मुद्रण संस्वृफति और आध्ुनिक दुनिया मुित या छपी हुइर् सामग्री के बग़्ौर दुनिया की कल्पना हमारे लिए कितनी मुश्िकल है! हम अपने चारों तरप़्ाफ जहाँ नज़्ार दौड़ाएँ, हमें कोइर् न कोइर् छपी हुइर् चीज़्ा दिखाइर् देगीः किताबें, पत्रा - पत्रिाकाएँ, अख़बार, मशहूर तसवीरों की नव़फलें, मेज़्ा पर पड़े नाटक के प्रोग्राम, सरकारी सूचनाएँ, वैफलेंडर, डायरी, सड़क के किनारे विज्ञापन और सिनेमा के पोस्टर, आदि - आदि। हम छपा हुआ साहित्य पढ़ते हैं, पें¯टग देखते हैं, अख़बार पढ़ते हैं, और सावर्जनिक दुनिया में चल रहे विवादों का जायज़्ाा लेते हैं। हम मुित दुनिया के अस्ितत्व को मानकर चलते हैं, यह सोचने की भी ज़्ारूरत नहीं पड़ती कि छपाइर् के पहले भी एक दुनिया थी। हम शायद ही महसूस करते हैं कि छपाइर् का अपना एक इतिहास है, और इस इतिहास ने हमारे समकालीन ज़्ामाने को आकार दिया है। यह इतिहास क्या है? समाज में मुित सामग्री कब से चलनी शुरू हुइर्? आध्ुनिक दुनिया को बनाने में इसकी क्या भूमिका थी? इस अध्याय में हम मुद्रण के इसी इतिहास को देखेंगे - वैफसे यह पूवीर् एश्िाया से शुरू होकर यूरोप और भारत में पैफला। हम मुद्रण तकनीक के प्रसार और प्रभाव को सामाजिक जीवन में आए बदलाव से जोड़कर समझने की कोश्िाश करेंगे। चित्रा 1 μ ¯प्रट के आने से पहले पुस्तक - निमार्ण, अख़लाव़्ाफ - ए - नसीरी, 1595, से। भारत का एक शाही ववर्फशाॅप - भारत में छपाइर् आने से काप़फी पहले। यहाँ पर पाठ को पहले बोलकर लिखाया जा रहा है, पिफर तस्वीर बनाइर् जा रही है। पुस्तक - निमार्ण में सुलेखन औरचित्राकारी का बहुत महत्त्व था। छापेख़ाने के आने के बाद इन कलाओं का क्या हुआ, यह सोचने लायक है। मुद्रण संस्वृफति और आध्ुनिक दुनिया अध्याय 7 1 शुरुआती छपी किताबें मुद्रण की सबसे पहली तकनीक चीन, जापान और कोरिया में विकसित हुइर्। यह छपाइर् हाथ से होती थी। तव़्ाफरीबन 594 इर्. से चीन में स्याही लगे काठ के ब्लाॅक या तख़्ती पर काग़्ाज़्ा को रगड़कर किताबें छापी जाने लगी थीं। चूँकि पतले, छिदि्रत काग़्ाज़्ा के दोनों तरप़्ाफ छपाइर् संभव नहीं थी, इसलिए पारंपरिक चीनी किताब ‘एकाॅ£डयन’ शैली में, किनारों को मोड़ने के बाद सिल कर बनाइर् जाती थी। किताबों का सुलेखन या ख़ुशनवीसी करनेवाले लोग दक्ष सुलेखक या ख़ुशख़त होते थे, जो हाथ से बड़े सुंदर - सुडौल अक्षरों में सही - सही कलात्मक लिखाइर् करते थे। एक लंबे अरसे तक मुित सामग्री का सबसे बड़ा उत्पादक चीनी राजतंत्रा था। सिविल सेवा परीक्षा से नियुक्त चीन की नौकरशाही भी विशालकाय थी, तो चीनी राजतंत्रा इन परीक्षाओं के लिए बड़ी तादाद में किताबें छपवाता था। सोलहवीं सदी में परीक्षा देने वालों की तादाद बढ़ी, लिहाज़्ाा, छपी किताबों की मात्रा भी उसी अनुपात में बढ़ गइर्। सत्राहवीं सदी तक आते - आते चीन में शहरी संस्क्ृफति के पफलने - पूफलने से छपाइर् के इस्तेमाल में भी विविध्ता आइर्। अब मुित सामग्री के उपभोक्ता सिप़्ार्फ विद्वान और अध्िकारी नहीं रहे। व्यापारी अपने रोशमरार् के कारोबार की जानकारी लेने के लिए मुित सामग्री का इस्तेमाल करने लगे। पढ़ना एक शग़्ाल भी बन गया। नए पाठक वगर् को काल्पनिक व्ि़ाफस्से, कविताएँ, आत्मकथाएँ, शास्त्राीय साहित्ियक वृफतियों के संकलन और रूमानी नाटक पसंद थे। अमीर महिलाओं ने भी पढ़ना शुरू किया और कुछ ने स्वरचित काव्य और नाटक भी छापे। पढ़ने की यह नयी संस्वृफति एक नयी तकनीक के साथ आइर्। उन्नीसवीं सदी के अंत में पश्िचमी शक्ितयों द्वारा अपनी चैकियाँ स्थापित करने के साथ ही पश्िचमी मुद्रण तकनीक और मशीनी प्रेस का आयात भी हुआ। पश्िचमी शैली के स्कूलों की ज़्ारूरतों को पूरा करने वाला शंघाइर् ¯प्रट - संस्वृफति का नया वेंफद्र बन गया। हाथ की छपाइर् की जगह अब ध्ीरे - ध्ीरे मशीनी या यांत्रिाक छपाइर् ने ले ली। 1.1 जापान में मुद्रण चीनी बौ( प्रचारक 768 - 770 इर्. के आसपास छपाइर् की तकनीक लेकर जापान आए। जापान की सबसे पुरानी, 868 इर्. में छपी, पुस्तक डायमंड सूत्रा है, जिसमें पाठ के साथ - साथ काठ पर खुदे चित्रा हैं। तसवीरें अकसरकपड़ों, ताश के पत्तों और काग़्ाज़्ा के नोटों पर बनाइर् जाती थीं। मध्यकालीन जापान में कवि भी छपते थे और गद्यकार भी, और किताबें सस्ती और सुलभ थीं। नए शब्द ख़ुशनवीसी: सुलेखन ;ब्ंससपहतंचीलद्ध अठारहवीं सदी के अंत में, एदो ;बाद में जिसे तोक्यो के नाम से जाना गयाद्ध के शहरी इलाव़्ोफ की चित्राकारी में शालीन शहरी संस्वृफति का पता मिलता है जिसमें हम चायघर के मजमों, कलाकारों, और तवायप़्ाफों को देख सकते हैं। हाथ से मुित तरह - तरह की सामग्री μ महिलाओं, संगीत के साज़्ाों, हिसाब - किताब, चाय अनुष्ठान, पूफलसाज़्ाी, श्िाष्टाचार और रसोइर् पर लिखी किताबों μ से पुस्तकालय एवं दुकानें अटी पड़ी थीं। बाॅक्स 1 कितागावा उतामारो, 1753 इर्. में एदो में पैदा हुए उतामारो ने उकियो ;तैरती दुनिया के चित्राद्ध नाम की एक नयी चित्राकला शैली में अहम योगदान किए, जिनमें आम शहरी जीवन का चित्राण किया गया। इनकी छपी प्रतियाँ यूरोप और अमेरिका पहुँची और माने, मोने और वान गाॅग जैसे चित्राकारों को प्रभावित किया। त्सुताया जुशाबूरो जैसे प्रकाशकों ने विषय चुनकर कलाकारों से उन पर चित्रा बनाने का व़्ाफरार किया जाता पिफर चित्राकार विषय की रूपरेखा बनाते थे। इसके बाद हुनरमंद वुडब्लाॅक श्िाल्पी चित्राकार द्वारा बनाइर् गइर् रूपरेखा को तख़्ती पर चिपकाकर उसकी आकृति को उकेर लेते थे। इस प्रिया में मूल आरेख तो ग़्ाायब हो जाता था, पर उसकी छपी नव़्ाफल बच जाती थी। चित्रा 3 μ कितागावा उतामारो की एक उकियो रचना। चित्रा 4 μ सुबह का नशारा। रचयिता: शुन्मन वुफबो, अठारहवीं सदी के अंत में। 2 यूरोप में मुद्रण का आना सदियों तक चीन से रेशम और मसाले रेशम मागर् से यूरोप आते रहे थे। ग्यारहवीं सदी में चीनी काग़्ाज़्ा भी उसी रास्ते वहाँ पहँुचा। काग़्ाज़्ा ने कातिबों या मुंश्िायों द्वारा सावधनीपूवर्क लिखी गइर् पांडुलिपियों के उत्पादन को मुमकिन बनाया। पिफर 1295 इर्. में माकोर् पोलो नामक महान खोजी यात्राी चीन में काप़्ाफी साल तक खोज करने के बाद इटली वापस लौटा। जैसा कि आपनेऊपर पढ़ा, चीन के पास वुडब्लाॅक ;काठ की तख़्तीद्ध वाली छपाइर् की तकनीक पहले से मौजूद थी। माकोर् पोलो यह ज्ञान अपने साथ लेकर लौटा। पिफर क्या था, इतालवी भी तख़्ती की छपाइर् से किताबें निकालने लगे और जल्द ही यह तकनीक बावफी यूरोप में पैफल गइर्। मुदि्रत किताबों को सस्ती,़अश्लील माननेवाले वुफलीन वगो± और भ्िाक्षु - संघों के लिए छपी किताबों के विलासी संस्करण अभी भी बेशव़्ाफीमती वेलम ;अमससनउद्ध या चमर् - पत्रा पर ही छपते थे। व्यापारी और विश्वविद्यालय के विद्याथीर् सस्ती मुित किताबें ख़रीदते थे। किताबों की माँग बढ़ने के साथ - साथ यूरोप - भर के पुस्तक - विक्रेता विभ्िान्न देशों में नियार्त करने लगे। अलग - अलग जगहों पर पुस्तक मेले लगने लगे। बढ़ती माँग की आपूतिर् के लिए हस्तलिख्िात पांडुलिपियों के उत्पादन के भी नए तरीवे़फ सोचे गए। अब सिप़्ार्फ अमीर लोगों के यहाँ सुलेखक या कातिब नहीं पाए जाते थे, बल्िक पुस्तक - विवे्रफता भी अब उन्हें रोशगार देने लगे। आम तौर पर एक विक्रेता के यहाँ 50 कातिब काम करते थे। लेकिन किताबों की अबाध् बढ़ती माँग हस्तलिख्िात पांडुलिपियों से पूरी नहीं होने वाली थी। नव़्ाफल उतारना बेहद ख़चीर्ला, समयसाध्य और श्रमसाध्य काम था। पांडुलिपियाँ अकसर नाशुक होती थीं, उनके लाने - ले जाने, रख - रखाव में तमाम मुश्िकलें थीं। इसलिए उनका सवुर्फलेशनμ;चलन, गश्तद्ध सीमित रहा तो किताबों की बढ़ती माँग के चलते वुडब्लाॅक ¯प्र¯टग ;तख़्ती कीछपाइर्द्ध उत्तरोत्तर लोकिय होता गया। पंद्रहवीं सदी की शुरुआत तक यूरोपमें बड़े पैमाने पर तख़्ती की छपाइर् का इस्तेमाल करके कपड़े, ताश के पत्ते, और छोटी - छोटी टिप्पण्िायों के साथ ध£मक चित्रा छापे जा रहे थे। ज़ाहिर है कि किताबें छापने के लिए इससे भी तेज़्ा और सस्ती मुद्रण तकनीक की शरूरत थी। ऐसा छपाइर् की एक नयी तकनीक के आविष्कार से ही संभव होता जो 1430 के दशक में स्टैªसबगर् के योहान गुटेन्बगर् ने अंततः कर दिखाया। 2.1 गुटेन्बगर् और ¯प्र¯टग प्रेस गुटेन्बगर् के पिता व्यापारी थे, और वह खेती की एक बड़ी रियासत में पल - बढ़कर बड़ा हुआ। वह बचपन से ही तेल और जैतून पेरने की मशीनें ;चतमेेद्ध देखता आया था। बाद में उसने पत्थर पर पाॅलिश करने की कला सीखी, पिफर सुनारी और अंत में उसने शीशे को इच्िछत आवृफतियों में गढ़ने नए शब्द वेलम ;टमससनउद्ध: चमर् - पत्रा या जानवरों के चमड़े से बनी लेखन की सतह। गतिविध्ि कल्पना कीजिए आप माकोर् पोलो हैं। चीन में आपने ¯प्रट का वैफसा संसार देखा, यह बताते हुए एक चिट्ठी लिखें। में महारत हासिल कर ली। अपने ज्ञान और अनुभव का इस्तेमाल उसने अपने नए आविष्कार में किया। जैतून प्रेस ही ¯प्र¯टग प्रेस का माॅडल या आदशर् बना, और साँचे का उपयोग अक्षरों की धतुइर् आवृफतियों को गढ़ने के लिए किया गया। गुटेन्बगर् ने 1448 तक अपना यह यंत्रा मुकम्मल कर लिया था। उसने जो पहली किताब छापी, वह थी बाइबिल। तव़्ाफरीबन 180 प्रतियाँ बनाने में उसे तीन साल लगे। जो उस समय के हिसाब से काप़्ाफी तेज़्ा था। पर यह नयी तकनीक हाथ से किताबें छापने की तकनीक की जगह पूरी तरह से नहीं ले पाइर्। शुरू - शुरू में तो छपी किताबें भी अपने रंग - रूप और साज - सज्जा में हस्तलिख्िात पांडुलिपियों जैसी दिखती थीं। धतुइर् अक्षर हाथ की सजावटीशैली का अनुकरण करते थे। हाश्िाये पर पूफल - पिायों की डिज़्ााइन बनाइर् जाती थी, और चित्रा अकसर पेंट किए जाते थे। अमीरों के लिए बनाइर् किताबों में छपे पन्ने पर हाश्िाये की जगह बेल - बूटों के लिए ख़ाली छोड़ दी जाती थी। हर ख़रीदार अपनी रुचि के हिसाब से डिज़्ााइन और पेंटर ख़ुद तय करके उसे सँवार सकता था। व़्ाफरीब सौ सालों के दरम्यान ;1450 - 1550द्ध यूरोप के ज़्यादातर देशों में छापेख़ाने लग गए थे। जमर्नी के ¯प्रटर या मुद्रक दूसरे देश जाकर नए छापेख़ाने खुलवाया करते थे। छपाइर्ख़ाने की संख्या में वृि के साथ - साथपुस्तक उत्पादन में कमाल की बढ़ोत्तरी हुइर्। पंद्रहवीं सदी के दूसरे हिस्से में यूरोप के बाज़्ाार में 2 करोड़ मुित किताबें आईं। यह संख्या सोलहवीं सदी में 20 करोड़ हो गइर्। हाथ की छपाइर् की जगह यांत्रिाक मुद्रण के आने पर ही मुद्रण क्रांति संभव हुइर्। नए शब्द प्लाटेन: लेटरप्रेस छपाइर् में प्लाटेन एक बोडर् होता है, जिसे वफाग़्ाश के पीछे दबाकर टाइप की छाप ली जाती थी। पहले यह बोडर् काठ का होता था, बाद में इस्पात का बनने लगा। चित्रा 6 μ गुटेन्बगर् ¯प्र¯टग प्रेस। स्व्रूफ से लगा लंबा हैंडल देखें। इसकी मदद से स्व्रूफ घुमाकर प्लाटेन को गीले काग़्ाश पर दबा दिया जाता था। गुटेन्बगर् ने रोमन वणर्माला के तमाम 26 अक्षरों के लिए टाइप बनाए, और जुगत लगाइर् कि इन्हें इध्र - उध्र ‘मूव’ कराकर या घुमाकर शब्द बनाए जा सकंे। लिहाशा, इसे ‘मूवेबल टाइप ¯प्र¯टग मशीन’ के नाम से जाना गया और यही अगले 300 सालों तक छपाइर् की बुनियादी तकनीक रही। हर छपाइर् के लिए तख़्ती पर ख़ास आकार उकेरने की पुरानी तकनीक की तुलना में अब किताबों का इस तरह छापना निहायत तेश हो गया। गुटेन्बगर् प्रेस एक घंटे में 250 पन्ने ;एक साइडद्ध छाप सकता था। चित्रा 7 μ यूरोप की पहली छपी किताब, गुटेन्बगर् की बाइबिल से वुफछ पन्ने। गुटेन्बगर् ने वुफल 180 प्रतियाँ छापी थीं, पर उनमें से 50 ही बच पाइर् हैं। आइए गुटेन्बगर् की बाइबिल के इन पन्नों को ध्यान से देखें। ये केवल नयी तकनीक की देन नहीं थे। इन्हें गुटेन्बगर् प्रेस की धतुइर् टाइप से छापा शरूर गया था, पर इनके हाश्िाए पर कलाकारों ने हाथ से टीकाकारी और सुघड़ चित्राकारी की थी। कोइर् दो प्रतियाँ एक - जैसी नहीं थीं। हर प्रति का हर पन्ना अलग था। जहाँ पहली नशर में वे एक - जैसे लगे भी, गौर से तुलना करने पर प़फव़्ार्फ पता चल जाएगा। हर जगह पर वुफलीन तबव़्ाफों ने इस विश्िाष्टता को पसंद किया। जो उनके पास था, वह अनोखा था, वे यह दावा कर सकते थे, क्योंकि किसी और के पास उसकी हू - ब - हू नव़्ाफल नहीं थी। आप इबारत में देखेंगे कि कइर् जगहों पर अक्षरों के अंदर रंग भरे गए हैं। इसके दो प़फायदेथे। पन्ना रंगीन हो जाता था, और साथ ही सारे पवित्रा शब्द श्यादा दशर्नी और महत्त्वपूणर् बन जाते थे। लेकिन हर पन्ने पर रंग हाथ से भरे जाते थे। गुटेन्बगर् ने इबारत या पाठ को काले में छापा और बाद में रंग भरे जाने के लिए जगह छोड़ दी। चित्रा 8 μ एक मुद्रक की ववर्फशाॅप, सोलहवीं सदी। इस तसवीर से पता चलता है कि सोलहवीं सदी में मुद्रक का कायर्स्थल वैफसानए शब्ददिखायी देता था। सारे काम एक ही छत के नीचे चल रहे हैं। दाएँ छोर परअगले हिस्से में कम्पोशीटर काम कर रहे हैं। बाएँ सिरे पर गैलीश तैयार किएकम्पोशीटर: छपाइर् के लिए इबारत कम्पोश करने वाला व्यक्ित।जा रहे हैं और धातुइर् अक्षरों पर स्याही लगाइर् जा रही है। पृष्ठभूमि में ¯प्रटसर् प्रेसके पेंच कस रहे हैं और उन्हीं के पास प्रूपफरीडर काम में जुटे हैं। बिलवुफल़गैली: धतुइर् प़्रेफम, जिसमें टाइप बिछाकर इबारत बनाइर् जाती थी।अगले भाग में तैयार माल पड़ा है। ये दो - दो पृष्ठ वाले छपे हुए पन्ने हैं जिनकीबाइं¯डग होनी है। मुद्रण क्रांति क्या थी? छापेख़ाने का आविष्कार महश तकनीकी दृष्िट से नाटकीय बदलाव की शुरुआत नहीं था। पुस्तक - उत्पादन के नए तरीव़्ाफों ने लोगों की ¯शदगी बदल दीः इसकी बदौलत सूचना और ज्ञान से, संस्था औरसत्ता से उनका रिश्ता ही बदल गया। इससे लोकचेतना बदली और बदला चीज़्ाों को देखने का नज़्ारिया। 3.1 नया पाठक वगर् छापेख़ाने के आने से एक नया पाठक वगर् पैदा हुआ। छपाइर् से किताबों की व़्ाफीमत गिरी। किताब की हर प्रति के उत्पादन में जो वक़्त और श्रम लगता था, वह कम हो गया, और बड़ी तादाद में प्रतियाँ छापना आसान हो गया।बाशार किताबों से पट गइर्, पाठक वगर् भी बृहत्तर होता गया। किताबों तक पहुँच आसान होने से पढ़ने की एक नयी संस्वृफति विकसित हुइर्। अब तक आमलोग मौख्िाक संसार में जीते थे। वे ध£मक किताबों का वाचन सुनते थे, गाथा - गीत उनको पढ़कर सुनाए जाते थे, और व्ि़ाफस्से भी उनके लिए बोलकर पढ़े जाते थे। ज्ञान का मौख्िाक लेन - देन ही होता था। लोगबाग समूह में ही दास्तान सुनते, या कोइर् आयोजन देखते, आए थे। आप आठवें अध्याय में देखेंगे कि वे तन्हाइर् में, या ख़ामोशी से, पढ़ने के आदी नहीं थे। छपाइर् क्रांति के पहले किताबें न केवल मँहगी थीं, बल्िक उन्हें पयार्प्त मात्रा में छापना भी असंभव था। अब किताबें समाज के व्यापक तबव़्ाफों तक पहुँच सकती थीं। अगर पहले की जनता श्रोता थी, तो कह सकते हैं कि अब पाठक - जनता अस्ितत्व में आ गइर् थी। लेकिन यह संक्रमण सरल नहीं था। किताबें सिप़्ार्फ साक्षर ही पढ़ सकते थे और यूरोप के अध्िकांश देशों में बीसवीं सदी तक साक्षरता की दर सीमित थी। प्रकाशकों के लिए सवाल था कि लोगों में छपी किताब के प्रति दिलचस्पी वैफसे जगाएँ? इसके लिए उन्हें मुित वृफति की व्यापक पहुँच का ध्यान रखना थाः जो नहीं पढ़ पाते थे, वे भी बोलकर पढ़े गए को सुनकर उसका लुत्प़्ाफ तो उठाते ही थे। इसलिए मुद्रकों ने लोकगीत और लोककथाएँ छापनी शुरू कर दीं, और ऐसी किताबें आमतौर पर तसवीरों से ख़ूब सजी - ध्जी यानी सचित्रा होती थीं। पिफर इन्हें सामूहिक ग्रामीण सभाओं में या शहरी शराबघरों में गाया - सुनाया जाता था। इस तरह मौख्िाक संस्वृफति मुित संस्वृफति में दाख्ि़ाल हुइर्, और छपी सामग्री मौख्िाक अंदाज़्ा में प्रसारित हुइर्। मौख्िाक और मुित संस्वृफतियों के बीच की विभाजक रेखा ध्ुँध्ली पड़ गइर्। श्रोता और पाठक वगर् एक - दूसरे में घुल - मिल गए। गतिविध्ि मान लीजिए आप नव - मुित सस्ती किताबों का इश्तेहार देना चाहते हैं। अपनी दुकान के बाहर लगाने के लिए एक पोस्टर बनाएँ। नए शब्द गाथा - गीत ;ठंससंकद्ध: लोकगीत का ऐतिहासिक आख्यान, जिसे गाया या सुनाया जाता है। शराबघर ;ज्ंअमतदद्ध: वह जगह जहाँ लोग शराब पीने, खाने, दोस्तों से मिलने और बात - विचार के लिए आते थे। 3.2 ध£मक विवाद और ¯प्रट का डर छापेख़ाने से विचारों के व्यापक प्रचार - प्रसार औरबहस - मुबाहिसे के द्वार खुले। स्थापित सत्ता के विचारों से असहमत होने वाले लोग भी अब अपने विचारों को छापकर उन्हें पैफला सकते थे। छपे हुए संदेश के शरिए वे लोगों को अलग ढंग से सोचने के लिए मना सकते थे, या कोइर् कारर्वाइर् करने के लिए प्रेरित कर सकते थे। शाहिर है किइस बात का जीवन के कइर् क्षेत्रों में गंभीर महत्त्व था। हर कोइर् मुित किताब को लेकर ख़ुश नहीं था, जिन्होंने इसका स्वागत भी किया, उनके मन में इसको लेकर कइर् डर थे। कइर् लोगों को छपी किताब के व्यापक प्रसार और छपे शब्द की सुगमता को लेकर यह आशंका थी कि न जाने इसका आमलोगों के शेहन पर क्या असर हो। भय था कि अगर छपे हुए और पढ़े जा रहे पर कोइर् नियंत्राण न होगा तो लोगों में बाग़्ाी और अधा£मक विचार पनपने लगेंगे। अगरऐसा हुआ तो ‘मूल्यवान’ साहित्य की सत्ता ही नष्ट हो जाएगी। ध्मर्गुरुओं और सम्राटों तथा कइर् लेखकों एवं कलाकारों द्वारा व्यक्त की गइर् यह ¯चता नव - मुित और नव - प्रसारित साहित्य की व्यापक आलोचना का आधार बनी। आइए, देखें कि जीवन के एक क्षेत्रा - ध्मर्μमें इसका क्या असर हुआ। चित्रा 9 μ जे.वी. श्ले, लाम्प्रीमेरी ;छापाख़ानाद्ध 1739ध्मर् - सुधरक मा£टन लूथर ने रोमन वैफथलिक चचर् की यह आध्ुनिक यूरोप के प्रारंभ में पि्रंट के आगमन का उत्सव मनाते हुए छपे कइर् चित्रों में से एक है। देखें कि छापाख़ाना लेकर एक देवी स्वगर् से उतर रही है।वुफरीतियों की आलोचना करते हुए अपनी पिच्चानवे स्थापनाएँ इस देवी के आजू - बाशू मिनवार् ;विद्या की देवीद्ध और मवर्फरी ;दूत - देव, विवेकलिखीं। इसकी एक छपी प्रति विटेनबगर् के गिरजाघर के का भी प्रतीकद्ध हैं। तसवीर के आगे के हिस्से में अलग - अलग देशों के छःदरवाज़्ो पर टाँगी गइर्। इसमें लूथर ने चचर् को शास्त्राथर् के अग्रणी मुद्रकों की छवियाँ लिए औरतें हैं। बीच में बाईं ओर घेरे के अंदर गुटेन्बगर् लिए चुनौती दी थी। जल्द ही लूथर के लेख बड़ी तादाद की तसवीर है। में छापे और पढ़े जाने लगे। इसके नतीजे मेें चचर् में विभाजन हो गया और प्रोटेस्टंेट ध्मर्सुधर की शुरुआत हुइर्। कुछ ही हफ्ऱतों में न्यू टेस्टामेंट के लूथर के तजुर्मे या अनुवाद की 5000 प्रतियाँ बिक गईं, और तीन महीने के अंदर दूसरा संस्करण निकालना पड़ा। ¯प्रट के प्रति तहेदिल से वृफतज्ञ लूथर ने कहा, ‘‘मुद्रण इर्श्वर की दी हुइर् महानतम देन है, सबसे बड़ा तोहप़्ाफा।’’ कइर् इतिहासकारों का यह खयाल है कि छपाइर् ने नया बौिक माहौल बनाया और इसमें ध्मर् - सुधर आंदोलन के नए विचारों के प्रसार में मदद मिली। नए शब्द प्रोटेस्टेंट ध्मर्सुधर: सोलहवीं सदी यूरोप में रोमन वैफथलिक चचर्3.3 मुद्रण और प्रतिरोध् में सुधर का आंदोलन। मा£टन लूथर प्रोटेस्टेंट सुधारकों में से एक थे। इस आंदोलन से वैफथलिक इर्साइर् मत के विरोध् में कइर्छपे हुए लोकिय साहित्य के बल पर कम श्िाक्ष्िात लोग ध्मर् की धराएँ निकलीं।अलग - अलग व्याख्याओं से परिचित हुए। सोलहवीं सदी की इटली के एक किसान मेनोकियो ने अपने इलाव़्ोफ में उपलब्ध् किताबों को पढ़ना शुरू कर दिया था। उन किताबों के आधार पर उसने बाइबिल के नए अथर् लगाने शुरू कर दिए, और उसने इर्श्वर और सृष्िट के बारे में ऐसे विचार बनाए कि रोमन वैफथलिक चचर् उससे क्रु( हो गया। ऐसे ध्मर् - विरोध्ी विचारों को दबाने के लिए रोमन चचर् ने जब इन्क्वीज़्ाीशन ;ध्मर् - द्रोहियों को दुरुस्त करने वाली संस्थाद्ध शुरू किया तो मेनोकियो को दो बार पकड़ा गया और आख्ि़ारकार उसे मौत की सज़्ाा दे दी गइर्। ध्मर् के पास ऐसे पाठ और उस पर उठाए जा रहे सवालों से परेशान रोमन चचर् ने प्रकाशकों और पुस्तक - विक्रेताओं पर कइर् तरह की पाबंदियाँ लगाईं, और 1558 इर्. से प्रतिबंध्ित किताबों की सूची रखने लगे। नए शब्द इन्क्वीशीशन ;ध्मर् - अदालतद्ध: विध्£मयों की श्िानाख़्त करने और सशा देने वाली रोमन वैफथलिक संस्था। धमर् - विरोधी: इनसान या विचार जो चचर् की मान्यताओं से असहमत हो। मध्यकाल में चचर् विध्£मयों या ध्मर् - द्रोह के प्रति सख़्त था, उसे लगता था कि लोगों की आस्था, उनके विश्वास पर सिप़र्फ उसका अध्िकार है, और उसकी बात ही अंतिम है। ड्डोत - क चचार् करें छपाइर् से विरोध्ी विचारों के प्रसार को किस तरह बल मिलता था? संक्षेप में लिखें। 4 पढ़ने का जुनून पूरे सत्राहवीं और अठारहवीं सदी के दौरान यूरोप के ज़्यादातर हिस्सों में साक्षरता बढ़ती रही। अलग - अलग संप्रदाय के चचो± ने गाँवों में स्कूल स्थापित किए और किसानों - कारीगरों को श्िाक्ष्िात करने लगे। अठारहवीं सदी के अंत तक यूरोप के कुछ हिस्सों में तो साक्षरता दर 60 से 80 प्रतिशत तक हो गइर् थी। यूरोपीय देशों में साक्षरता और स्कूलों के प्रसार के साथ लोगों में पढ़ने का जैसे जुनून पैदा हो गया। लोगों को किताबें चाहिए थीं, इसलिए मुद्रक ज़्यादा से ज़्यादा किताबें छापने लगे। नए पाठकांे की रुचि का ध्यान रखते हुए व्ि़ाफस्म - व्ि़ाफस्म का साहित्य छपने लगा। पुस्तक विक्रेताओं ने गाँव - गाँव जाकर छोटी - छोटी किताबें बेचने वाले पेफरीवालों को काम पर लगाया। ये किताबें मुख्यतः पंचांग के अलावा लोक - गाथाएँ और लोकगीतों की हुआ करती थीं। लेकिन जल्द ही मनोरंजन - प्रधान सामग्री भी आम पाठकों तक पहुँचने लगी। इंग्लैंड में पेनी चैपबुक्स या एकपैसिया किताबें बेचनेवालों को चैपमेन कहा जाता था। इन किताबों कोग़्ारीब तबव़्ोफ भी ख़रीदकर पढ़ सकते थे। Úांस में बिब्िलयोथीक ब्ल्यू का चलन था, जो सस्ते काग़्ाज़्ा पर छपी और नीली जिल्द में बँध्ी छोटी किताबें हुआ करती थीं। इसके अलावा चार - पाँच पन्ने की प्रेम - कहानियाँ थीं, और अतीत की थोड़ी गाथाएँ थीं, जिन्हें ‘इतिहास’ कहते थे। आप देख सकते हैं कि अलग - अलग उद्देश्य और दिलचस्पी के हिसाब से किताबों के कइर् आकार - प्रकार थे। अठारहवीं सदी के आरंभ से पत्रिाकाओं का प्रकाशन शुरू हुआ, जिनमें समसामयिक घटनाओं की ख़बर के साथ मनोरंजन भी परोसा जाने लगा। अख़बार और पत्रों में यु( और व्यापार से जुड़ी जानकारी के अलावा दूर देशों की ख़बरें होती थीं। उसी तरह वैज्ञानिक और दाशर्निक भी आम जनता की पहुँच के बाहर नहीं रहे। प्राचीन व मध्यकालीन ग्रंथ संकलित किए गए, और नक़्शों के साथ - साथ वैज्ञानिक ख़ाके भी बड़ी मात्रा में छापे गए। जब आइज़्ौक न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों ने अपने आविष्कार प्रकाश्िात करने शुरू किए तो उनके लिए विज्ञान - बोध् में पगा एक बड़ा पाठक - वगर् तैयार हो चुका था। टाॅमस पेन, वाॅल्तेयर और ज़्याँ ज़्ााक रूसो जैसे दाशर्निकों की किताबें भी भारी मात्रा में छपने और पढ़ी जाने लगीं। शाहिर है कि विज्ञान, तवर्फ और विवेकवाद के उनके विचार लोकिय साहित्य में भी जगह पाने लगे। 4.1 दुनिया के शालिमों, अब हिलोगे तुम! अठारहवीं सदी के मध्य तक यह आम विश्वास बन चुका था कि किताबों के ज़्ारिए प्रगति और ज्ञानोदय होता है। कइर् सारे लोगों का मानना था किकिताबें दुनिया बदल सकती हैं, कि वे निरंकुशवाद और आतंकी राजसत्ता से नए शब्द संप्रदाय: किसी ध्मर् का एक उप - समूह। पंचांग: चाँद, सूरज की गति, ज्वार - भाटा के समय और लोगों के दैनिक जीवन से जुड़ी कइर् अहम जानकारियाँ देता वा£षक प्रकाशन। चैपबुक ;गुटकाद्ध: पाॅकेट बुक के आकार की किताबों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द। इन्हें आमतौर पर पेफरीवाले बेचते थे। ये सोलहवीं सदी की मुद्रण क्रांति के समय से लोकिय हुए। बाॅक्स 2 1791 में लंदन के एक प्रकाशक जेम्स लाॅ¯कग्टन ने अपनी डायरी में यह लिखाμ पिछले बीस सालों में किताबों की बिक्री में आमतौर पर बेतहाशा वृि हुइर् है। ग़्ारीब व्ि़ाफस्म के किसान, या गाँव के लोग जो पहले अपनी शामें डायन - जोगिन, और भूत - प्रेत की कहानियाँ सुनते हुए बिताते थे.... अब अपनी संतानों द्वारा पढ़े गए रूमानी या अन्य व्ि़ाफस्सों को सुनने का आनंद लेते हुए जाड़े की रातों को छोटी करने लगे हैं। अगर जाॅन शहर जा रहा है, तो उसे सख़्त हिदायत की जाएगी कि वह पेरेगि्रन पिकल्स ऐडवेंचर लेकर आए... और अगर डाॅली अंडे बेचने जा रही है तो उसे कहा जाता है कि वह द हिस्ट्री आॅप़्ाफ जोशेप़्ाफ ऐण्ड्रूश लेकर ही वापस लौेटे। समाज को मुक्ित दिलाकर ऐसा दौर लाएँगी जब विवेक और बुि का राजहोगा। अठारहवीं सदी ़Úांस के एक उपन्यासकार लुइर् सेबेस्ितएँ म£सए ने घोषणा की, फ्छापाख़ाना प्रगति का सबसे ताव़्ाफतवर औज़्ाार है, इससे बन रही जनमत की आँध्ी में निरंवुफशवाद उड़ जाएगा।य् म£सए के उपन्यासों में नायक अकसर किताबें पढ़ने से बदल जाते हैं। वे किताबें घोंटते हैं, किताबों की दुनिया में जीते हैं, और इसी क्रम में ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। ज्ञानोदय को लाने और निरंवुफशवाद के आधर को नष्ट करने में छापेख़ाने की भूमिका के बारे में आश्वस्त म£सए ने कहा, ‘‘हे निरंवुफशवादी शासकों, अब तुम्हारे काँपने का वक़्त आ गया है! आभासी लेखक की व़्ाफलम वेेफ आगेफ शोर वतुम हिल उठोगे!’’ 4.2 मुद्रण संस्वृफति और प़्ा्रफंासीसी क्रांति कइर् इतिहासकारों का मानना है कि मुद्रण संस्कृति ने प़्ा्रफंासीसी क्रांति के लिए अनुकूल परिस्िथतियाँ रचीं। क्या हम दोनों में ऐसा संबंध् बना सकते हैं? मूलतः तीन तरह के तवर्फ देखने लायक हैंः पहला: छपाइर् के चलते ज्ञानोदय के ¯चतकों के विचारों का प्रसार हुआ। उनके लेखन ने वुफल मिलाकर परंपरा, अंध्विश्वास और निरंवुफशवाद की आलोचना पेश की। उन्होंने रीति - रिवाजों की जगह विवेक के शासन पर बल दिया, और माँग की कि हर चीज़्ा को तवर्फ और विवेक की कसौटी पर हीकसा जाए। उन्होंने चचर् की ध£मक और राज्य की निरंवुफश सत्ता पर प्रहार करके परंपरा पर आधरित सामाजिक व्यवस्था को दुबर्ल कर दिया। वाॅल्तेयर और रूसो के लेखन का व्यापक पाठक - वगर् था, और उनके पाठक एक नए, आलोचनात्मक, सवालिया और ता£कक नज़्ारिये से दुनिया को देखने लगे थे। दूसरा: छपाइर् ने वाद - विवाद - संवाद की नयी संस्वृफति को जन्म दिया। सारे पुराने मूल्य, संस्थाओं और व़्ाफायदों पर आम जनता के बीच बहस - मुबाहिसे हुए और उनके पुनमूर्ल्यांकन का सिलसिला शुरू हुआ। तवर्फ की ताव़्ाफत से परिचित यह नयी ‘पब्िलक’ धमर् और आस्था को प्रश्नांकित करने का मोल समझ चुकी थी। इस तरह बनी ‘सावर्जनिक दुनिया’ से सामाजिक क्रांति के नए विचारों का सूत्रापात हुआ। तीसरा: 1780 के दशक तक राजशाही और उसकी नैतिकता का मशाक उड़ाने वाले साहित्य का ढेर लग चुका था। इस प्रिया में सामाजिक व्यवस्था को लेकर तमाम सवाल खड़े किए गए। काटर्ूनों और वैफरिकेचरों ;व्यंग्य चित्रांेद्ध में यह भाव उभरता था कि जनता तो मुश्िकलों में पँफसी है जबकि राजशाही भोग - विलास में डूबी हुइर् है। भूमिगत घूमने वाले इस साहित्य ने लोगों को राजतंत्रा के ख्ि़ालाप़्ाफ भड़काया। हम इन तको± को वैफसे समझें? इसमें तो कोइर् शक नहीं कि छपाइर् ने विचारों को पैफलाने में मदद की। लेकिन याद रहे कि लोग - बाग़्ा हर तरह की सामग्री पढ़ते थे। एक तरप़़्ाफ वे अगर रूसो और वाॅल्तेयर पढ़ रहे थे तो दूसरी तरप़्ाफ ड्डोत - ख नए शब्द निरंवुफशवाद: राजकाज की ऐसी व्यवस्था, जिसमें किसी एकव्यिाफ को संपूणर् शिाफ प्राप्त हो, और उस पर न व़्ाफानूनी पाबंदी लगी हो, न ही संवैधनिक। चचर् और राज्य का प्रोपगैंडा या प्रचार भी। वे हर पढ़ी या देखी चीश से तो सीध्े प्रभावित नहीं हो सकते थे। वे वुफछ विचारों को स्वीकारते थे, तो वुफछ को नकारते भी थे। प्ि़ाफर चीशों की अपने ढंग से व्याख्या भी करते थे। इस तरह, मुद्रण ने उनके मानस को सीध्े तौर पर भले नहीं रचा हो, पर इसने अलग ढंग से सोचने की संभावनाएँ शरूर खोलीं। गतिविध्ि मान लीजिए कि आप क्रांति - पूवर् प़्ा्रफांस में एक काटर्ूनिस्ट या व्यंग्य - चित्राकार हैं। किसी परचे के लिए एक काटूर्न बनाएँ। इस व्यंग्य - चित्रा में दिखाया गाया है कि जनसाधरण - किसान, कारीगर और मशदूरμ किस तरह मुश्िकल हालात में थे, जबकि ¯शदगी के मशे लेने वाला वुफलीन वगर् उनका दोहन करता है। इस तरह के काटूर्नों के चलन से क्रांति के पहले लोगों के दिल - दिमाग़्ा पर ख़ास असर हुआ। चचार् करें वुफछ इतिहासकार ऐसा क्यों मानते हैं कि मुद्रण संस्कृति ने प़्ा्रफांसीसी क्रांति के लिए शमीन तैयार की? 5 उन्नीसवीं सदी उन्नीसवीं सदी में यूरोप ने जन - साक्षरता की दिशा में लंबी - लंबी छलाँगे लगाईं, जिसके बूते महिलाओं और बच्चों के रूप में बड़ी मात्रा में नया पाठकवगर् तैयार हुआ। 5.1 बच्चे, महिलाएँ और मशदूर उन्नीसवीं सदी के आख्ि़ार से प्राथमिक श्िाक्षा के अनिवायर् होने के चलते बच्चे, पाठकों की एक अहम श्रेणी बन गए। प्रकाशन उद्योग के लिएपाठ्य - पुस्तकों का उत्पादन महत्त्वपूणर् हो गया। प़्ा्रफंास में 1857 में सिप़्ार्फ बाल - पुस्तवेंफ छापने के लिए एक पे्रस या मुद्रणालय स्थापित किया गया। इस प्रेस में पुरानी और नयी, दोनों तरह की परी - कथाओं और लोक - कथाओं का प्रकाशन किया गया। जमर्नी के गि्रम बंध्ुओं ने बरसों लगाकर किसानों के बीच से लोक - कथाएँ जमा कीं। उनके द्वारा एकत्रिात सामग्री का संपादन हुआ, प्ि़ाफर कहानियों को अंततः 1812 के एक संकलन में छापा गया। बच्चों के लिए अनुपयुक्त सामग्री, या जो चीशें वुफलीन वगो± को अश्लील लगती थीं, उन्हें प्रकाश्िात संस्करण में शामिल नहीं किया जाता था। इस तरह पुरानी ग्रामीण लोककथाओं को नया रूप मिलाμछपने से वे दजर् तो हुईं, पर इस प्रिया में बदल भी गईं। महिलाएँ पाठिका और लेख्िाका की भूमिका में श्यादा अहम हो गईं। पेनी मैगशींस या एकपैसिया पत्रिाकाएँ ;देखें, चित्रा 12द्ध ख़ास तौर पर उन्हीं के लिए होती थीं, वैसे ही जैसे कि सही चाल - चलन और गृहस्थी सिखाने वाली निदेर्श्िाकाएँ। उन्नीसवीं सदी में जब उपन्यास छपने लगे तो महिलाएँ उनका अहम पाठक मानी गईं। मशहूर उपन्यासकारों में लेख्िाकाएँ अग्रणी थींः जेन आॅस्िटन, ब्राॅण्ट बहनें, जाॅजर् इलियट, आदि। उनके लेखन से नयी नारी की परिभाषा उभरी: जिसका व्यक्ितत्व सुदृढ़ था, जिसमें गहरी सूझ - बूझ थी, और जिसका अपना दिमाग़्ा था, अपनी इच्छाशक्ित थी। सत्राहवीं सदी से ही किराए पर किताब देने वाले पुस्तकालय अस्ितत्व में आ गए थे। उन्नीसवीं सदी के इंग्लैंड में ऐसे पुस्तकालयों का उपयोग सप़्ोफद - काॅलर मशदूरों, दस्तकारों और निम्नवगीर्य लोगों को श्िाक्ष्िात करने के लिए किया गया। काम के दिन के छोटे होने के बाद मशदूरों को अपने सुधार और आत्म - अभ्िाव्यक्ित के लिए थोड़ा वक़्त मिलने लगा। उन्होंने बड़ी संख्या में राजनीतिक पचेर्, और आत्मकथाएँ लिखीं। 5.2 नए तकनीकी परिष्कार अठारहवीं सदी के अंत तक प्रेस धतु से बनने लगे थे। पूरी उन्नीसवीं सदी के दौरान छापेख़ाने की तकनीक में लगातार सुधर हुए। उन्नीसवीं सदी के बाॅक्स 3 याॅवर्फशायर के एक मेवैफनिक थाॅमस वुड ने बताया कि वह पुराने अख़बार ख़रीदकर शाम के व़क्त आग की रोशनी में पढ़ता था, क्योंकि उसके पास मोमबत्ती के लिए पैसे नहीं होते थे। ग़्ारीबों की आत्मकथाओं से हमें पता चलता है कि वे मुश्िकल हालात में पढ़ने के लिए जद्दोजहद करते थेः बीसवीं सदी के रूसी क्रांतिकारी लेखक मैक्िसम गोकीर् की मेरा बचपन और मेरे विश्वविद्यालय इन संघषो± की कहानियाँ हैं। मध्य तक न्यूयाॅवर्फ के रिचडर् एम.हो. ने शक्ित चालित बेलनाकार प्रेस को कारगर बना लिया था। इससे प्रति घंटे 8000 शीट या ताव छप सकते थे। सदी के अंत तक आॅप़्ाफसेट प्रेस आ गया था, जिससे एक साथ छह रंग की छपाइर् मुमकिन थी। बीसवीं सदी के शुरू से ही, बिजली से चलनेवाले प्रेस के बल पर छपाइर् का काम बड़ी तेशी से होने लगे। एक - दो और चीशें हुईं। काग़्ाशडालने की विध्ि में सुधर हुआ, प्लेट की गुणवत्ता बेहतर हुइर्, स्वचालित पेपर - रील और रंगों के लिए प़्ाफोटो - विद्युतीय नियंत्राण भी काम में आने लगे। इस तरह कइर् छोटी - छोटी मशीनी इकाइयों में वुफल सुधर की बदौलत छपे हुए पन्ने का रंग - रूप ही बदल गया। मुद्रकों और प्रकाशकों ने अपने उत्पाद बेचने के नए गुर अपनाए। उन्नीसवीं सदी की पत्रिाकाओं ने उपन्यासों को धरावाहिक छापा जिससे उपन्यास लिखने की एक ख़ास शैली विकसित हुइर्। इंग्लैंड में 1920 के दशक में लोकपि्रय किताबें एक सस्ती शृंखलाμश्िा¯लग शृंखलाμके तहत छापी गईं। किताबों की जिल्द का आवरण या डस्ट कवर भी बीसवीं सदी की तकनीकी नवइयत है। 1930 की आथ्िार्क मंदी के आने से प्रकाशकों को किताबों की बिक्री गिरने का भय हुआ। लिहाशा, पाठकों की जेब का ख़याल रखते हुए उन्होंने सस्ते पेपरबैक या अजिल्द संस्करण छापे। गतिविध्ि चित्रा 13 μ इंग्लैंड के एक रेलवे स्टेशन पर लगे विज्ञापन, अल्प़्ा्रेफड काॅन्कानेन द्वारा बनाया गया लिथोग्राप़्ाफ, 1874 छपी हुइर् सूचनाएँ और इश्तेहार सड़कों की दीवारों, प्लैटप़्ाफाॅमर् और सावर्जनिक इमारतों पर लगाए जाते थे। आइए देखें कि भारत में छपाइर् कब शुरू हुइर्, और मुद्रण युग के पहले यहाँ सूचना और विचार वैफसे लिखे जाते थे। 6.1 मुद्रण युग से पहले की पंाडुलिपियाँ भारत में संस्कृत, अरबी, प़्ाफारसी और विभ्िान्न क्षेत्राीय भाषाओं में हस्त - लिख्िातपांडुलिपियों की पुरानी और समृ( परंपरा थी। पांडुलिपियाँ ताड़ के पत्तों या हाथ से बने काग़्ाश पर नव़्ाफल कर बनाइर् जाती थीं। कभी - कभी तो पन्नों पर बेहतरीन तसवीरें भी बनाइर् जाती थीं। प्िाफर उन्हें उम्र बढ़ाने के ख़याल से तख्ि़तयों की जिल्द में या सिलकर बाँध् दिया जाता था। उन्नीसवीं सदी के अंत तक, छपाइर् के आने के बाद भी, पांडुलिपियाँ छापी जाती रहीं। लेकिन पांडुलिपियाँ नाशुक होती थीं, काप़्ाफी मँहगी भी। एक तो उन्हें बड़ी सावधनी से पकड़ना होता था, दूसरे, लिपियों के अलग - अलग तरीव़्ोफ से लिखे जाने के चलते उन्हें पढ़ना भी आसान नहीं था। इसलिए उनका व्यापक यह एकाॅ£डयन शैली में हाथ से लिखी पांडुलिपि का एक नमूना है। चैदहवीं सदी के शायर हाप्ि़ाफश की संपूणर् शायरी दीवान में संकलित है। पेज पर ख़ुशनवीसी, नक्व़्ाफाशी और डिशाइन देखें। लेटरप्रेस के आने के बाद भी इस तरह की पांडुलिपियाँ अमीरों के लिए बनाइर् जाती रहीं। दैनिक इस्तेमाल नहीं होता था। हालाँकि पूवर् - औपनिवेश्िाक बंगाल में ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक पाठशालाओं का बड़ा जाल था, लेकिन विद्याथीर् आमतौर पर किताबें नहीं पढ़ते थे। गुरु याददाश्त से किताबें सुनाते थे, और विद्याथीर् उन्हें लिख लेते थे। इस तरह कइर् - सारे लोग बिना कोइर् किताब पढ़े साक्षर बन जाते थे। ¯प्रट के आगमन के काप़्ाफी बाद तक हस्तलिख्िात पांडुलिपियाँ प्रकाश्िात की जाती रहीं। यह 6.2 छपाइर् भारत आइर् पांडुलिपि मलयालम भाषा में अठारहवीं सदी में बनाइर् गइर्। ¯प्रटिंग प्रेस पहले - पहल सोलहवीं सदी में भारत के गोवा में पुतर्गाली धमर् - प्रचारकों के साथ आया। जेसुइट पुजारियों ने कोंकणी सीखी और कइर् सारी पुस्ितकाएँ छापीं। 1674 इर्. तक कोंकणी और कन्नड़ भाषाओं में लगभग 50 किताबें छप चुकी थीं। कैथलिक पुजारियों ने 1579 में कोचीन में पहली तमिल किताब छापी, और 1713 में पहली मलयालम किताब छापने वाले भी वही थे। डच प्रोटेस्टेंट ध्मर् - प्रचारकों ने 32 तमिल किताबें छापीं, जिनमें से कइर् पुरानी किताबों का अनुवाद थीं। अंगे्रशी - भाषी प्रेस भारत में काप़्ाफी देर तक विकास नहीं कर पाया था, यद्यपि इंग्िलश इर्स्ट इंडिया कंपनी ने सत्राहवीं सदी के अंत तक छापेख़ाने का आयात शुरू कर दिया था। जेम्स आॅगस्टस हिक्की ने 1780 से बंगाल गशट नामक एक साप्ताहिक पत्रिाका का संपादन शुरू किया, जिसने खुद को यूँ परिभाष्िात किया, ‘हर किसी के लिए खुली एक व्यवसायिक पत्रिाका, जो किसी के प्रभाव में नहीं है। यानी यह पत्रिाका भारत में प्रेस चलानेवाले औपनिवेश्िाक शासन से आशाद, निजी अंग्रेशी उद्यम थी, और इसे अपनी स्वतंत्राता पर अभ्िामान था। हिक्की ढेर सारे विज्ञापन छापता था जिनमें दासों की बिव्रफी से जुड़े इश्तेहार भी शामिल थे। लेकिन साथ ही वह भारत में कायर्रत वरिष्ठ अंग्रेश अिाकारियों से जुड़ी गपबाशी भी छापता था। इससे नाराश होकर गवनर्र जेनरल वाॅरेन हेस्िटंग्स ने हिक्की पर मुव़्ाफदमा कर दिया, और ऐसे सरकारी आश्रय - प्राप्त अख़बारों के प्रकाशन को प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया जो ड्डोत - ग औपनिवेश्िाक राज की छवि पर होते हमलों से इसकी रक्षा कर सवेंफ। अठाहरवीं सदी के अंत तक कइर् - सारी पत्रा - पत्रिाकाएँ छपने लगीं। वुफछ हिंदुस्तानी भी अपने अख़बार छापने लगे थे। ऐसे प्रयासों में पहला था राजा राममोहन राय के व़्ाफरीबी रहे गंगाधर भट्टाचायर् द्वारा प्रकाश्िात बंगाल गशट। 7 धमिर्क सुधर और सावर्जनिक बहसें जैसा कि आप जानते हैं, उन्नीसवीं सदी की शुरुआत से ही धमिर्क मसलों को लेकर बहसों का बाशार गमर् था। अलग - अलग समूह औपनिवेश्िाक समाज में हो रहे बदलावों से जूझते हुए, ध्मर् की अपनी - अपनी व्याख्या पेश कर रहे थे। वुफछ तो मौजूदा रीति - रिवाजों की आलोचना करते हुए उनमें सुधार चाहते थे, जबकि वुफछ अन्य समाज - सुधरकों के तको± के ख्ि़ालाप़्ाफ खड़े थे। ये सारे वाद - विवाद पि्रंट में, सरेआम पब्िलक में हुए। छपी हुइर् पुस्ितकाओं और अख़बारों ने न केवल नए विचारों का प्रचार - प्रसार किया बल्िक उन्होंने बहस की शक्ल भी तय की। इन बहसों में व्यापक जन - समुदाय भी हिस्सा ले सकता था, अपने मत शाहिर कर सकता था। इस तरह के मत - मंतातर से नए विचार उभरे। यह वह समय था जब समाज और ध्मर् - सुधरकों तथा ¯हदू रूढि़वादियों के बीच विध्वा - दाह, एकेश्वरवाद, ब्राह्मण पुजारीवगर् और मूतिर् - पूजा जैसे मुद्दों को लेकर तेश बहस ठनी हुइर् थी। बंगाल में जैसे - जैसे बहस चली, लगातार बढ़ती तादाद में पुस्ितकाओं और अख़बारों के शरिए तरह - तरह के तवर्फ समाज के बीच आने लगे। श्यादा से श्यादा लोगों तक पहुँचने के ख़याल से इन्हें आम बोलचाल की भाषा में छापा गया। राममोहन राय ने 1821 से संवाद कौमुदी प्रकाश्िात किया, और रूढि़वादियों ने उनके विचारों से टक्कर लेने के लिए समाचार चंदि्रका का सहारा लिया। दो प़फारसी अख़बारμ जाम - ए - जहाँ नामा और शम्सुल अख़बार - भी 1882 में प्रकाश्िात हुए। उत्तर भारत में उलमा मुस्िलम राजवंशों के पतन को लेकर चिंतित थे। उन्हें डर था कि कहीं औपनिवेश्िाक शासक ध्मा±तरण को बढ़ावा न दें, या मुस्िलम व़्ाफानून न बदल डालें। इससे निबटने के लिए उन्होंने सस्ते लिथोग्राप़फी प्रेस का इस्तेमाल करते हुए ध्मर्ग्रंथों के प़फारसी या उदूर् अनुवाद छापे और धमिर्क अख़बार तथा गुटके निकाले। सन् 1867 में स्थापित देवबंद सेमिनरी ने मुसलमान पाठकों को रोशमरार् वफा जीवन जीने का सलीका और इस्लामी सि(ांतों के मायने समझाते हुए हशारों प़्ाफतवे जारी किए। पूरी उन्नीसवीं सदी के दौरान कइर् इस्लामी संप्रदाय और सेमिनरी पैदा हुए, ध्मर् को लेकर सबकी अपनी - अपनी व्याख्याएँ थीं, हर कोइर् अपना संप्रदाय बढ़ाना चाहता था और दूसरों के असर को काटना चाहता था। ¯हदुओं के बीच भी छपाइर् से ख़ास तौर पर स्थानीय भाषाओं में धामिर्क पढ़ाइर् को काप़फी बल मिला। तुलसीदास की सोलहवीं सदी की किताब रामचरितमानस का पहला मुदि्रत संस्करण 1810 में कलकत्ता से प्रकाश्िातहुआ। उन्नीसवीं सदी के मध्य तक सस्ते लिथोग्राप़फी संस्करणों से उत्तर भारतका बाशार पट गया। लखनऊ के नवल किशोर प्रेस और बंबइर् के श्री वेंकटेश्वर प्रेस में अनेक भारतीय भाषाओं में अनगिनत धमिर्क किताबें छपीं। मुदि्रत और लाने - ले जाने में आसान होने के कारण आस्थावान इन्हें कहीं भी, नए शब्द उलमा: इस्लामी व़्ाफानून और शरिया के विद्वान। पफतवा: अनिश्चय या असमंजस की स्िथति में, इस्लामी व़्ाफानूऩजानने वाले विद्वान, सामान्यतः मुफ्ऱती, के द्वारा की जानेवाली वैधानिक घोषणा। किसी समय पढ़ सकते थे। इन्हे अनपढ़ लोगों की बड़ी भीड़ में बोल - बोल कर भी पढ़ा जा सकता था। मतलब यह कि धमिर्क पुस्तवेंफ बड़ी तादाद में व्यापक जन - समुदाय तक पहुँच रही थीं, जिसके चलते विभ्िान्न ध्मो± के बीच, और उनके अंदर, बहस - मुबाहिसे, और वाद - विवाद - संवाद की नयी स्िथति बन गइर् थी। लेकिन ¯प्रट ने समुदाय के बीच सिप़र्फ मत - मतांतर ही नहीं पैदा किए, बल्िक इसने समुदायों को अंदर से, और विभ्िान्न हिस्सों को पूरे भारत से जोड़ने का काम भी किया। ड्डोत - घ 8 प्रकाशन के नए रूप छापेख़ाने से नए तरह के लेखन के लिए भूख जागी। जैसे - जैसे नए लोग पढ़ने लगे, छपे हुए पन्नों में अपनी ¯शदगी, अपने तजुबो±, अपने भोगे हुए रिश्तों को देखने की चाहत बलवती होती गइर्। यूरोप में विकसित उपन्यास नामक यह साहित्ियक विध इन शरूरतों को पूरा करने में सक्षम थी। जल्दी ही इसने अपनी एक ख़ास भारतीय शक्ल और शैली अख्ि़तयार कर ली। अपने पाठकों को इसने अनुभव का नया संसार और मानव जीवन की विविधता का बोध् प्रदान किया। दूसरी तरह की साहित्ियक विधएँ, जैसे - गीत, कहानियाँ, सामाजिक - राजनीतिक मसलों पर लेख, ये सब पाठकों की दुनिया का हिस्सा बन गए। अपने अलग - अलग तेवरों में इन्होंने इनसानी ¯शदगी और अंतरंग भावनाओं, और उन सामाजिक - राजनीतिक नियमों पर बल दिया जिनसे इनका स्वरूप तय होता था। उन्नीसवीं सदी के अंत तक, एक नयी तरह की दृश्य - संस्कृति भी आकार ले रही थी। छापेख़ानों की बढ़ती तादाद के साथ छवियों की कइर् नव़्ाफलें या प्रतियाँ अब बड़ी आसानी से बनाइर् जा सकती थीं। राजा रवि वमार् जैसे चित्राकारों ने आम खपत के लिए तसवीरें बनाईं। काठ की तख़्ती पर चित्रा उकेरने वाले ग़्ारीब दस्तकारों ने लैटरप्रेस छापेख़ानों के करीब अपनी दुकानें लगाईं, और मुद्रकों से काम पाने लगे। बाशार में सुलभ सस्ती तसवीरें और कैलेंडर ख़रीदकर ग़्ारीब भीअपने घरों एवं दफ्ऱतरों में सजाया करते थे। इन छपी तसवीरों ने आहिस्ता - आहिस्ता आध्ुनिकता और परंपरा, ध्मर् औरराजनीति तथा समाज और संस्कृति के लोकपि्रय विचार - लोक को गढ़ना शुरू किया। 1870 के दशक तक पत्रा - पत्रिाकाओं में सामाजिक - राजनीतिक विषयों पर टिप्पणी करते हुए कैरिकेचर और काटूर्न छपने लगे थे। कुछ में श्िाक्ष्िात भारतीयों के पश्िचमी पोशाक और पश्िचमी अभ्िारुचियों का मशाक उड़ाया गया, जबकि कुछ अन्य में सामाजिक परिवतर्न को लेकर एक डर देखा गया। साम्राज्यवादी व्यंग्यचित्रों में राष्ट्रवादियों का मशाक उड़ायाजाता था, तो राष्ट्रवादी भी साम्राज्यवादी सत्ता पर निशाना साध्ने में पीछे नहीं रहे। राजा रवि वमार् ने मिथकीय कहानियों को लेकर अनगिनत चित्रा बनाए, जो उनके अपने, रवि वमार् प्रेस, में छपती थीं। 8.1 महिलाएँ और मुद्रण महिलाओं की ¯शदगी और उनकी भावनाएँ बड़ी साप़्ाफगोइर् और गहनता से लिखी जाने लगीं। इसलिए मध्यवगीर्य घरों में महिलाओं का पढ़ना भी पहले से बहुत श्यादा हो गया। उदारवादी पिता और पति अपने यहाँ औरतों को घर पर पढ़ाने लगे, और उन्नीसवीं सदी के मध्य में जब बड़े - छोटे शहरों में स्कूल बने तो उन्हें स्कूल भेजने लगे। कइर् पत्रिाकाओं ने लेख्िाकाओं को जगह दी और उन्होंने नारी - श्िाक्षा की शरूरत को बार - बार रेखांकित किया। उनमें पाठ्यक्रम भी छपता था, और शरूरत के मुताबिव़्ाफ पाठ्य - सामग्री भी, जिसका इस्तेमाल घर बैठे स्वूफली श्िाक्षा के लिए किया जा सकता था। लेकिन सारे परिवार उदार - दिल नहीं थे। अनेक परंपरावादी ¯हदू मानते थे कि पढ़ी - लिखी कन्याएँ विध्वा हो जाती हैं, और इसी तरह दव्ि़ाफयानूसी मुसलमानों को लगता था कि उदूर् के रूमानी अप़्ाफसाने पढ़कर औरतें बिगड़ जाएँगी। कभी - कभार बाग़ी औरतों ने इन प्रतिबंधें को अस्वीकार भी किया।हमें उत्तर भारत के दव्ि़ाफयानूसी मुसलमान परिवार की एक ऐसी लड़की की कहानी पता है, जिसने गुपचुप ढंग से न सिप़्ार्फ पढ़ना सीखा, बल्िक लिखा भी। उसके खानदान वाले चाहते थे कि वह सिप़्ार्फ अरबी वुफरान पढ़े, जो कि उसके पल्ले नहीं पड़ता था। लिहाशा उसने वह शबान पढ़ने की िाद की, जो उसकी अपनी थी। पूवीर् बंगाल में, उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में, कट्टर रूढि़वादी परिवार में ब्याही कन्या रशसुन्दरी देबी ने रसोइर् में छिप - छिप कर पढ़ना सीखा। बाद में चलकर उन्होंने आमार जीबन नामक आत्मकथा लिखी, जो 1876 में प्रकाश्िात हुइर्। यह बंगाली भाषा में प्रकाश्िात पहली संपूणर् आत्म - कहानी थी। चूँकि सामाजिक सुधरों और उपन्यासों ने पहले ही नारी जीवन और भावनाओं में दिलचस्पी पैदा कर दी थी, इसलिए महिलाओं द्वारा लिखी जा रही आपबीती के प्रति कुतूहल तो था ही। कैलाशबाश्िानी देवी जैसी महिलाओं ने 1860 के दशक से महिलाओं के अनुभवों पर लिखना शुरू कियाμकैसे वे घरों मंे बंदी और अनपढ़ बनाकर रखी जाती हैं, कैसे वे घर - भर के काम का बोझ उठाती हैं, और जिनकी सेवा वे करती हैं, वही उन्हें कैसे दुत्कारते हैं। आज जो महाराष्ट्र है वहाँ 1880 के दशक में ताराबाइर् ¯शदे और पंडिता रमाबाइर् ने उच्च जाति की नारियों की दयनीय हालत के बारे में जोश और रोष से लिखा। सामाजिक बंध्नों में बँधी औरत के लिए पढ़ने के क्या मायने हैं, इस पर एक तमिल उपन्यास में एक औरत ने लिखा, ‘बहुतेरे कारणों से मेरी दुनिया छोटी है... मेरे जीवन की आधी से श्यादा खुश्िायाँ किताबें पढ़ने से आइर् हैं...। उदूर्, तमिल, बंगाली और मराठी ¯प्रट - संस्कृति पहले विकसित हो गइर् थी, पर गंभीर ¯हदी छपाइर् की शुरुआत 1870 के दशक से ही हुइर्। जल्द ही इसका एक बड़ा हिस्सा नारी - श्िाक्षण को समपिर्त हुआ। बीसवीं सदी के आरंभ में महिलाओं के लिए मुित, और कभी - कभी उनके द्वारा संपादित पत्रिाकाएँ इंडियन शारिवारी उन्नीसवीं सदी के अंत में प्रकाश्िात होने वाले व्यंग्य और विद्रूप ;वैफरिकेचरद्ध विध के कइर् पत्रों में से एक था। ग़्ाौर करें कि साम्राज्यवादी अंग्रेश की छवि ठीक बीचोबीच है।सत्ता और प्रभुता की प्रतिमू£त बना वह देसी लोगों को, वे क्या करें, क्या नहीं, इसकी हिदायत दे रहा है। उसके दोनों ओर बैठे देसीजन गुलामों की नत मुद्रा में हैं। भारतीयों को व्यंग्य - चित्रों़के अंग्रेशी पत्रा, द पंच दिखाया जा रहा है। ऐसा लगता है जैसे बि्रटिश मालिक कह रहा हो, ‘यही सही माॅडल है, जाओ जाकर इसके भारतीय संस्करण निकालो।’ ड्डोत - घ लोकपि्रय हो गईं। इनमें औरतों की तालीम, विध्वा - जीवन, विध्वा - विवाह और राष्ट्रीय आंदोलन जैसे मसलों पर लेखनी चलाइर् गइर्। कुछ पत्रिाकाओं ने महिलाओं को गृहस्थी चलाने और प़्ौफशन के नुस्खे बताने के साथ - साथ कहानियों और धरावाहिक उपन्यासों के शरिए मनोरंजन परोसा। पंजाब में भी बीसवीं सदी के आरंभ से ही लोकपि्रय लोक साहित्य बड़े पैमाने पर छापा गया। राम चड्ढा ने औरतों को आज्ञाकारी बीवियाँ बनने की सीखदेने के उद्देश्य से अपनी बेस्ट - सेलिंग कृति स्त्राी ध्मर् विचार लिखी। खालसा ट्रैक्ट सोसायटी ;खालसा पुस्ितका सभाद्ध ने इसी तरह के संदेश देते हुए सस्ती पुस्ितकाएँ छापीं। अच्छी औरत बनने के उपदेश को कइर् बार संवाद के रूप में पेश किया गया। बंगाल में वेंफद्रीय कलकत्ता का एक पूरा इलाव़्ाफा - बटाला - लोकपि्रय किताबों के प्रकाशन को समपिर्त हो गया। यहाँ पर आप धमिर्क गुटकों और गं्रथों के सस्ते संस्करण तो खरीद ही सकते थे, जो आमतौर पर अश्लील और सनसनीखेश समझा जाता था, वह भी उपलब्ध् था। उन्नीसवीं सदी के अंत तक, ऐसी बहुत सारी किताबों पर काठ की तख़्ती और लिथोग्राप़्ाफी रंगों की मदद से प्रचुर मात्रा में तसवीरें उकेरी जा रही थीं। पेफरीवाले बटाला के प्रकाशन लेकर घर - घर घूमते थे, जिससे महिलाओं को प़्ाुफसर्त के वक़्त मनपसंद किताबें पढ़ने में सहूलियत हो गइर्। 8.2 ¯प्रट और ग़्ारीब जनता उन्नीसवीं सदी के मद्रासी शहरों में काप़फी सस्ती किताबें चैक - चैराहों पर बेची जा रही थीं, जिसके चलते ग़्ारीब लोग भी बाशार से उन्हें ख़रीदने की पारिवारिक संबंधें के नष्ट - भ्रष्ट होने की कल्पना। पत्नी, जैसा कि मुहावरे में कहा जाता है, पति के सिर पर सवार है। और वह खुद अपनी माँ को शंजीर पहनाकर जानवरों की तरह रखता है। इसमें कलाकार का यह डर उजागर होता है कि पश्िचमी हमले से पारिवारिक व्यवस्था उलट - पुलट गइर् है। मदर् वीणा बजा रहा है, और औरत हुक्का खींच रही है। उन्नीसवीं सदी में महिलाओं की श्िाक्षा की पहल के बाद पारंपरिक पारिवारिक भूमिकाओं के छिन्न - भ्िान्न हो जाने की आशंका तेश हो गइर्। इस तसवीर में पारंपरिक भूमिकाओं का निरूपण है। साहब शराब की बोतल थामे हैं, और मेमसाहब वायलिन बजा रही हैं। स्िथति में आ गए थे। बीसवीं सदी के आरंभ से सावर्जनिक पुस्तकालय खुलने लगे थे, जिससे किताबों की पहुँच निस्संदेह बढ़ी। ये पुस्तकालय अकसर शहरों या व़्ाफस्बों में होते थे, या यदा - कदा संपन्न गाँवों में भी। स्थानीय अमीरों के लिए पुस्तकालय खोलना प्रतिष्ठा की बात थी। उन्नीसवीं सदी के अंत से जाति - भेद के बारे में तरह - तरह की पुस्ितकाओं और निबंधें में लिखा जाने लगा था। ‘निम्न - जातीय’ आंदोलनों के मराठी प्रणेता ज्योतिबा पुफले ने अपनी गुलामगिरी ;1871द्ध में जाति प्रथा के अत्याचारों पर लिखा। बीसवीं सदी के महाराष्ट्र में भीमराव अंबेडकर और मद्रास में इर्.वी. रामास्वामी नायकर ने, जो पेरियार के नाम से बेहतर जाने जाते हैं, जाति पर ज़्ाोरदार व़्ाफलम चलाइर् और उनके लेखन पूरे भारत में पढ़े गए। स्थानीय विरोध् आंदोलनों और संप्रदायों ने भी प्राचीन ध्मर्ग्रंथों की आलोचना करते हुए, नए और न्यायपूणर् समाज का सपना बुनने की मुहिम में लोकिय पत्रा - पत्रिाकाएँ और गुटके छापे। कारखानों में मज़्ादूरों से बहुत श्यादा काम लिया जा रहा था, और उन्हें अपने तजुबो± के बारे में ढंग से लिखने की श्िाक्षा तक नहीं मिली थी। लेकिन कानपुर के मिल - मज़्ादूर काशीबाबा ने 1938 में छोटे और बड़े सवाल लिख और छाप कर जातीय तथा वगीर्य शोषण के बीच का रिश्ता समझाने की कोश्िाश की। 1935 से 1955 के बीच सुदशर्न चक्र के नाम से लिखने वाले एक और मिल - मज़्ादूर का लेखन सच्ची कविताएँ नामक एक संग्रह में छापा गया। बंगलौर के सूती - मिल - मज़्ादूरों ने ख़ुद को श्िाक्ष्िात करने के ख़याल से पुस्तकालय बनाए, जिसकी प्रेरणा उन्हें बंबइर् के मिल - मशदूरों से मिली थी। समाज - सुधरकों ने इन प्रयासों को संरक्षण दिया। उनकी मूल कोश्िाश यह थी कि मज़्ादूरों के बीच नशाख़ोरी कम हो, साक्षरता आए, और उन तक राष्ट्रवाद का संदेश भी यथासंभव पहुँचे। गतिविध्ि चित्रा 19, 20 और 21 को गौर से देखें। ऽ समाज में हो रहे बदलाव को लेकर चित्राकार क्या कह रहा है? ऽ वे कौन से बदलाव हो रहे थे, कि चित्राकार ने ऐसी प्रतििया दी? ऽ क्या आप चित्राकार के मत से सहमत हैं? 9 ¯प्रट और प्रतिबंध् इर्स्ट इंडिया कंपनी के तहत 1798 से पहले का औपनिवेश्िाक शासन सेंसरश्िाप या पाबंदी लगाने के बारे में श्यादा परेशान नहीं था। मज़्ोदार बात तो यह है कि मुित सामग्री को नियंत्रिात करने के इसके शुरुआती व़्ाफदम कंपनी के वुफप्रशासन की आलोचना करने वाले और कंपनी के हुक्मरानों के काम को कोसने वाले अंग्रेज़्ाों के ख्ि़ालाप़्ाफ उठे। कंपनी को इस बात की ¯चता थी कि इन आलोचनाओं का लाभ उठाकर इंग्लैंड में बैठे इनके ¯नदक कहीं भारत पर इनके व्यापारिक एकाध्िकार पर हमला न बोल दें। कलकत्ता सवोर्च्च न्यायालय ने 1820 के दशक तक प्रेस की आज़्ाादी को नियंत्रिात करने वाले वुफछ व़्ाफानून पास किए, और कंपनी ने बि्रतानी शासन का उत्सव मनाने वाले अख़बारों के प्रकाशन को प्रोत्साहन देना चालू कर दिया। अंग्रेशी और देसी भाषाओं के अख़बार - संपादकों द्वारा गुहार और अज़्ाीर् लगाने के बाद 1835 में गवनर्र जेनरल बंे¯टक प्रेस व़्ाफानून की पुनसर्मीक्षा करने के लिए राज़्ाी हो गया। पिफर उदारवादी औपनिवेश्िाक अप़्ाफसर टाॅमस मेकाॅले ने पहले की आज़्ाादियों को बहाल करते हुए नए व़्ाफानून बनाए। 1857 के विद्रोह के बाद प्रेस की स्वतंत्राता के प्रति रवैया बदल गया। व्रुफ( अंग्रेशों ने ‘देसी’ प्रेस का मुँह बंद करने की माँग की। ज्यों - ज्यों भाषाइर् समाचार पत्रा राष्ट्रवाद से समथर्न में मुखर होते गए, त्यों - त्यों औपनिवेश्िाक सरकार में कड़े नियंत्राण के प्रस्ताव पर बहस तेश होने लगी। आइरिश प्रेस कानून के तशर् पर 1878 में वनार्क्युलर प्रेस एक्ट लागू कर दिया गया। इससे सरकार को भाषाइर् प्रेस में छपी रपट और संपादकीय को संेसर करने का व्यापक हव़्ाफ मिल गया। अब से सरकार ने विभ्िान्न प्रदेशों से छपने वाले भाषाइर् अख़बारों पर नियमित नशर रखनी शुरू कर दी। अगर किसी रपट को बाग़्ाी करार दिया जाता था तो अख़बार को पहले चेतावनी दी जाती थी, और अगर चेतावनी की अनसुनी हुइर् तो अख़बार को शब्त किया जा सकता था और छपाइर् की मशीनें छीन ली जा सकती थीं। लेकिन दमन की नीति के बावजूद राष्ट्रवादी अख़बार देश के हर कोने में बढ़ते - पैफलते गए। उन्होंने औपनिवेश्िाक वुफशासन की रिपोटि±ग और राष्ट्रवादी ताव़्ाफतों की हौसला - अपफशाइर् जारी रखी। राष्ट्रवादी आलोचना को खामोश करने की तमाम कोश्िाशों का उग्र विरोध् हुआ। जब पंजाब के व्रफांतिकारियों को 1907 में कालापानी भेजा गया तो बालगंगाध्र तिलक ने अपने केसरी में उनके प्रति गहरी हमददीर् जताइर्। नतीजे के तौर पर उन्हें 1908 में व़्ौफद कर लिया गया, जिसके परिणामस्वरूप भारत - भर में व्यापक विरोध् हुए। बाॅक्स 4 कभी - कभी वप़फादार अख़बारों के संपादक खोजना सरकार के लिए मुश्िकल हो जाता था। जब 1877 में स्थापित अख़बार स्टेट्समैन के संपादक - पद के लिए सैंडसर् को बुलया गया तो उसने पूछा कि आशादी खोने के बदले उसे कितने पैसे मिलेंगे। द प्ऱेंफड आॅप़फ इंडिया ने सरकारी मदद लेने से इसलिए इनकार कर दिया कि इससे उसे सरकारी आदेश मानने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। बाॅक्स 5 मुित शब्द की ताव़्ाफत का अंदाशा अकसर सरकार द्वारा उसको नियंत्रिात करने की कोश्िाशों से मिलता है। औपनिवेश्िाक प्रशासन हमेशा तमाम किताबों और पत्रा - पत्रिाकाओं पर नशर रखता था। पहले विश्वयु( के दौरान, भारतीय रक्षा नियम के तहत, 22 अख़बारों को शमानत देनी पड़ी थी। इनमें से 18 ने सरकारी आदेश मानने की जगह ख़ुद को बंद कर देना उचित समझा। राॅलट के अध्ीन कायर्रत षड्यंत्रा समिति ने 1919 में विभ्िान्न अख़बारों के ख्ि़ालापफ जुमार्ना आदि कारर्वाइयों को और सख़्त बना दिया। द्वितीय विश्वयु( की शुरुआत पर, भारतीय रक्षा अिानियम पारित किया गया, ताकि यु( - संबंध्ी विषयों को सेंसर किया जा सके। भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़ी तमाम रपटें इसी के तहत सेंसर होती थीं। अगस्त 1942 में तव़्ाफरीबन 90 अख़बारों का दमन किया गया। ड्डोत - च संक्षेप में लिखें चचार् करें परियोजना कायर् पिछले सौ सालों में मुद्रण संस्कृति में हुए अन्य बदलावों का पता लगाएँ। पिफर इनके बारे में यह बताते हुए लिखें कि ये क्यों हुए और इनके कौन से नतीजे हुए? परियोजना कायर्

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