भारत में राष्ट्रवादजैसा कि आप देख चुके हैं, यूरोप में आधुनिक राष्ट्रवाद के साथ ही राष्ट्र - राज्यों का भी उदय हुआ। इससे अपने बारे में लोगों की समझ बदलने लगी। वे कौन हैं, उनकी पहचान किस बात से परिभाष्िात होती है, यह भावना बदल गइर्। उनमें राष्ट्र के प्रति लगाव का भाव पैदा होने लगा। नए प्रतीकोंऔर चिÉों ने, नए गीतों और विचारों ने नए संपवर्फ स्थापित किए और समुदायों की सीमाओं को दोबारा परिभाष्िात कर दिया। श्यादातर देशों में इस नयी राष्ट्रीय पहचान का निमार्ण एक लंबी प्रिया में हुआ। आइए देखें कि हमारे देश में यह चेतना किस तरह पैदा हुइर्? वियतनाम और दूसरे उपनिवेशों की तरह भारत में भी आधुनिक राष्ट्रवाद के उदय की परिघटना उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन के साथ गहरे तौर पर जुड़ी हुइर् थी। औपनिवेश्िाक शासकों के ख्ि़ालाप़फ संघषर् के दौरान लोग आपसी एकता को पहचानने लगे थे। उत्पीड़न और दमन के साझा भाव ने विभ्िान्न समूहों को एक - दूसरे से बाँध दिया था। लेकिन हर वगर् और समूह पर उपनिवेशवाद का असर एक जैसा नहीं था। उनके अनुभव भी अलग थे और स्वतंत्राता के मायने भी भ्िान्न थे। महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने इन समूहों को इकट्ठा करके एक विशाल आंदोलन खड़ा किया। परंतु इस एकता में टकराव के ¯बदु भी निहित थे। पहले की एक और पुस्तक में भी आपने भारत में राष्ट्रवाद के उदय का अध्ययन किया था। वहाँ आपने बीसवीं सदी के पहले दशक तक की कहानी पढ़ी थी। इस अध्याय में हम 1920 के दशक से आगे अध्ययन करेंगे और असहयोग आंदोलन तथा सविनय अवज्ञा आंदोलन के बारे में पढ़ेंगे। हम ये देखेंगे कि कांग्रेस ने राष्ट्रीय आंदोलन को विकसित करने के लिए किस तरह के प्रयास किए, इस आंदोलन में विभ्िान्न सामाजिक समूहों ने किस तरह हिस्सा लिया और किस तरह राष्ट्रवाद ने लोगों की कल्पना को नयी उड़ान दे दी। भारत में राष्ट्रवाद अध्याय 3 1 पहला विश्वयु(, ख्ि़ालाप़्ाफत और असहयोग 1919 से बाद के सालों में हम देखते हैं कि राष्ट्रीय आंदोलन नए इलाव़्ाफों तक पैफल गया था, उसमें नए सामाजिक समूह शामिल हो गए थे और संघषर् की नयी प(तियाँ सामने आ रही थीं। इन बदलावों को हम वैफसे समझेंगे? उनके क्या परिणाम हुए? सबसे पहली बात यह है कि विश्वयु( ने एक नयी आ£थक और राजनीतिक स्िथति पैदा कर दी थी। इसके कारण रक्षा व्यय में भारी इशाप़फा हुआ। इस खचेर् की भरपाइर् करने के लिए यु( के नाम पर व़्ाफशेर् लिए गए और करों में वृि की गइर्। सीमा शुल्क बढ़ा दिया गया और आयकर शुरू किया गया। यु( के दौरान व़्ाफीमतें तेशी से बढ़ रही थीं। 1913 से 1918 के बीच व़्ाफीमतें दोगुना हो चुकी थीं जिसके कारण आम लोगों की मुश्िकलें बढ़ गइर् थीं। गाँवों में सिपाहियों को जबरन भतीर् किया गया जिसके कारण ग्रामीण इलाव़्ाफों में व्यापक गुस्सा था। 1918 - 19 और 1920 - 21 में देश के बहुत सारे हिस्सों में पफसल खराब हो गइर् जिसके कारण खाद्य पदाथो± का भारी अभाव पैदा हो गया।उसी समय फ्ऱलू की महामारी पैफल गइर्। 1921 की जनगणना के मुताबिव़्ाफ दु£भक्ष और महामारी के कारण 120 - 130 लाख लोग मारे गए। लोगों को उम्मीद थी कि यु( खत्म होने के बाद उनकी मुसीबतें कम हो जाएँगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसी समय एक नया नेता सामने आया और उसने संघषर् का एक नया ढंग, एक नया तरीव़्ाफा पेश किया। 1.1 सत्याग्रह का विचार महात्मा गांधी जनवरी 1915 में भारत लौटे। इससे पहले वे दक्ष्िाण अÚ़ीका में थे। उन्होंने एक नए तरह के जनांदोलन के रास्ते पर चलते हुए वहाँ की नए शब्द जबरन भतीर्: इस प्रिया में अंग्रेश भारत के लोगों को शबरदस्ती सेना में भतीर् कर लेते थे। चित्रा 2 - दक्ष्िाण अÚ़ ीका में भारतीय मशदूर प़्ाफोकस्त्रास्ट से गुशर रहे हैं, 6 नवंबर 1913 न्यूवैफसल से ट्रांसवाल की ओर बढ़ रहे इस जुलूस में महात्मा गांधी मशदूरों का नेतृत्व कर रहे थे। जब जुलूस को रोका गया औरगांधीजी को गिरफ्रतार किया गया तो हशारों़मशदूर अश्वेतों के अिाकारों का हनन करने वाले नस्लभेदी व़्ाफानूनों के ख्ि़ालापफ सत्याग्रह़में शामिल हो गए। नस्लभेदी सरकार से सपफलतापूवर्क लोहा लिया था। इस प(ति को वे ड्डोत - क सत्याग्रह कहते थे। सत्याग्रह के विचार में सत्य की शक्ित पर आग्रह और सत्य की खोज पर शोर दिया जाता था। इसका अथर् यह था कि अगर आपका उद्देश्य सच्चा है, यदि आपका संघषर् अन्याय के ख्ि़ालाप़्ाफ है तो उत्पीड़क से मुव़्ाफाबला करने के लिए आपको किसी शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं है। प्रतिशोध की भावना या आक्रामकता का सहारा लिए बिना सत्याग्रही केवल अ¯हसा के सहारे भी अपने संघषर् में सपफल हो सकता है। इसके लिए दमनकारी शत्राु की चेतना को ¯झझोड़ना चाहिए। उत्पीड़क शत्राु को ही नहीं बल्िक सभी लोगों को ¯हसा के शरिए सत्य को स्वीकार करने पर विवश करने की बजाय सच्चाइर् को देखने और सहज भाव से स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। इस संघषर् में अंततः सत्य की ही जीत होती है। गांधीजी का विश्वास था की अ¯हसा का यह धमर् सभी भारतीयों को एकता के सूत्रा में बाँध सकता है। भारत आने के बाद गांधीजी ने कइर् स्थानों पर सत्याग्रह आंदोलन चलाया। 1916 में उन्होेंने बिहार के चंपारन इलाव़्ोफ का दौरा किया और दमनकारी बागान व्यवस्था के ख्ि़ालाप़फ किसानों को संघषर् के लिए प्रेरित किया। 1917 में उन्होंने गुजरात के खेड़ा जिले के किसानों की मदद के लिए सत्याग्रह का आयोजन किया। प़्ाफसल खराब हो जाने और प्लेग की महामारी के कारण खेड़ा जिले के किसान लगान चुकाने की हालत में नहीं थे। वे चाहते थे कि लगान वसूली में ढील दी जाए। 1918 में गांधीजी सूती कपड़ा कारखानों के मशदूरों के बीच सत्याग्रह आंदोलन चलाने अहमदाबाद जा पहुँचे। 1.2 राॅलट एक्ट इस कामयाबी से उत्साहित गांध्ीजी ने 1919 में प्रस्तावित राॅलट एक्ट ;1919द्ध के ख्ि़ालाप़फ एक राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह आंदोलन चलाने का प़्ौफसला लिया। भारतीय सदस्यों के भारी विरोध के बावजूद इस व़्ाफानून को इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल ने बहुत जल्दबाजी में पारित कर दिया था। इस व़्ाफानून के शरिए सरकार को राजनीतिक गतिवििायों को वुफचलने और राजनीतिक व़्ौफदियों को दो साल तक बिना मुव़्ाफदमा चलाए जेल में बंद रखने का अिाकार मिल गया था। महात्मा गांध्ी ऐसे अन्यायपूणर् व़्ाफानूनों के ख्ि़ालाप़फ अ¯हसक ढंग से नागरिक अवज्ञा चाहते थे। इसे 6 अप्रैल को एक हड़ताल से शुरू होना था। विभ्िान्न शहरों में रैली - जुलूसों का आयोजन किया गया। रेलवे ववर्फशाॅप्स में कामगार हड़ताल पर चले गए। दुकानें बंद हो गईं। इस व्यापक जन - उभार से ¯चतित तथा रेलवे व टेलीग्राप़फ जैसी संचार सुविधाओं के भंग हो जाने की आंशका से भयभीत अंग्रेजों ने राष्ट्रवादियों पर दमन शुरू कर दिया। अमृतसर में बहुत सारे स्थानीय नेताओं को हिरासत में ले लिया गया। गांध्ीजी के दिल्ली में प्रवेश करने पर पाबंदी लगा दी गइर्। 10 अप्रैल को पुलिस ने अमृतसर में एक शांतिपूणर् जुलूस पर गोली चला दी। इसके बाद लोग बैंकों, डाकखानों और रेलवे स्टेशनों पर हमले करने लगे। माशर्ल लाॅ लागू कर दिया गया और जनरल डायर ने कमान सँभाल ली। गतिवििा ड्डोत - क को ध्यान से पढ़ें। जब महात्मा गांध्ी ने सत्याग्रह को सिय प्रतिरोध कहा तो इससे उनका क्या आशय था? 13 अप्रैल को जलियाँवाला बाग़्ा हत्याकांड हुआ। उस दिन अमृतसर में बहुत सारे गाँव वाले सालाना वैसाखी मेले में श्िारकत करने के लिए जलियाँवालाबाग़्ा मैदान में जमा हुए थे। कापफी लोग तो सरकार द्वारा लागू किए गएदमनकारी कानून का विरोध् प्रकट करने के लिए एकत्रिात हुए। यह मैदानचारों तरप़फ से बंद था। शहर से बाहर होने के कारण वहाँ जुटे लोगों को यह पता नहीं था कि इलाव़्ोफ में माशर्ल लाॅ लागू किया जा चुका है। जनरल डायरहथ्िायारबंद सैनिकों के साथ वहाँ पहुँचा और जाते ही उसने मैदान से बाहरनिकलने के सारे रास्तों को बंद कर दिया। इसके बाद उसके सिपाहियों ने भीड़ पर अंधाधुंध गोलियाँ चला दीं। सैंकड़ों लोग मारे गए। बाद में उसने बतायाकि वह सत्याग्रहियों के ज़हन में दहशत और विस्मय का भाव पैदा करके‘एक नैतिक प्रभाव’ उत्पन्न करना चाहता था। जैसे - जैसे जलियाँवाला बाग़्ा की खबर पैफली, उत्तर भारत के बहुत सारे शहरोंमें लोग सड़कों पर उतरने लगे। हड़तालें होने लगीं, लोग पुलिस से मोचार् लेने लगे और सरकारी इमारतों पर हमला करने लगे। सरकार ने इन कारर्वाइयों कोनिमर्मता से कुचलने का रास्ता अपनाया। सरकार लोगों को अपमानित औरआतंकित करना चाहती थी। सत्याग्रहियों को शमीन पर नाक रगड़ने के लिए, सड़क पर घ्िासट कर चलने और सारे साहिबों को सलाम मारने के लिए मजबूरकिया गया। लोगों को कोड़े मारे गए और गाँवों ;गुजराँवाला, पंजाबद्ध पर बमबरसाए गए। ¯हसा पैफलते देख महात्मा गांध्ी ने आंदोलन वापस ले लिया। भले ही राॅलट सत्याग्रह एक बहुत बड़ा आंदोलन था लेकिन अभी भी वहमुख्य रूप से शहरों और व़्ाफस्बों तक ही सीमित था। महात्मा गांध्ी पूरे भारतमें और भी श्यादा जनाधार वाला आंदोलन खड़ा करना चाहते थे। लेकिनउनका मानना था कि ¯हदू - मुसलमानों को एक - दूसरे के नशदीक लाए बिनाऐसा कोइर् आंदोलन नहीं चलाया जा सकता। उन्हें लगता था कि ख्ि़ालाप़्ाफत का मुद्दा उठाकर वे दोनों समुदायों को नशदीक ला सकते हैं। पहले विश्वयु( में आॅटोमन तुकीर् की हार हो चुकी थी। इस आशय की अप़्ाफवाहें पैफली हुइर्थीं कि इस्लामिक विश्व के आध्यात्िमक नेता ;ख़लीप़फाद्ध आॅटोमन सम्राट परएक बहुत सख्त शांति संिा थोपी जाएगी। ख़लीप़फा की तात्कालिक शक्ितयोंकी रक्षा के लिए माचर् 1919 में बंबइर् में एक ख्ि़ालाप़्ाफत समिति का गठन किया गया था। मोहम्मद अली और शौकत अली बंध्ुओं के साथ - साथ कइर्युवा मुस्िलम नेताओं ने इस मुद्दे पर संयुक्त जनकारर्वाइर् की संभावना तलाशने के लिए महात्मा गांध्ी के साथ चचार् शुरू कर दी थी। सितंबर 1920 मेंकांग्रेस के कलकत्ता अिावेशन में महात्मा गांध्ी ने भी दूसरे नेताओं को इसबात पर राशी कर लिया कि ख्ि़ालाप़्ाफत आंदोलन के समथर्न और स्वराज के लिए एक असहयोग आंदोलन शुरू किया जाना चाहिए। 1.3 असहयोग ही क्यों? अपनी प्रसि( पुस्तक ¯हद स्वराज ;1909द्ध में महात्मा गांध्ी ने कहा था कि भारत में बि्रटिश शासन भारतीयों के सहयोग से ही स्थापित हुआ था और यह शासन इसी सहयोग के कारण चल पा रहा है। अगर भारत के लोग अपना सहयोग वापस ले लें तो साल भर के भीतर बि्रटिश शासन ढह जाएगा और स्वराज की स्थापना हो जाएगी। असहयोग का विचार आंदोलन वैफसे बन सकता था? गांधीजी का सुझाव था कि यह आंदोलन चरणब( तरीव़्ोफ से आगे बढ़ना चाहिए। सबसे पहले लोगों को सरकार द्वारा दी गइर् पदवियाँ लौटा देनी चाहिए और सरकारी नौकरियों, सेना, पुलिस, अदालतों, विधायी परिषदों, स्वूफलों और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना चाहिए। अगर सरकार दमन का रास्ता अपनाती है तो व्यापक सविनय अवज्ञा अभ्िायान भी शुरू किया जाए। 1920 की ग£मयों में गांधीजी और शौकत अली आंदोलन के लिए समथर्न जुटाते हुए देश भर में यात्राएँ करते रहे। कांग्रेस में बहुत सारे लोग इन प्रस्तावों पर सशंकित थे। वे नवंबर 1920 में विधायी परिषद के लिए होने वाले चुनावों का बहिष्कार करने में हिचकिचा रहे थे। उन्हें भय था कि इस आंदोलन में लोग ¯हसा कर सकते हैं। सितंबर से दिसंबर तक कांग्रेस में भारी खींचतान चलती रही। वुफछ समय के लिए ऐसा लगा कि आंदोलन के समथर्कों और विरोिायों के बीच सहमति नहीं बन पाएगी। आख्िारकार दिसंबर 1920 में कांग्रेस के नागपुर अिावेशन में एकसमझौता हुआ और असहयोग कायर्क्रम पर स्वीकृति की मोहर लगा दी गइर्। आंदोलन किस तरह आगे बढ़ा? उसमें किन लोगों ने हिस्सा लिया? विभ्िान्न सामाजिक समूहों ने असहयोग के विचार को किस तरह समझा? नए शब्द बहिष्कार: किसी के साथ संपवर्फ रखने और जुड़ने से इनकार करना या गतिवििायों में हिस्सेदारी, चीजों की खरीद व इस्तेमाल से इनकार करना। आमतौर पर यह विरोध का एक रूप होता है। चित्रा 4 - विदेशी कपड़े का बहिष्कार, जुलाइर् 1922 विदेशी कपड़ों को पश्िचमी आ£थकएवं सांस्कृतिक प्रभुत्व का प्रतीक माना जाता था। 2 आंदोलन के भीतर अलग - अलग धाराएँ असहयोग - ख्ि़ालापफत आंदोलन जनवरी 1921 में शुरू हुआ। इस आंदोलन में़विभ्िान्न सामाजिक समूहों ने हिस्सा लिया लेकिन हरेक की अपनी - अपनी आकांक्षाएँ थीं। सभी ने स्वराज के आह्वान को स्वीकार तो किया लेकिन उनके लिए उसके अथर् अलग - अलग थे। 2.1 शहरों में आंदोलन आंदोलन की शुरुआत शहरी मध्यवगर् की हिस्सेदारी के साथ हुइर्। हशारों विद्या£थयों ने स्वूफल - काॅलेज छोड़ दिए। हेडमास्टरों और श्िाक्षकों ने इस्तीप़्ोफ सौंप दिए। वकीलों ने मुव़्ाफदमे लड़ना बंद कर दिया। मद्रास के अलावा श्यादातर प्रांतों में परिषद् चुनावों का बहिष्कार किया गया। मद्रास में ग़्ौर - ब्राह्मणों द्वारा बनाइर् गइर् जस्िटस पाटीर् का मानना था कि काउंसिल में प्रवेश के शरिए उन्हें वे अिाकार मिल सकते हैं जो सामान्य रूप से केवल ब्राह्मणों को मिल पाते हैं इसलिए इस पाटीर् ने चुनावों का बहिष्कार नहीं किया। आ£थक मोचेर् पर असहयोग का असर और भी श्यादा नाटकीय रहा। विदेशी सामानों का बहिष्कार किया गया, शराब की दुकानों की पिके¯टग की गइर्, और विदेशी कपड़ों की होली जलाइर् जाने लगी। 1921 से 1922 के बीच विदेशी कपड़ों का आयात आधा रह गया था। उसकी व़्ाफीमत 102 करोड़ से घटकर 57 करोड़ रह गइर्। बहुत सारे स्थानों पर व्यापारियों ने विदेशी चीजों का व्यापार करने या विदेशी व्यापार में पैसा लगाने से इनकार कर दिया। जब बहिष्कार आंदोलन पैफला और लोग आयातित कपड़े को छोड़कर केवल भारतीय कपड़े पहनने लगे तो भारतीय कपड़ा मिलों और हथकरघों का उत्पादन भी बढ़ने लगा। कुछ समय बाद शहरों में यह आंदोलन धीमा पड़ने लगा। इसके कइर् कारण थे। खादी का कपड़ा मिलों में भारी पैमाने पर बनने वाले कपड़ों के मुव़्ाफाबले प्रायः मँहगा होता था और ग़्ारीब उसे नहीं खरीद सकते थे। वे मिलों के कपड़े का लंबे समय तक बहिष्कार वैफसे कर सकते थे? बि्रटिश संस्थानों के बहिष्कार से भी समस्या पैदा हो गइर्। आंदोलन की कामयाबी के लिए वैकल्िपक भारतीय संस्थानों की स्थापना शरूरी थी ताकि बि्रटिश संस्थानों के स्थान पर उनका प्रयोग किया जा सके। लेकिन वैकल्िपक संस्थानों की स्थापना की प्रिया बहुत धीमी थी। पफलस्वरूप, विद्याथीर् और श्िाक्षक सरकारी स्वूफलों में लौटने लगे और वकील दोबारा सरकारी अदालतों में दिखाइर् देने लगे। 2.2 ग्रामीण इलाव़्ाफों में विद्रोह शहरों से बढ़कर असहयोग आंदोलन देहात में भी पैफल गया था। यु( के बाद देश के विभ्िान्न भागों में चले किसानों व आदिवासियों के संघषर् भी इस आंदोलन में समा गए। नए शब्द पिके¯टग: प्रदशर्न या विरोध का एक ऐसा स्वरूप जिसमें लोगकिसी दुकान, प़्ौफक्ट्री या दफ्ऱतर के भीतर जाने का रास्ता रोक लेते हैं। गतिवििा मान लीजिए कि साल 1920 चल रहा है। आप सरकारी स्वूफल के विद्याथीर् हैं। विद्याथ्िार्यों को असहयोग आंदोलन से जुड़ने का आह्वान करते हुए एक पोस्टर बनाइए। अवध में संन्यासी बाबा रामचंद्र किसानों का नेतृत्व कर रहे थे। बाबा रामचंद्र इससे पहले पिफजी में गिरमिटिया मशदूर के तौर पर काम कर चुके थे। उनका आंदोलन तालुव़्ाफदारों और शमींदारों के ख्ि़ालाप़फ था जो किसानों से भारी - भरकम लगान और तरह - तरह के कर वसूल कर रहे थे। किसानों को बेगार करनी पड़ती थी। पट्टेदार के तौर पर उनके पट्टे निश्िचत नहीं होते थे। उन्हें बार - बार पट्टे की जमीन से हटा दिया जाता था ताकि जमीन पर उनका कोइर् अिाकार स्थापित न हो सके। किसानों की माँग थी कि लगान कम किया जाए, बेगार खत्म हो और दमनकारी शमींदारों का सामाजिक बहिष्कार किया जाए। बहुत सारे स्थानों पर शमींदारों को नाइर् - धोबी की सुविधाओं से भी वंचित करने के लिए पंचायतों ने नाइर् - धोबी बंद का प़्ौफसला लिया। जून 1920 में जवाहर लाल नेहरू ने अवध के गाँवों का दौरा किया, गाँववालों से बातचीत की और उनकी व्यथा समझने का प्रयास किया। अक्तूबर तक जवाहर लाल नेहरू, बाबा रामचंद्र तथा वुफछ अन्य लोगों के नेतृत्व में अवध किसान सभा का गठन कर लिया गया। महीने भर में इस पूरे इलाव़्ोफ के गाँवों में संगठन की 300 से श्यादा शाखाएँ बन चुकी थीं। अगले साल जब असहयोग आंदोलन शुरू हुआ तो कांग्रेस ने अवध के किसान संघषर् को इस आंदोलन मंे शामिल करने का प्रयास किया लेकिन किसानों के आंदोलन में ऐसे स्वरूप विकसित हो चुके थे जिनसे कांग्रेस का नेतृत्व खुश नहीं था। 1921 में जब आंदोलन पैफला तो तालुव़्ाफदारों और व्यापारियों के मकानों पर हमले होने लगे, बाशारों में लूटपाट होने लगी और अनाज के गोदामों पर व़्ाफब्शा कर लिया गया। बहुत सारे स्थानों पर स्थानीय नेता किसानों को समझा रहे थे कि गांध्ीजी ने ऐलान कर दिया है कि अब कोइर् लगान नहीं भरेगा और जमीन गरीबों में बाँट दी जाएगी। महात्मा का नाम लेकर लोग अपनी सारी कारर्वाइयों और आकांक्षाओं को सही ठहरा रहे थे। आदिवासी किसानों ने महात्मा गांध्ी के संदेश और स्वराज के विचार का वुफछ और ही मतलब निकाला। उदाहरण के लिए, आंध्र प्रदेश की गूडेम पहाडि़यों में 1920 के दशक की शुरुआत में एक उग्र गुरिल्ला आंदोलन पैफल गया। कांग्रेस इस तरह के संघषर् को कभी स्वीकार नहीं कर सकती थी। अन्य वन ड्डोत - ख नए शब्द बेगार: बिना किसी पारिश्रमिक के काम करवाना। गिरमिटिया मशदूर: औपनिवेश्िाक शासन के दौरान बहुत सारे लोगों को काम करने के लिए प्ि़ाफजी, गयाना, वेस्टइंडीश आदि स्थानों पर ले जाया गया था जिन्हें बाद में गिरमिटिया कहा जाने लगा। उन्हें एक एग्रीमेंट ;अनुबंध्द्ध के तहत ले जाया जाता था। बाद में इसी एग्रीमेंट को ये मशदूर गिरमिट कहने लगे जिससे आगे चलकर इन मशदूरों को गिरमिटिया मजदूर कहा जाने लगा। अंग्रेशी में इन्हें प्दकमदजनतमक स्ंइवनत कहा जाता है। गतिवििा अगर आप 1920 मेें उत्तर प्रदेश में किसान होते तो स्वराज केलिए गांध्ीजी के आह्वान पर क्या प्रतििया देते? अपने उत्तर के साथ कारण भी बताइए। क्षेत्रों की तरह यहाँ भी अंग्रेजी सरकार ने बड़े - बड़े जंगलों में लोगों के दाख्िाल होने पर पाबंदी लगा दी थी। लोग इन जंगलों में न तो मवेश्िायों को चरा सकते थे न ही जलावन के लिए लकड़ी और पफल बीन सकते थे। इससे पहाड़ों के लोग परेशान और गुस्सा थे। न केवल उनकी रोशी - रोटी पर असर पड़ रहा था बल्िक उन्हें लगता था कि उनके परंपरागत अिाकार भी छीने जा रहे हैं। जब सरकार ने उन्हें सड़कों के निमार्ण के लिए बेगार करने पर मजबूर किया तो लोगांे ने बग़्ाावत कर दी। उनका नेतृत्व करने वाले अल्लूरी सीताराम राजू एक दिलचस्प व्यक्ित थे। उनका दावा था कि उनके पास बहुत सारी विशेष शक्ितयाँ हैं: वह सटीक खगोलीय अनुमान लगा सकते हैं, लोगों को स्वस्थ कर सकते हैं तथा गोलियाँ भी उन्हें नहीं मार सकतीं। राजू के व्यक्ितत्वसे चमत्कृत विद्रोहियों को विश्वास था कि वह इर्श्वर का अवतार है। राजू महात्मा गांध्ी की महानता के गुण गाते थे। उनका कहना था कि वह असहयोग आंदोलन से प्रेरित हैं। उन्होंने लोगों को खादी पहनने तथा शराब छोड़ने के लिए प्रेरित किया। साथ ही उन्होंने यह दावा भी किया कि भारत अ¯हसा के बल पर नहीं बल्िक केवल बलप्रयोग के शरिए ही आशाद हो सकता है। गूडेम विद्रोहियों ने पुलिस थानों पर हमले किए, बि्रटिश अिाकारियों को मारने की कोश्िाश की और स्वराज प्राप्ित के लिए गुरिल्ला यु( चलाते रहे। 1924 में राजू को पफाँसी दे दी गइर्। राजू अपने लोगों के बीच लोकनायक बन चुके। 2.3 बागानों में स्वराज महात्मा गांध्ी के विचारों और स्वराज की अवधारणा के बारे में मशदूरों की अपनी समझ थी। असम के बागानी मशदूरों के लिए आशादी का मतलब यह था कि वे उन चारदीवारियों से जब चाहे आ - जा सकते हैं जिनमें उनको बंद करके रखा गया था। उनके लिए आशादी का मतलब था कि वे अपने गाँवों से संपवर्फ रख पाएँगे। 1859 के इनलैंड इमिग्रेशन एक्ट के तहत बाग़्ाानों में काम करने वाले मशदूरों को बिना इजाशत बागान से बाहर जाने की छूट नहीं होती थी और यह इजाशत उन्हें विरले ही कभी मिलती थी। जब उन्होंने असहयोग आंदोलन के बारे में सुना तो हशारों मशदूर अपने अिाकारियों की अवहेलना करने लगे। उन्होंने बागान छोड़ दिए और अपने घर को चल दिए। उनको लगता था कि अब गांध्ी राज आ रहा है इसलिए अब तो हरेक को गाँव में शमीन मिल जाएगी। लेकिन वे अपनी मंिाल पर नहीं पहुँच पाए। रेलवे और स्टीमरों की हड़ताल के कारण वे रास्ते में ही पफँसे रह गए। उन्हें पुलिस ने पकड़ लिया और उनकी बुरी तरह पिटाइर् हुइर्। इन स्थानीय आंदोलनों की अपेक्षाओं और दृष्िटयों को कांग्रेस के कायर्क्रम में परिभाष्िात नहीं किया गया था। उन्होंने तो स्वराज शब्द का अपने - अपने हिसाब से अथर् निकाल लिया था। उनके लिए यह एक ऐसे युग का द्योतक था जब सारे कष्ट और सारी मुसीबतें खत्म हो जाएँगी। पिफर भी, जब गतिवििा राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल ऐसे अन्य लोगों के बारे में पता लगाइए जिन्हें अंग्रेशों ने पकड़कर मौत के घाट उतार दिया था। क्या ऐसा ही उदाहरण आप इंडो - चाइना ;अध्याय 2द्ध के राष्ट्रीय आंदोलन में भी बता सकते हैं? आदिवासियों ने गांध्ीजी के नाम का नारा लगाया और ‘स्वतंत्रा भारत’ की हुंकार भरी तो वे एक अख्िाल भारतीय आंदोलन से भी भावनात्मक स्तर पर जुडे़ हुए थे। जब वे महात्मा गांध्ी का नाम लेकर काम करते थे या अपने आंदोलन को कांग्रेस के आंदोलन से जोड़कर देखते थे तो वास्तव में एक ऐसे आंदोलन का अंग बन जाते थे जो उनके इलाव़्ोफ तक ही सीमित नहीं था। 3 सविनय अवज्ञा की ओर प़फरवरी 1922 में महात्मा गांध्ी ने असहयोग आंदोलन वापस लेने का प़्ौफसला कर लिया। उनको लगता था कि आंदोलन ¯हसक होता जा रहा है और सत्याग्रहियों को व्यापक प्रश्िाक्षण की शरूरत है। कांग्रेस के वुफछ नेता इस तरह के जनसंघषो± से थक चुके थे। वे 1919 के गवनर्मेंट आॅप़फ इं डिया एक्ट के तहत गठित की गइर् प्रांतीय परिषदों के चुनाव में हिस्सा लेना चाहते थे। उनको लगता था कि परिषदों में रहते हुए बि्रटिश नीतियों का विरोध करना,सुधारों की वकालत करना और यह दिखाना भी महत्त्वपूणर् है कि ये परिषदें लोकतांत्रिाक संस्था नहीं हैं। सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू ने परिषद् राजनीति में वापस लौटने के लिए कांग्रेस के भीतर ही स्वराज पाटीर् का गठन कर डाला। जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस जैसे युवा नेता श्यादा उग्र जनांदोलन और पूणर् स्वतंत्राता के लिए दबाव बनाए हुए थे। आंतरिक बहस व असहमति के इस माहौल में दो ऐसे तत्व थे जिन्होंने बीस के दशक के आख्िारी सालों में भारतीय राजनीति की रूपरेखा एक बार पिफर बदल दी। पहला कारक था विश्वव्यापी आ£थक मंदी का असर। 1926 सेकृष्िा उत्पादों की व़्ाफीमतें गिरने लगी थीं और 1930 के बाद तो पूरी तरहधराशायी हो गइर्ं। कृष्िा उत्पादों की माँग गिरी और नियार्त कम होने लगा तो किसानों को अपनी उपज बेचना और लगान चुकाना भी भारी पड़ने लगा। 1930 तक ग्रामीण इलाव़्ोफ भारी उथल - पुथल से गुजरने लगे थे। इसी पृष्ठभूमि में बि्रटेन की नयी टोरी सरकार ने सर जाॅन साइमन के नेतृत्व में एक वैधानिक आयोग का गठन कर दिया। राष्ट्रवादी आंदोलन के जवाब में गठित किए गए इस आयोग को भारत में संवैधानिक व्यवस्था की कायर्शैली का अध्ययन करना था और उसके बारे में सुझाव देने थे। इस आयोग में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था सारे अंग्रेश थे। 1928 में जब साइमन कमीशन भारत पहुँचा तो उसका स्वागत ‘साइमन कमीशन वापस जाओ’ ;साइमन कमीशन गो बैकद्ध के नारों से किया गया। कांग्रेस और मुस्िलम लीग, सभी पा£टयों ने प्रदशर्नों में हिस्सा लिया। इस विरोध को शांत करने के लिए वायसराय लाॅडर् इरविन ने अक्तूबर 1929 में भारत के लिए ‘डोमीनियन स्टेटस’ का गोलमोल सा ऐलान कर दिया। उन्हांेने इस बारे में कोइर् समय सीमा भी नहीं बताइर्। उन्होंने सिपर्फ इतना कहा कि भावी संविधान के बारे में चचाऱ्करने के लिए गोलमेश सम्मेलन आयोजित किया जाएगा। इस प्रस्ताव से कांग्रेस के नेता संतुष्ट नहीं थे। जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व में कांग्रेस का तेश - तरार्र खेमा आक्रामक तेवर अपनाने लगा था। उदारवादी और मध्यमागीर् नेता बि्रटिश डोमीनियन के भीतर ही संवैधानिक व्यवस्था के पक्ष में ड्डोत - गथे। लेकिन इस खेमे का प्रभाव घटता जा रहा था। दिसंबर 1929 में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस के लाहौर अिावेशन में ‘पूणर् स्वराज’ की माँग को औपचारिक रूप से मान लिया गया। तय किया गया कि 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्राता दिवस के रूप में मनाया जाएगा और उस दिन लोग पूणर् स्वराज के लिए संघषर् की शपथ लेंगे। इस उत्सव की ओर बहुत कम ही लोगों ने ध्यान दिया। अब स्वतंत्राता के इस अमूतर् विचार को रोशमरार् िान्दगी के ठोस मुद्दों से जोड़ने के लिए महात्मा गांध्ी को कोइर् और रास्ता ढूँढ़ना था। 3.1 नमक यात्रा और सविनय अवज्ञा आंदोलन देश को एकजुट करने के लिए महात्मा गांध्ी को नमक एक शक्ितशाली प्रतीक दिखाइर् दिया। 31 जनवरी 1930 को उन्होंने वायसराय इरविन को एक खत लिखा। इस खत में उन्होंने 11 माँगों का उल्लेख किया था। इनमें से वुफछ सामान्य माँगें थीं जबकि कुछ माँगें उद्योगपतियों से लेकर किसानों तक विभ्िान्न तबव़्ाफों से जुड़ी थीं। गांध्ीजी इन माँगों के शरिए समाज के सभी वगो± को अपने साथ जोड़ना चाहते थे ताकि सभी उनके अभ्िायान में शामिल हो सवेंफ। इनमें सबसे महत्त्वपूणर् माँग नमक कर को खत्म करने के बारे में थी। नमक का अमीर - ग़्ारीब, सभी इस्तेमाल करते थे। यह भोजन का एक अभ्िान्न हिस्सा था। इसीलिए नमक पर कर और उसके उत्पादन पर सरकारी इशारेदारी को महात्मा गांध्ी ने बि्रटिश शासन का सबसे दमनकारी पहलू बताया था। महात्मा गांध्ी का यह पत्रा एक अल्टीमेटम ;चेतावनीद्ध की तरह था। उन्होंने लिखा था कि अगर 11 माचर् तक उनकी माँगें नहीं मानी गइर्ं तो कांग्रेस सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ देगी। इरविन झुकने को तैयार नहीं थे। पफलस्वरूप, महात्मा गांध्ी ने अपने 78 विश्वस्त वाॅलंटियरों के साथ नमक यात्रा शुरू कर दी। यह यात्रा साबरमती में गांध्ीजी के आश्रम से 240 किलोमीटर दूर दांडी नामक गुजराती तटीय व़्ाफस्बे में जाकर खत्म होनी थी। गांध्ीजी की टोली ने 24 दिन तक हर रोश लगभग 10 मील का सप़फर तय किया। गांध्ीजी जहाँ भी रुकते हशारों लोग उन्हें सुनने आते। इन सभाओं में गांध्ीजी ने स्वराज का अथर् स्पष्ट किया और आह्वान किया कि लोग अंग्रेजों की शांतिपूवर्क अवज्ञा करें यानी अंग्रेशों का कहा न मानें। 6 अप्रैल को वह दांडी पहुँचे और उन्होंने समुद्र का पानी उबालकर नमक बनाना शुरू कर दिया। यह व़्ाफानून का उल्लंघन था। यहीं से सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू होता है। यह आंदोलन असहयोग आंदोलन के मुव़्ाफाबले किस तरह अलग था? इस बार लोगों को न केवल अंग्रेशों का सहयोग न करने के लिए बल्िक औपनिवेश्िाक व़्ाफानूनों का उल्लंघन करने के लिए आह्वान किया जाने लगा। देश के विभ्िान्न भागों में चित्रा 7 - दांडी माचर्। नमक यात्रा के दौरान महात्मा गांध्ी के साथ उनके 78 सहयोगी भी गए थे। रास्ते में हशारों लोग इस यात्रा में जुड़ते गए। हशारों लोगों ने नमक व़्ाफानून तोड़ा, और सरकारी नमक कारखानों के सामने प्रदशर्न किए। आंदोलन पैफला तो विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया जाने लगा। शराब की दुकानों की पिके¯टग होने लगी। किसानों ने लगान और चैकीदारी कर चुकाने से इनकार कर दिया। गाँवों में तैनात कमर्चारी इस्तीप़ेफ देने लगे। बहुत सारे स्थानों पर जंगलों में रहने वाले वन व़्ाफानूनों का उल्लंघन करने लगे। वे लकड़ी बीनने और मवेश्िायों को चराने के लिए आरक्ष्िात वनों में घुसने लगे। इन घटनाओं से ¯चतित औपनिवेश्िाक सरकार कांग्रेसी नेताओं को गिरफ्ऱतार करने लगी। बहुत सारे स्थानों पर ¯हसक टकराव हुए। अप्रैल 1930 में जब महात्मा गांध्ी के सम£पत साथी अब्दुल गफ्ऱप़फार ख़ान को गिरफ्ऱतार किया गया तो गुस्साइर् भीड़ सशस्त्रा बख़्तरबंद गाडि़यों और पुलिस की गोलियों का सामना करते हुए सड़कों पर उतर आइर्। बहुत सारे लोग मारे गए। महीने भर बाद जब महात्मा गांध्ी को भी गिरफ्ऱतार कर लिया गया तो शोलापुर के औद्योगिक मशदूरों ने अंग्रेशी शासन का प्रतीक पुलिस चैकियों, नगरपालिका भवनों, अदालतों और रेलवे स्टेशनों पर हमले शुरू कर दिए। भयभीत सरकार ने निमर्म दमन का रास्ता अपनाया। शांतिपूणर् सत्याग्रहियों पर हमले किए गए, औरतों व बच्चों को मारा - पीटा गया और लगभग एक लाख लोग गिरफ्ऱतार किए गए। महात्मा गांध्ी ने एक बार पिफर आंदोलन वापस ले लिया। 5 माचर् 1931 को उन्होंने इरविन के साथ एक समझौते पर दस्तखत कर दिए। इस गांधी - इरविन समझौते के शरिए गांध्ीजी ने लंदन में होने वाले दूसरे गोलमेश सम्मेलन में हिस्सा लेने पर अपनी सहमति व्यक्त कर दी ;पहले गोलमेश सम्मेलन का कांग्रेस बहिष्कार कर चुकी थीद्ध। इसके बदले सरकार राजनीतिक व़्ौफदियों को रिहा करने पर राशी हो गइर्। दिसंबर 1931 में सम्मेलन के लिए गांध्ीजी लंदन गए। यह वातार् बीच में ही टूट गइर् और उन्हें निराश वापस लौटना पड़ा। यहाँ आकर उन्होंने पाया कि सरकार ने नए सिरे से दमन शुरू कर दिया है। गफ्ऱप़फार ख़ान और जवाहरलाल नेहरू, दोनों जेल में थे। कांग्रेस को ग़्ौरव़्ाफानूनी घोष्िात कर दिया गया था। सभाओं, प्रदशर्नों और बहिष्कार जैसी गतिवििायों को रोकने के लिए सख़्त व़्ाफदम उठाए जा रहे थे। भारी आशंकाओं के बीच महात्मा गांध्ी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन दोबारा शुरू कर दिया। साल भर तक आंदोलन चला लेकिन 1934 तक आते - आते उसकी गति मंद पड़ने लगी थी। 3.2 लोगों ने आंदोलन को वैफसे लिया आइए देखें कि सिविल नाप़फरमानी या सविनय अवज्ञा आंदोलन में शामिल विभ्िान्न सामाजिक समूह कौन से थे? उन्होंने आंदोलन में हिस्सा क्यों लिया? उनके आदशर् क्या थे? उनके लिए स्वराज के क्या मायने थे? गाँवों में संपन्न किसान समुदाय - जैसे गुजरात के पटीदार और उत्तर प्रदेश के जाट - आंदोलन में सिय थे। व्यावसायिक पफसलों की खेती करने के कारण व्यापार में मंदी और गिरती व़्ाफीमतों से वे बहुत परेशान थे। जब उनकी नव़्ाफद आय खत्म होने लगी तो उनके लिए सरकारी लगान चुकाना नामुमकिन हो गया। सरकार लगान कम करने को तैयार नहीं थी। चारों तरप़फ असंतोष था। संपन्न किसानों ने सविनय अवज्ञा आंदोलन का बढ़ - चढ़ कर समथर्न किया। उन्होंने अपने समुदायों को एकजुट किया और कइर् बार अनिच्छुक सदस्यों को बहिष्कार के लिए मजबूर किया। उनके लिए स्वराज की लड़ाइर् भारी लगान के ख्ि़ालापफ़लड़ाइर् थी। लेकिन जब 1931 में लगानों के घटे बिना आंदोलन वापस ले लिया गया तो उन्हें बड़ी निराशा हुइर्। पफलस्वरूप, जब 1932 में आंदोलन दुबारा शुरू हुआ तो उनमें से बहुतों ने उसमें हिस्सा लेने से इनकार कर दिया। ग़्ारीब किसान केवल लगान में कमी नहीं चाहते थे। उनमें से बहुत सारे किसान जमींदारों से पट्टे पर जमीन लेकर खेती कर रहे थे। महामंदी लंबी ख्िंाची और नव़्ाफद आमदनी गिरने लगी तो छोटे पट्टेदारों के लिए शमीन का किराया चुकाना भी मुश्िकल हो गया। वे चाहते थे कि उन्हें शमींदारों को जो भाड़ा चुकाना था उसे माप़फ कर दिया जाए। इसके लिए उन्होंने कइर् रेडिकल आंदोलनों में हिस्सा लिया जिनका नेतृत्व अकसर समाजवादियों और कम्युनिस्टों के हाथों में होता था। अमीर किसानों और शमींदारों की नाराशगी के भय से कांग्रेस ‘भाड़ा विरोधी’ आंदोलनों को समथर्न देने में प्रायः हिचकिचाती थी। इसी कारण ग़्ारीब किसानों और कांग्रेस के बीच संबंध अनिश्िचत बने रहे। बाॅक्स 1 ‘क्रांति की इस पूजा - वेदी पर हम अपना यौवन नैवेद्य के रूप में लाए हैं’ बहुत सारे राष्ट्रवादियों को लगता था कि अंग्रेशों के ख्ि़ालापफ़संघषर् अहिंसा के शरिए पूरा नहीं हो सकता। 1928 में दिल्ली स्िथत प्ि़ाफरोशशाह कोटला मैदान में हुइर् बैठक में ¯हदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्िलकन आमीर् ;एच.एस.आर.ए.द्ध की स्थापना की गइर्। इसके नेताओं में भगत ¯सह, जतिन दास और अजाॅय घोष शामिल थे। देश के विभ्िान्न भागों में कारर्वाइयाँ करते हुए एचएस.आर.ए. ने बि्रटिश सत्ता के कइर् प्रतीकों को निशाना बनाया।1929 में भगत ¯सह और बटुकेश्वर दत्त ने लेजिस्लेटिव असेंबली में बम पेंफका। उसी साल उस ट्रेन को उड़ाने का प्रयास किया गया जिसमें लाॅडर् इरविन यात्रा कर रहे थे। जिस समय भगत ¯सह पर मुवफदमा चला और उन्हें पफाँसी दी गइर् उस समय उनकी उम्ऱकेवल 23 साल थी। अपने मुव़्ाफदमे के दौरान भगत ¯सह ने कहा था कि वे ‘बम और पिस्तौल की उपासना नहीं करते’ बल्िक समाज में क्रांति चाहते हैं μ ‘क्रांति मानवजाति का जन्मजात अध्िकार है जिसका अपहरण नहीं किया जा सकता। स्वतंत्राता प्रत्येक मनुष्य का जन्मसि( अध्िकार है। श्रमिक वगर् ही समाज का वास्तविक पोषक है, जनता कीसवोर्परि सत्ता की स्थापना श्रमिक वगर् का अंतिम लक्ष्य है। इन आदशो± के लिए और इस विश्वास के लिए हमें जो भी दंड दिया जाएगा, हम उसका सहषर् स्वागत करेंगे। क्रांति की इस पूजा - वेदी पर हम अपना यौवन नैवेद्य के रूप में लाए हैं, क्योंकि ऐसे महान आदशर् के लिए बड़े - से - बड़ा त्याग भी कम है। हम संतुष्ट हैं और क्रांति के आगमन की उत्सुकतापूवर्क प्रतीक्षा कर रहे हैं। ‘इंकलाब ¯शदाबाद!’ भगत¯सह, बटुकेश्वरदत्त, ‘बमकांड पर सेशन कोटर् में बयान’ ;6 जून 1929 दिल्लीद्ध, भगत¯सह और उनके साथ्िायों के दस्तावेश, जगमोहन ¯सह, चमनलाल ;संद्ध से उ(ृत, राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, 2005 व्यवसायी वगर् की क्या स्िथति थी? उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन के बारे में क्या रुख अपनाया? पहले विश्वयु( के दौरान भारतीय व्यापारियों और उद्योगपतियों ने भारी मुनाप़फा कमाया था और वे ताव़्ाफतवर हो चुके थे ;देखें अध्याय 5द्ध। अपने कारोबार को पैफलाने के लिए उन्होंने ऐसी औपनिवेश्िाक नीतियों का विरोध किया जिनके कारण उनकी व्यावसायिक गतिवििायों मंे रुकावट आती थी। वे विदेशी वस्तुओं के आयात से सुरक्षा चाहते थे और रुपया - स्ट²लग विदेशी विनिमय अनुपात में बदलाव चाहते थे जिससे आयात में कमी आ जाए। व्यावसायिक हितों को संगठित करने के लिए उन्होंने 1920 में भारतीय औद्योगिक एवं व्यावसायिक कांग्रेस ;इंडियन इंडस्िट्रयल एंड कमश्िर्ायल कांग्रेसद्ध और 1927 में भारतीय वाण्िाज्य एवं उद्योग परिसंघ ;पेफडरेशन आॅप़फ इंडियन चैंबर आॅप़फ काॅमसर् एंड इंडस्ट्रीμपिफक्कीद्ध का गठन किया। पुरुषोत्तमदास ठावुफरदास और जी.डी. बिड़ला जैसे जाने - माने उद्योगपतियों के नेतृत्व में उद्योगपतियों ने भारतीय अथर्व्यवस्था पर औपनिवेश्िाक नियंत्राण का विरोध किया और पहले सिविल नाप़फरमानी आंदोलन का समथर्न किया। उन्होंने आंदोलन को आ£थक सहायता दी और आयातित वस्तुओं को खरीदने या बेचने से इनकार कर दिया। श्यादातर व्यवसायी स्वराज को एक ऐसे युग के रूप में देखते थे जहाँ कारोबार पर औपनिवेश्िाक पाबंदियाँ नहीं होंगी और व्यापार व उद्योग निबार्ध ढंग से पफल - पूफल सवेंफगे। गोलमेश सम्मेलन की विपफलता के बाद व्यावसायिक संगठनों का उत्साह भी मंद पड़ गया था। उन्हें उग्र गतिवििायों का भय था। वे लंबी अशांति की आशंका और कांग्रेस के युवा सदस्यों में समाजवाद के बढ़ते प्रभाव से डरे हुए थे। औद्योगिक श्रमिक वगर् ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में नागपुर के अलावा और कहीं भी बहुत बड़ी संख्या में हिस्सा नहीं लिया। जैसे - जैसे उद्योगपति कांग्रेस के नशदीक आ रहे थे, मशदूर कांग्रेस से छिटकने लगे थे। पिफर भी, वुफछ मशदूरों ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में हिस्सा लिया। उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार जैसे वुफछ गांध्ीवादी विचारों को कम वेतन व खराब कायर्स्िथतियों के ख्ि़ालाप़फ अपनी लड़ाइर् से जोड़ लिया था। 1930 में रेलवे कामगारों की और 1932 में गोदी कामगारों की हड़ताल हुइर्। 1930 में छोटा नागपुर की टिन खानों के हशारों मशदूरों ने गांध्ी टोपी पहनकर रैलियों और बहिष्कार अभ्िायानों में हिस्सा लिया। पिफर भी, कांग्रेस अपने कायर्क्रम में मशदूरों की माँगों को समाहित करने में हिचकिचा रही थी। कांग्रेस को लगता था कि इससे उद्योगपति आंदोलन से दूर चले जाएँगे और साम्राज्यवाद विरोधी ताव़्ाफतों में पूफट पडे़गी। सिविल नाप़फरमानी आंदोलन में औरतों ने बड़े पैमाने पर हिस्सा लिया। गांधीजी के नमक सत्याग्रह के दौरान हशारों औरतें उनकी बात सुनने के लिए घर से बाहर आ जाती थीं। उन्होंने जुलूसों में हिस्सा लिया, नमक बनाया, वुफछ महत्त्वपूणर् तिथ्िायाँ 1918 - 19 बाबा रामचंद्र उत्तर प्रदेश के किसानों को संगठित करते हैं। अप्रैल 1919 राॅलट एक्ट के ख्ि़ालाप़फ गांध्ीवादी हड़तालऋ जलियाँवाला बाग़्ा हत्याकांड। जनवरी 1921 असहयोग और ख्ि़ालाप़्ाफत आंदोलन शुरू। पफरवरी 1922 चैरी चैराऋ गांध्ीजी असहयोग आंदोलन वापस ले लेते हैं। मइर् 1924 अल्लूरी सीताराम राजू की गिरफ्ऱतारीऋ दो वषर् से चला आ रहा हथ्िायारबंद आदिवासी संघषर् समाप्त। दिसंबर 1929 लाहौर अिावेशनऋ कांग्रेस ‘पूणर् स्वराज’ की माँग को स्वीकार कर लेती है। 1930 अंबेडकर दमित वगर् एसोसिएशन की स्थापना करते हैं। माचर् 1930 गांध्ीजी दांडी में नमक व़्ाफानून का उल्लंघन करके सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करते हैं। माचर् 1931 गांध्ीजी सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस ले लेते हैं। दिसंबर 1931 दूसरा गोलमेश सम्मेलन। 1932 सविनय अवज्ञा आंदोलन पुनः प्रारंभ। चित्रा 9 - राष्ट्रवादी जुलूसों में औरतें भी शामिल थीं। राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान बहुत सारी औरतें अपनी ¯शदगी में पहली बार अपने घर से निकलकर सावर्जनिक क्षेत्रा में आइर् थीं। इस चित्रा में आप बच्चों को गोद में लिए बहुत सारी श्यादा उम्र वाली औरतों और माँओं को भी जुलूस में देख सकते हैं। विदेशी कपड़ों व शराब की दुकानों की पिके¯टग की। बहुत सारी महिलाएँ जेल भी गइर्ं। शहरी इलाव़्ाफों में श्यादातर ऊँची जातियों की महिलाएँ सिय थीं जबकि ग्रामीण इलाव़्ाफों में संपन्न किसान परिवारों की महिलाएँ आंदोलन में हिस्सा ले रही थीं। गांध्ीजी के आह्वान के बाद औरतों को राष्ट्र की सेवा करना अपना पवित्रा दायित्व दिखाइर् देने लगा था। लेकिन सावर्जनिक भूमिका में इस इशाप़ेफ का मतलब यह नहीं था कि औरतों की स्िथति में कोइर् भारी बदलाव आने वाला था। गांध्ीजी का मानना था कि घर चलाना, चूल्हा - चैका सँभालना, अच्छी माँ व अच्छी पत्नी की भूमिकाओं का निवार्ह करना ही औरत का असली कत्तर्व्य है। इसीलिए लंबे समय तक कांग्रेस संगठन में किसी भी महत्त्वपूणर् पद पर औरतों को जगह देने से हिचकिचाती रही। कांग्रेस को उनकी प्रतीकात्मक उपस्िथति में ही दिलचस्पी थी। 3.3 सविनय अवज्ञा की सीमाएँ सभी सामाजिक समूह स्वराज की अमूतर् अवधारणा से प्रभावित नहीं थे। ऐसा ही एक समूह राष्ट्र के ‘अछूतों’ का था। वे 1930 के बाद खुद को दलित या उत्पीडि़त कहने लगे थे। कांग्रेस ने लंबे समय तक दलितों पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि कांग्रेस रूढि़वादी सवणर् हिंदू सनातनपंथ्िायों से डरी हुइर् थी। लेकिन महात्मा गांध्ी ने ऐलान किया कि अस्पृश्यता ;छुआछूतद्ध को खत्म किए बिना सौ साल तक भी स्वराज की स्थापना नहीं की जा सकती। उन्होंने चचार् करें सविनय अवज्ञा आंदोलन में विभ्िान्न वगो± और समूहों ने क्यों हिस्सा लिया? ‘अछूतों’ को हरिजन यानी इर्श्वर की संतान बताया। उन्हें मंदिरों, सावर्जनिक तालाबों, सड़कों और वुफओं पर समान अिाकार दिलाने के लिए सत्याग्रह किया। मैला ढोनेवालों के काम को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए वे खुद शौचालय साप़फ करने लगे। उन्होंने ऊँची जातियों का आह्वान किया कि वे अपना हृदय परिवतर्न करें और ‘अस्पृश्यता के पाप’ को छोड़ें। लेकिन बहुत सारे दलित नेता अपने समुदाय की समस्याओं का अलग राजनीतिक हल ढूँढ़ना चाहते थे। वे खुद को संगठित करने लगे। उन्होंने श्िाक्षा संस्थानों में आरक्षण के लिए आवाश उठाइर् और अलग निवार्चन क्षेत्रों की बात कही ताकि वहाँ से विधायी परिषदों के लिए केवल दलितों को ही चुनकर भेजा जा सके। उनका मानना था कि उनकी सामाजिक अपंगता केवल राजनीतिक सशक्तीकरण से ही दूर हो सकती है। इसलिए सविनय अवज्ञा आंदोलन में दलितों की हिस्सेदारी काप़फी समित थी। महाराष्ट्र और नागपुर क्षेत्रा में यह बात खासतौर से दिखाइर् देती थी जहाँ उनके संगठन काप़फी मशबूत थे। डाॅ. अंबेडकर ने 1930 में दलितों को दमित वगर् एसोसिएशन ;क्मचतमेेमक ब्संेेमे ।ेेवबपंजपवदद्ध में संगठित किया। दलितों के लिए अलग निवार्चन क्षेत्रों के सवाल पर दूसरे गोलमेश सम्मेलन में महात्मा गांध्ी के साथ उनका काप़फी विवाद हुआ। जब बि्रटिश सरकार ने अंबेडकर की माँग मान ली तो गांध्ीजी आमरण अनशन पर बैठ गए। उनका मत था कि दलितों के लिए अलग निवार्चन क्षेत्रों की व्यवस्था से समाज में उनके एकीकरण की प्रिया धीमी पड़ जाएगी। आख्िारकार अंबेडकर ने गांध्ीजी की राय मान ली और सितंबर 1932 में पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर कर दिए। इससे दमित वगो± ;जिन्हें बाद में अनुसूचित जाति के नाम से जाना गयाद्ध को प्रांतीय एवं वेंफद्रीय विधायी परिषदों में आरक्ष्िात सीटें मिल गइर्ं हालाँकि उनके लिए मतदान सामान्य निवार्चन क्षेत्रों में ही होता था। पिफर भी, दलित आंदोलन कांग्रेस के नेतृत्व में चल रहे राष्ट्रीय आंदोलन को शंका की दृष्िट से ही देखता रहा। भारत के वुफछ मुस्िलम राजनीतिक संगठनों ने भी सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रति कोइर् खास उत्साह नहीं दिखाया। असहयोग - ख्ि़ालापफत आंदोलन के शांत़पड़ जाने के बाद मुसलमानों का एक बहुत बड़ा तबव़्ाफा कांग्रेस से कटा हुआ महसूस करने लगा था। 1920 के दशक के मध्य से कांग्रेस ¯हदू महासभा जैसे ¯हदू धा£मक राष्ट्रवादी संगठनों के काप़फी करीब दिखने लगी थी। जैसे - जैसे ¯हदू - मुसलमानों के बीच संबंध खराब होते गए, दोनों समुदाय उग्र धा£मक जुलूस निकालने लगे। इससे कइर् शहरों में ¯हदू - मुस्िलम सांप्रदायिक टकराव व दंगे हुए। हर दंगे के साथ दोनों समुदायों के बीच पफासला बढ़ता गया।़कांग्रेस और मुस्िलम लीग ने एक बार पिफर गठबंधन का प्रयास किया। 1927 में ऐसा लगा भी कि अब एकता स्थापित हो ही जाएगी। सबसे महत्त्वपूणर् मतभेद भावी विधान सभाओं में प्रतिनििात्व के सवाल पर थे। मुस्िलम लीग के नेताओं में से एक, मोहम्मद अली जिन्ना का कहना था कि अगर मुसलमानों को वंेफद्रीय सभा में आरक्ष्िात सीटें दी जाएँ और मुस्िलम बहुल प्रांतों ;बंगाल और पंजाबद्ध में मुसलमानों को आबादी के अनुपात में प्रतिनििात्व दिया जाए तो वे मुसलमानों के लिए पृथक निवार्चिका की माँग छोड़ने के लिए तैयार हैं। प्रतिनििात्व के सवाल पर यह बहस - मुबाहिसा चल ही रहा था कि 1928 में आयोजित किए गए सवर्दलीय सम्मेलन में ¯हदू महासभा के एम.आर. जयकर ने इस समझौते के लिए किए जा रहे प्रयासों की खुलेआम निंदा शुरू कर दी जिससे इस मुद्दे के समाधान की सारी संभावनाएँ समाप्त हो गईं। जब सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ उस समय समुदायों के बीच संदेह और अविश्वास का माहौल बना हुआ था। कांग्रेस से कटे हुए मुसलमानों का बड़ा तबव़्ाफा किसी संयुक्त संघषर् के लिए तैयार नहीं था। बहुत सारे मुस्िलम नेता और बुिजीवी भारत में अल्पसंख्यकों के रूप में मुसलमानों की हैसियत को लेकर ¯चता जता रहे थे। उनको भय था कि ¯हदू बहुसंख्या के वचर्स्व की स्िथति में अल्पसंख्यकों की संस्कृति और पहचान खो जाएगी। ड्डोत - घ चचार् करें ड्डोत - घ को ध्यान से पढ़ें। क्या आप सांप्रदायिकता के बारे में इव़्ाफबाल के विचारों से सहमत हैं? क्या आप सांप्रदायिकता को अलग प्रकार से परिभाष्िात कर सकते हैं? 4 सामूहिक अपनेपन का भाव ध्यान से देखें कि तिलक एकता के प्रतीकों से घ्िारे हुए हैं। चित्रा के चारों ओर विभ्िान्न धमो± के पवित्रा स्थान ;मंदिर, चचर्, मस्िजदद्ध चित्रिात किए गए हैं। राष्ट्रवाद की भावना तब पनपती है जब लोग ये महसूस करने लगते हैं कि वे एक ही राष्ट्र के अंग हैंऋ जब वे एक - दूसरे को एकता के सूत्रा में बाँधने वाली कोइर् साझा बात ढूँढ़ लेते हैं। लेकिन राष्ट्र लोगों के मस्ितष्क में एक यथाथर् का रूप कैसे लेता है? विभ्िान्न समुदायों, क्षेत्रों या भाषाओं से संब( अलग - अलग समूहों ने सामूहिक अपनेपन का भाव वैफसे विकसित किया? सामूहिक अपनेपन की यह भावना आंश्िाक रूप से संयुक्त संघषो± के चलतेपैदा हुइर् थी। इनके अलावा बहुत सारी सांस्कृतिक प्रियाएँ भी थीं जिनके शरिए राष्ट्रवाद लोगों की कल्पना और दिलोदिमाग़्ा पर छा गया था। इतिहास व साहित्य, लोक कथाएँ व गीत, चित्रा व प्रतीक, सभी ने राष्ट्रवाद को साकार करने में अपना योगदान दिया था। जैसा कि आप जानते है, राष्ट्र की पहचान सबसे श्यादा किसी तसवीर में अंकित की जाती है ;देखें अध्याय 1द्ध। इससे लोगों को एक ऐसी छवि गढ़ने में मदद मिलती है जिसके शरिए वे राष्ट्र को पहचान सकते हैं। बीसवीं सदी में राष्ट्रवाद के विकास के साथ भारत की पहचान भी भारत माता की छवि का रूप लेने लगी। यह तसवीर पहली बार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने बनाइर् थी। 1870 के दशक में उन्होंने मातृभूमि की स्तुति के रूप में ‘वन्दे मातरम्’ गीत लिखा था। बाद में इसे उन्होंने अपने उपन्यास आनन्दमठ में शामिल कर लिया। यह गीत बंगाल में स्वदेशी आन्दोलन में खूब गाया गया। स्वदेशी आंदोलन की प्रेरणा से अबनीन्द्रनाथ टैगोर ने भारत माता की विख्यात छवि को चित्रिात किया ;देखें चित्रा 12द्ध। इस पेंटिग में भारत माता को एक संन्यासिनी के रूप में दशार्या गया है। वह शांत, गंभीर, दैवी और अध्यात्िमक गुणों से युक्त दिखाइर् देती है। आगे चल कर जब इस छवि को बड़े पैमाने पर तसवीरों में उतारा जाने लगा और विभ्िान्न कलाकार यह तसवीर बनाने लगे तो भारत माता की छवि विविध रूप ग्रहण करती गइर् ;देखें चित्रा 14द्ध। इस मातृ छवि के प्रति श्र(ा को राष्ट्रवाद में आस्था का प्रतीक माना जाने लगा। राष्ट्रवाद का विचार भारतीय लोक कथाओं को पुनजीर्वित करने के आंदोलन से भी मशबूत हुआ। उन्नीसवीं सदी के आख्िार में राष्ट्रवादियों ने भाटों व चारणों द्वारा गाइर् - सुनाइर् जाने वाली लोक कथाओं को दजर् करना शुरू कर दिया। वे लोक गीतों व जनश्रुतियों को इकट्ठा करने के लिए गाँव - गाँव घूमनेलगे। उनका मानना था कि यही कहानियाँ हमारी उस परंपरागत संस्कृति की सही तसवीर पेश करती हैं जो बाहरी ताव़्ाफतों के प्रभाव से भ्रष्ट और दूष्िात हो चुकी है। अपनी राष्ट्रीय पहचान को ढूंढ़ने और अपने अतीत में गौरव का भाव पैदा करने के लिए इस लोक परंपरा को बचाकर रखना जरूरी था। बगंाल में खुद रबीन्द्रनाथ टैगोर भी लोक - गाथा गीत, बाल गीत और मिथकों ध्यान से देखें कि यहाँ दशार्इर् गइर् माँ की छवि श्िाक्षा, भोजन और कपड़े दे रही है। एक हाथ में माला उसके संन्यासी को इकट्ठा करने निकल पड़े। उन्होंने लोक परंपराओं को पुनजीर्वित करने वाले आंदोलन का नेतृत्व किया। मद्रास में नटेसा शास्त्राी ने द प़्ाफोकलोसर् आॅप़फ सदनर् इंडिया के नाम से तमिल लोक कथाओं का विशाल संकलन चार खंडों में प्रकाश्िात किया। उनका मानना था कि लोक कथाएँ राष्ट्रीय साहित्य होती हैंऋ यह ‘लोगों के असली विचारों और विश्िाष्टताओं की सबसे विश्वसनीय अभ्िाव्यक्ित’ है। जैसे - जैसे राष्ट्रीय आंदोलन आगे बढ़ा, राष्ट्रवादी नेता लोगों को एकजुट करनेऔर उनमें राष्ट्रवाद की भावना भरने के लिए इस तरह के चिÉों और प्रतीकों के बारे में और श्यादा जागरूक होते गए। बंगाल में स्वदेशी आंदोलन के दौरान एक तिरंगा झंडा ;हरा, पीला, लालद्ध तैयार किया गया। इसमें बि्रटिश भारत के आठ प्रांतों का प्रतिनििात्व करते कमल के आठ पूफल और ¯हदुओं व मुसलमानों का प्रतिनििात्व करता एक अधर्चंद्र दशार्या गया था। 1921 तक गांध्ीजी ने भी स्वराज का झंडा तैयार कर लिया था। यह भी तिरंगा ;सप़्ोफद, हरा और लालद्ध था। इसके मध्य में गांध्ीवादी प्रतीक चरखे को जगह दी गइर् थी जो स्वावलंबन का प्रतीक था। जुलूसों में यह झंडा थामे चलना शासन के प्रति अवज्ञा का संकेत था। इतिहास की पुनव्यार्ख्या राष्ट्रवाद की भावना पैदा करने का एक और साधन थी। उन्नीसवीं सदी के अंत तक आते - आते बहुत सारे भारतीय यह महसूस करने लगे थे कि राष्ट्र के प्रति गवर् का भाव जगाने के लिए भारतीय इतिहास को अलग ढंग से पढ़ाया जाना चाहिए। अंग्रेजों की नशर में भारतीय पिछड़े हुए और आदिम लोग थे जो अपना शासन खुद नहीं सँभाल सकते। इसके जवाब में भारत के लोग अपनी महान उपलब्िधयों की खोज में अतीत की ओर देखने लगे। उन्होंने उस गौरवमयी प्राचीन युग के बारे में लिखना शुरूकर दिया जब कला और वास्तुश्िाल्प, विज्ञान और गण्िात, धमर् और संस्कृति, व़्ाफानून और दशर्न, हस्तकला और व्यापार पफल - पूफल रहे थे। उनका कहना था की इस महान युग के बाद पतन का समय आया और भारत को ग़्ाुलाम बना लिया गया। इस राष्ट्रवादी इतिहास में पाठकों को अतीत में भारत की महानता व उपलब्िधयों पर गवर् करने और बि्रटिश शासन के तहत दुदर्शा से मुक्ित के लिए संघषर् का मागर् अपनाने का आह्वान किया जाता था। ड्डोत - घ गतिवििा चित्रा 12 और 14 को देख्िाए। क्या आपको लगता है कि यह तसवीरें सभी जातियों और समुदायों को भाएँगी? अपनी राय को संक्षेप में स्पष्ट कीजिए। लोगों को एकजुट करने की इन कोश्िाशों की अपनी समस्याएँ थीं। जिस अतीत का गौरवगान किया जा रहा था वह ¯हदुओं का अतीत था। जिन छवियों का सहारा लिया जा रहा था वे ¯हदू प्रतीक थे। इसलिए अन्य समुदायों के लोग अलग - थलग महसूस करने लगे थे। निष्कषर् अंग्रेश सरकार के ख्ि़ालाप़फ बढ़ता गुस्सा विभ्िान्न भारतीय समूहों और वगो± को स्वतंत्राता के साझा संघषर् में खींच रहा था। महात्मा गांध्ी के नेतृत्व में कांग्रेस ने लोगों के असंतोष और परेशानियों को स्वतंत्राता के संगठित आंदोलन में समाहित करने का प्रयास किया। उन्होंने आंदोलन के शरिए पूरे देश को एकता के सूत्रा में पिरोने का प्रयास किया। लेकिन जैसा कि हमने देखा, इन आंदोलनों में हिस्सा लेने वाले विभ्िान्न समूह और वगर् अलग - अलग आकांक्षाओं और अपेक्षाओं के साथ हिस्सा ले रहे थे। उनकी श्िाकायतें बहुत व्यापक थीं इसलिए औपनिवेश्िाक शासन से मुक्ित का भी सबके लिए अपना - अपना अथर् था। कांग्रेस ने इन विभेदों को हल करने और यह सुनिश्िचत करने के लिए हमेशा प्रयास किया कि एक समूह की माँगों के कारण कोइर् दूसरा समूह दूर न चला जाए। यही वजह है कि आंदोलन के भीतर अकसर बिखराव आ जाता था। कांग्रेस की सरग£मयों और राष्ट्रीय एकता के श्िाखर को छूने के बाद बिखराव और आंतरिक टकरावों के चरण आ जाते थे। संक्षेप में, जो राष्ट्र उभर रहा था वह औपनिवेश्िाक शासन से मुक्ित की चाह रखने वाली बहुत सारी आवाशों का पुंज था। संक्षेप में लिखें चचार् करें 74 परियोजना कायर्

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