जाति, धमर् और लैंगिक मसले परिचय पिछले अध्याय में हमने जाना कि सामाजिक विविधता लोकतंत्रा के लिए कोइर् खतरा नहीं होती। राजनीति में सामाजिक असमानताओं की अभ्िाव्यक्ित कोइर् असंभव बात नहीं है। कइर् बार तो यह अभ्िाव्यक्ित लोकतंत्रा के लिए लाभकर भी होती है। इस अध्याय में हम इस विचार को भारत में लोकतंत्रा के कामकाज के संदभर् में परखने की कोश्िाश करंेंगे। हम यहाँ सामाजिक विभाजन और भेदभाव वाली तीन सामाजिक असमानताओं पर गौर करेंगे। ये हैं लिंग, धमर् और जाति पर आधारित सामाजिक विषमताएँ। ये असमानताएँ वैफसी हैं और किस तरह राजनीति में अभ्िाव्यक्त होती हैं, हम इस पर बारी - बारी से गौर करेंगे। पिफर, हम यह देखने की कोश्िाश करेंगे कि इन असमानताओं पर आधारित अलग - अलग अभ्िाव्यक्ितयाँ लोकतंत्रा के लिए लाभकर हैं या नुकसानदेह। अध्याय 4लैंगिक मसले और राजनीति निजी और सावर्जनिक का विभाजन लड़के और लड़कियोें के पालन - पोषण के व्रफम में यह मान्यता उनके मन में बैठा दी जाती है कि औरतों की मुख्य जिम्मेवारी गृहस्थी चलाने और बच्चों का पालन - पोषण करने की है। यह चीज अिाकतर परिवारों के श्रम के लैंगिक विभाजन से झलकती है। औरतें घर के अंदर का सारा काम काज, जैसे - खाना बनाना, सपफाइर् करना, कपड़े़जुबानधेना और बच्चों की देखरेख करना आदि करती हैं जबकि मदर् घर के बाहर का काम करते हैं। ऐसा नहीं है कि मदर् ये सारे काम नहीं कर सकते। दरअसल वे सोचते हैं कि ऐसे कामों को करना औरतों के िाम्मे है। पर जब सिलाइर् - कटाइर् से लेकर इन्हीं सारे कामों के लिए पैसे मिलते हैं तो मदर् खुशी - खुशी यही काम घर के बाहर करते हैं। अिाकांश दजीर् या होटल के रसोइए पुरुष होते हैं। इसी प्रकार औरतें घर के बाहर का काम न करती हों - ऐसा भी नहीं है। गाँवों में स्ित्रायाँ पानी और जलावन जुटाने से लेकर खेत में खटने तक का काम करती हैं। शहरों में भी हम देखते हैं कि कोइर् गरीब स्त्राी किसी मध्यमवगीर्य परिवार में नौकरानी का काम कर रही है और मध्यमवगीर्य स्त्राी काम करने के लिए दफ्ऱतर जा रही है। सच्चाइर् यह है कि अध्िकतर महिलाएँ अपने घरेलू काम के अतिरिक्त अपनी आमदनी के लिए वुफछ न वुफछ काम करती हैं लेकिन उनके काम को श्यादा मूल्यवान नहीं माना जाता और उन्हें दिन रात काम करके भी उसका श्रेय नहीं मिलता। श्रम के इस तरह के विभाजन का नतीजा यह हुआ है कि औरत तो घर की चारदीवारी में सिमट के रह गइर् है और बाहर का सावर्जनिक जीवन पुरुषों के कब्शे में आ गया है। मनुष्य जाति की आबादी में औरतों का श्रम का लैंगिक विभाजन: काम के बँटवारे का वह तरीका जिसमें घर के अंदर के सारे काम परिवार की औरतें करती हैं या अपनी देखरेख में घरेलू नौकरों/नौकरानियों से कराती हैं। आइए, अपनी बात की शुरुआत हम लैंगिक असमानता से करें। सामाजिक असमानता का यह रूप हर जगह नशर आता है लेकिन राजनीति के अध्ययन में शायद ही इस बात की पहचान की जाती है। लैंगिक असमानता को स्वाभाविक या कहें कि प्रावृफतिक और अपरिवतर्नीय मान लिया जाता है। लेकिन, लैंगिक असमानता का आधार स्त्राी और पुरुष की जैविक बनावट नहीं बल्िक इन दोनों के बारे में प्रचलित रूढ़ छवियाँ और तयशुदा सामाजिक भूमिकाएँ हैं। हिस्सा आधा है पर सावर्जनिक जीवन में, मुद्दे उभरे। दुनिया के अलग - अलग हिस्सांे में खासकर राजनीति में उनकी भूमिका नगण्य ंऔरतों ने अपने संगठन बनाए और बराबरी ही है। यह बात अिाकतर समाजों पर लागू के अिाकार हासिल करने के लिए आंदोलन होती है। पहले सिपर्फ पुरुषों को ही सावर्जनिक मामलों में भागीदारी करने, वोट देने या का अिाकार प्रदान करने के लिए आंदोलन सावर्जनिक पदों के लिए चुनाव लड़ने की हुए। इन आंदोलनोें में महिलाओं के राजनीतिक अनुमति थी। धीरे - धीरे राजनीति में लैंगिक और वैधानिक दजेर् को ऊँचा उठाने और आदशर् स्त्राी की वुफछ बानगी...टीवी सीरियल के निमार्ताओं के लिए आदशर् दशर्क समाज केफैशन - उद्योग लिएके लिए आदशर् आदशर्सुंदरी गृहिणी भावी नियोक्ता सास - ससुर और पुरुष के लिए सहकमिर्यों के लिए आदशर् दुल्हन आदशर् कमर्चारी ़किए। विभ्िान्न देशों में महिलाओं को वोट चुनिए, इनमें से आप कौन हैं?जुबान अपने समाज में आदशर् स्त्राी के बारे में प्रचलित इन सारी धारणाओं पर चचार् करें। क्या आप इन सबसे सहमत हैं? अगर नहीं तो तो बताइए कि आदशर् स्त्राी के बारे में आपकी धारणा क्या है? उनके लिए श्िाक्षा तथा रोजगार के अवसर बढ़ाने की माँग की गइर् मूलगामी बदलाव की माँग करने वाले महिला आंदोलनों ने औरतों के व्यक्ितगत और पारिवारिक जीवन में भी बराबरी की माँग उठाइर्। इन आंदोलनों को नारीवादी आंदोलन कहा जाता है। लैंगिक विभाजन की राजनीतिक अभ्िाव्यक्ित और इस सवाल पर राजनीतिक गोलबंदी ने सावर्जनिक जीवन में औरत की भूमिका को बढ़ाने में मदद की। आज हम वैज्ञानिक, डाॅक्टर, इंजीनियर, प्रबंध्क, काॅलेज और विश्वविद्यालयी श्िाक्षक जैसे पेशों में बहुत - सी औरतों को पाते हैं जबकि पहले इन कामों को महिलाओं के लायक नहीं माना जाता था। दुनिया के वुफछ हिस्सों, जैसे स्वीडन, नावेर् और पिफनलैंड जैसे स्वैंफडिनेवियाइर् देशों में सावर्जनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी का स्तर कापफी उँफचा है।़देश के छह राज्यों में ‘समय का उपयोग’ संबंधी सवेर्क्षण किया गया। इससे पता चलता है कि एक औरत औसतन रोशाना साढ़े सात घंटे से श्यादा काम करती है जबकि एक मदर् औसतन रोश साढ़े छह घंटे ही काम करता है। पिफर भी पुरुषों द्वारा किया गया काम ही श्यादा दीख पड़ता है क्यांेंकि उससे आमदनी होती है। औरतें भी ढेर सारे ऐसे काम करती हैं जिनसे अप्रत्यक्ष रूप से आमदनी होती है लेकिन उनका श्यादातर काम घर की चारदीवारी के अंदर होता है। इसके लिए उन्हें पैसे नहीं मिलते इसलिए औरतों का काम दिखाइर् नहीं देता। समय का उपयोग ;दैनिक - घंटे और मिनट मेंद्ध नारीवादी: औरत और मदर् के समान अिाकारों और अवसरों में विश्वास करने वाली महिला या पुरुष। गतिवििायाँ पुरुष महिला आमदनी वाले काम 6ः00 2ः40 घर के काम 0.30 5ः00 गप्पबाजी 1.25 1ः20 बिना काम के/पुफरसत 3ः40 3ः50 सोना, अपने शरीर की साप़्ाफ - सप़्ाफाइर्, पढ़ना वगैरह 12.25 11ः10 ड्डोत: भारत सरकार, समय का उपयोग सवे±क्षण,1998 - 99 आप अपने परिवार में भी ‘समय का उपयोग’ वाला सवेर्क्षण कर सकते हैं। अपने परिवार के फ्रते तक गौर करंे और यह दजर् करते़सभी वयस्क पुरुषों और महिलाओं के काम पर एक हचलंे कि निम्नलिख्िात कामों पर हर आदमी कितना समय देता है: आमदनी वाले काम ¹दफ्ऱतर, दुकान या कारखाना अथवा खेत वगैरह में कामह्, घरेलू काम ¹खाना बनाना, झाडू - पांेछा - बरतन धोना, कपड़े धोना, पानी लाना, बच्चों और बूढ़ों की देखरेख करना वगैरहह्, पढ़ना और मनोरंजन, गप - शप करना, अपने शरीर की सापफ - सप़्ाफाइर्, आराम करना़या सोना। शरूरी लगे तो आप नयी श्रेणी भी बना सकते हैं। इसमें से हर काम में जो समय फ्रते भर का हिसाब जोड़ लंे और पिफर उसे सात से भाग देकर प्रत्येक़लगता है उसका हसदस्य का रोश का औसत समय निकालें। क्या आपके परिवार मंे भी महिलाएँ पुरुषों से श्यादा काम करती हैं? ैवनतबम रू न्छथ्च्।ए डपेेपदहण्ण्ण् डंचचपदह जीम ।कअमतेम ब्ीपसक ैमग त्ंजपव पद प्दकपंए 2005ए चण्3ण् हमारे देश में आशादी के बाद से महिलाओं की स्िथति में वुफछ सुधार हुआ है पर वे अभी भी पुरुषों से कापफी पीछे हैं। हमारा समाज अभी भी पितृ - प्रधान है। औरतों के साथ अभी भी कइर् तरह के भेदभाव होते हैं, उनका दमन होता है - ऽ महिलाओं में साक्षरता की दर अब भी मात्रा 54 पफीसदी है जबकि पुरुषों में 76 पफीसदी। इसी प्रकार स्वूफल पास करने वाली लड़कियों की एक सीमित संख्या ही उच्च श्िाक्षा की ओर कदम बढ़ा पाती हैं। जब हम स्वूफली परीक्षाओं के परिणाम पर गौर करते दिल्ली हैं तो देखते हैं कि कइर् जगह लड़कियों ने बाजी मार ली है और कइर् जगहों पर उनका प्रदशर्न लड़कों से बेहतर नहीं तो कमतर भी नहीं है। लेकिन आगे की पढ़ाइर् के दरवाशे उनके लिए बंद हो जाते हैं क्यांेकि माँ बाप अपने संसाधनों को लड़के - लड़की दोनों पर बराबर खचर् करने की जगह लड़कों पर श्यादा खचर् करना पसंद करते हैं। ऽ इस स्िथति के चलते अब भी उँफची तनख्वाह वाले और उँफचे पदों पर पहँुचने वाली महिलाओं की संख्या बहुत ही कम है। भारत में औसतन एक स्त्राी एक पुरुष क्या आप इस मानचित्रा में अपने िाले को पहचान सकते हैं? इस िाले में स्त्राी - पुरुष का अनुपात कितना है? आप इस अनुपात को अलग रंगों में अंकित जिलों से कितना कम या श्यादा पाते हैं? उन प्रांतों की पहचान करें जहाँ बाल लिंग - अनुपात 850 से कम है। अगले पृष्ठ पर दिए गए पोस्टर से इस नक्शे की तुलना करें। ये दोनों किस तरह हमें एक ही मुद्दे के बारे में अलग - अलग ढंग से बताते हैं? बाल ¯लग अनुपात 800 से कम 800 - 849 850 - 899 900 - 949 950 और उससे श्यादा आँकड़े उपलब्ध नहीं राष्ट्रीय अनुपात 914 ;2011 की जनगणनाद्ध सन् 2001 में चार राज्य ऐसे थे जहाँ प्रति हशार पुरुषों पर स्ित्रायों की संख्या 800 से भी कम थी। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में स्िथति बड़ी गंभीर है। इन राज्यों में बाल लिंग - अनुपात तेशी से घटा है। इन राज्यों में प्रति हशार बालकों पर बालिकाओं की संख्या 800 से भी कम थी। प्रति हशार लड़कों पर 950 से अिाक लड़कियों की संख्या वाले िालों की संख्या 1991 के मुकाबले सन् 2001 में और कम हो गइर् मम्मी हरदम बाहर वालों से कहती है: फ्मैं काम नहीं करती। मैं तो हाउसवाइपफ हँू।य् पर मैं देखती हूँ कि वह लगातार काम करते रहती है। अगर वह जो करती है उसे काम नहीं कहते तो पिफर काम किसे कहते हैं? पितृ - प्रधानः इसका शाब्िदक अथर् तो पिता का शासन है पर इस पद का प्रयोग महिलाओं की तुलना में पुरुषों को श्यादा महत्व, श्यादा शक्ित देने वाली व्यवस्था के लिए भी किया जाता है। यह मानचित्रा माप पर आधरित नहीं है। औसत 19ण्7 आॅक्सपेफम जी.बीविश्व के विभ्िान्न क्षेत्रों की राष्ट्रीय संसदों में महिलाओं की संख्या ;ःद्ध विश्व का45 40 35 30 25 20 15 भारत में महिलाओं का 10 प्रतिनििात्व बहुत कम है। क्या 5 आप इसके वुफछ कारण बता 0 नाडिर्क देश अमरीका ;उत्तरी यूरोपऽ सहारा मरूस्थल एश्िाया पैसेपिफक अरब मुल्क भारतसकते हैं? क्या आप मानते हैं और दक्ष्िाणीद्ध के दक्ष्िाणवतीर् कि अमरीका और यूरोप में देश क्षेत्रामहिलाओं का प्रतिनििात्व इस ऽयूरोप - ओ.एस.सी.इर्. ;आॅगेर्नाइजेशन पफाॅर सिक्युरिटी एंड कोआॅपरेशन इन यूरोपद्धः नाॅ£डक देशों ;डेनमावर्फ, पिफनलैंड, आइसलैंड, नाॅवेर् और स्वीडनद्ध को छोड़कर ओ.एस.सी.इर्. के सदस्य देश।स्तर तक पहुँच गया है कि टिप्पणी: यह आँकड़े 31 दिसंबर 2011 तक प्रत्यक्ष निवार्चित सदनों में महिलाओं के प्रतिशत की स्िथति बताते हैं।उसे संतोषजनक कहा जा स्रोत: ूूूण्पचनण्वतहध्ूउद.मध्ूवतसकण्ीजउ सके? की तुलना में रोशाना एक घंटा श्यादा काम करती है पर उसको श्यादातर काम के लिए पैसे नहीं मिलते इसलिए अक्सर उसके काम को मूल्यवान नहीं माना जाता। ऽ समान मशदूरी से संबंिात अिानियम में कहा गया है कि समान काम के लिए समान मजदूरी दी जाएगी। बहरहाल, काम के हर क्षेत्रा में यानी खेल - वूफद की दुनिया से लेकर सिनेमा के संसार तक और कल - कारखानों से लेकर खेत - खलिहान तक महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम मशदूरी मिलती है, भले ही दोनों ने समान काम किया हो। ऽ भारत के अनेक हिस्सों में माँ - बाप को सिप़्ार्फ लड़के की चाह होती है। लड़की को जन्म लेने से पहले ही खत्म कर देने के तरीके इसी मानसिकता से पनपते हैं। इससे देश का लिंग अनुपात ¹प्रति हशार लड़कों पर लड़कियों की संख्याह् गिरकर 914 रह गया है। साथ लगा नक्शा बताता है कि कइर् जगहों पर यह अनुपात गिरकर 850 और कहीं - कहीं तो 800 से भी नीचे चला गया है। महिलाओं के उत्पीड़न, शोषण और उन पर होने वाली हिंसा की खबरें हमें रोश पढ़ने को मिलती हैं। शहरी इलाके तो महिलाओं के लिए खास तौर से असुरक्ष्िात हैं। वे अपने घरों में भी सुरक्ष्िात नहीं हैं क्यांेकि वहाँ भी उन्हें मारपीट तथा अनेक तरह की घरेलू हिंसा झेलनी पड़ती है। महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिध्ित्व ये कोइर् छुपी हुइर् बात नहीं है कि औरतों की भलाइर् या उनके साथ समान व्यवहार वाले मुद्दों पर पयार्प्त ध्यान नहीं दिया जाता। इसी के चलते विभ्िान्न नारीवादी समूह और महिला आंदोलन इस निष्कषर् पर पहुँचे हंै कि जब तक औरतों का सत्ता पर नियंत्राण नहीं होगा तब तक इस समस्या का निपटारा नहीं हो सकता। इस लक्ष्य को हासिल करने का एक तरीका यह है कि जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनििायों में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाइर् जाए। भारत की विधायिका में महिला प्रतिनिध्ियों का अनुपात बहुत ही कम है। जैसे, लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या पहली बार 2009 में दस पफीसदी पार कर सकी है। राज्यों.की विधान सभाओं में उनका प्रतिनििात्व 5 पफीसदी से भी कम है। इस मामले में भारत का नंबर दुनिया के देशों में कापफी नीचे है़इस समस्या को सुलझाने का एक तरीका तो निवार्चित संस्थाओं में महिलाओं के लिए कानूनी रूप से एक उचित हिस्सा तय कर देना है। भारत में पंचायती राज के अंतगर्त वुफछ ऐसी ही व्यवस्था की गइर् है। स्थानीय सरकारों यानी पंचायतों और नगरपालिकाओं में एक तिहाइर् पद महिलाओं के लिए आरक्ष्िात कर दिए गए हैं। आज भारत के ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों में निवार्चित महिलाओं की संख्या 10 लाख से श्यादा है। महिला संगठनों और कायर्कत्तार्ओं की माँग है कि लोक सभा और राज्य विधान सभाओं की भी एक तिहाइर् सीटें महिलाओं के लिए आरक्ष्िात कर देनी चाहिए। संसद में इस आशय का एक विधेयक पेश भी किया गया था पर दस वषो± से श्यादा अविा से वह लटका पड़ा है। सभी राजनीतिक पाटिर्याँ इस विधेयक को लेकर एकमत नहीं हैं और यह पास नहीं हो सका है। लैंगिक विभाजन इस बात की एक मिसाल है कि वुफछ खास किस्म के सामाजिक विभाजनों को राजनीतिक रूप देने की शरूरत है। इससे यह भी पता चलता है कि जब सामाजिक ¹देखें पृष्ठ - 44 का बाॅक्सह्। भारत इस मामले विभाजन एक राजनीतिक मुद्दा बन जाता है तो में अप्रफीका और लातिन अमरीका के कइर् विकासशील देशों से भी पीछे है। कभी - कभार कोइर् महिला प्रधानमंत्राी या मुख्यमंत्राी की वुफसीर् तक आ गइर् है पर मंत्रिामंडलों में पुरुषों का ही वचर्स्व रहा है। वंचित समूहों को किस तरह लाभ होता है। क्या आपको लगता है कि अगर महिलाओं से भेदभाव भरे व्यवहार का मसला राजनीतिक तौर पर न उठता तो उनको लाभ मिल पाना संभव था? से सहमत हैं? धमर्, सांप्रदायिकता और राजनीति पारिवारिक कानून: विवाह, तलाक, गोद लेना और उत्तराध्िकार जैसे परिवार से जुड़े मसलों से संबंिात कानून। हमारे देश में सभी धमो± के लिए अलग - अलग पारिवारिक कानून हंै। आइए, अब एकदम अलग किस्म के सामाजिक विभाजन की चचार् करें यानी धामिर्क अंतरों पर आधारित विभाजन की। यह विभाजन लैंगिक विभाजन जैसा सावर्भौम तो नहीं है पर विश्व में धामिर्क विभ्िान्नता आज बड़ी व्यापक हो चली है। भारत समेत अनेक देशों में अलग - अलग धमो± को मानने वाले लोग रहते हैं पर, जैसा कि हमने उत्तरी आयरलैंड के मामले में देखा, अगर लोग एक धमर् को मानें लेकिन उनकी पूजा - प(ति और मान्यताएँ अलग - अलग हों तब भी गंभीर मतभेद पैदा हो जाते हैं। लैंगिक विभाजन के विपरीत धामिर्क विभाजन अक्सर राजनीति के मैदान में अभ्िाव्यक्त होता है। शरा इन बातों पर गौर करंे: ऽ गांधी जी कहा करते थे कि धमर् को कभी भी राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता। धमर् से उनका मतलब हिंदू या इस्लाम जैसे धमर् से न होकर नैतिक मूल्यों से था जो सभी धमो± से जुड़े हंै। उनका मानना था कि राजनीति धमर् द्वारा स्थापित मूल्यों से निदेर्श्िात होनी चाहिए। ऽ अपने देश के मानवािाकार समूहों का कहना है कि इस देश में सांप्रदायिक दंगों मंे मरने वाले श्यादातर लोग अल्पसंख्यक समुदायों के हैं। उनकी माँग है कि सरकार अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए विशेष कदम उठाए। ऽ महिला - आंदोलन का कहना है कि सभी धमो± में वण्िार्त पारिवारिक कानून महिलाओं से भेदभाव करते हैं। इस आंदोलन की माँग है कि सरकार को इन कानूनों को समतामूलक बनाने के लिए उनमें बदलाव करने चाहिए। ये सभी मामले धमर् और राजनीति से जुड़े हैं पर ये बहुत गलत या खतरनाक भी नहीं लगते। विभ्िान्न धमो± से निकले विचार, आदशर् और मूल्य राजनीति में एक भूमिका निभा सकते हैं। लोगों को एक धामिर्क समुदाय के तौर पर अपनी शरूरतांे, हितों ओर माँगों को राजनीति में उठाने का अिाकार होना चाहिए। जो लोग राजनीतिक सत्ता में हों उन्हें धमर् के कामकाज पर नशर रखनी चाहिए और अगर वह किसी के साथ भेदभाव करता है या किसी के दमन में सहयोगी की भूमिका निभाता है तो इसे रोकना चाहिए। अगर शासन सभी धमो± के साथ समान बरताव करता है तो उसके ऐसे कामों में कोइर् बुराइर् नहीं है। सांप्रदायिकता समस्या तब शुरू होती है जब धमर् को राष्ट्र का आधार मान लिया जाता है। पिछले अध्याय का उत्तरी आयरलैंड का उदाहरण राष्ट्रवाद की ऐसी ही अवधारणा से जुड़े खतरों को दिखाता है। समस्या तब और विकराल हो जाती है जब राजनीति में धमर् की अभ्िाव्यक्ित एक समुदाय की विश्िाष्टता के दावे और पक्षपोषण का रूप लेने लगती है तथा इसके अनुयायी दूसरे धमार्वलंबियों के ख्िालाप़्ाफ मोचार् खोलने लगते हैं। ऐसा तब होता है जब एक धमर् के विचारों को दूसरे से श्रेष्ठ माना जाने लगता है और कोइर् एक धामिर्क समूह अपनी माँगों को दूसरे समूह के विरोध में खड़ा करने लगता है। इस प्रिया में जब राज्य अपनी सत्ता का इस्तेमाल किसी एक धमर् के पक्ष में करने लगता है तो स्िथति और विकट होने लगती है। राजनीति से धमर् को इस तरह जोड़ना ही सांप्रदायिकता है। सांप्रदायिक राजनीति इस सोच पर आधरित होती है कि धमर् ही सामाजिक समुदाय का निमार्ण करता है। इस मान्यता के अनुवूफल सोचना सांप्रदायिकता है। इस सोच के अनुसार एक खास धमर् में आस्था रखने वाले लोग एक ही समुदाय के होते हैं। उनके मौलिक हित एक जैसे होते हैं तथा समुदाय के लोगों के आपसी मतभेद सामुदायिक जीवन में कोइर् अहमियत नहीं रखते । इस सोच में यह बात भी शामिल है कि किसी अलग धमर् को मानने वाले लोग दूसरे सामाजिक समुदाय का हिस्सा नहीं हो सकतेऋ अगर विभ्िान्न धमो± के लोगों वफी सोच में कोइर् समानता दिखती है तो यह ऊपरी और बेमानी होती है। अलग - अलग ध्मो± के लोगों के हित तो अलग - अलग होंगे ही और उनमें टकराव भी होगा। सांप्रदायिक सोच जब श्यादा आगे बढ़ती है तो उसमंे यह विचार जुड़ने लगता है कि दूसरे धमो± के अनुयायी एक ही राष्ट्र में समान नागरिक के तौर पर नहीं रह सकते। इस मानसिकता के अनुसार या तो एक समुदाय के लोगों को दूसरे समुदाय के वचर्स्व में रहना होगा या पिफर उनके लिए अलग राष्ट्र बनाना होगा। यह मान्यता बुनियादी रूप से गलत है। एक धमर् के लोगों के हित और उनकी आकांक्षाएँ हर मामले में एक जैसी हों - यह संभव नहीं है। हर व्यक्ित कइर् तरह की भूमिका निभाता है। उसकी हैसियत और पहचान अलग - अलग होती है। हर समुदाय में तरह - तरह के विचार के लोग होते हैं। इन सभी को अपनी बात कहने का अिाकार है इसलिए एक धमर् से जुड़े सभी लोगों को किसी गैर - धामिर्क संदभर् में एक करके देखना उस समुदाय की विभ्िान्न आवाशों को दबाना है। सांप्रदायिकता राजनीति में अनेक रूप धारण कर सकती है: ऽ सांप्रदायिकता की सबसे आम अभ्िाव्यक्ित दैनंदिन जीवन में ही दिखती है। इनमें धामिर्क पूवार्ग्रह, धामिर्क समुदायों के बारे में बनी बनाइर् धारणाएँ और एक धमर् को दूसरे धमर् से श्रेष्ठ मानने की मान्यताएँ शामिल हैं। ये चीशें इतनी आम हैं कि अक्सर हम उन पर ध्यान तक नहीं देते जबकि ये हमारे अंदर ही बैठी होती हैं। ऽ सांप्रदायिक सोच अक्सर अपने धमिर्क समुदाय का राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने के प्ि़ाफराक में रहती है। जो लोग बहुसंख्यक समुदाय के होते हैं उनकी यह कोश्िाश बहुसंख्यकवाद का रूप ले लेती है। जो अल्पसंख्यक समुदाय के होते हैं उनमें यह विश्वास अलग राजनीतिक इकाइर् बनाने की इच्छा का रूप ले लेता है। मैं अक्सर दूसरे धमर् के लोगों के बारे में चुटवुफले सुनाता हूँ। क्या इससे मैं भी सांप्रदायिक बन जाता हूँ? ऽ सांप्रदायिक आधार पर राजनीतिक गोलबंदी सांप्रदायिकता का दूसरा रूप है। इसमें धमर् के पवित्रा प्रतीकों, धमर्गुरुओं, भावनात्मक अपील और अपने ही लोगों के मन में डर बैठाने जैसे तरीकों का उपयोग बहुत आम है। चुनावी राजनीति में एक धमर् के मतदाताओं की भावनाओं या हितों की बात उठाने जैसे तरीके अक्सर अपनाए जाते हैं। ऽ कइर् बार सांप्रदायिकता सबसे गंदा रूप लेकर संप्रदाय के आधार पर हिंसा, दंगा और नरसंहार कराती है। विभाजन के समय भारत और पाकिस्तान में भयावह सांप्रदायिक दंगे हुए थे। आशादी के बाद भी बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा हुइर् है। धमर्निरपेक्ष शासन सांप्रदायिकता हमारे देश के लोकतंत्रा के लिए एक बड़ी चुनौती रही है। हमारे संविधान निमार्ता इस चुनौती के प्रति सचेत थे। इसी कारण उन्होंने धमर्निरपेक्ष शासन का माॅडल चुना और इसी आधार पर संविधान में अनेक प्रावधान किए गए इनके बारे में हम पिछले साल पढ़ चुके हैं। ऽ भारतीय राज्य ने किसी भी धमर् को राजकीय धमर् के रूप में अंगीकार नहीं किया है। श्रीलंका में बौ( धमर्, पाकिस्तान में इस्लाम और इंग्लैंड में इर्साइर् धमर् का जो दजार् रहा है उसके विपरीत भारत का संविधन किसी धमर् को विशेष दजार् नहीं देता। ऽ संविधान सभी नागरिकोें और समुदायों को किसी भी धमर् का पालन करने और प्रचार करने की आशादी देता है। ऽ संविधान धमर् के आधार पर किए जाने वाले किसी तरह के भेदभाव को अवैधनिक घोष्िात करता है। लोकतांत्रिाक राजनीति ऽ इसके साथ ही संविधान धामिर्क समुदायों में समानता सुनिश्िचत करने के लिए शासन को धामिर्क मामलों में दखल देने का अिाकार देता है। जैसे, यह छुआछूत की इजाशत नहीं देता। इस हिसाब से देखें तो धमर्निरपेक्षता वुफछ पाटिर्यों या व्यक्ितयों वफी एक विचारधारा भर नहीं है। यह विचार हमारे संविधान की बुनियाद है। सांप्रदायिकता भारत में सिप़्ार्फ वुफछ लोगों के लिए ही एक खतरा नहीं है। यह भारत की बुनियादी अवधारणा के लिए एक चुनौती है, एक खतरा है। हमारी तरह का धमर्निरपेक्ष संविधान शरूरी चीश है पर अकेले इसी के बूते सांप्रदायिकता का मुकाबला नहीं किया जा सकता। हमें अपने दैनंदिन जीवन में सांप्रदायिक पूवार्ग्रहों और दुष्प्रचारों का मुकाबला करना होगा तथा धमर् पर आधरित गोलबंदी का मुकाबला राजनीति के दायरे में करने की शरूरत है। जाति और राजनीति हमने राजनीति में सामाजिक विभाजन की दो अभ्िाव्यक्ितयाँ देखीं। इनमें एक मोटे तौर पर सकारात्मक या लाभदायक है तो दूसरी नकारात्मक या नुकसानदेह। आइए, अब अंतिम प्रमुख विभाजन - यानी जाति और राजनीति की चचार् करें इसके सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों ही पक्ष हैं। जातिगत असमानताएँ लिंग और धमर् पर आधारित विभाजन तो दुनिया भर मंे हंै पर जाति पर आधारित विभाजन सिपर्फ भारतीय समाज में ही देखने ़को मिलता है। सभी समाजों में वुफछ सामाजिक असमानताएँ और एक न एक तरह का श्रम का विभाजन मौजूद होता है। अिाकतर समाजों में पेशा परिवार की एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाता है। लेकिन जाति व्यवस्था इसका एक अतिवादी और स्थायी रूप है। अन्य समाजों में मौजूद असमानताओं से यह एक खास अथर् में भ्िान्न है। इसमें पेशा के वंशानुगत विभाजन को रीति - रिवाजों की मान्यता प्राप्त है। एक जाति समूह के लोग एक या मिलते - जुलते पेशों के तो होते ही हैं साथ ही उन्हें एक अलग सामाजिक समुदाय के रूप में भी देखा जाता है। उनमें आपस में ही बेटी - रोटी अथार्त शादी और खानपान का संबंध रहता है। अन्य जाति समूहों में उनके बच्चों की न तो शादी हो सकती है न महत्वपूणर् पारिवारिक और सामुदायिक आयोजनों में उनकी पाँत मंे बैठकर दूसरी जाति के लोग भोजन कर सकते हैं। वणर् - व्यवस्था अन्य जाति - समूहों से भेदभाव और उन्हें अपने से अलग मानने की धारणा पर आधारित है। इसमें ‘अंत्यज’ जातियों के साथ छुआछूत का व्यवहार किया जाता था। इसकी चचार् हमने 9वीं कक्षा में की थी। यही कारण है कि ज्योतिबा पुफले, महात्मा गांधी, डाॅ. आंबेडकर और पेरियार रामास्वामी नायकर जैसे राजनेताओं और समाज सुधरकों ने जातिगत भेदभाव से मुक्त समाज व्यवस्था बनाने की बात की और उसके लिए काम किया। अजीत नीनन, द टाइम्स आॅपफ इंडिया वणर् - व्यवस्था: जाति समूहों का पदानुव्रफम जिसमें एक जाति के लोग हर हाल में सामाजिक पायदान मंे सबसे ऊपर रहेंगे तो किसी अन्य जाति समूह के लोग व्रफमागत के रूप से उनके नीचे। लोकतांत्रिाक राजनीति भारत की सामाजिक और धामिर्क विविधता जनगणना में प्रत्येक दस साल बाद सभी नागरिकों के धमर् को भी दजर् किया जाता है। जनगणना विभाग के आदमी घर - घर जाकर लोगों से उनके बारे में सूचनाएँ जुटाते हैं। धमर् समेत सभी बातों के बारे में लोग जो वुफछ बताते हैं, ठीक वैसा ही पफामर् में दजर् किया जाता है। अगर कोइर् कहता है कि वह नास्ितक है या किसी धमर् को नहीं मानता तो पफामर् में भी इसे वैसे ही दजर् कर दिया जाता है। इस कारण देश में विभ्िान्न धमो± को मानने वाले लोगों की संख्या और उनके अनुपात में आए किसी बदलाव के बारे में हमारे पास विश्वसनीय सूचनाएँ हैं। नीचे दिए गए पाइर् चाटर् से देश के छह प्रमुख धामिर्क समुदायों की आबादी के अनुपात का पता चलता है। आशादी के बाद से प्रत्येक धामिर्क समूह की आबादी तो काप़्ाफी बढ़ी है पर वुफल आबादी मंे उनका अनुपात श्यादा नहीं बदला है। प्रतिशत के हिसाब से देखें तो 1961 के बाद से हिंदू, जैन और इर्साइर् समुदाय का हिस्सा मामूली रूप से घटा है जबकि मुसलमान, सिख और बौ(ों का हिस्सा मामूली रूप से बढ़ा है। एक आम लेकिन भ्रांत धारणा यह है कि देश की आबादी में मुसलमानों का प्रतिशत इतना बढ़ जाएगा कि दूसरे धमर् - समुदाय उससे पीछे हो जाएँगे। प्रधानमंत्राी द्वारा नियुक्त उच्चस्तरीय समिति ;इसे सच्चर समिति के नाम से जाना गयाद्ध के आकलन से स्पष्ट होता है कि मुस्िलम आबादी का अनुपात थोड़ा शरूर बढ़ेगा लेकिन अगले पचास सालों में भी यह बढ़वार 3 - 4 प्रतिशत तक ही रहेगी। इससे साबित होता है कि एक व्यापक पफलक पर विभ्िान्न धमर् समुदायों के अनुपात में कोइर् बड़ा उलट - पेफर नहीं होने वाला। यही बात प्रमुख जाति समूहों पर भी लागू होती है। जनगणना में सिपर्फ दो विश्िाष्ट समूहों: अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियोें की गिनती अलग से दजर् की जाती है। इन दोनों बड़े समूहों में ऐसी सैंकड़ों जातियाँ और आदिवासी समूह शामिल हंै जिनके नाम सरकारी अनुसूची में दजर् हंै। इसी के चलते इनके नाम के साथ ‘अनुसूचित’ शब्द लगाया गया है। अनुसूचित जातियों में, जिन्हें आम तौर पर दलित कहा जाता है, सामान्यतः वे हिंदू जातियाँ आती हैं जिन्हें हिंदू सामाजिक व्यवस्था मंे अछूत माना जाता था। इन जातियों के साथ भेदभाव किया जाता था और इन्हें तिरस्कार की दृष्िट से देखा जाता था। अनुसूचित जनजातियों में जिन्हें आमतौर पर आदिवासी कहा जाता है, वे समुदाय शामिल हैं जो अमूमन पहाड़ी और जंगली इलाकों में रहते हैं और जिनका बाकी समाज से श्यादा मेल - जोल नहीं था। 2001 में, देश की आबादी मंें अनुसूचित जातियों का हिस्सा 16.2 प़्ाफीसदी और अनुसूचित जनजातियों का हिस्सा 8.2 प़्ाफीसदी था। जनगणना में अभी तक अन्य पिछड़ी जातियों की गिनती नहीं की जाती। इनकी चचार् हमने 9वीं कक्षा भारत में विभ्िान्न धामिर्क समूहों की आबादी,में की थी। पूरे देश में इनकी आबादी कितनी है - इस बात को लेकर कोइर् एक स्पष्ट अनुमान नहीं 2001 है। राष्ट्रीय नमूना सवेर्क्षण, 2004 - 05 का अनुमान हिंदू है कि इनकी आबादी करीब 41 पफीसदी है। इस 80ण्5ः प्रकार मुल्क की आबादी में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ी जातियों मुसलमानका हिस्सा लगभग दो तिहाइर् तथा हिंदुओं की 13ण्4ः आबादी का लगभग तीन - चैथाइर् है। अन्य 1ण्9ः अन्य में शामिल हैं - बौ(.0ण्8ःए जैन.0ण्4ःए इर्साइर् 2ण्3ः अन्य धमर् .0ण्6ःए कोइर् धमर् नहीं.0ण्1ः सिख1ण्9ः स्रोत: जनगणना, 2001 इन महापुरुषों के प्रयासों और सामाजिक - आथ्िार्क बदलावों के चलते आधुनिक भारत में जाति की संरचना और जाति व्यवस्था में भारी बदलाव आया है। आथ्िार्क विकास, शहरीकरण, साक्षरता और श्िाक्षा के विकास, पेशा चुनने की आशादी और गाँवों में शमींदारी व्यवस्था के कमशोर पड़ने से जाति व्यवस्था के पुराने स्वरूप और वणर् व्यवस्था पर टिकी मानसिकता में बदलाव आ रहा है। शहरी इलाकों में तो अब श्यादातर इस बात का कोइर् हिसाब नहीं रखा जाता कि ट्रेन या बस में आपके साथ कौन बैठा है या रेस्तराँ में आपकी मेश पर बैठकर खाना खा रहे आदमी की जाति क्या है? संविधन में किसी भी तरह के जातिगत भेदभाव का निषेध किया गया है। संविधान ने जाति व्यवस्था से पैदा हुए अन्याय को समाप्त करने वाली नीतियों का आधार तय किया है। अगर सौ साल पहले का कोइर् व्यक्ित एक बार पिफर भारत लौटकर आए तो यहाँ हुए बदलावों को देखकर हैरान रह जाएगा। बहरहाल, समकालीन भारत से जाति प्रथा विदा नहीं हुइर् है। जाति व्यवस्था के वुफछ पुराने पहलू अभी भी बरकरार हैं। अभी भी श्यादातर लोग अपनी जाति या कबीले में ही शादी करते हैं। स्पष्ट संवैधनिक प्रावधान के बावजूद छुआछूत की प्रथा अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुइर् है। जाति व्यवस्था के अंतगर्त सदियों से वुफछ समूहों को लाभ की स्िथति में तो वुफछ समूहों को दबाकर रखा गया है। इसका प्रभाव सदियों बाद आज तक नशर आता है। जिन जातियों में पहले से ही पढ़ाइर् - लिखाइर् का चलन मौजूद था और जिनकी श्िाक्षा पर पकड़ थी, आध्ुनिक श्िाक्षा व्यवस्था में भी उन्हीं का बोलबाला है। जिन जातियों को पहले श्िाक्षा से वंचित रखा जाता था उनके सदस्य अभी भी स्वाभाविक तौर पर पिछड़े हुए हैं। यही कारण है कि शहरी मध्यम वगर् में अगड़ी जाति के लोगों का अनुपात असामान्य रूप से काप़्ाफी श्यादा है। जाति और आथ्िार्क हैसियत में काप़्ाफी निकट मुझे अपनी जाति की परवाह नहीं रहती। हम पाठ्यपुस्तक मंे इसकी चचार् क्यों कर रहे हैं? क्या हम जाति पर चचार् करके जातिवाद को बढ़ावा नहीं दे रहे हैं? का संबंध है। ¹जातिगत असमानताएँ शीषर्क बाॅक्स देखेंह् राजनीति में जाति सांप्रदायिकता की तरह जातिवाद भी इस मान्यता पर आधारित है कि जाति ही सामाजिक समुदाय के गठन का एकमात्रा आधार है। इस चिंतन प(ति के अनुसार एक जाति के लोग एक स्वाभाविक सामाजिक समुदाय का निमार्ण करते हैं और उनके हित एक जैसे होते हैं तथा दूसरी जाति के लोगों से उनके हितों का कोइर् मेल नहीं होता। जैसा कि हमने सांप्रदायिकता के मामले में देखा है, यह मान्यता हमारे अनुभव से पुष्ट नहीं होती। हमारे अनुभव बताते हैं कि जाति हमारे जीवन का एक पहलू शरूर है लेकिन यही एकमात्रा या सबसे श्यादा महत्वपूणर् पहलू नहीं है। राजनीति में जाति अनेक रूप ले सकती है - ऽ जब पाटिर्याँ चुनाव के लिए उम्मीदवारों के नाम तय करती हैं तो चुनाव क्षेत्रा के मतदाताओं की जातियों का हिसाब ध्यान में रखती हंै ताकि उन्हें चुनाव जीतने के लिए शरूरी वोट मिल जाए। जब सरकार का गठन किया जाता है तो राजनीतिक दल इस बात का ध्यान रखते हैं कि उसमें विभ्िान्न जातियों और कबीलों के लोगों को उचित जगह दी जाए। अब तुम्हें यह पसंद नहीं आ रहा है! क्या तुम्हीं ने नहीं कहा था कि जहाँ भी प्रभुत्व या वचर्स्व की बात आए तो हमें राजनीति विज्ञान में उसकी चचार् करनी चाहिए? क्या हमारे चुप रहने से जाति व्यवस्था समाप्त हो जाएगी? शहरीकरण: ग्रामीण इलाकों से निकलकर लोगों का शहरों में बसना। लोकतांत्रिाक राजनीति जातिगत असमानता आथ्िार्क असमानता का एक महत्वपूणर् आधार जाति भी है क्योंकि इससे विभ्िान्न संसाधनों तक लोगों की पहँुच निधार्र्िरत होती है। उदाहरण के लिए पहले ‘अछूत’ कही जाने वाली जातियों के लोगों को जमीन रखने का अिाकार नहीं था जबकि कथ्िात ‘द्विज’ जातियों को ही श्िाक्षा पाने का अिाकार था। आज जाति पर आधारित इस किस्म की औपचारिक और प्रकट असमानताएँ तो गैरकानूनी हो गइर् है पर सदियों से जिस व्यवस्था ने वुफछ समूहों को लाभ या घाटे की स्िथति में बनाए रखा है उसका संचित असर अभी भी महसूस किया जा सकता है। इतना ही नहीं, इस बीच नयी तरह की असमानताएँ भी उभरी हैं। निश्िचत रूप से जाति और आथ्िार्क हैसियत की पुरानी स्िथति में कापफी बदलाव आया है। आज ‘उँफची’ ़या ‘नीची’ किसी भी जाति में बहुत अमीर और बहुत गरीब लोग देखे जा सकते हैं। बीस या तीस वषर् पहले तक ऐसा नहीं था। तब सबसे ‘नीची’ जातियों में कोइर् अमीर आदमी बमुश्िकल ही ढूँढे़ मिलता था। पर, जैसा कि राष्ट्रीय नमूना सवेर्क्षण से स्पष्ट है - आज भी जाति आथ्िार्क हैसियत के निधार्रण में बहुत महत्वपूणर् भूमिका निभाती है: ऽ औसत आथ्िार्क हैसियत ¹जिसे मासिक खचर् जैसे हिसाबों से मापा जाता हैह् अभी भी वणर्व्यवस्था के साथ गहरा संबंध दशार्ती है यानी ‘उँफची’ जाति के लोगों की आथ्िार्क स्िथति सबसे अच्छी है। दलित तथा आदिवासियों की आथ्िार्क स्िथति सबसे खराब है, जबकि पिछड़ी जातियाँ बीच की स्िथति में हैॅ। ऽ हर जाति में गरीब लोग हैं, पर भारी दरिद्रता में ¹सरकारी गरीबी रेखा के नीचेह् जीवन बसर करने वालों में श्यादा बड़ी संख्या सबसे निचली जातियों के लोगों की है। उँफची जातियों में गरीबी का प्रतिशत सबसे कम है। इस मामले में भी पिछड़ी जातियों के लोग बीच की स्िथति में है। ऽ आज सभी जातियों में अमीर लोग हैं पर यहाँ भी उँफची जाति वालों का अनुपात बहुत श्यादा है और निचली जातियों का बहुत कम। गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करने वालों का प्रतिशत अनुपात, 1999 - 2000 जाति और समुदाय ग्रामीण शहरी अनुसूचित जनजातियाँ 45.8 35.6 अनुसूचित जातियाँ 35.9 38.3 अन्य पिछड़ी जातियाँ 27.00 29.5 मुसलमान अगड़ी जातियाँ 26.8 34.2 हिंदू अगड़ी जातियाँ 11.7 9.9 इर्साइर् अगड़ी जातियाँ 9.6 5.4 उँफची जाति के सिख 0.0 4.9 अन्य अगड़ी जातियाँ 16.0 2.7 सभी समूह 27.0 23.4 नोट: यहाँ अगड़ी जाति का मतलब उन सभी लोगों से है जो अनुसूचित जाति/जनजाति या पिछड़ी जातियांें के अंतगर्त नहीं आते। गरीबी रेखा से नीचे का मतलब है प्रति व्यक्ित प्रति माह 327 रुपए ¹ग्रामीणह् और 455 ¹शहरीह् रुपये से कम खचर् करने वाले लोग। स्रोत: राष्ट्रीय नमूना सवेर्क्षण, 55वाँ दौर, 1999 - 2000 ऽ राजनीतिक पाटिर्याँ और उम्मीदवार समथर्न हासिल करने के लिए जातिगत भावनाओं को उकसाते हैं। वुफछ दलों को वुफछ जातियों के मददगार और प्रतिनििा के रूप में देखा जाता है। ऽ सावर्भौम वयस्क मतािाकार और एक व्यक्ित - एक वोट की व्यवस्था ने राजनीतिक दलों को विवश किया कि वे राजनीतिक समथर्न पाने और लोगों को गोलबंद करने के लिए सवि्रफय हों। इससे उन जातियों के लोगों में नयी चेतना पैदा हुइर् जिन्हें अभी तक छोटा और नीच माना जाता था। राजनीति में जाति पर जोर देने के कारण कइर् बार यह धारणा बन सकती है कि चुनाव जातियों का खेल है, वुफछ और नहीं। यह बात सच नहीं है। जरा इन चीजों पर गौर कीजिएः ऽ देश के किसी भी एक संसदीय चुनाव क्षेत्रा में किसी एक जाति के लोगों का बहुमत नहीं है इसलिए हर पाटीर् और उम्मीदवार को चुनाव जीतने के लिए एक जाति और एक समुदाय से श्यादा लोगों का भरोसा हासिल करना पड़ता है। ऽ कोइर् भी पाटीर् किसी एक जाति या समुदाय के सभी लोगों का वोट हासिल नहीं कर सकती। जब लोग किसी जाति विशेष को किसी एक पाटीर् का ‘वोट बैंक’ कहते हंै तो इसका मतलब यह होता है कि उस जाति के श्यादातर लोग उसी पाटीर् को वोट देते हैं। ऽ अगर किसी चुनाव क्षेत्रा में एक जाति के लोगों का प्रभुत्व माना जा रहा हो तो अनेक पाटिर्यों को उसी जाति का उम्मीदवार खड़ा करने से कोइर् रोक नहीं सकता। ऐसे में वुफछ मतदाताओं के सामने उनकी जाति के एक से श्यादा उम्मीदवार होते हैं तो किसी - किसी जाति के मतदाताओं के सामने उनकी जाति का एक भी उम्मीदवार नहीं होता। ऽ हमारे देश में सत्तारूढ़ दल, वतर्मान सांसदों और विधायकों को अक्सर हार का सामना करना पड़ता है। अगर जातियों और समुदायों की राजनीतिक पसंद एक ही होती तो ऐसा संभव नहीं हो पाता। स्पष्ट है कि चुनाव में जाति की भूमिका महत्वपूणर् होती है ¯कतु दूसरे कारक भी इतने ही असरदार होते हैं। मतदाता अपनी जातियों से जितना जुड़ाव रखते हैं अक्सर उससे श्यादा गहरा जुड़ाव राजनीतिक दलों से रखते हैं। एक जाति या समुदाय के भीतर भी अमीर और गरीब लोगों के हित अलग - अलग होते हैं। एक ही समुदाय के अमीर और गरीब लोग अक्सर अलग - अलग पाटिर्यों को वोट देते हैं। सरकार के कामकाज के बारे में लोगों की राय और नेताओं की लोकियता का चुनावों पर अक्सर निणार्यक असर होता है। जाति के अंदर राजनीति अभी तक हमने इसी चीज पर गौर किया है कि राजनीति में जाति की क्या भूमिका होती है। पर, इसका यह मतलब नहीं है कि जाति और राजनीति के बीच सिपर्फ एकतरप़्ाफा संबंध़होता है। राजनीति भी जातियों को राजनीति के अखाड़े में लाकर जाति व्यवस्था और क्या आपको यह बात ठीक लगती है कि राजनेता किसी जाति के लोगों को अपने वोट - बैंक के रूप में देखें? अजीत नीनन - इंडिया टुडे बुक आॅप़्ाफ काटू±सलोकतांत्रिाक राजनीतिजातिगत पहचान को प्रभावित करती है। इस तरह, सिप़्ार्फ राजनीति ही जातिग्रस्त नहीं होती जाति भी राजनीतिग्रस्त हो जाती है। यह चीज अनेक रूप लेती हैः ऽ हर जाति खुद को बड़ा बनाना चाहती है। सो, पहले वह अपने समूह की जिन उप जातियों को छोटा या नीचा बताकर अपने से बाहर रखना चाहती थी अब उन्हें अपने साथ लाने की कोश्िाश करती हैं। ऽ चूँकि एक जाति अपने दम पर सत्ता पर कब्शा नहीं कर सकती इसलिए वह श्यादा राजनीतिक ताकत पाने के लिए दूसरी जातियों या समुदायों को साथ लेने की कोश्िाश करती है और इस तरह उनके बीच संवाद और मोल - तोल होता है। ऽ राजनीति में नए किस्म की जातिगत गोलबंदी भी हुइर् हैं, जैसे ‘अगड़ा’ और ‘पिछड़ा’। इस प्रकार जाति राजनीति में कइर् तरह की भूमिकाएँ निभाती है और एक तरह से यही चीशें दुनिया भर की राजनीति में चलती हैं। दुनिया भर में राजनीतिक पाटिर्याँ वोट पाने के लिए सामाजिक समूहों और समुदायों को गोलबंद करने का प्रयास करती हंै। वुफछ खास स्िथतियों में राजनीति में जातिगत विभ्िान्नताएँ और असमानताएँं वंचित और कमशोर समुदायों के लिए अपनी बातें आगे बढ़ाने और सत्ता में अपनी हिस्सेदारी माँगने की गुंजाइश भी पैदा करती हंै। इस अथर् में जातिगत राजनीति ने दलित और पिछड़ी जातियों के लोगों के लिए सत्ता तक पहँुचने तथा निणर्य प्रवि्रफया को बेहतर ढंग से प्रभावित करने की स्िथति भी पैदा की है। अनेक पाटिर्याँ और गैर - राजनीतिक संगठन खास जातियों के ख्िालाप़्ाफ भेदभाव समाप्त करने, उनके साथ श्यादा सम्मानजनक व्यवहार करने, उनके लिए शमीन - शायदाद और अवसर उपलब्ध कराने की माँग को लेकर आंदोलन करते रहे हैं। पर, इसके साथ ही यह भी सच है कि सिप़्ार्फ जाति पर जोर देना नुकसानदेह हो सकता है। जैसा कि धमर् के मसले से स्पष्ट होता है, सिप़्ार्फ जातिगत पहचान पर आधारित राजनीति लोकतंत्रा के लिए शुभ नहीं होती। इससे अक्सर गरीबी, विकास, भ्रष्टाचार जैसे श्यादा बड़े मुद्दों से लोगों का ध्यान भी भटकता है। कइर् बार जातिवाद तनाव, टकराव और हिंसा को भी बढ़ावा देता है। 1 जीवन के उन विभ्िान्न पहलुओें का िाव्रफ करंे जिनमें भारत में स्ित्रायों के साथ भेदभाव होता है या वे कमशोर स्िथति मंे होती हैं। 2 विभ्िान्न तरह की सांप्रदायिक राजनीति का ब्यौरा दें और सबके साथ एक - एक उदाहरण भी दें। 3 बताइए कि भारत में किस तरह अभी भी जातिगत असमानाताएँ जारी हंै। 4 दो कारण बताएँ कि क्यों सिप़्ार्फ जाति के आधार पर भारत में चुनावी नतीजे तय नहीं हो सकते। 5 भारत की विधायिकाओं मंे महिलाओं के प्रतिनििात्व की स्िथति क्या है? 6 किन्हीं दो प्रावधानों का जिव्रफ करें जो भारत को धमर्निरपेक्ष देश बनाते हैं। 7 जब हम लैंगिक विभाजन की बात करते हैं तो हमारा अभ्िाप्राय होता है: ;कद्ध स्त्राी और पुरुष के बीच जैविक अंतर ;खद्ध समाज द्वारा स्त्राी और पुरुष को दी गइर् असमान भूमिकाएँ ;गद्ध बालक और बालिकाओं की संख्या का अनुपात। ;घद्ध लोकतांत्रिाक व्यवस्थाओं में महिलाओं को मतदान का अिाकार न मिलना। 8 भारत में यहाँ औरतों के लिए आरक्षण की व्यवस्था है: ;कद्ध लोकसभा ;खद्ध विधानसभा ;गद्ध मंत्रिामंडल ;घद्ध पंचायती राज की संस्थाएँ 9.सांप्रदायिक राजनीति के अथर् संबंधी निम्नलिख्िात कथनों पर गौर करें। सांप्रदायिक राजनीति इस धारणा पर आधारित है कि: ;अद्ध एक धमर् दूसरों से श्रेष्ठ है। ;बद्ध विभ्िान्न धमो± के लोग समान नागरिक के रूप में खुशी - खुशी साथ रह सकते हैं। ;सद्ध एक धमर् के अनुयायी एक समुदाय बनाते हैं। ;दद्ध एक धामिर्क समूह का प्रभुत्व बाकी सभी धमो± पर कायम करने में शासन की शक्ित का प्रयोग नहीं किया जा सकता। इनमें से कौन या कौन - कौन सा कथन सही है? ;कद्ध अ, ब, स और द ;खद्ध अ, ब और द ;गद्ध अ और स ;घद्ध ब और द 10.भारतीय संविधान के बारे में इनमें से कौन सा कथन गलत है? ;कद्ध यह धमर् के आधार पर भेदभाव की मनाही करता है। ;खद्ध यह एक धमर् को राजकीय धमर् बताता है। ;गद्ध सभी लोगों को कोइर् भी धमर् मानने की आशादी देता है। ;घद्ध किसी धामिर्क समुदाय में सभी नागरिकों को बराबरी का अिाकार देता है। 11................................ पर आधारित सामाजिक विभाजन सिप़्ार्फ भारत में ही है। 12.सूची प् और सूची प्प् का मेल कराएँ और नीचे दिए गए कोड के आधार पर सही जवाब खोजें। सूची - प् सूची - प्प् 1 अिाकारों और अवसरों के मामले में स्त्राी और पुरुष की बराबरी मानने वाला व्यक्ित ;कद्ध सांप्रदायिक 2 धमर् को समुदाय का मुख्य आधार मानने वाला व्यक्ित ;खद्ध नारीवादी 3 जाति को समुदाय का मुख्य आधार मानने वाला व्यक्ित ;गद्ध धमर्निरपेक्ष 4 व्यक्ितयों के बीच धामिर्क आस्था के आधार पर भेदभाव न करने वाला व्यक्ित ;घद्ध जातिवादी 1 2 3 4 ;साद्ध ख ग क घ ;रेद्ध ख क घ ग ;गाद्ध घ ग क ख ;माद्ध ग क ख घ

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