जन - संघषर् और आंदोलन परिचय पिछले अध्यायों में हमने पढ़ा कि लोकतंत्रा में सत्ता का बँटवारा क्यों शरूरी है और सरकार के अलग - अलग अंग तथा विभ्िान्न सामाजिक समूह वैफसे सत्ता में हिस्सेदारी करते हैं। इस अध्याय में हम इसी पिछली चचार् को आगे बढ़ाते हुए देखेंगे कि सत्ताधरी स्वच्छंद नहीं हैं। अपने ऊपर पड़ने वाले प्रभाव और दबाव से वे मुक्त नहीं रह सकते। लोकतंत्रा में अमूमन हितों और नशरियों का टकराव चलते रहता है। हितों और नशरियों के इस द्वंद्व की अभ्िाव्यक्ित संगठित तरीके से होती है। जिनके पास सत्ता होती है उन्हें परस्पर विरोध्ी माँगों और दबावों में संतुलन बैठाना पड़ता है। इस अध्याय की शुरुआत में हम जानेंगे कि वैफसे परस्पर विरोध्ी माँगों और दबावों के बीच लोकतंत्रा आकार ग्रहण करता है। इस चचार् के क्रम में हम यह भी जानेंगे कि आम नागरिक विभ्िान्न तरीकों तथा संगठनों के सहारे लोकतंत्रा में अपनी भूमिका निभाते हैं। अध्याय में हम राजनीति को प्रभावित करने के अप्रत्यक्ष तरीके यानी दबाव - समूह और आंदोलनों की चचार् करेंगे। इस तरह हम अगले अध्याय की बातों के लिए तैयार होंगे जिसमें राजनीतिक सत्ता को राजनीतिक दलों के शरिए नियंत्रिात करने यानी राज - सत्ता को नियंत्रिात करने के प्रत्यक्ष तरीके की चचार् की गइर् है। अध्याय 5नेपाल और बोलिविया में जन - संघषर् क्या आपको पोलैंड में लोकतंत्रा की जीत की कथा याद है? हमने इसके बारे में पिछले साल कक्षा - 9 की पुस्तक के पहले अध्याय में पढ़ा था। यह कहानी हमें लोकतंत्रा की रचना में जनता की भूमिका की याद दिलाती है। आइए, इस तरह की दो हालिया घटनाओं के बारे में पढ़ें और जानें कि लोकतंत्रा में सत्ता का इस्तेमाल वैफसे होता है। नेपाल में लोकतंत्रा का आंदोलन सन् 2006 के अप्रैल माह में नेपाल में एक विलक्षण जन - आंदोलन उठ खड़ा हुआ। शायद आपको याद हो कि नेपाल लोकतंत्रा की ‘तीसरी लहर’ के देशों में एक है जहाँ लोकतंत्रा 1990 के दशक में कायम हुआ। नेपाल में राजा औपचारिक रूप से राज्य का प्रधन बना रहा लेकिन वास्तविक सत्ता का प्रयोग जनता के द्वारा निवार्चित प्रतिनिध्ियों के हाथों में था। आत्यंतिक राजतंत्रा से वीरेन्द्र ने स्वीकार कर लिया था लेकिन शाही खानदान के एक रहस्यमय कत्लेआम में राजा वीरेन्द्र की हत्या हो गइर्। नेपाल के नए राजा ज्ञानेंद्र लोकतांत्रिाक शासन को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। लोकतांत्रिाक रूप से निवार्चित सरकार की अलोकियता और कमशोरी का उन्होंने पफायदा उठाया।़सन् 2005 की प़्ाफरवरी में राजा ज्ञानेंद्र ने तत्कालीन प्रधनमंत्राी को अपदस्थ करके जनता द्वारा निवार्चित सरकार को भंग कर दिया। 2006 की अप्रैल में जो आंदोलन उठ खड़ा हुआ उसका लक्ष्य शासन की बागडोर राजा के हाथ से लेकर दोबारा जनता के हाथों में सौंपना था। संसद की सभी बड़ी राजनीतिक पाटिर्यों ने एक ‘सेवेन पाटीर् अलायंस’ ;सप्तदलीय गठबंध्न - एस.पी.ए.द्ध बनाया और नेपाल की राजधनी काठमांडू में चार दिन के ‘बंद’ का आह्वान किया। इस प्रतिरोध् ने जल्दी ही नेपाल के लोग और राजनीतिक दल एक ‘रैली’ में लोकतंत्रा की बहालों की माँग करते हुए। इसमें माओवादी बागी तथा अन्य संगठन भी का प्रधनमंत्राी चुना। संसद पिफर बहाल हुइर् फ्रयूर् तोड़कर सड़कों़साथ हो लिए। लोग कऔर इसने अपनी बैठक में कानून पारित पर उतर आए। तकरीबन एक लाख लोग रोशाना एकजुट होकर लोकतंत्रा की बहाली की माँग कर रहे थे और लोगों की इतनी बड़ी तादाद के आगे सुरक्षा - बलों की एक न चल सकी। 21 अप्रैल के दिन आंदोलनकारियों की संख्या 3 - 5 लाख तक पहुँच गइर् और आंदोलनकारियों ने राजा को ‘अल्टीमेटम’ दे दिया। राजा ने आध्े - अध्ूरे मन से वुफछ रियायत देने की घोषणा की जिसे आंदोलन के नेताओं ने स्वीकार नहीं किया। नेता अपनी माँगों पर अडिग रहे कि संसद को बहाल किया जायऋ सवर्दलीय सरकार बने तथा एक नयी संविधन - सभा का गठन हो। 24 अप्रैल 2006 अल्टीमेटम का अंतिम दिन था। इस दिन राजा तीनों माँगों को मानने के लिए बाध्य हुआ। एस.पी.ए.ने गिरिजा प्रसाद कोइर्राला को अंतरिम सरकार किए। इन कानूनों के सहारे राजा की अध्िकांश शक्ितयाँ वापस ले ली गईं। नयी संविधन - सभा के निवार्चन के तौर - तरीकों पर एस.पी.ए.और माओवादियों के बीच सहमति बनी। इस संघषर् को नेपाल का ‘लोकतंत्रा के लिए दूसरा आंदोलन’ कहा गया। नेपाल के लोगों का यह संघषर् पूरे विश्व के लोकतंत्रा - प्रेमियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। बोलिविया का जल - यु( नेपाल अथवा पोलैंड की कथाएँ लोकतंत्रा की स्थापना अथवा उसके पुनरु(ार की बातें बताती हैं। लेकिन, जन - संघषर् की भूमिका लोकतंत्रा की स्थापना के साथ खत्म नहीं हो जाती। बोलिविया में लोगों ने पानी के निजीकरण के ख्िालापफ एक सपफल संघषऱ्माओवादी: चीनी - क्रांति के नेता माओ की विचारधरा को मानने वाले साम्यवादी। माओवादी, मशदूरों और किसानों के शासन को स्थापित करने के लिए सशस्त्रा क्रांति के शरिए सरकार को उखाड़ पफेंकना चाहते हैं। चलाया। इससे पता चलता है कि लोकतंत्रा की जीवंतता से जन - संघषर् का अंदरूनी रिश्ता है। बोलिविया लातिनी अमरीका का एक गरीब देश है। विश्व बैंक ने यहाँ की सरकार पर नगरपालिका द्वारा की जा रही जलापूतिर् से अपना नियंत्राण छोड़ने के लिए दबाव डाला। सरकार ने कोचबंबा शहर में जलापूतिर् के अध्िकार एक बहुराष्ट्रीय कंपनी को बेच दिए। इस कंपनी ने आनन - पफानन में पानी की कीमत में चार गुना इशाप़फा कर दिया। अनेक लोगों का पानी का मासिक बिल 1000 रुपये तक जा पहुँचा जबकि बोलिविया में लोगों की औसत आमदनी 5000 रुपये महीना है। इसके पफलस्वरूप स्वतःस्पफूतर् जन - संघषर् भड़क उठा। सन् 2000 की जनवरी में श्रमिकों, मानवाध्िकार कायर्कतार्ओं तथा सामुदायिक नेताओं के बीच एक गठबंध्न ने आकार ग्रहण किया और इस गठबंध्न ने शहर में चार दिनों की कामयाब आम हड़ताल की। सरकार बातचीत के लिए राजी हुइर् और हड़ताल वापस ले ली गइर्। पिफर भी, वुफछ हाथ नहीं लगा। पफरवरी में पिफर आंदोलन ़शुरू हुआ लेकिन इस बार पुलिस ने बबर्रतापूवर्क दमन किया। अप्रैल में एक और हड़ताल हुइर् और सरकार ने ‘माशर्ल लाॅ’ के जन - संघषर् में एक निवार्चित और लोकतांत्रिाक सरकार को जनता की माँग मानने के लिए बाध्य किया गया। बोलिविया का जन - संघषर् सरकार की एक विशेष नीति के ख्िालापफ था जबकि नेपाल में चले ़आंदोलन ने यह तय किया कि देश की राजनीति की नींव क्या होगी। ये दोनों ही संघषर् सपफल रहे लेकिन इनके प्रभाव के स्तर अलग - अलग थे। इन अंतरों के बावजूद दोनों ही कथाओं में वुफछ ऐसी बातें हैं जो लोकतंत्रा के अतीत और भविष्य के लिए प्रासंगिक हैं। ये दो कथाएँ राजनीतिक संघषर् का उदाहरण हैं। दोनों ही घटनाओं में जनता बड़े पैमाने पर लामबंद हुइर्। जन - समथर्न की सावर्जनिक अभ्िाव्यक्ित ने विवाद को उसके परिणाम तक पहुँचाया। इसके साथ - साथ हम यह भी देखते हैं कि दोनों ही घटनाओं में राजनीतिक संगठनों की भूमिका निणार्यक रही। अगर आपको कक्षा - 9 की पाठ्यपुस्तक के पहले अध्याय की याद हो तो आप पहचान जाएँगे कि पूरे विश्व में लोकतंत्रा का विकास ऐसे ही हुआ है। इस तरह हम इन दो उदाहरणों से वुफछ सामान्य निष्कषर् निकाल सकते हैं। ऽ लोकतंत्रा का जन - संघषर् के जरिए विकास होता है। यह भी संभव है कि वुफछ महत्वपूणर् लगा दिया। लेकिन, जनता की ताकत के आगे बहुराष्ट्रीय कंपनी के अध्िकारियों को ़़पैफसले आम सहमति से हो जाएँ और ऐसे पैफसलों के पीछे किसी तरह का संघषर् न हो। शहर छोड़कर भागना पड़ा। सरकार को आंदोलनकारियों की सारी माँगें माननी पड़ी। बहुराष्ट्रीय कंपनी के साथ किया गया करार रद्द कर दिया गया और जलापूतिर् दोबारा नगरपालिका को सौंपकर पुरानी दरें कायम कर दी गईं। इस आंदोलन को ‘बोलिविया के जलयु(’ के नाम से जाना गया। लोकतंत्रा और जन - संघषर् इन दो कथाओं का संदभर् बड़ा अलग - अलग है। नेपाल में चले आंदोलन का लक्ष्य लोकतंत्रा को स्थापित करना था जबकि बोलिविया पिफर भी, इसे अपवाद ही कहा जाएगा। लोकतंत्रा की निणार्यक घड़ी अमूमन वही होती है जब सत्ताधरियों और सत्ता में हिस्सेदारी चाहने वालों के बीच संघषर् होता है। ऐसी घड़ी तब आती है जब कोइर् देश लोकतंत्रा की ओर कदम बढ़ा रहा होऋ उस देश में लोकतंत्रा का विस्तार हो रहा हो अथवा वहाँ लोकतंत्रा की जड़ें मशबूत होने की प्रवि्रफया में हों। ऽ लोकतांत्रिाक संघषर् का समाधन जनता की व्यापक लामबंदी के जरिए होता है। संभव है, कभी - कभी इस संघषर् का समाधन मौजूदा संस्थाओं मसलन संसद अथवालोकतांत्रिाक राजनीति न्यायपालिका के जरिए हो जाय। लेकिन, जब कि ऐसी ऐतिहासिक घटनाओं में स्वतःस्पफूतर् क्या इसका मतलब यहविवाद श्यादा गहन होता है तो ये संस्थाएँ होने का भाव भी कहीं न कहीं शरूर मौजूद हुआ कि जिस पक्ष नेस्वयं उस विवाद का हिस्सा बन जाती है। ऐसे होता है लेकिन जनता की स्वतःस्पफूतर् सावर्जनिक श्यादा संख्या में लोग जुटामें समाधन इन संस्थाओं के जरिए नहीं भागीदारी संगठित राजनीति के शरिए कारगर लिए वह अपना चाहा हुआ बल्िक उनके बाहर यानी जनता के माध्यम से हो पाती है। संगठित राजनीति के कइर् माध्यम सब वुफछ हासिल कर लेगा? क्या हम यह मानेंहोता है। हो सकते हैं। ऐसे माध्यमों में राजनीतिक दल, कि लोकतंत्रा का मतलबऽ ऐसे संघषर् और लामबंदियों का आधर दबाव - समूह और आंदोलनकारी समूह जिसकी लाठी उसकीराजनीतिक संगठन होते हैं। यह बात सच है शामिल हैं। भैंस? सन् 1984 में कनार्टक सरकार ने कनार्टक पल्पवुड लिमिटेड नाम से एक कंपनी बनाइर्। इस कंपनी को लगभग 30,000 हेक्टेयर शमीन 40 सालों के लिए एक तरह से मुफ्ऱत में दे दी गइर्। इसमें से अध्िकांश शमीन का इस्तेमाल किसान अपने पशुओं के लिए चरागाह के रूप में करते थे। कंपनी ने इस शमीन पर यूक्िलप्टस के पेड़ लगाने शुरू किए। इन पेड़ों का इस्तेमाल कागश बनाने की लुगदी तैयार करने के लिए किया जाना था। सन् 1987 में कििाको - हक्िचको ;अथार्त् तोड़ो और रोपोद्ध नाम का एक आंदोलन शुरू हुआ। इसमें अहिंसक प्रतिरोध् का रास्ता अख्ितयार किया गया। लोगों ने यूक्िलप्टस के पेड़ तोड़े और इनकी जगह वैसे पेड़ों के बिचड़े लगाए जो जनता के लिए पफायदेमंद थे।़नीचे वुफछ समूहों के नाम दिए गए हैं। अगर आप इनमें से किसी भी समूह में होते तो अपने पक्ष के समथर्न में क्या दलील देते? स्थानीय किसान, पयार्वरणवादी कायर्कतार्, उपयुर्क्त कंपनी में काम करने वाला अध्िकारी अथवा कागश का उपभोक्ता। लामबंदी और संगठन आइए, हम ऊपर के दोनों उदाहरणों की तरप़्ाफ लौटें और उन संगठनों की बात करें जिनके बूते ये संघषर् सपफल हुए। हमने देखा कि नेपाल में अनियतकालीन हड़ताल का आह्वान सात दलों के गठबंध्न यानी एस.पी.ए. ने किया था। इस गठबंध्न में ऐसे सात बड़े दल शामिल हुए जिनके वुफछ न वुफछ सदस्य संसद में थे। लेकिन, इस जन - संघषर् के पीछे सिप़्ार्फ एस.पी.एही नहीं था। इस संघषर् में नेपाली कम्युनिस्ट पाटीर् ;माओवादीद्ध ने भी भाग लिया जिसे संसदीय लोकतंत्रा पर विश्वास नहीं है। यह पाटीर् नेपाल की सरकार के विरु( सशस्त्रा संघषर् चला रही थी और इसने नेपाल के एक बड़े हिस्से पर अपना नियंत्राण कर लिया था। नेपाल के जन - संघषर् में राजनीतिक दलों के अलावा अनेक संगठन शामिल थे। सभी बड़े मशदूर संगठन और उनके परिसंघों ने इस आंदोलन में भाग लिया। अन्य अनेक संगठनों मसलन मूलवासी लोगों के संगठन तथा श्िाक्षक, वकील और मानवाध्िकार कायर्कतार्ओं के समूह ने इस आंदोलन को अपना समथर्न दिया। पानी के निजीकरण के ख्िालाप़्ाफ बोलिविया में जो आंदोलन चला उसकी अगुआइर् किसी राजनीतिक दल ने नहीं की। इस आंदोलन का नेतृत्व ‘पेफडेकोर’ ;थ्म्क्म्ब्व्त्द्ध नामक संगठन ने किया। इस संगठन में इंजीनियर और पयार्वरणवादी समेत स्थानीय कामकाजी लोग शामिल थे। इस संगठन को सिंचाइर् पर निभर्र किसानों के एक संघ, कारखाना - मशदूरों के संगठन के परिसंघ, कोचबंबा विश्वविद्यालय के छात्रों तथा शहर में बढ़ती बेघर - बार बच्चों की आबादी का समथर्न मिला। इस आंदोलन को ‘सोशलिस्ट पाटीर्’ ने भी समथर्न दिया। सन् 2006 में बोलिविया में सोशलिस्ट पाटीर् को सत्ता हासिल हुइर्। इन दो उदाहरणों से हम जान सकते हैं कि एक लोकतांत्रिाक व्यवस्था में किसी संघषर् के पीछे बहुत से संगठन होते हैं। ये संगठन दो तरह से अपनी भूमिका निभाते हैं। लोकतंत्रा में किसी पैफसले पर असर डालने ़का एक जाना - पहचाना तरीका राजनीति में प्रत्यक्ष भागीदारी करने का होता है। इसके लिए पाटीर् बनाइर् जाती हैऋ चुनाव लड़ा जाता है और सरकार बनाइर् जाती है। लेकिन, हर नागरिक इतने प्रत्यक्ष ढंग से भागीदारी नहीं करता। संभव है, नागरिक की इच्छा न हो अथवा प्रत्यक्ष राजनीतिक गतिविध्ियों में हिस्सेदारी की उसे शरूरत न महसूस होती हो। संभव है, उसके पास इसके लिए शरूरी कौशल का अभाव हो और वह ऐसे में सिप़्ार्फ मतदान करके प्रत्यक्ष राजनीति मेें अपनी हिस्सेदारी करता हो। बहरहाल, ऐसे अनेक अप्रत्यक्ष तरीके हैं जिनके सहारे लोग सरकार से अपनी माँग अथवा नशरिए का इशहार कर सकते हैं। लोग इसके लिए संगठन बनाकर अपने हितों अथवा नशरिए को बढ़ावा देने वाली गतिविध्ियाँ कर सकते हैं। इसे हित - समूह अथवा दबाव - समूह कहते हैं। कभी - कभी लोग बगैर संगठन बनाए अपनी माँगों के लिए एकजुट होने का पैफसला करते हैं। ऐसे़समूहों को आंदोलन कहा जाता है। दबाव - समूह और आंदोलन बतौर संगठन दबाव - समूह सरकार की नीतियों को प्रभावित करने की कोश्िाश करते हैं। केशव, द हिंदू लेकिन, राजनीतिक पाटिर्यों के समान दबाव - समूह का लक्ष्य सत्ता पर प्रत्यक्ष नियंत्राण करने अथवा उसमें हिस्सेदारी करने का नहीं होता। दबाव - समूह का निमार्ण तब होता है जब समान पेशे, हित, आकांक्षा अथवा मत के लोग एक समान उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए एकजुट होते हैं। ऊपर की चचार् में हमारा सामना वुफछ ऐसी बातों से हुआ जिन्हें हम संगठन नहीं कह सकते। नेपाल में हुए जन - संघषर् को ‘लोकतंत्रा के लिए दूसरा आंदोलन’ कहा गया था। हम अक्सर कइर् तरह की सामूहिक कारर्वाइयों के लिए जन - आंदोलन जैसा शब्द व्यवहार होता सुनते हैं, जैसे - नमर्दा बचाओ आंदोलन, सूचना के अध्िकार का आंदोलन, शराब - विरोध्ी आंदोलन, महिला आंदोलन तथा पयार्वरण आंदोलन। दबाव - समूह के समान आंदोलन भी चुनावी मुकाबले में सीध्े भागीदारी करने के बजाय राजनीति को प्रभावित करने की कोश्िाश करते हैं। लेकिन, दबाव - समूहों के विपरीत आंदोलनों में संगठन ढीला - ढाला होता है। आंदोलनों में प़्ौफसले अनौपचारिक ढंग से लिए जाते हैं और ये प़्ौफसले लचीले भी होते हैं। आंदोलन जनता की स्वतःस्पफूतर् भागीदारी पर निभर्र होते हैं न कि दबाव - समूह पर। वगर् विशेष के हित - समूह और जन - सामान्य के हित - समूह हित - समूह अमूमन समाज के किसी ख़ास हिस्से अथवा समूह के हितों को बढ़ावा देना चाहते हैं। मशदूर संगठन, व्यावसायिक संघ और पेशेवरों ;वकील, डाॅक्टर, श्िाक्षक आदिद्ध अखबार की इन कतरनों में जिन दबाव - समूहों का िाक्र किया गया है, क्या आप उन्हें पहचान सकते हैं? वे क्या माँग कर रहे हैं? विकिपीडिया के निकाय इस तरह के दबाव - समूह के उदाहरण हैं। ये दबाव - समूह वगर् - विशेषी होते हैं क्योंकि ये समाज के किसी खास तबके मसलन मशदूर, कमर्चारी, व्यवसायी, उद्योगपति, ध्मर् - विशेष के अनुयायी अथवा किसी खास जाति आदि का प्रतिनिध्ित्व करते हैं। ऐसे दबाव - समूह का मुख्य सरोकार पूरे समाज का नहीं बल्िक अपने सदस्यों की बेहतरी और कल्याण करना होता है। वुफछ संगठन समाज के किसी एक तबके के ही हितों का प्रतिनिध्ित्व नहीं करते। ये संगठन सवर् - सामान्य हितों की नुमाइंदगी करते हैं जिनकी रक्षा शरूरी होती है। संभव है, ऐसा संगठन जिस उद्देश्य को पाना चाहता हो उससे इसके सदस्यों को कोइर् लाभ न हो। बोलिविया का ‘पेफडेकोर’ ;थ्म्क्म्ब्व्त् द्ध नाम का संगठन ऐसे ही संगठन का उदाहरण है। नेपाल के मामले में हमने देखा कि वहाँ मानवाध्िकार के संगठनों ने भी भागीदारी की थी। हमने ऐसे संगठनों के बारे में कक्षा - 9 की व्िाफताब में पढ़ा था। इन दूसरे किस्म के संगठनों को जन - सामान्य के हित - समूह अथवा लोक कल्याणकारी समूह कहते हैं। ऐसे संगठन किसी खास हित के बजाय सामूहिक हित का प्रतिनिध्ित्व करते हैं। इनका लक्ष्य अपने सदस्यों की नहीं बल्िक किन्हीं और की मदद करना होता है। मिसाल के लिए हम ाफ लड़ने वाले समूहों बँध्ुआ मशदूरी के ख्िालाप़्का नाम ले सकते हैं। ऐसे समूह अपनी भलाइर् के लिए नहीं बल्िक बँध्ुआ मशदूरी के बोझ तले पिस रहे लोगों के लिए लड़ते हैं। वुफछ मामलों में संभव है कि जन - सामान्य के हितों का प्रतिनिध्ित्व करने वाले समूह ऐसे उद्देश्य को साध्ने के लिए आगे आएँलोकतांत्रिाक राजनीतिाफायदा शमीन के अध्िकार को लेकर विरोध् - प्रदशर्न: पश्िचमी जावा ;इंडोनेश्िायाद्ध के किसान। सन् 2004 में एक दिन पश्िचमी जावा ;इंडोनेश्िायाद्ध के लगभग 15,000 भूमिहीन किसान इंडोनेश्िाया की राजधनी जकात्तार् पहुँचे। किसान अपने परिवार के साथ आए थे और भूमि - सुधर की माँग कर रहे थे। किसानों का कहना था कि हमें अपने ‘पफामर्’ वापस लौटा दिए जाएँ। वे विश्व व्यापार संगठन और उसके विध्वंसक नियम - कानूनों का विरोध् कर रहे थे। प्रदशर्नकारियों का नारा था - ‘‘शमीन नहीं तो वोट नहीं।’’ उनका ऐलान था कि अगर किसी ़जिससे बाकियों के साथ - साथ उन्हें भी प्होता हो। उदाहरण के लिए ‘बामसेपफ’ ;बैकवडर् एंड माइनाॅरिटी कम्युनिटीश एम्पलाइज पफेडरेशन - ठ।डब्म्थ्द्ध का नाम लिया जा सकता है। यह मुख्यतया सरकारी कमर्चारियों का संगठन है जो जातिगत भेदभाव के ख्िालापफ़उम्मीदवार ने भूमि - सुधर का पक्ष नहीं लिया तो वे इंडोनेश्िाया में हो रहे राष्ट्रपति पद के पहले प्रत्यक्ष चुनाव का बहिष्कार करेंगे। अभ्िायान चलाता है। यह संगठन जातिगत भेदभाव के श्िाकार अपने सदस्यों की समस्याओं को देखता है लेकिन इसका मुख्य सरोकार सामाजिक न्याय और पूरे समाज के लिए सामाजिक समानता को हासिल करना है। आंदोलनकारी समूह दबाव - समूह के समान किसी आंदोलन में कइर् तरह के समूह शामिल रहतेे हैं। ऊपर वुफछ उदाहरण दिए गए हैं जिससे इनकी एक साधरण विशेषता का संकेत मिलता है। अध्िकतर आंदोलन किसी खास मुद्दे पर वेंफित होते हैं। ऐसे आंदोलन एक सीमित समय - सीमा के भीतर किसी एक लक्ष्य को पाना चाहते हैं। वुफछ आंदोलन श्यादा सावर्भौम प्रकृति के होते हैं और एक व्यापक लक्ष्य को बहुत बड़ी समयावध्ि में हासिल करना चाहते हैं। नेपाल में उठे लोकतंत्रा के आंदोलन का विश्िाष्ट उद्देश्य था राजा को अपने आदेशों को वापस लेने के लिए बाध्य करना। इन आदेशों के द्वारा राजा ने लोकतंत्रा को समाप्त कर दिया था। भारत में, नमर्दा बचाओ आंदोलन ऐसे आंदोलन का अच्छा उदाहरण है। नमर्दा नदी पर बनाए जा रहे सरदार सरोवर बाँध् के कारण लोग विस्थापित हुए। यह आंदोलन इसी खास मुद्दे को लेकर शुरू हुआ। इसका उद्देश्य बाँध् को बनने से रोकना था। ध्ीरे - ध्ीरे इस आंदोलन ने व्यापक रूप धरण किया। इसने सभी बड़े बाँधें और विकास के उस माॅडल पर सवाल उठाए जिसमें बड़े बाँधें को अनिवायर् साबित किया जाता है। ऐसे आंदोलनों में नेतृत्व बड़ा स्पष्ट होता है और उनका संगठन भी होता है लेकिन ऐसे आंदोलन बहुत थोड़े समय तक ही सवि्रफय रह पाते हैं। किसी एक मुद्दे पर आधरित ऐसे आंदोलनों के बरक्स उन आंदोलनों को रखा जा सकता है जो लंबे समय तक चलते हैं और जिनमें एक से श्यादा मुद्दे होते हैं। पयार्वरण के आंदोलन तथा महिला आंदोलन ठेठ ऐसे ही आंदोलनों की मिसाल हैं। ऐसे आंदोलनों के नियंत्राण अथवा दिशा - निदेर्श के लिए कोइर् एक संगठन नहीं होता। पयार्वरण आंदोलन के अंतगर्त अनेक संगठन तथा खास - खास मुद्दे पर आधरित आंदोलन शामिल हैं। इनके सबके संगठन अलग - अलग हैंऋ सामाजिक आंदोलन और दबाव - समूह नागरिकों को कइर् तरह से लामबंद करने की कोश्िाश करते हैं। इस कोलाॅज में वुफछ ऐसे ही तरीकों को दिखाया गया है। सुरेंदर, द हिंदू कइर् लोकतांत्रिाक सरकारें अपने नागरिकों को सूचना का अध्िकार ;त्ज्प्द्ध प्रदान करती हैं। सूचना का अध्िकार अध्िनियम, 2005 हमारी संसद द्वारा पारित एक ऐतिहासिक कानून है। नागरिक इस कानून के अंतगर्त, सरकारी कायार्लयों से उनकी विभ्िान्न गतिविध्ियों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। क्या आप ऐसा सोचते हैं कि यह काटर्ून इस कानून के पालन में नौकरशाही की अवरोध्ी भूमिका को बढ़ा - चढ़ा कर दिखाता है? नेतृत्व भी अलहदा है और नीतिगत मामलों पर अक्सर इनकी राय अलग - अलग होती है। इसके बावजूद एक व्यापक उद्देश्य के ये साझीदार हैं और इनका दृष्िटकोण एक जैसा है। इसी वजह से इन्हें एक आंदोलन यानी पयार्वरण आंदोलन का नाम दिया जाता है। कभी - कभी ऐसे व्यापक आंदोलनों का एक ढीला - ढाला सा सवर् - समावेशी संगठन होता है। मिसाल के लिए नेशनल अलायंस पफाॅर पी‘पल्स मूवमेंट ;छ।च्डद्ध ऐसा ही संगठनों का संगठन है। विभ्िान्न मुद्दों पर संघषर् कर रहे अनेक आंदोलनकारी समूह इस संगठन के घटक हैं। यह संगठन अपने देश में अनेक जनांदोलनों की गतिविध्ियों में तालमेल बैठाने का काम करता है। दबाव - समूह और आंदोलन राजनीति पर वैफसे असर डालते हैं? दबाव - समूह और आंदोलन राजनीति पर कइर् तरह से असर डालते हैं: ऽ दबाव - समूह और आंदोलन अपने लक्ष्य तथा गतिविध्ियों के लिए जनता का समथर्न और सहानुभूति हासिल करने की कोश्िाश करते हैं। इसके लिए सूचना अभ्िायान चलाना, बैठक आयोजित करना अथवा अशीर् दायर करने जैसे तरीकों का सहारा लिया जाता है। ऐसे अध्िकतर समूह मीडिया को प्रभावित करने की कोश्िाश करते हैं ताकि उनके मसलों पर मीडिया श्यादा ध्यान दे। ऽ ऐसे समूह अक्सर हड़ताल अथवा सरकारी कामकाज में बाध पहुँचाने जैसे उपायों का सहारा लेते हैं। मशदूर संगठन, कमर्चारी संघ तथा अध्िकतर आंदोलनकारी समूह अक्सर ऐसी युक्ितयों का इस्तेमाल करते हैं कि सरकार उनकी माँगों की तरपफ ध्यान देने के ़लिए बाध्य हो। ऽ व्यवसाय - समूह अक्सर पेशेवर ‘लाॅबिस्ट’ नियुक्त करते हैं अथवा महँगे विज्ञापनों को प्रायोजित करते हैं। दबाव - समूह अथवा आंदोलनकारी समूह के वुफछ व्यक्ित सरकार को सलाह देने वाली समितियों और आध्िकारिक निकायों में श्िारकत कर सकते हैं। हालाँकि दबाव - समूह और आंदोलन दलीय राजनीति में सीध्े भाग नहीं लेेते लेकिन वे राजनीतिक दलों पर असर डालना चाहते हैं। अध्िकतर आंदोलन किसी राजनीतिक दल से संब( नहीं होते लेकिन उनका एक राजनीतिक पक्ष होता है। आंदोलनों की राजनीतिक विचारधरा होती है और बड़े मुद्दों पर उनका राजनीतिक पक्ष होता है। राजनीतिक दल और दबाव - समूह के बीच का रिश्ता कइर् रूप धरण कर सकता है जिसमें वुफछ प्रत्यक्ष होते हैं तो वुफछ अप्रत्यक्ष। ऽ वुफछ मामलों में दबाव - समूह राजनीतिक दलों द्वारा ही बनाए गए होते हैं अथवा उनका नेतृत्व राजनीतिक दल के नेता करते हैं। वुफछ दबाव - समूह राजनीतिक दल की एक शाखा के रूप में काम करते हैं। उदाहरण के लिए भारत के अध्िकतर मशदूर - संगठन और छात्रा - संगठन या तो बड़े राजनीतिक दलों द्वारा बनाए गए हैं अथवा उनकी संब(ता राजनीतिक दलों से है। ऐसे दबाव - समूहों के अध्िकतर नेता अमूमन किसी न किसी राजनीतिक दल के कायर्कतार् और नेता होते हैं। ऽ कभी - कभी आंदोलन राजनीतिक दल का रूप अख्ितयार कर लेते हैं। उदाहरण के लिए ‘विदेशी’ लोगों के विरु( छात्रों ने ‘असम आंदोलन’ चलाया और जब इस आंदोलन की समाप्ित हुइर् तो इस आंदोलन ने ‘असम गण परिषद्’ का रूप ले लिया। सन् 1930 और 1940 के दशक में तमिलनाडु में समाज - सुधर आंदोलन चले थे। डी.एम.के. और ए.आइर्.ए.डी.एम.केजैसी पाटिर्यों की जडें़ इन समाज - सुधर आंदोलनों में ढूँढी जा सकती है़ं। ऽ अध्िकांशतया दबाव - समूह और आंदोलन का राजनीतिक दलों से प्रत्यक्ष संबंध् नहीं होता। दोनों परस्पर विरोध्ी पक्ष लेते हैं। पिफर भी, इनके बीच संवाद कायम रहता है और सुलह की बातचीत चलती रहती है। आंदोलनकारी समूहों ने नए - नए मुद्दे उठाए हैं और राजनीतिक दलों ने इन मुद्दों को आगे बढ़ाया है। राजनीतिक दलों के अध्िकतर नए नेता दबाव - समूह अथवा आंदोलनकारी समूहों से आते हैं। क्या दबाव - समूह और आंदोलन के प्रभाव सकारात्मक होते हैं? शुरुआती तौर पर लग सकता है कि किसी एक ही तबके के हितों की नुमाइंदगी करने वाले दबाव - समूह लोकतंत्रा के लिए हितकर नहीं हैं। लोकतंत्रा में किसी एक तबके के का प्रतिनिध्ित्व करते आंदोलन अथवा दबाव - समूहों से जुड़ी ख़बरों का एक खाका तैयार करें: किसान, व्यापारी, मशदूर, उद्योग, पयार्वरण और महिला। इनमें से किसका जिक्र टेलीविशन के समाचारों में सबसे श्यादा हुआ? किस तबके अथवा हित - समूह का जिक्र समाचारों में सबसे कम हुआ? ;टेलीविशन की जगह आप अख़बार का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।द्ध ग्रीनबेल्ट ;हरितपट्टðीद्ध मूवमेंट के अंतगर्त पूरे केन्या में 3 करोड़ वृक्ष लगाए गए। इस आंदोलन के नेता वांगरी मथाइर् सरकारी अध्िकारियों और राजनेताओं के रुख से बड़े नाखुश हैं। उनका कहना है, ‘‘सन् 1970 और 1980 के दशक में जब मैं किसानों को वृक्षापरोपण के लिए उत्साहित कर रही थी तो मुझे पता चला कि सरकार के भ्रष्ट कमर्चारी ही वनों के अध्िकांश विनाश के लिए िाम्मेदार हैं। इन लोगों ने अपने चहेते ‘डेवलेपसर्’ को जमीन और वृक्ष अवैध् रूप से बेच रखे थे। सन् 1990 के दशक में राष्ट्रपति डेनियल अरेप मोइर् की सरकार के वुफछ तत्वों ने जातीय समुदायों को शमीन के सवाल पर आपस में लड़वा दिया। इससे ‘रिफ्रट वैली’ के अनेक केन्यावासियों की आजीविका और अध्िकार जाते रहे। वुफछ को अपनी जान गँवानी पड़ी। शासक दल के समथर्कों को शमीन मिली और लोकतंत्रा - समथर्क आंदोलन के पक्ष मंे बोलने वालों को विस्थापित होना पड़ा। यह सरकार की एक चाल थी जिसका उद्देश्य समुदायों को शमीन के सवाल पर आपस में लड़वाकर सत्ता पर कब्शा जमाए रखना था। अगर वे एक - दूसरे से भ्िाड़ते रहेंगे तो लोकतंत्रा की माँग करने के लिए उनके पास कम मौके होंगे।’’ ऊपर के अनुच्छेद में आपको लोकतंत्रा और सामाजिक आंदोलन में क्या संबंध् नशर आ रहा है? इस आंदोलन को सरकार के प्रति क्या रवैया अपनाना चाहिए? नहीं बल्िक सबके हितों की रक्षा होनी चाहिए। मशबूत हुइर् हैं। शासकों के ऊपर दबाव यह भी लग सकता है कि ऐसे समूह सत्ता डालना लोकतंत्रा में कोइर् अहितकर गतिविध्ि का इस्तेमाल तो करना चाहते हैं लेकिन नहीं बशतेर् इसका अवसर सबको प्राप्त हो। िाम्मेदारी से बचना चाहते हैं। राजनीतिक सरकारें अक्सर थोड़े से ध्नी और ताकतवर दलों को चुनाव के समय जनता का सामना लोगों के अनुचित दबाव में आ जाती हैं। करना पड़ता है लेकिन ये समूह जनता के जन - साधरण के हित - समूह तथा आंदोलन प्रति जवाबदेह नहीं होते। संभव है कि इस अनुचित दबाव के प्रतिकार में उपयोगी दबाव - समूहों और आंदोलनों को जनता से भूमिका निभाते हैं और आम नागरिक की समथर्न अथवा ध्न न मिले। कभी - कभी शरूरतों तथा सरोकारों से सरकार को अवगत ऐसा भी हो सकता है कि दबाव - समूहों को कराते हैं। बहुत कम लोगों का समथर्न प्राप्त हो लेकिन वगर् - विशेषी हित - समूह भी महत्वपूणर् उनके पास ध्न श्यादा हो और इसके बूते भूमिका निभाते हैं। जब विभ्िान्न समूह सिय अपने संवुफचित एजेंडे पर वे सावर्जनिक हों तो कोइर् एक समूह समाज के ऊपर बहस का रुख मोड़ने में सपफल हो जाएँ। प्रभुत्व कायम नहीं कर सकता। यदि कोइर् लेकिन थोड़ा संतुलित नशरिया अपनाएँ एक समूह सरकार के ऊपर अपने हित में तो स्पष्ट होगा कि दबाव - समूहों और नीति बनाने के लिए दबाव डालता है तो आंदोलनों के कारण लोकतंत्रा की जड़ें दूसरा समूह इसके प्रतिकार में दबाव डालेगा कि नीतियाँ उस तरह से न बनाइर् जाएँ। इस काटूर्न का शीषर्क है ‘खबर - बेखबर’ सरकार को भी ऐसे में पता चलता रहता है मीडिया में अक्सर किसकी चचार्एँ कि समाज के विभ्िान्न तबके क्या चाहतेचलती हैं? अख़बारों में श्यादातर किनके बारे में लिखा गया होता है? हैं। इससे परस्पर विरोध्ी हितों के बीच सामंजस्य बैठाना तथा शक्ित - संतुलन करना संभव होता है। 1 दबाव - समूह और आंदोलन राजनीति को किस तरह प्रभावित करते हैंैं? 2 दबाव - समूहों और राजनीतिक दलों के आपसी संबंधें का स्वरूप वैफसा होता है, वणर्न करें। 3 दबाव - समूहों की गतिविध्ियाँ लोकतांत्रिाक सरकार के कामकाज में वैफसे उपयोगी होती हैं? 4 दबाव - समूह क्या हैं? वुफछ उदाहरण बताइए। 5 दबाव - समूह और राजनीतिक दल में क्या अंतर है? 6 जो संगठन विश्िाष्ट सामाजिक वगर् जैसे मशदूर, कमर्चारी, श्िाक्षक और वकील आदि के हितों को बढ़ावा देने की गतिविध्ियाँ चलाते हैं उन्हें - - - - - - - - - - - कहा जाता है। 7 निम्नलिख्िात में किस कथन से स्पष्ट होता है कि दबाव - समूह और राजनीतिक दल में अंतर होता है - ;कद्ध राजनीतिक दल राजनीतिक पक्ष लेते हैं जबकि दबाव - समूह राजनीतिक मसलों की चिंता नहीं करते। ;खद्ध दबाव - समूह वुफछ लोगों तक ही सीमित होते हैं जबकि राजनीतिक दल का दायरा श्यादा लोगों तक पैफला होता है। ;गद्ध दबाव - समूह सत्ता में नहीं आना चाहते जबकि राजनीतिक दल सत्ता हासिल करना चाहते हैं। ;घद्ध दबाव - समूह लोगों की लामबंदी नहीं करते जबकि राजनीतिक दल करते हैं। 8 सूची - प् ;संगठन और संघषर्द्ध का मिलान सूची - प्प् से कीजिए और सूचियों के नीचे दी गइर् सारणी से सही उत्तर चुनिए: 1 2 3 4 सूची - प् किसी विशेष तबके या समूह के हितों को बढ़ावा देने वाले संगठन जन - सामान्य के हितों को बढ़ावा देने वाले संगठन किसी सामाजिक समस्या के समाधन के लिए चलाया गया एक ऐसा संघषर् जिसमें सांगठनिक संरचना हो भी सकती है और नहीं भी। ऐसा संगठन जो राजनीतिक सत्ता पाने की गरश से लोगों को लामबंद करता है। सूची - प्प् ;कद्ध आंदोलन ;खद्ध राजनीतिक दल ;गद्ध वगर् - विशेष के हित समूह ;घद्ध लोक कल्याणकारी हित समूह 1 2 3 4 ;कद्ध ग घ ख क ;खद्ध ग घ क ख ;गद्ध घ ग ख क ;घद्ध ख ग घ क प्रश्नावली 9.सूची प् का सूची प्प् से मिलान करें जो सूचियों के नीचे दी गइर् सारणी में सही उत्तर हो चुनें: सूची प् सूची प्प् 1 दबाव सूमह ;कद्ध नमर्दा बचाओ आंदोलन 2 लंबी अवध्ि का आंदोलन ;खद्ध असम गण परिषद् 3 एक मुद्दे पर आधरित आंदोलन ;गद्ध महिला आंदोलन 4 राजनीतिक दल ;घद्ध खाद विव्रेफताओं का संघ 1 2 3 4 ;अद्ध घ ग क ख ;बद्ध ख क घ ग ;सद्ध ग घ ख क ;दद्ध ख घ ग क 10.दबाव - समूहों और राजनीतिक दलों के बारे में निम्नलिख्िात कथनों पर विचार कीजिए। ;कद्ध दबाव - समूह समाज के किसी खास तबके के हितों की संगठित अभ्िाव्यक्ित होते हैं। ;खद्ध दबाव - समूह राजनीतिक मुद्दों पर कोइर् न कोइर् पक्ष लेते हैं। ;गद्ध सभी दबाव - समूह राजनीतिक दल होते हैं। अब नीचे दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प चुनें - ;अद्ध क, ख और ग ;बद्ध क और ख ;सद्ध ख और ग ;दद्ध क और ग 11.मेवात हरियाणा का सबसे पिछड़ा इलाका है। यह गुड़गाँव और प़्ाफरीदाबाद िाले का हिस्सा हुआ करता था। मेवात के लोगों को लगा कि इस इलाके को अगर अलग िाला बना दिया जाय तो इस इलाके पर श्यादा ध्यान जाएगा। लेकिन, राजनीतिक दल इस बात में कोइर् रुचि नहीं ले रहे थे। सन् 1996 में मेवात एजुकेशन एंड सोशल आगेर्नाइजेशन तथा मेवात साक्षरता समिति ने अलग िाला बनाने की माँग उठाइर्। बाद में सन् 2000 में मेवात विकास सभा की स्थापना हुइर्। इसने एक के बाद एक कइर् जन - जागरण अभ्िायान चलाए। इससे बाध्य होकर बड़े दलों यानी कांग्रेस और इंडियन नेशनल लोकदल को इस मुद्दे को अपना समथर्न देना पड़ा। उन्होंने प़्ाफरवरी 2005 में होने वाले विधन सभा के चुनाव से पहले ही कह दिया कि नया िाला बना दिया जाएगा। नया िाला सन् 2005 की जुलाइर् में बना। इस उदाहरण में आपको आंदोलन, राजनीतिक दल और सरकार के बीच क्या रिश्ता नशर आता है? क्या आप कोइर् ऐसा उदाहरण दे सकते हैं जो इससे अलग रिश्ता बताता हो?

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