पाटीर् आथ्िार्क सुधर अपनाती है पर राजनीतिक सत्ता पर एकाध्िकार बनाए रखती है। पाकिस्तान: जनरल मुशरर्पफ जनमत़संग्रह कराते हैंऋ मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोप लगते हैं। इराक: नइर् सरकार अपनी सत्ता कायम नहीं कर पातीऋ बड़े पैमाने पर संाप्रदायिक हिंसा। दक्ष्िाण अप्रफीका: मंडेला का सवि्रफय राजनीति से संन्यासऋ उनके उत्तराध्िकार मबेकी पर गोरे अल्पसंख्यकों को दी गइर् वुफछ रियायतें वापस लेने का दबाव। अब, जबकि आपने इन सभी चुनौतियों को लिख डाला है तो आइए इन्हें वुफछ बड़ी श्रेण्िायों में डालें। नीचे लोकतांत्रिाक राजनीति के वुफछ दायरों को खानों में रखा गया है। पिछले खंड में एक या एक से अध्िक देशों में आपने वुफछ चुनौतियाँ लक्ष्य की थीं। वुफछ काटर्ूनों में भी आपने इन्हें देखा। आप चाहें तो नीचे दिए गए खानों के सामने मेल का ध्यान रखते हुए इन चुनौतियों को लिख सकते हैं। इनके अलावा भारत से भी इन खानों में दिए जाने वाले एक - एक उदाहरण दजर् करें। अगर आपको कोइर् चुनौती इन खानों में पिफट बैठती नहीं लगती तो आप नयी श्रेण्िायाँ बनाकर उनमें इन मुद्दों को आइए, इन श्रेण्िायों का नया वगीर्करण करें। इस बार इसके लिए हम उन मानकों को आधर बनाएँगे जिनकी चचार् अध्याय के पहले हिस्से में हुइर् है। इन सभी श्रेण्िायों के लिए कम से कम एक उदाहरण भारत से भी खोजें। आइए, अब सिपर्फ भारत के बारे में विचार करें। समकालीन भारत के लोकतंत्रा के सामने मौजूद चुनौतियों पर गौर करें। इनमें़से उन पाँच की सूची बनाइए जिन पर पहले ध्यान दिया जाना चाहिए। यह सूची प्राथमिकता को भी बताने वाली होनी चाहिए यानी आप जिस चुनौती को सबसे महत्वपूणर् और भारी मानते हैं उसे सबसे ऊपर रखें। शेष को इसी क्रम से बाद में। ऐसी चुनौती का एक उदाहरण दें और बताएँ कि आपकी प्राथमिकता में उसे कोइर् खास जगह क्यों दी गइर् है। प्राथमिकता लोकतंत्रा की चुनौती उदाहरण प्राथमिकता का कारण 1 2 3 4 5 इनमें से प्रत्येक चुनौती के साथ सुधर की संभावनाएँ भी जुड़ी हुइर् हैं। जैसा कि पहले कहा गया है, हम चुनौतियों की चचार् सिप़्ार्फ इसलिए करते हैं क्योंकि हमें उनका समाधन पाना संभव लगता है। लोकतंत्रा की विभ्िान्न चुनौतियों के बारे में सभी सुझाव या प्रस्ताव ‘लोकतांत्रिाक सुधर’ या ‘राजनीतिक सुधर’ कहे जाते हैं। यहाँ हम वांछित राजनीतिक सुधरों की सूची नहीं देने जा रहे हैं क्योंकि ऐसी कोइर् सूची अंतिम रूप से बनाइर् नहीं जा सकती। अगर सभी देशों की चुनौतियाँ एक जैसी नहीं हैं तो इसका यह भी मतलब है कि राजनीतिक सुधरों के लिए हर कोइर् एक ही पफामूर्ले का इस्तेमाल नहीं कर सकता। हम कार का माॅडल जाने बगैर उसकी गड़बड़ी ठीक करने का उपाय नहीं बता सकते। वह कहाँ से खराब हुइर् हैंऋ उस जगह क्या उपकरण लगे हैंऋ उसका माॅडल क्या है - यह सब जानकर ही उसकी मरम्मत का तरीका सुझाया जा सकता है। पर क्या हम आज के संदभर् में अपने देश मंे वांछित सुधरों की कम से कम एक सूची बना सकते हैं? हम राष्ट्रीय स्तर के सुधर के वुफछ प्रस्ताव बना सकते हैं लेकिन हो सकता है सुधर की असली चुनौती राष्ट्रीय स्तर की न हो। वुफछ महत्वपूणर् सवालों के जवाब राज्य या स्थानीय स्तर पर भी दिए जा सकते हैं। पिफर, यह सूची वुफछ समय बाद बेकार भी हो सकती है। सो, सूची बनाने की जगह, आइए, वुफछ व्यापक दिशा - निदेर्शों पर विचार करें जिन्हें भारत में राजनीतिक सुधरों के लिए तरीका और जरिया ढूँढ़ते समय अपने जेहन में रखा जा सकता है। ऽ कानून बनाकर राजनीति को सुधरने की बात सोचना बहुत लुभावना लग सकता है। नए कानून सारी अवांछित चीशें खत्म कर देंगे यह सोच लेना भले ही सुखद हो लेकिन इस लालच पर लगाम लगाना ही बेहतर है। निश्िचत रूप से सुधरों के मामले में कानून की एक महत्वपूणर् भूमिका है। सावधनी से बनाए गए कानून गलत राजनीतिक आचरणों को हतोत्साहित और अच्छे कामकाज को प्रोत्साहित करेंगे। पर विध्िक - संवैधनिक बदलावों को ला देने भर से लोकतंत्रा की चुनौतियों को हल नहीं किया जा सकता। ये तो वि्रफकेट के नियमों की तरह हैं। एल.बी.डब्ल्यू. के नियम मंे बदलाव से बल्लेबाशों द्वारा अपनाए जाने वाले बल्लेबाशी के नकारात्मक दाँव - पेंच को कम किया जा सकता है पर यह कोइर् भी नहीं सोच सकता कि सिप़्ार्फ नियमों में बदलाव कर देने - भर से वि्रफकेट का खेल सुध्र जाएगा। यह काम तो मुख्यतः ख्िालाडि़यों, प्रश्िाक्षकों और वि्रफकेट - प्रशासकों के करने से ही होगा। इसी प्रकार राजनीतिक सुधरों का काम भी मुख्यतः राजनीतिक कायर्कतार्, दल, आंदोलन और राजनीतिक रूप से सचेत नागरिकों के द्वारा ही हो सकता है। ऽ कानूनी बदलाव करते हुए इस बात पर गंभीरता से विचार करना होगा कि राजनीति पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। कइर् बार परिणाम एकदम उलटे निकलते हैं, जैसे कइर् राज्यों ने दो से श्यादा बच्चों वाले लोगों के पंचायत चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी है। इसके चलते अनेक गरीब लोग और महिलाएँ लोकतांत्रिाक अवसर से वंचित हुईं जबकि ऐसा करने के पीछे यह मंशा न थी। आम तौर पर किसी चीश की मनाही करने वाले कानून राजनीति में श्यादा सपफल नहीं होते। राजनीतिक कायर्कतार् को अच्छे काम करने के लिए बढ़ावा देने वाले या लाभ पहुँचाने वाले कानूनों के सपफल होने की संभावना श्यादा होती है। सबसे बढि़या कानून वे हैं जो लोगों को लोकतांत्रिाक सुधर करने की ताकत देते हैं। सूचना का अध्िकार - कानून लोगों को जानकार बनाने और लोकतंत्रा के रखवाले के तौर पर सवि्रफय करने का अच्छा उदाहरण है। ऐसा कानून भ्रष्टाचार पर अंवुफश लगाता है और भ्रष्टाचार पर रोक लगाने तथा कठोर दंड आयद करने वाले मौजूदा कानूनों की मदद करता है। ऽ लोकतांत्रिाक सुधर तो मुख्यतः राजनीतिक दल ही करते हैं। इसलिए, राजनीतिक सुधरों का शोर मुख्यतः लोकतांत्रिाक कामकाज को श्यादा मशबूत बनाने पर होना चाहिए। जैसा कि आपने राजनीतिक दलों वाले अध्याय में पढ़ा था, ऐसे सभी सुधरों में मुख्य चिंता इस बात की होनी चाहिए कि इससे आम नागरिक की राजनीतिक भागीदारी के स्तर और गुणवत्ता में सुधर होता है या नहीं। ऽ राजनीतिक सुधर के किसी भी प्रस्ताव में अच्छे समाधन की चिंता होने के साथ - साथ यह सोच भी होनी चाहिए कि इन्हें कौन और क्यों लागू करेगा। यह मान लेना समझदारी नहीं कि संसद कोइर् ऐसा कानून बना देगी जो हर राजनीतिक दल और सांसद के हितों के ख्िालाप़्ाफ हो। पर लोकतांत्रिाक आंदोलन, नागरिक संगठन और मीडिया पर भरोसा करने वाले उपायों के सपफल होने की संभावना होती है। आइए, इन सामान्य दिशा - निदेर्शों को ध्यान में रखें और लोकतंत्रा की वुफछ उन चुनौतियोें पर गौर करें जिनमें वुफछ सुधरों की गुंजाइश है। तो चलिए, सुधर के वुफछ ठोस प्रस्ताव बनाते हैं। यहाँ वुफछ चुनौतियाँ दी गइर् हैं। इनके लिए राजनीतिक सुधरों की शरूरत है। इन चुनौतियों पर विस्तार से चचार् करें। यहाँ सुधर के जो विकल्प दिए गए हैं उनको देखें और कारण बताते हुए अपनी पसंद के समाधन को बताएँ। यह बात याद रखें कि यहाँ बताए गए विकल्प सीध्े - सीध्े ‘सही’ या ‘गलत’ करार नहीं दिए जा सकते। आप कइर् विकल्पों को मिलाकर जवाब दे सकते हैं या ऐसा समाधन भी बता सकते हैं जिसकी यहाँ कोइर् चचार् ही नहीं हुइर् है। आप अपना समाधन पूरे विस्तार से दें और अपनी पसंद के लिए तवर्फ भी बताएँ। राजनीतिक दलों का चंदा चुनौती: लोकसभा का पिछला चुनाव लड़ने वाले प्रत्येक उम्मीदवार की संपिा औसतन एक करोड़ रफपए से श्यादा की थी। यह डर व्यक्त किया जा रहा है कि अब चुनाव लड़ना सिपर्फ अमीरों या उनका़समथर्न रखने वालों के लिए ही संभव है। अध्िकतर राजनीतिक दल बड़े व्यावसायिक घरानों के चंदों पर निभर्र हैं। आशंका इस बात की है कि राजनीति में पैसों की यह बढ़ती हुइर् भूमिका गरीबों के ख्िालाप़्ाफ जाएगी और अपने लोकतंत्रा में जो थोड़ी - बहुत आवाश वे उठा पाते हैं उससे भी वंचित हो जाएँगे। सुधर के प्रस्ताव: प्रत्येक राजनीतिक दल के वित्तीय लेखा - जोखा को सावर्जनिक कर दिया जाना चाहिए। इसका लेखा सरकारी आॅडिटरों से कराया जाना चाहिए। चुनाव का खचर् सरकार को उठाना चाहिए। पाटिर्यों को चुनावी खचर् के लिए सरकार वुफछ रकम दे। नागरिकों को भी दलों और राजनीतिक कायर्कत्तार्ओं को चंदा देने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। ऐसे चंदों पर आयकर में छूट मिलनी चाहिए। राजनीति को रोश ने आख्िारकार मैडम लिंगदोह को अपनी कक्षा के सामने पकड़ हीसुधरना लिया। यह योजना वह वुफछ समय से बना रही थी। फ्मै’म! मुझे सचमुच कनाडा वाला वह काटूर्न बहुत अच्छा लगाय् रोश ने बातचीत शुरू करने के लिए यह प्रकरण छेड़ा। फ्कौन सा?य् मैडम लिंगदोह को एकबारगी वह काटूर्न याद नहीं आया। फ्मै’म, वह काटूर्न जिसमें कहा गया है कि कनाडा के 98 प़्ाफीसदी लोग सारे राजनेताओं को एक बड़े कार के बक्से में बंद करके नियाग्रा जल - प्रपात में पफेंकना चाहते हैं। मुझे तो अपने राजनेता याद आ रहे थे। हमें तो और बड़े वाहन और ब्रह्मपुत्रा जैसे विशाल नदी की शरूरत होगी।य् लिंगदोह मैडम रोश की बात सुनकर मुस्वुफराईं। अध्िकतर भारतीयों की तरह वह भी नेताओं के व्यवहार तथा दल और देश का शासन चलाने के उनके तौर - तरीवफों से नाराश थीं। पर वे चाहती थीं कि रोश इस समस्या की जटिलता को समझे। उन्होंने पूछा, फ्तुम्हें क्या लगता है कि राजनेताओं को हटाने से तुम्हारी समस्याएँ सुलझ जाएँगी?य् फ्हां मैं’म, क्या ये घटिया नेता लोग ही हमारे देश की समस्याओं के लिए िाम्मेवार नहीं हैं? मेरा मतलब है भ्रष्टाचार, दल - बदल, जातिवाद, सांप्रदायिक दंगे, अपराध् .... हर गड़बड़ के लिए।य् लिंगदोह मैडम: फ्तो हमें अभी के सारे नेताओं से मुक्ित पाने भर की शरूरत है। क्या तुम्हें पक्का भरोसा है कि उनकी जगह जो लोग आएँगे वे ऐसे नहीं होंगे?य् रोश: फ्हां, मैंने इस पर तो सोचा ही नहीं था, लेकिन संभव है वे इनकी तरह के न हों। संभव है आगे बेहतर चरित्रा वाले नेता आएँ।य् लिंगदोह मैडम: ‘मैं तुम्हारी बात मानती हूँ कि अगर लोग श्यादा चैकस रहें और दिलचस्पी लेकर भ्रष्ट और खराब नेताओं को हटाएँ तथा अच्छे लोगों का चुनाव करें तो स्िथति बदल सकती है, पिफर, यह भी हो सकता है कि सारे नेता भ्रष्ट न हों...य् फ्आप ऐसा वैफसे कह सकती हैं, मै’म?य् बीच में ही रोश ने कहा। लिंगदोह मैडम: फ्मैं यह नहीं कहती कि राजनेता भ्रष्ट नहीं है। संभव है कि जब तुम नेताओं के बारे में सोचती हो तो तुम्हारे ध्यान में वे बड़े लोग होते हांेगे जिनकी तस्वीर अखबारों में छपती है। मुझे भी उन्हीं नेताओं की याद आती है जिन्हें मैं जानती हूँ। मुझे नहीं लगता कि जिन नेताओं को मैं जानती हूँ वे मेरे अपने साथ्िायों या सरकारी अध्िकारियों, ठेकेदारों अथवा मेरी जानकारी के मध्यवगीर्य पेशेवर लोगों से श्यादा भ्रष्ट हों। राजनेताओं का भ्रष्टाचार अध्िक दिखाइर् देता है और हम उसी आधर पर सभी नेताओं के बारे मंे धरणा बना लेते हैं। उनमें से वुफछ भ्रष्ट हैं तो वुफछ इर्मानदार भी हैं।य् रोश ने हार नहीं मानीः फ्मै’म मेरे कहने का मतलब यह था कि भ्रष्टाचार और जाति - ध्मर् के आधर पर राजनीति करने जैसे गलत कामों पर रोक होनी चाहिए।य् लिंगदोह मैडम: फ्रोश! सीध्े - सीध्े ऐसा नहीं कह सकते! एक बात तो यही कि राजनीति में जाति और ध्मर् का इस्तेमाल रोकने के कानून तो अभी हैं ही लेकिन नेता उनको दरकिनार करने का तरीका ढूँढ़ लेते हैं। जब तक लोग जाति और ध्मर् के नाम पर समाज को बाँटने और भरमाने का काम बंद नहीं करेंगे तब तक कानून वुफछ नहीं कर सकता। जब तक लोग और नेता जाति - ध्मर् की सीमाओं से ऊपर नहीं उठेंगे तब तक वास्तविक लोकतंत्रा नहीं आएगा।य् लोकतंत्रा की पुनपर्रिभाषा पिछले साल हमने लोकतंत्रा की इस यात्रा की शुरफआत उसकी न्यूनतम परिभाषा के साथ की थी। क्या आपको वह परिभाषा याद है? पिछले साल की आपकी पाठ्यपुस्तक के अध्याय 2 में दी गइर् परिभाषा वुफछ इस प्रकार थी: लोकतंत्रा शासन का वह स्वरूप है जिसमें लोग अपने शासकों का चुनाव खुद करते हैं। इसके बाद हमने अनेक मामलों पर गौर किया और परिभाषा में वुफछ और चीशें जोड़ीं: अल्पसंख्यक आवाशों का आदर करना लोकतंत्रा के लिए बहुत शरूरी है। ऽ लोकतंत्रा की हमारी चचार् सरकार और उसके कामकाज से आगे तक गइर्। हमने यह चचार् भी की कि भेदभाव को समाप्त करना भी लोकतांत्रिाक व्यवस्था का महत्वपूणर् काम है। ऽ आख्िार में हमने यह भी चचार् चलाइर् कि किसी भी लोकतांत्रिाक व्यवस्था से हमें वुफछ न्यूनतम नतीजों की उम्मीद तो करनी ही चाहिए। ऐसा करने में हम लोकतंत्रा की उस परिभाषा के ख्िालाप्ाफ़ऽ लोगों द्वारा चुने गए शासक ही सारे प्रमुख पैफसले लेंऋ ़ऽ चुनाव में लोगों को वतर्मान शासकों को बदलने और अपनी पसंद शाहिर करने का पयार्प्त अवसर और विकल्प मिलना चाहिए। ये विकल्प और अवसर हर किसी को बराबरी में उपलब्ध् होने चाहिए। ऽ विकल्प चुनने के इस तरीके से ऐसी सरकार का गठन होना चाहिए जो संविधन के बुनियादी नियमों और नागरिकोें के अध्िकारों को मानते हुए काम करे। ऽ शायद आपको निराशा हुइर् हो कि इस परिभाषा में उन उँफचे आदशोर्ं की चचार् कहीं भी नहीं है जिनको हम लोकतंत्रा के साथ जोड़कर देखते हैं। हमने लोकतंत्रा के वुफछ आदशोर्ं की चचार् शरूर की थी पर व्यावहारिक हिसाब से हमने लोकतंत्रा की न्यूनतम लेकिन स्पष्ट परिभाषा से बात शुरू की थी। इससे हमारे लिए लोकतांत्रिाक और गैर - लोकतांत्रिाक शासन व्यवस्थाओं में स्पष्ट अंतर करना आसान हो गया। आपने पाया होगा कि लोकतांत्रिाक सरकार और राजनीति के विभ्िान्न पहलुओं की अपनी चचार् में हम उस परिभाषा से काप़्ाफी आगे आ गए हैं: ऽ हमने विस्तार से लोकतांत्रिाक अध्िकारों की चचार् की और पाया कि ये अध्िकार सिपर्फ वोट देने, चुनाव लड़ने औऱराजनीतिक संगठन बनाने भर के नहीं हैं। हमने वुफछ ऐसे सामाजिक और आथ्िार्क अध्िकारों की चचार् की जिन्हें एक लोकतांत्रिाक शासन को अपने नागरिकों को देना ही चाहिए। ऽ हमने सत्ता में हिस्सेदारी को लोकतंत्रा की भावना के अनुवूफल माना था और चचार् की थी कि सरकारों और सामाजिक समूहों के बीच सत्ता की साझेदारी लोकतंत्रा के लिए शरूरी है। ऽ हमने यह भी देखा था कि लोकतंत्रा बहुमत की तानाशाही या व्रूफर शासन - व्यवस्था नहीं हो सकता और नहीं गए हैं जो पिछले वषर् दी गइर् थी। किसी भी देश को लोकतंत्रा कहलाने के लिए जिन न्यूनतम चीजों की शरूरत होती है उसे परिभाष्िात करके हमने शुरफआत की। इसके बाद हमने लोकतंत्रा के लिए वुफछ वांछित शतो± की चचार् की जिन्हें पूरा किया जाना चाहिए। पिफर हमने लोकतंत्रा की परिभाषा से आगे बढ़कर अच्छी लोकतांत्रिाक व्यवस्था का ब्यौरा दिया। एक अच्छे लोकतंत्रा को हम वैफसे परिभाष्िात करेंगे? इसकी विशेषताएँ क्या - क्या हैं? किसी लोकतंत्रा को अच्छा बताने के लिए उसमें किस विशेषता का होना बहुत शरूरी है? और, अगर कोइर् व्यवस्था लोकतांत्रिाक है तो उसमें क्या चीश निश्िचत रूप से नहीं होनी चाहिए? ये प़्ौफसले आप कीजिए। एरेस - बेस्ट लैटिन अमरीका - केगल काटू±स विशेषताएँ ¹सिप़्ार्फ बिंदुवार लिखें। जितने बिंदु आप बताना चाहें उतने बता सकते हैं। इसे कम से कम बिंदुओं में निपटाने का प्रयास करेंह् 1234567आपको यह अभ्यास वैफसा लगा? क्या आपको इसमें आनंद आया? क्या यह बहुत मुश्िकल था? क्या वुफछ परेशानियाँ हुईं? क्या डर भी लगा? क्या आपको लगता है कि इस पाठ्यपुस्तक ने इस महत्वपूणर् अभ्यास में आपकी मदद नहीं की? क्या आपको डर है कि आपकी परिभाषा ग़्ालत भी हो सकती है? तो लोकतंत्रा के बारे में आपकी पढ़ाइर् का यह रहा आख्िारी सबक: अच्छे लोकतंत्रा की कोइर् बनी बनाइर् परिभाषा नहीं है। अच्छा लोकतंत्रा वही है जैसा उसे हम सोचते हैं और जिसे बनाने की आकांक्षा रखते हैंः यह बात वुफछ अजीब लग सकती है। पिफर भी, इस बात पर गौर करेंः क्या यही लोकतंत्रा है कि कोइर् डंडे के शोर पर बताए कि अच्छा लोकतंत्रा क्या है?

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