भूमंडलीकृत विश्व का बनना 1 आधुनिक युग से पहले जब हम ‘वैश्वीकरण’ की बात करते हैं तो आमतौर पर हम एक ऐसी आथ्िार्क व्यवस्था की बात करते हैं जो मोटे तौर पर पिछले लगभग पचास सालों में हीहमारे सामने आइर् है। लेकिन जैसा कि आप इस अध्याय में देखेंगे, भूमंडलीकृत विश्व के बनने की प्रिया - व्यापार का, काम की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह जाते लोगों का, पूँजी व बहुत सारी चीजों की वैश्िवक आवाजाही का - एक लंबा इतिहास रहा है। आज जब हम अपने जीवन में वैश्िवक आपसी संपको± के बारे में सोचते हैं तो हमें उन युगों के बारे में भी जानना चाहिए जिनसे गुशरते हुए हमारी यह दुनिया ऐसी बनी है। इतिहास के हर दौर में मानव समाज एक - दूसरे के श्यादा नशदीक आते गए हैं। प्राचीन काल से ही यात्राी, व्यापारी, पुजारी और तीथर्यात्राी ज्ञान, अवसरों और आध्यात्िमक शांति के लिए या उत्पीड़न/यातनापूणर् जीवन से बचने के लिए दूर - दूर की यात्राओं पर जाते रहे हैं। अपनी यात्राओं में ये लोग तरह - तरह की चीजें, पैसा, मूल्य - मान्यताएँ, हुनर, विचार, आविष्कार और यहाँ तक कि कीटाणु और बीमारियाँ भी साथ लेकर चलते रहे हैं। 3,000 इर्सा पूवर् में समुद्री तटों पर होने वाले व्यापार के माध्यम से सिंधु घाटी की सभ्यता उस इलाव़्ोफ से भी जुड़ी हुइर् थी जिसे आज हम पश्िचमी एश्िाया के नाम से जानते हैं। हशार साल से भी श्यादा समय से मालदीव के समुद्र में पाइर् जाने वाली कौडि़याँ ;जिन्हें पैसे या मुद्रा के रूप में इस्तेमाल किया जाता थाद्ध चीन और पूवीर् अप़्रफीका तक पहुँचती रही हैं। बीमारी पैफलाने वाले कीटाणुओं का दूर - दूर तक पहुँचने का इतिहास भी सातवीं सदी तक ढूूँढ़ा जा सकता है। तेरहवीं सदी के बाद तो इनके प्रसार को निश्चय ही साप़्ाफ देखा जा सकता है। चित्रा 1 - एक स्मृतिश्िाला पर पानी के एक जहाश का चित्रा, गोवा संग्रहालय, दसवीं शताब्दी। पश्िचमी तट के क्षेत्रा में पाइर् गइर् नवीं सदी के बाद की स्मृतिश्िालाओं पर जलपोतों की तसवीरों से उस काल मेंसमुद्री व्यापार के महत्त्व का पता चलता है। भूमंडलीकृत विश्व का बनना अध्याय 4 1.1 रेशम मागर् ;सिल्क रूटद्ध से जुड़ती दुनिया आधुनिक काल से पहले के युग में दुनिया के दूर - दूर स्िथत भागों के बीचव्यापारिक और सांस्कृतिक संपको± का सबसे जीवंत उदाहरण सिल्क मागो± के रूप में दिखाइर् देता है। ‘सिल्क मागर्’ नाम से पता चलता है कि इस मागर् सेपश्िचम को भेजे जाने वाले चीनी रेशम ;सिल्कद्ध का कितना महत्त्व था। इतिहासकारों ने बहुत सारे सिल्क मागो± के बारे में बताया है। शमीन या समुद्र से होकर गुशरने वाले ये रास्ते न केवल एश्िाया के विशाल क्षेत्रों को एक - दूसरे सेजोड़ने का काम करते थे बल्िक एश्िाया को यूरोप और उत्तरी अप़्रफीका से भी जोड़ते थे। ऐसे मागर् इर्सा पूवर् के समय में ही सामने आ चुके थे और लगभग पंद्रहवीं शताब्दी तक अस्ितत्व में थे। इसी रास्ते से चीनी पाॅटरी जाती थी और इसी रास्ते से भारत व दक्ष्िाण - पूवर् एश्िाया के कपड़े व मसाले दुनिया के दूसरे भागों में पहुँचते थे। वापसी में सोने - चाँदी जैसी कीमती धातुएँ यूरोप से एश्िाया पहुँचती थीं। व्यापार और सांस्कृतिक आदान - प्रदान, दोनों प्रियाएँ साथ - साथ चलती थीं। श्ुारुआती काल के इर्साइर् मिशनरी निश्चय ही इसी मागर् से एश्िाया में आते होंगे। कुछ सदी बाद मुस्िलम धमोर्पदेशक भी इसी रास्ते से दुनिया में पफैले। इससे भी बहुत पहले पूवीर् भारत में उपजा बौ( धमर् सिल्क मागर् की विविध शाखाओं से ही कइर् दिशाओं में पफैल चुका था। 1.2 भोजन की यात्रा: स्पैघेत्ती और आलू हमारे खाद्य पदाथर् दूर देशों के बीच सांस्कृतिक आदान - प्रदान के कइर् उदाहरण पेश करते हैं। जब भी व्यापारी और मुसापिफर किसी नए देश में जाते थे, जाने - अनजाने वहाँ नयी प़्ाफसलों के बीज बो आते थे। संभव है कि दुनिया के विभ्िान्न भागों में मिलने वाले ‘झटपट तैयार होने वाले’ ;त्मंकलद्ध खाद्य पदाथो±के भी साझा ड्डोत रहे हों। आइए स्पैघेत्ती ;ैचंहीमजजपद्ध और नूडल्स का ही उदाहरण लें। माना जाता है कि नूडल्स चीन से पश्िचम में पहुँचे औरवहाँ उन्हीं से स्पैघेत्ती का जन्म हुआ, या संभव है कि पास्ता अरब यात्रिायों के साथ पाँचवीं सदी में सिसली पहुँचा जो अब इटली का ही एक टापू है। इसी तरह के आहार भारत और जापान में भी पाए जाते हैं इसलिए हो सकता कि हम कभी यह न जान सकें कि उनका जन्म कैसे हुआ होगा। पिफर भी, इन अनुमानों के आधार पर इतना शरूर कहा जा सकता है कि आधुनिक काल से पहले भी दूर देशों के बीचसंास्कृतिक लेन - देन चल रहा होगा। आलू, सोया, मूँगपफली, मक्का, टमाटर, मिचर्, शकरकंद और ऐसे ही बहुत सारे दूसरे खाद्य पदाथर् लगभग पाँच सौ साल पहले हमारे पूवर्जों के पास नहीं थे। ये खाद्य पदाथर् यूरोप और एश्िाया में तब पहुँचे जब िस्टोपफर कोलंबस गलती से उन अज्ञात महाद्वीपों में पहुँच गया था जिन्हें बाद में अमेरिका के नामसे जाना जाने लगा। ;यहाँ ‘अमेरिका’ का मतलब उत्तरी अमेरिका, दक्ष्िाणी अमेरिका और कैरीबियन द्वीपसमूह, सभी से है।द्ध दरअसल, हमारे बहुत सारे खाद्य पदाथर् अमेरिका के मूल निवासियों यानी अमेरिकन इंडियनों से हमारे पास आए हैं। कइर् बार नयी प़्ाफसलों के आने से जीवन में शमीन - आसमान का पफव़्ा़र्फ आ जाता चित्रा 4 - आयरलैंड में आलू अकाल, इलस्टेªटेड लंदन न्यूश, 1849 प़्ाफसल कट जाने के बाद बचे - खुचे आलुओं की उम्मीद में खेत की मि‘ी खोदते बच्चे। 1845 से 1849 के बीच पड़े भयानक आयरिश आलू अकाल के दौरान आयरलैंड के लगभग 10,00,000 लोग भुखमरी के कारण मारे गए थे और इससे दोगुने लोग काम की तलाश में घर - बार छोड़ कर दूसरे इलाव़्ाफों में चले गए थे। बाॅक्स 1 ‘जैविक’ यु(? न्यू इंग्लैंड स्िथत मैसाचुसेट्स बे काॅलोनी के पहले गवनर्र जाॅन विनथाॅपर् ने मइर् 1634 में लिखा था कि छोटी चेचक उपनिवेशकारों के लिए इर्श्वर का वरदान है: ‘... देशी जनता ... छोटी चेचक के कारण लगभग पूरी खत्म हो चुकी थी। इस तरह परमेश्वर ने हमारी मिल्कीयत पर हमें मालिकाना दे दिया।’ अल्प्ऱफेड क्राॅस्बी, इकोलाॅजिकल इंपीरियलिश्म था। साधारण से आलू का इस्तेमाल शुरू करने पर यूरोप के ग्आमूल रूप से बदल गइर् थी। उनका भोजन बेहतर हो गया और उनकी औसत उम्र बढ़ने लगी। आयरलैंड के गरीब काश्तकार तो आलू पर इस हद तक निभर्र हो चुके थे कि जब 1840 के दशक के मध्य में किसी बीमारी के कारण आलू की पफसल ़खराब हो गइर् तो लाखों लोग भुखमरी के कारण मौत के मुँह में चले गए। 1.3 विजय, बीमारी और व्यापार सोलहवीं सदी मेें जब यूरोपीय जहािायों ने एश्िाया तक का समुद्री रास्ता ढूँढ़ लिया और वे पश्िचमी सागर को पार करते हुए अमेरिका तक जा पहुँचे तो पूवर् - आधुनिक विश्व बहुत छोटा सा दिखाइर् देने लगा। इससे पहले कइर् सदियों से हिंद महासागर के पानी में पफलता - पूफलता व्यापार, तरह - तरह के सामान, लोग, ज्ञान और परंपराएँ एक जगह से दूसरी जगह आ - जा रही थीं। भारतीय उपमहाद्वीप इन प्रवाहों के रास्ते में एक अहम बिंदु था। पूरे नेटवकर् में इस इलाव़्ोफ का भारी महत्त्व था। यूरोपीयों के दाख्िाले से यह आवाजाही और बढ़ने लगी और इन प्रवाहों की दिशा यूरोप की तरपफ भी मुड़ने लगी।़अपनी ‘खोज’ से पहले लाखों साल से अमेरिका का दुनिया से कोइर् संपकर् नहीं था। लेकिन सोलहवीं सदी से उसकी विशाल भूमि और बेहिसाब प़्ाफसलें व खनिज पदाथर् हर दिशा में जीवन का रूप - रंग बदलने लगे। आज के पेरू और मैक्िसको में मौजूद खानों से निकलने वाली व़्ाफीमती धातुओं, खासतौर से चाँदी, ने भी यूरोप की संपदा को बढ़ाया और पश्िचम एश्िाया के साथ होने वाले उसके व्यापार को गति प्रदान की। सत्राहवीं सदी के आते - आते पूरे यूरोप में दक्ष्िाणी अमेरिका की धन - संपदा के बारे में तरह - तरह के व्िाफस्से बनने लगे थे। इन्हीं किंवदंतियों की बदौलत वहाँ वेफ़लोग एल डोराडो को सोने का शहर मानने लगे और उसकी खोज में बहुत सारे खोजी अभ्िायान शुरू किए गए। सोलहवीं सदी के मध्य तक आते - आते पुतर्गाली और स्पेनिश सेनाओं की विजय का सिलसिला शुरू हो चुका था। उन्होंने अमेरिका को उपनिवेश बनाना शुरू कर दिया था। यूरोपीय सेनाएँ केवल अपनी सैनिक ताकत के दम पर नहीं जीतती थीं। स्पेनिश विजेताओं के सबसे शक्ितशाली हथ्िायारों में परंपरागत व्ि़ाफस्म का सैनिक हथ्िायार तो कोइर् था ही नहीं। यह हथ्िायार तो चेचक जैसे कीटाणु थे जो स्पेनिश सैनिकों और अप़्ाफसरों के साथ वहाँ जा पहुँचे थे। लाखों साल से दुनिया से अलग - थलग रहने के कारण अमेरिका के लोगों के शरीर में यूरोप से आने वाली इन बीमारियों से बचने की रोग - प्रतिरोधी क्षमता नहीं थी। रीबों की िांदगीा़पफलस्वरूप, इस नए स्थान पर चेचक बहुत मारक साबित हुइर्। एक बार संक्रमण शुरू होने के बाद तो यह बीमारी पूरे महाद्वीप में पफैल गइर्। जहाँ यूरोपीय लोग नहीं पहुँचे थे वहाँ के लोग भी इसकी चपेट में आने लगे। इसने पूरे के पूरे समुदायों को खत्म कर डाला। इस तरह घुसपैठियों की जीत का रास्ता आसान होता चला गया। बंदूकों को तो खरीद कर या छीन कर हमलावरों के ख्ि़ालापफ भी इस्तेमाल़किया जा सकता था। पर चेचक जैसी बीमारियों के मामले में तो ऐसा नहीं किया जा सकता था क्योंकि हमलावरों के पास उससे बचाव का तरीका भी था और उनके शरीर में रोग प्रतिरोधी क्षमता भी विकसित हो चुकी थी। उन्नीसवीं सदी तक यूरोप में गरीबी और भूख का ही साम्राज्य था। शहरों में बेहिसाब भीड़ थी और बीमारियों का बोलबाला था। धामिर्क टकराव आम थे। धामिर्क असंतुष्टों को कड़ा दंड दिया जाता था। इस वजह से हशारों लोग यूरोप से भागकर अमेरिका जाने लगे। अठारहवीं सदी तक अमेरिका में अप्ऱफीका से पकड़ कर लाए गए गुलामों को काम में झोंक कर यूरोपीय बाशारों के लिए कपास और चीनी का उत्पादन किया जाने लगा था। अठारहवीं शताब्दी का काप़्ाफी समय बीत जाने के बाद भी चीन और भारत को दुनिया के सबसे धनी देशों में गिना जाता था। एश्िायाइर् व्यापार में भी उन्हीं का दबदबा था। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि पंद्रहवीं सदी से चीन ने दूसरे देशों के साथ अपने संबंध कम करना शुरू कर दिए और वह दुनिया से अलग - थलग पड़ने लगा। चीन की घटती भूमिका और अमेरिका के बढ़तेमहत्त्व के चलते विश्व व्यापार का केंद्र पश्िचम की ओर ख्िासकने लगा। अब यूरोप ही विश्व व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र बन गया। नए शब्द असंतुष्ट: जो स्थापित विश्वासों और तरीवफों को़नहीं मानता। जब हम कहते हैं कि सोलहवीं सदी में दुनिया ‘सिकुड़ने’ लगी थी तो इसका क्या मतलब है। 2 उन्नीसवीं शताब्दी ;1815 - 1914द्ध उन्नीसवीं सदी में दुनिया तेशी से बदलने लगी। आथ्िार्क, राजनीतिक,सामाजिक, सांस्कृतिक और तकनीकी कारकों ने पूरे के पूरे समाजों की कायापलट कर दी और विदेश संबंधों को नए ढरेर् में ढाल दिया। अथर्शास्ित्रायों ने अंतरार्ष्ट्रीय आथ्िार्क विनिमय में तीन तरह की गतियों या ‘प्रवाहों’ का उल्लेख किया है। इनमें पहला प्रवाह व्यापार का होता है जो उन्नीसवीं सदी में मुख्य रूप से वस्तुओं ;जैसे कपड़ा या गेहूँ आदिद्ध के व्यापार तक ही सीमित था। दूसरा, श्रम का प्रवाह होता है। इसमें लोग काम या रोशगार की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं। तीसरा प्रवाह पूँजी का होता है जिसे अल्प या दीघर् अविा के लिए दूर - दराश के इलाव़्ाफों में निवेश कर दिया जाता है। ये तीनों तरह के प्रवाह एक - दूसरे से जुड़े हुए थे और लोगों के जीवन को प्रभावित करते थे। कभी - कभी इन कारकों के बीच मौजूद संबंध टूट भी जाते थे। उदाहरण के लिए, वस्तुओं या पँूजी की आवाजाही के मुव़्ाफाबले श्रमिकों की आवाजाही पर प्रायः श्यादा शते± और बंदिशें लगाइर् जाती थीं। पिफर भी, यदि हम इन तीनों प्रवाहों का एक साथ अध्ययन करें तो उन्नीसवीं सदी की विश्व अथर्व्यवस्था को श्यादा अच्छी तरह समझ सकते हैं। 2.1 विश्व अथर्व्यवस्था का उदय इस विषय को समझने के लिए सबसे पहले औद्योगिक यूरोप में खाद्य उत्पादन और उपभोग के बदलते रुझानों पर विचार करें तो बेहतर होगा। सामान्य रूप से सभी देश भोजन के मामले में आत्मनिभर्र होने का प्रयास करते रहे हैं। लेकिन उन्नीसवीं सदी के बि्रटेन की बात अलग थी। अगर उस समय बि्रटेन खाद्य आत्मनिभर्रता के रास्ते पर चलता तो वहाँ के लोगों का जीवनस्तर गिर जाता और सामाजिक तनाव पफैलता। आइए देखें कि इस आशंका के पीछे क्या कारण थे? अठारहवीं सदी के आख्िारी दशकों में बि्रटेन की आबादी तेशी से बढ़ने लगी थी। नतीजा, देश में भोजन की माँग भी बढ़ी। जैसे - जैसे शहर पफैले औरउद्योग बढ़ने लगे, कृष्िा उत्पादों की माँग भी बढ़ने लगी। कृष्िा उत्पाद मँहगे होने लगे। दूसरी तरप़्ाफ बड़े भूस्वामियों के दबाव में सरकार ने मक्का के आयात पर भी पाबंदी लगा दी थी। जिन व़्ाफानूनों के सहारे सरकार ने यह पाबंदी लागू की थी उन्हें ‘काॅनर् लाॅ’ कहा जाता था। खाद्य पदाथो± की उफँची व़्ाफीमतों से परेशान उद्योगपतियों और शहरी बाश्िांदों ने सरकार को मजबूर कर दिया कि वह काॅनर् लाॅ को प़्ाफौरन समाप्त कर दे। काॅनर् लाॅ के निरस्त हो जाने के बाद बहुत कम कीमत पर खाद्य पदाथो± का आयात किया जाने लगा। आयातित खाद्य पदाथो± की लागत बि्रटेन में पैदा होने वाले खाद्य पदाथो± से भी कम थी। पफलस्वरूप, बि्रटिश किसानों की हालत बिगड़ने लगी क्योंकि वे आयातित माल की वफीमत का मुव़्ाफाबला नहीं कऱसकते थे। विशाल भूभागों पर खेती बंद हो गइर्। हशारों लोग बेरोशगार हो गए। गाँवों से उजड़ कर वे या तो शहरों में या दूसरे देशों में जाने लगे। जब खाद्य पदाथो± की वफीमतों में गिरावट आइर् तो बि्रटेन में उपभोग का स्तऱबढ़ गया। उन्नीसवीं सदी के मध्य से बि्रटेन की औद्योगिक प्रगति कापफी तेश़रही जिससे लोगों की आय में वृि हुइर्। इससे लोगों की शरूरतें बढ़ीं। खाद्य पदाथो± का और भी श्यादा मात्रा में आयात होने लगा। पूवीर् यूरोप, रूस, अमेरिका और आॅस्ट्रेलिया, दुनिया के हर हिस्से में बि्रटेन का पेट भरने के लिए शमीनों को सापफ करके खेती की जाने लगी।़खेती के लिए शमीन को सापफ कर देना ही काप़्ाफी नहीं था। खेतिहर इलाव़्ा़फों को बंदरगाहों से जोड़ने के लिए रेलवे की भी शरूरत थी। श्यादा तादाद में माल ढुलाइर् के लिए नयी गोदियाँ बनाना और पुरानी गोदियों को पफैलाना शरूरी था। नयी जमीनों पर खेती करने के लिए यह आवश्यक था कि दूसरे इलाव़्ाफों के लोग वहाँ आकर बसें। यानी नए घर बनाना और नयी बस्ितयाँ बसाना भी शरूरी था। इन सारे कामों के लिए पूँजी और श्रम की जरूरत थी। इसके लिए लंदनजैसे वित्तीय केंद्रों से पूँजी आने लगी। अमेरिका और आॅस्ट्रेलिया जैसे जिन स्थानों पर मजदूरों की कमी थी वहाँ लोगों को ले जाकर बसाया जाने लगा यानी श्रम का प्रवाह होने लगा। उन्नीसवीं सदी में यूरोप के लगभग पाँच करोड़ लोग अमेरिका और आॅस्ट्रेलिया में जाकर बस गए। माना जाता है कि पूरी दुनिया में लगभग पंद्रह करोड़ लोग बेहतर भविष्य की चाह में अपने घर - बार छोड़कर दूर - दूर के देशों में जाकर काम करने लगे थे। 1890 तक एक वैश्िवक कृष्िा अथर्व्यवस्था सामने आ चुकी थी। इस घटनाक्रम के साथ ही श्रम विस्थापन रुझानों, पूँजी प्रवाह, पारिस्िथतिकी और तकनीक में गहरे बदलाव आ चुके थे। अब भोजन किसी आसपास के गांव या व़्ाफस्बे से नहीं बल्िक हशारों मील दूर से आने लगा था। अब अपने खेतों पर खुद काम करने वाले किसान ही खाद्य पदाथर् पैदा नहीं कर रहे थे। अब यह काम ऐसे औद्योगिक मशदूर करने लगे थे जो संभवतः हाल ही में वहाँ आए थे और ऐसे खेतों में काम कर रहे थे जहाँ महश एक पीढ़ी पहले संभवतः ठेठ जंगल रहे होंगे। खाद्य पदाथो± को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाने के लिए रेलवे का इस्तेमाल किया जाता था। रेल का नेटवकर् इसी काम के लिए बिछाया गया था। पानी के जहाशों से इसे दूसरे देशों में पहुँचाया जाता था। इन जहाशों पर दक्ष्िाण यूरोप, एश्िाया, अप्ऱफीका और कैरीबियाइर् द्वीपसमूह के मशदूरों से बहुत कम वेतन पर काम करवाया जाता था। गतिवििा फ्रलो चाटर् के माध्यम से दशार्इए कि जब बि्रटेन ने खाद्य पदाथो± के आयात का निणर्य लिया तो उसके कारण अमेरिका और आॅस्टेªलिया की ओर पलायन करने वालों की संख्या क्यों बढ़ने लगी? गतिवििा कल्पना कीजिए कि आप आयरलैंड से अमेरिका में आए एक खेत मशदूर हैं। इस बारे में एक पैराग्राप़्ाफ लिख्िाए विफ आपने यहाँ आने का प़्ौफसला क्यों किया और अब आप अपनी रोशी - रोटी कमाने के लिए क्या करते हैं। बहुत छोटे पैमाने पर ही सही लेकिन इसी तरह के नाटकीय बदलाव हम अपने यहाँ पंजाब में भी देख सकते हैं। यहाँ बि्रटिश भारतीय सरकार ने अ(र् - रेगिस्तानीपरती जमीनों को उपजाऊ बनाने के लिए नहरों का जाल बिछा दिया ताकि नियार्त के लिए गेहूँ और कपास की खेती की जा सके। नयी नहरों की सिंचाइर् वाले इलाव़्ाफों में पंजाब के अन्य स्थानों के लोगों को लाकर बसाया गया। उनकी बस्ितयों को केनाल काॅलोनी ;नहर बस्तीद्ध कहा जाता था। भोजन तो सिप़र्फ एक उदाहरण मात्रा है। कुछ ऐसी ही कहानी कपास की भी रही है जिसकी दुनिया भर में बड़े पैमाने पर खेती की जाने लगी थी ताकि बि्रटिश कपड़ा मिलों की माँग को पूरा किया जा सके। रबड़की कहानी भी इससे अलग नहीं है। विभ्िान्न चीजों के उत्पादन में विभ्िान्न इलाव़्ाफों ने इतनी महारत हासिल कर ली थी कि 1820 से 1914 के बीच विश्व व्यापार में 25 से 40 गुना वृि हो चुकी थी। इस व्यापार में लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा‘प्राथमिक उत्पादों’ यानी गेहूँ और कपास जैसे कृष्िा उत्पादों तथा कोयले जैसे खनिज पदाथो± का था। 2.2 तकनीक की भूमिका इस घटनाक्रम में तकनीक की क्या भूमिका रही? रेलवे, भाप के जहाश, टेलिग्राप़्ाफ, ये सब तकनीकी बदलाव बहुत महत्त्वपूणर् रहे। उनके बिना उन्नीसवीं सदी में आए परिवतर्नों की कल्पना नहीं की जा सकती थी। तकनीकी प्रगति अकसर चैतरप़्ाफा सामाजिक, राजनीतिक और आथ्िार्क कारकों का परिणाम भी होती है। उदाहरण के लिए, औपनिवेशीकरण के कारण यातायात और परिवहन साधनों में भारी सुधार किए गए। तेश चलने वाली रेलगाडि़याँ बनीं, बोगियों का भार कम किया गया, जलपोतों का आकार बढ़ा जिससे किसी भी उत्पाद को खेतों से दूर - दूर के बाशारों में कम लागत पर और श्यादा आसानी से पहुँचाया जा सके। चित्रा 8 - द स्िमथप़्ाफील्ड क्लब पशु बाशार, 1851, इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज़। मेलों में किसान अपने पालतू जानवर लाते थे जिनकी वहाँ ख़रीद - प़्ाफरोख़्त की जाती थी। स्िमथपफील्ड में लंदन का सबसे पुराना पशु बाशार था। उन्नीसवीं सदी के मध्य में स्िमथपफील्ड के पास एक विशाल मुगीऱ्एवं मांस बाशार खोला गया था जहाँ से देश के सभी बड़े मांस आपूतिर् केंद्रों को रेलवे लाइनें जाती थीं। मांस उत्पादों के व्यापार से इस प्रिया का अच्छा अंदाशा मिलता है। 1870 के दशक तक अमेरिका से यूरोप को मांस का नियार्त नहीं किया जाता था। उस समय केवल जिंदा जानवर ही भेजे जाते थे जिन्हें यूरोप ले जाकर ही काटा जाता था। लेकिन िांदा जानवर बहुत श्यादा जगह घेरते थे। बहुत सारे तो लंबे सप़्ाफर में मर जाते थे या बीमार पड़ जाते थे। बहुतों का वशन गिर जाता था या वे खाने के लायक नहीं रह जाते थे। इसी वजह से मांस खाना एक मँहगा सौदा था और यूरोप के गरीबों की पहुँच से बाहर था। दूसरी तरपफ,़़ऊँची कीमतों के कारण मांस उत्पादों की माँग और उत्पादन भी कम रहता था। नयी तकनीक के आने पर यह स्िथति बदल गइर्। पानी के जहाशों में रेपि्ऱफजरेशन की तकनीक स्थापित कर दी गइर् जिससे जल्दी खराब होने वाली चीशों को भी लंबी यात्राओं पर ले जाया जा सकता था। इसके बाद तो जानवरों को यात्रा से पहले ही मारा जाने लगा। अमेरिका, आॅस्ट्रेलिया या न्यूजीलैंड, सब जगह से जानवरों की बजाय उनका मांस ही यूरोप भेजा जाने लगा। इससे न केवल समुद्री यात्रा में आने वाला खचार् कम हो गया बल्िक यूरोप में मांस के दाम भी गिर गए। यूरोप के गरीबों को श्यादा विविधतापूणर् खुराक मिलने लगी। पहले उनके पास सिप़्ार्फ आलू और ब्रेड होते थे। अब बहुत सारे लोगों के भोजन में मांसाहार ;और मक्खन व अंडेद्ध भी शामिल हो गया। जीवनस्िथति सुधरी तो देश में शांति स्थापित होने लगी और दूसरे देशों में साम्राज्यवादी मंसूबों को समथर्न मिलने लगा। 2.3 उन्नीसवीं सदी के आख्िार में उपनिवेशवाद उन्नीसवीं शताब्दी के आख्िारी दशकों में व्यापार बढ़ा और बाशार तेशी से पफैलने लगे। यह केवल पफैलते व्यापार और संपन्नता का ही दौर नहीं था। हमें इस प्रिया के स्याह पक्ष को भी नशरअंदाश नहीं करना चाहिए। व्यापार में इशाप़्ोफ और विश्व अथर्व्यवस्था के साथ निकटता का एक परिणाम यह हुआ कि दुनिया के बहुत सारे भागों में स्वतंत्राता और आजीविका के साधन छिनने लगे। उन्नीसवीं सदी के आख्िारी दशकों में यूरोपीयों की विजयों से बहुत सारे कष्टदायक आथ्िार्क, सामाजिक और पारिस्िथतिकीय परिवतर्न आए और औपनिवेश्िाक समाजों को विश्व अथर्व्यवस्था में समाहित कर लिया गया। शरा अप्ऱफीका के मानचित्रा को देख्िाए। आप पाएँगे कि वहाँ के कुछ देशों की सीमाएँ तो बिलकुल सीधी लकीर जैसी हैं मानो उन्हें पुफट्टा ;ैबंसमद्ध रखकर खींचा गया हो। दुभार्ग्यवश, यही हुआ भी था। अप्ऱफीका पर व़्ाफब्शे की कोश्िाश में लगी प्रतिद्वंद्वी यूरोपीय ताव़्ाफतों ने अपने - अपने इलाके बाँटने के लिए प्रायः इसी तरीके का सहारा लिया था। 1885 में यूरोप के ताकतवर देशों की बलिर्न में एक बैठक हुइर् जिसमें अप्ऱफीका के नक़्शे पर इसी तरह लकीरें खींचकर उसको आपस में बाँट लिया गया था। उन्नीसवीं सदी के आख्िार में बि्रटेन और प्ऱफंास ने अपने शासन वाले विदेशी क्षेत्रापफल में भारी वृि कर ली थी। बेल्िजयम और जमर्नी नयी औपनिवेश्िाक ताव़्ाफतों के रूप में सामने आए। पहले स्पेन के कब्शे में रह चुके कुछ उपनिवेशों पर व़्ाफब्शा करके 1890 के दशक के आख्िारी वषो± में संयुक्त राज्य अमेरिका भी औपनिवेश्िाक ताव़्ाफत बन गया। आइए देखें कि उपनिवेशवाद से औपनिवेश्िाक समाजों की अथर्व्यवस्था और रोशी - रोटी के साधनों पर क्या असर पड़ा। बाॅक्स 2 मध्य अप्ऱफीका में सर हेनरी माॅटर्न स्टैनली स्टैनली एक पत्राकार और खोजी थे। न्यूयाॅकर् हैरल्ड ने उन्हें कइर् साल पहले अप्ऱफीका गए लिविंग्स्टन नामक मिशनरी की खोज करने के लिए भेजा था। उस शमाने के अन्य यूरोपीय और अमेरिकी अन्वेषकों की भाँति स्टैनली भी हथ्िायारों से लैस होकर गए थे। उन्होंने वहाँ जाकर स्थानीय श्िाकारियों, यो(ाओं और मजदूरों को इकट्ठा किया, स्थानीय कबीलों के साथ लड़ाइयाँ लड़ीं, अप्ऱफीकी भूदृश्य की पड़ताल की और विभ्िान्न इलाकों के नक़्शे बनाए। बाद में इन खोजों और अन्वेषणों से अप्ऱफीका को जीतने में मदद मिली। ऐसे भौगोलिक अन्वेषण केवल वैज्ञानिक जानकारियाँ इकट्ठा करने की सामान्य इच्छा से पे्ररित नहीं होते थे। उनका साम्राज्यवादी योजनाओं से सीधा संबंध होता था। 2.4 रिंडरपेस्ट या मवेशी प्लेग अप्ऱफीका में 1890 के दशक में रिंडरपेस्ट नामक बीमारी बहुत तेशी से पफैल गइर्। मवेश्िायों में प्लेग की तरह पफैलने वाली इस बीमारी से लोगों की आजीविका और स्थानीय अथर्व्यवस्था पर गहरा असर पड़ा। यह इस बात का अच्छा उदाहरण है कि औपनिवेश्िाक समाजों पर यूरोपीय साम्राज्यवादी ताव़्ाफतों के प्रभाव से बड़े पैमाने पर क्या असर पड़े। इस उदाहरण से पता चलता है कि हमलों और विजयों के इस युग में दुघर्टनावश पफैल गइर् मवेश्िायों की बीमारी ने भी हशारों लोगों का जीवन व भाग्य बदल कर रख दिया और दुनिया के साथ उनके संबंधों को नयी शक्ल में ढाल दिया। प्राचीन काल से ही अप्ऱफीका में शमीन की कभी कोइर् कमी नहीं रही जबकि वहाँ की आबादी बहुत कम थी। सदियों तक अप्ऱफीकियों की ¯शदगी व कामकाज शमीन और पालतू पशुओं के सहारे ही चलता रहा है। वहाँ पैसे या वेतन पर काम करने का चलन नहीं था। उन्नीसवीं सदी के आख्िार में अप्ऱफीका में ऐसे उपभोक्ता सामान बहुत कम थे जिन्हें वेतन के पैसे से खरीदा जा सकता था। अगर आप अप्ऱफीका के किसान होते और आपके पास शमीन और पालतू पशु होते - जिनकी वहाँ कोइर् कमी नहीं थी - तो शायद आपको भी यह बात समझ में नहीं आती कि वेतन के लिए काम करने की क्या शरूरत है। उन्नीसवीं सदी के आख्िार में यूरोपीय ताव़्ाफतें अप्ऱफीका के विशाल भूक्षेत्रा और खनिज भंडारों को देखकर इस महाद्वीप की ओर आकष्िार्त हुइर् थीं। यूरोपीय लोग अप्ऱफीका में बागानी खेती करने और खदानों का दोहन करना चाहते थे ताकि उन्हें वापस यूरोप भेजा जा सके। लेकिन वहाँ एक ऐसी समस्या पेश आइर् जिसकी उन्हें उम्मीद नहीं थी। वहाँ के लोग तनख़्वाह पर काम नहीं करना चाहते थे। मशदूरों की भतीर् और उन्हें अपने पास रोके रखने के लिए मालिकों ने बहुत सारे हथकंडे आशमा कर देख लिए लेकिन बात नहीं बनी। उन पर भारी भरकम कर लाद दिए गए जिनका भुगतान केवल तभी किया जा सकता था विल्ज नदी को पार करना ट्रांसवाल की सोना खदानों तक पहँुचने का सबसे छोटा और आसान रास्ता था। विट्वाॅटसर्रेंड में सोने की खोज के बाद तो बीमारियों और मौत की आश्ंाका व रास्ते की कठिनाइयों के बावजूद यूरोप के लोग उस इलाव़्ोफ की ओर दौड़ पड़े थे। 1890 के दशक तक आते - आते दुनिया भर के सोना उत्पादन में अप्ऱफीका का हिस्सा 20 प्रतिशत सेभी ऊपर जा चुका था। जब करदाता बागानों या खदानों में काम करता हो। काश्तकारों को उनकीशमीन से हटाने के लिए उत्तरािाकार कानून भी बदल दिए गए। नए व़्ाफानून में यह व्यवस्था कर दी गइर् कि अब परिवार के केवल एक ही सदस्य कोपैतृक संपिा मिलेगी। इस व़्ाफानून के शरिए परिवार के बाव़्ाफी लोगों को श्रम बाशार में ढकेलने का प्रयास किया जाने लगा। खानकमिर्यों को बाड़ों में बंद कर दिया गया। उनके खुलेआम घूमने - पिफरने पर पाबंदी लगा दी गइर्। तभी वहाँ रिंडरपेस्ट नामक विनाशकारी पशु रोग पफैल गया। अप्ऱफीका में रिंडरपेस्ट नाम की बीमारी सबसे पहले 1880 के दशक के आख्िारी सालों में दिखाइर् दी। उस समय पूवीर् अप्ऱफीका में एरिटिªया पर हमला कर रहे इतालवी सैनिकों का पेट भरने के लिए एश्िायाइर् देशों से जानवर लाए जाते थे। यह बीमारी बि्रटिश अिापत्य वाले एश्िायाइर् देशों से आए उन्हीं जानवरों के शरिए यहाँ पहँुची थी। अप्ऱफीका के पूवीर् हिस्से से महाद्वीप में दाख्िाल होने वाली यह बीमारी ‘जंगल की आग’ की तरह पश्िचमी अप्ऱफीका की तरप़्ाफ बढ़ने लगी। 1892 में यह अप्ऱफीका के अटलांटिक तट तक जा पहँुची। पाँच साल बाद यह केप ;अप्ऱफीका का धुर दक्ष्िाणी हिस्साद्ध तक भी पहँुच गइर्। रिंडरपेस्ट ने अपने रास्ते में आने वाले 90 प्रतिशत मवेश्िायों को मौत की नींद सुला दिया। पशुओं के खत्म हो जाने से तो अप्ऱफीकियों के रोशी - रोटी के साधन ही खत्महो गए। अपनी सत्ता को और मशबूत करने तथा अप्ऱफीकियों को श्रम बाशार में ढकेलने के लिए वहाँ के बागान मालिकों, खान मालिकों और औपनिवेश्िाक सरकारों ने बचे - खुचे पशु भी अपने व़्ाफब्शे में ले लिए। बचे - खुचे पशु संसाधनों पर व़्ाफब्शे से यूरोपीय उपनिवेशकारों को पूरे अप्ऱफीका को जीतने व ग़़्ाुलाम बना लेने का बेहतरीन मौवफा हाथ लग गया था। उन्नीसवीं सदी की दुनिया के अन्य भागों पर पश्िचमी आक्रमण और विजय के परिणामों की ऐसी ही और भी कहानियाँ देखी जा सकती हैं। 2.4 भारत से अनुबंिात श्रमिकों का जाना भारत से अनुबंिात ;गिरमिटियाद्ध श्रमिकों को ले जाया जाना भी उन्नीसवीं सदी की दुनिया की विविधता को प्रतिबिंबित करता है। यह तेश आथ्िार्क वृि के साथ - साथ जनता के कष्टों में वृि, कुछ लोगों की आय में वृि और दूसरों के लिए बेहिसाब गरीबी, कुछ क्षेत्रों में भारी तकनीकी प्रगति और दूसरे क्षेत्रों में उत्पीड़न के नए रूपों की इर्जाद की दुनिया थी। उन्नीसवीं सदी में भारत और चीन के लाखों मजदूरों को बागानों, खदानों और सड़क व रेलवे निमार्ण परियोजनाओं में काम करने के लिए दूर - दूर के देशों में ले जाया जाता था। भारतीय अनुबंिात श्रमिकों को खास तरह के अनुबंध या एग्रीमेंट के तहत ले जाया जाता था। इन अनंबुधों में यह शतर् होती थी कि यदि मशदूर अपने मालिक के बागानों में पाँच साल काम कर लेंगे तो वे स्वदेश लौट सकते हैं। भारत के श्यादातर अनुबंिात श्रमिक मौजूदा पूवीर् उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य भारत और तमिलनाडु के सूखे इलाव़्ाफों से जाते थे। उन्नीसवीं सदी के मध्य में इन इलाव़्ाफों में भारी बदलाव आने लगे थे। कुटीर उद्योग खत्म हो रहे थे, शमीन का भाड़ा बढ़ गया था, खानों और बागानों के लिए शमीनों को सापफ किया जा रहा था। इन परिवतर्नों से़गरीबों के जीवन पर गहरा असर पड़ा। वे बँटाइर् पर शमीन तो ले लेते थे लेकिन उसका भाड़ा नहीं चुका पाते थे, उन पर व़्ाफशार् चढ़ने लगा। काम की तलाश में उन्हें अपने घर - बार छोड़ने पड़े। भारतीय अनुबंिात श्रमिकों को मुख्य रूप से कैरीबियाइर् द्वीप समूह ;मुख्यतः त्रिानिदाद, गुयाना और सुरीनामद्ध, माॅरिशस व प्िा़फजी ले जाया जाता था। तमिल आप्रवासी सीलोन और मलाया जाकर काम करते थे। बहुत सारे अनुबंिात श्रमिकों को असम के चाय बागानों में काम करवाने के लिए भी ले जाया जाता था। मशदूरों की भतीर् का काम मालिकों के एजेंट किया करते थे। एजेंटों को कमीशन मिलता था। बहुत सारे आप्रवासी अपने गाँव में होने वाले उत्पीड़न और गरीबी से बचने वेफ़लिए भी इन अनुबंधों को मान लेते थे। एजेंट भी भावी आप्रवासियों को पफुसलाने के लिए झूठी जानकारियाँ देते थे। कहाँ जाना है, यात्रा के साधन क्या होंगे, क्या काम करना होगा, और नयी जगह पर काम व जीवन के हालात कैसे होंगे, इस बारे में उन्हें सही जानकारी नहीं दी जाती थी। बहुत सारे आप्रवासियों को तो यह भी नहीं बताया जाता था कि उन्हें लंबी समुद्री यात्रा पर जाना है। अगर कोइर् मशदूर अनुबंध के लिए राजी नहीं होता था तो एजेंट उसका अपहरण तक कर लेते थे। उन्नीसवीं सदी की इस अनुबंध व्यवस्था को बहुत सारे लोगों ने ‘नयी दास प्रथा’ का भी नाम दिया है। बागानों में या कायर्स्थल पर पहुँचने के बाद मशदूरों को पता चलता था कि वे जैसी उम्मीद कर रहे थे यहाँ वैसे हालात नहीं हैं। नयी जगह की जीवन एवं कायर् स्िथतियाँ कठोर थीं और मशदूरों के पास व़्ाफानूनी अिाकार कहने भर को भी नहीं थे। इसके बावजूद मशदूरों ने भी िंादगी बसर करने के अपने तरीव़्ाफे ढूँढ़ निकाले। बहुत सारे तो भाग कर जंगलों में ही चले गए। अगर ऐसे मशदूर पकड़े जाते तो उन्हें भारी सज़ा दी जाती थी।बहुतों ने अपनी पुरानी और नयी संस्कृतियों का सम्िमश्रण करते हुए व्यक्ितगत और सामूहिक आत्माभ्िाव्यक्ित के नए रूप खोज लिए। त्रिानिदाद में मुहरर्म के सालाना जुलूस को एक विशाल उत्सवी मेले का रूप दे दिया गया। इस मेले को ‘होसे’ ;इमाम हुसैन के नाम परद्ध नाम दिया गया। उसमें सभी धमो± व नस्लों के मशदूर हिस्सा लेते थे। इसी प्रकार रास्तापफारियानवाद ;त्ंेजंितपंदपेउद्ध नामक विद्रोही धमर् ;जिसे जमैका के रैगे गायक बाॅब मालेर् ने ख्याति के श्िाखर पर पहुँचा दियाद्ध में भी भारतीय आप्रवासियों और कैरीबियाइर् द्वीपसमूह के बीच इन संबंधों की झलक देखी जा सकती है। त्रिानिदाद और गुयाना में मशहूर ‘चटनी म्यूजि़क’ भी भारतीय आप्रवासियों के वहाँ पहुँचने के बाद सामने आइर् रचनात्मकअभ्िाव्यक्ितयों का ही उदाहरण है। सांस्कृतिक समागम के ये स्वरूप एक नयी वैश्िवक दुनिया के उदय की प्रिया का अंग थे। यह ऐसी प्रिया थी जिसमें अलग - अलग स्थानों की चीशें आपस में घुल - मिल जाती थीं, उनकी मूल पहचान और विश्िाष्टताएँ गुम हो जाती थीं और बिलवुफल नया रूप सामने आता था। चचार् करें राष्ट्रीय पहचान के निमार्ण में भाषा और लोक परंपराओं केमहत्त्व पर चचार् करें। श्यादातर अनुबंिात श्रमिक अनुबंध समाप्त हो जाने के बाद भी वापस नहीं लौटे। जो वापस लौटे उनमें से भी अिाकांश केवल कुछ समय यहाँ बिता कर पिफर अपने नए ठिकानों पर वापस चले गए। इसी कारण इन देशों में भारतीय मूल के लोगों की संख्या बहुत श्यादा पाइर् जाती है। क्या आपने नोबेल पुरस्कार विजेता साहित्यकार वी.एस.नायपाॅल का नाम सुना है? आपमें से कुछ लोगों ने वेस्ट इंडीश के िकेट ख्िालाड़ी श्िावनरैन चंद्रपाॅल और रामनरेश सरवन का नाम भी सना ुही होगा। क्या आपको कभी ऐसा लगता है कि उनके नाम हम भारतीयों जैसे क्यों हैं? इसकी वजह यही है कि वे भारत से गए अनुबंिात मजदूरों के ही वंशज हैं। बीसवीं सदी के शुरुआती सालों से ही हमारे देश के राष्ट्रवादी नेता इस प्रथा का विरोध करने लगे थे। उनकी राय में यह बहुत अपमानजनक और क्रूर व्यवस्था थी। इसी दबाव के कारण 1921 में इसे खत्म कर दिया गया। लेकिन इसके बाद भी कइर् दशक तक भारतीय अनुबंिात मजदूरों के वंशज कैरीबियाइर् द्वीप समूह में बेचैन अल्पसंख्यकों का जीवन जीते रहे। वहाँ के लोग उन्हें ‘कुली’ मानते थे और उनके ड्डोत - कसाथ कुलियों जैसा बतार्व करते थे। नायपाॅल के कुछ प्रारंभ्िाक उपन्यासों में विछोह और परायेपन के इस अहसास को खूब देखा जा सकता है। 2.5 विदेश में भारतीय उद्यमी विश्व बाशार के लिए खाद्य पदाथर् व पफसलें उगाने के वास्ते पूँजी की़आवश्यकता थी। बड़े बागानों के लिए तो बाशार और बैंकों से पैसा लिया जा सकता था। लेकिन छोटे - मोटे किसानों का क्या होता? यहीं से देशी साहूकार और महाजन दृश्य में आते हैं। क्या आपने श्िाकारीपूरी श्राॅपफ और नट्टूकोट्टइर् चेटि्टयारों के बारे में सुना है? ये उन बहुत सारे बैंकरों और व्यापारियों में से थे जो मध्य एवं दक्ष्िाण पूवर् एश्िाया में नियार्तोन्मुखी खेती के लिए कशेर् देते थे। इसके लिए वे या तो अपनी जेब से पैसा लगाते थे या यूरोपीय बैंकों से कशेर् लेते थे। उनके पास दूर - दूर तक पैसे पहुँचाने की एक व्यवस्िथत प(ति होती थी। यहाँ तक कि उन्होंने व्यावसायिक संगठनों और ियाकलापों के देशी स्वरूप भी विकसित कर लिए थे। अप्ऱफीका में यूरोपीय उपनिवेशकारों के पीछे - पीछे भारतीय व्यापारी और महाजन भी जा पहुँचे। हैदराबादी सिंधी व्यापारी तो यूरोपीय उपनिवेशों से भी आगे तक जा निकले। 1860 के दशक से उन्होंने दुनिया भर के बंदरगाहों पर अपने बड़े - बड़े एम्पोरियम खोल दिए। इन दुकानों में सैलानियों को आकषर्क स्थानीय और विदेशी चीशें मिलती थीं। यह एक पफलता - पफूलता कारोबार था क्योंकि सुरक्ष्िात और आरामदेह जलपोतों के आ जाने से सैलानियों की संख्या भी दिनोंदिन बढ़ने लगी थी। 2.6 भारतीय व्यापार, उपनिवेशवाद और वैश्िवक व्यवस्था भारत में पैदा होने वाली महीन कपास का यूरोपीय देशों को नियार्त किया जाता था। औद्योगीकरण के बाद बि्रटेन में भी कपास का उत्पादन बढ़ने लगा था। इसी कारण वहाँ के उद्योगपतियों ने सरकार पर दबाव डाला कि वह कपास के आयात पर रोक लगाए और स्थानीय उद्योगों की रक्षा करे। पफलस्वरूप, इर्स्ट इंडिया वंफपनी के दुनिया भर में चलने वाले कायो± का वेंफद्र यहीं था। बि्रटेन में आयातित कपड़ों पर सीमा शुल्क थोप दिए गए। वहाँ महीन भारतीय कपास का आयात कम होने लगा। उन्नीसवीं शताब्दी की श्ुारुआत से ही बि्रटिश कपड़ा उत्पादक दूसरे देशों में भी अपने कपड़े के लिए नए - नए बाशार ढूँढ़ने लगे थे। सीमा शुल्क की व्यवस्था के कारण बि्रटिश बाशारों से बेदखल हो जाने के बाद भारतीय कपड़ों को दूसरे अंतरार्ष्ट्रीय बाशारों में भी भारी प्रतिस्पधार् का सामना करना पड़ा। यदि भारतीय नियार्त के आँकड़ों का अध्ययन करें तो पता चलता है कि सूती कपड़े के नियार्त में लगातार गिरावट का ही रुझान दिखाइर् देता है। सन् 1800 के आसपास नियार्त में सूती कपड़े का प्रतिशत 30 था जो 1815 में घट कर 15 प्रतिशत रह गया। 1870 तक तो यह अनुपात केवल 3 प्रतिशत रह गया था। तो पिफर भारत ने किन चीशों का नियार्त किया? आँकड़ों के माध्यम से पिफर एक नाटकीय कहानी सामने आती है। निमिर्त वस्तुओं का नियार्त घटता जा रहा था और उतनी ही तेशी से कच्चे मालों का नियार्त बढ़ता जा रहा था। 1812 से 1871 के बीच कच्चे कपास का नियार्त 5 प्रतिशत से बढ़ कर 35 सत्राहवीं सदी के दौरान और अठारहवीं सदी के शुरुआती सालों में सूरत पश्िचमी भारत से होने वाले समुद्री व्यापार का मुख्य वेंफद्र रहा। प्रतिशत तक पहुँच गया था। कपड़ों की रँगाइर् के लिए इस्तेमाल होने वाले नील का भी कइर् दशक तक बड़े पैमाने पर नियार्त होता रहा। जैसा कि आपने पिछली कक्षा में पढ़ा ही था, 1820 के दशक से चीन को बड़ी मात्रा में अपफीम का ़नियार्त भी किया जाने लगा। कुछ समय तक तो भारतीय नियार्त में अप़्ाफीम का हिस्सा ही सबसे श्यादा रहा। बि्रटेन की सरकार भारत में अप़्ाफीम की खेती करवाती थी और उसे चीन को नियार्त कर देती थी। अप़फीम के नियार्त से जो पैसा मिलता था उसके बदले चीन से ही चाय और दूसरे पदाथो± का आयात किया जाता था। उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय बाशारों में बि्रटिश औद्योगिक उत्पादों की बाढ़ ही आ गइर् थी। भारत से बि्रटेन और शेष विश्व को भेजे जाने वाले खाद्यान्न व कच्चे मालों के नियार्त में इशाप़्ाफा हुआ। बि्रटेन से जो माल भारत भेजा जाता था उसकी कीमत भारत से बि्रटेन भेजे जाने वाले माल की कीमत से बहुत श्यादा होती थी। भारत के साथ बि्रटेन हमेशा ‘व्यापार अिाशेष’ की अवस्था में रहता था। इसका मतलब है कि आपसी व्यापार में हमेशा बि्रटेन को ही प़्ाफायदा रहता था। बि्रटेन इस मुनाप़्ोफ के सहारे दूसरे देशों के साथ होने वाले व्यापारिक घाटे की भरपाइर् कर लेता था। बहुपक्षीय बंदोबस्त ऐसे ही काम करता है। इसमें एक देश के मुकाबले दूसरे देश को होने वाले घाटे की भरपाइर् किसी तीसरे देश के साथ व्यापार में मुनाप़्ाफा कमा कर की जाती है। बि्रटेन के घाटे की भरपाइर् में मदद देते हुए भारत ने उन्नीसवीं सदी की विश्व अथर्व्यवस्था का रूप तय करने में एक अहम भूमिका अदा की थी। बि्रटेन के व्यापार से जो अध्िशेष हासिल होता था उससे तथाकथ्िात ‘होम चाजेर्श’ ;देसी खचेर्द्ध का निबटारा होता था। इसके तहत बि्रतानी अप़्ाफसरों और व्यापारियों द्वारा अपने घर में भेजी गइर् निजी रकम, भारतीय बाहरी वफशेर् पर ब्याज ़और भारत में काम कर चुके बि्रतानी अप़्ाफसरों की पेंशन शामिल थी। 3 महायु(ों के बीच अथर्व्यवस्था पहला महायु( मुख्य रूप से यूरोप में ही लड़ा गया। लेकिन उसके असर सारी दुनिया में महसूस किए गए। इस अध्याय में हम जिन चीशों पर विचारकर रहे हैं उनकी दृष्िट से एक महत्त्वपूणर् प्रभाव यह रहा है कि इस यु( ने विश्व अथर्व्यवस्था को एक ऐसे संकट में ढकेल दिया जिससे उबरने में दुनिया को तीन दशक से भी श्यादा समय लग गया। इस दौरान पुरी दुनिया में चैतरपफा आथ्िार्क एवं राजनीतिक अस्िथरता बनी रही और अंत में मानवता़एक और विनाशकारी महायु( के नीचे कराहने लगी। 3.1 यु(कालीन रूपांतरण जैसा कि आप जानते ही हैं, पहला विश्वयु( दो खेमों के बीच लड़ा गया था। एक पाले में मित्रा राष्ट्र यानी बि्रटेन, प्ऱफांस और रूस थे तो दूसरे पाले में केंद्रीय शक्ितयाँ यानी जमर्नी, आॅस्िट्रया - हंगरी और आॅटोमन तुकीर् थे। अगस्त 1914 में जब यु( शुरू हुआ उस समय बहुत सारी सरकारों को यही लगता था कि यह यु( श्यादा से श्यादा िसमस तक खत्म हो जाएगा। पर यह यु( तो चार साल से भी श्यादा समय तक चलता रहा। मानव सभ्यता के इतिहास में ऐसा भीषण यु( पहले कभी नहीं हुआ था। इस यु( में दुनिया के सबसे अगुआ औद्योगिक राष्ट्र एक - दूसरे से जूझ रहे थे और शत्राुओं को नेस्तनाबूद करने के लिए उनके पास बेहिसाब आधुनिक औद्योगिक शक्ित इकट्ठा हो चुकी थी। यह पहला आधुनिक औद्योगिक यु( था। इस यु( में मशीनगनों, टैंकों, हवाइर् जहाशों और रासायनिक हथ्िायारों का भयानक पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। ये सभी चीशें आधुनिक विशाल उद्योगों की देन थीं। यु( के लिए दुनिया भर से असंख्य सिपाहियों की भतीर् की जानी थी और उन्हें विशाल जलपोतों व रेलगाडि़यों में भर कर यु( के मोचो± पर ले जाया जाना था। इस यु( ने मौत और विनाश की जैसी विभ्िाष्िाका रची उसकी औद्योगिक युग से पहले और औद्योगिक शक्ित के बिना कल्पना नहीं की जा सकती थी। यु( में 90 लाख से श्यादा लोग मारे गए और 2 करोड़ घायल हुए। मृतकों और घायलों में से श्यादातर कामकाजी उम्र के लोग थे। इस महाविनाश के कारण यूरोप में कामकाज के लायक लोगों की संख्या बहुत कम रह गइर्। परिवार के सदस्य घट जाने से यु( के बाद परिवारों की आय भी गिर गइर्। यु( संबंधी सामग्री का उत्पादन करने के लिए उद्योगों का पुनगर्ठन किया गया। यु( की शरूरतों के मद्देनजर पूरे के पूरे समाजों को बदल दिया गया। मदर् मोचेर् पर जाने लगे तो उन कामों को सँभालने के लिए घर की औरतों को बाहर आना पड़ा जिन्हें अब तक केवल मदो± का ही काम माना जाता था। यु( के कारण दुनिया की कुछ सबसे शक्ितशाली आथ्िार्क ताव़्ाफतों के बीच आथ्िार्क संबंध टूट गए। अब वे देश एक - दूसरे से बदला लेने पर उतारू थे। इस यु( के लिए बि्रटेन को अमेरिकी बैंकों और अमेरिकी जनता से भारी व़्ाफशार् लेना पड़ा। पफलस्वरूप, इस यु( ने अमेरिका को व़्ाफशर्दार की बजाय कशर्दाता देश बना दिया। कहने का आशय यह है कि यु( के बाद दूसरे देशों में अमेरिका व उसकेनागरिकों की संपिायों की कीमत अमेरिका में दूसरे देशों की सरकारों या उन नागरिकों के स्वामित्व अथवा नियंत्राण वाली संपदाओं से कहीं श्यादा हो चुकी थी। 3.2 यु(ोत्तर सुधार यु( के बाद आथ्िार्क स्िथति को पटरी पर लाने का रास्ता काप़्ाफी मुश्िकल साबित हुआ। यु( से पहले बि्रटेन दुनिया की सबसे बड़ी अथर्व्यवस्था था। यु( के बाद सबसे लंबा संकट उसे ही झेलना पड़ा। जिस समय बि्रटेन यु( से जूझ रहा था उसी समय भारत और जापान में उद्योग विकसित होने लगे थे। यु( के बाद भारतीय बाशार में पहले वाली वचर्स्वशाली स्िथति प्राप्त करना बि्रटेन के लिए बहुत मुश्िकल हो गया था। अब उसे जापान से भी मुव़्ाफाबला करना था, सो अलग। यु( के खचेर् की भरपाइर् करने के लिए बि्रटेन ने अमेरिका से जम कर व़्ाफशेर् लिए थे। इसका परिणाम यह हुआ कि यु( खत्म होने तक बि्रटेन भारी विदेशी व़्ाफशो± में दब चुका था। यु( के कारण आथ्िार्क उछाह का माहौल पैदा हो गया था क्योंकि माँग, उत्पादन और रोशगारों में भारी इशाप़्ाफा हुआ था। पर जब यु( के कारण पैदा हुआ उछाह शांत होने लगा तो उत्पादन गिरने लगा और बेरोशगारी बढ़ने लगी। दूसरी ओर सरकार ने भारी - भरकम यु( संबंधी व्यय में भी कटौती शुरू कर दी ताकि शांतिकालीन करों के सहारे ही उनकी भरपाइर् की जा सके। इन सारे प्रयासों से रोशगार भारी तादाद में खत्म हुए। 1921 में हर पाँच में से एक बि्रटिश मशदूर के पास काम नहीं था। रोशगार के बारे में बेचैनी औरअनिश्िचतता यु(ोत्तर वातावरण का अंग बन गइर् थी। बहुत सारी कृष्िा आधारित अथर्व्यवस्थाएँ भी संकट में थीं। उदाहरण के लिए, गेहूँ उत्पादकों की हालत पर ही विचार कीजिए। यु( से पहले पूवीर् यूरोप विश्व बाशार में गेहूँ की आपूतिर् करने वाला एक बड़ा केंद्र था। यु( के दौरान यह आपूतिर् अस्त - व्यस्त हुइर् तो कनाडा, अमेरिका और आॅस्ट्रेलिया में गेहूँ की पैदावार अचानक बढ़ने लगी। लेकिन जैसे ही यु( समाप्त हुआ पूवीर् यूरोप में गेहूँ की पैदावार सुधरने लगी और विश्व बाजारों में गेहूँ की अति के हालात पैदा हो गए। अनाज की कीमतें गिर गईं, ग्रामीण आय कम हो गइर् और किसान गहरे व़्ाफशर् संकट में पफँस गए। 3.3 बड़े पैमाने पर उत्पादन और उपभोग अमेरिका में सुधार की गति तेश रही। यह हम पहले ही देख चुके हैं कि यु( से अमेरिका की अथर्व्यवस्था को कितना प़्ाफायदा पहुँचा था। यु( के बाद कुछ समय के लिए तो अमेरिकी अथर्व्यवस्था को भी झटका लगा लेकिन बीस के दशक के शुरुआती सालों से ही अमेरिकी अथर्व्यवस्था तेशी से तरक्व़्ाफी के रास्ते पर बढ़ने लगी। 1920 के दशक की अमेरिकी अथर्व्यवस्था की एक बड़ी खासियत थी बृहत उत्पादन ;डंेे च्तवकनबजपवदद्ध का चलन। बृहत उत्पादन की ओर बढ़ने का सिलसिला तो उन्नीसवीं सदी के आख्िार में ही शुरू हो चुका था लेकिन 1920 के दशक में तो यह अमेरिकी औद्योगिक उत्पादन की विशेषता ही बन गया था। कार निमार्ता हेनरी प़्ाफोडर् बृहत उत्पादन के विख्यात प्रणेता थे। उन्होंने श्िाकागो के एक बूचड़खाने की असेंबली लाइन की तशर् पर डेट्राॅयट के अपने कार कारखाने में भी आधुनिक असेंबली लाइन स्थापित की थी। श्िाकागो के बूचड़खाने में मरे हुए जानवरों को एक कन्वेयर बेल्ट पर रख दिया जाता था और उसके दूसरे सिरे पर खड़े मांस विक्रेता अपने हिस्से का मांस उठा कर निकलते जाते थे। यह देख कर प़फोडर् को लगा कि गाडि़यों के उत्पादन के लिए भी असेंबली लाइन का तरीका समय और पैसे, दोनों के लिहाश से किपफायती साबित हो सकता है। असेंबली लाइन पर मजदूरों को एक ही काम - जैसे, कार के किसी खास पुशेर् को ही लगाते रहना - मशीनी ढंग से बार - बार करते रहनाहोता था। काम की रफ्ऱतार इस बात से तय होती थी कि कन्वेयर बेल्ट किसरफ्ऱतार से चलती है। यह काम की गति बढ़ाकर प्रत्येक मशदूर की उत्पादकता बढ़ाने वाला तरीका था। कन्वेयर बेल्ट के साथ खड़े होने के बाद कोइर् मशदूर अपने काम में ढील करने या कुछ पल के लिए भी अवकाश लेने का जोख्िाम नहीं उठा सकता था। और तो और, इस व्यवस्था में मशदूर अपने साथ्िायों के साथ बातचीत भी नहीं कर सकते थे। इसका नतीजा यह हुआ की हेनरी पफोडर् के कारखाने की असेंबली लाइन से हर तीन मिनट में एक कार तैयार होकरनिकलने लगी। इससे पहले की प(तियों के मुकाबले यह रफ्ऱतार कइर् गुना श्यादा थी। टी - माॅडल नामक कार बृहत उत्पादन प(ति से बनी पहली कार थी। शुरुआत में प़्ाफोडर् प़्ौफक्ट्री के मजदूरों को असेंबली लाइन पर पैदा होने वाली थकान झेलने में काप़्ाफी मुश्िकल महसूस हुइर् क्योंकि वे उसकी रफ्ऱतार को किसी भी तरह नियंत्रिात नहीं कर सकते थे। बहुत सारे मशदूरों ने काम छोड़ दिया। इस चुनौती से निपटने के लिए प़्ाफोडर् ने हताश होकर जनवरी 1914 से वेतन दोगुना यानी 5 डाॅलर प्रतिदिन कर दिया। साथ ही उन्होंने अपने कारखानों में ट्रेड यूनियन गतिवििायों पर भी पाबंदी लगा दी। तनख़्वाह बढ़ाने से हेनरी पफोडर् के मुनाप़्ोफ में जो कमी आइर् थी उसकी भरपाइऱ्करने के लिए वे अपनी असेंबली लाइन की रफ्ऱतार बार - बार बढ़ाने लगे। उनके मशदूरों पर काम का बोझ लगातार बढ़ता रहता था। अपने इस पफैसले़से पफोडर् बहुत संतुष्ट थे। कुछ समय बाद उन्होंने कहा था कि ‘लागत कम़करने के लिए’ अपनी ¯शदगी में उन्होंने इससे अच्छा प़्ाफैसला कभी नहीं लिया। प़्ाफोडर् द्वारा अपनाइर् गइर् उत्पादन प(तियों को जल्दी ही पूरे अमेरिका में अपनाया जाने लगा। बीस के दशक में ही यूरोप में भी उनकी नव़्ाफल की जाने 94 लगी। बृहत उत्पादन प(ति ने इंजीनियरिंग आधारित चीजों की लागत और कीमत में कमी ला दी। बेहतर वेतन के चलते अब बहुत सारे मशदूर भी कारजैसी टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुएँ खरीद सकते थे। 1919 में अमेरिका में 20 लाख कारों का उत्पादन होता था जो 1929 में बढ़कर 50 लाख कार प्रतिवषर्से भी ऊपर जा पहुँचा। इसके साथ ही बहुत सारे लोग पि़्रफज, वाॅश्िांग मशीन, रेडियो, ग्रामोप़्ाफोन प्लेयसर् आदि भी खरीदने लगे। ये सब चीजें ‘हायर - परचेज़’ व्यवस्था के तहत खरीदी जाती थीं। यानी लोग ये सारी चीजें व़फशेर् पर खरीदते थे और उनकी कीमत साप्ताहिक या मासिक किस्तों में चुकाइर् जाती थी। मकानों के निमार्ण और निजी मकानों की संख्या में वृि से भी पि़्रफज, वाॅश्िांग मशीन आदि उपकरणों की माँग में इशाप़्ाफा हुआ। उल्लेखनीय है कि घरों का निमार्ण या खरीदारी भी व़्ाफशेर् पर ही की जा रही थी। 1920 के दशक में आवास एवं निमार्ण क्षेत्रा में आए उछाल से अमेरिकी संपन्नता का आधार पैदा हो चुका था। मकानों के निमार्ण और घरेलू शरूरत की चीशों में निवेश से रोशगार और माँग बढ़ती थी तो दूसरी और उपभोग भी बढ़ता था। बढ़ते उपभोग के लिए और श्यादा निवेश की जरूरत थी जिससे और नए रोशगार व आमदनी में वृि होने लगती थी। 1923 में अमेरिका शेष विश्व को पूँजी का नियार्त दोबारा करने लगा और वह दुनिया में सबसे बड़ा वफशर्दाता देश बन गया। अमेरिका द्वारा आयात और पूँजी़नियार्त ने यूरोपीय अथर्व्यवस्थाओं को भी संकट से उबरने में मदद दी। अगले छह साल में विश्व व्यापार व आय वृि दर में काप़्ाफी सुधार आया। लेकिन यह स्िथति लंबे समय तक वफायम नहीं रह पाइर्। 1929 तक़आते - आते दुनिया एक ऐसे आथ्िार्क संकट में पँफस गइर् जिसका दुनिया ने पहले कभी अनुभव नहीं किया था। 3.4 महामंदी आथ्िार्क महामंदी की शुरुआत 1929 से हुइर् और यह संकट तीस के दशक के मध्य तक बना रहा। इस दौरान दुनिया के श्यादातर हिस्सों के उत्पादन, रोशगार, आय और व्यापार में भयानक गिरावट दजर् की गइर्। इस मंदी का समय और असर सब देशों में एक जैसा नहीं था लेकिन आमतौर पर ऐसामाना जा सकता है कि कृष्िा क्षेत्रों और समुदायों पर इसका सबसे बुरा असर पड़ा। ऐसा इसलिए हुआ था क्योंकि औद्योगिक उत्पादों की तुलना में खेतिहर उत्पादों की कीमतों में श्यादा भारी और श्यादा समय तक कमी बनी रही। इस महामंदी के कइर् कारण थे। यह हम पहले ही देख चुके हैं कि यु(ोत्तर विश्व अथर्व्यवस्था कितनी कमशोर थी। पहला कारण यह था कि कृष्िा क्षेत्रा में अतिउत्पादन की समस्या बनी हुइर् थी। कृष्िा उत्पादों की गिरती कीमतों के कारण स्िथति और खराब हो गइर् थी। कीमतें गिरीं और किसानों की आय घटने लगी तो आमदनी बढ़ाने के लिए किसान उत्पादन बढ़ाने का प्रयास करने लगे ताकि कम कीमत पर ही सही लेकिन श्यादा माल पैदा करके वे अपना आय स्तर बनाए रख सकें। बाॅक्स 3 यह चित्रा लेने वाली डाॅरोथी लेंग ने इस भूखी माँ के साथ अपनी मुलाकात के क्षणों को याद करते हुए बहुत साल बाद कहा था μ ‘मैंने इस भूखी, लाचार औरत को देखा और मानो किसी चुंबक से ख्िांची मैं उसकी ओर बढ़ती चली गइर्...। मैंने न तो उसका नाम पूछा न उसके अतीत के बारे में सवाल किए। उसने मुझे अपनी उम्र बताइर्। उसने कहा कि उसकी उम्र पैंतीस साल है। उसने कहा कि वे लोग ;यानी माँ और उसके सात बच्चेद्ध आसपास के खेतों में जाड़ों से जमी पड़ी सब्िशयों और उन परिंदों के सहारे जिंदा हैं जिन्हें उसके बच्चे मार लाते हैं...। वो वहाँ बैठी थी... अपने बच्चों को चिपटाए, शायद उसे लगता था कि मेरी तसवीर उसकी कोइर् मदद कर सकती है इसलिए उसने मेरी मदद कर दी...।’ ड्डोत: पाॅपुलर प़़़्ाफोटोग्रापफी, पफरवरी 1960 पफलस्वरूप, बाशार में कृष्िा उत्पादों की आमद और भी बढ़ गइर्। जाहिर है, कीमतेंऔर नीचे चली गईं। खरीदारों के अभाव में कृष्िा उपज पड़ी - पड़ी सड़ने लगी। दूसरा कारण: 1920 के दशक के मध्य में बहुत सारे देशों ने अमेरिका से व़्ाफशेर् लेकर अपनी निवेश संबंधी शरूरतों को पूरा किया था। जब हालात अच्छे थे तो अमेरिका से व़्ाफशार् जुटाना बहुत आसान था लेकिन संकट का संकेत मिलते ही अमेरिकी उद्यमियों के होश उड़ गए। 1928 के पहले छह माह तक विदेशों में अमेरिका का व़्ाफशार् एक अरब डाॅलर था। साल भर के भीतर यह कशार् घटकर केवल चैथाइर् रह गया था। जो देश अमेरिकी व़्ाफशेर् पर सबसे श्यादा निभर्र थे उनके सामने गहरा संकट आ खड़ा हुआ। भले ही सब देशों में एक जैसा प्रभाव न पड़ा हो लेकिन अमेरिकी पूँजी के लौट जाने से पूरी दुनिया पर असर शरूर पड़ा। यूरोप में कइर् बड़े बैंक धराशायी हो गए। कइर् देशों की मुद्रा की कीमत बुरी तरह गिर गइर्। इस झटकेसे बि्रटिश पाउंड भी नहीं बच पाया। लैटिन अमेरिका और अन्य स्थानों पर कृष्िा एवं कच्चे मालों की व़फीमतें तेशी से लुढ़कने लगीं। अमेरिकी सरकार इस महामंदी से अपनी अथर्व्यवस्था को बचाने के लिए आयातित पदाथो± पर दो गुना सीमा शुल्क वसूल करने लगी। इस प़्ौफसले ने तो विश्व व्यापार की कमर ही तोड़ दी। औद्योगिक देशों में भी मंदी का सबसे बुरा असर अमेरिका को ही झेलना पड़ा। कीमतों में कमी और मंदी की आशंका को देखते हुए अमेरिकी बैंकों ने घरेलू व़्ाफशेर् देना बंद कर दिया। जो कशेर् दिए जा चुके थे उनकी वसूली तेश कर दी गइर्। किसान उपज नहीं बेच पा रहे थे, परिवार तबाह हो गए, कारोबार ठप पड़ गए। आमदनी में गिरावट आने पर अमेरिका के बहुत सारे परिवार कशेर् चुकाने में नाकामयाब हो गए जिसके चलते उनके मकान, कार और सारी शरूरी चीजें कुकर् कर ली गईं। बीस के दशक में जो उपभोक्तावादी संपन्नता दिखाइर् दे रही थी वह धूल के गुबार की तरह रातोंरात काप़्ाूफर हो गइर् थी। बेरोशगारी बढ़ी तो लोग काम की तलाश में दूर - दूर तक जाने लगे। आख्िारकार अमेरिकी बैंकिंग व्यवस्था भी धराशायी हो गइर्। निवेश से अपेक्ष्िात लाभ न पा सकने, कशेर् वसूल न कर पाने और जमाकतार्ओं की जमा पूँजी न लौटा पाने के कारण हशारों बैंक दिवालिया हो गए और बंद कर दिए गए। इस परिघटना से जुड़े आँकड़े सकते में डाल देने वाले हैं: 1933 तक 4,000 से श्यादा बैंक बंद हो चुके थे और 1929 से 1932 के बीच तकरीबन 1,10,000 वंफपनियाँ चैपट हो चुकी थीं। यद्यपि 1935 तक श्यादातर औद्योगिक देशों में आथ्िार्क संकट से उबरने के संकेत दिखाइर् देने लगे थे लेकिन समाजों, अंतरार्ष्ट्रीय संबंधों और राजनीति तथा लोगों के दिलो - दिमाग़ पर उसकी जो छाप पड़ी वह जल्दी मिटने वाली नहीं थी। 3.5 भारत और महामंदी यदि हम इस बात पर ध्यान दें कि महामंदी से भारत पर क्या असर पड़ा तो इस बात को अच्छी तरह समझ सकते हैं कि बीसवीं सदी की शुरुआत तकवैश्िवक अथर्व्यवस्था कितनी एकीकृत हो चुकी थी। दुनिया के एक हिस्से में पैदा होने वाले संकट की वँफपवँफपाहट बाकी हिस्सों तक भी पहुँच जाती सौजन्य: लायब्रेरी आॅप़्ाफ कांग्रेस पि्रंट्स एंड पफोटोग्राफ्ऱस डिविजन। ़जब एक बेरोजगारी जनगणना से पता चला कि देश में एक करोड़ से श्यादा लोगों के पास कोइर् काम नहीं है तो अमेरिका के बहुत सारे राज्यों में स्थानीय प्रशासन की ओर से बेरोशगारोंको छोटे - छोटे भत्ते दिए जाने लगे। ये लंबी वफतारे़ं महामंदी के सालों में गरीबी और बेरोशगारी का प्रतीक थीं। थी और उससे दुनिया भर में लोगों की ¯शदगी, अथर्व्यवस्थाएँ और समाज प्रभावित हो उठते थे। जैसा कि आप पीछे देख चुके हैं, औपनिवेश्िाक भारत कृष्िा वस्तुओं का नियार्तक और तैयार मालों का आयातक बन चुका था। महामंदी ने भारतीय व्यापार को प़्ाफौरन प्रभावित किया। 1928 से 1934 के बीच देश के आयात - नियार्त घट कर लगभग आधे रह गए थे। जब अंतरार्ष्ट्रीय बाशार में कीमतें गिरने लगीं तो यहाँ भी कीमतें नीचे आ गईं। 1928 से 1934 के बीच भारत में गेहूँ की कीमत 50 प्रतिशत गिर गइर्। शहरी निवासियों के मुव़़्ाफाबले किसानों और काश्तकारों को श्यादा नुवफसान हुआ। यद्यपि कृष्िा उत्पादों की कीमत तेशी से नीचे गिरी लेकिन सरकार ने लगान वसूली में छूट देने से साप़्ाफ इनकार कर दिया। सबसे बुरी मार उन काश्तकारों पर पड़ी जो विश्व बाशार के लिए उपज पैदा करते थे। बंगाल के जूट/पटसन उत्पादकों को ही देख्िाए। वे कच्चा पटसन उगाते थे जिससे कारखानों में टाट की बोरियाँ बनाइर् जाती थीं। जब टाट का नियार्त बंद हो गया तो कच्चे पटसन की कीमतों में 60 प्रतिशत से भी श्यादा गिरावट आ गइर्। जिन काश्तकारों ने दिन पिफरने की उम्मीद में या बेहतर आमदनी के लिए उपज बढ़ाने के वास्ते व़्ाफशेर् ले लिए थे उनकी हालत भी उपज का सही मोल न मिलने के कारण खराब थी। वे दिनोंदिन और व़्ाफशर् में डूबते जा रहेथे। इसी विपिा को ध्यान में रखकर बंगाल के एक कवि ने लिखा था μ चलो भाइयों, नव़्ाफद की उम्मीद में और श्यादा पटसन तुम उगाओ लागत और व़्ाफशेर् में पिसकर नाउम्मीदी पाओ सारी पूँजी लगा - पँफसाकर पफसल खड़ी कर जाओ़...घर पर बैठे बनिये देंगे पाँच रुपये मन भाव पूरे देश में काश्तकार पहले से भी श्यादा व़्ाफशर् में डूब गए। खचेर् पूरे करने के चक्कर में उनकी बचत खत्म हो चुकी थी, शमीन सूदखोरों के पास गिरवी पड़ी थी, घर में जो भी गहने - शेवर थे बिक चुके थे। मंदी के इन्हीं सालों में भारत कीमती धातुओं, खासतौर से सोने का नियार्त करने लगा। प्रसि( अथर्शास्त्राी कीन्स का मानना था कि भारतीय सोने के नियार्त से भी वैश्िवक अथर्व्यवस्था को पुनजीर्वित करने में काप़्ाफी मदद मिली। इस नियार्त ने बि्रटेन की आथ्िार्क दशा सुधारने में तो निश्चय ही मदद दी लेकिन भारतीय किसानों को कोइर् लाभ नहीं हुआ। 1931 में मंदी अपने चरम पर थी और ग्रामीण भारत असंतोष व उथल - पुथल के दौर से गुजर रहा था। उसी समस महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा ;सिविल नाप़्ाफरमानीद्ध आंदोलन शुरू किया। यह मंदी शहरी भारत के लिए इतनी दुखदाइर् नहीं रही। कीमतें गिरते जाने के बावजूद शहरों में रहने वाले ऐसे लोगों की हालत ठीक रही जिनकी आय निश्िचत थी। जैसे, शहर में रहने वाले शमींदार जिन्हें अपनी शमीन पर बँधा - बँधाया भाड़ा मिलता था, या मध्यवगीर्य वेतनभोगी कमर्चारी। राष्ट्रवादी खेेमे के दबाव में उद्योगों की रक्षा के लिए सीमा शुल्क बढ़ा दिए गए थे जिससे औद्योगिक क्षेत्रा में भी निवेश में तेशी आइर्। चचार् करें पटसन ;जूटद्ध उगाने वालों के विलाप में पटसन की खेती से किसके मुनापेफ का िाक्र आया है? स्पष्ट करें।़4 विश्व अथर्व्यवस्था का पुननिर्मार्ण: यु(ोत्तर काल पहला विश्व यु( खत्म होने के केवल दो दशक बाद दूसरा विश्व यु( शुरू हो गया। यह यु( भी दो बड़े खेमों के बीच था। एक गुट में धुरी शक्ितयाँ ;मुख्य रूप से नात्सी जमर्नी, जापान और इटलीद्ध थीं तो दूसरा खेमा मित्रा राष्ट्रों ;बि्रटेन, सोवियत संघ, प़्ा्रफंास और अमेरिकाद्ध के नाम से जाना जाता था। छह साल तक चला यह यु( शमीन, हवा और पानी में असंख्य मोचो± पर लड़ा गया। इस यु( में मौत और तबाही की कोइर् हद बाकी नहीं बची थी। माना जाता है कि इस जंग के कारण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से करीब 6 करोड़ लोग मारे गए। यह 1939 की वैश्िवक जनसंख्या का लगभग 3 प्रतिशत था। करोड़ों लोग घायल हुए। अब तक के यु(ों में मोचेर् पर मरने वालों की संख्या श्यादा होती थी। इस यु( में ऐसे लोग श्यादा मरे जो किसी मोचेर् पर लड़ नहीं रहे थे। यूरोप और एश्िाया के विशाल भूभाग तबाह हुए। कइर् शहर हवाइर् बमबारी या लगातार गोलाबारी के कारण मिट्टी में मिल गए। इस यु( ने बेहिसाब आथ्िार्क और सामाजिक तबाही को जन्म दिया। ऐसे हालात में पुननिर्मार्ण का काम कठिन और लंबा साबित होने वाला था। यु(ोत्तर काल में पुननिर्मार्ण का काम दो बड़े प्रभावों के साये में आगे बढ़ा। पश्िचमी विश्व में अमेरिका आथ्िार्क, राजनीतिक और सैनिक दृष्िट से एक वचर्स्वशाली ताकत बन चुका था। दूसरी ओर सोवियत संघ भी एक वचर्स्वशाली शक्ित के रूप में सामने आया। नात्सी जमर्नी को हराने के लिए सोवियत संघ की जनता ने भारी कुबार्नियाँ दी थीं। जिस समय पूँजीवादी दुनिया महामंदी से जूझ रही थी उसी दौरान सोवियत संघ के लोगों ने अपने देश को एक पिछड़े खेतिहर देश की जगह एक विश्व शक्ित की हैसियत में ला खड़ा किया था। 4.1 यु(ोत्तर बंदोबस्त और ब्रेटन - वुड्स संस्थान दो महायु(ों के बीच मिले आथ्िार्क अनुभवों से अथर्शास्ित्रायों और राजनीतिज्ञों ने दो अहम सबव़्ाफ निकाले। पहला, बृहत उत्पादन पर आधारित किसी औद्योगिक समाज को व्यापक उपभोग के बिना व़्ाफायम नहीं रखा जा सकता। लेकिन व्यापक उपभोग को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक था कि आमदनी काप़्ाफी श्यादा और स्िथर हो। यदि रोशगार अस्िथर होंगे तो आय स्िथर नहीं हो सकती थी। स्िथर आय के लिए पूणर् रोशगार भी शरूरी था। लेकिन बाशार पूणर् रोशगार की गारंटी नहीं दे सकता। कीमत, उपज और रोशगार में आने वाले उतार - चढ़ावों को नियंत्रिात करने के लिए सरकार का दखल शरूरी था। आथ्िार्क स्िथरता केवल सरकारी हस्तक्षेप के शरिये ही सुनिश्िचत की जा सकती थी। दूसरा सबव़्ाफ बाहरी दुनिया के साथ आथ्िार्क संबंधों के बारे में था। पूणर् रोशगार का लक्ष्य केवल तभी हासिल किया जा सकता है जब सरकार के पास वस्तुओं, पूँजी और श्रम की आवाजाही को नियंत्रिात करने की ताव़्ाफत उपलब्ध हो। संक्षेप में, यु(ोत्तर अंतरार्ष्ट्रीय आथ्िार्क व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य यह था कि औद्योगिक विश्व में आथ्िार्क स्िथरता एवं पूणर् रोशगार बनाए रखा जाए। इस प्रे़फमवकर् पर जुलाइर् 1944 में अमेरिका स्िथत न्यू हैम्पशर के ब्रेटन वुड्सनामक स्थान पर संयुक्त राष्ट्र मौिक एवं वित्तीय सम्मेलन में सहमति बनी थी। सदस्य देशों के विदेश व्यापार में लाभ और घाटे से निपटने के लिए ब्रेटन वुड्स सम्मेलन में ही अंतरार्ष्ट्रीय मुद्रा कोष ;आइर्.एम.एप़्ाफ.द्ध की स्थापना कीगइर्। यु(ोत्तर पुननिर्मार्ण के लिए पैसे का इंतशाम करने के वास्ते अंतरार्ष्ट्रीय पुननिर्मार्ण एवं विकास बैंक ;जिसे आम बोलचाल में विश्व बैंक कहा जाता हैद्ध का गठन किया गया। इसी वजह से विश्व बैंक और आइर्.एम.एपफ. को़ब्रेटन वुड्स संस्थान या ब्रेटन वुड्स टि्वन ;ब्रेटन वुड्स की जुड़वाँ संतानद्धभी कहा जाता है। इसी आधार पर यु(ोत्तर अंतरार्ष्ट्रीय आथ्िार्क व्यवस्था को अकसर ब्रेटन वुड्स व्यवस्था भी कहा जाता है। विश्व बैंक और आइर्.एम.एपफ. ने 1947 में औपचारिक रूप से काम करना़शुरू किया। इन संस्थानों की निणर्य प्रिया पर पश्िचमी औद्योगिक देशों का नियंत्राण रहता है। अमेरिका विश्व बैंक और आइर्.एम.एप़्ाफ. के किसी भी प़्ाफैसले को वीटो कर सकता है। अंतरार्ष्ट्रीय मौिक व्यवस्था राष्ट्रीय मुद्राओं और मौिक व्यवस्थाओं को एक - दूसरे से जोड़ने वाली व्यवस्था है। ब्रेटन वुड्स व्यवस्था निश्िचत विनिमय दरों पर आधरित होती थी। इस व्यवस्था में राष्ट्रीय मुद्राएँ, जैसे भारतीय मुद्रा - रुपया - डाॅलर के साथ एक निश्िचत विनिमय दर से बँधा हुआ था। एक डाॅलर के बदले में कितने रुपये देने होंगे, यह स्िथर रहता था। डाॅलर का मूल्य भी सोने से बँधा हुआ था। एक डाॅलर की कीमत 35 औंस सोने के बराबर निधार्रित की गइर् थी। 4.2 प्रारंभ्िाक यु(ोत्तर वषर् ब्रेटन वुड्स व्यवस्था ने पश्िचमी औद्योगिक राष्ट्रों और जापान के लिए व्यापार तथा आय में वृि के एक अप्रतिम युग का सूत्रापात किया। 1950 से 1970 के बीच विश्व व्यापार की विकास दर सालाना 8 प्रतिशत से भी श्यादा रही। इस दौरान वैश्िवक आय में लगभग 5 प्रतिशत की दर से वृि हो रही थी। विकास दर भी कमोबेश स्िथर ही थी। उसमें श्यादा उतार - चढ़ाव नहीं आए। इस दौरान श्यादातर समय अिाकांश औद्योगिक देशों में बेरोशगारी औसतन 5 प्रतिशत से भी कम ही रही। इन दशकों में तकनीक और उद्यम का विश्वव्यापी प्रसार हुआ। विकासशील देश विकसित औद्योगिक देशों के बराबर पहुँचने की जीतोड़ नए शब्द वीटो: निषेधािाकारऋ इस अिाकार के सहारे एक ही सदस्य की असहमति किसी भी प्रस्ताव को खारिज करने का आधार बन जाती है। चचार् करें संक्षेप में बताएँ कि दो महायु(ों के बीच जो आथ्िार्क परिस्िथतियाँ पैदा हुए उनसे अथर्शास्ित्रायों और राजनेताओं ने क्या सबक सीखे? कोश्िाश कर रहे थे। इसीलिए उन्होंने आधुनिक तकनीक से चलने वाले संयंत्रों और उपकरणों के आयात पर बेहिसाब पूँजी का निवेश किया। 4.3 अनौपनिवेशीकरण और स्वतंत्राता दूसरा विश्व यु( खत्म होने के बाद भी दुनिया का एक बहुत बड़ा भाग यूरोपीय औपनिवेश्िाक शासन के अधीन था। अगले दो दशकों में एश्िाया और अप्ऱफीका के श्यादातर उपनिवेश स्वतंत्रा, स्वाधीन राष्ट्र बन चुके थे। लेकिन बाॅक्स 4 एक साथ बहुत सारे देशों में व्यवसाय करने वाली वंफपनियों को बहुराष्ट्रीय निगम ;मल्टीनेशनल काॅपोर्रेशन - एमएनसीद्ध या बहुराष्ट्रीय वंफपनी कहा जाता है। शुरुआती बहुराष्ट्रीय वंफपनियों की स्थापना 1920 के दशक में की गइर् थी। पचास व साठ के दशक में जब अमेरिकी व्यवसाय दुनिया भर में पफैलते जा रहे थे और पश्िचमी यूरोपएवं जापान भी विश्वयु( के प्रभाव से बाहर निकलते हुए शक्ितशाली औद्योगिक राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर थे उस समय ऐसी बहुत सारी नयी वंफपनियाँ सामने आइ। बहुराष्ट्रीय वंफपनियों का विश्वव्यापी प्रसारपचास और साठ के दशक की एक विशेषता था। इसके पीछे ±ये सभी देश ग़्ारीबी व संसाधनों की कमी से जूझ रहे थे। उनकी अथर्व्यवस्थाएँ और समाज लंबे समय तक चले औपनिवेश्िाक शासन के आंश्िाक रूप से इस बात का भी हाथ था कि श्यादातर सरकारें बाहर से आने वाली चीजों पर भारी आयात शुल्क वसूल करती थीं जिसकेकारण अस्त - व्यस्त हो चुके थे। कारण बड़ी वंफपनियों को अपने संयंत्रा उन्हीं देशों में लगाने पड़ते थे जहाँ वे अपने उत्पाद बेचना चाहती थीं। उन्हें ‘घरेलू उत्पादकों’ केआइर्.एम.एपफ. और विश्व बैंक का गठन तो औद्योगिक देशों की शरूरतों को पूरा करने के लिए ही किया गया था। ये संस्थान भूतपूवर् उपनिवेशों में गरीबी की समस्या और विकास की कमी से निपटने में दक्ष नहीं थे। लेकिन जिस प्रकार यूरोप और जापान ने अपनी अथर्व्यवस्थाओं का पुनगर्ठन किया था उसके कारण ये देश आइर्.एम.एपफ. अ।ैर विश्व बैंक पर बहुत निभर्र भी नहीं थे। इसी कारण पचास के दशक के आख्िारी सालों में आकर ब्रेटन वुड्स संस्थान विकासश्ील देशों पर भी पहले से श्यादा ध्यान देने लगे। दुनिया के अल्पविकसित भाग उपनिवेशों के रूप में पश्िचमी साम्राज्यों के अधीन रूप में काम करना पड़ता था। नए शब्द आयात शुल्क ;ज्ंतपद्धिि: किसी दूसरे देश से आने वाली चीशों पर वसूल किया जाने वाला शुल्क। यह कर या शुल्क उस जगह लिया जाता है जहाँ से वह चीज देश में आती है, यानी सीमा पर, बंदरगाह पर या हवाइर् अड्डे पर।रहे थे। विडंबना यह थी कि नवस्वाधीन राष्ट्रों के रूप में भी अपनी जनता को गरीबी और पिछड़ेपन की गतर् से बाहर निकालने के लिए उन्हें ऐसे अंतरार्ष्ट्रीय संस्थानों की मदद लेनी पड़ी जिन पर भूतपूवर् औपनिवेश्िाक शक्ितयों का ही वचर्स्व था। अनौपनिवेशीकरण के बहुत साल बीत जाने के बाद भी बहुत सारे नवस्वाधीन राष्ट्रों की अथर्व्यवस्थाओं पर भूतपूवर् औपनिवेश्िाक शक्ितयों का ही नियंत्राण बना हुआ था। जो देश बि्रटेन और प्ऱफांस के उपनिवेश रह चुके थे या जहाँ कभी उनकाराजनीतिक प्रभुत्व रह चुका वहाँ के महत्त्वपूणर् संसाधनों, जैसे खनिज संपदा और शमीन पर अभी भी बि्रटिश और प्ऱफांसीसी वंफपनियों का ही नियंत्राण था और वे इस नियंत्राण को छोड़ने के लिए किसी भी कीमत पर तैयार नहीं थीं। कइर् बार अमेरिका जैसे अन्य शक्ितशाली देशों की बहुराष्ट्रीय वंफपनियाँ भी विकासशीलदेशों के प्राकृतिक संसाधनों का बहुत कम कीमत पर दोहन करने लगती थीं। दूसरी ओर श्यादातर विकासशील देशों को पचास और साठ के दशक में पश्िचमी अथर्व्यवस्थाओं की तेज प्रगति से कोइर् लाभ नहीं हुआ। इस समस्या को देखते हुए उन्होंने एक नयी अंतरार्ष्ट्रीय आथ्िार्क प्रणाली ;छमू प्दजमतदंजपवदंस म्बवदवउपब व्तकमतदृछप्म्व्द्ध के लिए आवाश उठाइर् और समूह 77 ;जी - 77द्ध के रूप में संगठित हो गए। एन.आइर्.इर्.ओ. से उनका आशय एक ऐसी व्यवस्था से था जिसमें उन्हें अपने संसाधनों पर सही मायनों में नियंत्राण मिल सके, जिसमें उन्हें विकास के लिए अिाक सहायता मिले, कच्चे माल के सही दाम मिलें, और अपने तैयार मालों को विकसित देशों के बाशारों में बेचने के लिए बेहतर पहुँच मिले। 4.4 ब्रेटन वुड्स का समापन और ‘वैश्वीकरण’ की शुरुआत सालों की स्िथर और तेश वृि के बावजूद यु(ोत्तर दुनिया में सब कुछ सही नहीं चल रहा था। साठ के दशक से ही विदेशों में अपनी गतिवििायों कीभारी लागत ने अमेरिका की वित्तीय और प्रतिस्पधीर् क्षमता को कमशोर कर दिया था। अमेरिकी डाॅलर अब दुनिया की प्रधान मुद्रा के रूप में पहले जितना सम्मानित और निविर्वाद नहीं रह गया था। सोने की तुलना में डाॅलर की कीमत गिरने लगी थी। अंततः स्िथर विनिमय दर की व्यवस्था विपफल हो गइर् और प्रवाहमयी या अस्िथर विनिमय दर की व्यवस्था शुरू की गइर्। सत्तर के दशक के मध्य से अंतरार्ष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में भी भारी बदलाव आ चुके थे। अब तक विकासशील देश व़्ाफशेर् और विकास संबंधी सहायता के लिए अंतरार्ष्ट्रीय संस्थानों की शरण ले सकते थे लेकिन अब उन्हें पश्िचमके व्यावसायिक बैंकों और निजी ट्टणदाता संस्थानों से व़्ाफशर् न लेने के लिए बाध्य किया जाने लगा। विकासशील विश्व में समय - समय पर व़्ाफशर् संकट पैदा होने लगा जिसके कारण आय में गिरावट आती थी और गरीबी बढ़ने लगती थी। अप्ऱफीका और लैटिन अमेरिका में यह समस्या सबसे श्यादा दिखाइर् दी। औद्योगिक विश्व भी बेरोशगारी की समस्या में पँफसने लगा था। सत्तर के दशक के मध्य से बेरोशगारी बढ़ने लगी। नब्बे के दशक के प्रांरभ्िाक वषो± तक वहाँकापफी बेरोशगारी रही। सत्तर के दशक के आख्िार सालों से बहुराष्ट्रीय वंफपनियाँ भी एश्िाया के ऐसे देशों में उत्पादन केंित करने लगीं जहाँ वेतन कम थे। चीन 1949 की क्रांति के बाद विश्व अथर्व्यवस्था से अलग - थलग ही था। परंतु चीन में नयी आथ्िार्क नीतियों और सोवियत खेमे के बिखराव तथा पूवीर् यूरोप में सोवियत शैली की व्यवस्था समाप्त हो जाने के पश्चात बहुत सारे देश दोबारा विश्व अथर्व्यवस्था का अंग बन गए। चीन जैसे देशों में वेतन तुलनात्मक रूप से कम थे। पफलस्वरूप विश्व बाशारों पर अपना प्रभुत्व व़्ाफायम करने के लिए प्रतिस्पधार् कर रही विदेशी बहुराष्ट्रीय वंफपनियों ने वहाँ जमकर निवेश करना शुरू कर दिया। क्या आपने इस बात पर ध्यान दिया है कि हमारे श्यादातर टेलीविज़न, मोबाइल प़्ाफोन और ख्िालौने चीन में बने होते हैं या वहाँ के जैसे ही लगते हैं? यह चीनी अथर्व्यवस्था की अल्प लागत अथर्व्यवस्था और खास तौर से वहाँ के कम वेतनों का नतीजा है। उद्योगों को कम वेतन वाले देशों में ले जाने से वैश्िवक व्यापार और पूँजी प्रवाहों पर भी असर पड़ा। पिछले दो दशक में भारत, चीन और ब्राशील आदि देशों की अथर्व्यवस्थाओं में आए भारी बदलावों के कारण दुनिया का आथ्िार्क भूगोल पूरी तरह बदल चुका है। नए शब्द विनिमय दर: इस व्यवस्था के जरिये अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार की सुविधा के लिए विभ्िान्न देशों की राष्ट्रीय मुद्राओं को एक - दूसरे से जोड़ा जाता है। मोटे तौर पर विनिमय दर दो प्रकार की होती हैं: स्िथर विनिमय दर और परिवतर्नशील विनिमय दर। स्िथर विनिमय दर: जब विनिमय दर स्िथर होती हैं और उनमें आने वाले उतार - चढ़ावों को नियंत्रिात करने के लिए सरकारों को हस्तक्षेप करना पड़ता है तो ऐसी विनिमय दर को स्िथर विनिमय दर कहा जाता है। लचीली या परिवतर्नशील विनिमय दर: इस तरह की विनिमय दर विदेशी मुद्रा बाशार में विभ्िान्न मुद्राओं की माँग या आपूतिर् के आधार पर और सि(ांततः सरकारों के हस्तक्षेप के बिना घटती - बढ़ती रहती है। संक्षेप में लिखें चचार् करें परियोजना कायर् उÂीसवीं सदी के दौरान दक्ष्िाण अप़्रफीका में स्वणर् हीरा खनन के बारे में और जानकारियाँ इकट्ठी करें। सोना और हीरा वंफपनियों पर किसका नियंत्राण था? खनिक कौन लोग थे और उनका जीवन वैफसा था? परियोजना कायर्

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