औद्योगीकरण का युग इर्.टी. पाॅल म्यूिाक वंफपनी ने सन् 1900 में संगीत की एक किताब प्रकाश्िात की थी जिसकी ज्िाल्द पर दी गइर् तसवीर में ‘नयी सदी के उदय’ ;डाॅन आॅप़फ द सेंचुरीद्ध ;चित्रा 1द्ध का ऐलान किया था। जैसा कि आप इस चित्रा में देख सकते हैं, तसवीर के मध्य में एक देवी जैसी तसवीर है। यह देवी हाथ में नयी शताब्दी की ध्वजा लिए प्रगति का प़्ाफरिश्ता दिखाइर् देती है। उसका एक पाँव पंखों वाले पहिये पर टिका हुआ है। यह पहिया समय का प्रतीक है। उसकी उड़ान भविष्य की ओर है। उसके पीछे उन्नति के चिह्न तैर रहे हैं: रेलवे, वैफमरा, मशीनें, ¯प्र¯टग प्रेस और कारख़ाना। मशीन और तकनीक का यह महिमामंडन एक अन्य तसवीर में और भी श्यादा सापफ दिखाइर् देता है। यह तसवीर एक व्यापारिक पत्रिाका के पन्नों पर सौ साल़से भी पहले छपी थी ;चित्रा 2द्ध। इस तसवीर में दो जादूगर दिखाए गए हैं।ऊपर वाले हिस्से में प्राच्य ;व्तपमदजद्ध इलाव़ेफ का अलादीन है जिसने अपने जादुइर् चिराग को रगड़ कर एक भव्य महल का निमार्ण कर दिया है। नीचे नए शब्द प्राच्य: भूमध्य सागर के पूवर् में स्िथत देश। आमतौर परयह शब्द एश्िाया के लिए इस्तेमाल किया जाता है।पश्िचमी नशरिये में प्राच्य इलाव़ेफ पूवर् - आध्ुनिक, पारंपरिकऔर रहस्यमय थे। 103 औद्योगीकरण का युग अध्याय 5 एक आधुनिक मेवैफनिक है जो अपने आधुनिक औशारों से एक नया जादू रच रहा है। वह पुल, पानी के जहाश, मीनार और गगनचुंबी इमारतें बनाता है। अलादीन पूरब और अतीत का प्रतीक हैऋ मेवैफनिक पश्िचम और आधुनिकता का। ये तसवीरें आधुनिक विश्व की विजयगाथा कहती हैं। इस गाथा में आधुनिक विश्व द्रुत तकनीकी बदलावों व आविष्कारों, मशीनों व कारखानों, रेलवे और वाष्पपोतों की दुनिया के रूप में दशार्या गया है। इसमें औद्योगीकरण का इतिहास विकास की कहानी के रूप में सामने आता है और आधुनिक युग तकनीकी प्रगति के भव्य युग के रूप में उभरता है। अब ये छवियाँ और ये संबंध लोकमानस का हिस्सा बन चुके हैं। क्या आप भी तेश औद्योगीकरण को प्रगति व आधुनिकता के काल के रूप में नहीं देखते? क्या आपको नहीं लगता कि रेलवे और प़ैफक्िट्रयों का निमार्ण, गगनचुंबी इमारतों व पुलों का विस्तार समाज के विकास का द्योतक होता है? ये छवियाँ किस प्रकार विकसित हुइर् हैं? इन विचारों से हमारा क्या संबंध है? क्या औद्योगीकरण के लिए तीव्र तकनीकी विकास हमेशा जरूरी होता है? क्या आज भी हम तमाम तरह के कामों के दिनोंदिन बढ़ते मशीनीकरण का गुणगान कर सकते हैं? औद्योगीकरण से लोगों की िांदगी पर क्या असर पड़ा है? ऐसे सवालों का जवाब देने के लिए हमें औद्योगीकरण के इतिहास को समझना पड़ेगा। इस अध्याय में हम यही इतिहास पढ़ेंगे। यहाँ हम दुनिया के पहले औद्योगिक राष्ट्र - बि्रटेन और उसके बाद भारत में औद्योगीकरण का अध्ययन करेंगे जहाँ औद्योगिक बदलावों का पैटनर् औपनिवेश्िाक शासन से तय हो रहा था। गतिविध्ि दो ऐसे उदाहरण दीजिए जहाँ आधुनिक विकास से प्रगति की बजाय समस्याएँ पैदा हुइर् हंै। आप चाहें तो पयार्वरण, आणविक हथ्िायारों व बीमारियों से संबंिात क्षेत्रों पर विचार कर सकते हैं। औद्योगीकरण को अकसर हम कारखानों के विकास के साथ ही जोड़कर देखते हैं। जब हम औद्योगिक उत्पादन की बात करते हैं तो हमारा आशय प़ैफक्िट्रयों में होने वाले उत्पादन से होता है। और जब हम औद्योगिक मशदूरों की बात करते हैं, तो भी हमारा आशय कारखानों में काम करने वाले मशदूरों से ही होता है। औद्योगीकरण के इतिहास अकसर प्रारंभ्िाक प़ैफक्िट्रयों की स्थापना से शुरू होते हैं। पर इस सोच में एक समस्या है। दरअसल, इंग्लैंड और यूरोप में प़ैफक्िट्रयों की स्थापना से भी पहले ही अंतरार्ष्ट्रीय बाशार के लिए बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन होने लगा था। यह उत्पादन प़ैफक्िट्रयों में नहीं होता था। बहुत सारे इतिहासकार औद्योगीकरण के इस चरण को आदि - औद्योगीकरण ;चतवजवपदकनेजतपंसपेंजपवदद्ध का नाम देते हैं। सत्राहवीं और अठारहवीं शताब्दी में यूरोपीय शहरों के सौदागर गाँवों की तरप़्ाफ रुख़ करने लगे थे। वे किसानों और कारीगरों को पैसा देते थे और उनसे अंतरार्ष्ट्रीय बाशार के लिए उत्पादन करवाते थे। उस समय विश्व व्यापार के विस्तार और दुनिया के विभ्िान्न भागों में उपनिवेशों की स्थापना के कारण चीशों की माँग बढ़ने लगी थी। इस माँग को पूरा करने के लिए केवल शहरों में रहते हुए उत्पादन नहीं बढ़ाया जा सकता था। वजह यह थी कि शहरों में शहरी दस्तकारी और व्यापारिक गिल्ड्स काप़्ाफी ताकतवर थे। ये गिल्ड्स उत्पादकों के संगठन होते थे। गिल्ड्स से जुड़े उत्पादक कारीगरों को प्रश्िाक्षण देते थे, उत्पादकों पर नियंत्राण रखते थे, प्रतिस्पधार् और मूल्य तय करते थे तथा व्यवसाय में नए लोगों को आने से रोकते थे। शासकों ने भी विभ्िान्न गिल्ड्स को खास उत्पादों के उत्पादन और व्यापार का एकािाकार दिया हुआ था। पफलस्वरूप, नए व्यापारी शहरों में कारोबार नहीं कर सकते थे। इसलिए वे गाँवों की तरपफ जाने लगे।़गाँवों में गरीब काश्तकार और दस्तकार सौदागरों के लिए काम करने लगे। जैसा कि आपने पिछले साल की पाठ्यपुस्तक में देखा है, यह एक ऐसा समय था जब खुले खेत खत्म होते जा रहे थे और काॅमन्स की बाड़ाबंदी की जा रही थी। अब तक अपनी रोशी - रोटी के लिए साझा शमीनों से जलावन की लकड़ी, बेरियाँ, सब्िशयाँ, भूसा और चारा आदि बीन कर काम चलाने वाले छोटे किसान ;काॅटेशरद्ध और गरीब किसानआमदनी के नए ड्डोत ढँूढ़ रहे थे। बहुतों के पास छोटे - मोटे खेत तो थे लेकिन उनसे घर के सारे लोगों का पेट नहीं भर सकता था। इसीलिए, जब सौदागर वहाँ आए और उन्होंने नए शब्द आदि: किसी चीश की पहली या प्रारंभ्िाक अवस्था का संकेत। माल पैदा करने के लिए पेशगी रव़फम दी तो किसान पफौरऩतैयार हो गए। सौदागरों के लिए काम करते हुए वे गाँव में ही रहते हुए अपने छोटे - छोटे खेतों को भी सँभाल सकते थे। इस आदि - औद्योगिक उत्पादन से होने वाली आमदनी ने खेती के कारण सिमटती आय में बड़ा सहारा दिया। अब उन्हें पूरे परिवार के श्रम संसाधनों के इस्तेमाल का मौव़फा भी मिल गया। इस व्यवस्था से शहरों और गाँवों के बीच एक घनिष्ठ संबंध विकसित हुआ। सौदागर रहते तो शहरों में थे लेकिन उनके लिए काम श्यादातर देहात में चलता था। इंग्लैंड के कपड़ा व्यवसायी स्टेप्लसर् ;ैजंचसमतेद्ध से ऊन खरीदते थे और उसे सूत कातने वालों के पास पहुँचा देते थे। इससे जो धागा मिलता था उसे बुनकरों, प़ुफलशर् ;थ्नससमतेद्ध, और रंगसाशों के पास ले जाया जाता था। लंदन में कपड़ों की पिफनि¯शग होती थी। इसके बाद नियार्तक व्यापारी कपड़े को अंतरार्ष्ट्रीय बाशार में बेच देते थे। इसीलिए लंदन को तो पि़फनि¯शग सेंटर के रूप में ही जाना जाने लगा था। यह आदि - औद्योगिक व्यवस्था व्यवसायिक आदान - प्रदान के नेटववर्फ का हिस्सा थी। इस पर सौदागरों का नियंत्राण था और चीशों का उत्पादन कारखानों की बजाय घरों में होता था। उत्पादन के प्रत्येक चरण में प्रत्येक सौदागर 20 - 25 मशदूरों से काम करवाता था। इसका मतलब यह था कि कपड़ों के हर सौदागर के पास सैकड़ों मशदूर काम करते थे। 1.1 कारख़ानों का उदय इंग्लैंड में सबसे पहले 1730 के दशक में कारख़ाने खुले लेकिन उनकी संख्या में तेशी से इशाप़्ाफा अठारहवीं सदी के आख्िार में ही हुआ। कपास ;काॅटनद्ध नए युग का पहला प्रतीक थी। उन्नीसवीं सदी के आख्िार में कपास के उत्पादन में भारी बढ़ोतरी हुइर्। 1760 में बि्रटेन अपने कपास उद्योग की शरूरतों को पूरा करने के लिए 25 लाख पौंड कच्चे कपास का आयात करता था 1787 में यह आयात बढ़कर 220 लाख पौंड तक पहुँच गया। यह इशाप़्ाफा उत्पादन की प्रिया में बहुत सारे बदलावों का परिणाम था। आइए देखें कि ये बदलाव कौन से थे। अठारहवीं सदी में कइर् ऐसे आविष्कार हुए जिन्होंने उत्पादन प्रिया ;का²डग, ऐंठना व कताइर्, और लपेटनेद्ध के हर चरण की कुशलता बढ़ा दी। प्रति मशदूर उत्पादन बढ़ गया और पहले से श्यादा मजबूत धागों व रेशों का उत्पादन होने लगा। इसके बाद रिचडर् आवर्फराइट ने सूती कपड़ा मिल की रूपरेखा सामने रखी। अभी तक कपड़ा उत्पादन पूरे देहात में पैफला हुआ था। यह काम लोग अपने - अपने घर पर ही करते थे। लेकिन अब मँहगी नयी मशीनें खरीदकर उन्हें कारखानों में लगाया जा सकता था। कारखाने में सारी प्रियाएँ एक छत के नीचे और एक मालिक के हाथों में आ गइर् थीं। इसकेचलते उत्पादन प्रिया पर निगरानी, गुणवत्ता का ध्यान रखना और मशदूरों पर नशर रखना संभव हो गया था। जब तक उत्पादन गाँवों में हो रहा था तब तक ये सारे काम संभव नहीं थे। नए शब्द स्टेपलर: ऐसा व्यक्ित जो रेशों के हिसाब से ऊन को ‘स्टेपल’ करता है या छाँटता है। पुफलर: ऐसा व्यक्ित जो ‘पुफल’ करता है यानी चुन्नटों के सहारे कपड़े को समेटता है। का£डंग: वह प्रिया जिसमें कपास या ऊन आदि रेशों को कताइर् के लिए तैयार किया जाता है। उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में कारखाने इंग्लैंड के भूदृश्य का अभ्िान्न अंग बन गए थे। ये नए कारखाने इतने विशाल, और नयी प्रौद्योगिकी की ताव़फत इतनी जादुइर् दिखाइर् देती थी कि उस समय के लोगों की आँखें चैंिाया जाती थीं। लोगों का ध्यान कारखानों पर टिका रह जाता था। वे इस बात को मानो भूल ही जाते थे कि उनकी आँखों से ओझल गलियों और ववर्फशाॅप्स में अभी भी उत्पादन चालू है। 1.2 औद्योगिक परिवतर्न की रफ्ऱतार औद्योगीकरण की प्रिया कितनी तेश थी? क्या औद्योगीकरण का मतलब केवल प़ैफक्ट्री उद्योगों के विकास तक ही समित होता है? गतिविध्ि जिस तरह इतिहासकार छोटी ववर्फशाॅप की बजाय औद्योगीकरण पर ध्यान केंदि्रत करते हैं यह इस बात का एक बढि़या उदाहरण है कि आज हम अतीत के बारे में जो विश्वास लिए हुए हैं वे इस बात से तय होते हैं कि इतिहासकार भी सिप़्ार्फ वुफछ चीशों पर ध्यान देते हैं और वुफछ को नशरअंदाश कर देते हैं। अपने जीवन की किसी एक ऐसी घटना या पहलू को लिखें जिसेआपके माता - पिता या श्िाक्षक आदि वयस्क लोग महत्त्वपूणर्नहीं मानते लेकिन आपको वह महत्त्वपूणर् लगती है। पहला: सूती उद्योग और कपास उद्योग बि्रटेन के सबसे पफलते - पूफलते उद्योग थे। तेशी से बढ़ता हुआ कपास उद्योग 1840 के दशक तक औद्योगीकरण के पहले चरण में सबसे बड़ा उद्योग बन चुका था। इसके बाद लोहा और स्टील उद्योग आगे निकल गए। 1840 के दशक से इंग्लैंड में और 1860 के दशक से उसके उपनिवेशों में रेलवे का विस्तार होने लगा था। पफलस्वरूप लोहे और स्टील की शरूरत तेजी से बढ़ी। 1873 तक बि्रटेन के लोहा और स्टील नियार्त का मूल्य लगभग 7.7 करोड़ पौंड हो गया था। यह राश्िा इंग्लैंड के कपास नियार्त के मूल्य से दोगुनी थी। दूसरा: नए उद्योग परंपरागत उद्योगों को इतनी आसानी से हाश्िाए पर नहीं ढकेल सकते थे। उन्नीसवीं सदी के आख्िार में भी तकनीकी रूप से विकसित औद्योगिक क्षेत्रा में काम करने वाले मशदूरों की संख्या वुफल मशदूरों में 20 प्रतिशत से श्यादा नहीं थी। कपड़ा उद्योग एक गतिशील उद्योग था लेकिन उसके उत्पादन का बड़ा हिस्सा कारखानों में नहीं बल्िक घरेलू इकाइयों में होता था। गतिविध्ि चित्रा 4 और 5 को देखें। क्या आपको दोनों तसवीरों में औद्योगीकरण को दशार्ने के ढंग में कोइर् प़फव़र्फ दिखाइर् देता है? अपना दृष्िटकोण संक्षेप में व्यक्त करें। तीसरा: यद्यपि ‘परंपरागत’ उद्योगों में परिवतर्न की गति भाप से चलने वाले सूती और धातु उद्योगों से तय नहीं हो रही थी लेकिन ये परंपरागत उद्योग पूरी तरह ठहराव की अवस्था में भी नहीं थे। खाद्य प्रसंस्करण, निमार्ण, पाॅटरी, काँच के काम, चमर्शोधन, प़फनीर्चर और औशारों के उत्पादन जैसे बहुत सारे ग़्ौर - मशीनी क्षेत्रों में जो तरक्व़फी हो रही थी वह मुख्य रूप से साधारण और छोटे - छोटे आविष्कारों का ही परिणाम थी। चैथा: प्रौद्योगिकीय बदलावों की गति धीमी थी। औद्योगिक भूदृश्य पर ये बदलाव नाटकीय तेशी से नहीं पैफले। नयी तकनीक मँहगी थी। सौदागर व व्यापारी उनके इस्तेमाल के सवाल पर पूँफक - पूँफक कर कदम बढ़ाते थे। मशीनें अकसर खराब हो जाती थीं और उनकी मरम्मत पर काप़्ाफी खचार् आता था। वे उतनी अच्छी भी नहीं थीं जितना उनके आविष्कारकों और निमार्ताओं का दावा था। इस बात को समझने के लिए आइए भाप के इंजन का उदाहरण लें। जेम्स वाॅट ने न्यूकाॅमेन द्वारा बनाए गए भाप के इंजन में सुधार किए और 1871 में नए इंजन को पेटेंट करा लिया। इस माॅडल का उत्पादन उनके दोस्त उद्योगपति मैथ्यू बूल्टन ने किया। पर, सालों तक उन्हें कोइर् खरीदार नहीं मिला। उन्नीसवीं सदी की शुरुआत तक पूरे इंग्लैंड में भाप के सिपर्फ 321 इंजन थे। इनमें से़80 इंजन सूती उद्योगों में, 9 ऊन उद्योगों में और बाकी खनन, नहर निमार्ण और लौह कायो± में इस्तेमाल हो रहे थे। और किसी उद्योग में भाप के इंजनों का इस्तेमाल काप़्ाफी समय बाद तक भी नहीं हुआ। यानी मशदूरों की उत्पादन क्षमता को कइर् गुना बढ़ाने की संभावना वाली सबसे शक्ितशाली प्रौद्योगिकी को अपनाने में भी उद्योगपति बहुत हिचकिचा रहे थे। अब इतिहासकार इस बात को मानने लगे हैं कि उन्नीसवीं सदी के मध्य का औसत मशदूर मशीनों पर काम करने वाला नहीं बल्िक परंपरागत कारीगर और मशदूर ही होता था। विक्टोरिया कालीन बि्रटेन में मानव श्रम की कोइर् कमी नहीं थी। ग़्ारीब किसान और बेकार लोग कामकाज की तलाश में बड़ी संख्या में शहरों को जाते थे। जैसा कि आप आगे जानेंगे, जब श्रमिकों की बहुतायत होती है तो वेतन गिर जाते हैं। इसीलिए, उद्योगपतियों को श्रमिकों की कमी या वेतन के मद में भारी लागत जैसी कोइर् परेशानी नहीं थी। उन्हें ऐसी मशीनों में कोइर् दिलचस्पी नहीं थी जिनके कारण मशदूरों से छुटकारा मिल जाए और जिन पर बहुत श्यादा खचार् आने वाला हो। बहुत सारे उद्योगों में श्रमिकों की माँग मौसमी आधार पर घटती - बढ़ती रहती थी। गैसघरों और शराबखानों में जाड़ों के दौरान खासा काम रहता था। इस दौरान उन्हें श्यादा मशदूरों की शरूरत होती थी। िसमस के समय बुक बाइंडरों और पि्रंटरों को भी दिसंबर से पहले अतिरिक्त मशदूरों की दरकार रहती थी। बंदरगाहों पर जहाशों की मरम्मत और सापफ - सप़्ाफाइर् व सजावट का़काम भी जाड़ों में ही किया जाता था। जिन उद्योगों में मौसम के साथ उत्पादन घटता - बढ़ता रहता था वहाँ उद्योगपति मशीनों की बजाय मशदूरों को ही काम पर रखना पसंद करते थे। बहुत सारे उत्पाद केवल हाथ से ही तैयार किए जा सकते थे। मशीनों से एक जैसे तय किस्म के उत्पाद ही बड़ी संख्या में बनाए जा सकते थे। लेकिन ड्डोत - क गतिविध्ि कल्पना कीजिए कि आप सौदागर हैं और एक ऐसे सेल्समैन को चिट्ठी लिख रहे हैं जो आपको नयी मशीन खरीदने के लिए राशी करने की कोश्िाश कर रहा है। अपने पत्रा में बताइए कि मशीन के बारे में आपने क्या सुना है और आप नयी प्रौद्योगिकी में पैसा क्यों नहीं लगाना चाहते। बाशार में अकसर बारीक डिशाइन और खास आकारों वाली चीशों की कापफी़माँग रहती थी। उदाहरण के लिए, बि्रटेन में उन्नीसवीं सदी के मध्य में 500 तरह के हथौड़े और 45 तरह की कुल्हाडि़याँ बनाइर् जा रही थीं। इन्हें बनाने के लिए यांत्रिाक प्रौद्योगिकी की नहीं बल्िक इनसानी निपुणता की शरूरत थी। विक्टोरिया कालीन बि्रटेन में उच्च वगर् के लोग - वुफलीन और पूँजीपति वगर् - हाथों से बनी चीशों को तरजीह देते थे। हाथ से बनी चीशों को परिष्कार और सुरुचि का प्रतीक माना जाता था। उनकी पि़फनिश अच्छी होती थी। उनको एक - एक करके बनाया जाता था और उनका डिशाइन अच्छा होता था। मशीनों से बनने वाले उत्पादों को उपनिवेशों में नियार्त कर दिया जाता था। जिन देशों में मशदूरों की कमी होती है वहाँ उद्योगपति मशीनों का इस्तेमाल करना श्यादा पसंद करते हैं ताकि कम से कम मशदूरों का इस्तेमाल करके वे अपना काम चला सकें। उन्नीसवीं सदी के अमेरिका में यही स्िथति थी। लेकिन बि्रटेन में कामगारों की कोइर् कमी नहीं थी। 2.1 मशदूरों की ¯शदगी बाशार में श्रम की बहुतायत से मशदूरों की ¯शदगी भी प्रभावित हुइर्। जैसे ही नौकरियों की खबर गाँवों में पहुँची सैकड़ों की तादाद में लोगों के हुजूम शहरों चित्रा 9 - लोहे की प़ैफक्ट्री में मशदूर, उत्तर - पूवर् इंग्लैंड, विलियम बेल स्काॅट की पें¯टग, 1861 उन्नीसवीं सदी के आख्िार में बहुत सारे कलाकार मशदूरों को आदशर् के रूप में प्रस्तुत करने लगे थे। उन्हें राष्ट्र के लिए कठिनाइयाँ और पीड़ा झेलते हुए दिखाया जाता था। इस पें¯टग में दशार्या गया है कि लंदन में बेघर लोग एक कामघर ;ॅवता ीवनेमद्धमें रात भर ठहरने के टिकट के लिए अशीर् दे रहे हैं। ये आश्रय स्थल ‘बेसहारा, सड़कों पर रहने वाले, आवाराओं और यहाँ - वहाँ भटकते’ लोगों के लिए ग़्ारीब व़फानून आयुक्त की देखरेख में चलाए जाते थे। इन ववर्फहाउसों में रहना िाल्लत की बात थी। हरेक की डाक्टरी जाँच करके ये पता लगाया जाता था कि व्यक्ित बीमार तो नहीं है, उनका शरीर पूरी तरह सापफ है या नहीं और उनके कपड़े मैले तो नहीं हैं। उन्हें कठोर परिश्रम भी करना पड़ता था।़की तरप़्ाफ चल पड़े। नौकरी मिलने की संभावना यारी - दोस्ती, वुफनबे - वुफटुंब के शरिए जान - पहचान पर निभर्र करती थी। अगर किसी कारख़ाने में आपका रिश्तेदार या दोस्त लगा हुआ है तो नौकरी मिलने की संभावना श्यादा रहती थी। सबके पास ऐसे सामाजिक संपवर्फ नहीं होते थे। रोशगार चाहने वाले बहुत सारे लोगों को हफ्ऱतों इंतशार करना पड़ता था। वे पुलों के नीचे या रैन - बसेरों में राते काटते थे। वुफछ बेरोशगार शहर में बने निजी रैनबसेरों में रहते थे। बहुत सारे निधर्न व़फानून विभाग द्वारा चलाए जाने वाले अस्थायी बसेरों में रुकते थे। बहुत सारे उद्योगों में मौसमी काम की वजह से कामगारों को बीच - बीच में बहुत समय तक खाली बैठना पड़ता था। काम का सीशन गुजर जाने के बाद गरीब दोबारा सड़क पर आ जाते थे। वुफछ लोग जाड़ों के बाद गाँवों में चले जाते थे जहाँ इस समय काम निकलने लगता था। लेकिन श्यादातर शहर में ही छोटा - मोटा काम ढूँढ़ने की कोश्िाश करते थे जो उन्नीसवीं सदी के मध्य तक भी आसान काम नहीं था। उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में वेतन में वुफछ सुधार आया। लेकिन इससे मशदूरों की हालत में बेहतरी का पता नहीं चलता। औसत आँकड़ों से अलग - अलग व्यवसायों के बीच आने वाले प़्ाफव़र्फ और साल - दर - साल होने वाले उतार - चढ़ाव छिपे रह जाते थे। मिसाल के तौर पर, जब लंबे नेपोलियनी यु( के दौरान कीमतें तेशी से बढ़ीं तो मशदूरों की आय के वास्तविक मूल्य में भारी कमी आ गइर्। अब उन्हें वेतन तो पहले जितना मिलता था लेकिन उससे वे पहले जितनी चीशें नहीं खरीद सकते थे। मशदूरों की आमदनी भी सिप़्ार्फ वेतन दर पर ही निभर्र नहीं होती थी। रोशगार की अविा भी बहुत महत्त्वपूणर् थी: मशदूरों की औसत दैनिक आय इससे तय होती थी कि उन्होंने ड्डोत - ख चचार् करें चित्रा 3, 7 और 11 को देख्िाए। इसके बाद ड्डोत - ख को दोबारा पढि़ए। अब बताइए कि बहुत सारे मशदूर स्िप¯नग जेनी के इस्तेमाल का विरोध क्यों कर रहे थे। 1850 के दशक से पूरे लंदन में रेलवे स्टेशन बनने लगे थे। इसका मतलब था कि सुरंगे बनाने, बल्िलयों की पाड़ लगाने, ईंट और लोहे का काम करने के लिए बहुत सारे मशदूरों की शरूरत थी। रोशगार चाहने वाले एक निमार्ण स्थल से दूसरे निमार्ण स्थल तक जाते रहते थे। कितने दिन काम किया है। उन्नीसवीं सदी के मध्य में सबसे अच्छे हालात में भी लगभग 10 प्रतिशत शहरी आबादी निहायत ग़्ारीब थी। 1830 के दशक में आइर् आ£थक मंदी जैसे दौरों में बेरोशगारों की संख्या विभ्िान्न क्षेत्रों में 35 से 75 प्रतिशत तक पहुँच जाती थी। बेरोजगारी की आशंका के कारण मशदूर नयी प्रौद्योगिकी से च्िाढ़ते थे। जबऊन उद्योग में स्िप¯नग जेनी मशीन का इस्तेमाल शुरू किया गया तो हाथसे ऊन कातने वाली औरतें इस तरह की मशीनों पर हमला करने लगीं। जेनी के इस्तेमाल पर यह टकराव लंबे समय तक चलता रहा। 1840 के दशक के बाद शहरों में निमार्ण की गतिवििायाँ तेशी से बढ़ीं। लोगों के लिए नए रोशगार पैदा हुए। सड़कों को चैड़ा किया गया, नए रेलवे स्टेशन बने, रेलवे लाइनों का विस्तार किया गया, सुरंगें बनाइर् गईं, निकासी और सीवर व्यवस्था बिछाइर् गइर्, नदियों के तटबंध बनाए गए। परिवहन उद्योग में काम करने वालों की संख्या 1840 के दशक में दोगुना और अगले 30 सालों में एक बार पिफर दोगुना हो गइर्। नए शब्द स्िप¯नग जेनी: जेम्स हरग्रीव्ज़ द्वारा 1764 में बनाइर् गइर् इस मशीन ने कताइर् की प्रिया तेश कर दी और मशदूरों की माँग घटा दी। एक ही पहिया घुमाने वाला एक मशदूर बहुत सारी तकलियों को घुमा देता था और एक साथ कइर् धागे बनने लगते थे। 3 उपनिवेशों में औद्योगीकरण आइए अब भारत पर नशर डालें और देखें कि एक उपनिवेश का औद्योगीकरण वैफसे होता है। यहाँ भी हम कारखाना उद्योग के साथ - साथ ग्ौर - मशीनी क्षेत्रा पऱभी ध्यान देंगे। हमारा अध्ययन मुख्य रूप से कपड़ा उद्योग तक ही सीमित रहेगा। 3.1 भारतीय कपड़े का युग मशीन उद्योगों के युग से पहले अंतरार्ष्ट्रीय कपड़ा बाशार में भारत के रेशमी और सूती उत्पादों का ही दबदबा रहता था। बहुत सारे देशों में मोटा कपास पैदा होता था लेकिन भारत में पैदा होने वाला कपास महीन किस्म का था। ाफारसी सौदागर पंजाब से अप्आमीर्नियन और प़़्ाफगानिस्तान, पूवीर् प़्ाफारस और मध्य एश्िाया के रास्ते यहाँ की चीशें लेकर जाते थे। यहाँ के बने महीन कपड़ों के थान ऊँटों की पीठ पर लाद कर पश्िचमोत्तर सीमा से पहाड़ी दरो± और रेगिस्तानों के पार ले जाए जाते थे। मुख्य पूवर् औपनिवेश्िाक बंदरगाहों से पफलता - पूफलता समुद्री व्यापार चलता था। गुजरात के तट पर स्िथत सूरत बंदरगाह के शरिए भारत खाड़ी और लाल सागर के बंदरगाहों से जुड़ा हुआ था। कोरोमंडल तट पर मछलीपटनम और बंगाल में हुगली के माध्यम से भी दक्ष्िाण - पूवीर् एश्िायाइर् बंदरगाहों के साथ खूब व्यापार चलता था। नियार्त व्यापार के इस नेटववर्फ में बहुत सारे भारतीय व्यापारी और बैंकर सिय थे। वे उत्पादन में पैसा लगाते थे, चीशों को लेकर जाते थे और नियार्तकों को पहुँचाते थे। माल भेजने वाले आपूतिर् सौदागरों के जरिये बंदरगाह नगर देश के भीतरी इलाकों से जुडे़ हुए थे। ये सौदागर बुनकरों को पेशगी देते थे, बुनकरों से तैयार कपड़ा खरीदते थे और उसे बंदरगाहों तक पहुँचाते थे। बंदरगाह पर बड़े जहाश मालिक और नियार्त व्यापारियों के दलाल कीमत पर मोल - भाव करते थे और आपू£त सौदागरों से माल खरीद लेते थे। 1750 के दशक तक भारतीय सौदागरों के नियंत्राण वाला यह नेटववर्फ टूटने लगा था। यूरोपीय कंपनियों की ताव़फत बढ़ती जा रही थी। पहले उन्होंने स्थानीय दरबारों से कइर् तरह की रियायतें हासिल कीं और उसके बाद उन्होंने व्यापार पर इशारेदारी अिाकार प्राप्त कर लिए। इससे सूरत व हुगली, दोनों पुराने बंदरगाह कमशोर पड़ गए। इन बंदरगाहों से होने वाले नियार्त में नाटकीय कमी आइर्। पहले जिस व़्ाफशेर् से व्यापार चलता था वह खत्म होने लगा। धीरे - धीरे स्थानीय बैंकर दिवालिया हो गए। सत्राहवीं सदी के आख्िारी सालों में सूरत बंदरगाह से होने वाले व्यापार का कुल मूल्य 1.6 करोड़ रुपये था। 1740 के दशक तक यह गिर कर केवल 30 लाख रुपये रह गया था। गतिविध्ि एश्िाया के मानचित्रा पर भारत से मध्य एश्िाया, पश्िचम एश्िाया और दक्ष्िाण पूवर् एश्िाया के साथ होने वाले कपड़ा व्यापार के समुद्री और सड़क संपको± को चिहि्नत कीजिए। सूरत व हुगली कमशोर पड़ रहे थे और बंबइर् व कलकत्ता की स्िथति सुधर रही थी। पुराने बंदरगाहों की जगह नए बंदरगाहों का बढ़ता महत्त्व औपनिवेश्िाक सत्ता की बढ़ती ताव़फत का संकेत था। नए बंदरगाहों के शरिए होने वाला व्यापार यूरोपीय वंफपनियों के नियंत्राण में था और यूरोपीय जहाशों के शरिए होता था। बहुत सारे पुराने व्यापारिक घराने ढह चुके थे। जो बचे रहना चाहते थे उनके पास भी यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों के नियंत्राण वाले नेटववर्फ में काम करने के अलावा कोइर् चारा नहीं था। इन बदलावों ने बुनकरों व अन्य कारीगरों की ¯शदगी को किस तरह प्रभावित किया? 3.2 बुनकरों का क्या हुआ? 1760 के दशक के बाद इर्स्ट इंडिया वंफपनी की सत्ता के सुदृढ़ीकरण की शुरुआत में भारत के कपड़ा नियार्त में गिरावट नहीं आइर्। बि्रटिश कपास उद्योग अभी पैफलना शुरू नहीं हुआ था और यूरोप में बारीक भारतीय कपड़ों की भारी माँग थी। इसलिए वंफपनी भी भारत से होने वाले कपड़े के नियार्त को ही और पैफलाना चाहती थी। 1760 और 1770 के दशकों में बंगाल और कनार्टक में राजनीतिक सत्ता स्थापित करने से पहले इर्स्ट इंडिया वंफपनी को नियार्त के लिए लगातार सप्लाइर् आसानी से नहीं मिल पाती थी। बुने हुए कपड़े को हासिल करने के लिए प़्ा्रफंासीसी, डच और पुतर्गालियों के साथ - साथ स्थानीय व्यापारी भी होड़ में रहते थे। इस प्रकार बुनकर और आपू£त सौदागर खूब मोल - भाव करते थे और अपना माल सबसे ऊँची बोली लगाने वाले खरीदार को ही बेचते थे। लंदन भेजे गए अपने पत्रा में वंफपनी के अप़्ाफसरों ने आपू£त में मुश्िकल और ऊँचे दामों का बार - बार जिक्र किया है। लेकिन एक बार इर्स्ट इंडिया वंफपनी की राजनीतिक सत्ता स्थापित हो जाने के बाद वंफपनी व्यापार पर अपने एकािाकार का दावा कर सकती थी। पफलस्वरूप उसने प्रतिस्पधार् खत्म करने, लागतों पर अंकुश रखने और कपास व रेशम से बनी चीशों की नियमित आपू£त सुनिश्िचत करने के लिए प्रबंधन और नियंत्राण की एक नयी व्यवस्था लागू कर दी। यह काम कइर् चरणों में किया गया। पहला: वंफपनी ने कपड़ा व्यापार में सिय व्यापारियों और दलालों को खत्म करने तथा बुनकरों पर श्यादा प्रत्यक्ष नियंत्राण स्थापित करने की कोश्िाश की। वंफपनी ने बुनकरों पर निगरानी रखने, माल इकट्ठा करने और कपड़ों की गुणवत्ता जाँचने के लिए वेतनभोगी कमर्चारी तैनात कर दिए जिन्हें गुमाश्ता कहा जाता था। दूसरा: वंफपनी को माल बेचने वाले बुनकरों को अन्य खरीदारों के साथ कारोबार करने पर पाबंदी लगा दी गइर्। इसके लिए उन्हें पेशगी रव़फम दी जाती थी। एक बार काम का आॅडर्र मिलने पर बुनकरों को कच्चा माल खरीदने के लिए व़फशार् दे दिया जाता था। जो व़फशार् लेते थे उन्हें अपना बनाया हुआ कपड़ा गुमाश्ता को ही देना पड़ता था। उसे वे किसी और व्यापारी को नहीं बेच सकते थे। जैसे - जैसे व़फशेर् मिलते गए और महीन कपड़े की माँग बढ़ने लगी, श्यादा कमाइर् की आस में बुनकर पेशगी स्वीकार करने लगे। बहुत सारे बुनकरों के पास जमीन के छोटे - छोटे पट्टे थे जिन पर वे खेती करते थे और अपने परिवार की शरूरतें पूरी कर लेते थे। अब वे इस जमीन को भाड़े पर देकर पूरा समय बुनकरी में लगाने लगे। अब पूरा परिवार यही काम करने लगा। बच्चे व औरतें, सभी वुफछ न वुफछ काम करते थे। लेकिन जल्दी ही बहुत सारे बुनकर गाँवों में बुनकरों और गुमाश्तों के बीच टकराव की खबरें आने लगीं। इससे पहले आपू£त सौदागर अकसर बुनकर गाँवों में ही रहते थे और बुनकरों से उनके नशदीकी ताल्लुकात होते थे। वे बुनकरों की शरूरतों का खयाल रखते थे और संकट के समय उनकी मदद करते थे। नए गुमाश्ता बाहर के लोग थे। उनका गाँवों से पुराना सामाजिक संबंध नहीं था। वे दंभपूणर् व्यवहार करते थे, सिपाहियों व चपरासियों को लेकर आते थे और माल समय पर तैयार न होने की स्िथति में बुनकरों को सशा देते थे। सशा के तौर पर बुनकरों को अकसर पीटा जाता था और कोड़े बरसाए जाते थे। अब बुनकर न तो दाम पर मोलभाव कर सकते थे और न ही किसी और को माल बेच सकते थे। उन्हें वंफपनी से जो कीमत मिलती थी वह बहुत कम थी पर वे व़फशो± की वजह से वंफपनी से बँधे हुए थे। कनार्टक और बंगाल में बहुत सारे स्थानों पर बुनकर गाँव छोड़ कर चले गए। वे अपने रिश्तेदारों के यहाँ किसी और गाँव में करघा लगा लेते थे। कइर् स्थानों पर वंफपनी और उसके अप़्ाफसरों का विरोध करते हुए गाँव के व्यापारियों के साथ मिलकर बुनकरों ने बगावत कर दी। वुफछ समय बाद बहुत सारे बुनकर ड्डोत - ग व़फशार् लौटाने से इनकार करने लगे। उन्होंने करघे बंद कर दिए और खेतों में मशदूरी करने लगे। उन्नीसवीं सदी आते - आते कपास बुनकरों के सामने नयी समस्याएँ पैदा हो गईं। 3.3 भारत में मैनचेस्टर का आना 1772 में इर्स्ट इंडिया वंफपनी के अप़्ाफसर हेनरी पतूलो ने कहा था कि भारतीय कपड़े की माँग कभी कम नहीं हो सकती क्योंकि दुनिया के किसी और देश में इतना अच्छा माल नहीं बनता। लेकिन हम देखते हैं कि उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में भारत के कपड़ा नियार्त में गिरावट आने लगी जो लंबे समय तक जारी रही। 1811 - 12 में सूती माल का हिस्सा वुफल नियार्त में 33 प्रतिशत था। 1850 - 51 में यह मात्रा 3 प्रतिशत रह गया था। ऐसा क्यों हुआ? उसके निहिताथर् क्या थे? ड्डोत - घ जब इंग्लैंड में कपास उद्योग विकसित हुआ तो वहाँ के उद्योगपति दूसरे देशों से आने वाले आयात को लेकर परेशान दिखाइर् देने लगे। उन्होंने सरकार पर दबाव डाला कि वह आयातित कपड़े पर आयात शुल्क वसूल करे जिससे मैनचेस्टर में बने कपड़े बाहरी प्रतिस्पधार् के बिना इंग्लैंड में आराम से बिक सकें। दूसरी तरप़्ाफ उन्होंने इर्स्ट इंडिया वंफपनी पर दबाव डाला कि वह बि्रटिश कपड़ों को भारतीय बाशारों में भी बेचे। उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में बि्रटेन के वस्त्रा उत्पादों के नियार्त में नाटकीय वृि हुइर्। अठारहवीं सदी के आख्िार में भारत में उत्पादों का न के बराबर नियार्त होता था। 1850 तक आते - आते सूती का आयात भारतीय आयात में 31 प्रतिशत हो चुका था। 1870 तक यह आँकड़ा 50 प्रतिशत से ऊपर चला गया। इस प्रकार भारत में कपड़ा बुनकरों के सामने एक - साथ दो समस्याएँ थीं। उनका नियार्त बाशार ढह रहा था और स्थानीय बाशार सिवुफड़ने लगा था। स्थानीय बाशार में मैनचेस्टर के आयातित मालों की भरमार थी। कम लागत पर मशीनों से बनने वाले आयातित कपास उत्पाद इतने सस्ते थे कि बुनकर उनका मुकाबला नहीं कर सकते थे। 1850 के दशक तक देश के श्यादातर बुनकर इलाकों में गिरावट और बेकारी के ही वि़फस्सों की भरमार थी। 1860 के दशक में बुनकरों के सामने नयी समस्या खड़ी हो गइर्। उन्हें अच्छी कपास नहीं मिल पा रही थी। जब अमेरिकी गृहयु( शुरू हुआ और अमेरिका से कपास की आमद बंद हो गइर् तो बि्रटेन भारत से कच्चा माल मँगाने लगा। भारत से कच्चे कपास के नियार्त में इस वृि से उसकी कीमत आसमान छूने लगी। भारतीय बुनकरों को कच्चे माल के लाले पड़ गए। उन्हें मनमानी कीमत पर कच्ची कपास खरीदनी पड़ती थी। ऐसी सूरत में बुनकरी के सहारे पेट पालना संभव नहीं था। उन्नीसवीं सदी के आख्िार में बुनकरों और कारीगरों के सामने एक और समस्या आ गइर्। अब भारतीय कारखानों में उत्पादन होने लगा और बाशार मशीनों की बनी चीशों से पट गया था। ऐसे में बुनकर उद्योग किस तरह व़फायम रह सकता था? 4 प़ैफक्िट्रयों का आना बंबइर् में पहली कपड़ा मिल 1854 में लगी और दो साल बाद उसमें उत्पादन होने लगा। 1862 तक वहाँ ऐसी चार मिलें काम कर रही थीं। उनमें 94,000 तकलियाँ और 2,150 करघे थे। उसी समय बंगाल में जूट मिलें खुलने लगीं। वहाँ देश की पहली जूट मिल 1855 में और दूसरी 7 साल बाद 1862 में चालू हुइर्। उत्तरी भारत में एल्िगन मिल 1860 के दशक में कानपुर में खुली। इसके साल भर बाद अहमदाबाद की पहली कपड़ा मिल भी चालू हो गइर्। 1874 में मद्रास में भी पहली कताइर् और बुनाइर् मिल खुल गइर्। ये उद्योग कौन लगा रहा था? उनके लिए पूँजी कहा से आ रही थी? मिलों में काम करने वाले कौन थे? 4.1 प्रारंभ्िाक उद्यमी देश के विभ्िान्न भागों में तरह - तरह के लोग उद्योग लगा रहे थे। आइए देखें ये कौन लोग थे। बहुत सारे व्यावसायिक समूहों का इतिहास चीन के साथ व्यापार के शमाने से चला आ रहा था। जैसा कि पिछले साल की किताब में आपने पढ़ा था, अठारहवीं सदी के आख्िार से ही अंग्रेश भारतीय अपफीम का चीन को नियार्त़करने लगे थे। उसके बदले में वे चीन से चाय खरीदते थे जो इंग्लैंड जाती थी। इस व्यापार में बहुत सारे भारतीय कारोबारी सहायक की हैसियत में पहुँच गए थे। वे पैसा उपलब्ध कराते थे, आपू£त सुनिश्िचत करते थे और माल को जहाशों में लाद कर रवाना करते थे। व्यापार से पैसा कमाने के बाद उनमें से कुछ व्यवसायी भारत में औद्योगिक उद्यम स्थापित करना चाहते थे। बंगाल में द्वारकानाथ टैगोर ने चीन के साथ व्यापार में खूब पैसा कमाया और वे उद्योगों में निवेश करने लगे। 1830 - 1840 के दशकों में उन्होंने 6 संयुक्त उद्यम वंफपनियाँ लगा ली थीं। 1840 के दशक में आए व्यापक व्यावसायिक संकटों में औरों के साथ - साथ टैगोर के उद्यम भी बैठ गए। लेकिन उन्नीसवीं सदी में चीन के साथ व्यापार करने वाले बहुत सारे व्यवसायी सपफल उद्योगपति भी साबित हुए। बंबइर् में डिनशाॅ पेटिट और आगे चलकर देश में विशाल औद्योगिक साम्राज्य स्थापित करने वाले जमशेदजी नुसरवानजी टाटा जैसे पारसियों ने आंश्िाक रूप से चीन को नियार्त करके और आंश्िाक रूप से इंग्लैंड को कच्ची कपास नियार्त करके पैसा कमा लिया था। 1917 में कलकत्ता में देश की पहली जूट मिल लगाने वाले मारवाड़ी व्यवसायी सेठ हुवुफमचंद ने भी चीन के साथ व्यापार किया था। यही काम प्रसि( उद्योगपति जी.डी. बिड़ला के पिता और दादा ने किया। जीजीभोये एक पारसी बुनकर के बेटे थे। अपने समय के बहुत सारे लोगों की तरह उन्होंने भी चीन के साथ व्यापार और जहाशरानी का काम किया था। उनके पास जहाशों का एक विशाल बेड़ा था। अंग्रेश और अमेरिकी जहाश कंपनियों के साथ प्रतिस्पधार् के कारण 1850 के दशक तक उन्हें सारे जहाश बेचने पड़े। द्वारकानाथ टैगोर का विश्वास था कि भारत पश्िचमीकरण और औद्योगीकरण के रास्ते पर चलकर ही विकास कर सकता है। उन्होंने जहाशरानी, जहाश निमार्ण, खनन, बैं¯कग, बागान और बीमा क्षेत्रा में निवेश किया था। पूँजी इकट्ठा करने के लिए अन्य व्यापारिक नेटवको± का सहारा लिया गया। मद्रास के कुछ सौदागर बमार् से व्यापार करते थे जबकि कुछ के मध्य - पूवर्व पूवीर् अÚीका में संबंध थे। इनके अलावा भी कुछ वाण्िाज्ियक समूह थे लेकिन वे विदेश व्यापार से सीधे जुड़े हुए नहीं थे। वे भारत में ही व्यवसाय करते थे। वे एक जगह से दूसरी जगह माल ले जाते थे, सूद पर पैसा चलाते थे, एक शहर से दूसरे शहर में पैसा पहुँचाते थे और व्यापारियों को पैसा देते थे। जब उद्योगों में निवेश के अवसर आए तो उनमें से बहुतों ने प़ैफक्िट्रयाँ लगा लीं। जैसे भारतीय व्यापार पर औपनिवेश्िाक श्िाकंजा कसता गया, वैसे - वैसे भारतीय व्यावसायियों के लिए जगह सिकुड़ती गइर्। उन्हें अपना तैयार माल यूरोप में बेचने से रोक दिया गया। अब वे मुख्य रूप से कच्चे माल और अनाज - कच्ची कपास, अप़्ाफीम, गेहूँ और नील - का ही नियार्त कर सकते थे जिनकी अंग्रेशों को शरूरत थी। धीरे - धीरे उन्हें जहाशरानी व्यवसाय से भी बाहर धकेल दिया गया। पहले विश्वयु( तक यूरोपीय प्रबंधकीय एजेंसियाँ भारतीय उद्योगों के विशाल क्षेत्रा का नियंत्राण करती थीं। इनमें बडर् हीगलसर् एंड वंफपनी, एंड्रयू यूल, और जाडीर्न स्िकनर एंड वंफपनी सबसे बड़ी वंफपनियाँ थीं। ये एजेंसियाँ पूँजी जुटाती थीं, संयुक्त उद्यम वंफपनियाँ लगाती थीं और उनका प्रबंधन सँभालती थीं। श्यादातर मामलों में भारतीय वित्तपोषक ;पफाइनेंसरद्ध पूँजी उपलब्ध कराते थे जबकि निवेश और व्यवसाय से संबंिात प़्ौफसले यूरोपीय एजेंसियाँ लेती थीं। यूरोपीय व्यापारियों - उद्योगपतियों के अपने वाण्िाज्ियक परिसंघ थे जिनमें भारतीय व्यवसायियों को शामिल नहीं किया जाता था। 4.2 मशदूर कहाँ से आए? प़ैफक्िट्रयाँ होंगी तो मशदूर भी होंगे। पै़फक्िट्रयों के विस्तार से मशदूरों की माँग बढ़ने लगी। 1901 में भारतीय पैफक्िट्रयों में 5,84,000 मशदूर काम करते थे। 1946 तक यह संख्या बढ़कर 24,36,000 हो चुकी थी। ये मशदूर कहाँ से आए? श्यादातर औद्योगिक इलाव़फों में मशदूर आसपास के जिलों से आते थे। जिन किसानों - कारीगरों को गाँव में काम नहीं मिलता था वे औद्योगिक वेंफद्रों की तरपफ जाने लगते थे। 1911 में बंबइर् के सूती कपड़ा उद्योग में काम करने वाले़50 प्रतिशत से श्यादा मशदूर पास के रत्नागिरी जिले से आए थे। कानपुर की मिलों में काम करने वाले श्यादातर कानपुर जिले के ही गाँवों से आते थे। मिल मशदूर बीच - बीच में अपने गाँव जाते रहते थे। वे पफसलों की कटाइर् व त्यौहारों़के समय गाँव लौट जाते थे। बाद में, जब नए कामों की खबर पैफली तो दूर - दूर से भी लोग आने लगे।उदाहरण के लिए, संयुक्त प्रांत के लोग बंबइर् के कपड़ा मिलों और कलकत्ता के जूट मिलों में काम करने के लिए पहुँच रहे थे। 1912 में जे.एन. टाटा ने जमशेदपुर में भारत का पहला लौह एवं इस्पात संयंत्रा स्थापित किया। भारत में लौह एवं इस्पात उद्योग, कपड़ा उद्योग के काप़्ाफी बाद शुरू हुआ। औपनिवेश्िाक भारत में औद्योगिक मशीनरी, रेलवे और लोकोमोटिव का श्यादातर आयात ही किया जाता था। इसलिए स्वतंत्राता मिलने तक भारी उद्योग कोइर् खास आगे नहीं बढ़ सकता था। नौकरी पाना हमेशा मुश्िकल था। हालाँकि मिलों की संख्या बढ़ती जा रही थी और मशदूरों की माँग भी बढ़ रही थी लेकिन रोशगार चाहने वालों की संख्या रोशगारों के मुव़फाबले हमेशा श्यादा रहती थी। मिलों में प्रवेश भी निष्िा( था। उद्योगपति नए मशदूरों की भतीर् के लिए प्रायः एक जाॅबर रखते थे। जाॅबर कोइर् पुराना और विश्वस्त कमर्चारी होता था। वह अपने गाँव से लोगों को लाता था, उन्हें काम का भरोसा देता था, उन्हें शहर में जमने के लिए मदद देता था और मुसीबत में पैसे से मदद करता था। इस प्रकार जाॅबर ताव़फतवर और मशबूत व्यक्ित बन गया था। बाद में जाॅबर मदद के बदले पैसे व तोहप़फों की माँग करने लगे और मशदूरों की ¯शदगी को नियंत्रिात करने लगे। समय के साथ प़ैफक्ट्री मशदूरों की संख्या बढ़ने लगी। लेकिन जैसा कि आप देखेंगे, कुल औद्योगिक श्रम शक्ित में उनका अनुपात बहुत छोटा था। ड्डोत - घ नए शब्द जाॅबर: इन्हें अलग - अलग इलावफों में ‘सरदार’ या ‘मिस्त्राी’ आदि़भी कहते थे। ड्डोत - च भारत में औद्योगिक उत्पादन पर वचर्स्व रखने वाली यूरोपीय प्रबंधकीय एजेंसियों की कुछ खास तरह के उत्पादों में ही दिलचस्पी थी। उन्होंने औपनिवेश्िाक सरकार से सस्ती कीमत पर शमीन लेकर चाय व काॅप़फी के बागान लगाए और खनन, नील व जूट व्यवसाय में पैसे का निवेश किया। इनमें से श्यादातर ऐसे उत्पाद थे जिनकी भारत में बिक्री के लिए नहीं बल्िक मुख्य रूप से नियार्त के लिए आवश्यकता थी। उन्नीसवीं सदी के आख्िार में जब भारतीय व्यवसायी उद्योग लगाने लगे तो उन्होंने भारतीय बाशार में मैनचेस्टर की बनी चीशों से प्रतिस्पधार् नहीं की। भारत आने वाले बि्रटिश मालों में धागा बहुत अच्छा नहीं था इसलिए भारत के शुरुआती सूती मिलों में कपड़े की बजाय मोटे सूती धागे ही बनाए जाते थे। जब धागे का आयात किया जाता था तो वह हमेशा बेहतर वि़फस्म का होता था। भारतीय कताइर् मिलों में बनने वाले धागे का भारत के हथकरघा बुनकर इस्तेमाल करते थे या उन्हें चीन को नियार्त कर दिया जाता था। बीसवीं सदी के पहले दशक तक भारत में औद्योगीकरण का ढरार् कइर् बदलावों की चपेट में आ चुका था। स्वदेशी आंदोलन को गति मिलने से राष्ट्रवादियों ने लोगांे को विदेशी कपड़े के बहिष्कार के लिए प्रेरित किया। औद्योगिक समूह अपने सामूहिक हितों की रक्षा के लिए संगठित हो गए और उन्होंने आयात शुल्क बढ़ाने तथा अन्य रियायतें देने के लिए सरकार पर दबाव डाला। 1906 के बाद चीन भेजे जाने वाले भारतीय धागे के नियार्त में भी कमी आने लगी थी। चीनी बाशारों में चीन और जापान की मिलों के उत्पाद छा गए थे। पफलस्वरूप, भारत के उद्योगपति धागे की बजाय कपड़ा बनाने लगे। 1900 से 1912 के भारत में सूती कपड़े का उत्पादन दोगुना हो गया। पहले विश्व यु( तक औद्योगिक विकास धीमा रहा। यु( ने एक बिलवुफल नयी स्िथति पैदा कर दी थी। बि्रटिश कारख़ाने सेना की शरूरतों को पूरा करने के लिए यु( संबंधी उत्पादन में व्यस्त थे इसलिए भारत में मैनचेस्टर के माल का आयात कम हो गया। भारतीय बाशारों को रातोंरात एक विशाल देशी बाशार मिल गया। यु( लंबा ¯खचा तो भारतीय कारखानों में भी पफौज के लिए जूट की बोरियाँ, ़प़्ाफौजियों के लिए वदीर् के कपड़े, टेंट और चमड़े के जूते, घोड़े व खच्चर की जीन तथा बहुत सारे अन्य सामान बनने लगे। नए कारखाने लगाए गए। पुराने कारखाने कइर् पालियों में चलने लगे। बहुत सारे नए मशदूरों को काम पर रखा गया और हरेक को पहले से भी श्यादा समय तक काम करना पड़ता था। यु( के दौरान औद्योगिक उत्पादन तेशी से बढ़ा। यु( के बाद भारतीय बाशार में मैनचेस्टर को पहले वाली हैसियत कभी हासिल नहीं हो पायी। आधुनिकीकरण न कर पाने और अमेरिका, जमर्नी व जापान के मुकाबले कमजोर पड़ जाने के कारण बि्रटेन की अथर्व्यवस्था चरमरा गइर् थी। कपास का उत्पादन बहुत कम रह गया था और बि्रटेन से होने वाले सूती कपड़े के नियार्त में शबरदस्त गिरावट आइर्। उपनिवेशों में विदेशी उत्पादों को हटाकर स्थानीय उद्योगपतियों ने घरेलू बाशारों पर व़फब्शा कर लिया और धीर - धीरे अपनी स्िथति मशबूत बना ली। 5.1 लघु उद्योगों की बहुतायत हालाँकि यु( के बाद प़ैफक्ट्री उद्योगों में लगातार इशापफा हुआ लेकिऩअथर्व्यवस्था में विशाल उद्योगों का हिस्सा बहुत छोटा था। उनमें से श्यादातर - 1911 में 67 प्रतिशत - बंगाल और बंबइर् में स्िथत थे। बाकी पूरेदेश में छोटे स्तर के उत्पादन का ही दबदबा रहा। पंजीकृत प़ैफक्िट्रयों में कुल औद्योगिक श्रम शक्ित का बहुत छोटा हिस्सा ही काम करता था। यह संख्या 1911 में 5 प्रतिशत और 1931 में 10 प्रतिशत थी। बाकी मशदूर गली - मोहल्लों में स्िथत छोटी - छोटी ववर्फशाॅप और घरेलू इकाइयों में काम करते थे। कुछ मामलों में तो बीसवीं सदी के दौरान हाथ से होने वाले उत्पादन में ़दरअसल इशापफा हुआ था। यह बात हथकरघा क्षेत्रा के बारे में भी सही है जिसकी हमने पीछे चचार् की थी। सस्ते मशीन - नि£मत धागे ने उन्नीसवीं सदी में कताइर् उद्योग को तो खत्म कर दिया था लेकिन तमाम समस्याओं के बावजूद बुनकर अपना व्यवसाय किसी तरह चलाते रहे। बीसवीं सदी में हथकरघों पर बने कपड़े के उत्पादन में लगातार सुधार हुआ। 1900 से 1940 के बीच यह तीन गुना हो चुका था। ऐसा वैफसे हुआ? इसके पीछे आंश्िाक रूप से तकनीकी बदलावों का हाथ था। अगर लागत में ़बहुत श्यादा इशापफा न हो और उत्पादन बढ़ सकता हो तो हाथ से काम करने वालों को नयी तकनीक अपनाने में कोइर् परेशानी नहीं होती। इसलिए, बीसवीं सदी के दूसरे दशक तक आते - आते हम ऐसे बुनकरों को देखते हैं जोफ्ऱलाइर् शटल वाले करघों का इस्तेमाल करते थे। इससे कामगारों की उत्पादन क्षमता बढ़ी, उत्पादन तेश हुआ और श्रम की माँग में कमी आइर्। 1941 तकभारत में 35 प्रतिशत से श्यादा हथकरघों में फ्ऱलाइर् शटल लगे होते थे। त्रावणकोर, मद्रास, मैसूर, कोचीन, बंगाल आदि क्षेत्रों में तो ऐसे हथकरघे 70 - 80 प्रतिशत तक थे। इसके अलावा भी कइर् छोटे - छोटे सुधार किए गए जिनसे बुनकरों को अपनी उत्पादकता बढ़ाने और मिलों से मुवफाबला करने में मदद मिली। ़हाथ से बुने कपड़े के महीन डिज़ाइन की मिलों में नवफल नहीं़की जा सकती थी। नए शब्द फ्ऱलाइर् शटल: यह रस्िसयों और पुलियों के शरिए चलने वाला एक यांत्रिाक औशार है जिसका बुनाइर् के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह क्षैतिज धागे ;तानाμजीम ूमजिद्ध को लम्बवत् धागे ;बानाμजीम ूंतचद्ध में पिरो देती है। फ्ऱलाइर् शटल के आविष्कार से बुनकरों को बड़े करघे चलाना और चैड़े अरज का कपड़ा बनाने में काप़्ाफी मदद मिली। मिलों के साथ प्रतिस्पधार् का मुव़फाबला कर पाने के मामले में कुछ बुनकर औरों से बेहतर स्िथति में थे। बुनकरों में से कुछ मोटा कपड़ा बनाते थे जबकि कुछ महीन वि़फस्म के कपड़े बुनते थे। मोटे कपड़े को मुख्य रूप से गरीब ही खरीदते थे और उसकी माँग में भारी उतार - चढ़ाव आते थे। खराब प़फसल और अकाल के समय जब ग्रामीण ग़्ारीबों के पास खाने को कुछ नहीं होता था और नकद आय के साधन खत्म हो जाते थे तो वे कपड़ा नहीं खरीद सकते थे। बेहतर व्ि़ाफस्म के कपड़े की माँग खाते - पीते तबव़ेफ में श्यादा थी। उसमें उतार - चढ़ाव कम आते थे। जब ग़्ारीब भूखों मर रहे होते थे तब भी अमीर यह कपड़ा खरीद सकते थे। अकालों से बनारसी या बालूचरी साडि़यों की बिक्री पर असर नहीं पड़ता था। वैसे भी, जैसा कि आप देख चुके है, मिल विशेष प्रकार की बुनाइर् की नव़्ाफल नहीं कर सकते थे। बुने हुए बाॅडर्र वाली साडि़यों या मद्रास की प्रसि( लुंगियों की जगह ले लेना मिलों के लिए आसान नहीं था। ऐसा भी नहीं है कि बीसवीं सदी में भी उत्पादन बढ़ाते जा रहे बुनकरों व अन्य दस्तकारों को हमेशा प़्ाफायदा ही हो रहा था। उनकी ¯शदगी बहुत कठोर थी। उन्हें दिन - रात काम करना पड़ता था। अकसर पूरा परिवार - बच्चे, बूढ़े, औरतें - उत्पादन के किसी न किसी काम में हाथ बढ़ाता था। लेकिन ये प़ैफक्िट्रयों के युग में अतीत के अवशेष भर नहीं थे। उनका जीवन और श्रम औद्योगीकरण की प्रिया का अभ्िान्न अंग थे। हम देख चुके हैं कि किस तरह बि्रटिश निमार्ताओं ने भारतीय बाशार पर व़फब्शे के लिए प्रयास किया और किस तरह भारतीय बुनकरों व दस्तकारों, व्यापारियों व उद्योगपतियों ने औपनिवेश्िाक नियंत्राण का विरोध किया, आयात शुल्क सुरक्षा के लिए माँग उठाइर्, अपने लिए जगह बनाइर् और अपने माल के बाशार को पैफलाने का प्रयास किया। जब नयी चीशें बनती हैं तो लोगों को उन्हें खरीदने के लिए प्रेरित भी करना पड़ता है। लोगों को लगना चाहिए कि उन्हें उस उत्पाद की शरूरत है। इसके लिए क्या किया गया? नए उपभोक्ता पैदा करने का एक तरीव़फा विज्ञापनों का है। जैसा कि आप जानते हैं, विज्ञापन विभ्िान्न उत्पादों को जरूरी और वांछनीय बना लेते हैं। वे लोगों की सोच बदल देते हैं और नयी शरूरतें पैदा कर देते हैं। आज हम एक ऐसी दुनिया में हैं जहाँ चारों तरप़्ाफ विज्ञापन छाए हुए हैं। अखबारों, पत्रिाकाओं, हो£डंग्स, दीवारों, टेलीविशन के परदे पर, सब जगह विज्ञापन छाए हुए हैं। लेकिन अगर हम इतिहास में पीछे मुड़कर देखें तो पता चलता है कि औद्योगीकरण की शुरुआत से ही विज्ञापनों ने विभ्िान्न उत्पादों के बाशार कोपैफलाने में और एक नयी उपभोक्ता संस्कृति रचने में अपनी भूमिका निभाइर् है। जब मैनचेस्टर के उद्योगपतियों ने भारत में कपड़ा बेचना शुरू किया तो वे कपड़े के बंडलों पर लेबल लगाते थे। लेबल का प़्ाफायदा यह होता था कि खरीदारों को वंफपनी का नाम व उत्पादन की जगह पता चल जाती थी। लेबलही चीशों की गुणवत्ता का प्रतीक भी था। जब किसी लेबल पर मोटे अक्षरों में ‘मेड इन मैनचेस्टर’ लिखा दिखाइर् देता तो खरीदारों को कपड़ा खरीदने में किसी तरह का डर नहीं रहता था। चित्रा 26 ;कद्ध - मैनचेस्टर के लेबल, बीसवीं सदी का प्रारंभ। आयातित कपड़ों के लेबलों पर असंख्य भारतीय देवी - देवताओं - का£तक, लक्ष्मी, सरस्वती - को चित्रिात किया जाता था जो संबंिात वस्तुकी गुणवत्ता को दशार्ने का प्रयास था। चित्रा 26 ;खद्ध - मैनचेस्टर के लेबल पर महाराजा रणजीत ¯सह का चित्रा। उत्पाद के प्रति सम्मान पैदा करने हेतु ऐतिहासिक व्यक्ितत्वों का इस्तेमाल किया जा रहा था। लेबलों पर सिप़्ार्फ शब्द और अक्षर ही नहीं होते थे। उन पर तस्वीरें भी बनी होती थीं जो अकसर बहुत सुंदर होती थीं। अगर हम पुराने लेबलों को देखें तो उनके निमार्ताओं की सोच, उनके हिसाब - किताब और लोगों को आक£षत करने के उनके तरीव़फों का अंदाशा लगा सकते हैं। इन लेबलों पर भारतीय देवी - देवताओं की तसवीरें प्रायः होती थीं। देवी - देवताओं की तसवीर के बहाने निमार्ता ये दिखाने की कोश्िाश करते थे कि इर्श्वर भीचाहता है कि लोग उस चीश को खरीदें। कृष्ण या सरस्वती की तसवीरों का प़्ाफायदा ये होता था कि विदेशों में बनी चीश भी भारतीयों को जानी - पहचानी सी लगती थी। उन्नीसवीं सदी के आख्िार में निमार्ता अपने उत्पादों को बेचने के लिए कैलेंडर छपवाने लगे थे। अखबारों और पत्रिाकाओं को तो पढ़े - लिखे लोग ही समझ सकते थे लेकिन कैलेंडर उनको भी समझ में आ जाते थे जो पढ़ नहीं सकतेथे। चाय की दुकानों, दफ्ऱतरों व मध्यवगीर्य घरों में ये कैलेंडर लटके रहते थे। जो इन कैलेंडरों को लगाते थे वे विज्ञापन को भी हर रोज, पूरे साल देखते थे। इन कैलेंडरों में भी नए उत्पादों को बेचने के लिए देवताओं की तसवीर होती थी। देवताओं की तसवीरों की तरह महत्त्वपूणर् व्यक्ितयों, सम्राटों व नवाबों की तस्वीरें भी विज्ञापनों व कैलेंडरों में खूब इस्तेमाल होती थीं। इनका संदेश अकसर यह होता था: अगर आप इस शाही व्यक्ित का सम्मान करते हैं तो इस उत्पाद का भी सम्मान कीजिएऋ अगर इस उत्पाद को राजा इस्तेमाल करतेहैं या उसे शाही निदेर्श से बनाया गया है तो उसकी गुणवत्ता पर सवाल खड़ा नहीं किया जा सकता। जब भारतीय निमार्ताओं ने विज्ञापन बनाए तो उनमें राष्ट्रवादी संदेश साप़्ाफ दिखाइर् देता था। इनका आशय यह था कि अगर आप राष्ट्र की परवाह करते हैं तो उन चीशों को खरीदिए जिन्हें भारतीयों ने बनाया है। ये विज्ञापन स्वदेशी के राष्ट्रवादी संदेश के वाहक बन गए थे। निष्कषर् शाहिर है कि उद्योगों के युग में बड़े - बड़े प्रौद्योगिकीय बदलाव आए हैं, प़ैफक्िट्रयों का उदय हुआ है और नयी औद्योगिक श्रमशक्ित अस्ितत्व में आइर् है। लेकिन जैसा कि आपने देखा है, इस युग में हाथ से बनने वाली चीशें और छोटे पैमानेका उत्पादन भी औद्योगिक भूदृश्य का एक महत्त्वपूणर् हिस्सा रहा है। चित्रा 1 और 2 को दोबारा देख्िाए। अब बताइए कि ये छवियाँ क्या दशार्ती हैं। संक्षेप में लिखें चचार् करें परियोजना कायर्

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