उपन्यास, समाज और इतिहास आपने पिछले अध्याय से जाना कि मुद्रण संस्वृफति का उदय वैफसे हुआ और किस तरह संचार के नए रूपों ने लोगों के एक - दूसरे के बारे में सोचने और एक - दूसरे से जुड़ने के तरीव़्ोफ को बदल दिया। आपने यह भी देखा कि मुद्रण संस्वृफति ने साहित्य के नए रूपों को संभव बनाया। इस अध्याय में हम साहित्य के एक ऐसे ही नए रूपμउपन्यासμके बारे में पढ़ेंगे क्योंकि इसका आध्ुनिक सोच के ढरेर् से निहायत नशदीकी रिश्ता रहा है। पहले हम पश्िचम में उपन्यास के इतिहास को और पिफर भारत के वुफछ इलाव़्ाफों में इसके विकास का अध्ययन करेंगे। आप देखेंगे कि बहुत सारे आपसी प़्ाफव़्ार्फ के बावजूद, दुनिया के विभ्िान्न हिस्सों में उपन्यासों में काप़्ाफी अहम समानताएँ थीं। 1 उपन्यास का उदय उपन्यास साहित्य की एक आध्ुनिक विध है। इसकी पैदाइश छापेख़ाने के मशीनी आविष्कार से हुइर्। छपी किताब के बगैर उपन्यास की कल्पना हम नहीं कर सकते। आप जानते हैं कि प्राचीन काल में पांडुलिपियाँ हस्तलिख्िात होती थीं ;सातवाँ अध्यायद्ध। इससे प्रसार चंद लोगों तक सीमित था। लेकिन मशीन से छपने के बाद उपन्यासों को बहुत बड़ा पाठक वगर् मिल गया और जल्द ही इसे शबरदस्त लोकपि्रयता मिली। इस समय तक लंदन जैसे शहर बड़ी तेशी से पैफल रहे थे और छपाइर् तथा संचार के अन्य साध्नों के आने से छोटे शहरों से भी उनका संपवर्फ आसान हो गया था। अपने बिखरे हुए और विविध् पाठक - वगर् के बीच उपन्यासों ने वुफछ साझी रुचियाँ व़्ाफायम कीं। ज्यों - ज्यों पाठक कहानी में घुसते गए और काल्पनिक व्िाफरदारों से उनका रिश्ता बनता गया, त्यों - त्यों प्रेम और विवाह तथा स्त्राी - पुरुष - संबंध् आदि के बारे में वे अलग तरह से सोचने लगे। उपन्यास ने पहले - पहल जड़ें इंग्लैंड और प़्ा्रफांस में जमाईं। हालाँकि उपन्यास सत्राहवीं सदी से ही लिखे जाने लगे थे, लेकिन उनका असली विकास अठारहवीं सदी में ही हुआ। इनके पाठकों में इंग्लैंड और प़्ा्रफांस के पारंपरिक भद्र समाज के अलावा दुकानदार व मुंशी वगर् के लोग भी शामिल हो गए। पाठक वगर् और किताबों के बाशार के बढ़ने से लेखकों की आय भी बढ़ी। वुफलीन वगर् के संरक्षण से आशाद होकर अब वे खुले दिल से अलग - अलग शैलियों में तरह - तरह के प्रयोग करने लगे। अठारहवीं सदी के पहले हिस्से में लिख रहे उपन्यासकार हेनरी प़्ाफी¯ल्डग ने दावा किया कि उन्होंने ‘अपने लिए एक अलग साम्राज्य ख़ुद बनाया है’ जहाँ उन्हीं के बनाए व़्ाफानून चलते हैं। वाॅल्टर स्काॅट ने स्काॅट लोकगीतों को याद और जमा करके स्काॅट वंशावली व उनकी लड़ाइयों के इतिहास पर लिखे अपने उपन्यासों में उनका उपयोग किया। दूसरी तरप़्ाफ ख़तूती या पत्रात्मक उपन्यासों में निजी पत्रों को आधर बनाया गया। अठारहवीं सदी में लिखे गए सैमुएल रिचडर्सन के उपन्यास पामेला में पूरी कहानी प्रेमियों के आपसी ख़तों के शरिए कही गइर् है। पाठकों को नायिका के मन की बात, उसके अंतद्व±द्वों का पता नायिका की चिटि्ठयों से ही चलता है। 1.1 प्रकाशन बाशार समाज के ग़्ारीब तबव़्ोफ काप़्ाफी अरसे तक प्रकाशन के बाशार से बाहर रहे। शुरू - शुरू में उपन्यास सस्ते तो थे नहीं। हेनरी प़्ाफी¯ल्डग का टाॅम जोन्स ;1749द्ध छः खंडों में प्रकाश्िात हुआ और हर खंड की वफीमत तीन श्िा¯लग़थीं, जो कि एक औसत मशदूर के हफ्ऱते - भर की कमाइर् होती थी। नए शब्द भद्र समाज: जो लोग उँफचे ख़ानदान में पैदाइश और उँफची समाजिक हैसियत का दावा करते थे । उनका मानना था कि सही व्यवहार के मानक वही तय करते हैं। पत्रात्मक उपन्यास: पत्रों की शंृखला के रूप में लिखा हुआ। लेकिन जल्द ही 1740 में किराये पर चलनेवाले पुस्तकालयों की स्थापना के बाद लोगों के लिए किताबें सुलभ हो गईं। तकनीकी सुधर से भी छपाइर् के ख़चेर् में कमी आइर् और मावेर्फटिंग के नए तरीव़्ाफों से किताबों की बिव्रफी बढ़ी। प़्ा्रफांस में प्रकाशकों को लगा कि उपन्यासों को घंटे के हिसाब से किराये पर उठाने से श्यादा लाभ होता है। याद रहे कि उपन्यास बृहद स्तर पर उत्पादित और बेची जाने वाली सवर्प्रथम वस्तुओं में से एक था। इसकी लोकपि्रयता के कइर् कारण थे। उपन्यासों में रची जा रही दुनिया विश्वसनीय और दिलचस्प थी, और सच लगती थी। उपन्यास पढ़ते हुए पाठक किसी और दुनिया में चला जाता था और संसार को किताब के व्िाफरदार की नशर से देखने लगता था। इन्हें अकेले - अकेले भी पढ़ा जा सकता था, और दोस्तों - रिश्तेदारों के साथ मिल - बैठ - बोलकर भी इस पर चचार् की जा सकती थी। देहाती इलाव़्ाफों में लोग अकसर इकट्ठा होकर उपन्यासों को बड़े ग़्ाौर से किसी एक को पढ़ते हुए सुनते देखे जा सकते थे। कहा जाता है कि इंग्लैंड के स्लाउ नामक स्थान पर लोग यह जानकर बड़े खुश हुए कि रिचडर्सन के उपन्यास की नायिका, पामेला, उन्हीं के गाँव में ब्याही गइर् थी। वे उत्साह में आकर चचर् की ओर भागे और वहाँ जाकर गिरजाघर की घंटियाँ बजाने लगे। चाल्सर् डिकेन्स के उपन्यास पिकविक पेपसर् का 1836 में एक पत्रिाका में धारावाहिक रूप में छपना एक महत्त्वपूणर् घटना थी। सचित्रा और सस्ती होने की वजह से पत्रिाकाओं का अपना आकषर्ण था। धरावाहिक मुद्रण के चलते पाठकों को रहस्य का मशा मिलने लगा, वे आपस में चरित्रों पर चचार् करनेलगे, और हफ्ऱता - दर - हफ्ऱता उनकी कहानियों के साथ जीने लगे। ठीक उसी तरह जैसे आज के टीवी सीरियलों के साथ होता है। नए शब्द धरावाहिक: ऐसी प(ति जिसमें कहानी को किस्तों मेें छापा जाता है। हर किस्त पत्रिाका या अख़बार के अगले अंक में छपती है। 1.2 उपन्यासों की दुनिया इससे पहले आनेवाली तमाम लिख्िात वृफतियों की तुलना में उपन्यास आम लोगों की िांदगी के श्यादा व़्ाफरीब हैं। इनमें राज्यों - साम्राज्यों की तव़्ाफदीर बदलने वाली महान हस्ितयों की ही चचार् नहीं होती बल्िक इनमें आम इनसानों की रोशाना की िांदगी का चित्राण भी मिलता है। उन्नीसवीं सदी में यूरोप ने औद्योगिक युग में प्रवेश किया। प़्ौफक्िट्रयाँ आईं, व्यवसाय में मुनाप़्ोफ बढ़े, अथर्व्यवस्था पैफली। लेकिन साथ ही मशदूरों की समस्याएँ भी बढ़ीं, शहर अध्िक काम और कम मशदूरी पर खटते श्रमिकों से भर गए। ग़्ारीब बेरोशगार काम की तलाश में सड़कों की ख़ाक छानने लगे और ववर्फहाउस या रैनबसेरों में पनाह लेने लगे। उद्योगों की प्रगति के साथ - साथ मुनाप़्ाफाखोरों को सही व मशदूरों को कमतर इनसान मानने कीप्रवृिा चल पड़ी। इस घटनाव्रफम की कड़ी निंदा करते हुए चाल्सर् डिकेन्स जैसे उपन्यासकारों ने लोगों के जीवन व चरित्रा पर औद्योगीकरण के दुष्प्रभावों के बारे में लिखा। उनके उपन्यास हाडर् टाइम्स ;1854द्ध में वण्िार्त कोकटाउन एक उदास काल्पनिक औद्योगिक शहर है, जहाँ मशीनों की भरमार है, ध्ुआँ उगलती चिमनियाँ हैं, प्रदूषण से स्याह पड़ी नदियाँ हैं, और मकान सब एक - से। मशदूरों को यहाँ ‘हाथ’ की संज्ञा से जाना जाता है, और मशीन चलाने के अलावा उनकी कोइर् और अस्िमता नहीं। डिकेन्स ने न केवल लाभ के लोभ की आलोचना की बल्िक उन विचारों को भी आड़े हाथों लिया जो इनसानों को महश उत्पादन का औशार मानते हैं। अपने दूसरे उपन्यासों में भी डिकेन्स ने औद्योगीकरण के दौर में शहरी जीवन की दुदर्शा का चित्राण किया। उनका ओलिवर टि्वस्ट ;1838द्ध एक ऐसे चचार् करें निम्नलिख्िात प्रकार के उपन्यासों का क्या मतलब है? =पत्रात्मक उपन्यास =धरावाहिक उपन्यास दोनों व्ि़ाफस्मों के बारे में प्रसि( एक - एक लेखक का नाम शरूर बताएँ। अनाथ की कहानी कहता है, जिसे छोटे - मोटे अपरािायों और भ्िाखारियों की दुनिया में रहना पड़ा। एक निमर्म ववर्फहाउस या कामघर ;चित्रा 6द्ध में पलने - बढ़ने के बाद ओलिवर को अंततः एक अमीर ने गोद ले लिया और वह सुख से रहने लगा। पर ग़्ारीबों के जीवन से जुड़ा हर उपन्यास पाठक को सुखांत का आनंद दे यह शरूरी नहीं था। एक युवा खनिक की िांदगी पर लिख्िात एमिली शोला का जमिर्नल ;1885द्ध खदान मशदूरों के शोचनीय हालात का जायशा लेता है। इसका अंत दुखद हैः नायक जिस हड़ताल की अगुवाइर् कर रहा है, वह असपफल रहती है और उसके साथ मशदूर उसके ख्ि़ालाप़्ाफ खड़े हो जाते हैं, आशा की कोइर् किरण नहीं दिखती। 1.3 समुदाय व समाज उपन्यासों के श्यादातर पाठक शहरों में रहते थे। उपन्यासों ने उनमें ग्रामीण समुदायों की नियति के साथ जुड़ने का भाव पैदा किया। मिसाल के तौर पर उन्नीसवीं सदी के उपन्यासकार टाॅमस हाडीर् ने इंग्लैंड के तेशी से गायब होते़देहाती समुदायों के बारे में लिखा। यह वही समय था, जब बड़े किसानों ने अपनी शमीनों को बाड़ाबंद कर लिया था, और मशीनों पर मशदूर लगाकर उन्होंने बाशार के लिए उत्पादन शुरू कर दिया था। हमें इस बदलाव का अहसास हाडीर् के मेयर आॅप़्ाफ वैफस्टरबि्रज ;1886द्ध को पढ़कर होता है। यह कहानी माइकल हेंचडर् की है, जो पहले अनाज का व्यापारी होता है, और पिफर वैफस्टरबि्रज नामक देहाती शहर का मेयर बनने में सपफल हो जाता है। वह स्वतंत्रा विचारों का व्यक्ित है, अपने ही तरीव़्ोफ से व्यापार करता है। पर अपने कमर्चारियों के साथ उसका रवैया अनिश्िचतμकभी बेहद दयालु, तो कभी एकदम निदर्यीμहोता था। लिहाशा वह अपने प्रबंध्क व प्रतिद्वंद्वी, डाॅनल्ड प़्ाफारप़्ा्रेफ के सामने टिक नहीं पाता। प़्ाफारप़्ा्रेफ की प्रबंध्न तकनीक सक्षम थी और लोग मानते थे कि वह हर किसी के साथ एक - जैसा और शालीन बतार्व करता था। हम देख सकते हैं कि हाडीर् इस कहानी में उस ग़्ाायब होते वक्त का अप़्ाफसोस करते हैं, जिसमें एक तरह का अपनापन था - हालाँकि उन्हें पुरानी व्यवस्था की ख़ामियों और नयी ख़ूबियों का भी अहसास है। उपन्यास आम लोगों, जनसाधरण, की भाषा का इस्तेमाल करता है। लोगों की अलग - अलग बोलियों से निकटता बनाकर उपन्यास एक राष्ट्र के विविध् समुदायों की साझा दुनिया रचता है। इस तरह उपन्यास भाषा की अलग - अलग शैलियों से भी सामग्री लेते हैं। किसी एक ही उपन्यास में एक साथ शास्त्राीय व सड़कछाप भाषा को उपन्यास की अपनी जनभाषा के साथ मिलाकर पेश किया जा सकता है। राष्ट्र की ही तरह उपन्यास भी कइर् संस्वृफतियों को एक साथ इकट्ठा करता है। 1.4 नयी महिला उपन्यास से संबंध्ित सबसे भली बात तो यह हुइर् कि महिलाएँ उससे जुड़ीं। अठारहवीं सदी में मध्यवगर् और संपन्न हुए। नतीजे में महिलाओं को उपन्यास पढ़ने और लिखने का अवकाश मिल सका। अतः उपन्यासों में महिला जगत को, उसकी भावनाओं, उसके तजुबो±, मसलों और उसकी पहचान से जुड़े मुद्दों को समझा - सराहा जाने लगा। कइर् सारे उपन्यास घरेलू िांदगी पर वेंफदि्रत थे। इनमें महिलाओं को अध्िकार के साथ बोलने का अवसर मिला। अपने अनुभवों को आधर बनाकर उन्होंने पारिवारिक जीवन की कहानियाँ रचते हुए अपनी सावर्जनिक पहचान बनाइर्। जेन आॅस्िटन के उपन्यासों में हमें उन्नीसवीं सदी के बि्रटेन के ग्रामीण वुफलीन समाज की झाँकी मिलती है। हमें ऐसे समाज के बारे में सोचने की प्रेरणा मिलती है जहाँ महिलाओं को ध्नी या जायदाद वाले वर खोजकर ‘अच्छी’ नए शब्द जनभाषा ;टमतदंबनसंतद्ध: औपचारिक, साहित्ियक शैली के बजाय सामान्य बोलचाल की भाषा। 182 जब औरतों ने उपन्यास लिखना शुरू कर दिया तो बहुत सारे लोगों को लगा कि वे अब पत्नी व माँ की परंपरागत भूमिकाओं को नहीं सँभालेेंगी और घर अस्त - व्यस्त हो जाएँगे। 183 शादियाँ करने के लिए उत्साहित किया जाता था। जेन आॅस्िटन के उपन्यास प्राइड एंड प्रेज्युडिस की पहली पंक्ित देखेंः ‘यह एक सवर्स्वीवृफत सत्य है कि कोइर् अकेला आदमी अगर मालदार है तो उसे एक अदद बीवी की तलाश होगी।’ इस बयान से हम आॅस्िटन के समाज को समझ सकते हैं, कि उनके उपन्यासों की औरतें क्यों हमेशा अच्छी शादी और पैसे की प्ि़ाफराव़्ाफ में रहती हैं। लेकिन महिला उपन्यासकारों ने सिप़्ार्फ गृहस्िथन चरित्रों को ही लोकपि्रय नहीं बनाया। हमें उनकी वृफतियों में अकसर ऐसी औरतें मिलती हैं जो सामाजिक मान्यताओं को मानने के पहले उनसे लड़ती हैं। इन कहानियों से पाठिकाओं को विद्रोह करने की प्रेरणा अवश्य मिली होगी। शारलाॅट ब्राॅण्ट की 1847 में प्रकाश्िात जेन आयर में युवती जेन को आशाद - ख़याल और दृढ़ व्यक्ितत्व वाला दिखाया गया है। यद्यपि उस दौर की महिलाओं को खामोश और शालीन रहने का संस्कार दिया जाता था, लेकिन जेन दस साल की उम्र में ही बड़ों के पाखंड का मुँहतोड़ जवाब देकर चैंका देती है। उससे हमेशा बुरा सुलूक करने वाली अपनी आंट से वह कहती हैः ‘लोग आपको नेक औरत समझते हैं, लेकिन हव़्ाफीव़्ाफत में आप बुरी हैं... आप शातिर हैं। इस िांदगी में तो मैं आपको आंट नहीं कहने वाली।’ 1.5 युवाओं के लिए उपन्यास किशोरों के लिए उपन्यासों में एक नए तरह का आदशर् पुरुष पेश किया गया जो ताव़्ाफतवर, दृढ़, स्वतंत्रा और साहसी था। ऐसे श्यादातर उपन्यासों की कथाभूमि यूरोप से दूर कहीं ऐसी जगह पर होती थी, और घटनाएँ जोश और बाॅक्स 1 उपन्यासकार औरतें जाॅजर् इलियट ;1819 - 1880द्ध का असली नाम मेरी एन इवान्स था। जाॅजर् इलियट उनका लेखकीय नाम था। वह प्रसि( उपन्यासकार थीं और उनका मानना था कि उपन्यासों से औरतों को खुद को स्वछंदतापूवर्क व्यक्त करने का अवसर मिलता है। हर औरत साहित्य लिखने में सक्षम होती है। ‘कथा लेखन साहित्य की एक ऐसी शाखा है जिसमें अपने ढंग से औरतें मदो± की पूरी तरह बराबरी कर सकती है। कोइर् शैक्षण्िाक बंदिश औरतों को कथा लेखन की सामग्री से वंचित नहीं कर सकती और कला की ऐसी कोइर् प्रजाति नहीं है जो कड़ी आवश्यकताओं से इतनी आशाद हो।’ जाॅजर् इलियट, ‘सिली नाॅवल्स बाइर् लेडी नाॅवलिस्ट’, 1856 साहस के कारनामों से भरी होती थीं। उपनिवेश की स्थापना करनेवालों को नायक का सम्मान दिया जाता था, क्योंकि वे अनजान वातावरण में देसी लोगों से जूझ रहे थे, देसी समाज के अनुरूप खुद को ढालते हुए उसे भी बदल रहे थे। वे भू - भागों में उपनिवेश बनाकर उनमें राष्ट्र विकसित कर रहे थे। इस विध की किताबों में आर.एल. स्टीवेंसन की ट्रेशर आइलैंड ;1883द्ध और रडयाडर् किपलिंग की जंगल बुक ;1894द्ध बहुत मशहूर हुईं। बि्रतानी साम्राज्य के बोलबाले के शमाने में जी.ए. हेंटी के ऐतिहासिक साहसिक उपन्यास भी बेहद लोकपि्रय थे। उनसे अजनबी इलाव़्ाफों पर विजय हासिल करने का उत्साह और हौसले का भाव पैदा होता होगा। इनकी पृष्ठभूमि मेक्िसको, अलेक्शंाडिªया, सायबेरिया जैसे अनेक देशों की होती थी। इनकी कहानियों में अकसर युवा लड़कों को ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह बनाया जाता था, उन्हें किसी न किसी सैनिक कारर्वाइर् में डालकर ‘अंग्रेशी’ हिम्मत का पाठ पढ़ाया जाता था। किशोरियों के लिए लिखी प्रेम कहानियाँ भी इसी शमाने में, ख़ासतौर पर अमेरिका में, लोकपि्रय हुईं। हेलेन हंट जैक्सन वृफत रमोना ;1884द्ध और सूशन वूफलिज के छद्म नाम से लिखने वाली सारा चैंसी वूल्शी की सीरीश ह्नाट केटी डिड ;1872द्ध ने काप़्ाफी नाम कमाया। 1.6 उपनिवेशवाद के बाद इस तरह यूरोप में उपन्यास का उदय उस समय हुआ जब वह बाव़्ाफी विश्व पर औपनिवेश्िाक व़्ाफब्शा जमा रहा था। उपनिवेशवाद में शुरुआती उपन्यासों बाॅक्स 2 जी.ए. हेंटी ;1832 - 1902द्ध। अंडर ड्रेक्स फ्ऱलैग ;1883द्ध में दो ऐलिशाबेथ्िायाइर् युवा रोमांचकारी मौत के नशदीक पहुँच जाते हैं लेकिन इसके बावजूद इस घमंड को नहीं छोड़ते कि वे अंग्रेश हैं। ‘देखो नेड, व्ि़ाफस्मत ने हमें उम्मीद से श्यादा साथ दिया है। हो सकता है हम उसी दिन मर जाते जब हम यहाँ पहुँचे थे लेकिन हमने तो मैदानों में श्िाकार करते छह महीने मशे से बिता दिए। अब मरना ही है तो हम अंग्रेशों की तरह और इर्साइयों की तरह बतार्व करते हुए मरेंगे।’ का योगदान यही था कि इन्होंने अपने पाठकों में उपनिवेशकों के महान समुदाय का हिस्सा होने का अहसास भरा। डैनियल डेप़्ाफो वृफत राॅ¯बसन व्रूफसो ;1719द्ध का नायक साहसिक यात्राी होने के साथ - साथ दास - व्यापारी है। एक द्वीप पर जहाशी दुघर्टना के बाद पड़ा हुआ वह ग़्ौर - गोरे लोगों को बराबर का इनसान नहीं बल्िक अपने से हीनतर जीव मानता है। एक ‘देसी’ को मुक्त कराकर उसे वह अपना ग़्ाुलाम बना लेता है। वह उससे उसका नाम पूछना भी शरूरी नहीं समझता, बस अपनी तरप़्ाफ से उसे प्रफाइडे कहता है। पर उस समय व्रूफसो का व्यवहार अमान्य सा असामान्य नहीं समझा गया, क्योंकि उस दौर में श्यादातर लेखक उपनिवेशवाद को एक सहज और वुफदरती परिघटना मानते थे। जिन्हें उपनिवेशीवृफत या ग़्ाुलाम बनाया गया था, उन लोगों को आदिमानुस, बबर्र और इनसान से कमतर माना जाता था और यह भी कि उपनिवेशवाद उनको सभ्य, पूणर् इनसान बनाने का शरूरी औशार था। काप़्ाफी बाद, बीसवीं सदी में आकर ही जोसपफ काॅनरैड ;1857 - 1924द्ध जैसे लेखकों ने अपने उपन्यासों में औपनिवेश्िाक ग़्ाुलामी के स्याह पक्ष को उजागर किया। जिन्हें ग़्ाुलाम बनाया गया था, उनका विश्वास था कि उपन्यास ने उन्हें अपनी अस्िमता, अपने मसलों और राष्ट्रीय सरोकारों को समझने का मौव़्ाफा दिया। आइए देखें कि उपन्यास भारत में वैफसे और कब लोकपि्रय हुआ और समाजके लिए इसका क्या महत्त्व रहा? 2 उपन्यास भारत आया भारत में गद्य कथाएँ पहले भी लिखी जा रही थीं। मिसाल के तौर पर बाणभट्ट ने सातवीं सदी में संस्वृफत में कादम्बरी लिखी थी। पंचतंत्रा एक और मशहूर उदाहरण है। इसके अलावा प़्ाफारसी और उदूर् में भी साहस, वीरता और चतुराइर् के व्ि़ाफस्सों की लंबी परंपरा थी, जिसे दास्तान कहते थे। लेकिन ये वृफतियाँ हम आज जिसे उपन्यास कहते हैं, उनसे भ्िान्न थीं। भारत में आध्ुनिक उपन्यास का विकास उन्नीसवीं सदी में पश्िचमी उपन्यास से भारतीयों के परिचय के बाद हुआ। भारतीय भाषाओं, छपाइर्, और पाठक - वगर् के विकास से इसमें काप़्ाफी मदद मिली। यहाँ के आरंभ्िाक उपन्यास बंगालीऔर मराठी में लिखे गए। मराठी का पहला उपन्यास बाबा पप्रणजी का यमुना पयर्टन ;1857द्ध था, जिसमें विध्वाओं की दुदर्शा को आधर बनाकर सीधी - सादी कहानी बुनी गइर् थी। इसके बाद लक्ष्मण मोरेश्वर हाल्बे वृफत मुक्तमाला ;1861द्ध आया। यह कोइर् यथाथर्वादी वृफति नहीं थी, बल्िक इसके शरिए एक ‘रूमानी’ कहानी के कलेवर में नैतिक सीख देने की कोश्िाश की गइर् थी। उन्नीसवीं सदी के अग्रणी उपन्यासकारों ने किसी न किसी उद्देश्य को लेकर उपन्यास रचे। उपनिवेशवादी शासकों को उस समय की भारतीय संस्वृफति कमतर नशर आती थी। वहीं भारतीय उपन्यासकारों ने देश में आधुनिक साहित्य का विकास करने के उद्देश्य से लिखाμऐसा साहित्य जो लोगों में राष्ट्रीयता की भावना और उपनिवेशी शासकों से बराबरी का अहसास जगा सके। विभ्िान्न क्षेत्राीय भाषाओं में उपन्यासों के अनुवाद से उपन्यास की लोकपि्रयता तो बढ़ी ही, इसका कइर् और इलाव़्ाफों में विकास भी हुआ। 2.1 दक्ष्िाण भारत में उपन्यास दक्ष्िाण भारतीय भाषाओं में भी उपन्यास औपनिवेश्िाक काल के दौरान ही आने लगे थे। कइर् शुरुआती उपन्यास तो अंगे्रशी उपन्यासों के अनुवाद के रूप में छपे। मिसाल के तौर पर मालाबर के उप - न्यायाध्ीश, ओ. चंदू मेनन ने बेंजामिन डिश्रायली के उपन्यास हेनरीएटा टेम्पल का मलयालम में तजुर्मा ;अनुवादद्ध करने की कोश्िाश की। लेकिन उन्हें जल्दी ही महसूस हुआ कि केरल के उनके पाठ अंग्रेशी उपन्यासों के चरित्रों के रहन - सहन, उनके कपड़ों, उनकी बोलचाल, उनके रस्मो - रिवाज से वाकिप़्ाफ नहीं थे। उन्हें अंग्रेशी उपन्यासों का ठेठ अनुवाद निहायत उबाउफ लगता। इसलिए उन्होंने अनुवाद का विचार छोड़ दिया और ‘अंग्रेशी उपन्यासों की तशर् पर’ एक मलयालम कहानी लिखी। इंदुलेखा ;1889द्ध नामक यह मशेदार उपन्यास मलयालम का पहला आधुनिक उपन्यास माना गया। आंध््र प्रदेश का मामला भी लगभग ऐसा ही रहा। काण्डुवुफरी वीरेश¯लगम ;1848 - 1919द्ध ने ओलिवर गोल्डस्िमथ के विकार आॅप़्ाफ बेकप़्ाफील्ड का बाॅक्स 3 सारे मराठी उपन्यास यथाथर्वादी नहीं थे। नारो सदाश्िाव )स्बद ने अपने मराठी उपन्यास मंजूघोष ;1868द्ध में बेहद सौंदयार्त्मक शैली का इस्तेमाल किया था। इस उपन्यास में हैरतअंगेश घटनाओं की भरमार थी। )स्बद ने जानबूझ कर यह शैली चुनी थी। उनका कहना थाμ ‘शादी के प्रति हमारे रवैये तथा कइर् अन्य कारणों से ¯हदुओं की ¯शदगी में न तो दिलचस्प नशरिए मिलते हैं और न दिलचस्प मूल्य...। अगर हम रोशमरार् के तजुबो± के बारे में लिखें तो उनमें कुछ मशेदार नहीं रहेगा, इसलिए अगर हमें मनोरंजक किताब लिखनी है तो हमें बेजोड़ चीशोें को लेना ही पड़ेगा।’ तेलुगू अनुवाद शुरू किया पर उन्होंने भी वैसे ही कारणों से यह योजना त्याग दी और पिफर 1878 में राजशेखर चरितमू लिखा। 2.2 हिंदी उपन्यास उत्तर में आध्ुनिक हिंदी साहित्य के पुरोध, भारतेन्दु हरिश्चंद्र, ने अपनी मंडली के कवियों व लेखकों को दूसरी भाषाओं में पुनरर्चना और अनुवाद जी.डब्ल्यू.एम. रेनाॅल्ड्स द्वारा लिखी पुस्तक पिकविक एब्राॅड से लिया गया एक चित्रा। रेनाल्ड, एपफ. मारयोन क्राप़्ाफोडर् और मेरी कोरेली जैसे उन्नीसवीं सदी के छोटे अंग्रेश उपन्यासकार औपनिवेश्िाक भारत में बहुत मशहूर थे। उनके उपन्यास ऐतिहासिक प्रेम कथा, रोमांचकारी व्ि़ाफस्सों और सनसनी पर आधरित होते थे। वे यहाँ आसानी से उपलब्ध् थे उनका कइर् भारतीय भाषाओं में अनुवाद और ‘रूपांतरण’ किया गया था। भारत में रेनाल्ड का पिकविक एब्राॅड ;1839द्ध चाल्सर् डिकेन्स के मूल उपन्यास पिकविक पेपसर् ;1837द्ध के मुव़्ाफाबले ज्यादा प्रसि( था। करने को उत्साहित किया। उनकी प्रेरणा से कइर् सारे उपन्यास अंग्रेशी या बंगाली से हिंदी में या तो अनूदित हुए या रूपांतरित, लेकिन हिंदी का पहला उपन्यास लिखने का श्रेय दिल्ली के श्रीनिवास दास को जाता है। परीक्षा - गुरु ;1882द्ध नामक इस उपन्यास में खुशहाल परिवारों के युवाओं को बुरी संग - सोहबत के नैतिक खतरों से आगाह किया गया। परीक्षा - गुरु से नव - निमिर्त मध्यवगर् की अंदरूनी व बाहरी दुनिया का पता चलता है। उपन्यास के चरित्रों को औपनिवेश्िाक शासन से व़्ाफदम मिलाने में वैफसी मुश्िकलें आती हैं और अपनी सांस्वृफतिक अस्िमता को लेकर वे क्या सोचते हैं, यह इस उपन्यास का कथ्य है। औपनिवेश्िाक आध्ुनिकता की दुनिया उनको एक साथ भयानक और आकषर्क मालूम पड़ती है। उपन्यास पाठक को जीने के ‘सही तरीव़्ोफ’ बताता है, और हर ‘विवेकवान’ इनसान से यह उम्मीद करता है कि वे समाज - चतुर और व्यावहारिक बनें पर साथ ही अपनी संस्वृफति और परंपरा में जमे रहकर इश्शत और गरिमा की िांदगी जिएँ। उपन्यास के व्ि़ाफरदार अपने कमर् से दो अलग संसारों के बीच की दूरी पाटने की कोश्िाश करते दिखाइर् देते हैंः वे नयी वृफष्िा तकनीक अपनाते हैं, व्यापार - कमर् को आध्ुनिक बनाते हैं, भारतीय भाषा के प्रयोग बदलते हैं ताकि वह पाश्चात्य विज्ञान और भारतीय बुि दोनों को अभ्िाव्यक्ित करने में सक्षम हो सवेंफ। युवाओं से अख़बार पढ़ने की ‘स्वस्थ आदत’ डालने की अपील की जाती है। लेकिन उपन्यास में इस बात पर शोर है कि यह सब मध्यवगीर् गृहस्थी के पारंपरिक मूल्यों पर समझौता किए बगैर हो। अपनी तमाम अच्छी मंशा के बावजूद परीक्षा - गुरु बहुत श्यादा पाठक नहीं जुटा पाया, शायद इसलिए कि इसकी शैली वुफछ अध्िक उपदेशात्मक थी। ¯हदी उपन्यास का पाठक - वगर् देवकी नंदन खत्राी के लेखन से पैदा हुआ। माना जाता है कि उनकी बेस्ट - सेलर चंद्रकान्ता संतति - जो प़्ांफतासी के तत्वों से बुना हुआ रूमानी उपन्यास था - ने उस समय के श्िाक्ष्िात तबव़्ाफों में ¯हदी भाषा और नागरी लिपि को लोकिय बनाने में अहम भूमिका निभाइर्। हालाँकि इसे मात्रा ‘पढ़ने के मशे’ के लिए लिखा गया था, पिफर भी इससे इसके पाठक - वगर् की चाहत और उनके भय के बारे में भी दिलचस्प सुराग मिलता है। प्रेमचंद के लेखन के साथ ¯हदी उपन्यास में उत्कृष्टता आइर्। उदूर् से लिखना शुरू कर वे बाद में ¯हदी में लिखने लगे और दोनों ही भाषाओं में उनका प्रभाव शबरदस्त रहा। उन्होंने पारंपरिक व्ि़ाफस्सागोइर् से अपनी शैली के लिए प्रेरणा ली। कइर् आलोचक मानते हैं कि 1916 में प्रकाश्िात उनके उपन्यास सेवासदन ने ¯हदी उपन्यास को प़्ाफंतासी, उपदेश और सरल मनोरंजन के दायरे से उठाकर आम लोगों की ¯शदगी और सामाजिक सरोकारों पर विचारनेवाली विध बना दिया। इस उपन्यास में मूलतः महिलाओं की दुरावस्था पर ध्यान दिया गया है, पर बाल - विवाह और दहेज जैसे सामाजिक मसले भी उठाए गए हैं। साथ ही इससे हमें पता चलता है कि उच्च वगर् ने औपनिवेश्िाक शासकों से स्वशासन के जो भी थोड़े - बहुत मौव़्ोफ मिले, उनका उन्होंने किस तरह इस्तेमाल किया। 2.3 बंगाल में उपन्यास उन्नीसवीं सदी के बंगाल का उपन्यास दो संसारों में जीता था, वुफछ तो भूतकाल में रहते थे, उनके व्िाफरदार, घटनाएँ और प्रेम कहानियाँ ऐतिहासिक होती थीं। जबकि एक और व्ि़ाफस्म के उपन्यास समसामयिक महिलाओं की घरेलू परिस्िथतियों पर वेंफित थे। महिला घरेलू उपन्यास आमतौर पर सामाजिक समस्याओं और स्त्राी - पुरुष संबंधें के इदर् - गिदर् घूमते थे। कलकत्ता का पुराना व्यापारी वुफलीन वगर् संगीत और नृत्य सभाओं और काव्य - प्रतियोगिताओं को संरक्षण देता। इसके बरक्स नए भद्रलोक को उपन्यास की दुनिया श्यादा रास आइर्, उन्हें एकांत में पढ़ना श्यादा भाया, कभी - कभार समूह में भी उपन्यास पढ़े जाते थे। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय अपने घर में जात्रा का आयोजन करते थे और उसमें पूरा परिवार शरीक होता था। लेकिन उनके अपने कमरे में साहित्ियक मित्रा इकट्ठा होकर साहित्ियक चचार् करें शुरुआती ¯हदी उपन्यास की दो अहम विशेषताओं के बारे में लिखें। बाॅक्स 4 असम में उपन्यास असम में सबसे शुरुआती उपन्यास मिशनरियों ने लिखे थे। उनमें से दो का बंगाली में अनुवाद किया गया था। इन उपन्यासों में पूफलमणी और करुणा नामक उपन्यास भी शामिल थे। 1888 में असमिया विद्याथ्िार्यों ने कोलकाता में असमिया भाषार उन्नतिसाध्न नामक संस्था का गठन किया और जोनकी के नाम से एक पत्रिाका निकालनी शुरू कर दी। इस पत्रिाका के शरिए नए लेखकों को उपन्यास की विधा को विकसित करने का मौव़्ाफा मिला। रजनीकांता बारदोलेइर् ने असम में मनोमती ;1900द्ध के नाम से पहला बड़ा ऐतिहासिक उपन्यास लिखा। यह उपन्यास बमीर् अतिक्रमण के बारे में था जिसकी कहानियाँ लेखक ने संभवतः उन पुराने सिपाहियों से ही सुनी होगी जो 1819 के अभ्िायान में हिस्सा ले चुके थे। यह एक दूसरे के दुश्मन दो परिवारों से संबंध् रखने वाले दो प्रेमियों की कथा है जो यु( के कारण बिछड़ जाते हैं और बाद में दुबारा मिलते हैं। कृतियों को पढ़कर उनका मूल्यांकन करते थे, उनपर बहस - मुबाहिसा करते थे। जब बंकिम ने अपने पहले उपन्यास, दुगेर्शनंदिनी ;1865द्ध का ऐसे ही एक समूह में पाठ किया तो सभा ने दाँतों तले उँगली दबा ली कि बंगालीगद्य ने कितनी जल्दी ऐसी उत्कृष्टता हासिल कर ली थी! कथानक में रहस्य - रोमांच के उतार - चढ़ाव की पटुता तो थी ही, उसकी भाषा भी निराली थी। इसकी गद्य - शैली अपने आप में आनंद का स्रोत बन गइर्। शुरू - शुरू में बंगाली उपन्यासों में शहरी जीवन की तशर् पर बोलचाल की शैली का इस्तेमाल हुआ। साथ ही, महिलाओं में प्रचलित बोली मेयेली का भी उपयोग किया गया। यह शैली जल्द ही बदल गइर् - बंकिम की भाषासंस्कृतनिष्ठ थी पर उसमें बोलियों का भी पुट था। उपन्यास बहुत शीघ्र बंगाल में खूब लोकिय हो गया। बीसवीं सदी तक आते - आते सरल भाषा में कहानी कहने की उनकी व़्ाफाबिलियत ने शरद चंद्र चट्टोपाध्याय ;1876 - 1938द्ध को बंगाल, या शायद पूरे भारत का, सबसे लोकिय उपन्यासकार बना दिया। दाएँ सिरे पर मंदिर बना है जहाँ परिवार के लोग तथा अन्य लोग इक्टठा होते थे जबकि बाएँ सिरे पर वह बैठक है जिसमें बंकिम अपने कुछ दोस्तों के साथ नयी साहित्ियक कृतियों पर चचार् किया करते थे। ध्यान दें, परंपरागत और आध्ुनिक - दोनों व्ि़ाफस्म की जगहें एक दूसरे से सटी दिखाइर् दे रही हैं। यह औपनिवेश्िाक भारत में अध्िकांश बुिजीवियों की खंडित जीवनशैली की ओर संकेत है। बाॅक्स 5 उडि़या उपन्यास 1877 - 78 में नाटककार रामशंकर राय ने सौदामिनी के नाम से पहले उडि़या उपन्यास का धरावाहिक प्रकाशन शुरू किया लेेकिन वे इसे पूरा नहीं कर पाए। 30 साल के भीतर उड़ीसा में पफकीर मोहन सेनापति ;1843 - 1918द्ध के रूप में एक बड़ा उपन्यासकार पैदा किया। उनके एक उपन्यास का नाम छः माणो आठौ गुंठौ ;1902द्ध था जिसका शाब्िदक अथर् है - छह एकड़और बत्तीस गट्ठे शमीन। इस उपन्यास के साथ एक नए व्ि़ाफस्म के उपन्यास की धरा शुरू हुइर् जो शमीन और उस पर हव़्ाफ के सवाल से जुड़ी थी। इस उपन्यास में रामचंद्र मंगराज की कहानी है जो एक शमींदार के मैनेजर की नौकरी करता है। यह मैनेजर अपने आलसी और पियक्कड़ मालिक को ठगता है औरनिःसन्तान बुनकर पति - पत्नी भगिया और सारिया की उपजाऊ शमीन को हथ्िायाने की जुगत सोचता रहता है। मंगराज बुनकर दंपति को बेवकूपफ बनाकर उन्हें व़्ाफशेर् में दबा लेता है जिससे शमीन उसकी हो जाए। यह उपन्यास मील का पत्थर साबित हुआ और इसने साबित कर दिया कि उपन्यास के शरिए ग्रामीण मुद्दों को भी गहरी सोच का अहम हिस्सा बनाया जा सकता है। यह उपन्यास लिखकर पफकीर मोहन ने बंगाल तथा अन्य स्थानों पर बहुत सारे लेखकों के लिए रास्ता खोल दिया था। अगर हम भारत के विभ्िान्न इलाव़्ाफों में उपन्यास के विकास को ग़्ाौर से देखें तो हमें उनमें कइर् सारी क्षेत्राीय विशेषताएँ दिखाइर् देंगी, पर उनमें एक तरह की समानता और बार - बार दिखने वाला पैटनर् भी नशर आएगा। लेखकों को उपन्यास लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिलती थी? उन्हें पढ़ता कौन था? पढ़नेकी संस्कृति किस तरह विकसित हुइर्? औपनिवेश्िाक परिवेश में सामाजिक परिवतर्न से उपन्यास किस तरह रू - ब - रू हुआ? उपन्यासों ने अपने पाठकों के लिए कौन - से नए जगत खोले? इन सवालों का जवाब देने की कोश्िाश करते हुए हम मूल रूप से तीन अलग इलाव़्ाफों के इन तीन लेखकों के रचना जगत को देखेंगेः चंदू मेनन, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय और प्रेमचंद। 3.1 उपन्यास के इस्तेमाल औपनिवेश्िाक सरकार को उपन्यासों में देसी जीवन व रीति - रिवाज से जुड़ी जानकारी का बहुमूल्य स्रोत नशर आया। नाना प्रकार के समुदायों व जातियों वाले भारतीय समाज पर शासन करने के लिए इस तरह की जानकारी उपयोगी थी। भारतीय घरों के अंदर क्या होता है, भला उन्हें वैफसे पता चल पाता? पर भारतीय भाषाओं के इन नए उपन्यासों में गृहस्थी का विपुल वणर्न था। उन्हें पढ़कर लोगों के पहनावे - ओढ़ावे, पूजा - पाठ, उनके विश्वास और आचार आदि के बारे में सहज पता चल सकता था। इनमें से वुफछ किताबों का तो अंग्रेशी अनुवाद भी हुआ, जिसको अंजाम देने वाले अकसर या तो बि्रतानी प्रशासक थे, या इर्साइर् मिशनरी। ¯हदुस्तानियों ने उपन्यासों का इस्तेमाल समाज में जो उनकी नशर में बुराइयाँ थीं, उनकी आलोचना करने और उनके इलाज सुझाने के लिए किया। वीरेश¯लगम जैसे लेखकों ने उपन्यास का उपयोग मूलतः अपने विचारों को श्यादा से श्यादा लोगों तक पहुँचाने के लिए किया। उपन्यासों की मदद से भूत के साथ रिश्ता भी व़्ाफायम किया गया। कइर् सारे उपन्यास पुराने शमाने की शौयर् और सािाश की रोमांचक कहानियाँ थे।प्राचीन काल का महिमा - गायन करके इन कृतियों ने अपने पाठकों में राष्ट्रीय गौरव की भावना का संचार किया। पर यह भी सही है कोइर् भी व्यक्ित उपन्यासों को पढ़ सकता था, बशतेर् उसे उसकी भाषा आती हो। इस तरह भाषा के साझा आधर पर एक अलग व्ि़ाफस्म की सामूहिकता भी पैदा हुइर्। आपने ग़्ाौर किया होगा कि एक ही इलाव़्ोफ के लोग अकसर एक ही भाषा को अलग - अलग लहशे में बोलते हैं - कभी वे एक ही चीश के लिए दूसरे शब्द इस्तेमाल करते हैं, तो कभी उसी शब्द का अलग ढंग से उच्चारण किया जाता है। उपन्यास के आगमन के बाद इस तरह की विविध्ताएँ छपाइर् की बाॅक्स 6 सुधर का संदेश बहुत सारे शुरुआती उपन्यासों में सुधरवादी संदेश साप़्ाफ दिखाइर् देते हैं। उदाहरण के लिए 1899 में गुलावड़ी वेंकटराव द्वारा लिखे गए कन्नड़ उपन्यास - इंदिराबाइर् में नायिका को बहुत कम उम्र में एक बूढ़े से ब्याह दिया जाता है। कुछ ही समय में उसके पति की मृत्यु हो जाती है और उसे विध्वा का जीवन जीने को विवश किया जाता है। अपने परिवार और समाज के विरोध् के बावजूद इंदिराबाइर् अपनी तालीम जारी रखती है। आख्ि़ारकार वह दुबारा शादी करती है। इस बार वह एक अंग्रेशी पढ़े - लिखे आदमी से शादी करती है। उस समय कनार्टक के सामाजिक सुधरकों के सामने महिला श्िाक्षा, विधवाओं की दुदर्शा और लड़कियों के कम उम्र में विवाह से पैदा होने वाली समस्याओं पर काप़्ाफी मंथन चल रहा था। बाॅक्स 7 तमिल भाषा के सबसे लोकपि्रय ऐतिहासिक उपन्यासकारआर. कृष्णमूतिर् रहे हैं जो ‘कल्िक ’ के नाम से लिखते थे। उन्होंने स्वतंत्राता आंदोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया और वे प्रसि( तमिल पत्रिाकाओंμआनंदविकटन और कल्िक के संपादक थे। सरल भाषा में लिखे और बहादुरी, रोमांच, रहस्य से भरे उपन्यासों ने तमिल भाष्िायों की एक पूरी पीढ़ी को अपने मोहपाश में बाँध् लिया। दुनिया में पहली बार दाख्ि़ाल हुईं। उपन्यास का कौन सा पात्रा किस तरह बोलता है, यह उसके इलाव़्ोफ, वगर् या जाति का परिचायक बन गया। इस प्रकार उपन्यास के शरिए लोग यह जान पाए कि उनके इलाव़्ोफ के ही लोग उनकी भाषा किस तरह अलग ढंग से बोलते हैं। 3.2 आध्ुनिक होने की समस्याएँ काल्पनिक कहानियाँ होने के बावजूद उपन्यास अकसर अपने पाठकों से उनके असली संसार की बातें करते। पर यह भी तय है उनमें दुनिया की असलियत वैसी ही नहीं दिखाइर् जाती थी, जैसी वह वाव़्ाफइर् है। कभी - कभी उनमें दुनिया वैफसी होनी चाहिए, उसका आदशर् पेश किया जाता था। सामाजिक उपन्यासकार बहुध आदशर् नायक - नायिकाएँ पेश करते थे, जिन्हें उनके पाठक सराह सवेंफ, जिनका वे अनुसरण कर सवेंफ। ये आदशर् गुण भला वैफसे परिभाष्िात होते थे? औपनिवेश्िाक काल के कइर् उपन्यासों में आदशर् व्यक्ित ग़्ाुलामी के जीवन की सबसे अहम दुविध का सपफलतापूवर्क निवार्ह करता हैः परंपरा को त्यागे बिना आध्ुनिक वैफसे बनें? पश्िचम से आने वाले विचारों को अपनी पहचान खोए बगैर वैफसे स्वीकारें? चंदू मेनन की इंदुलेखा के रूप में जिस पात्रा का सृजन किया, उस अपूवर्सुंदरी में कइर् अद्भुत बौिक और कलात्मक प्रतिभाएँ थीं, और वह संस्कृत व अंग्रेशी पढ़ी हुइर् थी। नायक माध्वन भी आदशर् रंग में रँगा गया था। वह मद्रास विश्वविद्यालय से पैदा हुए नए अंग्रेशी - श्िाक्षा - प्राप्त नायर वगर् का सदस्य था। साथ ही वह ‘उच्च कोटि का संस्कृतज्ञ’ भी था। पश्िचमी कपड़े ़तो पहनता था, पर साथ ही, नायर रीति के मुताबिवफ लंबी चुटिया भी रखता था। श्यादातर उपन्यास के नायक व नायिकाएँ आध्ुनिक दुनिया की पैदाइश थे। इस तरह वे भारत के पुराने शमाने के मिथकीय आदशर् चरित्रों से अलग थे। औपनिवेश्िाक युग में अंग्रेशी - श्िाक्ष्िात वगर् को पाश्चात्य रहन - सहन और विचार आक£षत करते थे। पर उन्हें इसका भी अंदेशा था कि पश्िचमी मूल्यों को थोक - भाव से अपना लेने पर कहीं उनकी अपनी पारंपरिक जीवन - शैली न नष्ट हो जाए। इंदुलेखा और माध्वन जैसे व्ि़ाफरदारों ने पाठकों को दिखाया कि वैफसे भारतीय और विदेशी जीवन - शैली में आदशर् तालमेल बिठाया जा सकता है। 3.3 पाठ का आनंद बाव़्ाफी दुनिया की तरह उपन्यास भारत में भी मध्यवगर् के मनोरंजन का लोकिय माध्यम बन गया। किताबों के चलन में आने के बाद लोगों के हाथ मन - बहलाव के नए तरीव़्ोफ लग गए। सचित्रा किताबें, दूसरी भाषाओं से अनुवाद, लोकिय गाने, जिन्हें कभी - कभी समसामयिक घटनाओं के आधर पर रचा जाता था, ये सब मनोरंजन के नए साध्न थे। ¯प्रट की इस नयीसंस्कृति में उपन्यास जल्द ही महा - लोकिय हो गए। मिसाल के तौर पर तमिल में बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में उपन्यासों की बाढ़ - सी आ गइर्। पाठकों माँग पूरी करने के लिए जासूसी और रहस्यात्मक उपन्यास को तो कइर् दप़्ोफ छापना पड़ता था - और वुफछेक तो 22 बार पुनमुर्ित हुए। उपन्यास की मदद से लोगों ने मौन रहकर पढ़ना सीखा। हम चुपचाप पढ़ने के ऐसे आदी हो चुके हैं कि हमारे लिए यह सोचना भी मुश्िकल हो जाता है कि पहले के शमाने में यह आम चलन नहीं था। उन्नीसवीं सदी के आख्िार तक बल्िक शायद बीसवीं सदी की शुरुआत तक लिख्िात पाठ बोल - बोल कर पढ़ा जाता था ताकि इकट्ठा लोग सुन सवेंफ। कभी - कभी उपन्यास भी ऐसे ही पढ़े जाते रहे पर आमतौर पर उपन्यास अकेले में और खामोश रहकर ही पढ़े जाते। घर में अकेला बैठा या रेलगाड़ी में सप़्ाफर करता व्यक्ित उपन्यास पढ़ने का आनंद ले सकता था। किसी भीड़ - भरे कमरे में भी पाठक उपन्यास की दुनिया मंे डूबकर सब - वुफछ भूल सकता था। इस तरह उपन्यास पढ़ना एक दिवास्वप्न देखने जैसा था। 4 महिलाएँ और उपन्यास वुफछ लोगों को यह ¯चता सताने लगी कि उपन्यास का लोगों के शेहन पर क्या प्रभाव पड़ेगाμक्योंकि श्यादातर पाठक तो हव़्ाफीव़्ाफत की दुनिया से ऐसे काल्पनिक जगत में चले जाते थे, जहाँ वुफछ भी हो सकता था। उनमें से वुफछ ने पत्रा - पत्रिाकाओं में लेख लिखकर लोगों से अपील की कि वे उपन्यासों के नैतिक दुष्प्रभाव से बचें। यह निदेर्श ख़ासतौर पर महिलाओं और बच्चों को लक्ष्िात था: माना जाता था कि उन्हें बड़ी आसानी से बहकाया जा सकता है। वुफछ माँ - बाप उपन्यासों को अपने बच्चों की पहुँच से बाहर, मसलन छज्जे पर छिपाकर, रखते थे। युवा अकसर पढ़ने का काम चोरी - छिपे करते थे। लेकिन यह उत्साह सिप़्ार्फ युवाओं तक सीमित नहीं था। बड़ी - बूढ़ी महिलाएँ जो आमतौर पर पढ़ी - लिखी नहीं थीं, भी लोकिय तमिल उपन्यासों को अपने पोते - पोतियों से बड़ी तल्लीनता से सुनती थीं, जो कि दादी - नानी की कहानियों की कहावत का एकदम उलट व्ि़ाफस्सा हुआ। लेकिन महिलाएँ पुरुषों द्वारा लिखी गइर् कहानियों की पाठिका - मात्रा बनकर नहीं रहीं। वुफछ भाषाओं में उनकी सबसे शुरुआती रचनाएँ कविताएँ, लेख या आत्मकथात्मक बयान थीं। बीसवीं सदी के आरंभ्िाक दशकों में दक्ष्िाण भारत की लेख्िाकाओं ने उपन्यास और कहानियाँ भी लिखनी शुरू कर दीं। महिलाओं के बीच उपन्यास की लोकियता का एक कारण यह भी था कि इससे नारीत्व की एक नयी परिकल्पना उभरती थी। कइर् उपन्यासों की मूल कथानकμप्रेम - कहानियोंμमें ऐसी महिलाएँ आती थीं, जो अपने साथी या रिश्ते को स्वयं चुन सकती थीं, या उन्हें अस्वीकार सकती थीं। यानी इनमें ऐसी महिलाओं का चित्राण था जो अपनी ¯शदगी की मालकिन खुद थीं। वुफछ लेख्िाकाओं ने ऐसी नारियों के बारे में लिखा जिन्होंने औरतों के साथ - साथ मदो± की दुनिया भी बदल डाली। रोवैफया हुसैन ;1880 - 1932द्ध समाज सुधरक थीं, जिन्होंने विध्वा होने केबाद कलकत्ता में एक बालिका विद्यालय की स्थापना की। उन्होंने अंग्रेशी में सुल्ताना’श ड्रीम, 1905 ;सुल्ताना का स्वप्नद्ध नामक एक व्यंग्यात्मक प़्ांफतासी लिखी, जिसमें उस उलट - पुलट भरी दुनिया की बात की गइर् जहाँ महिलाओं ने पुरुषों की जगह ले ली है। उनके उपन्यास पद्मराग ने अपनी व्ि़ाफस्मत का प़्ौफसला खुद करके महिलाओं की दशा सुधरने का आह्नान किया। हैरत की बात नहीं कि कइर् सारे मदर् महिलाओं द्वारा उपन्यास लिखने या पढ़ने के चलन को शक की नशर से देखते थे। शक करने वालों में हर समुदाय नए शब्द व्यंग्य: लेखन, चित्राकारी, रेखांकन आदि के माध्यम से निरूपण का एक ऐसा ढंग जिसमें हास्यपरक और चतुर ढंग से समाज की आलोचना की जाती है। 194 इस काष्ठ चित्रा में दशार्या गया है कि किस तरह औरतें भी पढ़ने का मशा लेने लगी थीं। उन्नीसवीं सदी के अंत में पढ़ती हुइर् औरतों की छवियाँ भारत की लोकपि्रय पत्रिाकाओं में अकसर दिखाइर् देने लगी थीं। स्रोत - क के लोग थे। इर्साइर् ध्मर्प्रचारक और बंगाली के शायद पहले उपन्यास करुणा ओ पूफलमनीर बिबरण ;1852द्ध की लेख्िाका हाना मूलेन्स अपने पाठकों को बताती हैं कि वे गुप्त रूप से लिखा करती थीं। बीसवीं सदी में शैलबाला घोष जया इसलिए लिख पाईं क्योंकि उन्हें अपने पति का संरक्षण प्राप्त था। जैसा कि हमें दक्ष्िाण भारत के दृष्टांत से पता है, यहाँ भी लड़कियों और महिलाओं को पढ़ने से निरुत्साहित किया जाता था। 4.1 जाति प्रथा, ‘निम्न जातियाँ’ और अल्पसंख्यक आपको पता है कि इंदुलेखा एक प्रेम कहानी थी। लेकिन यह ‘उच्च जाति’ की एक वैवाहिक समस्या से भी रू - ब - रू थी जिस पर इसके लिखे जाने के वक़्त वाद - विवाद चल रहा था। नम्बूदरी ब्राह्मण उस समय केरल के बड़े शमींदार थे और नायरों का एक बड़ा तबव़्ाफा उनके रैयत/लगानदार थे। अपने आप ध्न अ£जत कर अमीर बने नायरों की नयी पीढ़ी नायर महिलाओं केसाथ नम्बूदरी ब्राह्मणों के रिश्ते पर आपिा जताने लगी। वे चाहते थे कि शादीऔर संपिा को लेकर नए व़्ाफानून बनाए जाएँ। इस विवाद के आलोक में इंदुलेखा को पढ़ना काप़्ाफी दिलचस्प होगा। जो इंदुलेखा से शादी के लिए आनेवाले सूरी नम्बूदरी नामक बेववूफप़्ाफ शमींदार को इस उपन्यास के व्यंग्य का श्िाकार बनाया गया है। बुिमान नायिका उसको अस्वीकार कर देती है, और पढ़े - लिखे, सुंदर, नायर माध्वन को चुनती है, पिफर युवा दंपति मद्रास आकर रहते हैं, जहाँ माध्वन सिविल सेवा में नौकरी करता है। सूरी नम्बूदरी को शादी की तड़प थी, लिहाशा वह उसी परिवार की एक ग़्ारीब संबंधी से शादी रचा कर चला जाता है, यह सोचते हुए कि उसने इंदुलेखा से ही शादी की है। चंदू मेनन चाहते हैं कि उनके पाठक नायक - नायिका द्वारा अपनाए गए नए मूल्यों को सराहें और सूरी नम्बूदरी के अनैतिक हथकंडों की ¯नदा करें। इंदिराबाइर् और इंदुलेखा जैसे उपन्यास उच्च जाति के उपन्यासकारों द्वारा, मूल रूप से वैसे ही चरित्रों को लेकर लिखे गए थे। लेकिन सारे उपन्यास ऐसे ही नहीं थे। उत्तरी केरल की ‘निम्न’ जाति के लेखक पोथेरी वुंफजाम्बु ने 1892 में सरस्वतीविजयम नामक उपन्यास लिखा, जिसमें जाति - दमन की कड़ी ¯नदा की गइर्। इस उपन्यास का ‘अछूत’ नायक ब्राह्मण शमींदार के शुल्म से बचने के लिए शहर भाग जाता है। वह इर्साइर् ध्मर् अपना लेता है, पढ़ - लिखकर जज बनकर, स्थानीय कचहरी में वापस आता है। इसी बीच गाँव वाले यह सोचकर कि शमींदार ने उसकी हत्या कर दी है, अदालत में मुव़्ाफदमा कर देते हैं। मामले की सुनवाइर् के आख्ि़ार में जज अपनी असली पहचान खोलता है और नम्बूदरी को अपने किए पर पश्चाताप होता है, वह सुध्र जाता है। इस तरह सरस्वतीविजयम निम्न जाति के लोगों की तरक्व़्ाफी के लिए श्िाक्षा केमहत्त्व को रेखांकित करता है। बाॅक्स 8 किताबों के साथ औरतें ‘आजकल हम काली किनारी वाली साडि़याँ पहने और हाथों में मोटी - मोटी किताबें लिए औरतों को अपने घर में टहलते देखते हैं। उनके हाथों में अकसर किताबें देखकर उनके भाइर् या पति भयभीत हो जाते हैं - कहीं वे किसी शब्द का मतलब न पूछ लें।’ साधरणी, 1880 चन्दू मेनन का मानना था कि उपन्यास भी भारतीय चित्राकला के क्षेत्रा में सामने आ रहे नए रुझानों की तरह हैं। राजा रवि वमार् इस काल के सबसे प्रमुख तैल चित्राकारों में थे ;1848 - 1906द्ध। चन्दू मेनन ने अपनी नायिकाओं का जिस तरह चित्राण किया है उस पर रवि वमार् के चित्रों का असर भी हो सकता है। बंगाल में भी 1920 के आसपास एक नयी व्ि़ाफस्म के उपन्यास का आना हुआ जिनमें किसानों और निम्न जातियों से जुड़े मसले उठाए गए। अद्वैत मल्ला बमर्न ;1914 - 51द्ध ने तीताश एकटी नदीर नाम ;1956द्ध के रूप में तीताश नदी में मछली मारकर जीनेवाले मल्लाहों के जीवन पर एक महाकाव्यात्मक उपन्यास लिखा। इसमें मल्लाहों की तीन पीढि़यों की, उनकी सतत त्रासदियों की और अपनी सुहागरात को ही एक - दूसरे से बिछुड़ गए माँ - बाप के बेटे अनंत की कहानियाँ हैं। अनंत अपनी बिरादरी को छोड़कर शहर आकर पढ़ाइर् करता है। उपन्यास में मल्लाहों के सामुदायिक जीवन का, उनके होली और काली पूजा उत्सवों का, नौका - दौड़, भटियाली गानों, किसानों से उनके रिश्ते, दोस्ती - दुश्मनी और उच्च जातियों के साथ साथ उनकी वैमनस्यता का विशदवणर्न है। पर ध्ीरे - ध्ीरे शहर से आते सांस्कृतिक प्रभावों के दबाव में समुदाय में दरार पड़ जाती है, मल्लाह आपस में लड़ने लगते हैं। समुदाय और नदी के बीच बड़ा नशदीकी आपसी संबंध् है। उनका अंत भी साथ - साथ होता हैμज्यों - ज्यों नदी सूखती है, समुदाय मरता जाता है। हालाँकि बमर्न से पहले के उपन्यासकारों ने भी ‘निम्न’ जाति के व्ि़ाफरदार रचे थे पर तीताश इसलिए ख़ास है चूँकि लेखक खुद ‘निम्न’ जाति के मल्लाह समुदाय के थे। वक़्त के साथ उपन्यास - माध्यम में ऐसे समुदायों को स्थान मिलने लगा जो साहित्ियक परिदृश्य पर अब तक नशर नहीं आए थे। मिसाल के तौर पर वैकोम मुहम्मद बशीर ;1908 - 94द्ध मलयालम में मशहूर होनेवाले शुरुआती मुस्िलम उपन्यासकारों में से एक थे। बशीर की औपचारिक श्िाक्षा नहीं के बराबर हुइर् थी। उनकी श्यादातर कृतियाँ उनके अपने अनुभवों, न कि पढ़ी हुइर् किताबों, पर आधरित थीं। पाँच साल की उम्र में स्वूफल की पढ़ाइर् करते समय उन्होंने नमक सत्याग्रह में भाग लेने के लिए घर छोड़ दिया। बाद में सालों तक वह भारत के विभ्िान्न हिस्सों में घूमते रहे, पिफर अरब गए, जहाश पर काम किया, सूप़्ाफी और ¯हदू संन्यासियों की सोहबत की, पहलवानी भी सीखी। बशीर की उपन्यासिकाएँ और कहानियाँ आम बोलचाल की भाषा में लिखी गइर् थीं। बशीर के उपन्यास मुस्िलम घरों की रोशाना की ¯शदगी को चुटीले अंदाश में बयान करते थे। अपने लेखन में उन्होंने ग़्ारीब, पागलपन, और बंदी जीवन पर ऐसे कथानक रचे जो मलयालम में उस समय आम नहीं थे। लेखक के तौर पर अपने शुरुआती सालों में बशीर को अपनी किताबों के सहारे रोशी - रोटी चलाने में भारी परेशानी पेश आइर्। वे खुद अपनी किताबें घरों और दुकानों में जाकर बेचते थे। बशीर ने अपनी कुछ कहानियों में उन दिनों का भी िाक्र किया है जब वे अपनी ही किताबों को घूम - घूमकर बेचते थे। 5 राष्ट्र और उसका इतिहास औपनिवेश्िाक इतिहासकारों द्वारा लिखे गए इतिहास में ¯हदुस्तानियों को आमतौर पर कमशोर, आपस में विभाजित और अंग्रेशों पर निभर्र बताया जाता था। इस इतिहास से भारत के नए प्रशासकों और बौिकों को असंतोष होना लािामी था। न ही उनका विश्वास सुरों - असुरों के हैरतअंगेश और अंधविश्वासी कारनामों व किरदारों से पटी पारंपरिक पौराण्िाक कहानियों पर जम सकता था। ऐसे मानस को भूत के एक नए दृष्िटकोण की दरकार थी, वे यह जताना चाहते थे कि भारतीय स्वतंत्रा चेतना वाले थे, और इतिहास में भी आशाद - ख़याल रहे थे। उन्हें उपन्यास ने एक अच्छा समाधन मुहैया कराया। इसमें राष्ट्र भूतकाल में कल्िपत किया जा सकता था, और इस तरह अतीत में ऐतिहासिक चरित्रा और स्थान, घटनाएँ और तारीख़ हो सकती थीं। बंगाल में कइर् सारे उपन्यास मराठों व राजपूतों को लेकर लिखे गए। इनसे अख्िाल - भारतीयता का अहसास पैदा हुआ। उनमें कल्िपत राष्ट्र रूमानी साहस, वीरता, और त्याग से ओत - प्रोत था। ये ऐसे गुण थे जिन्हें उन्नीसवीं सदी केदफ्ऱतरों और सड़कों पर पाना मुश्िकल था। इस तरह उपन्यास में ग़्ाुलाम जनता ने अपनी चाहत को साकार करने का शरिया ढूँढ़ा। भूदेब मुखोपाध्याय;1827 - 94द्ध कृत अँगुरिया बिनिमाॅय ;1857द्ध बंगाल में लिखा जाने वाला पहला ऐतिहासिक उपन्यास था। इसके नायक श्िावाजी ध्ूतर् और वुफटिल औरंगशेब से कइर् बार लोहा लेते हैं। मान ¯सह श्िावाजी को शांति - समझौता के लिए आग्रह करते हैं। लेकिन यह समझने के बाद कि औरंगशेब उन्हें नशरबंद करना चाहता है, श्िावाजी भाग निकलते हैं और पिफर से जंग केमैदान में नशर आते हैं। उनके साहस और जीवन का प्रेरणाड्डोत यह विश्वास है कि वे ¯हदुओं की आशादी के लिए लड़ रहे राष्ट्रवादी हैं। उपन्यास में कल्िपत राष्ट्र में इतनी ताव़्ाफत थी कि इससे प्रेरित होकर असली राजनीतिक आंदोलन उठ खड़े हुए। बंकिम का आनंदमठ ;1882द्ध मुसलमानों से लड़कर ¯हदू साम्राज्य स्थापित करने वाले ¯हदू सैन्य - संगठन की कहानी कहता है। इस एक उपन्यास ने तरह - तरह के स्वतंत्राता - सेनानियों को प्रेरित किया। इनमें से वुफछ उपन्यास हमें राष्ट्र के बारे में एक और तरह से सोचने को मजबूर करते हैं। क्या भारत को सिप़्ार्फ एक ध£मक समुदाय का होना था? किन लोगों के पास इस राष्ट्र के वासी होने का व़्ाुफदरती दावा था? 5.1 उपन्यास और राष्ट्र - निमार्ण साहस और शौयर्शाली अतीत के आह्वान के शरिए उपन्यास को एक साझे राष्ट्र के अहसास को लोकिय बनाने में मदद मिली। साझा समाज दिखाने का एक और तरीका यह था कि उपन्यास में हर तबव़्ोफ या वगर् के चरित्रा गढ़े जाएँ। प्रेमचंद के उपन्यासों में समाज के हर स्तर से आए नानाविध् बहुत सारे उपन्यासों पर प्ि़ाफल्में बनी। तकषी श्िावशंकर पिल्लै ;1912 - 99द्ध द्वारा लिख्िात उपन्यास चेम्मीन ;झींगा, 1956द्ध केरल के मछुआरा समुदाय की पृष्ठभूमि पर आधारित है और उसके पात्रा मलयालम की विभ्िान्न शैलियों में बात करते हैं। रामू करयात के निदेर्शन में चेम्मीन प्ि़ाफल्म 1965 में बनाइर् गइर्। यह प्ि़ाफल्म 1930 में प्रसि( कन्नड़ उपन्यासकार श्िावराम कारंत ;1902 - 1997द्ध द्वारा लिखे गए इसी नाम के उपन्यास पर आधरित है। शक्ितशाली चरित्रा हैं। वहाँ आपको एक तरप़्ाफ शमींदार और नवाब मिलेंगे तो दूसरी तरप़्ाफ किसान और भूमिहीन मशदूर, मध्यवगर् के नौकरी - पेशा लोग मिलेंगे तो समाज के हाश्िाए पर पड़े इनसान भी। उनकी महिलाएँμख़ासतौर पर निचले वगर् की ग़्ौर - आध्ुनिक औरतेंμभी ताव़्ाफतवर व्यक्ितत्व की मालकिन हैं। अपने कइर् दीगर समकालीनों के विपरीत, प्रेमचंद ने प्राचीनइतिहास से मोह से परहेश किया। उनके उपन्यासों में अतीत के महत्त्व को न भूलते हुए भविष्य की ओर देखने की पहल दिखाइर् देती है। समाज के विभ्िान्न तबव़्ाफों से आते पे्रमचंद के पात्रा जनवादी मूल्यों पर आधारित समाज बनाते दिखते हैं। रंगभूमि का केंद्रीय चरित्रा, सूरदास, तथाकथ्िात अछूत जाति का ज्योतिहीन भ्िाखारी है। इस तरह के ‘नायक’ का चयन अपने आप में ख़ास बात है। संदेश यह है कि सबसे दबे - वुफचले - सताए लोग भी साहित्ियक रचना के विषय हो सकते हैं। हम सूरदास को तम्बावूफ प़्ौफक्ट्री के लिए व़्ाफब्शे से अपनी शमीन को बचाने के लिए संघषर्रत पाते हैं। कहानी पढ़ते - पढ़ते हमें समाज और आम लोगों के जीवन पर औद्योगीकरण के असर के बारे में सोचने लगते हैं। इससे दरअसल किसका प़्ाफायदा होता है? क्या इसके हित में जीने के अन्य तरीव़्ाफों की बलि देना शरूरी है? सूरदास की कहानी के स्रोत महात्मा गाँध्ी के व्यक्ितत्व और विचारों में खोजे जा सकते हैं। गोदान ;1936द्ध प्रेमचंद की सबसे मशहूर कृति है। यह भारतीय किसानों पर लिखा गया महान उपन्यास है। इस उपन्यास में किसान होरी और उसकी बीवीधनिया की कहानी है। समाज में सत्ता के मालिक लोगμशमींदार, महाजन, पुजारी और औपनिवेश्िाक नौकरशाहीμउन्हें अपने दमन के दुष्चक्र में ऐसा पफाँसते हैं कि वे भूमिहीन मशदूर बन जाते हैं। पर सबके बावजूद होरी और ध्निया आख्ि़ार तक अपनी गरिमा बनाए रखते हैं। निष्कषर् हमने देखा कि अपने इतिहास में उपन्यास किस तरह पश्िचम और भारत दोनों जगहों पर विभ्िान्न तबव़्ाफों के लोगों की ¯शदगी का अहम हिस्सा बन जाता है। छपाइर् की तकनीक में विकास के चलते यह अपने छोटे पाठक - वगर् से बाहर निकलता हुआ पठन के नए तरीव़्ोफ सुझाता है। उपन्यासों ने ऐसे लोगों की कहानियाँ गढ़ीं, जिनके बारे में आमतौर पर श्िाक्ष्िात व मध्वगीर्य समाज गतिविध्ि गोदान को पढ़ें। संक्षेप में लिखेंμ ऽ उपन्यास में प्रेमचंद ने किसानों की ¯शदगी का किस तरह वणर्न किया है। ऽ महामंदी के समय किसानों की ¯शदगी वैफसी थी, इसके बारे में उपन्यास हमें क्या बताता है। बाॅक्स 9 बंकिम की मृत्यु के बाद रबीन्द्रनाथ टैगोर ;1861 - 1941द्ध ने बंगला उपन्यास को और विकसित किया। उनके शुरुआती उपन्यास ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधरित होते थे। बाद में वे घरेलू संबंधें के बारे में कहानियाँ लिखने लगे। टैगोर मुख्य रूप से औरतों की हालत और राष्ट्रवाद पर लिखते हैं। उनकी ये दोनों ¯चताएँ घरे बायरे ;1916द्ध में दिखाइर् देती हैं जिसका 1919 में अंग्रेशी में द होम एण्ड द वल्डर् के नाम से अनुवाद किया गया था। यह एक उदारवादी शमींदार निख्िालेश की पत्नी बिमला की कहानी है। निख्िालेश को लगता है कि वह अपने देश के ग़्ारीब और हाश्िायाइर् लोगों की ¯शदगी में सुधर लाकर देश को बचा सकता है। लेकिन बिमला अपने पति के दोस्त संदीप की ओर आकष्िार्त है जो चरमपंथी विचारों में विश्वास रखता है। संदीप अंग्रेशों को उखाड़ पेंफकने के उद्यम में इतना खोया हुआ है कि उसे ‘निचली’ जातियों और मुसलमानों की बेगानगी के अससास से भी कोइर् दिक़्व़्ाफत नहीं है। संदीप की टोली में शामिल होकरबिमला के भीतर आत्ममहत्त्व और स्वाभ्िामान की भावना जाग उठती है। रबीन्द्रनाथ ने औरतों के लिए राष्ट्रवादी आंदोलन में हिस्सेदारी के अन्तविर्रोध्ी प्रभावों को भी दशार्या है। टोली के युवा सदस्य बिमला की भले ही तारीप़्ाफ करते हों लेकिन इसके बावजूद वह उनके प़्ौफसलों को प्रभावित नहीं कर सकती। वस्तुतः संदीप आंदोलन के लिए चंदा इकट्ठा करने में उसका इस्तेमाल ही करता है। टैगोर के उपन्यास इसलिए ध्यान खींचते हैं क्योंकि उनको पढ़कर हम औरत - मदर् के रिश्तों और राष्ट्रवाद दोनों के बारे में, पुनविर्चार को बाध्य हो जाते हैं। के बीच जानकारी नहीं के बराबर थी। हमने प्रेमचंद के हवाले से वुफछ ऐसी मिसालें देखीं, लेकिन ये उदाहरण दूसरे उपन्यासकारों में भी मौजूद हैं। भ्िान्न - भ्िान्न पृष्ठभूमि के लोगों को एक साथ लाने पर एक साझा सामुदायिक समझ बनती है। ऐसे समुदाय का सबसे ग़्ाौरतलब रूप राष्ट्र का है। यह बात भी उतनी ही अहम है कि ताव़्ाफतवर और कमशोर दोनों तरह के लोगों वसंस्कृतियों को साथ लाकर उपन्यास इन समुदायों की प्रकृति के बारे में बहुत सारे सवाल खड़े करता है। हम कह सकते हैं कि उपन्यास साझेपन का एक अहसास पैदा करता है और साथ ही अलग - अलग तरह के लोगों, समुदायों और मूल्यों का बोध् कराता है। साथ ही विभ्िान्न समूहों के लोग जिस तरह अपनी पहचान पर सोचते हुए, उस पर सवाल उठाते हैं, उपन्यास हमें इसका भी अंदाशा देता है। संक्षेप में लिखें चचार् करें परियोजना कायर् कल्पना कीजिए कि आप सन् 3035 के इतिहासकार हैं। अभी आपने दो ऐसे उपन्यास देखे हैं जो बीसवीं सदी में लिखे गए थे। उन उपन्यासों से आपको उस शमाने के समाज और रीति - रिवाजों के बारे में क्या पता चलता है? परियोजना कायर्

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