काम, आराम और जीवनसमकालीन विश्व में शहर सन् 1880 में दुगार्चरण राय ने एक उपन्यास लिखा था देबगानेर मत्येर् आगमन ;धरती पर देवता उतरेद्ध। इस उपन्यास में ब्रह्मा कुछ अन्य देवताओं के साथकलकत्ता जाने के लिए एक रेलगाड़ी में बैठते हैं। कलकत्ता उस समय केबि्रटिश भारत की राजधानी था। वषार् देव वरुण इन देवताओं को कलकत्ता की सैर कराते हैं। इस विशाल, आधुनिक शहर को देखकर सारे देवता चकित रह जाते हैं। वे न केवल रेलगाड़ी बल्िक गंगा के पानी में चलते विशाल जहाश, कारखानों की धुआँ उगलती चिमनियों, बड़े - बड़े पुल, विशाल स्मारक और नाना प्रकार की चीजों से लदी दुकानों को देखकर विस्िमत रह जाते हैं। जगमगाते महानगर की चकाचैंध से वे इतने अभ्िाभूत हो जाते हैं कि स्वगर् के अपने दरबार में भी ऐसा ही संग्रहालय बनाने का निणर्य कर लेते हैं! उन्नीसवीं सदी के कलकत्ता में नए - नए मौ ़कों की भरमार थी। वहाँ व्यापार और वाण्िाज्य, श्िाक्षा और नौकरियों के एक से एक अवसर सामने आ रहे थे। लेकिन देवतागण इस शहर की एक चीश से परेशान भी होते हैं। उन्हें यहाँ के ठग और चोरों, भयानक ग़्ारीबी, असंख्य लोगों के दड़बेनुमा मकानों को देखकर बड़ा दुख होता है। ब्रह्मा खुद ऐनक खरीदने के चक्कर में ठगे जाते हैं। जब वे जूते खरीदने के लिए दुकान में जाते हैं तो यह देखकर बड़े हैरान होते हैं कि सारे दुकानदार एक - दूसरे को धोखेबाश बता रहे हैं। सारे देवता जाति, धमर् और औरत - मदर् के प़़फवर्फ को देखकर बड़े परेशान होते हैं। जो भेद अब तक वुफदरती और सामान्य दिखाइर् देते थे वे टूटते दिखाइर् दे रहे थे।़दुगार्चरण राय की तरह उन्नीसवीं सदी में भारत के बहुत सारे लोग शहरों को देखकर हैरान भी होते थे और भ्रम में भी पड़ जाते थे। शहर का जीवन परस्पर विरोधी छवियों और अनुभवों को जन्म दे रहा थाः एक तरप़फ संपन्नता तो दूसरी ओर ग़़्ारीबी का महासागर था, एक तरपफ चमक - दमक थी तो दूसरी और धूल - धक्कड़ थी, एक ओर अवसर थे तो दूसरी ओर निराशा थी। क्या शहर हमेशा ऐसे ही थे? यद्यपि शहरीकरण की प्रिया बहुत लंबी रही है लेकिन आधुनिक शहर के उदय का इतिहास 200 साल से श्यादा पुराना नहीं है। औद्योगिक पूँजीवाद का उदय, दुनिया के बहुत बड़े भाग पर औपनिवेश्िाक शासन की स्थापना और लोकतांत्रिाक आदशो± का विकास, इन तीन ऐतिहासिक प्रियाओं ने आधुनिक शहरों की शक्ल - सूरत तय करने में निणार्यक भूमिका निभायी है। इस अध्याय में शहरीकरण को जन्म देने वाली वुफछ प्रियाओं को समझने का प्रयास किया जाएगा। यहाँ हम इस बात की पड़ताल करेंगे कि आधुनिक शहर वैफसे विकसित हुआ और शहर के भीतर क्या चलता है। 1 शहर की विशेषताएँ आइए, सबसे पहले इस बात पर विचार करें कि एक तरप़फ शहरों और दूसरी ओर गाँवों व कस्बों के बीच हम क्या प्वर्फ देखते हैं? उर, निप्पुर और मोहनजोदड़ो जैसे शुरुआती ़कस्बे और शहर नदी घाटियों के आसपास विकसित हुए और वे अपने समय की अन्य इनसानी बस्ितयों या आबादियों से बड़े थे। प्राचीन शहर केवल तभी बस सकते थे जब बहुत सारे ऐसे लोगों के लिए भी भोजन का प्रबंध किया जा सके जो खाद्य उत्पादन के अलावा अन्य काम करतेहैं। राजनीतिक सत्ता, प्रशासकीय नेटवकर्, व्यापार और उद्योग, धामिर्क संस्थानों और बौिक गतिवििायों के केंद्र आमतौर पर शहर ही होते थे। ़शहरी इलाके कइर् तरह के हो सकते हैं। कहीं समय - समय पर लगने वाले बाशार होते हैं तो कहीं स्थायी बाशार होते हैं, तो दूसरी ओर ऐसे छोटे कस्बे भी ़होते हैं जो बाशार के साथ - साथ ़कानून, प्रशासन और धामिर्क गतिवििायों के केंद्र भी हैं। शहरों के आकार और जटिलता में भी बहुत पफवर्फ होता है: ़़राजनीतिक प्रािाकार का वेंफद्र प्रायः शहर ही होते हैं। वे दस्तकारों, व्यापारियों और धामिर्क अिाकारियों को भी प्रश्रय देते हैं। शहर घनी आबादी वाले आधुनिक ़िकस्म के महानगर भी हो सकते हैं जहाँ से एक पूरे क्षेत्रा के राजनीतिक व आथ्िार्क कामों को देखा जाता है और जिनकी आबादी बहुत बड़ी होती है। इस अध्याय में हम आधुनिक विश्व में शहरीकरण के इतिहास को समझने का प्रयास करेंगे। महानगरीय विकास के उदाहरण के तौर पर हम दो आधुनिक शहरों - लंदन और बंबइर् - का विस्तार से अध्ययन करेंगे। लंदन दुनिया का सबसे बड़ा महानगर है और उन्नीसवीं सदी में साम्राज्यवादी केंद्र रहा है। बंबइर् भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे महत्वपूणर् आधुनिक शहर है। 1.1 इंग्लैंड में औद्योगीकरण और आधुनिक शहर का उदय आधुनिक काल में औद्योगीकरण ने शहरीकरण के स्वरूप पर गहरा असर डाला है। इसके बावजूद, 1850 के दशक तक भी, यानी औद्योगिक क्रांति की शुरुआत होने के कइर् दशक बाद तक भी श्यादातर पश्िचमी शहर मोटे तौर पर ग्रामीण ि़कस्म के शहर ही थे। लीड्स और मैनचेस्टर जैसे प्रारंभ्िाक औद्योगिक शहर अठारहवीं सदी के आख्िार में स्थापित किए गए कपड़ा मिलों के कारण प्रवासी मशदूरों को बड़ी संख्या में आकष्िार्त कर रहे थे। 1851 में मैनचेस्टर में रहने वाले तीन चैथाइर् से श्यादा लोग ग्रामीण इलाव़्ाफों से आए प्रवासी मशदूर थे। आइए, अब जरा लंदन को देखें। 1750 तक इंग्लैंड और वेल्स का हर नौ में से एक आदमी लंदन में रहता था। यह एक महाकाय शहर था जिसकी आबादी 6,75,000 तक पहुँच चुकी थी। उन्नीसवीं शताब्दी में भी लंदन इसीतरह पफैलता रहा। 1810 से 1880 के बीच सत्तर सालों में उसकी आबादी 10 लाख से बढ़कर 40 लाख यानी चार गुना हो चुकी थी। ़ाफ ़़गतिविध्ि क्या आप भारतीय इतिहास में से इन श्रेण्िायों के सही उदाहरण ढँूढ़ सकते हैंμकोइर् धामिर्क वेंफद्र, एक बाशार, शहर, कोइर् क्षेत्राीय राजधानी, एक महानगर? उनमें से किसी एक के इतिहास के बारे में पता लगाएँ। नए शब्द महानगर: किसी प्रांत या देश का विशाल और घनी आबादी वाला शहर जो प्रायः वहाँ की राजधानी भी होता है। शहरीकरण: किसी शहर या कस्बे के रूप में विकसित होने की़प्रिया। हालाँकि लंदन में विशाल कारखाने नहीं थे पिफर भी प्रवासी आबादी चुंबक की तरह उसी की तरप़फ ख्िांची चली आती थी। गैरेथ स्टेडमैन जोन्स के शब्दों में, फ्उन्नीसवीं शताब्दी का लंदन क्लको± और दुकानदारों, छोटे पेशेवरों और निपुण कारीगरों, कुशल व शारीरिक श्रम करने वालों की बढ़ती आबादी, सिपाहियों, नौकरों, दिहाड़ी मशदूरों, पफेरीवालों और भ्िाखारियों का शहर था।य् लंदन की गोदी के अलावा मुख्य रूप से पाँच तरह के बड़े उद्योगों में बहुत सारे लोगों को काम मिला हुआ था। ये उद्योग थे: परिधान और जूता उद्योग, लकड़ी व ़पफनीर्चर उद्योग, धातु एवं इंजीनियरिंग उद्योग, छपाइर् और स्टेशनरी उद्योग तथा शल्य चिकित्सा उपकरण व घड़ी जैसे सटीक माप वाले उत्पादों और ़कीमती धातुओं की चीशें बनाने वाले उद्योग। पहले विश्वयु( ;1914 - 18द्ध के दौरान लंदन में मोटरकार और बिजली के उपकरणों का भी उत्पादन होने लगा और विशाल कारखानों की संख्या बढ़ते - बढ़ते इतनी हो गइर् कि शहर की तीन चैथाइर् नौकरियाँ इन्हीं कारखानों में सिमट गईं। 1.2 हाश्िाये के समूह जैसे - जैसे लंदन बढ़ा, वहाँ अपराध भी बढ़ने लगे। कहते हैं कि 1870 के दशक में लंदन में कम से कम बीस हशार अपराधी रहते थे। इस दौर की आपरािाक गतिवििायों के बारे में अब हम काप़फी कुछ जानते हैं क्योंकि उस समय अपराध व्यापक चिंता और बेचैनी का कारण बन चुके थे। पुलिस ़कानून व्यवस्था को लेकर चिंतित थी, परोपकारी समाज की नैतिकता को लेकर बेचैन थे, और उद्योगपति परिश्रमी व अनुशासित मशदूर वगर् चाहते थे। इन्हीं सारी बातों को ध्यान में रखते हुए अपरािायों की गिनती की गइर्, उनकी गतिवििायों पर नशर रखी जाने लगी और उनकी ¯शदगी के तौर - तरीकों की जाँच की जाती थी। उन्नीसवीं सदी के मध्य में हेनरी मेह्यू ने लंदन के मशदूरों पर कइर् किताबें लिखीं। उन्होंने ऐसे लोगों की एक लंबी सूची भी बनाइर् जो अपराधों से ही अपनी आजीविका चलाते थे। ‘अपरािायों’ की इस सूची में दजर् बहुत सारे ऐसे चित्रा 1 - लंदन का पफैलावः चार अलग दौरों में लंदन की आबादी को दशार्ने वाला मानचित्रा।लोग भी थे जो मकानों की छतों से सीसा चुरा लेते थे, दुकानों से खाने की चीशें उठा लेते थे, कोयले के ढेर उठा ले जाते थे या बाड़ों पर सूखे कपड़े उठा ले जाते थे। दूसरी ओर ऐसे अपराधी भी थे जो अपने धंधे में माहिर थे, जिन्हें अपराधों को पूरी सपफाइर् से अंजाम देना अच्छी तरह आता था। लंदन की सड़कों़पर ठगों और जालसाशों, जेबकतरों और छोटे - मोटे चोरों की भरमार रहती थी। जनता को अनुशासित करने के लिए शासन ने अपराधों के लिए भारी सज़ाएँ तय कर दीं और जो ‘लायक ग़्ारीब’ थे उन्हें रोशगार देने का इंतशाम शुरू किया। अठारहवीं सदी के आख्िार में और उन्नीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में प़ैफक्िट्रयों में बहुत सारी औरतें भी काम करती थीं। जैसे - जैसे तकनीक में सुधार आया, कारखानों में औरतों की नौकरियाँ छिनने लगीं और वे घरेलू कामों में सिमट कर रह गईं। 1861 की जनगणना से पता चला कि लंदन में लगभग ढाइर् लाख घरेलू नौकर हैं। उनमें औरतों की संख्या बहुत श्यादा थी। उनमें से अिाकांश हाल ही में शहर में आइर् थीं। बहुत सारी औरतें परिवार की आय बढ़ाने के लिए अपने मकानों का भी इस्तेमाल करती थीं। वे या तो किसी को नए शब्द परोपकारी: ऐसा व्यक्ित जो सामाजिक उत्थान और भलाइर् के लिए काम करता है और इसके लिए अपना पैसा व समय देता है। भाड़े पर रख लेती थीं या घर पर ही रह कर सिलाइर् - बुनाइर्, कपड़े धोने या माचिस बनाने जैसे काम करती थीं। बीसवीं सदी में हालात एक बार पिफरबदले। जब औरतों को यु(कालीन उद्योगों और दफ्ऱतरों में काम मिलने लगा तो वे घरेलू काम छोड़ कर पिफर बाहर आने लगीं। बहुत सारे बच्चों को भी मामूली वेतन के लिए कामों पर भेजा जाने लगा। बहुधा उनके माँ - बाप ही उन्हें काम पर भेजते थे। 1880 के दशक में द बिटर क्राइर् आॅपफ़आउटकास्ट लंदन नामक पुस्तक लिखने वाले पादरी ऐंड्रयू मीयन्सर् ने इस बात पर रोशनी डाली कि लंदन के अल्पवेतन कारखानों में मशदूरी करने की बजाय अपराध ही श्यादा पफायदेमंद क्यों हैं: ‘माना जाता है कि सात साल का एक बच्चा़चोरी - चकारी करके हर हफ्ऱते आराम से 10 श्िालिंग 6 पेंस कमा लेता है...। अगर इसी उम्र का कोइर् लड़का उस चोर के बराबर कमाना चाहे तो इसके लिए उसेहफ्रगतिविध्ि कल्पना कीजिए कि आप एक अखबार के संवाददाता हैं और आपको लंदन में 1811 में आ रहे बदलावों के बारे में लेख लिख कर भेजना है। आप किन समस्याओं के बारे में लिखेंगे? उस समय जो बदलाव आ रहे थे उनसे किसको प़फायदा होना था? ते में माचिसों के 56 डिब्बे यानी रोशाना 1, 296 माचिसें बनानी पड़ेंगी।’ 1870 के अनिवायर् प्राथमिक श्िाक्षा ़़कानून और 1902 से लागू किए गए प़्ौफक्ट्री कानून के बाद बच्चों को औद्योगिक कामों से बाहर रखने की व्यवस्था लागू कर दी गइर्। 1.3 आवास औद्योगिक क्रांति के बाद लोग बड़ी संख्या में शहरों की तरप़्ाफ रुख करने लगे तो लंदन जैसे पुराने शहर नाटकीय रूप से बदलने लगे। प़्ौफक्ट्री या ववर्फशाॅप मालिक प्रवासी कामगारों को रहने की जगह नहीं देते थे। पफलस्वरूप, जिनके पास शमीन थी ऐसे अन्य लोग ही इन नवागंतुकों के लिए सस्ते और सामान्यतः असुरक्ष्िात टेनेमेंट्स बनाने लगे। ़नए शब्द टेनेमेंट्स: कामचलाऊ और अकसर बेहिसाब भीड़ वाले अपाटर्मेंट मकान। ऐसे मकान बड़े शहरों के गरीब इलाव़्ाफों में़श्यादा पाए जाते थे। चित्रा 2 - ए स्ट्रेंजसर् होम ;अजनबियों का घरद्ध, दि इलस्ट्रेड लंदन न्यूश, 1870 बहुत सारे शहरों में खैराती संस्थाओं और स्थानीय शासन की ओर से जाड़ों में रैनबसेरे और अजनबी घरों की व्यवस्था की जाती थी। ग़्ारीब लोग भोजन, गमार्हट और पनाह की आस में इन स्थानों की ओर टूट पड़ते थे। यूँ तो गाँवों में भी ग़्ारीबी खूब थी लेकिन शहरों में तो बहुत घनी और साप़्ाफ दिखाइर् पड़ती थी। 1887 में लिवरपूल के एक जलपोत मालिक चाल्सर् बूथ ने लंदन के इर्स्ट एंड ;पूवीर् छोरद्ध में लंदन के अल्पकुशल मशदूरों का पहला सामाजिक सवेर्क्षण किया। उन्होंने पाया कि लंदन के कम से कम 10 लाख ;लंदन की आबादी का लगभग पाँचवाँ हिस्साद्ध लोग बहुत ही ग़्ारीब हैं और उनकी औसत उम्र 29 साल से श्यादा नहीं है ;संपन्न वगर् और मध्यवगर् की औसत उम्र 55 साल थीद्ध। बूथ ने पाया कि इन मशदूरों के किसी ‘ववर्फशाॅप, अस्पताल या पागलखाने’ में मरने की संभावना श्यादा है। चाल्सर् बूथ ने अपने सवेर्क्षण में निष्कषर् निकाला कि लंदन को ‘अपने निधर्नतम नागरिकों को बसाने के लिए कम से कम 4,00,000 कमरे और बनाने होंगे। कुछ समय तक शहर के खाते - पीते बाश्िांदे यही माँग करते रहे कि झोपड़पटि्टयों को सापफ कर दिया जाना चाहिए। लेकिन धीरे - धीरे लोग इस़बात को समझने लगे कि शहर के ग़्ारीबों के लिए भी आवास का इंतशाम करना शरूरी है। इस बढ़ती चिंता के क्या कारण थे? पहली बात तो यही थी कि ग़्ारीबों के एक कमरे वाले मकानों को जनता के स्वास्थ्य के लिए खतरा माना जाने लगा था। इन मकानों में भीड़ रहती थी, वहाँ हवा - निकासी का इंतशाम नहीं था और साप़़्ाफ - सपफाइर् की सुविधाएँ नहीं थीं। दूसरा, खस्ताहाल मकानों के कारण आग लगने का खतरा बना रहता था। तीसरा, इस विशाल जनसमूह के कारण सामाजिक उथल - पुथल की आशंका दिखाइर् देने लगी थी। 1917 की रूसी क्रांति के बाद यह डर कापफी बढ़ गया था। लंदन वेफ़गरीब कहीं विद्रोह न कर डालें, इस आशंका से निपटने के लिए मशदूरों के लिए आवासीय योजनाएँ शुरू की गईं। 1.4 लंदन की सपफाइऱ्लंदन को सापफ - सुथरा बनाने के लिए तरह - तरह से प्रयास किए गए। भीड़़भरी बस्ितयों की भीड़ कम करने, खुले स्थानों को हरा - भरा बनाने, आबादी चित्रा 3 - चूहेदानी बेचने वाला, रोलैंड्सन द्वारा बनाया काटूर्न, 1799रोलैंड्सन ने अपनी कृतियों में लंदन के उन काम - धंधों को दजर् किया था जो औद्योगिक पूँजीवाद के आगमन के कारण खत्म होने लगे थे। गतिविध्ि आज भारत के बहुत सारे शहरों में ग़्ारीबों की झोपड़पटि्टयों को हटाया जा रहा है। आपस में चचार् कीजिए कि सरकार को इन लोगों के लिए मकानों का इंतशाम करना चाहिए या नहीं। चित्रा 4 - लंदन की एक झोपड़पट्टी, 1899 इस तसवीर में सड़क का किन - किन कामों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है? बीसवीं सदी के मशदूरों के आवासों में क्या बदलाव आने वाले थे? चित्रा 5 μ गरीबों के लिए आराम और मौज - मस्ती करने के लिए सड़क के अलावा और कोइर् जगह़नहीं होती थी। इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूश, 1856 उन्नीसवीं सदी में अभ्िाजात्य तबव़े़फी चिंतित फ के लोग सड़कों पर बढ़ती शराबखोरी और गंदगी को लेकर कापरहने लगे थे। आख्िारकार शराबखोरी की समस्या से निपटने के लिए संयमता आंदोलन शुरू किया गया। ड्डोत - ककम करने और शहर को योजनानुसार बसाने के लिए कोश्िाशें शुरू कर दी गईं। इसी तरह की आवासीय समस्याओं से जूझ रहे बलिर्न और न्यूयाॅकर् जैसे शहरों की तशर् पर अपाटर्मेंट्स के विशाल ब्लाॅक बनाए गए। लेकिन टेनेमेंट्स की वजह से यहाँ की समस्या विकट थी। मकानों की भारी किल्लत के असर को काबू करने के लिए प्रथम विश्वयु( के दौरान किराया नियंत्राण कानूऩ़लागू किया गया। उन्नीसवीं सदी के औद्योगिक शहरों में घुटन भरे भीड़ - भड़क्के ने देहाती सापफ़हवा की चाह बढ़ा दी थी। लंदन और पेरिस के बहुत सारे अमीर तो देहात में अवकाश गृह बनवाने का खचार् उठा सकते थे पर यह विकल्प सबके पास नहीं था। शहर के लिए नए ‘पफेपफड़ों’ का इंतशाम करने की बात उठने लगी। लंदन के गिदर् हरित पट्टी आदि विकसित करके देहात और शहर के पको पाटने के प्रयास भी किए गए। ़फासले नए शब्द संयमता आंदोलन: मुख्य रूप से मध्यवगर् के नेतृत्व में चलाया गया समाज सुधर आंदोलन जो इंग्लैंड और अमेरिका मेंगतिविध्ि उन्नीसवीं सदी से शुरू हुआ। इस आंदोलन में शराब को परिवार व समाज की तबाही के लिए िाम्मेदार ठहराया जाता था। इसकल्पना कीजिए कि आप लंदन के ग़्ारीबों के रहन - सहन का अध्ययन कर रहे हैं। ़आंदोलन में मुख्य रूप से कामकाजी तबके में नशीले पेय पदाथो±उन परिस्िथतियों से जनता के स्वास्थ्य के लिए जो खतरे पैदा हो रहे थे उनके बारे के उपभोग में कमी लाने पर शोर दिया जाता था।में एक नोट लिख्िाए। वास्तुकार और योजनाकार एबेनेज़र हावडर् ने गाडर्न सिटी ;बगीचों का शहरद्ध की अवधारणा प्रस्तुत की। उन्होंने एक ऐसे शहर का खाका खींचा जहाँ पेड़ - पौधों की भरमार हो और जहाँ लोग रहते भी हों, काम भी करते हों। उनका मानना था कि इस प्रकार बेहतर नागरिक तैयार करने में भी मदद मिलेगी। हावडर् के विचारों के आधार पर रेमंड अनविन और बैरी पाकर्र ने न्यू अजऱ्विक नाम से एक गाडर्न सिटी का डिजाइन तैयार किया। इसमें साझा बाग - बगीचे, खूबसूरत नशारों का इंतजाम किया गया था। हर चीश को बड़ी बारीकी से सजाया गया था। लेकिन ऐसे मकानों को तो केवल खाते - पीते कामगार ही खरीद सकते थे। विश्वयु(ों के दौरान ;1919 - 39द्ध मशदूर वगर् के लिए आवास का इंतशाम करने की िाम्मेदारी बि्रटिश राज्य ने अपने ऊपर ले ली और स्थानीय शासन के शरिये 10 लाख मकान बनाए गए। इनमें से श्यादातर एक परिवार के रहने लायक छोटे मकान थे। इस दौरान शहर इतना पफैल चुका था कि अब लोग पैदल अपने काम तक नहीं जा सकते थे। शहर के आसपास यानी उपशहरी बस्ितयों के अस्ितत्व में आने से सावर्जनिक परिवहन व्यवस्था अनिवायर् हो चुकी थी। 1.5 शहर में आवागमन अगर लोगों को उपनगरीय बस्ितयों से शहर तक लाने के लिए यातायात की सुविधा नहीं है तो भला लोगों को शहर छोड़ कर उपनगरीय गाडर्न आबादियों में जाकर रहने के लिए वैफसे तैयार किया जा सकता था? लंदन के भूमिगत रेलवे ने आवास की समस्या को एक हद तक हल कर दिया था। इसके शरिये भारी संख्या में लोग शहर के भीतर - बाहर आ - जा सकते थे। दुनिया की सबसे पहली भूमिगत रेल के पहले खंड का उद्घाटन 10 जनवरी 1863 को किया गया। यह लाइन लंदन की पैडिंग्टन और पफैरिंग्टन स्ट्रीट के चित्रा 6 μ न्यू अशर्विक, एक बगीचा - उपशहर। ध्यान से देख्िाए कि इसमें चारों तरप़फ से बंद हरे - भरे स्थान के सहारे एक नया सामुदायिक जीवन विकसित हो रहा है। बीच स्िथत थी। पहले ही दिन 10,000 यात्रिायों ने इस रेल में यात्रा की। इस लाइन पर हर दस मिनट में अगली गाड़ी आ रही थी। 1880 तक भूमिगत रेल नेटवकर् का विस्तार हो चुका था और उसमें सालाना चार करोड़ लोग यात्रा करने लगे थे। शुरू में भूमिगत यात्रा की कल्पना से लोग डर जाते थे। इस बारे में अखबार के एक पाठक ने इन शब्दों में चेतावनी दी थीः मैं जिस डिब्बे में बैठा था वह पाइप पीते मुसापि़फरों से भरा हुआ था। डिब्बे का माहौल सल्प़फर, कोयले की धूल,और ऊपर लगे गैस के लैंप से निकलती गंध से अटा हुआ था। हालत ये थी कि जब हम मूरगेट स्टेशन पहुँचे तब तक मैं श्वासावरोधन और गमीर् के कारण अधमरा हो चुका था। मेरा मानना है कि इन भूमिगत रेलगाडि़यों को प़फौरन बंद कर दिया जाना चाहिए। ये स्वास्थ्य के लिए भयानक खतरा हैं। चित्रा 7 μ लंदन में रेलवे लाइनें बिछायी जा रही हैं। इलस्ट्रेटेड टाइम्स, 1868 बहुत सारे लोगों का मानना था कि इन ‘लौह दैत्यों’ ने शहर की अप़फरा - तप़फरी और अस्वास्थ्यकर माहौल को और बढ़ा दिया है। निमार्ण की प्रिया में होने वाले बेहिसाब विनाश के बारे में चाल्सर् डिकेन्स ने डाॅम्बी एंड सन ;1848द्ध में लिखाμ मकान गिरा दिए गएऋ सड़कों को तोड़ कर बंद कर दिया गयाऋ शमीन में गहरे गड्ढे और खाइयाँ खोद दी गईंऋ चारों तरपफ बेहिसाब मिट्टी और धूल के अंबार लगा दिएऋ ...अधूरेपन की सौ हजार शक्लें और पदाथर् सामने थे, उलट - पुलट अपनी जगह अदलते - बदलते, शमीन में धँसे हुए ...। तकरीबन दो मील लंबी रेलवे लाइन बिछाने के लिए औसतन 900 घर गिरा दिए जाते थे। इस प्रकार लंदन में बनी ट्यूब रेलवे के कारण लंदन के ग़्ारीबों को बड़ी संख्या में उजाड़ा गया, खास तौर से दो विश्वयु(ों के बीच। बहरहाल, इन सारी अड़चनों के बावजूद भूमिगत रेलवे एक शबरदस्त कामयाबी साबित हुइर्। बीसवीं सदी आते - आते न्यूयाॅकर्, टोकियो और श्िाकागो जैसे श्यादातर विशाल महानगर अपनी सुव्यवस्िथत सावर्जनिक परिवहन व्यवस्था के बिना नहीं रह सकते थे। नतीजा यह हुआ कि शहर की आबादी और बिखरने लगी। सुनियोजित उपनगरीय इलाव़्ाफों और अच्छे रेल नेटवकर् की बदौलत बहुत सारे लोगों के लिए मध्य लंदन से बाहर रहते हुए रोश काम पर आना आसान हो गया। इन नयी सुविधाओं ने सामाजिक ऊँच - नीच को कमशोर किया तो नए ़िकस्म के विभेद भी पैदा कर दिए। इन बदलावों से लोगों के घरेलू और सावर्जनिक जीवन पर क्या असर पड़ा? क्या उनका सभी सामाजिक समूहों के लिए एकजैसा महत्त्व था? नए शब्द श्वासावरोधन: आॅक्सीजन की कमी के कारण दम घुटने का अहसास होना। चित्रा 9 - लंदन की सड़कों पर गाएँ, द ग्राप्िाफक़, 1877आधुनिक शहर बनाने के लिए सड़कों को भी सापफ करने का प़्ौफसला लिया़गया। उन्नीसवीं सदी में लंदन की सड़कों पर गायों की वजह से अकसर टैªपि़फकजाम हो जाता था। अठारहवीं सदी में परिवार उत्पादन और उपभोग के साथ - साथ राजनीतिक निणर्य लेने के लिहाश से भी एक महत्वपूणर् इकाइर् था। औद्योगिक शहर में जीवन के रूप रंग ने परिवार की उपादेयता और स्वरूप को पूरी तरह बदल डाला। परिवार के सदस्यों के बीच अब तक जो बंधन थे वे ढीले पड़ने लगे। मशदूर वगर् में विवाह संस्था टूटने की कगार पर पहुँच गइर्। दूसरी ओर बि्रटेन के उच्च एवं मध्यवगर् की औरतें अकेलापन महसूस करने लगी थीं हालाँकि नौकरानियों के आ जाने से उनकी िांदगी काप़फी आसान हो गइर् थी। ये नौकरानियाँ बहुत मामूली वेतन पर घर का खाना बनाती थीं, साप़फ - सप़फाइर् का काम करती थीं और बच्चों की देखभाल भी करती थीं। वेतन के लिए काम करने वाली औरतों का अपने जीवन पर श्यादा नियंत्राण था। विशेष रूप से निम्नतर सामाजिक वगो± की महिलाओं का अपने जीवन पर अच्छा - खासा नियंत्राण था। बहुत सारे समाज सुधारकों का मानना था कि एक संस्था के रूप में परिवार टूट चुका है। इस आशंका को दूर करने के लिए उन्होंने सुझाव दिया कि घर से बाहर जाकर काम करने वाली औरतों को दोबारा घर की चारदिवारी में भेजा जाए। 2.1 शहर में मदर्, औरत और परिवार इसमें कोइर् संदेह नहीं कि शहर पुरुषों और महिलाओं, दोनों में व्यक्ितवाद की एक नयी भावना पैदा कर रहा था। वे सामूहिक मूल्य - मान्यताओं से दूर जाने लगे थे जोकि छोटे ग्रामीण समुदायों की खासियत थी। परंतु इस नयी शहरी परििा में पुरुषों व महिलाओं की पहुँच एकसमान नहीं थी। जैसे - जैसे औरतों के औद्योगिक रोशगार खत्म होने लगे और रूढि़वादी तत्व सावर्जनिक स्थानों पर उनकी उपस्िथति के बारे में अपना असंतोष व्यक्त करने लगे, औरतों के पास वापस अपने घरों में लौटने के अलावा कोइर् चारा नहीं रहा। सावर्जनिक परििा केवल पुरुषों का दायरा बनती चली गइर् और घरेलू दायरे को ही औरतों के लिए सही जगह माना जाने लगा। उन्नीसवीं शताब्दी के श्यादातर आंदोलनों, जैसे चाटिर्श्म ;सभी वयस्क पुरुषों के लिए मतािाकार के पक्ष में चलाया गया आंदोलनद्ध, दस घंटे का आंदोलन ;कारखानों में काम के घंटे निश्िचत करने के लिए चला आंदोलनद्ध में पुरुष बड़ी संख्या में एकजुट हुए। औरतों के मतािाकारआंदोलन या विवाहित औरतों के लिए संपिा में अिाकार आदि आंदोलनों के माध्यम से महिलाएँ काप़फी समय बाद जाकर ;1870 के दशक सेद्ध राजनीतिक गतिवििायों में हिस्सा लेने के लिए तैयार हो पाईं। नए शब्द व्यक्ितवाद: वह सि(ांत जिसमें समुदाय की नहीं बल्िक व्यक्ित की स्वतंत्राता, अिाकारों और स्वतंत्रा कारर्वाइर् की हिमायत की जाती है। 135 बीसवीं शताब्दी तक शहरी परिवार एक बार पिफर बदलने लगा था। इसके पीछे आंश्िाक रूप से यु( के दौरान औरतों के बहुमूल्य योगदान का भी हाथ था। यु( की शरूरतों को पूरा करने के लिए महिलाओं को बड़ी संख्या में काम पर रखा जाने लगा था। इन परिस्िथतियों में परिवार काप़फी छोटा हो गया था। सबसे महत्त्वपूणर् बात यह थी कि अब परिवार वस्तुओं और सेवाओं के, तथा विचारों के नए बाशार का केंद्रबिंदु बन चुका था। यदि नए औद्योगिक शहर ने सामूहिक श्रम के लिए नए अवसर उपलब्ध कराए तो उसने रविवार और अन्य छु‘ियों के दिनों में आमोद - प्रमोद और मनोरंजन की समस्या भी खड़ी कर दी। लोगों का मनोरंजन करने के लिए जो समय मिला उसका उन्होंने किस प्रकार प्रयोग किया? 2.2 मनोरंजन और उपभोग अमीर बि्रटेनवासियों के लिए बहुत पहले से ही ‘लंदन सीज़न’ की परंपरा चली आ रही थी। अठारहवीं सदी के आख्िारी दशकों में 300 - 400 संभ्रांत परिवारों के समूह के लिए आॅपेरा, रंगमंच और शास्त्राीय संगीत आदि कइर् प्रकार केसांस्कृतिक आयोजन किए जाते थे। मेहनतकश अपना खाली समय पब या शराबघरों में बिताते थे। इस मौव़फ पर वे खबरोंका आदान - प्रदान भी करते थे और कभी - कभी राजनीतिक कारर्वाइयों के लिए गोलबंदी भी करते थे। धीरे - धीरे आम लोगों के लिए भी मनबहलाव के तरीव़ेफ निकलने लगे। इनमें से कुछ सरकारी पैसे से शुरू किए गए थे। उन्नीसवीं सदी में लोगों को इतिहास का बोध देने के लिए और लोगों को बि्रटेन की उपलब्िधयों से परिचित कराने के लिए बहुत सारे पुस्तकालय, कला दीघार्एँ और संग्रहालय खोले जाने लगे। शुरुआती दिनों में लंदन स्िथत बि्रटिश म्यूिायम में आने वालों की सालाना तादाद सिपर्फ 15, 000 थी। 1810 से इस सं्रें पवश शल्क समाप्त कर दिया गहालय म्रेुगया तो दशर्कों की संख्या तेशी से बढ़ने लगी। 1824 - 25 में 1, 27, 643 दशर्क आए जबकि 1846 तक दशर्कों की संख्या बढ़कर 8, 25,901 तक जा पहँुची। निचले वगर् के लोगों में संगीत सभा काप़फी लोकपि्रय थी और बीसवीं सदी आते - आते तो विभ्िान्न पृष्ठभूमि के लोगों के लिए सिनेमा भी मनोरंजन का शबरदस्त साधन बन गया। बि्रटिश औद्योगिक मशदूरों को छुट्टी के दिनों में समुद्र किनारे जाने की सलाह दी जाती थी जिससे वे खुली धूप और स्वच्छ हवा का आनंद ले सवेंफ। 1883 में ब्लैकपूल स्िथत समुद्र तट पर सैर - सपाटे के लिए आने वालों की संख्या 10 लाख सेश्यादा थी जो 1939 तक 70 लाख से ऊपर जा चुकी थी। कामकाजी ग़्ारीब जहाँ भी रहते थे अपने मनोरंजन के ठिकाने बना ही लेते थे। चित्रा 12 - शराबघर के बाहर खड़ी घोड़ागाडि़याँ, उन्नीसवीं शताब्दी का प्रारंभ। इस तसवीर से पता चलता है कि उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में शराबख़ानों और घोड़ागाडि़यों के बीच कितना गहरा रिश्ता था। रेलवे के आने से पहले शराबख़ाने ऐसे स्थान थे जहाँ आकर घोड़ागाडि़याँ रुकती थीं और थके हुए मुसापि़फर शराबख़ाने में ही खाते - पीते और सोते थे। शराबघर आमतौर पर घोड़ागाडि़यों के रास्ते में स्िथत होता था और उनमें रात को रुकने का इंतशाम रहता था। रेलवे और बस परिवहन के आगमन के बाद घोड़ागाडि़यों और शराबख़ानों का इस्तेमाल कम होने लगा। रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों के पास ही शराबघर खुलने लगे। यहाँ लोग पफटापफट पीने और गपशप के लिए ठहरते थे और पिफर सप़फर पर निकल पड़ते थे। ़3 शहर में राजनीति 1886 में कड़ाके की सदीर् के दिनों में चारदीवारी के बाहर काम करना असंभव हो गया तो लंदन के ग़्ारीब दंगों पर उतारू हो गए। उनकी माँग थी कि उन्हें भयानक ग़्ारीबी से आजादी दिलाइर् जाए। डेप्टप़फोडर् से लंदन की ओर बढ़े चले आ रहे 10, 000 लोगों की भीड़ से भयभीत दुकानदारों ने अपनी दुकानें बंद कर दीं। जुलूस को तितर - बितर करने के लिए पुलिस बुलाइर् गइर्। इसी तरह का दंगा 1887 के आख्िारी महीनों में भी हुआ। इस बार पुलिस ने श्यादा सख्ती दिखाइर्। इस पुलिस कारर्वाइर् को नवंबर 1887 के खूनी रविवार के नाम से याद किया जाता है। दो साल बाद लंदन के हशारों गोदी कामगारों ने हड़ताल कर दी और शहर भर में जुलूस निकाले। एक लेखक के अनुसार, ‘हशारों हड़ताली शहर भर में जुलूस निकाल रहे थे लेकिन न तो किसी की जेब कटी और न कोइर् ख्िाड़की टूटी...।’ 12 दिन तक चली इस हड़ताल में मशदूरों की माँग थी कि गोदी कामगारों की यूनियन को मान्यता दी जाए। इन उदाहरणों से आप अच्छी तरह समझ सकते हैं कि शहर में बहुत सारे लोगों को एक साथ राजनीतिक कारर्वाइयों में खींचा जा सकता था। इस प्रकार शहर की विशाल जनसंख्या एक अवसर भी थी और एक खतरा भी। शहरों में विद्रोह की आशंकाओं को कम करने और शहरों को सुंदर बनाने के लिए सरकारी तंत्रा ने हर संभव उपाय किए हैं। इस बात को पेरिस के बारे में दिए गए उदाहरणों से समझा जा सकता है। बाॅक्स 1 पेरिस का हाॅसमानीकरण सन् 1852 में लुइर् नेपोलियन प्प्प् ;नेपोलियन बोनापाटर् का भतीजाद्ध ने खुद को सम्राट घोष्िात कर दिया। सत्ता सँभालने के बाद उसने पूरे जोश से पेरिस के पुननिर्मार्ण का काम शुरू कर दिया। नए पेरिस के निमार्ण का काम बैराॅन हाॅसमान नामक वास्तुकार को सौंपा गया जो सियाँ का िप़फेक्ट था। उसकानाम सुंदरता और व्यवस्था के नाम पर शहरों के जबरन पुननिर्मार्ण का पयार्य बन चुका है। उसने शहर को खूबसूरत बनाने और किसी भी तरह की बग़्ाावत की आशंका को दूर करने के लिए पेरिस के मध्य से ग़्ारीबों की बस्ितयों को साप़फ करवा दिया था। 1852 के बाद 17 साल तक हाॅसमान पेरिस के पुननिर्मार्ण में लगा रहा। शहर भर में सीधी, चैड़ी सड़कें या बुलेवड्सर् ;छायादार सड़कद्ध बनाइर् गईं, खुले मैदान बनाए गए और बड़े - बड़े पेड़ लगा दिए गए। 1870 तक पेरिस की सड़कों में से 20 प्रतिशत हाॅसमान की योजना के अनुसार बनाइर् जा चुकी थीं।पूरे शहर में पुलिस को तैनात किया गया, रात में गश्त शुरू की गइर् और बस अड्डों व टोंटी के पानी का इंतशाम किया गया। इतने बड़े पैमाने पर काम करने के लिए बहुत सारे लोगों की शरूरत थी। 1860 के दशक में पेरिस के प्रत्येक पाँच कामकाजी लोगों में से एक निमार्ण कायो± में लगा था। इस पुननिर्मार्ण अभ्िायान में पेरिस के बीच रहने वाले 3,50,000 लोगों को उजाड़ दिया गया था। पेरिस के कुछ संपन्न निवासियों को भी लगता था कि उनके शहर को दानवी ढंग से बदल दिया गया है। उदाहरण के लिए, 1860 में गाॅनकोटर् बंधुओं नेअपने लेखन में पुरानी जीवनशैली के खत्म हो जाने और एक उच्चवगीर्य संस्कृति के स्थापित हो जाने पर गहरा दुख व्यक्त किया था। बहुतों का मानना थाकि हाॅसमान ने एक जैसे दिखने वाले बुलेवड्सर् और छज्जों से भरा सुनसान, उदास शहर बनाने के लिए सड़क के जीवन और ‘सड़कों को मार डाला’ है। 1866 में लिखे गए मेशों न्यूवे नाटक में एक बूढ़ा दुकानदार कहता है, ‘अब तो जरा सी सैर के लिए भी मीलों जाना पड़ता है! ऐसी पटरियाँ बना दी गइर् हैं जो कहीं खत्म ही नहीं होतीं! एक पेड़, एक बेंच, एक खोखा! एक पेड़, एक बेंच, एक खोखा! एक पेड़, एक बेंच, ...।’ लेकिन हाॅसमान के पेरिस के बारे में मचा यह हल्ला जल्दी ही गवर् के भाव में तब्दील हो गया। यह नयी राजधानी पूरे यूरोप के लिए इर्ष्यार् का विषय बनचुकी थी। पेरिस बहुत सारे ऐसे वास्तुश्िाल्पीय, सामाजिक और बौिक प्रयोगों का केंद्र बन गया जो पूरी सदी तक यूरोप ही नहीं बल्िक पूरी दुनिया पर अपना असर डालते रहे। 4 औपनिवेश्िाक भारत के शहर पश्िचमी यूरोपीय शहरों के विपरीत उन्नीसवीं सदी में हमारे शहर इतनी तेशीड्डोत - खसे नहीं पैफले। औपनिवेश्िाक शासन के दौरान भारत में शहरीकरण की रफ्ऱतार धीमी ही रही। बीसवीं सदी की शुरुआत में हमारे देश के केवल 11 प्रतिशत लोग शहरों में रहते थे। इस शहरी आबादी में से भी बहुत बड़ी संख्या तीन विशाल प्रेसीडेंसी शहरों में रहती थी। ये बहुउपयोगी किस्म के शहर थे।उनमें बड़े - बड़े बंदरगाह थे, वेयरहाउस थे, घर व दफ्ऱतर थे, सेना की छावनियाँ थीं और शैक्षण्िाक संस्थान, संग्रहालय व पुस्तकालय थे। बंबइर् भारत का एक प्रमुख शहर था। उन्नीसवीं सदी के आख्िारी सालों से बंबइर् तेशी से पफैलने लगा था। 1872 में उसकी आबादी 6, 44, 405 थी जो 1941 में 15, 00, 000 तक पहँुच चुकी थी। आइए, देखें बंबइर् का विकास वैफसे हुआ। नए शब्द प्रेसीडेंसी शहर: बि्रटिश शासन के समय बंबइर्, बंगाल और मद्रास प्रेसिडेंसी की राजधनियाँ। चचार् करें ड्डोत - ख को ध्यान से पढ़ें। इसमें लेखकों ने शहरी जीवन के कौन से साझा पहलू गिनाए हैं? उन्होंने कौन से अंतविर्रोधी अनुभवों का उल्लेख किया है? 4.1 बंबइर्: भारत का सबसे महत्त्वपूणर् शहर? सत्राहवीं शताब्दी में बंबइर् सात टापुओं का समूह था और उस पर पुतर्गालियों का नियंत्राण था। 1661 में बि्रटेन के राजा चाल्सर् द्वितीय का विवाह पुतर्गाल की राजकुमारी से हुआ तो ये टापू अंग्रेशों के हाथों में चले गए। इसके बाद इर्स्ट इंडिया वंफपनी ने भी पश्िचमी भारत के अपने सबसे मुख्य बंदरगाह सूरत ़से अपना मुख्यालय बंबइर् में कायम कर लिया। इस चित्रा में आप दाएँ सिरे पर कोलाबा का लाइटहाउस और पृष्ठभूमि में सेंट थाॅमस का गिरजा देखसकते हैं। उन्नीसवीं सदी के मध्य में भी चित्राकारों को खूबसूरत दृश्य मिल जाते थे। बड़ी विकासपरियोजनाएँ अभी शुरू नहीं हुइर् थीं। शुरू - शुरू में बंबइर् का महत्त्व गुजरात से आने वाले कपड़े के नियार्त के लिए ही श्यादा था। उन्नीसवीं सदी में बाद के सालों के दौरान बंबइर् एक बंदरगाह के रूप में विकसित होने लगा जहाँ से कपास और अप़्ाफीम जैसे कच्चे माल बड़ी तादाद में रवाना किए जा सकते थे। धीरे - धीरे यह पश्िचमी भारत का एक महत्वपूणर् प्रशासकीय केंद्र भी बन गया। सदी के आख्िार तक आते - आते बंबइर् देश का एक बड़ा औद्योगिक केंद्र बन चुका था। 4.2 शहर में रोशगार अंग्रेज - मराठा यु( में मराठों की हार के बाद 1819 में बंबइर् को बंबइर् प्रसीडेंसी की राजधानी घेष्िात कर दिया गया। इसके बाद शहर तेशी से पफैलने लगा। कपास और अप़्ाफीम के बढ़ते व्यापार के चलते न केवल बहुत सारे व्यापारी और व्सक पेसंदकेमहाजन बल्िक तरह - तरह के कारीगर और दुकानदार भी बंबइर् में आकर बसने लगे। कपड़ा मिलें खुलने के बाद और भी श्यादा संख्या में लोग शहर की तरपफ स्ंदक तमबसंउंजपवदरुख करने लगे। चित्रा 18 - 1930 के दशक में बंबइर् का मानचित्रा जिसमें सातों टापुओं और विकसित की गइर् शमीन को देखा जा सकता है। ़बंबइर् में पहली सूती कपड़ा मिल 1854 में स्थापित की गइर् थी। 1921 में वहाँ ऐसी 85 कपड़ा मिलें खुल चुकी थीं जिनमें 1, 46, 000 मशदूर काम करते थे। 1881 से 1931 के बीच बंबइर् में रहने वालों में से लगभग एक चैथाइर् ही ऐसे थे जिनका जन्म बंबइर् में हुआ था। बा की निवासी बाहर से़आकर वहाँ बसे थे। पास में ही स्िथत रत्नागिरी िाले के बहुत सारे लोग कपड़ा मिलों में काम करने के लिए बंबइर् आ रहे थे। 1919 से 1926 के बीच मिलों में काम करने वाले मशदूरों में औरतों की संख्या 23 प्रतिशत थी। इसके बाद कामकाजी आबादी में उनकी संख्या लगातार गिरती चली गइर् और आख्िार में उनका हिस्सा केवल 10 प्रतिशत पर सिमट कर रह गया। तीस के दशक के आख्िार तक औरतों के काम या तो मशीनों से किए जाने लगे थे या उनके काम पुरुष मशदूरों को सौंपे जाने लगे। बीसवीं सदी के बहुत साल बीत जाने के बाद भी भारत के समुद्री व्यापार पर बंबइर् का ही दबदबा बना हुआ था। बंबइर् शहर दो प्रमुख रेलवे नेटवको± का जंक्शन या मिलन बिंदु था। रेलवे के कारण शहर में आने वालों को और सुविधा महसूस होने लगी। उदाहरण के लिए, 1888 - 89 में कच्छ के सूखे इलाव़्ाफों में पड़े अकाल के कारण असंख्य लोग बंबइर् आ गए। आप्रवासियों की इस बाढ़ से प्रशासनिक दायरों में बेचैनी और भय पैदा होने लगा था। 1898 में प्लेग की महामारी के कारण जब लोगों के रेले के रेले बंबइर् में आने लगे तो िाला प्रशासन ने लोगों को वापस भेजना शुरू कर दिया। 1901 तक लगभग 30, 000 लोगों को उनके मूल स्थानों पर वापस भेजा जा चुका था। 4.3 आवास और पड़ोस बंबइर् भीड़ - भाड़ वाला शहर था। 1840 के दशक में लंदन का क्षेत्रापफल प्रति व्यक्ित 155 वगर् गश था जबकि बंबइर् का प्रति व्यक्ित क्षेत्रापफल केवल 9.5 वगर् गश था। 1872 में लंदन में प्रति मकान औसतन 8 आदमी रहते थे गतिविध्ि निम्नलिख्िात शीषर्क पर अपनी कक्षा में पक्ष और विपक्ष में बहस कीजिएः ‘समुदायों और जीवनशैलियों को नष्ट किए बिना शहरों का विकास नहीं किया जा सकता। यह विकास का अभ्िान्न अंग है।’ जबकि बंबइर् में प्रति मकान 20 आदमी थे। शुरू से ही बंबइर् किसी योजना के अनुसार विकसित नहीं हुआ। मकानों के बीच में ही बाग़्ा - बग़्ाीचे पफैले हुए थे। प़फोटर् एरिया में ऐसी स्िथति कुछ श्यादा ही दिखाइर् देती थी। सन् 1800 के आसपास बंबइर् प़फोटर् एरिया शहर का केंद्र था और दो हिस्सों में बँटा हुआ था। एक हिस्से में ‘नेटिव’ रहते थे औरदूसरे हिस्से में यूरोपीय या ‘गोरे’ रहा करते थे। प़्ाफोटर् आबादी के उत्तर में एक यूरोपीय उपनगर और औद्योगिक पट्टी भी विकसित होने लगी थी। दक्ष्िाण में भी इसी तरह की उपनगरीय आबादी और एक छावनी थी। यह नस्ली विभाजन तीनों पे्रसीडेंसी शहरों में दिखाइर् देता था। शहर के तीव्र और अनियोजित विस्तार के कारण 1850 के दशक तक शहर में आवास और जलापूतिर् की समस्या बहुत बढ़ चुकी थी। कपड़ा मिलों के चालू होने के बाद तो बंबइर् के आवासीय इलाव़्ाफों पर दबाव और बढ़ गया था। गतिविध्ि चित्रा 20 को देख्िाए। आपके विचार में इस तरह के परिवहन साधनों का इस्तेमाल किस तरह के लोग करते होंगे? इसकी तुलना घोड़ों द्वारा खींची जाने वाली ट्राम और बिजली से चलने वाली ट्राम के साथ कीजिए। आप देख सकते हैं कि दोनों तरह के साधनों में संख्याओं के बीच बिलकुल उलटा रिश्ता दिखाइर् देता है: घोड़े वाली ट्राम या बिजली की ट्राम के लिए सिप़र्फ एक आॅपरेटर की शरूरत पड़ती थी जबकि पालकी में एक सवारी होती थी और उसे ढोने के लिए कइर् लोगों की शरूरत रहती थी। ड्डोत - गचैक से बहुत सारी पालकियाँ गुजर रही हैं। यूरोपीय अमीरों और अप़फसरों की तरह अमीर पारसी, मुसलमान और ऊँची जाति के व्यापारी व उद्योगपति भी लंबे - चैड़े बंगलों में रहते थे। इसके विपरीत बंबइर् की 70 पफीसदी जनता घनी आबादी वाली चाॅलों में रहती थी। मशदूरों को काम पर पैदल जाना पड़ता था इसलिए 90 प्रतिशत मिल मशदूर गिरनगाँव नामक ‘मिल गाँव’ में रहते थे जो मिलों से बमुश्िकल 15 मिनट के प़्ाफासले पर पड़ता था। बंबइर् की चाॅल बहुमंजिला इमारतें होती थीं। शहर के ‘नेटिव’ हिस्से में इस तरह की इमारतें कम से कम 1860 के दशक से तो बनने ही लगी थीं। लंदन के टेनेमेंट्स की तरह ये मकान भी मोटे तौर पर निजी संपिा होते थे। बाहर से आने वालों की आवासीय शरूरतों को पूरा करने के लिए व्यापारी, महाजन और भवन निमार्ता ठेकेदार इस तरह की इमारतें बनवाते थे। प्रत्येक चाॅल में कमरों की कतारें ़होती थीं। कमरों के लिए अलग - अलग शौचालय नहीं बनाए जाते थे। एक टेनेमेंट में एक साथ कइर् परिवार रह सकते थे। 1901 की जनगणना में बताया गया था कि ‘टापू की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा यानी कुल आबादी का 80 प्रतिशत एक कमरे वाले टेनेमेंट्स में रहता हैऋ हर कमरे मेंऔसतन 4 से 5 आदमी रहते हैं...।’ कमरों का भाड़ा बहुत ऊँचा था इसलिए कइर् मशदूर मिलकर एक कमरा ले लेते थे। वे या तो अपने रिश्तेदारों के साथ या अपनी ही जात - बिरादरी के मशदूरों के साथ रहना पसंद करते थे। ‘गंदे गटर, नालियाँ, भैंसों के तबेलों इत्यादि के नशदीक होने के कारण’ कमरों की ख्िाड़कियाँ बंद ही रहती थीं चाहे मौसम कितना भी आद्रर् क्यों न हो। पानी की समस्या हमेशा रहती थी। नलके पर अपनी बारी के चक्कर में लोग सुबह को अकसर झगड़ बैठते थे लेकिन प्रेक्षकों का कहना है कि पिफर भी उनके घर साप़फ रहते थे। घर के भीतर जगह की कमी के कारण खाना पकाने, कपड़े धोने और सोने आदि के लिए सड़कों और पास - पड़ोस के खाली स्थानों का भी इस्तेमाल किया जाता था। जहाँ खाली जगह मिलती थी, शराब की दुकानें और अखाड़े खुल जाते थे। सड़कों का प्रयोग विभ्िान्न प्रकार की मनोरंजन संबंधी गतिवििायों के लिए भी किया जाता था। बीसवीं शताब्दी के शुरुआती दिनों को याद करते हुए पावर्तीबाइर् भोर ने बताया: ‘हमारी चार चाॅलों के बीच एक खुला मैदान था। वहाँ कभी बाशीगर, कभी मदारी तो कभी कलाबाश अपने करतब दिखाने आते रहते थे। वहीं नंदी बैल को देखने के लिए मजमा जुटता था। मैं कड़कलक्ष्मी से बहुत डरती थी। जब वह दो रोटी के लिए खुद अपने बदन पर कोड़े बरसाती थी तो मेरी रूह काँप जाती थी।’ चाॅलों में ही रोशगार, हड़तालों, दंगे और प्रदशर्नों के बारे में खबरों के लेन - देन का भी काम चलता था। मिलों के आसपास की बस्ितयों में जाति - कुटुंब के मुख्िाया गाँव प्रधान जैसी हैसियत रखते थे। कइर् बार मिल - मशदूरों का ठेकेदार ही मोहल्ले का नेता भी होता था। वह विवादों का प़ैफसला करता था, खाने - पीने का इंतशाम करता था और वक़्त शरूरत व़फशर् आदि की भी व्यवस्था करता था। राजनीतिक हालात के बारे में भी वह महत्वपूणर् जानकारियाँ लाता था। ‘दबे - कुचले वगो±’ के लोगों के लिए तो मकान का इंतजाम करना और भी मुश्िकल था। बहुत सारी चाॅलों में मुसलमानों और निचली जाति के लोगों कोनहीं रखा जाता था। उन्हें अकसर नालीदार चादर या पत्तों या बाँस के बने झोंपड़ों में रहना पड़ता था। अगर लंदन में नगर योजना का काम सामाजिक क्रांति के भय से शुरू किया गया था तो बंबइर् में यह काम प्लेग की महामारी के डर से हाथों में लिया गया। 1898 में सिटी आॅप़्ाफ बाॅम्बे इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट की स्थापना की गइर् और उसे शहर के बीचोबीच बसे ग़्ारीबों के मकानों को हटाने का काम सौंपा गया। इस ट्रस्ट की योजनाओं के कारण 64, 000 लोगों को आवासीय सुविधाओं से हाथ धोना पड़ा। उनमें से केवल 14, 000 लोगों को ही मकान दिए गए। 1918 में भाड़ों को तकर्संगत सीमा में रखने के लिए किराया कानून पारित किया गया लेकिन इसका उलटा असर हुआ। किरायों पर अंकुश लगने के कारण मकान मालिकों ने मकान किराए पर देना कम कर दिया जिसके कारण मकानों की भारी वि़फल्लत पैदा हो गइर्। शमीन की कमी के करण शहर के विस्तार से बंबइर् में हमेशा ही समस्या पैदा हुइर्। बंबइर् शहर जिस तरह विकसित हुआ है उसमें भूमि विकास परियोजनाओं का अहम हाथ रहा है। 4.4 बंबइर् में भूमि विकास क्या आप जानते हैं कि बंबइर् जिन सात टापुओं को मिला कर बनाया गया है उन्हें लंबे समय में एक - दूसरे से जोड़ा गया था? इस दिशा में सबसे पहली इस इमारत में जगह का संयोजन किस प्रकार किया गया है? गतिविध्ि कल्पना कीजिए कि आप चाॅल में रहने वाले युवा हैं। वहाँ के अपने जीवन के एक दिन का वणर्न कीजिए। नए शब्द दबे - कुचले वगर्: ऐसे लोगों के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द जिन्हें जाति व्यवस्था में ‘निम्न जाति’ और ‘अछूत’ माना जाता है। भूमि विकास: दलदली अथवा डूबी हुइर् शमीन को रहने या खेती करने या किसी अन्य काम के लायक बनाना। परियोजना 1784 में शुरू की गइर् थी। बंबइर् के गवनर्र विलियम हाॅनर्बी ने उस समय विशाल तटीय दीवार बनाने के प्रस्ताव पर मंशूरी दी ताकि शहर के निचले इलाव़ेफ समुद्र के पानी की चपेट में आने से बच जाएँ। तब से कइर् भूमि विकास परियोजनाएँ चलाइर् जा चुकी हैं। उन्नीसवीं सदी के मध्य में व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए और श्यादा शमीन की शरूरत पैदा हुइर् तो सरकार और निजी कंपनियों, दोनों की ओर से कइर् नयी योजनाएँ तैयार की गइर्ं ताकि और श्यादा समुद्री भूमि को इस्तेमाल के योग्य बनाया जा सके। निजी वंफपनियाँ भी जोख्िाम उठाने के लिए तैयार थीं। 1864 में मालाबार हिल से कोलाबा के आख्िारी छोर तक के पश्िचमी तट को विकसित करने का ठेका बैक बे रिक्लेमेशन वंफपनी को मिला। भूमि विकास के लिए अकसर बंबइर् के आसपास के पहाड़ी इलाव़्ाफों को भी सपाट किया जाता था। भारी लागत के कारण 1870 तक श्यादातर निजी वंफपनियाँ बंद हो चुकी थीं लेकिन तब तक शहर का क्षेत्रापफल 22 वगर् किलोमीटर तक पहुँच चुका था। बीसवीं सदी में जिस प्रकार आबादी तेशी से बढ़ती रही, शमीन के हर टुकड़े को घेर लिया गया और श्यादा से श्यादा समुद्री शमीन को विकसित किया जाने लगा। एक सपफल भूमि विकास परियोजना बाॅम्बे पोटर् ट्रस्ट के अंतगर्त शुरू की गइर्। ट्रस्ट ने 1914 से 1918 के बीच एक सूखी गोदी का निमार्ण किया और उसकी खुदाइर् से जो मिट्टी निकली उसका इस्तेमाल करके 22 एकड़ का बालाडर् एस्टेट बना डाला। इसके बाद बंबइर् का मशहूर मरीन ड्राइव बनाया गया। 4.5 सपनों का शहर बंबइर्: सिनेमा और संस्कृति की दुनिया भला कौन होगा जो बंबइर् का जिक्र करे पर उसके प्ि़ाफल्म उद्योग की चचार् न करे? यहाँ की बेहिसाब भीड़ और कठिन जीवनस्िथतियों के बावजूद बहुतों के लिए बंबइर् ‘मायापुरी’ ही है - रूपहले सपनों का शहर। बंबइर् की बहुत सारी पि़फल्में शहर में आने वाले आप्रवासियों और उनके दैनिक जीवन में पेश आने वाली मुश्िकलों के बारे में ही हैं। बंबइर् पि़फल्म उद्योग के कइर् लोकपि्रय गीत शहर के अंतविर्रोधी आयामों को उजागर करते हैं। पिफल्म सीआइर्डी ;1956द्ध में नायक का दोस्त गाता है, ‘ऐ दिल है मुश्िकल जीना यहाँ, जरा हटके, जरा बचके, ये है बाॅम्बे मेरी जान।’ पि़फल्म गेस्ट हाउस ;1959द्ध में मोहभंग की आवाश सुनाइर् देती है, ‘जिसका जूता, उसी के सर, दिल है छोटा बड़ा शहर, अरे वाह रे वाह तेरी बंबइर्।’ बंबइर् पि़फल्म उद्योग सबसे पहले कब सामने आया? हरीशचंद्र सखाराम भाटवाडेकर ने 1896 में बंबइर् के हैंगिंग गाड±स में हुए कुश्ती के एक मुव़फाबले के एक दृश्य को वैफमरे में उतारा था। यही भारत की पहली मूवी यानी चलचित्रा था। कुछ समय बाद दादा साहेब पफाल्के ने राजा हरिशचंद्र ;1913द्ध पि़फल्म बनाइर्। इसके बाद तो बंबइर् का पि़फल्म उद्योग आगे ही बढ़ता गया। 1925 तक बंबइर् भारत की पि़फल्म राजधानी बन चुका था। वहाँ पूरे देश के दशर्कों के लिए पि़फल्मों का निमार्ण होता था। 1947 में लगभग 50 पि़फल्में बनीं जिन पर 75.6 करोड़ रुपए की लागत आइर् थी। 1987 तक आते - आते पि़फल्म उद्योग में काम करने वालों की संख्या 5, 20, 000 तक जा चुकी थी। पि़फल्म उद्योग में काम करने वाले भी श्यादातर लाहौर, कलकत्ता, मद्रास आदि दूसरे शहरों से आए थे। इतनी सारी जगहों से आए लोगों के कारण ही पि़फल्म उद्योग का ऐसा राष्ट्रीय स्वरूप बना था। लाहौर से आए लोगों ने हिंदी पि़फल्म उद्योग के विकास में काप़़फी महत्वपूणर् भूमिका अदा की। इस्मत चुगताइर् और साअदत हसन मंटो जैसे बहुत सारे विख्यात कलाकार और लेखक हिंदी सिनेमा से जुड़े हुए थे। खुद बंबइया पि़फल्मों ने भी शहर को सपने और हव़फीव़फत, झोपड़पट्टी और दमकते बंगलों की दुनिया वाली मिली - जुली छवि देने में अहम भूमिका अदा की है। ड्डोत - घ चचार् करें ड्डोत - घ को पढ़ें। यह कविता नयी पीढ़ी के लिए अवसरों और अनुभवों के बारे में क्या कहती है? बाॅक्स 2 एश्िायाइर् देशों के सभी शहर अनियोजित और बेतरतीब ढंग से विकसित नहीं हुए। बहुत सारे शहरों की सोच - विचार कर योजना तैयार की गइर् थी। आधुनिक सिंगापुर ऐसा ही एक शहर था। ली वुफआन येव का सिंगापुर आज हम सबके लिए सिंगापुर एक कामयाब, अमीर, और सुनियोजित शहर है। दुनिया भर के लिए नगर विकास का एक शानदार माॅडल। पर, इस शहर को यह हैसियत हाल ही में मिली है। 1965 तक सिंगापुर एक महत्वपूणर् बंदरगाह तो था लेकिन वह बा की़एश्िायाइर् शहरों जैसा ही था। नियोजन का तत्व तो यहाँ 1822 से ही मौजूद था लेकिन लंबे समय तक केवल श्वेत बस्ितयों को ही योजना के हिसाब से बसाया जाता था। सिंगापुर पर उस समय श्वेतों का ही शासन था। शहर की श्यादातर आबादी भीड़ - भाड़, गंदगी, खराब मकानों और ग़्ारीबी के माहौल में रहती थी। 1965 में जब पीपुल्स एक्शन पाटीर् के अध्यक्ष ली वुफआन येव के नेतृत्व में सिंगापुर को आशादी मिली तो यह एक स्वतंत्रा राष्ट्र बन गया। इसके बाद एक विशाल आवास एवं विकास कायर्क्रम शुरू किया गया जिसने इस द्वीप राष्ट्र का चेहरा ही बदल डाला। इस बारे में जो योजना तैयार की गइर् थी उसमें शहर के एक - एक इंच का हिसाब रखा गया था। सरकार ने लगभग 85 प़्ाफीसदी जनता को अच्छे मकान दे दिए थे इसलिएसरकार को जनता का समथर्न भी हासिल था। ऊँचे - ऊँचे आवासीय खंडों में हवा - निकासी और सभी प्रकार की सेवाओं का इंतशाम किया गया था। ये चीशें अच्छी भौतिक योजना का सबूत थीं। इन इमारतों ने शहर के सामाजिक जीवन को भी बदल दिया था। बाहरी गलियारों के कारण अपराध कम हो गए थे, बडे़ - बूढ़ों को भी उनके परिवारों के साथ बसा दिया गया था, सामुदायिक कायर्क्रमों के लिए सभी इमारतों में खाली मंिालें छोड़ दी गयी थीं। शहर में लोगों के आने पर नियंत्राण रखा जाने लगा। चीनी, मलय और भारतीय, इन तीनों समुदायों के बीच नस्ली सामाजिक टकरावों को रोकने के लिए सामाजिक संबंधों पर भी लगातार नशर रखी जाने लगी थी। अखबारों, पत्रिाकाओं और सभी प्रकार के संचार साधनों पर कड़ा नियंत्राण रखा जाता था। 1986 में राष्ट्रीय दिवस के अपने भाषण में ली वुफआन येव ने नियोजन के शुरुआती दिनों को याद करते हुए कहा, ‘...अगर हमने निहायत निजी मामलों में भी दखल न दिया होता तो हम तरक्की नहीं कर सकते थेः आपके पड़ोस में कौन रहता है, आप वैफसे जीते हैं, आप शोर तो नहीं मचाते, आप कहाँ - वैफसे थूकते हैं, वैफसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं। हम ही तय करते थे कि क्या सही है। लोग क्या सोचते हैं इसकी हमें परवाह नहीं थी।’ द स्ट्रेट्स टाइम्स में उ(ृत। हालाँकि सिंगापुर के नागरिकों को भौतिक सुविधाएँ और संपन्नता मिली हुइर् है लेकिनबहुत सारे लोगों का मानना है कि इस शहर में जीवंत और चुनौतीपूणर् राजनीतिक संस्कृति अभी भी नहीं है। गतिविध्ि बैराॅन हाॅसमान और लगभग सौ साल बाद ली वुफआन येव द्वारा सिंगापुर में किए गए कामों की तुलना कीजिए। इस बारे में चचार् कीजिए कि क्या शहर में भौतिक सुख - सुविधा और सुंदरता पैदा करने के लिए सामाजिक और निजी जीवन पर नियंत्राण रखना शरूरी है। क्या आपको लगता है कि सरकार को इस बारे में नियम बनाने का अिाकार दे दिया जाना चाहिए कि लोग अपना निजी जीवन वैफसे जीते हैं? 5 शहर और पयार्वरण की चुनौती जहाँ भी शहर पफैले हैं, पारिस्िथतिकी और पयार्वरण को नुकसान पहुँचा है। कारखानों, मकानों और अन्य संस्थानों के लिए शमीन की शरूरत को पूरा करनेके वास्ते प्राकृतिक आयामों को काट - छाँट कर समतल किया गया है। शहरों में पैदा होने वाले बेहिसाब कचरे और गंदगी से पानी और हवा प्रदूष्िात हुइर् है जबकि शहरी बाश्िांदों को दिन - रात भारी शोर में जीना पड़ता है, सो अलग। उन्नीसवीं शताब्दी के इंग्लैंड के घरों और कारखानों में कोयले के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से गंभीर समस्याएँ पैदा हो गइर् थीं। लीड्स, ब्रैडपफोडर् और मैनचेस्टर जैसे औद्योगिक शहरों में कारखानों की सैकड़ों चिमनियाँ बेहिसाब काला धुआँ पेंफकती रहती थीं। लोग मशाक में कहने लगे थे कि थोड़े दिन बाद इन शहरों के लोग यही मानने लगेंगे कि आसमान मटमैला होता है और पेड़ - पौधे काले होते हैं! दुकानदार, मकानमालिक और तमाम लोग इस बात से परेशान रहने लगे थे कि उनके शहरों पर स्याह कोहरा छाया रहता है जिससे लोगों को जल्दी गुस्सा आ जाता है, धुएँ से जुड़ी बीमारियाँ पफैलती हैं और कपड़े सदा गंदे रहते हैं। जब लोगों ने पहली बार साप़फ हवा के लिए मुहिम छेड़ी तो सबसे पहले इस समस्या से निपटने के लिए कानूनी रास्तों को आशमाने का प्रयास किया गया।़़अपनी मशीनों में सुधार के लिए पैसा खचर् करने को कतइर् तैयार नहीं थे। 1840 के दशक तक डबीर्, लीड्स और मैनचेस्टर जैसे कुछ शहरों में धुएँ पर काबू पाने के लिए कानून बनाए जा चुके थे। लेकिन धुएँ को मापना या़़उस पर कड़ी नशर रखना बहुत मुश्िकल था। कारखाना मालिकों ने अपनी मशीनों में मामूली पेफरबदल ही किए जिससे धुएँ की तादाद पर कोइर् प़फव़र्फ ़पड़ने वाला नहीं था। 1847 और 1853 के धुआँ नियंत्राण कानून अपने म़कसद में नाकाम हो चुके थे। कलकत्ता का भी वायु प्रदूषण का पुराना इतिहास रहा है। यहाँ के लोग बारहों महीने धुएँ भरी मटमैली हवा में साँस लेते थे। जाड़ों में तो समस्या और गंभीरहो जाती थी। क्योंकि कलकत्ता दलदली शमीन पर बसा था इसलिए वहाँ श्यादा कोहरा पैदा होता था जो धुएँ के साथ मिलकर काली धुंध पैदा कर देता था। शहर में भारी वायु प्रदूषण के पीछे इस बात का काप़फी हाथ था कि वहाँ बहुत बड़ी आबादी गोबर के उपलों और लकड़ी के इर्ंधन पर ही आश्रित थी। परंतुप्रदूषण का इससे भी बड़ा ड्डोत तो वे कारखाने और प्रतिष्ठान थे जिनमें कोयले से चलने वाले वाष्प इंजनों का इस्तेमाल किया जाता था। औपनिवेश्िाक अिाकारियों ने शुरू - शुरू में दुग±ध पैदा करने वाले स्थानों की सप़फाइर् का इरादा बनाया लेकिन 1855 में शुरू हुइर् रेलवे लाइन ने तो एक और खतरनाक प्रदूषक तत्व - रानीगंज से आने वाला कोयला - भी सामने ला दिया। भारतीय कोयले में राख श्यादा निकलती है जिसकी वजह से यह समस्या वैसे भी गंभीर दिखाइर् देती थी। गंदे कारखानों को शहर से बाहर निकाल पफेंकने के लिए कइर् याचिकाएँ दी गइर्ं लेकिन उनका कोइर् नतीजानहीं निकला। पिफर भी, कलकत्ता भारत का पहला शहर था जहाँ 1863 में धुआँ निरोधक ़कानून पारित किया गया था। 1920 में टाॅलीगंज की चावल मिलों में कोयले की बजाय धान की भूसी जलाइर् जाने लगी जिसके कारण आसपास के लोगों ने श्िाकायत की कि, ‘हवा में कालिख भरी रहती है जो सुबह से शाम तक बरसती रहती है, और यहाँ रहना तो नामुमकिन है।’ बंगाल स्मोक नुइसेंस कमीशन ;बंगाल धुआँ निरोधक आयोगद्ध के निरीक्षकों ने आख्िारकार औद्योगिक धुएँ पर ़काबू पा लिया। लेकिन घरेलू धुएँ पर लगाम कसना अभी भी मुश्िकल था। निष्कषर् तमाम समस्याओं के बावजूद शहर ऐसे लोगों को हमेशा आकष्िार्त करते रहे हैं जो आशादी और नए मौ ़कों की चाह रखते हैं। यहाँ तक कि दुगार्चरण के उपन्यास में जिसका िाक्र अध्याय के शुरू में हुआ था, देवताओं को भीअपना स्वगर् अधूरा - सा लगने लगता है। कलकत्ता की अपनी सैर में उन्होंने जो कुछ देखा और अनुभव किया था वह उन्हें अपने स्वगर् में भी नहीं दिखाइर् देता था। उपन्यास के देवताओं को शहरी जीवन के जिन आयामों के बारे में सबसे श्यादा बेचैनी थी वे उन लाखों लोगों के लिए सामाजिक और आथ्िार्क गतिशीलता के नए झरोखों की निशानी थे जिन्होंने शहरों को ही अपना घर बना लिया था। गतिविध्ि बंगाल स्मोक नुइसेंस कमीशन की ओर से एक कारखाने के मालिक को भेजने के लिए नोटिस तैयार कीजिए। नोटिस में उसे कारखाने से निकलने वाले धुएँ के खतरों और हानिकारक प्रभावों के बारे में बताइए। संक्षेप में लिखें चचार् करें परियोजना कायर् इस अध्याय में जिन बंबइया प्ि़ाफल्मों का उल्लेख किया गया है उनमें से कोइर् एक प्ि़ाफल्म देख्िाए। अब इस अध्याय में उल्िलख्िात एक प्ि़ाफल्म और बंबइर् पर आधरित किसी हालिया प्ि़ाफल्म में शहर को किस तरह दिखाया गया है, इसकी तुलना कीजिए। परियोजना कायर्

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