लोकतंत्रा और विविध्ता परिचय पिछले अध्याय में हमने देखा कि भाषायी और क्षेत्राीय विविध्ताओं कोसंग - साथ लेकर चलने के लिए सत्ता का बँटवारा किया जा सकता है। लेकिन, लोगों की विश्िाष्ट पहचान सिप़्ार्फ भाषा और क्षेत्रा के आधर पर ही नहीं बनती। कइर् बार लोग अपनी पहचान और दूसरों से अपने संबंध् शारीरिक बनावट, वगर्, ध्मर्, लिंग, जाति, कबीले वगैरह के आधर पर भी परिभाष्िात करते हैं। इस अध्याय में हम देखेंगे कि किस तरह लोकतंत्रा सारी सामाजिक विभ्िान्नताओं, अंतरों और असमानताओं के बीच सामंजस्य बैठाकर उनका सवर्मान्य समाधन देने की कोश्िाश करता है। यहाँ हम सामाजिक विभाजनों की सावर्जनिक अभ्िाव्यक्ित के एक उदाहरण के जरिए अपनी बात स्पष्ट करने की कोश्िाश करेंगे। इसके बाद हम यह चचार् करेंगे कि सामाजिक विभ्िान्नता वैफसे अलग - अलग रूप धरण करती है। पिफर हम यह देखेंगे कि सामाजिक विभ्िान्नता और लोकतांत्रिाक राजनीति किस तरह एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। अध्याय 3 लोकतंत्रा और विविध्ता एÚो - अमरीकी: एप्रफो - अमरीकन, अश्वेत अमरीकी या अश्वेत शब्द उन अप्रफीकी लोगों के वंशजों के लिए प्रयुक्त होता है जिन्हें 17वीं सदी से लेकर 19वीं सदी की शुरफआत तक अमरीका में गुलाम बनाकर लाया गया था। अमरीका में नागरिक अध्िकार आंदोलन ;1954 - 1968द्धः घटनाओं और सुधर आंदोलनों का एक सिलसिला जिसका उद्देश्यएÚो - अमरीकी लोगों के विरु( होने वाले नस्ल आधरित भेदभाव को मिटाना था। माटिर्न लूथर किंग जूनियर की अगुवाइर् में लड़े गए इस आंदोलन का स्वरूप पूरी तरह अहिंसक था। इसने नस्ल के आधर पर भेदभाव करने वाले कानूनों और व्यवहार को समाप्त करने की माँग उठाइर् जो अंततः सपफल हुइर्। अश्वेत शक्ित आंदोलन: यह आंदोलन 1966 में उभरा और 1975 तक चलता रहा। नस्लवाद को लेकर इस आंदोलन का रवैया श्यादा उग्र था। इसका मानना था कि अमरीका से नस्लवाद मिटाने के लिए हिंसा का सहारा लेने में भी हशर् नहीं है। मैक्िसको ओलंपिक की कहानी इस पृष्ठ पर छपी तस्वीर अमरीका में चले नागरिक अध्िकार आंदोलन की एक प्रमुख घटना से संबंध्ित है। यह 1968 में मैक्िसको सिटी में हुए ओलंपिक मुकाबलों की 200 मीटर दौड़ के पदक समारोह की तस्वीर है। अमरीका का राष्ट्रगान बज रहा है और सिर झुकाए तथा मुट्ठी ताने हुए जो दो ख्िालाड़ी खड़े हैं, वे हैं अमरीकी धवक टाॅमी स्िमथ और जाॅन कालोर्स। ये एÚो - अमरीकी हैं। इन्होंने क्रमशः स्वणर् और कांस्य पदक जीता था। उन्होंने जूते नहीं पहने थे। सिप़्ार्फ मोशे चढ़ाए पुरस्कार लेकर दोनों ने यह जताने की कोश्िाश की कि अमरीकी अश्वेत लोग गरीब हैं। स्िमथ ने अपने गले में एक काला मप़फलर जैसा परिधन भी पहना था जो अश्वेत लोगों के आत्मगौरव का प्रतीक है। कालोर्स ने मारे गए अश्वेत लोगों की याद में काले मनकों की एक माला पहनी थी। अपने इन प्रतीकों और तौर - तरीकों से उन्होंने अमरीका में होने वाले रंगभेद के प्रति अंतरार्ष्ट्रीय बिरादरी का ध्यान खींचने की कोश्िाश की। काले दस्ताने और बँध्ी हुइर् मुटि्ठयाँ अश्वेत शक्ित का प्रतीक थीं। रजत पदक जीतने वाले आस्ट्रेलियाइर् धवक पीटर नामर्न ने पुरस्कार समारोह में अपनी जसीर् पर मानवाध्िकार का बिल्ला लगाकर इन दोनों अमरीकी ख्िालाडि़यों के प्रति अपना समथर्न जताया। क्या कालोर्स और स्िमथ द्वारा अमरीकी समाज के आंतरिक मामलों को अंतरार्ष्ट्रीय मंच पर उठाना उचित था? क्या आप उनके काम को राजनीतिक मानेंगे? पीटर नामर्न, जो न तो अमरीकी थे, न अश्वेत, क्यों इस विरोध् में शामिल हो गए? क्या आप उनकी जगह होते तो ऐसा ही करते? अंतरार्ष्ट्रीय ओलंपिक संघ ने कालोर्स और स्िमथ द्वारा राजनीतिक बयान देने की इस युक्ित को ओलंपिक भावना के विरु( विकीपीडिया और पफोटो िलकर डाॅट काॅम केविन बताते हुए उन्हें दोषी करार दिया और उनके पदक वापस ले लिए गए। नामर्न को भी अपने प़फसले की कीमत चुकानी पड़ी ैऔर अगले ओलंपिक में उन्हें आस्ट्रेलिया की टीम में जगह नहीं दी गइर् पर इनके प़्ौफसलों ने अमरीका में बढ़ते नागरिक अध्िकार आंदोलन के प्रति दुनिया का ध्यान खींचने में सपफलता पाइर्। हाल में ही सैन होश स्टेट यूनिवसिर्टी ने, जहाँ इन दोनों ने पढ़ाइर् की थी, इन दोनों का अभ्िानंदन किया और विश्वविद्यालय के भीतर उनकी मूतिर् लगवाइर्। जब 2006 में नामर्न की मौत हुइर् तो उनकी अरथी को कंध देने वालों में स्िमथ और कालोर्स भी थे। वुफछ दलित समूहों ने 2001 में डरबन में हुए संयुक्त राष्ट्र के नस्लभेद विरोध्ी सम्मेलन में हिस्सा लेने का पैफसला किया और माँग की कि सम्मेलन की कायर्सूची़में जातिभेद को भी रखा जाए। इस पैफसले पर ये तीन प्रतिियाएँ सामने आईं:़अमनदीप कौर ;सरकारी अध्िकारीद्ध: हमारे संविधन में जातिगत भेदभाव को गैर - कानूनी करार दिया गया है। अगर कहीं - कहीं जातिगत भेदभाव होता है तो यह हमारा आंतरिक मामला है और इसे प्रशासनिक अक्षमता के रूप में देखा जाना चाहिए। मैं इसे अंतरार्ष्ट्रीय मंच पर उठाए जाने के ख्िालापफ हूँ।़ओइनम ;समाजशास्त्राीद्ध: जाति और नस्ल एक जैसे सामाजिक विभाजन नहीं हैं इसलिए मैं इसके ख्िालापफ़हूँ। जाति का आधर सामाजिक है जबकि नस्ल का आधर जीवशास्त्राीय होता है। नस्लवाद विरोध्ी सम्मेलन में जाति के मुद्दे को उठाना दोनों को समान मानने जैसा होगा। अशोक ;दलित कायर्कतार्द्ध: किसी मुद्दे को आंतरिक मामला कहना दमन और भेदभाव पर खुली चचार् को रोकना है। नस्ल विशु( रूप से जीवशास्त्राीय नहीं है, यह जाति की तरह ही़मैं पाकिस्तानी लड़कियोंकापफी हद तक समाजशास्त्राीय और वैधनिक वगीर्करण है। इस सम्मेलन में जातिगत भेदभाव का की एक टोली से मिलीमसला शरूर उठाना चाहिए। और मुझे लगा कि अपने इनमें से किस राय को आप सबसे सही मानते हैं? कारण बताइए। ही देश के दूसरे हिस्सों की लड़कियों की तुलना में वे मुझसेे श्यादा समानता रखती हैं, क्या इसे राष्ट्र - विरोध्ी मेल कहासमानताएँ, असमानताएँ और विभाजन जाएगा? ऊपर दिए गए उदाहरण में ख्िालाड़ी विभाजन क्षेत्राीय और सामाजिक, दोनों सामाजिक बँटवारे और सामाजिक भेदभाव स्तरों पर मौजूद था। बेल्िशयम में अलग - अलग का अपने तरीके से विरोध् कर रहे थे। इलाकों में रहने वाले लोग अलग - अलग पर क्या ऐसा भेदभाव सिप़्ार्फ नस्ल या रंग भाषाएँ बोलते हैं। श्रीलंका में यह बँटवारा के आधर पर ही होता है? पिछले दो भाषा और क्षेत्रा दोनों आधरों पर दिखाइर् अध्यायों में हमने सामाजिक बँटवारे के देता है। इस प्रकार हर समाज में सामाजिक वुफछ अन्य स्वरूपों को देखा था। उदाहरण विविध्ता अलग - अलग रूप में सामने के लिए बेल्िशयम और श्रीलंका में यह आती है। लोकतांत्रिाक राजनीतिएरेस - केगल काटू±स सामाजिक भेदभाव की उत्पिा सामाजिक विभाजन अध्िकांशतः जन्म पर आधरित होता है। सामान्य तौर पर अपना समुदाय चुनना हमारे वश में नहीं होता। हम सिपर्फ इस आधर पर किसी खास समुदाय़के सदस्य हो जाते हैं कि हमारा जन्म उस समुदाय के एक परिवार में हुआ होता है। जन्म पर आधरित सामाजिक विभाजन का अनुभव हम अपने दैनिक जीवन में लगभग रोश करते हैं। हम अपने आस - पास देखते हैं कि चाहे कोइर् स्त्राी हो या पुरुष, लंबा हो या छोटा - सबकी चमड़ी का रंग अलग - अलग है, उनकी शारीरिक क्षमताएँ या अक्षमताएँ अलग - अलग हैं। बहरहाल, सभी किस्म के सामाजिक विभाजन सिप़्ार्फ जन्म पर आधरित नहीं होते। वुफछ चीशें हमारी पसंद या चुनाव के आधर पर भी तय होती हैं। कइर् लोग हर सामाजिक विभ्िान्नता सामाजिक विभाजन का रूप नहीं लेती। सामाजिक विभ्िान्नताएँ लोगों के बीच बँटवारे का एक बड़ा कारण होती शरूर हैं लेकिन यही विभ्िान्नताएँ कइर् बार अलग - अलग तरह के लोगों के बीच पुल का काम भी करती हैं। विभ्िान्न सामाजिक समूहों के लोग अपने समूहों की सीमाओं से परे भी समानताओं और असमानताओं का अनुभव करते हैं। जो उदाहरण पहले दिया गया है उसमें कालोर्स और स्िमथ तो एक हिसाब से समान थे;दोनों एÚो अमरीकी थेद्ध जबकि नामर्न श्वेत थे। पर इन तीनों में एक समानता थी कि वे सभी नस्ल आधरित भेदभाव के ख्िालाप़्ाफ थे। अक्सर यह देखा जाता है कि एक ध्मर् को मानने वाले लोग खुद को एक ही समुदाय का सदस्य नहीं मानते क्योंकि उनकी जाति या उनका पंथ अलग होता है। यह भी संभव है कि अलग - अलग ध्मर् के अनुयायी होकर भी एक जाति वाले लोग खुद को एक - दूसरे के श्यादा करीब महसूस करें। एक ही परिवार के अमीर और गरीब श्यादा घनिष्ठ संबंध् नहीं रख पाते क्योंकि सभी अलग - अलग तरीके से सोचने लगते हैं। इस प्रकार हम सभी की एक से श्यादा पहचान होती है। इसी तरह लोग एक से श्यादा सामाजिक समूहों का हिस्सा हो सकते हैं। दरअसल हर संदभर् मंे हमारी पहचान एक अलग रूप धरण करती है। विभ्िान्नताओं में सामंजस्य और टकराव सामाजिक विभाजन तब होता है जब वुफछ सामाजिक अंतर दूसरी अनेक विभ्िान्नताओं से ऊपर और बड़े हो जाते हैं। अमरीका में श्वेत और अश्वेत का अंतर एक सामाजिक विभाजन भी बन जाता है क्योंकि अश्वेत लोग आमतौर पर गरीब हैं, बेघर हैं, भेदभाव का श्िाकार हैं। हमारे देश में भी दलित आमतौर पर गरीब और भूमिहीन हैं। उन्हें अप्रकटरंगभेदभी अक्सर भेदभाव और अन्याय का श्िाकार होना पड़ता है। जब एक तरह का सामाजिक अंतर अन्य अंतरों से श्यादा महत्वपूणर् बन जाता है और लोगों को यह महसूस होने लगता है कि वे दूसरे समुदाय के हैं तो इससे एक सामाजिक विभाजन की स्िथति एक रोश किसी ने खोद निकाला बीसवीं सदी का एक शहर और पिफर लिखा अपना निष्कषर्, वुफछ इस तरह। यहाँ है एक दिलचस्प अभ्िालेख: ‘इस नल पर हर जाति और ध्मर् के लोगों को पानी पीने की अनुमति है।’ क्या मतलब होगा ऐसा लिखने का: पैदा होती है। अगर एक - सी सामाजिक असमानताएँ कइर् समूहों में मौजूद हों तो पिफर एक समूह के लोगों के लिए दूसरे समूहों से अलग क्या यह समाज आपस में बँटा हुआ था? क्या इस समाज में वुफछ ‘उँफचे’ थे और बाव़्ाफी ‘नीचे’?पहचान बनाना मुश्िकल हो जाता है। इसका ़ठीक है, प्िाफर, इस शहर को दप़्ाफन कर देना ही बेहतर!मतलब यह है कि किसी एक मुद्दे पर कइर् समूहों के हित एक जैसे हो जाते हैं जबकि किसी दूसरे मुद्दे पर उनके नजरिए में अंतरहो सकता है। उत्तरी आयरलैंड और नीदरलैंड का उदाहरण लें। दोनों ही इर्साइर् बहुल देश हैं लेकिन यहाँ के लोग प्रोटेस्टंेट और वैफथोलिकटे हैं। उत्तरी आयरलैंड में वगर् और क्यों कहा गया इसे पिफर मशीन का युग? यह तो ऐन बीसवीं सदी के बीच पाषाण - काल था। μ दया पवार ‘माँ’खेमे में बँध्मर् के बीच गहरी समानता है। वहाँ का वैफथोलिक समुदाय गरीब है। लंबे समय से काली, काली पतली देह... वह माँ थी मेरी! जंगल में गुम ठीक सुबह से जलावन के लिए! हम सारे भाइर् साथ बैठे देखते थे उसकी राह,उसके साथ भेदभाव होता आया है। नीदरलैंड में वगर् और ध्मर् के बीच ऐसा मेल दिखाइर् नहीं देता। वहाँ वैफथोलिक और प्रोटेस्टेंट, दोनों में अमीर और गरीब हैं। परिणाम यह है किउत्तरी आयरलैंड में वैफथोलिकों और प्रोटेस्टेंटों के बीच भारी मारकाट चलती रही है पर नीदरलैंड में ऐसा नहीं होता। जब सामाजिक विभ्िान्नताएँ एक दूसरे से गुँथ जाती है तो एक गहरे सामाजिक विभाजन की जमीन तैयार होने लगती है। जहाँ ये सामाजिक विभ्िान्नताएँ एक साथ कइर्ूसमहों में विद्यमान भालना अपेक्षाकृत आसान और अगर वह जलावन न बेच पाती तो भूखे सो जाते थे..μ वामन निंबालकर दलित कवियों की इन दो कविताओं को पढ़ें: पोस्टर के ऊपर ‘अप्रकट रंगभेद’ क्यों लिखा गया है? वहाँ भी अनेक समुदायों के लोग हैं। जमर्नी और स्वीडन जैसे समरूप समाज में भी, जहाँ मोटे तौर पर अध्िकतर लोग एक हीसमरूप समाज: एक ऐसानस्ल और संस्कृति के हैं, दुनिया के दूसरेहोती हैं वहाँ उन्हें सँहोता है। हिस्सों से पहँुचने वाले लोगों के कारण तेशी आज अध्िकतर समाजों में कइर् किस्म से बदलाव हो रहा है। ऐसे लोग अपने साथके विभाजन दिखाइर् देते हैं। देश बड़ा हो या अपनी संस्कृति लेकर पहुुँचते हैं। उनमें अपनाछोटा इससे खास पफवर्फ नहीं पड़ता। भारत अलग समुदाय बनाने की प्रवृिा होती है। कापफी बड़ा देश है और इसमें अनेक समुदायों़इस हिसाब से आज दुनिया के अध्िकतरके लोग रहते हैं। बेल्िशयम छोटा देश है पर देश बहु - सांस्कृतिक हो गए हैं। समाज जिसमें सामुदायिक,सांस्कृतिक या जातीय विभ्िान्नताएँ श्यादा गहरी नहीं होतीं। लोकतंत्रा और विविध्ता लोकतांत्रिाक राजनीतिइमराना दसवीं कक्षा के सेक्शन ‘ब’ की छात्रा है। वह बारहवीं कक्षा के छात्रों को विदाइर् पाटीर् देने की तैयारी में अपनी कक्षा के अन्य छात्रों के साथ ग्यारहवीं कक्षा के छात्रों की मदद कर रही है। पिछले महीने उसने अपने सेक्शन की खो - खो टीम की तरप़्ाफ से दसवीं कक्षा के सेक्शन ‘अ’ की टीम के ख्िालापफ मैच़खेला था। वह बस से घर जाती है और उसी बस में यमुना पार से आने वाले और भी बच्चे होते हैं जो अलग - अलग कक्षाओं में पढ़ते हैं। इमराना उनसे भी हिली - मिली है। इमराना और उसकी बड़ी बहन नइर्मा की श्िाकायत है कि उन्हें तो माँ के साथ घर के काम में हाथ बँटाना पड़ता है जबकि उनका भाइर् कोइर् काम नहीं करता। इमराना के पिता उसकी बड़ी बहन के लिए एक लड़का ढूँढ़ रहे हैं। उनकी कोश्िाश है कि लड़का उन्हीं की हैसियत का हो। क्या आप बता सकते हैं कि इमराना की पहचान किस आधर पर की जा सकती है - घर में वह एक लड़की है ध्मर् के हिसाब से वह ..... स्वूफल में वह ..... ..... वह ..... ..... वह ..... सामाजिक विभाजनों की राजनीति सामाजिक विभाजन राजनीति को किस प्रकार प्रभावित करते हैं? राजनीति का इन सामाजिक विभाजनों से क्या लेना - देना है? पहली नशर में तो राजनीति और सामाजिक विभाजनों का मेल बहुत खतरनाक और विस्पफोटक लगता है। लोकतंत्रा में विभ्िान्न राजनीतिक पाटिर्यों के बीच प्रतिद्वंद्विता का माहौल होता है। इस प्रतिद्वंद्विता के कारण कोइर् भी समाज पफूट का श्िाकार बन सकता है। अगर राजनीतिक दल समाज में मौजूद विभाजनों के हिसाब से राजनीतिक होड़ करने लगे तो इससे सामाजिक विभाजन राजनीतिक विभाजन में बदल सकता है और ऐसे में देश विखंडन की तरप़्ाफ जा सकता है। ऐसा कइर् देशों में हो चुका है। परिणामों का दायरा उत्तरी आयरलैंड का ही उदाहरण लें जिसकाजिक्र हम ऊपर कर चुके हैं। ग्रेट बि्रटेन का यह हिस्सा काप़्ाफी लंबे समय से हिंसा, जातीय कटुता और राजनीतिक टकराव की गिर ़फ्रत में रहा है। यहाँ की आबादी मुख्यतः इर्साइर् ही है पर वह इस ध्मर् के दो प्रमुख पंथों में बुरी तरह बँटी है। 53 पफीसदी आबादी प्रोटेस्टेंट है ़जबकि 44 प़्ाफीसदी रोमन वैफथोलिक। वैफथोलिकों का प्रतिनिध्ित्व नेशनलिस्ट पाटिर्याँकरती हैं। उनकी माँग है कि उत्तरी आयरलैंड को आयरलैंड गणराज्य के साथ मिलाया जाए जो कि मुख्यतः वैफथोलिक बहुल है। प्रोटेस्टेंट लोगोें का प्रतिनिध्ित्व यूनियनिस्ट पाटिर्याँ करती हैं जो ग्रेट बि्रटेन के साथ ही रहने के पक्ष में हैं क्योंकि बि्रटेन मुख्यतः प्रोटेस्टेंट देश है। यूनियनिस्टों और नेशनलिस्टों के बीच चलने वाले हिंसक टकराव में बि्रटेन के सुरक्षा बलों सहित सैकड़ों लोग और सेना के जवान मारे जा चुके हैं। 1998 में बि्रटेन की सरकार और नेशनलिस्टों के बीच शांति समझौता हुआ जिसमें दोनों पक्षों ने हिंसक आंदोलन बंद करने की बात स्वीकार की। यूगोस्लाविया में कहानी का ऐसा सुखद अंत नहीं हुआ। वहाँ धमिर्क और जातीय विभाजन के आधर पर शुरू हुइर् राजनीतिक होड़ में यूगोस्लाविया कइर् टुकड़ों में बँट गया। ऐसे उदाहरणों के आधर पर वुफछ लोग यह निष्कषर् निकालते हैं कि राजनीति और सामाजिक विभाजन का मेल नहीं होना चाहिए। लोकतांत्रिाक राजनीतिओरियन/जूस्का रैंटेनेन - िलकर डाॅट काॅम...तो ऐसा सारी दुनिया में होता है, यूरोप में भी! मुझे लगता था कि सामाजिक विभाजन तो भारत जैसे गरीब देशों में ही होता है। उनका मानना है कि सवर्श्रेष्ठ स्िथति तो यह है कि समाज में किसी किस्म का विभाजन ही न हो। अगर किसी देश में सामाजिक विभाजन है तो उसे राजनीति में अभ्िाव्यक्त ही नहीं होने देना चाहिए। पर इसके साथ यह भी सच्चाइर् है कि राजनीति में सामाजिक विभाजन की हर अभ्िाव्यक्ित पफूट पैदा नहीं करती। हमने पहले भी देखा है कि दुनिया के अध्िकतर देशों में किसी न किसी किस्म का सामाजिक विभाजन है और ऐसे विभाजन राजनीतिक शक्ल भी अख्ितयार करते ही हैं। लोकतंत्रा में राजनीतिक दलों के लिए सामाजिक विभाजनों की बात करना तथा विभ्िान्न समूहों से अलग अलग वायदे करना बड़ी स्वाभाविक बात है, विभ्िान्न समुदायों को उचित प्रतिनिध्ित्व देने का प्रयास करना और विभ्िान्न समुदायों की उचित माँगों और शरूरतों को पूरा करने वाली नीतियाँ बनाना भी इसी कड़ी का हिस्सा है। अध्िकतर देशों में मतदान के स्वरूप और सामाजिक विभाजनों के बीच एक प्रत्यक्ष संबंध् दिखाइर् देता है। इसके तहत एक समुदाय के लोग आमतौर पर किसी एक दल को दूसरों के मुकाबले श्यादा पसंद करते हैं और उसी को वोट देते हैंै। कइर् देशों में ऐसी पाटिर्याँ हैं जो सिप़्ार्फ एक ही समुदाय पर ध्यान देती हैं और उसी के हित में राजनीति करती हैं। पर इस सबकी परिणति देश के विखंडन में नहीं होती। तीन आयाम सामाजिक विभाजनों की राजनीति का परिणाम तीन चीशों पर निभर्र करता है। पहली चीज है लोगों में अपनी पहचान के प्रति आग्रह की भावना। अगर लोग खुद को सबसे विश्िाष्ट और अलग मानने लगते हैं तो उनके लिए दूसरों के साथ तालमेल बैठानाबहुत मुश्िकल हो जाता है। जब तक उत्तरी आयरलैंड के लोग खुद को सिप़्ार्फ प्रोटेस्टेंट या वैफथोलिक के तौर पर देखते रहेंगे तब तक उनका शांत हो पाना संभव नहीं है। अगर लोग अपनी बहु - स्तरीय पहचान के प्रति सचेत हैं और उन्हें राष्ट्रीय पहचान का हिस्सा या सहयोगी मानते हैं तब कोइर् समस्या नहीं होती। जैसे, बेल्िशयम के अध्िकतर लोग खुद को बेल्िशयाइर् ही मानते हैं भले ही वे डच या जमर्न बोलते हों। इस नशरिए से उन्हें साथ - साथ रहने में मदद मिलती है। हमारे देश में भी श्यादातर लोग अपनी पहचान को लेकर ऐसा ही नशरिया रखते हैं। वे खुद कोे पहले भारतीय मानते हैं पिफर किसी प्रदेश, क्षेत्रा, भाषा समूह या धमिर्क और सामाजिक समुदाय का सदस्य । दूसरी महत्वपूणर् चीश है कि किसी समुदाय की माँगों को राजनीतिक दल वैफसे उठा रहे हैं। संविधन के दायरे में आने वाली और दूसरे समुदाय को नुकसान न पहुँचाने वाली माँगों को मान लेना आसान है। श्रीलंका में ‘श्रीलंका केवल सिंहलियों के लिए’ की माँग तमिल समुदाय की पहचान और हितों के ख्िालाप़्ाफ थी। यूगोस्लाविया में विभ्िान्न समुदायों के नेताओं ने अपने जातीय समूहों की तरप़्ाफ से ऐसी माँगें रख दीं जिन्हें एक देश की सीमा के भीतर पूरा करना असंभव था। तीसरी चीश है सरकार का रुख। सरकार इन माँगों पर क्या प्रतििया व्यक्त करती है, यह भी महत्वपूणर् है। जैसा कि हमने बेल्िशयम और श्रीलंका के उदाहरणों में देखा, अगरशासन सत्ता में साझेदारी करने को तैयार हो और अल्पसंख्यक समुदाय की उचित माँगों को पूरा करने का प्रयास इर्मानदारी से किया जाए तोे सामाजिक विभाजन मुल्क के लिए खतरा नहीं बनते। अगर शासन राष्ट्रीय एकता के नाम पर किसी ऐसी माँग को दबाना शुरू कर देता है तो अक्सर उलटे और नुकसानदेह परिणाम ही निकलते हैं। ताकत के दम पर एकता बनाए रखने की कोश्िाश अक्सर विभाजन की ओर ले जाती है। इस तरह किसी देश में सामाजिक विभ्िान्नताओं पर शोर देने की बात को हमेशा खतरा मानकर नहीं चलना चाहिए। लोकतंत्रा में सामाजिक विभाजन की राजनीतिक अभ्िाव्यक्ित एक सामान्य बात है और यह एक स्वस्थ राजनीति का लक्षण भी हो सकता हैै। इसी से विभ्िान्न छोटे सामाजिक समूह, हाश्िाये पर पड़ी शरूरतों और परेशानियों को जाहिर करते हैं और सरकार का ध्यान अपनी तरप़्ाफ खींचते हैं। राजनीति में विभ्िान्न तरह के सामाजिक विभाजनों की अभ्िाव्यक्ित ऐसे विभाजनों के बीच संतुलन पैदा करने का काम भी करती हैं। इसके चलते कोइर् भी सामाजिक विभाजन एक हद से श्यादा उग्र नहीं हो पाता। इस स्िथति में लोकतंत्रा मशबूत ही होता है। पर विभ्िान्नता के प्रति सकारात्मक नशरिया रखना और सभी चीशों को समाहित करने की इच्छा रखना इतना आसान मामला डेरियो वैफसिलेजो - केगल काट±ूस नहीं है। जो लोग खुद को वंचित, उपेक्ष्िात और भेदभाव का श्िाकार मानते हैं उन्हें अन्याय से संघषर् भी करना होता है। ऐसी लड़ाइर् अक्सर लोकतांत्रिाक रास्ता ही अख्ितयार करती है। लोग शांतिपूणर् और संवैधनिक तरीके से अपनी माँगों को उठाते हैं और चुनावों के माध्यम से उसके लिए दबाव बनाते हैं, उसका समाधन पाने का प्रयास करते हैं। कइर् बार सामाजिक असमानताएँ इतनी श्यादा गैर - बराबरी और अन्याय वाली होती हैं कि उनको स्वीकार करना असंभव है। ऐसी गैर - बराबरी और अन्याय के ख्िालापफ़होने वाला संघषर् कइर् बार हिंसा का रास्ता भी अपना लेता है और शासन के ख्िालाप़्ाफ उठ खड़ा होता है। इतिहास बताता है कि ऐसी तमाम गड़बडि़यों की पहचान करने और विविध्ता को समाहित करने का लोकतंत्रा ही सबसे अच्छा तरीका है। जीवन के विभ्िान्न पहलुओं में दिखने वाले सामाजिक विभाजन से जुड़ी तस्वीरें जमा करें या बनाएँ। क्या आप खेल के मामले में सामाजिक विभाजन या भेदभाव के वुफछ उदाहरण सोच सकते हैं? 1.सामाजिक विभाजनों की राजनीति के परिणाम तय करने वाले तीन कारकों की चचार् करें। 2.सामाजिक अंतर कब और वैफसे सामाजिक विभाजनों का रूप ले लेते हैं? 3.सामाजिक विभाजन किस तरह से राजनीति को प्रभावित करते हैं? दो उदाहरण भी दीजिए। 4............................ सामाजिक अंतर गहरे सामाजिक विभाजन और तनावों की स्िथति पैदा करते हैं। .................... सामाजिक अंतर सामान्य तौर पर टकराव की स्िथति तक नहीं जाते। 5.सामाजिक विभाजनों को सँभालने के संदभर् में इनमें से कौन सा बयान लोकतांत्रिाक व्यवस्था पर लागू नहीं होता? ;कद्ध लोकतंत्रा में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के चलते सामाजिक विभाजनों की छाया राजनीति पर भी पड़ती है। ;खद्ध लोकतंत्रा में विभ्िान्न समुदायों के लिए शांतिपूणर् ढंग से अपनी श्िाकायतें शाहिर करना संभव है। ;गद्ध लोकतंत्रा सामाजिक विभाजनों को हल करने का सबसे अच्छा तरीका है। ;घद्ध लोकतंत्रा सामाजिक विभाजनों के आधर पर समाज को विखंडन की ओर ले जाता है। 6.निम्नलिख्िात तीन बयानों पर विचार करें: ;अद्ध जहाँ सामाजिक अंतर एक - दूसरे से टकराते हैं वहाँ सामाजिक विभाजन होता है। ;बद्ध यह संभव है कि एक व्यक्ित की कइर् पहचान हो। ;सद्ध सिप़्ार्फ भारत जैसे बड़े देशों में ही सामाजिक विभाजन होते हैं। इन बयानों में से कौन - कौन से बयान सही हैं। ;कद्धअ, ब और स ;खद्ध अ और ब ;गद्ध ब और स ;घद्ध सिपर्फ स 7. निम्नलिख्िात बयानों को ताकिर्क व्रफम से लगाएँ और नीचे दिए गए कोड के आधर पर सही जवाब ढँूढें़। ;अद्ध सामाजिक विभाजन की सारी राजनीतिक अभ्िाव्यक्ितयाँ खतरनाक ही हों यह शरूरी नहीं है। ;बद्ध हर देश में किसी न किसी तरह के सामाजिक विभाजन रहते ही हैं। ;सद्ध राजनीतिक दल सामाजिक विभाजनों के आधर पर राजनीतिक समथर्न जुटाने का प्रयास करते हैं। ;दद्ध वुफछ सामाजिक अंतर सामाजिक विभाजनों का रूप ले सकते हैं। ;कद्धद, ब, स, अ ;खद्ध द, ब, अ, स ;गद्ध द, अ, स, ब ;घद्ध अ, ब, स, द 8. निम्नलिख्िात में किस देश को धमिर्क और जातीय पहचान के आधर विखंडन का सामना करना पड़ा? ;कद्ध बेल्िशयम ;खद्ध भारत ;गद्ध यूगोस्लाविया ;घद्ध नीदरलैंड 9.माटिर्न लूथर ¯कग जूनियर के 1963 के प्रसि( भाषण के निम्नलिख्िात अंश को पढ़ें। वे किस सामाजिक विभाजन की बात कर रहे हैं? उनकी उम्मीदें और आशंकाएँ क्या - क्या थीं? क्या आप उनके बयान और मैक्िसको ओलंपिक की उस घटना में कोइर् संबंध् देखते हैं जिसका जिव्रफ इस अध्याय में था? फ्मेरा एक सपना है कि मेरे चार नन्हें बच्चे एक दिन ऐसे मुल्क में रहेंगे जहाँ उन्हें चमड़ी के रंग के आधर पर नहीं, बल्िक उनके चरित्रा के असल गुणों के आधर पर परखा जाएगा। स्वतंत्राता को उसके असली रूप में आने दीजिए। स्वतंत्राता तभी वैफद से बाहर आ पाएगी जब यह हर बस्ती, हर गाँव तक पहँुचेगी, हर राज्य और हर शहर में होगी और हम उस दिन को ला पाएँगे जब इर्श्वर की सारी संतानेंμअश्वेत स्त्राी - पुरफष, गोरे लोग, यहूदी तथा गैर - यहूदी, प्रोटेस्टेंट और वैफथोलिकμहाथ में हाथ डालेंगी और इस पुरानी नीग्रो प्राथर्ना को गाएँगी - ‘मिली आशादी, मिली आशादी! प्रभु बलिहारी, मिली आशादी!’ मेरा एक सपना है कि एक दिन यह देश उठ खड़ा होगा और अपने वास्तविक स्वभाव के अनुरूप कहेगा, फ्हम इस स्पष्ट सत्य को मानते हैं कि सभी लोग समान हैं।य् प्रश्नावली

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