लोकतंत्रा के परिणाम परिचय अब जब कि हम लोकतंत्रा की अपनी यात्रा के आख्िारी पड़ाव पर हैं तब विश्िाष्ट बातों की चचार् से आगे जाने और वुुफछ सामान्य किस्म के सवाल पूछने का वक्त आ गया है, जैसे यही कि लोकतंत्रा क्या करता है अथवा यह कि लोकतंत्रा से हम अमूमन किन परिणामों की उम्मीद करते हैं? साथ ही, यह सवाल भी पूछा जा सकता है कि क्या वास्तविक जीवन में लोकतंत्रा इन उम्मीदों को पूरा करता है? लोकतंत्रा के परिणामों का मूल्यांकन वैफसे करें ? हम इन्हीं बातों से अध्याय की शुरुआत करेंगे। इस विषय पर विचार करने के बारे में वुफछ बातों को स्पष्ट कर लेने के बाद हम इस बात पर गौर करेंगे कि विभ्िान्न मामलों मंे लोकतंत्रा से वैफसे परिणाम वांछित हैं और वास्तविक धरातल पर क्या परिणाम आते हैं। इसके लिए हम लोकतंत्रा के विभ्िान्न पहलुओं मसलन, शासन के स्वरूप, आथ्िार्क कल्याण, समानता, सामाजिक अंतर और टकराव तथा आख्िार में आशादी और स्वाभ्िामान जैसे मामलों पर गौर करेंगे। इस तलाश में हमें सकारात्मक परिणाम मिलेंगे लेकिन इन परिणामों के साथ कइर् सवाल और शंकाएँ भी लगी हुइर् हैं। ये सवाल और आशंकाएँ हमें लोकतंत्रा के सामने खड़ी चुनौतियों पर सोचने के लिए उकसाती हैं जिस पर हम अगले और अंतिम अध्याय में विचार करेंगे। अध्याय 7लोकतंत्रा के परिणाम लोकतंत्रा के परिणामों का मूल्यांकन वैफसे करें? क्या आपको याद है कि मैडम लिंगदोह की कक्षा में छात्रों ने लोकतंत्रा के बारे में वैफसी बातें की थीं? आपने इसे कक्षा 9 वफी पाठ्यपुस्तक के दूसरे अध्याय में पढ़ा था। इस बातचीत से यह नतीजा निकला था कि लोकतंत्रा शासन की अन्य व्यवस्थाओं से बेहतर है। तानाशाही और अन्य व्यवस्थाएँ श्यादा दोषपूणर् हैं। लोकतंत्रा को सबसे बेहतर बताया गया था क्योंकि यह ऽ नागरिकों में समानता को बढ़ावा देता हैऋ ऽ व्यक्ित वफी गरिमा को बढ़ाता हैऋ ऽ इससे प़्ौफसलों में बेहतरी आती हैऋ ऽ टकरावों को टालने - सँभालने का तरीका देता हैऋ और ऽ इसमें गलतियों को सुधारने की गुंजाइश होती है। क्या ये उम्मीदें लोकतांत्रिाक शासन व्यवस्थाओं से पूरा होती हंै? अपने आसपास के लोगों से बात करंे तो पाएँगे कि अिाकांश लोग अन्य किसी भी वैकल्िपक शासन व्यवस्था की तुलना में लोकतंत्रा को पसंद करते हैं। लेकिन लोकतांत्रिाक शासन के कामकाज सेे संतुष्ट होने वालों की संख्या उतनी बड़़़ी नहीं होती। सो, हम एक दुविधा की स्िथति में आ क्या विविध् प्रकार के दबाव झेलना और तरह - तरह की माँगों को संतुष्ट करना ही लोकतंत्रा है? अच्छा माना जाता है पर व्यवहार में इसे इतना अच्छा नहीं माना जाता। इस दुविधा के चलते लोकतंत्रा के नतीजों पर श्यादा गहराइर् से विचार करना शरूरी हो जाता है। क्या हम सिप़्ार्फ नैतिक कारणों से ही लोकतंत्रा को पसंद करते हैं? या पिफर, लोकतंत्रा के समथर्न के पीछे वुफछ युक्ितपरक कारण भी हैं? आज दुनिया के सौ देश किसी न किसी तरह की लोकतांत्रिाक व्यवस्था चलाने का दावा करते हैं। इनका औपचारिक संविधान है, इनके यहाँ चुनाव होते हैं और राजनीतिक दल भी हैं। साथ ही, वे अपने नागरिकों को वुफछ बुनियादी अिाकारों की गारंटी देते हैं। लोकतंत्रा के ये तत्व तो अिाकांश देशों में समान हैं पर सामाजिक स्िथति, अपनी आथ्िार्क उपलब्िध और अपनी संस्वृफतियों के मामले में ये देश एक - दूसरे से काप़्ाफी अलग - अलग हैं। स्पष्ट है कि इन सबका लोकतांत्रिाक शासन व्यवस्था के नतीजों पर भी असर पड़ता है और एक जगह जो उपलब्िध हो वह दूसरी जगह भी उसी तरह दिखे यह शरूरी नहीं है। लेकिन क्या कोइर् ऐसी बुनियादी चीश है जिसकी उम्मीद हम हर लोकतांत्रिाक शासन व्यवस्था से करेंगे ही? कइर् बार हम लोकतंत्रा को हर मजर् की दवा मान लेते हैं और उससे हर चीश की उम्मीद करने लगते हैं। लोकतंत्रा के प्रति अपनी दिलचस्पी और दीवानगी के चलते अक्सर हम यह कह बैठते हैं कि लोकतंत्रा सभी सामाजिक, आथ्िार्क और राजनीतिक समस्याओं का समाधान कर सकता है और जब हमारी वुुफछ उम्मीदें पूरी नहीं होतीं तो हम लोकतंत्रा की अवधारणा को ही दोष देने लगते हैं। हम यह संदेह करने लगते हैं कि क्या हम वास्तव में लोकतांत्रिाक व्यवस्था में ही रह रहे हैं। लोकतंत्रा के परिणामों के बारे में सावधानीपूवर्क विचार करने की दिशा में पहला कदम यही है कि हम पहले यह मानंे कि लोकतंत्रा शासन का एक स्वरूप भर है। यह वुफछ चीशों को हासिल करने की स्िथतियाँ तो बना सकता है पर नागरिकों को ही उन स्िथतियों का लाभ लेकर अपने लक्ष्यों को हासिल करना होता है। इतना ही नहीं, लोकतंत्रा का उन अनेक चीशों से श्यादा सरोकार नहीं होता जिनको हम बहुत मूल्यवान मानते हैं। लोकतंत्रा हमारी सभी सामाजिक बुराइयों को मिटा देने वाली जादू की छड़ी भी नहीं है। तो आइए, हम उन वुफछ चीशों की जाँच करें जिसकी उम्मीद हर लोकतांत्रिाक व्यवस्था से की जा सकती है और साथ ही लोकतंत्रा के रिकाॅडर् पर भी नशर डालंे। उत्तरदायी, िाम्मेवार और वैध शासन वुफछ ऐसी चीशें हैं जिन्हें लोकतंत्रा को पूरा करना ही चाहिए। लोकतंत्रा मंे सबसे बड़ी चिंता यह होती है कि लोगों का अपना शासक चुनने का अिाकार और शासकों पर नियंत्राण बरकरार रहे। वक्त - शरूरत और यथासंभव इन चीशों के लिए लोगों को निणर्य प्रवि्रफया में भागीदारी करने में सक्षम होना चाहिए ताकि लोगों के प्रति िाम्मेवार सरकार बन सके और सरकार लोगों की शरूरतों और उम्मीदों पर ध्यान दे। सरकार की नशर आप सरकार के बारे में बस इतना जान पाते हैं..आपके बारे में माइक कीपेफ - केगल काटू±स लोकतंत्रा के परिणाम सरकार इतनाइस सवाल के तफ्रसील में जाने से पहले जानती है..हमारे सामने एक मामूली - सा जान पड़ता सवाल यह भी हैः क्या लोकतांत्रिाक सरकार लेकिन इसने पूरी प्रवि्रफया को माना है इसलिए कायर्वुफशल होती है? क्या यह प्रभावी होती इस बात की श्यादा संभावना है कि लोग उसके पैफसलों को मानेंगे और वे श्यादा प्रभावी है? वुफछ लोगों का मानना है कि लोकतंत्रा में़कम प्रभावी सरकारें बनती हैं। निश्िचत रूप से यह सही है कि अलोकतांत्रिाक सरकारों को विधायिका का सामना नहीं करना होता। उन्हें बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक नशरिए का ख्याल नहीं रखना पड़ता। लोकतंत्रा में बातचीत और मोलतोल के आधार पर काम चलता है। क्या इससे लोकतांत्रिाक सरकारें कम प्रभावशाली हो जाती हैं? आइए, अब प़्ौफसलों को मूल्य के हिसाब से तौलने की कोश्िाश करंे। ऐसी सरकार की कल्पना कीजिए जो बहुत तेश प़्ौफसले लेती है। लेकिन यह सरकार ऐसे पैफसले भी ले़सकती है जिसे लोग स्वीकार न करें और तब ऐसे पैफसलों से परेशानी हो सकती है। इसकी ़तुलना में लोकतांत्रिाक सरकार सारी प्रवि्रफया को पूरा करने में श्यादा समय ले सकती है। होंगे। इस प्रकार लोकतंत्रा में प़्ौफसला लेने में जो वक्त लगता है वह बेकार नहीं जाता। अब दूसरे पहलू पर नशर डालें: लोकतंत्रा में इस बात की पक्की व्यवस्था होती है कि प़्ौफसले वुफछ कायदे - कानून के अनुसार होंगे और अगर कोइर् नागरिक यह जानना चाहे कि प़्ौफसले लेने में नियमों का पालन हुआ है या नहीं तो वह इसका पता कर सकता है। उसे यह न सिप़्ार्फ जानने का अिाकार है बल्िक उसके पास इसके साध्न भी उपलब्ध हैं। इसे पारदश्िार्ता कहते हैं। यह चीश अक्सर गैर - लोकतांत्रिाक सरकारों में नहीं होती इसलिए जब हम लोकतंत्रा के परिणामों पर गौर कर रहे हैं तो यह उम्मीद करना उचित है कि लोकतांत्रिाक व्यवस्था में ऐसी सरकार का गठन होगा जो कायदे - कानून को क्या आप इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि सरकार आपके तथा आपके परिवार के बारे में क्या - क्या जानती है और वैफसे जानती है ;जैसे राशन - काडर् या मतदान पहचान - पत्राद्ध? सरकार के बारे में जानकारी के लिए आपके पास कौन - कौन से स्रोत हैं? मानेगी और लोगों के प्रति जवाबदेह होगी। हम यह उम्मीद भी कर सकते हैं कि लोकतांत्रिाक सरकार नागरिकों को निणर्य प्रवि्रफया मेें हिस्सेदार बनाने और खुद को उनके प्रति जवाबदेह बनाने वाली कायर्वििा भी विकसित कर लेती है। उनका रिकाॅडर् खराब रहा है। पर इनकी तुलना जब हम गैर - लोकतांत्रिाक शासनों से करते हैं तो इन क्षेत्रों का भी उनका प्रदशर्न बेहतर ही ठहरता है। एक व्यापक धरातल पर लोकतांत्रिाक सरकारों से यह उम्मीद करना उचित ही है अगर आप इन नतीजों के आधार पर गों का ध्यानँकि वे लोगों की शरूरतों और मालोकतांत्रिाक व्यवस्था को तौलना चाहते हैं रखने वाली हों और वुफल मिलाकर भ्रष्टाचार तो आपको इन संस्थाओं और व्यवहारों पर से मुक्त शासन दें। इन दो मामलों में भी गौर करना होगा: नियमित और निष्पक्ष लोकतांत्रिाक सरकारों का रिकाॅडर् प्रभावशाली चुनाव, प्रमुख नीतियों और नए कानूनों पर नहीं है। लोकतांत्रिाक व्यवस्थाएँअक्सर लोगों खुली सावर्जनिक चचार् और सरकार तथा इसके कामकाज के बारे में जानकारी पाने का नागरिकों का सूचना का अिाकार। इन पैमानों पर लोकतांत्रिाक शासकों का रिकाॅडर् मिला - जुला रहा है। नियमित और निष्पक्ष चुनाव कराने और खुली सावर्जनिक चचार् के लिए उपयुक्त स्िथतियाँ बनाने के मामले में लोकतांत्रिाक व्यवस्थाएँ श्यादा सपफल हुइर् हैं पर ऐसे चुनाव कराने में जिसमें सबको को उनकी शरूरतों के लिए तरसाती हैं और आबादी के एक बड़े हिस्से की माँगों की उपेक्षा करती हैं। भ्रष्टाचार के आम किस्से इस बात की गवाही देते हैं कि लोकतांत्रिाक व्यवस्था इस बुराइर् से मुक्त नहीं है। पर इसके साथ इस पर भी ध्यान दें कि गैर - लोकतांत्रिाक सरकारें कम भ्रष्ट हैं या लोगों की शरूरतों के प्रति संवेदनशील हैं - यह कहने का कोइर् आधार नहीं है। अवसर मिले अथवा हर प्ौफसले पर सावर्जनिक ़बहस कराने के मामले में उनका रिकाॅडर् श्यादा अच्छा नहीं रहा है। नागरिकों के साथ सूचनाओं का साझा करने के मामले में भी पाकिस्तान को छोड़कर हर जगह लोकतंत्रा को तानाशाही के ऊपर वरीयता इनमें से किसी एक कथन से सहमत दक्ष्िाण एश्िाया 20 10 62 बांग्लादेश भारत नेपाल पाकिस्तान श्रीलंका लोकतंत्रा बेहतर 69 70 62 37 71 कभी - कभी तानाशाही 6 9 10 14 11 बेहतर कोइर् पफवर्फ नहीं पड़ता 25 21 28 49 18़बहरहाल, एक मामले मंे लोकतांत्रिाक शासन व्यवस्था निश्िचत रूप से अन्य शासनों से बेहतर है: यह वैध शासन व्यवस्था है। यह सुस्त हो सकती है, कम कायर् - वुफशल ड्डोत: एसडीएसए टीम: स्टेट आपफ डेमोव्रेफसी इन साऊथ एश्िाया, दिल्ली: आक्सपफोडर् यूनि. प्रेस, 2007 हो सकती है, इसमें भ्रष्टाचार हो सकता है, यह लोगों की शरूरतों की वुफछ हद तक अनदेखी कर सकती है लेकिन लोकतांत्रिाक शासन व्यवस्था लोगों की अपनी शासन व्यवस्था है। इसी कारण पूरी दुनिया में लोकतंत्रा के विचार के प्रति शबरदस्त समथर्न का भाव है। साथ दिए गए दक्ष्िाण एश्िाया के प्रमाणोें से जाहिर है कि यह समथर्न आथ्िार्क संवृि और विकास अगर लोकतांत्रिाक शासन में अच्छी सरकार की उम्मीद की जाती है तो उससे विकास की उम्मीद करना क्या उचित नहीं है? अगर हम 1950 से 2000 के बीच के सभी लोकतांत्रिाक शासनों और तानाशाहियों के कामकाज की तुलना करें तो पाएँगे कि आथ्िार्क संवृि के मामले में तानाशाहियों का रिकाॅडर् थोड़ा बेहतर है। उच्चतर आथ्िार्क संवृि हासिल करने में लोकतांत्रिाक शासन की यह अक्षमता हमारे लिए चिंता का कारण है। पर अकेले इसी कारण से लोकतंत्रा को खारिज नहीं किया जा सकता। जैसा कि आपने अथर्शास्त्रा में पढ़ा है - आथ्िार्क विकास कइर् कारकों लोकतांत्रिाक शासन वाले मुल्कों में तो है ही उन देशों में भी जहाँ लोकतांत्रिाक सरकारें नहीं हैं, लोग अपने द्वारा चुने गए प्रतिनििायों का शासन चाहते हैं। वे यह भी मानते हैं कि लोकतंत्रा उनके देश के लिए उपयुक्त है। अपने लिए समथर्न पैदा करने की लोकतंत्रा की क्षमता भी लोकतंत्रा का एक परिणाम ही है और इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। मसलन देश की जनसंख्या के आकार, वैश्िवक स्िथति, अन्य देशों से सहयोग और देश द्वारा तय की गइर् आथ्िार्क प्राथमिकताओं पर भी निभर्र करता है। तानाशाही वाले कम विकसित देशों और लोकतांत्रिाक व्यवस्था वाले कम विकसित देशों के बीच का अंतर नगण्य सा है। पर हम उम्मीद कर सकते हैं कि इस मामले में लोकतांत्रिाक व्यवस्था तानाशाही से नहीं पिछड़े। तानाशाही और लोकतांत्रिाक शासन वाले देशों के आथ्िार्क विकास दर में अंतर भले श्यादा हो लेकिन इसके बावजूद लोकतांत्रिाक व्यवस्था का चुनाव ही बेहतर है क्योंकि इसके अन्य अनेक सकारात्मक पफायदे हैं।़इस तथा इससे आगे के तीन पन्नों पर दिए गए काटूर्न ध्नी और गरीब लोगों के बीच के अंतर को दिखाते हैं। क्या आथ्िार्क संवृि का लाभ सबको बराबर - बराबर हुआ है? राष्ट्र के धन में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए गरीब किस तरह आवाश उठा सकते हैं? विश्व के धन में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए गरीब देश क्या करें? आर. जे. मैटसन - केगल काटू±स।श्यादा धन जैसे देशों में ऊपरी 20 प़़्ाफीसदी हिस्से पर कब्शा है जबकि सबसे नीचे के 20 देशों के नाम राष्ट्रीय आय मंे प्रतिशत हिस्सा ऊपर का 20ः नीचे का 20ः दक्ष्िाण अप्रफीका 64.8 2.9 ब्राजील 63.0 2.6 रूस 53.7 4.4 अमरीका 50.0 4.0 बि्रटेन 45.0 6.0 डेनमावर्फ 34.5 9.6 हंगरी 34.4 10.0 जिम्मी पफगुर्लिए - कंगल काटू±स। स्रोत: एडम प्रेजवस्कीर्, माइकेल इर् अल्वरेज, जोस एंटोनियो केइर्बब और पफना±डो लिमोंगी, डेमोव्रेफसी एंड डेवलपमेंटः पाॅलिटिकल इंस्टीट्यूशन ऐंड वेल - बीइंग इन द वल्डर्, 1960 - 1990, वैंफबि्रज, वैंफबि्रज यूनि. प्रेस, 2000। असमानता और गरीबी में कमी एरेस - बेस्ट लैटिन अमरीका, केगल काट±ूसइससे भी श्यादा खराब है। बांग्लादेश में आध्ी से श्यादा आबादी गरीबी में जीवन गुशारती है। अनेक गरीब देशों के लोग अपनी खाद्य - आपूतिर् के लिए भी अब अमीर देशों पर निभर्र हो गए हैं। आथ्िार्क संवृि की बात तो खैर है ही लेकिन लोकतांत्रिाक व्यवस्थाओं से यह उम्मीद रखना कहीं श्यादा तवर्फसंगत है कि वे आथ्िार्क असमानता को कम करेंगी। जब देश में आथ्िार्क विकास तेश हो तब भी क्या आमदनी का वितरण इस तरह हो पाता है कि सभी को उसका बराबर - बराबर लाभ मिले और सभी लोग बेहतर जीवन गुशार सवेंफ? क्या लोकतांत्रिाक व्यवस्था में आथ्िार्क संवृि और लोगों के बीच आथ्िार्क असमानता का बढ़ना साथ - साथ होता है? क्या लोकतंत्रा आने से अवसरों और वस्तुओं का न्यायपूणर् वितरण हो पाता है? लोकतांत्रिाक व्यवस्था राजनीतिक समानता पर आधारित होती है। प्रतिनििायों के चुनाव में हर व्यक्ित का वशन बराबर होता है। व्यक्ितयों को राजनीतिक क्षेत्रा में परस्पर बराबरी का दजार् तो मिल जाता है लेकिन इसके साथ - साथ हम आथ्िार्क असमानता को भी बढ़ता हुआ पाते हैं। मुट्ठी भर धनवुफबेर आय और संपिा में अपने अनुपात से बहुत श्यादा हिस्सा पाते हैं। इतना ही नहीं, देश की वुफल आय में उनका हिस्सा भी बढ़ता गया है। समाज के सबसे निचले हिस्से के लोगों को जीवन बसर करने के लिए काप़्ाफी कम साधन मिलते हैं। उनकी आमदनी गिरती गइर् है। कइर् बार उन्हें भोजन, कपड़ा, मकान, श्िाक्षा और इलाज जैसी बुनियादी शरूरतें पूरी करने में वास्तविक जीवन में लोकतांत्रिाक व्यवस्थाएँ आथ्िार्क असमानताओं को कम करने में श्यादा सपफल नहीं हो पाइर् हैं। अथर्शास्त्रा की कक्षा 9 की पाठ्यपुस्तक में आपने भारत की गरीबी के बारे मंे पढ़ा है। हमारे मतदाताओं में गरीबों की संख्या काप़्ाफी बड़ी है इसलिए कोइर् भी पाटीर् उनके मतों से हाथ धोना नहीं चाहेगी। पिफर भी लोकतांत्रिाक ढंग से निवार्चित सरकारें गरीबी के सवाल पर उतना ध्यान देने को तत्पर नहीं जान पड़तीं जितने कि आप उनसे उम्मीद करते हैं। वुफछ अन्य देशों में हालत क्या लोकतांत्रिाक शासन व्यवस्थाएँ शांति और सद्भाव का जीवन जीने में नागरिकों के लिए मददगार साबित होती हंै? लोकतांत्रिाक व्यवस्था से यह उम्मीद करना उचित है कि वह सद्भावपूणर् सामाजिक जीवन उपलब्ध कराएगी। हमने इससे पहले के अध्यायों में पाया कि लोकतांत्रिाक व्यवस्थाएँ अनेक तरह के सामाजिक विभाजनों को सँभालती हैं। हमने पहले अध्याय में देखा कि किस तरह बेल्िजयम ने अपने यहाँ के विभ्िान्न जातीय समूहों की आकांक्षाओं के बीच सपफलतापूवर्क सामंजस्य स्थापित किया। लोकतांत्रिाक व्यवस्थाएँ आम तौर पर अपने अंदर की प्रतिद्वंद्विताओं को सँभालने की प्रवि्रफया विकसित कर लेती हैं। इससे इन टकरावों के विस्पफोटक या हिंसक रूप लेने का अंदेशा कम हो जाता है। कोइर् भी समाज अपने विभ्िान्न समूहों के बीच के टकरावों को पूरी तरह और स्थायी रूप से नहीं खत्म कर सकता, पर हम इन अंतरों और विभेदों का आदर करना सीख सकते हैं और इनके बीच बातचीत से सामंजस्य बैठाने का तरीका विकसित कर सकते हैं। इस काम के लिए लोकतंत्रा सबसे अच्छा है। गैर - लोकतांत्रिाक व्यवस्थाएँ आमतौर पर अपने अंदरूनी सामाजिक मतभेदों से आँखें पेफर लेती हैं या उन्हें दबाने की कोश्िाश करती हैं। इस प्रकार सामाजिक अंतर, विभाजन और टकरावों को सँभालना निश्िचत रूप से लोकतांत्रिाक व्यवस्थाओं का एक बड़ा गुण है, पर श्रीलंका का उदाहरण हमें इस बात की भी याद दिलाता है कि इस परिणाम को हासिल करने के लिए लोकतांत्रिाक व्यवस्थाओं को स्वयं भी दो शतो± को पूरा करना होता है: ऽ यह गौर करना शरूरी है कि लोकतंत्रा का सीधे - सीधे अथर् बहुमत की राय से शासन करना नहीं है। बहुमत को सदा ही अल्पमत का ध्यान रखना होता है। उसके साथ काम करने की शरूरत होती है। तभी, सरकार जन - सामान्य की इच्छा का प्रतिनिध्ित्व कर पाती है। बहुमत और अल्पमत की राय कोइर् स्थायी चीश नहीं होती। ऽ यह भी समझना शरूरी है कि बहुमत के शासन का अथर् धमर्, नस्ल अथवा भाषायी आधार के बहुसंख्यक समूह का शासन नहीं होता। बहुमत के शासन का मतलब होता है कि हर प़्ौफसले या चुनाव में अलग - अलग लोग और समूह बहुमत का निमार्ण कर सकते हैं या बहुमत में हो सकते हैं। लोकतंत्रा तभी तक लोकतंत्रा रहता है जब तक, प्रत्येक नागरिक को किसी न किसी अवसर पर बहुमत का हिस्सा बनने का मौका मिलता है। अगर किसी को जन्म के आधार पर बहुसंख्यक समुदाय का हिस्सा बनने से रोका जाता है तब लोकतांत्रिाक शासन उस व्यक्ित या समूह के लिए समावेशी नहीं रह जाता। हेल - मेल सामाजिक विभाजन पर लोकतांत्रिाक राजनीति के दो तरह के प्रभावों को इन दो तस्वीरों के माध्यम से दिखाया गया है। प्रत्येक तस्वीर का उदाहरण देते हुए लोकतांत्रिाक राजनीति में दोनों स्िथतियों के नतीजों के बारे में एक - एक अनुच्छेद लिखें। नागरिकों की गरिमा और आशादी व्यक्ित की गरिमा और आशादी के मामले में लोकतांत्रिाक व्यवस्था किसी भी अन्य शासन प्रणाली से काप़्ाफी आगे है। प्रत्येक व्यक्ित अपने साथ के लोगों से सम्मान पाना चाहता है। अक्सर, टकराव तभी पैदा होते हैं जब वुफछ लोगों को लगता है कि उनके साथ सम्मान का व्यवहार नहीं किया गया। गरिमा और आशादी की चाह ही लोकतंत्रा का आधार है। दुनिया भर की लोकतांत्रिाक व्यवस्थाएँ इस चीश को मानती हैं - कम से कम सि(ांत के तौर पर तो शरूर। अलग - अलग लोकतांत्रिाक व्यवस्थाओं में इन बातों पर अलग - अलग स्तर का आचरण होता है। लोकतांत्रिाक सरकारें सदा नागरिकों के अिाकारों का सम्मान नहीं करतीं। पिफर, जो समाज लंबे समय तक गुलामी में रहे हैं उनके लिए यह एहसास करना आसान नहीं है कि सभी व्यक्ित बराबर हैं। यहाँ स्ित्रायों की गरिमा का ही उदाहरण लें। दुनिया के अिाकांश समाज पुरुष - प्रधन समाज रहे हैं। महिलाओं के लंबे संघषर् के बाद अब जाकर यह माना जाने लगा है कि महिलाओं के साथ गरिमा और समानता का व्यवहार लोकतंत्रा की शरूरी एरेम - बेस्ट लैटिन अमरीका, केगल काटू±स।शतर् है और आज अगर कहीं यह हालत है तो उसका यह मतलब नहीं कि औरतों के साथ सदा से सम्मान का व्यवहार हुआ है। बहरहाल, एक बार जब सि(ांत रूप में इस बात को स्वीकार कर लिया गया है तो अब औरतों के लिए वैधानिक और नैतिक रूप से अपने प्रति गलत मान्यताओं और व्यवहारों के ख्िालाप़्ाफ संघषर् करना आसान हो गया है। अलोकतांत्रिाक व्यवस्था में यह बात संभव न थी क्योंकि वहाँ व्यक्ितगत आशादी और गरिमा न तो वैधानिक रूप से मान्य है, न नैतिक रूप से। यही बात जातिगत असमानता पर भी लागू होती है। भारत में लोकतांत्रिाक व्यवस्था ने कमशोर और भेदभाव का श्िाकार हुइर् जातियों के लोगों के समान दजेर् और समान अवसर के दावे को बल दिया है। आज भी जातिगत भेदभाव और दमन के उदाहरण देखने को मिलते हैं पर इनके पक्ष में कानूनी या नैतिक बल नहीं होता। संभवतः इसी अहसास के चलते आम लोग अपने लोकतांत्रिाक अिाकारों के प्रति श्यादा चैकस हुए हैं। लोकतंत्रा से लगाइर् गइर् उम्मीदों को किसी लोकतांत्रिाक देश के मूल्यांकन का आधार भी बनाया जा सकता है। लोकतंत्रा की एक खासियत है कि इसकी जाँच - परख और परीक्षा कभी खत्म नहीं ंहोती। वह एक जाँच पर खरा उतरे तो अगली जाँच आ जाती है। लोगों को जब लोकतंत्रा से थोड़ा लाभ मिल जाता है तो वे और लाभों की माँग करने लगते हैं। वे लोकतंत्रा से और अच्छा काम चाहते हैं। यही कारण है कि जब हम उनसे लोकतंत्रा के कामकाज के बारे में पूछते हैं तो वे हमेशा लोकतंत्रा से जुड़ी अपनी अन्य अपेक्षाओं का पु¯लदा खोल देते हैं और श्िाकायतों का अंबार लगा देते हैं। श्िाकायतों का बने रहना भी लोकतंत्रा की सपफलता की गवाही देता है। इससे पता चलता है कि लोग सचेत हो गए हैं और वे सत्ता में बैठे लोगों के कामकाज का आलोचनात्मक मूल्यांकन करने लगे हैं। लोकतंत्रा के कामकाज से लोगों का असंतोष जताना लोकतंत्रा की सपफलता को तो बताता ही है साथ ही यह लोगों के प्रजा से नागरिक बनने की गवाही भी देता है। आज अिाकांश लोग मानते हैं कि सरकार की चाल - ढाल पर उनके वोट से असर पड़ता है और यह उनके अपने हितों को भी प्रभावित करता है। रोशा - प्रेरणा का एक स्तंभ स्रोत: एसडीएसए टीम, स्टेट आपफ डेमोव्रेफसी इऩसैट बैंगले - केगल काटू±स ऊपर दिए गए काटूर्न या ग्रापफ को देखें। दोनों में इस हिस्से में उठाए गए साउथ एश्िाया, दिल्ली, आक्सपफोडर् यूनिवसिर्टी प्रेस, 2007जुड़ने वाली पंक्ितयों को रेखांकित करें। क्या आप बता सवफते हैं कि रोशा पावर््फस कौन थीं और यहाँ किस घटना का िाक्र किया गया है? 1.लोकतंत्रा किस तरह उत्तरदायी, िाम्मेवार और वैध सरकार का गठन करता है? 2.लोकतंत्रा किन स्िथतियों में सामाजिक विविधता को सँभालता है और उनके बीच सामंजस्य बैठाता है? 3.निम्नलिख्िात कथनों के पक्ष या विपक्ष में तवर्फ दें: ऽ औद्योगिक देश ही लोकतांत्रिाक व्यवस्था का भार उठा सकते हैं पर गरीब देशों को आथ्िार्क विकास करने के लिए तानाशाही चाहिए। ऽ लोकतंत्रा अपने नागरिकों के बीच की असमानता को कम नहीं कर सकता। ऽ ग़्ारीब देशों की सरकार को अपने श्यादा संसाधन गरीबी को कम करने और आहार, कपड़ा, स्वास्थ्य तथा श्िाक्षा पर लगाने की जगह उद्योगों और बुनियादी आथ्िार्क ढाँचे पर खचर् करने चाहिए। ऽ नागरिकों के बीच आथ्िार्क समानता अमीर और गरीब, दोनों तरह के लोकतांत्रिाक देशों में है। ऽ लोकतंत्रा में सभी को एक ही वोट का अिाकार है। इसका मतलब है कि लोकतंत्रा में किसी तरह का प्रभुत्व और टकराव नहीं होता। 4. नीचे दिए गए ब्यौरों में लोकतंत्रा की चुनौतियांे की पहचान करें। ये स्िथतियाँ किस तरह नागरिकों के गरिमापूणर्, सुरक्ष्िात और शांतिपूणर् जीवन के लिए चुनौती पेश करती हैं। लोकतंत्रा को मशबूत बनाने के लिए नीतिगत - संस्थागत उपाय भी सुझाएँ: ऽ उच्च न्यायालय के निदेर्श के बाद ओडि़सा में दलितों और गैर - दलितों के प्रवेश के लिए अलग - अलग दरवाशा रखने वाले एक मंदिर को एक ही दरवाशे से सबको प्रवेश की अनुमति देनी पड़ी। ऽ भारत के विभ्िान्न राज्यों में बड़ी संख्या में किसान आत्महत्या कर रहे हैं। ऽ जम्मू - कश्मीर के गंडवारा में मुठभेड़ बताकर जम्मू - कश्मीर पुलिस द्वारा तीन नागरिकों की हत्या करने के आरोप वफो देखते हुए इस घटना के जाँच के आदेश दिए गए। 5.लोकतांत्रिाक व्यवस्थाओं के संदभर् में इनमें से कौन - सा विचार सही है - लोकतांत्रिाक व्यवस्थाओं ने सपफलतापूवर्क: ऽ लोगों के बीच टकराव को समाप्त कर दिया है। ऽ लोगों के बीच की आथ्िार्क असमानताएँ समाप्त कर दी हैं। ऽ हाश्िाए के समूहों से वैफसा व्यवहार हो, इस बारे में सारे मतभेद मिटा दिए हैं। ऽ राजनीतिक गैर बराबरी के विचार को समाप्त कर दिया है। 6. लोकतंत्रा के मूल्यांकन के लिहाज से इनमें कोइर् एक चीश लोकतांत्रिाक व्यवस्थाओं के अनुरूप नहीं है। उसे चुनें: ;कद्ध स्वतंत्रा और निष्पक्ष चुनाव ;खद्ध व्यक्ित की गरिमा ;गद्ध बहुसंख्यकों का शासन ;घद्ध कानून से समक्ष समानता 7. लोकतांत्रिाक व्यवस्था के राजनीतिक और सामाजिक असमानताओं के बारे में किए गए अध्ययन बताते हैं कि - ऽ लोकतंत्रा और विकास साथ ही चलते हैं। ऽ लोकतांत्रिाक व्यवस्थाओं में असमानताएँ बनी रहती हैं। ऽ तानाशाही में असमानताएँ नहीं होतीं। ऽ तानाशाहियाँ लोकतंत्रा से बेहतर साबित हुइर् हैं। अभ्यास8.नीचे दिए गए अनुच्छेद को पढ़ंे ऋ नन्नू एक दिहाड़ी मशदूर है। वह पूवीर् दिल्ली की एक झुग्गी बस्ती वेलकम मशदूर काॅलोनी में रहता है। उसका राशन काडर् गुम हो गया और जनवरी 2006 में उसने डुप्लीकेट राशन काडर् फ्रतर के कइर् चक्कऱबनाने के लिए अशीर् दी। अगले तीन महीनों तक उसने राशन विभाग के दलगाए लेकिन वहाँ तैनात किरानी और अिाकारी उसका काम करने या उसके अशीर् की स्िथति बताने की कौन कहे उसको देखने तक के लिए तैयार न थे। आख्िारकार उसने सूचना के अिाकार का उपयोग करते हुए अपनी अशीर् की दैनिक प्रगति का ब्यौरा देने का आवेदन किया। इसके साथ ही उसने इस अशीर् पर काम करने वाले अिाकारियों के नाम और काम न करने की सूरत में उनके ख्िालापफ होने वाली कारर्वाइर् का ब्यौरा भी माँगा। सूचना के अिाकार वाला़फ्रते भर के अंदर खाद्य विभाग का एक इंस्पेक्टर उसके घर आया और उसने़आवेदन देने के ह फ्रतर आकर उसे ले जा सकते हो।़नन्नू को बताया कि तुम्हारा राशन काडर् तैयार है और तुम दअगले दिन जब नन्नू राशन काडर् लेने गया तो उस इलाके के खाद्य और आपूतिर् विभाग के सबसे बड़े अिाकारी ने गमर्जोशी से उसका स्वागत किया। इस अिाकारी ने उसे चाय की पेशकश की और कहा कि अब आपका काम हो गया है इसलिए सूचना के अिाकार वाला अपना आवेदन आप वापस ले लें। नन्नू का उदाहरण क्या बताता है? नन्नू के इस आवेदन का अिाकारियों पर क्या असर हुआ? अपने माँ - पिताजी से पूछिए कि अपनी समस्याओं के लिए सरकारी कमर्चारियों के पास जाने का उनका अनुभव वैफसा रहा है।

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