इंडो - चाइना में राष्ट्रवादी आंदोलन वियतनाम को औपचारिक रूप से 1945 में यानी भारत से भी पहले आशादी मिल गइर् थी लेकिन वियतनाम गणराज्य की स्थापना के लिए वहाँ के लोगों को तीस साल और संघषर् करना पड़ा। इंडो - चाइना पर केंित इस अध्याय में आपको प्रायद्वीप केएक महत्त्वपूणर् देश वियतनाम के बारे में जानने का मौव़्ाफा मिलेगा। वियतनाम में राष्ट्रवाद का उदय उस प्रकार नहीं हुआ था जिस तरह यूरोप में हुआ था। वियतनामी राष्ट्रवाद औपनिवेश्िाक परिस्िथतियों मे विकसित हआ था। वियतनाम के विभ्िान्नंुसमुदायों को मिला कर आधुनिक वियतनामी राष्ट्र की स्थापना में आंश्िाक रूप से उपनिवेशवाद का योगदान रहा तो दूसरी तरपफ यह भी सच है कि इस राष्ट्र का़रूप - स्वरूप औपनिवेश्िाक वचर्स्व के ख्िालाप़्ाफ चले संघषो± से ही तय हुआ था। यदि आप इंडो - चाइना के ऐतिहासिक अनुभवों को भारत के अनुभवों से मिला कर देखें तो पाएँगे कि इन दोनों समाजों में औपनिवेश्िाक साम्राज्यों का आचरण और तौर - तरीव़्ोफ अलग - अलग थे। दोनों जगह उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन भी अलग - अलग तरीव़्ोफ से ही आगे बढ़ा। इन भ्िान्नताओं और समानताओं को देखते हुए आपको यह समझने में मदद मिलेगी कि दुनिया के भ्िान्न भागों में राष्ट्रवाद कैसे - कैसे विकसित हुआ है और उसने समकालीन विश्व की रंगत - सूरत तय करने में कितनी अहम भूमिका अदा की है। 1 चीन के साये से आशादी इंडो - चाइना तीन देशों से मिल कर बना है। ये तीन देश हैं - वियतनाम, लाओस और कंबोडिया ;चित्रा 1द्ध। इस पूरे इलाव़्ोफ के श्ुारुआती इतिहास को देखने पर पता चलता है कि पहले यहाँ बहुत सारे समाज रहते थे और पूरे इलाव़्ोफपर शक्ितशाली चीनी साम्राज्य का वचर्स्व था। जिसे आज उत्तरी और मध्य वियतनाम कहा जाता है जब वहाँ एक स्वतंत्रा देश की स्थापना कर ली गइर् तो भी वहाँ के शांसकों ने न केवल चीनी शासन व्यवस्था को बल्िक चीनीसंस्कृति को भी अपनाए रखा। वियतनाम उस रास्ते से भी जुड़ा रहा है जिसे समुद्री सिल्क रूट कहा जाता था। इस रास्ते से वस्तुओं, लोगों और विचारों की ख़ूब आवाजाही चलती थी। व्यापार के अन्य रास्तों के माध्यम से वियतनाम उन दूरवतीर् इलाव़्ाफों से भी जुड़ा रहता था चित्रा 2 - पफाइपफो बंदरगाह। इस बंदरगाह की स्थापना पुतर्गाली व्यापारियों ने की थी। यह उन बंदरगाहों में से था जिनका यूरोपीय व्यापारिक कंपनियाँ उन्नीसवीं सदी से भी काप़फी पहले ही इस्तेमाल करने लगी थीं। 1.1 औपनिवेश्िाक वचर्स्व और उसका प्रतिरोध वियतनाम पर प़्ा्रफंासीसियों के व़्ाफब्शे के बाद वियतनामियों की जिंदगी पूरी तरह बदल गइर्। जीवन के हर मोचेर् पर जनता का औपनिवेश्िाक शासकों के साथ टकराव होने लगा। प़्ा्रफंासीसियों का नियंत्राण सबसे श्यादा तो सैनिक और आथ्िार्क मामलों में ही दिखाइर् देता था लेकिन वियतनामी संस्कृति को तहस - नहस करने के लिए भी उन्होंने सुनियोजित प्रयास किए। प़्ा्रफंासीसियों और उनके वचर्स्व का अहसास कराने वाली हर चीज के ख्िालाप़फ वियतनामी समाज के हर तबव़्ोफ ने जमकर संघषर् किया और यहीं से वियतनाम में राष्ट्रवाद के बीज पड़े। चित्रा 3 - न्गूयेन राजवंश के ख्िालाप़फ चढ़ाइर् का नेतृत्व करने वाले प़्ा्रफंासीसी अपफसर प्ऱफांसिस गानिर्ए की दरबारी सिपाहियों के हाथों हत्या का दृश्य। गानिर्ए उस प़्ा्रफंासीसी दल का सदस्य था जिसने मेकोंग नदीकी खोज की थी। 1873 में प़्ा्रफंासीसियों ने गानिर्ए को उत्तर में स्िथत टोंकिन प्रांत में प़्ा्रफंासीसी उपनिवेश स्थापित करने का जिम्मा सौंपा था। उसने टोंकिन की राजधानी हनोइर् पर हमला तो किया लेकिन इस यु( में वह खुद मारा गया था। प़्ा्रफंासीसी सेना ने पहली बार 1858 में वियतनाम की धरती पर डेरा डाला। अस्सी के दशक केमध्य तक आते - आते उन्होंने देश के उत्तरी इलाव़्ोफ पर मशबूती से व़्ाफब्शा जमा लिया। प़्ा्रफंास - चीन यु( के बाद उन्होंने टोंकिन और अनाम पर भी व़्ाफब्शा कर लिया। 1887 में प़्ा्रेंफच इंडो - चाइना का गठन किया गया। बाद के दशकों में एक ओर प़्ा्रफंासीसी शासक वियतनाम ़पर अपना व़्ाफब्शा जमाते गए और दूसरी तरपफ वियतनामियों को यह बात समझ में आने लगी कि प़्ा्रफंासीसियों के हाथों वे क्या - क्या गँवा चुके हैं। इसी सोच - विचार और जद्दोजहद से वियतनाम में राष्ट्रªवादी प्रतिरोध विकसित हुआ। चित्रा 4 - प़्ा्रफंासीसी अन्वेषण बल द्वारा तैयार किया गया मेकोंग नदी का उत्कीणर् चित्रा। इस अन्वेषण दल में गानिर्ए भी शामिल था। दुनिया भर के उपनिवेशकारों ने नदियों की खोजबीन की है और उनके नक्शे बनाए हैं। औपनिवेश्िाक शासक इस बात को जानने का प्रयास करते थे कि कौन सी नदी कहाँ - कहाँ से होकर जाती है, उसका उद्गम स्थल क्या है और वह कैसे - कैसे भूभागों से होकर गुजरती है। इस जानकारी के आधार पर उनका व्यापार और परिवहन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता था। इन खोजी अभ्िायानों के दौरान असंख्य नक़्शे और तसवीरें बनायी जाती थीं। मशहूर नेत्राहीन शायर न्गूयेन दिन्ह चियू ;1822 - 88द्ध ने अपने देश की दुदर्शा पर शोक व्यक्त करते हुए लिखाμ मैं चिर - अंधकार में जीने को तैयार हूँ, गद्दारों का मुँह देखना मुझे मंशूर नहीं। मुझे कोइर् आदमज़ात न दिखे, कोइर् बात नहीं, किसी इनसान की पीड़ा मुझे मंशूर नहीं। मैं कुछ न देखूँ, कोइर् बात नहीं, वतन को छिन्न - भ्िान्न होते नहीं देख सकता। 1.2 प़्ा्रफंासीसियों को उपनिवेशों की शरूरत क्यों थी एक जमाने में प्राकृतिक संसाधन हासिल करने और शरूरी साशो - सामान जुटाने के लिए उपनिवेश बनाना शरूरी माना जाता था। इसके अलावा, दूसरे पश्िचमी राष्ट्रों की तरह प़्ा्रफंासीसियों को भी लगता था कि दुनिया के पिछड़े समाजों तक सभ्यता की रोशनी पहुँचाना ‘विकसित’ यूरोपीय राष्ट्रों का दायित्व है। प़्ा्रफंासीसियों ने वियतनाम के मेकोंग डेल्टा इलाव़्ोफ में खेती बढ़ाने के लिए सबसे पहले वहाँ नहरें बनाईं और जल निकासी का प्रबंध शुरू किया। सिंचाइर् की विशाल व्यवस्था बनाइर् गइर्। बहुत सारी नयी नहरें और भूमिगत जलधाराएँ बनाइर् गईं। श्यादातर लोगों को शबरदस्ती काम पर लगा कर निमिर्त की गइर् इस व्यवस्था से चावल के उत्पादन में वृि हुइर्। वियतनाम दूसरे देशों को चावल का नियार्त करने लगा। 1873 में चावल की खेती केवल 2,74,000 हैक्टेयर इलाव़्ोफ में होती थी। 27 साल बाद, यानी सन् 1900 में यह क्षेत्रापफल 11 लाख हैक्टेयर और 1930 में बढ़कर 22 लाख हैक्टेयर हो गया था। अब तक वियतनाम का दो - तिहाइर् चावल अंतरार्ष्ट्रीय बाजार में जाने लगा था। 1931 तक वियतनाम दुनिया में चावल का तीसरा सबसे बड़ा नियार्तक बन चुका था। इसी दौरान व्यापारिक वस्तुओं के आवागमन, प़्ाफौजी टुकडि़यों की आवाजाही और पूरे क्षेत्रा पर नियंत्राण व़्ाफायम करने के लिए संरचनागत परियोजनाओं का निमार्ण शुरू कर दिया गया। पूरे इंडो - चाइना से गुजरने वाला एक विशाल रेलनेटवकर् बनाया गया। इसके माध्यम से वियतनाम के उत्तरी व दक्ष्िाणी भाग चीन से जुड़ गए। यह रेल नेटवकर् चीन में स्िथत येनान प्रांत तक जाता था। यह नेटवकर् 1910 में बन कर पूरा हुआ। उसी समय एक और लाइन बिछाइर् गइर् जिसके शरिए कंबोडिया की राजधानी नोम पेन्ह के रास्ते होते हुए वियतनाम को स्याम देश ;उस समय थाइर्लैंड का यही नाम हुआ करता थाद्ध से जोड़ दिया गया। 1920 के दशक तक आते - आते प़्ा्रफंासीसी व्यवसायी अपने कारोबार में श्यादा से श्यादा मुनाप़फा कमाने के लिए वियतनाम सरकार पर इस बात के लिए और दबाव डालने लगे कि संरचनागत परियोजनाओं को और भी तेशी से आगे बढ़ाया जाए। 1.3 क्या उपनिवेशों का विकास करना शरूरी है? इस बारे में कोइर् संदेह नहीं कि स्वामी राष्ट्रों के हितों को पूरा करने के लिए ही उपनिवेश बनाए जाते थे। सवाल यह है कि स्वामी राष्ट्रों के हितों को नए शब्द संरचनागत: ऐसी विशाल परियोजनाएँ जिनसे अथर्व्यवस्था का ढाँचा तैयार होता है। बड़ी सड़क परियोजनाएँ, रेल नेटववर्फ या बिजलीघर आदि इसी तरह की परियोजनाएँ हैं। गतिविध्ि नहर परियोजना पर काम कर रहे एक वियतनामी मशदूर और प़्ा्रफंासीसी उपनिवेशकार के बीच बातचीत की कल्पना कीजिए। प़्ा्रफंासीसी को लगता है कि वह इन पिछड़े लोगों को सभ्यता के प्रकाश में ला रहा है जबकि वियतनामी मशदूर की दलील इसके ख्ि़ालाप़फ है। कक्षा में जोड़े बनाइए और इस पाठ में दिए गए साक्ष्यों के आधार पर इस बातचीत का मंचन कीजिए। साधने का तरीव़्ाफा क्या हो? प्रभावशाली लेखक और नीति - निमार्ता पाॅल बनार्डर् जैसे कुछ लोगों का मानना था कि उपनिवेशों की अथर्व्यवस्था का विकास करना शरूरी है। उनका कहना था कि उपनिवेश मुनाप़फा कमाने के लिए ही बनाए जाते हैं इसलिए अगर ग़्ाुलाम देश की अथर्व्यवस्था मशबूत होगी और लोगों का जीवनस्तर बेहतर होगा तो वे श्यादा चीजें खरीदेंगे जिससे बाशाऱपफैलेगा और प़्ा्रफंासीसी व्यवसायों को पफायदा होगा। बनार्डर् ने वियतनाम की आथ्िार्क प्रगति को बािात करने वाली कइर् बातें गिनवाइर् हैं। जैसे, देश की आबादी श्यादा थी, खेती का उत्पादन स्तर कम था और किसान भारी व़्ाफशेर् में डूबे हुए थे। ग्रामीण ग़्ारीबी कम करने और खेतिहर उत्पादन बढ़ाने के लिए यह शरूरी था कि वियतनाम में भी उसी तरह के भूमि सुधार किए जाएँ जिस तरह के सुधार जापान में 1890 के दशक में किए गए थे। लेकिन इस रास्ते पर चलते हुए यह गारंटी नहीं दी जा सकती थी कि सबको रोशगार भी मिल जाएगा। जैसा कि जापान के अनुभवों से स्पष्ट हो चुका था, नए रोशगार पैदा करने के लिए अथर्व्यवस्था का औद्योगीकरण करना शरूरी था। वियतनाम की औपनिवेश्िाक अथर्व्यवस्था मुख्य रूप से चावल की खेती और रबड़ के बाग़्ाानों पर आश्रित थी। इन पर प़्ा्रफंास और वियतनाम के मुट्ठी भर धनी तबव़्ोफ का स्वामित्व था। इस क्षेत्रा की शरूरतों को पूरा करने के लिए ही रेल और बंदरगाह की सुविधाएँ विकसित की जा रही थीं। रबड़ के बाग़्ाानों में वियतनामी मजदूरों से एकतरप़्ाफा अनुबंध व्यवस्था के तहत काम करवाया जाता था। बनार्डर् की राय के विपरीत प़्ा्रफंासीसियों ने वियतनाम की अथर्व्यवस्था में सुधार के लिए कोइर् ख़ास प्रयास नहीं किए। ग्रामीण इलाव़्ाफों में शमींदारों का बोलबाला था और जीवनस्तर गिरता जा रहा था। नए शब्द एकतरप़फा अनुबंध व्यवस्था: वियतनाम के बागानों में इस तरह की मशदूरी व्यवस्था काप़फी प्रचलित थी। इस व्यवस्था में मशदूर ऐसे अनुबंधों के तहत काम करते थे जिनमें मजदूरों को कोइर् अिाकार नहीं दिए जाते थे जबकि मालिकों को बेहिसाब अिाकार मिलते थे। अगर मशदूर अनुबंध की शतो± के हिसाब से अपना काम पूरा न कर पाएँ तो मालिक उनके ख्िालाप़फ मुव़्ाफदमे दायर कर देते थे, उन्हें सशा देते थे, जेलों में डाल देते थे। 2 औपनिवेश्िाक श्िाक्षा की दुविधा प़्ा्रफंासीसी उपनिवेशवाद सिप़र्फ आथ्िार्क शोषण पर केंित नहीं था। इसके पीछे‘सभ्य’ बनाने का विचार भी काम कर रहा था। जिस तरह भारत में अंग्रेश दावा करते थे उसी तरह प़्ा्रफंासीसियों का दावा था कि वे वियतनाम के लोगोंको आधुनिक सभ्यता से परिचित करा रहे हैं। उनका विश्वास था कि यूरोपमें सबसे विकसित सभ्यता व़्ाफायम हो चुकी है। इसीलिए वे मानते थे कि उपनिवेशों में आधुनिक विचारों का प्रसार करना यूरोपियों का ही दायित्व हैऔर इस दायित्व की पूतिर् करने के लिए अगर उन्हें स्थानीय संस्कृतियों, धमो±व परंपराओं को भी नष्ट करना पड़े तो इसमें कोइर् बुराइर् नहीं है। वैसे भी,यूरोपीय शासक इन संस्कृतियों, धमो± और परंपराओं को पुराना व बेकार मानतेथे। उन्हें लगता था कि ये चीजें आधुनिक विकास को रोकती हैं। ‘देशी’ जनता को सभ्य बनाने के लिए श्िाक्षा को काप़फी अहम माना जाता था।लेकिन वियतनाम में श्िाक्षा का प्रसार करने से पहले प़्ा्रफंासीसियों को एक औरदुविधा हल करनी थी। दुविधा इस बात को लेकर थी कि वियतनामियों को किसहद तक या कितनी श्िाक्षा दी जाए? प़्ा्रफंासीसियों को श्िाक्ष्िात कामगारों की शरूरत तो थी लेकिन ग़्ाुलामों को पढ़ाने - लिखाने से समस्याएँ भी पैदा हो सकती थीं।श्िाक्षा प्राप्त करने के बाद वियतनाम के लोग औपनिवेश्िाक शासन पर सवालभी उठा सकते थे। इतना ही नहीं, वियतनाम में रहने वाले प़्ा्रफंासीसी नागरिकों ;जिन्हें कोलोन कहा जाता थाद्ध को तो यह भी भय था कि स्थानीय लोगों मेंश्िाक्षा के प्रसार से कहीं उनके काम - धंधे और नौकरियाँ भी हाथ से न जातीरहें। इन लोगों में कोइर् श्िाक्षक, कोइर् दुकानदार तो कोइर् पुलिसवाला था। इसीलिएये लोग वियतनामियों को पूरी प़्ा्रफंासीसी श्िाक्षा देने का विरोध करते थे। 2.1 आधुनिक सोच: श्िाक्षा की भाषा श्िाक्षा के क्षेत्रा में प़्ा्रफंासीसियों को एक और समस्या का सामना करना पड़ा।वियतनाम के धनी और अभ्िाजात्य तबव़्ोफ के लोग चीनी संस्कृति से गहरे तौरपर प्रभावित थे। प़्ा्रफंासीसियों की सत्ता को सुदृढ़ आधार प्रदान करने के लिएइस प्रभाव को समाप्त करना शरूरी था। पफलस्वरूप, पहले उन्होंने परंपरागतश्िाक्षा व्यवस्था को सुनियोजित ढंग से तहस - नहस किया और पिफर वियतनामियोंके लिए प़्ा्रफंासीसी किस्म के स्कूल खोल दिए। लेकिन यह कोइर् आसान काम नहीं था। अब तक समाज के खाते - पीते तबव़्ोफ के लोग चीनी भाषा काइस्तेमाल करते थे जिसे हटाना शरूरी था। लेकिन उसकी जगह लेने वालीभाषा कौन सी हो? चीनी भाषा को हटा कर लोगों को वियतनामी भाषा पढ़ायीजाए या उन्हें प़्ा्रफंासीसी भाषा में श्िाक्षा दी जाए? इस सवाल पर लोगों के बीच दो मत थे। कुछ नीति - निमार्ता मानते थे किप़्ा्रफंासीसी भाषा को ही श्िाक्षा का माध्यम बनाया जाए। उन्हें लगता था किप़्ा्रफंासीसी भाषा सीखने से वियतनाम के लोग प़्ा्रफंास की संस्कृति और सभ्यतासे परिचित हो जाएँगे। इस प्रकार ‘यूरोपीय प़्ा्रफंास के साथ मशबूती से बँधे एकएश्िायाइर् प़्ा्रफंास’ की रचना करने में मदद मिलेगी। वियतनाम के श्िाक्षा प्राप्तलोग प़्ा्रफंासीसी भावनाओं व आदशो± का सम्मान करने लगेंगे, प़्ा्रफंासीसी संस्कृतिकी श्रेष्ठता के कायल हो जाएँगे और प़्ा्रफंासीसियों के लिए लगन से काम करने लगेंगे। बहुत सारे लोग इस बात के ख्िालापफ थे कि पढ़ाइर् के लिए़केवल प़्ा्रफंासीसी भाषा को ही माध्यम बनाया जाए। उनका विचार था कि अगर छोटी कक्षाओं में वियतनामी और बड़ी कक्षाओं में प़्ा्रफंासीसी भाषा में श्िाक्षादी जाए तो श्यादा बेहतर होगा। वे तो यहाँ तक चाहते थे कि जो थोड़े से लोगप़्ा्रफंासीसी सीख लेंगे और प़्ा्रफंास की संस्कृति को अपना लेंगे उन्हें प़्ा्रफंास की नागरिकता भी प्रदान कर दी जाएगी। लेकिन स्कूलों में दाख्िाला लेने की ताव़्ाफत तो वियतनाम के धनी वगर् के पासही थी। यह देश की आबादी का एक बहुत छोटा हिस्सा था। जो स्कूल में दाख्िाला ले पाते थे उनमें से भी बहुत थोड़े से विद्याथीर् ही ऐसे होते थे जोसपफलतापूवर्क स्कूल की पढ़ाइर् पूरी कर पाते थे। दरअसल बहुत सारे बच्चोंको तो आख्िारी साल की परीक्षा में जानबूझ कर पेफल कर दिया जाता था ताकिवे अच्छी नौकरियों के लिए योग्यता प्राप्त न कर सवेंफ। आमतौर पर दो तिहाइर्विद्याथ्िार्यों को इसी तरह पेफल कर दिया जाता था। 1925 में 1.7 करोड़ कीआबादी में स्वूफल की पढ़ाइर् पूरी करने वालों की संख्या 400 से भी कम थी। स्कूली किताबों में प़्ा्रफंासीसियों का गुणगान किया जाता था और औपनिवेश्िाकशासन को सही ठहराया जाता था। वियतनामियों को आदिम और पिछड़ादशार्या जाता था जो शारीरिक श्रम तो कर सकते हैं लेकिन बौिक कामों के लायक़ नहीं हैंऋ वे खेतों में काम तो कर सकते हैं लेकिन अपना शासन खुदनहीं चला सकतेऋ वे ‘माहिर नव़्ाफलची’ तो हैं पर उनमें रचनाशीलता नहीं है।स्कूली बच्चों को पढ़ाया जाता था कि वियतनाम में केवल प़्ा्रफंासीसी ही शांतिव़्ाफायम कर सकते हैं: ‘जब से वियतनाम में प़्ा्रफंासीसी शासन की स्थापना हुइर्है, वियतनामी किसान डावुफओं के भय से आशाद हो गए हैं... चारों तरपफअमन - चैन है और किसान दिल लगा कर काम कर सकते हैं।’ 2.2 आधुनिक दिखने की चाह पश्िचमी ढंग की श्िाक्षा देने के लिए 1907 में टोंकिन प्ऱफी स्कूल खोला गयाथा। इस श्िाक्षा में विज्ञान, स्वच्छता और प़्ा्रफंासीसी भाषा की कक्षाएँ भी शामिलथीं ;जो शाम को लगती थीं और उनके लिए अलग से प़्ाफीस ली जाती थीद्ध। इस स्कूल की नशर में ‘आधुनिक’ के क्या मायने थे इससे उस समय की सोच़को अच्छी तरह समझा जा सकता है। स्कूल की राय में, सिपर्फ विज्ञान औऱपश्िचमी विचारों की श्िाक्षा प्राप्त कर लेना ही कापफी नहीं था: आधुनिकबनने के लिए वियतनामियों को पश्िचम के लोगों जैसा ही दिखना भी पड़ेगा।इसीलिए यह स्कूल अपने छात्रों को पश्िचमी शैलियों को अपनाने के लिएउकसाता था। मसलन, बच्चों को छोटे - छोटे बाल रखने की सलाह दी जाती थी। वियतनामियों के लिए यह अपनी पहचान को पूरी तरह बदल डालनेवाली बात थी। वे तो पारंपरिक रूप से लंबे ही बाल रखते थे। इस आमूलपरिवतर्न का महत्त्व स्पष्ट करने वाला एक ‘बाल - कटाइर् श्लोक’ तक गढ़लिया गया थाμ बाएँ हाथ में कंघा थामोऋ दाएँ हाथ में कैंची,कच, कच, कपच, कपचऋ खबरदार, खयाल रखो। वाहियात आदतें छोड़ दोऋ बच्चों जैसा क्यों करते हो,मुँह खोलकर बोलो बेधड़कऋ पश्िचमी तौर - तरीव़्ोफ सीखो। गतिविध्ि कल्पना कीजिए कि 1910 में आप टोंकिन प़्रफी स्कूल में पढ़ रहे हैं। अब सोच कर बताइए कि μ वियतनामियों के बारे में पाठ्यपुस्तकों में जो कुछ पढ़ाया जा रहा है उसे पढ़कर आपकी क्या प्रतििया होती? μ बाल काढ़ने के बारे में जो कुछ बताया जा रहा है उसे पढ़कर आप क्या कहते? 2.3 स्वूफलों में विरोध के स्वर श्िाक्षकों और विद्याथ्िार्यों ने इन पुस्तकों और पाठ्यक्रमों का आँख मूँद कर अनुसरण नहीं किया। कहीं इनका खुलकर विरोध हुआ तो कहीं लोगों नेखामोशी से प्रतिरोध दशर् कराया। जैसे - जैसे छोटी कक्षाओं में वियतनामीश्िाक्षकों की संख्या बढ़ती गइर्, इस बात पर नियंत्राण रखना मुश्िकल होता गया कि उन कक्षाओं में क्या पढ़ाया जा रहा है। बहुत सारे वियतनामी श्िाक्षककिताबों में लिखी बातों को चुपचाप बदल कर पढ़ाने लगते थे और जो उनमेंछपा होता था उसमें मीनमेख निकालने लगते थे। 1926 में साइगाॅन नेटिव गल्सर् स्कूल में एक बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया। विवादतब शुरू हुआ जब एक कक्षा में अगली सीट पर बैठी वियतनामी लड़की कोउठकर पिछली व़्ाफतार में जाकर बैठने के लिए कह दिया गया क्योंकि अगली सीट पर एक स्थानीय प़्ा्रफंासीसी लड़की को बैठना था। वियतनामी लड़की ने सीटछोड़ने से इनकार कर दिया। स्कूल का पि्रंसिपल एक कोलोन ;यानी उपनिवेशोंमें रहने वाले प़्ा्रफंासीसीद्ध था। उसने लड़की को स्कूल से निकाल दिया। जब दूसरेविद्याथ्िार्यों ने पि्रंसिपल के पफैसले का विरोध किया तो उन्हें भी स्कूल से निकालदिया गया। इसके बाद तो यह विवाद और पफैल गया। लोग खुलेआम जुलूसनिकालने लगे। हालात बेकाबू होने लगे तो सरकार ने आदेश दिया कि लड़की को दोबारा स्कूल में वापस ले लिया जाए। पि्रंसिपल ने लड़की को वापस दाख्िालातो दे दिया लेकिन साथ ही यह ऐलान भी कर दिया कि ‘मैं सारे वियतनामियोंको पाँव तले कुचल कर रख दूँगा। वाह! तुम लोग मुझे वापस भ्िाजवाना चाहतेहो। अच्छी तरह गाँठ बाँध लो, जब तक एक भी वियतनामी कोचिनचाइना मेंबसने की जुरर्त करता रहेगा तब तक मैं यहाँ से जाने वाला नहीं हूँ।’ दूसरे इलाव़्ाफों में भी छात्रा - छात्राओं ने सरकार की इस चाल का जमकर विरोध़किया कि वियतनामी बच्चों को सपेफदपोश नौकरियों के लायक योग्यता न मिले। ये विद्याथीर् देशभक्ित की भावानाओं से प्रेरित थे। उनको विश्वास था कि श्िाक्ष्िातोंको समाज के भले के लिए काम करना चाहिए। उनकी इसी सोच के कारण नकेवल प़्ा्रफंासीसियों के साथ बल्िक स्थानीय अभ्िाजात्य वगर् के साथ भी उनकाटकराव बढ़ने लगा क्योंकि दोनों को ही लगता था कि इस तरह तो उनकी हैसियतऔर सत्ता खतरे में पड़ जाएगी। 1920 के दशक तक आते - आते छात्रा - छात्राएँराजनीतिक पाटिर्याँ बनाने लगे थे। उन्होंने यंग अन्नान जैसी पाटिर्यों बना ली थीें और वे अन्नानीज़ स्टूडेंट ;अन्नान के विद्याथीर्द्ध जैसी पत्रिाकाएँ निकालने लगे थे। पाठशालाएँ राजनीतिक - सांस्कृतिक संघषर् के अखाड़ों में तब्दील होने लगीं।श्िाक्षा पर नियंत्राण के माध्यम से प़्ा्रफंासीसी वियतनाम पर अपना व़्ाफब्शा औरमशबूत करने की पि़फराव़्ाफ में थे। वे जनता की मूल्य - मान्यताओं, तौर - तरीकोंऔर रवैयों को बदलने का प्रयास करने लगे ताकि लोग प़्ा्रफंासीसी सभ्यता कोश्रेष्ठ और वियतनामियों को कमतर मानने लगें। दूसरी तरप़फ, वियतनामी बुिजीवियों को लगता था कि प़्ा्रफंासीसियों के शासन में वियतनाम न केवलअपने भूभाग पर अपना नियंत्राण खोता जा रहा है बल्िक अपनी पहचान भीगँवाता जा रहा है। उसकी संस्कृति और मूल्यों का अपमान किया जा रहा थाऔर लोगों में राजा - प्रजा वाला भाव पैदा हो रहा था। प़्ा्रफंासीसी औपनिवेश्िाकश्िाक्षा के ख्िालाप़फ चल रहा संघषर् उपनिवेशवाद के विरोध और स्वतंत्राता केहव़्ाफ में चलने वाले व्यापक संघषर् का हिस्सा बन गया था। कुछ महत्त्वपूणर् तारीखें 1802 न्गूयेन राजवंश के अंतगर्त राष्ट्रीय एकीकरण के प्रतीक न्गूयेन आन्ह की सम्राट के रूप में ताजपोशी होती है। 1867 कोचिनचाइना ;दक्ष्िाणद्ध प़्ा्रफंास का उपनिवेश बन जाता है। 1887 कोचिनचाइना, अन्नम, टोंकिन, कंबोडिया और बाद में लाओस को मिला कर इंडो - चाइना यूनियन की स्थापना की जाती है। 1930 हो ची मिन्ह वियतनामी कम्युनिस्ट पाटीर् की स्थापना करते हैं। 1945 वियेतमिन्ह जनविद्रोह शुरू करते हैं। बाओ दाइर् को गद्दी से हटा दिया जाता है। हो ची मिन्ह हनोइर् में स्वतंत्राता की घोषणा करते हैं ;23 सितंबरद्ध। 1954 दिएन बिएन पूफ के मोचेर् पर प़्ा्रफंासीसी सेना घुटने टेक देती है। 1961 कैनेडी दक्ष्िाणी वियतनाम के लिए अमेरिकी सैनिक सहायता बढ़ाने का निणर्य लेते हैं। 1974 पेरिस शांति संिा। 1975 ;30 अप्रैलद्ध एन.एल.एपफ. की सैनिक टुकडि़याँ साइगाॅन में दाख्िाल होती हैं। 1976 वियतनाम समाजवादी गणराज्य की स्थापना होती है। ़फ - सप़फाइर्, बीमारी और रोशमरार् प्रतिरोध ़़उपनिवेशवाद के ख्िालापफ ऐसे राजनीतिक संघषर् सिपर्फ श्िाक्षा के क्षेत्रा में ही नहीं चल रहे थे। बहुत सारे दूसरे संस्थानों में भी ग़्ाुलाम जनता नाना प्रकार से अपने गुस्से को अभ्िाव्यक्त कर रही थी। 3.1 हनोइर् पर प्लेग का हमला ़़आइए स्वास्थ्य और सापफ - सपफाइर् का ही उदाहरण लें। जब प़्ा्रफंासीसियों ने एक आधुनिक वियतनाम की स्थापना का काम शुरू किया तो उन्होंने प़ैफसला लिया कि वे हनोइर् का भी पुननिर्मार्ण करेंगे। एक नए ‘आधुनिक’ शहर का निमार्ण करने के लिए वास्तुकला के क्षेत्रा में सामने आ रहे नवीनतम विचारों और आधुनिक इंजीनियरिंग निपुणता का इस्तेमाल किया गया। 1903 में हनोइर् के नवनिमिर्त आधुनिक भाग में ब्यूबाॅनिक प्लेग की महामारी पफैल गइर्। बहुत सारे औपनिवेश्िाक देशों में इस बीमारी को पफैलने से रोकने के लिए जो व़्ाफदम उठाए गए उनके कारण भारी सामाजिक तनाव पैदा हुए। परंतु हनोइर् के हालात तो कुछ ख़ास ही थे। हनोइर् के प़्ा्रफंासीसी आबादी वाले हिस्से को एक खूबसूरत और साप़फ - सुथरे शहर के रूप में बनाया गया था। वहाँ चैड़ी सड़कें थीं और निकासी का बढि़या इंतशाम था। ‘देशी’ बस्ती में ऐसी कोइर् आधुनिक सुविधाएँ नहीं थीं। पुराने शहर का सारा कचरा और गंदा पानी सीधे नदी में बहा दिया जाता था। भारी बरसात या बाढ़ के समय तो सारी गंदगी सड़कों पर ही तैरने लगती थी। असल में प्लेग की शुरुआत ही उन चीजों से हुइर् थी जिनको शहर के प़्ा्रफंासीसी भाग में स्वच्छ परिवेश बनाए रखने के लिए लगाया गया था। शहर के आधुनिक भाग में लगे विशाल सीवर आधुनिकता का प्रतीक थे। यही सीवर चूहों के पनपने के लिए भी आदशर् साबित हुए। ये सीवर चूहों की निबार्ध आवाजाही के लिए भी उचित थे। इनमें चलते हुए चूहे पूरे शहर में बेखटके घूमते थे। और इन्हीं पाइपों के रास्ते चूहे प़्ा्रफंासीसियों के चाक - चैबंद घरों में घुसने लगे। अब क्या किया जाए? 3.2 चूहों की पकड़ - धकड़ इस घुसपैठ को रोकने के लिए 1902 में चूहों को पकड़ने की मुहिम शुरू की गइर्। इस काम के लिए वियतनामियों को काम पर रखा गया और उन्हें हर चूहे के बदले इर्नाम दिया जाने लगा। हशारों की संख्या में चूहे पकड़े जाने लगे। उदाहरण के लिए, 30 मइर् को 20,000 चूहे पकड़े गए। इसके बावजूद चूहे खत्म होने का नाम ही न लेते थे। वियतनामियों को चूहों के श्िाकार कीइस मुहिम के शरिए सामूहिक सौदेबाशी का महत्त्व समझ में आने लगा था। जो लोग सीवरों की गंदगी में घुस कर काम करते थे उन्होंने पाया कि अगर वे एकजुट हो जाएँ तो बेहतर मेहनताने के लिए सौदेबाजी कर सकते हैं। उन्होंने इस स्िथति से प़फायदा उठाने के एक से एक नायाब तरीव़्ोफ भी ढूँढ़ निकाले। मशदूरों को पैसा तब मिलता था जब वे यह साबित कर देते थे कि उन्होंने चूहे को पकड़ कर मार डाला है। सबूत के तौर पर उन्हें चूहे की पूँछ लाकर दिखानी पड़ती थी। इस प्रावधान का प़फायदा उठाते हुए मशदूर श्यादा पैसा कमाने के लिए चूहे को पकड़ कर उसकी पूँछ तो काट लेते थे पर चूहे को ¯शदा छोड़ देते थे ताकि वे कभी खत्म न हों और उनको पकड़ने का सिलसिला ऐसे ही चलता रहे। कुछ लोगों ने तो पैसे कमाने के लिए बाव़्ाफायदा चूहे पालना शुरू कर दिया था। निबर्लों के इस प्रतिरोध और असहयोग से तंग आकर आख्िारकार प़्ा्रफंासीसियों ने चूहे के बदले पैसे देने की योजना ही बंद कर दी। लिहाशा, ब्यूबाॅनिक प्लेग खत्म नहीं हुआ। न केवल 1903 में बल्िक अगले कुछ सालों तक यह बीमारी पूरे इलाव़्ोफ में पफैल गइर्। चूहों के आतंक की यह कहानी कइर् मायनों मेंप़्ा्रफंासीसी सत्ता की सीमा और सभ्यता प्रसार के उनके मिशन में निहित अंतविर्रोधों को सामने ला देती है। चूहे पकड़ने वालों की हरकतों से हमें पता चलता है कि वियतनाम के लोग रोज़मरार् की जिंदगी में उपनिवेशवाद का किस - किस तरह से विरोध कर रहे थे। चचार् करें 1903 में पफैली प्लेग की बीमारी और उस पर व़्ाफाबू पाने के लिए जो व़्ाफदम उठाए गए उनसे स्वास्थ्य और साप़फ - सप़फाइर् के प्रति औपनिवेश्िाक प़्ा्रफंासीसी सरकार की सोच और रवैये के बारे में क्या पता चलता है? औपनिवेश्िाक वचर्स्व निजी और सावर्जनिक जीवन के तमाम पहलुओं पर नियंत्राण के रूप में सामने आता था। प़्ा्रफंासीसियों ने न केवल सैनिक ताव़्ाफत के सहारे वियतनाम पर व़्ाफब्शा कर लिया था बल्िक वे वहाँ के सामाजिक औरसांस्कृतिक जीवन को भी पूरी तरह बदल देना चाहते थे। हालाँकि धमर् ने औपनिवेश्िाक शासन को मशबूती प्रदान करने में अहम भूमिका अदा की लेकिन दूसरी ओर उसने प्रतिरोध के नए - नए रास्ते भी खोल दिए थे। आइए देखें कि किस प्रकार ऐसा हुआ। वियतनामियों के धामिर्क विश्वास बौ( धमर्, कन्फ्ऱयूश्िायसवाद और स्थानीय रीति - रिवाजों पर आधारित थे। प़्ा्रफंासीसी मिशनरी वियतनाम में इर्साइर् धमर् के बीज बोने का प्रयास कर रहे थे। उन्हें वियतनामियों के धमिर्क जीवन में इस तरह का घालमेल पसंद नहीं था। उन्हें लगता था कि पराभौतिक शक्ितयों को पूजने की वियतनामियों की आदत को सुधारा जाना चाहिए। अठारहवीं सदी से ही बहुत सारे धामिर्क आंदोलन पश्िचमी शक्ितयों के प्रभाव और उपस्िथति के ख्िालाप़फ जागृति पफैलाने का प्रयास कर रहे थे। 1868 का स्काॅलसर् रिवोल्ट ;विद्वानों का विद्रोहद्ध प़्ा्रफंासीसी व़्ाफब्शे और इर्साइर् धमर् के ़प्रसार के ख्िालापफ शुरुआती आंदोलनों में से था। इस आंदोलन की बागडोर बाॅक्स 1 कन्फ्ऱयूश्िायस ;551 - 479 इर्सा पूवर्द्ध एक चीनी विचारक थे जिन्होंने सदाचार, व्यवहार बुि और उचित सामाजिक संबंधों को आधार बनाते हुए एक दाशर्निक व्यवस्था विकसित की थी। उनके सि(ांतों के आधार पर लोगों को बड़े - बुजुगो± व माता - पिता का आदर करने और उनका कहना मानने का पाठ पढ़ाया जाता था। उन्हें सिखाया जाता था कि राजा और प्रजा का संबंध वैसा ही होना चाहिए जैसा माता - पिता का अपने बच्चों के साथ होता है। चित्रा 8 - कैथलिक मिशनरी प़्ाफादर बोरी को मृत्युदंड देने का चित्रा। प़्ा्रफंास में धामिर्क उन्माद पफैलाने के लिए प़्ा्रफंासीसी कलाकार ऐसी तसवीरें भी छापते थे। शाही दरबार के अप़फसरों के हाथों में थी। ये अप़फसर वैफथलिक धमर् औरप़्ा्रफंासीसी सत्ता के प्रसार से नाराश थे। उन्होंने न्गू अन और हा तिएन प्रांतों में बग़्ाावतों का नेतृत्व किया और एक हशार से श्यादा इर्साइयों का व़्ाफत्ल कर डाला। वैफथलिक मिशनरी सत्राहवीं सदी की शुरुआत से ही स्थानीय लोगों को इर्साइर् धमर् से जोड़ने में लगे हुए थे और अठारहवीं सदी के अंत तक आते - आते उन्होंने लगभग 3,00,000 लोगों को इर्साइर् बना लिया था। प़्ा्रफंासीसियों ने 1868 के आंदोलन को तो कुचल डाला लेकिन इस बग़्ाावत ने प़्ा्रफंासीसियों के ख्िालाप़फ अन्य देशभक्तों में उत्साह का संचार जरूर कर दिया। वियतनाम के अभ्िाजात्य चीनी भाषा और कन्फ्ऱयूश्िायसवाद की श्िाक्षा लेते थे। लेकिन किसानों के धामिर्क विश्वास बहुत सारी समन्वयवादी परंपराओं से जन्मे थे जिनमें बौ( धमर् और स्थानीय मूल्य - मान्यताओं, दोनों का सम्िमश्रण था। वियतनाम में बहुत सारे पंथ ऐसे लोगों के शरिए पैफले थे जिनका दावा था कि उन्होंने इर्श्वर की आभा देखी है। इनमें से कुछ धामिर्क आंदोलन प़्ा्रफंासीसियों का समथर्न करते थे जबकि कुछ औपनिवेश्िाक शासन के विरु( चलने वाले आंदोलनों के पक्षधर थे। होआ हाओ ऐसा ही एक आंदोलन था। यह आंदोलन 1939 में शुरू हुआ था। हरे - भरे मेकोंग डेल्टा इलाव़्ोफ में इसे भारी लोकपि्रयता मिली। यह आंदोलन उन्नीसवीं सदी के उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों में उपजे विचारों से प्रेरित था। होआ हाओ आंदोलन के संस्थापक का नाम था हुइन्ह पूफ सो। वह जादू - टोना और ग़्ारीबों की मदद किया करते थे। व्यथर् खचेर् के ख्िालाप़फ उनके उपदेशों का लोगों में कापफी असर था। वह बालिका वधुओं की खरीद - प़फरोख़्त, शराब़व अप़्ाफीम के प्रखर विरोधी थे। प़्ा्रफंासीसियों ने हुइन्ह पूफ सो के विचारों पर आधारित आंदोलन को कुचलने का कइर् तरह से प्रयास किया। उन्होंने पूफ सो को पागल घोष्िात कर दिया। प़्ा्रफंासीसी उन्हें पागल बोन्ज़े कह कर बुलाते थे। सरकार ने उन्हें पागलखाने में डाल दिया था। मशे की बात यह थी कि जिस डाॅक्टर को यह जिम्मेदारी सौंपी गइर् कि वह पूफ सो को पागल घोष्िात करेगा वही कुछ समय में उनका अनुयायी बन गया। आख्िारकार 1941 में प़्ा्रफंासीसी डाॅक्टरों ने भी मान लिया कि वह पागल नहीं हैं। इसके बाद प़्ा्रफंासीसी सरकार ने उन्हें वियतनाम से निष्कासित करके लाओस भेज दिया। उनके बहुत सारे समथर्कों और अनुयायियों को यातना श्िाविर ;ब्वदबमदजतंजपवद ब्ंउचद्ध में डाल दिया गया। इस तरह के आंदोलनों का राष्ट्रवाद की मुख्यधारा के साथ अंतविर्रोधी संबंध रहता था। राजनीतिक दल ऐसे आंदोलनों से जुड़े जनसमथर्न का प़फायदा उठाने की तो कोश्िाश करते थे लेकिन उनकी गतिवििायों से बेचैन भी रहते थे। राजनीतिक दलों को ऐसे समूहों पर नियंत्राण और अपना अनुशासन व़्ाफायम करने में काप़फी परेशानी महसूस होती थीऋ न ही वे उनके रीति - रिवाजों और व्यवहारों का समथर्न कर पाते थे। इसके बावजूद साम्राज्यवादी भावनाओं को झकझोरने में ऐसे आंदोलनों के योगदान को कम करके नहीं आँका जा सकता। नए शब्द समन्वयवाद: ऐसा विश्वास जिसमें भ्िान्नताओं की बजाय समानताओं पर ध्यान देते हुए अलग - अलग मान्यताओं और आचारों को एक - दूसरे के साथ लाने का प्रयास किया जाता है। यातना श्िाविर: एक प्रकार की जेल जिसमें व़्ाफानूनी प्रिया का पालन किए बिना ही लोगों को व़्ौफद में डाल दिया जाता है। इस शब्द को सुन कर गहन यातना और निमर्म अत्याचार की तसवीरें मन में कौंध जाती हैं। प़्ा्रफंासीसी उपनिवेशवाद का विभ्िान्न स्तरों पर और नाना रूपों में विरोध हो रहा था। लेकिन सभी राष्ट्रवादियों के सामने सवाल एक जैसे थे। मसलन, आधुनिक होने का क्या मतलब होता है? राष्ट्रवादी किसे कहते हैं? क्या आधुनिक बनने के लिए परंपराओं को पिछड़ेपन की निशानी मानना और सभी पुराने विचारों व सामाजिक आचारों को खारिश करना शरूरी है? क्या ‘पश्िचम’ को ही विकास व सभ्यता का प्रतीक मानना और उसकी नक़ल करना शरूरी है? ऐसे सवालों के जवाब कइर् तरह के थे। कुछ बुिजीवियों का मानना था कि पश्िचम के प्रभुत्व का मुव़्ाफाबला करने के लिए वियतनामी परंपराओं को मशबूत करना शरूरी है जबकि कइर् बुिजीवियों का विचार था कि विदेशी वचर्स्व का विरोध करते हुए भी वियतनाम को पश्िचम से बहुत कुछ सीखना होगा। इन मतभेदों के कारण कइर् गंभीर बहसें खड़ी हुईं जिन्हें आसानी से हल नहीं किया जा सकता था। उन्नीसवीं सदी के आख्िार में प़्ा्रफंासीसियों के विरोध का नेतृत्व प्रायःकन्फ्ऱयूश्िायन विद्वानों - कायर्कतार्ओं के हाथों में होता था जिन्हें अपनी दुनियाबिखरती दिखाइर् दे रही थी। कन्फ्ऱयूश्िायन परंपरा में श्िाक्ष्िात पफान बोइर् चाऊ;1867 - 1940द्ध ऐसे ही एक महत्त्वपूणर् राष्ट्रवादी थे। 1903 में उन्होंने रेवोल्यूशनरी सोसायटी ;दुइर् तान होइर्द्ध नामक पाटीर् का गठन किया और तभी से वह उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन के एक अहम नेता बन गए थे। राजकुमार कुआंग दे इस पाटीर् के मुख्िाया थे। पफान बोइर् चाऊ ने 1905 में चीनी सुधारक लियाँग किचाओ ;1873 - 1929द्ध से योकोहामा में भेंट की। पफान की सबसे प्रभावशाली पुस्तक, द हिस्ट्री आॅप़फ द लाॅस आॅप़फ वियतनाम, लियाँग की सलाह और प्रभाव में ही लिखी गइर् थी। वियतनाम और चीन में यह किताब खूब बिकी और उस पर एक नाटक भी खेला गया। यह किताब एक - दूसरे से जुड़े दो विचारों पर केंित हैं: एक, देश की संप्रभुता का नाश, और दूसरा, दोनों देशों के अभ्िाजात्य वगर् को एकसंस्कृति में बाँधने वाले वियतनाम - चीन संबंधों का टूटना। पफान अपनी पुस्तक में इसी दोहरे नाश का विलाप करते हैं। उनके शोक का अंदाश वैसा ही था जैसा परंपरागत अभ्िाजात्य तबव़्ोफ से निकले सुधारकों का दिखाइर् देता था। अन्य राष्ट्रवादी पफान बोइर् चाऊ के विचारों से गहरे तौर पर असहमत थे। पफान चू त्रिान्ह ;1871 - 1926द्ध ऐसे नेताओं में प्रमुख थे। वे राजशाही/राजतंत्रा के कट्टर विरोधी थे। उन्हें यह मंशूर नहीं था कि प़्ा्रफंासीसियों को देश से निकालने के लिए शाही दरबार या राजा की सहायता ली जाए। वह एक लोकतांत्रिाक गणराज्य की स्थापना करना चाहते थे। पश्िचम के लोकतांत्रिाक आदशो± से प्रभावित त्रिान्ह पश्िचमी सभ्यता को पूरी तरह खारिज करने के ख्िालाप़फ थे। उन्हें मुक्ित के प़्ा्रफंासीसी क्रांतिकारी आदशर् तो पसंद थे लेकिन उनका आरोप था कि खुद प़्ा्रफंासीसी ही उन आदशो± का अनुसरण नहीं कर रहे हैं। उनकी ड्डोत - क चचार् करें पफान बोइर् चाऊ और पफान चू त्रिान्ह के विचारों में क्या समानताएँ थीं? उनके बीच किन सवालों पर मतभेद था? नए शब्द गणतंत्रा: आम जनता की सहमति और जनप्रतिनििात्व पर आधारित शासन व्यवस्था। राजशाही के विपरीत ऐसी सरकारलोगों की सत्ता ;लोकशाहीद्ध पर आधारित होती है। माँग थी कि प़्ा्रफंासीसी शासक वियतनाम में वैधानिक एवं शैक्षण्िाक संस्थानोंकी स्थापना करें और कृष्िा व उद्योगों का विकास करें। 5.1 आधुनिक बनने के अन्य तरीव़्ोफ: जापान और चीन प्रारंभ्िाक वियतनामी राष्ट्रवादियों के जापान और चीन के साथ काप़फी घनिष्ठ संबंध थे। जापान और चीन न केवल बदलाव का प्रतीक थे बल्िक प़्ा्रफंासीसी पुलिस से बच निकलने वालों के लिए शरणस्थली भी थे। इन देशों में एश्िायाइर् क्रांतिकारियों के नेटवकर् बने हुए थे। बीसवीं सदी के पहले दशक में ‘पूरब की ओर चलो’ आंदोलन कापफी तेश़था। 1907 - 1908 में लगभग 300 वियतनामी विद्याथीर् आधुनिक श्िाक्षा प्राप्त करने के लिए जापान गए थे। उनमें से बहुतों का सबसे बड़ा लक्ष्य यही था कि प़्ा्रफंासीसियों को वियतनाम से निकाल बाहर किया जाए, कठपुतली सम्राट को गद्दी से हटा दिया जाए और प़्ा्रफंासीसियों द्वारा अपमानित करके गद्दी से हटा दिए गए न्गूयेन राजवंश को दोबारा गद्दी पर बिठाया जाए। इन राष्ट्रवादियों को विदेशी हथ्िायार और मदद लेने से कोइर् परहेश नहीं था। इसके लिए उन्होंने एश्िायाइर् होने के नाते जापानियों से मदद माँगी। जापान आधुनिकीकरण के रास्ते पर काप़फी आगे बढ़ चुका था। जापानियों ने पश्िचम द्वारा ग़्ाुलाम बनाए जाने की कोश्िाशों का भी सपफलतापूवर्क विरोध किया था। 1907 में रूस पर विजय प्राप्त करके जापान अपनी सैनिक ताव़्ाफत का भी लोहा मनवा चुका था। वियतनामी विद्याथ्िार्यों ने टोकियो में भी रेस्टोरेशन सोसायटी की स्थापना कर ली थी लेकिन 1908 में जापानी गृह मंत्रालय ने ऐसी गतिवििायों का दमनशुरू कर दिया। पफान बोइर् चाऊ सहित बहुत सारे लोगों को जापान से निकाला जाने लगा और उन्हें मजबूरन चीन व थाइर्लैंड में शरण लेनी पड़ी। चीन के घटनाक्रम ने भी वियतनामी राष्ट्रवादियों के हौसले बढ़ा दिए थे। सुन यात सेन के नेतृत्व में चले आंदोलन के शरिए जनता ने लंबे समय से चीन पर शासन करते आ रहे राजवंश को 1911 में गद्दी छोड़ने पर विवश कर दिया और वहाँ गणराज्य की स्थापना की गइर्। इन घटनाओं से प्रेरणा लेते हुए वियतनामी विद्याथ्िार्यों ने भी वियतनाम मुक्ित एसोसिएशन ;वीयेत - नाम कुवान पुफक होइर्द्ध की स्थापना कर डाली। अब प़्ा्रफंास - विरोधी स्वतंत्राता आंदोलन का स्वरूप बदल चुका था। अब इस संघषर् का उद्देश्य यह नहीं था कि संवैधानिक राजशाही की स्थापना कैसे की जाए। अब स्वतंत्राता संग्रामी एक लोकतंात्रिाक गणराज्य की स्थापना का सपना देखने लगे थे। लेकिन जल्दी ही वियतनाम का साम्राज्यवाद - विरोधी आंदोलन एक नए प्रकार के नेतृत्व की देखरेख में तेशी से आगे बढ़ने लगा। 6 कम्युनिस्ट आंदोलन और वियतनामी राष्ट्रवाद 1930 के दशक में आइर् महामंदी ने वियतनाम पर भी गहरा असर डाला। रबड़ ड्डोत - ख और चावल के दाम गिर गए और व़्ाफशार् बढ़ने लगा। चारों तरप़फ बेरोजगारी और ग्रामीण विद्रोहों का बोलबाला था। न्घे अन और हा तिन्ह प्रांतों में भी ऐसे ही आंदोलन हुए। ये सबसे गरीब प्रांत थे जहाँ रैडिकल आंदोलनों की एक लंबी परंपरा चली आ रही थी जिसके कारण उन्हें वियतनाम की ‘लपलपाती चिंगारी’ कहा जाता था। जब भी बड़ा संकट आता था तो सबसे पहले वहीं असंतोष की ज्वाला भड़कती थी। प़्ा्रफंासीसियों ने इन बग़्ाावतों को सख़्ती से कुचल डाला। यहाँ तक कि जुलूसों पर हवाइर् जहाज़ों से भी बमबारी की गइर्। पफरवरी 1930 में हो ची मिन्ह ने राष्ट्रवादियों के अलग - थलग समूहों और गुटों को एकजुट करके वियतनामी कम्युनिस्ट ;वियतनाम काँग सान देंगद्ध पाटीर् की स्थापना की जिसे बादे में इंडो - चाइनीज़ कम्युनिस्ट पाटीर् का नाम दिया गया। हो ची मिन्ह यूरोपीय कम्युनिस्ट पाटिर्यों के उग्र आंदोलनों से काप़फी प्रभावित थे। 1940 में जापान ने वियतनाम पर व़्ाफब्शा कर लिया। जापान पूरे दक्ष्िाण - पूवर् एश्िाया पर व़्ाफब्शा करना चाहता था। ऐसे में अब राष्ट्रवादियों को प़्ा्रफंासीसियों के साथ - साथ जापानियों से भी लोहा लेना था। बाद में वियेतमिन्ह के नाम से जानी गइर् लीग पफाॅर द इंडिपेंडेस आॅप़्ाफ वियतनाम ;वियतनाम स्वतंत्राता लीगद्ध ने जापानी व़्ाफब्शे का मुँहतोड़ जवाब दिया और सितंबर 1945 में हनोइर् को आशाद करा लिया। इसके बाद वियतनाम लोकतांत्रिाक गणराज्य की स्थापना की गइर् और हो ची मिन्ह को उसका अध्यक्ष चुना गया। 6.1 वियतनाम गणराज्य नए गणराज्य के सामने बहुत सारी चुनौतियाँ थीं। प़्ा्रफंासीसी शासक सम्राट बाओ दाइर् को कठपुतली की तरह इस्तेमाल करते हुए देश पर व़्ाफब्शा शमाए रखने की कोश्िाश कर रहे थे। प़्ा्रफंासीसी हमले को देखते हुए वियेतमिन्ह के सदस्यों को पहाड़ी इलाव़्ाफों में शरण लेनी पड़ी। आठ साल तक चली लड़ाइर् में आख्िारकार प़्ा्रफंासीसियों को दिएन बिएन पूफ के मोचेर् पर मुँह की खानी पड़ी। प़्ा्रफंासीसी सेनाओं के सवोर्च्च कमांडर जनरल हेनरी नावारे ने 1953 में ऐलान किया था कि उनकी सेना जल्दी ही विजयी होगी। लेकिन 7 मइर् 1954 को वियेतमिन्ह ने प़्ा्रफंासीसी एक्सपीडिशनिरी कोर के बहुत सारे सैनिकों को मार गिराया और 16,000 से श्यादा को व़्ौफद कर लिया। एक जनरल, 16 कनर्लों और 1,749 अप़फसरों सहित पूरे कमांडिंग दस्ते को पकड़ लिया गया। प़्ा्रफंासीसियों की पराजय के बाद जिनेवा में चली शांति वातार्ओं में वियतनामियोंको देश विभाजन का प्रस्ताव मानने के लिए बाध्य कर दिया गया। उत्तरी औरदक्ष्िाणी वियतनाम, दो अलग - अलग देश बन गए। उत्तरी भाग में हो ची मिन्हऔर कम्युनिस्टों की सत्ता स्थापित हुइर् जबकि दक्ष्िाणी वियतनाम में बाओ डाइर्की सत्ता बनी रही। इस बँटवारे से पूरा वियतनाम यु( के मोचेर् में तब्दील होकर रह गया। देश के अपने ही लोगों और पयार्वरण की तबाही होने लगी। कुछसमय बाद न्गो दिन्ह दिएम के नेतृत्व में हुए तख़्तापलट में बाओ डाइर्को गद्दी से हटा दिया गया। इसके बाद दिएम की अगुवाइर् में एक और दमनकारी व निरंकुश शासन की स्थापना हुइर्। उसका विरोध करनेवालों को कम्युनिस्ट कहकर जेल में डाल दिया जाता था या मार दियाजाता था। दिएम ने अध्यादेश 10 को भी नहीं हटाया जिसमें इर्साइर् धमर् को तो मान्यता दी गइर् थी लेकिन बौ( धमर् को ग़्ौरव़्ाफानूनी घोष्िात करदिया गया था। उसके तानाशाही शासन के ख्ि़ालाप़फ नेशनल लिबरेशनप़्रफंट ;एन.एल.एपफ.द्ध के नाम से एक व्यापक मोचार् बनाया गया। उत्तरी वियतनाम में हो ची मिन्ह के नेतृत्व वाली सरकार की सहायतासे एन.एल.एपफ. ने देश के एकीकरण के लिए आवाज उठाइर्। अमेरिकाइस गठबंधन की बढ़ती ताव़्ाफत और उसके प्रस्तावों से भयभीत था। कहीं पूरे वियतनाम पर कम्युनिस्टों का व़्ाफब्शा न हो जाए, इस भय से अमेरिकाने अपनी प़्ाफौजें और गोला - बारूद वियतनाम में तैनात करना शुरू करदिया। अमेरिका इस खतरे से सख्ती से निपटना चाहता था। बाॅक्स 2 दिएन बिएन पूफ में जनरल वो न्गूयेन ग्याप के नेतृत्व वाली वियेतमिन्ह टुकडि़यों ने प़्ा्रफंासीसियों को नाकों चने चबवा दिए। प़्ा्रफंासीसी जनरल नवारे को पूरा अंदाशा नहीं था कि यु( के मोचेर् पर उसकी सेनाओं को किन - किन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। जिस घाटी में प़्ा्रफंासीसी टुकडि़यों ने डेरा डाला हुआ था वहाँ बरसात के महीनों में पानी भर गया। यह जगह चारों तरप़फ से झाडि़यों से घ्िारी हुइर् थी जिसकी वजह से न तो सिपाही और न ही टैंक वहाँ से आगे बढ़ सकते थे। इसी कारण प़्ा्रफंासीसी सैनिक जंगल में छिपी वियेतमिन्ह विमानभेदी तोपों का भी पता नहीं लगा सकते थे। वियेतमिन्ह के जवान पहाडि़यों के उपर थे। उन्होंने नीचे घाटी में तैनात प़्ा्रफंासीसियों को चारों तरप़फ से घेर लिया और आगे बढ़ने के लिए गुप्त खंदकें और गुपफाएँ बना लीं ताकि कोइर् उनकी टोह न ले सके और वे चुपचाप आगे बढ़ते रहें। प़्ा्रफंासीसी टुकडि़यों को न तो रसद मिल पा रही थी न घायलों को बाहर ़ले जाया जा सकता था। लगातार गोलाबारी के कारण प़्ा्रफंासीसी हवाइर् पटि्टयाँ भी किसी काम की नहीं रह गइर् थीं। दिएन बिएन पूफ का मोचार् संघषर् का एक अप्रतिम प्रतीक बन चुका था। इस मोचेर् ने वियेतमिन्ह के इस विश्वास को और बल दिया कि वे अपनी दृढ़निष्ठा और सही रणनीति के सहारे ताकतवर साम्राज्यवादी दुश्मनों को भी धूल चटा सकते हैं। लोगों में जोश भरने के लिए इस संघषर् की कहानियों को गाँव - गाँव में सुनाया जाता था। वियेतमिन्ह के लड़ाकों ने सैनिकों के वास्ते शरूरी सामान पहुँचाने के लिए साइकिलों और वुफलियों की मदद ली। दुश्मन के हमलों से बचने के लिए वे जंगल और गुप्त रास्तों से छिपते - छिपाते अपनी मंिाल तक पहुँच जाते थे। बाॅक्स 3 हो ची मिन्ह ;1890 - 1969द्ध हो ची मिन्ह की शुरुआती िांदगी के बारे में ज्यादा जानकारियाँ उपलब्ध नहीं हैं क्योंकि वह अपनी निजी पृष्ठभूमि के बारे में बहुत बात नहीं करते थे। उन्होंने खुद को वियतनाम की आशादी के लिए झोंक दिया था। उनका जन्म मध्य वियतनाम में हुआ और उनका असली नाम संभवतः न्गूयेन वान थान्ह था। हो ने भी उन्हीं प़्ा्रफंासीसी स्कूलों में श्िाक्षा पाइर् थी जिनसे न्गो दिन्ह दिएम, वो न्गूयेन ग्याप, और पफान वान देंग जैसे नेता निकले थे। 1910 में कुछ समय के लिए उन्होंने बच्चों को पढ़ाया। 1911 में उन्होंने बेकिंग सीखी और साइगाॅन से मासेर्इर् जाने वाले प़्ा्रफंासीसी जहाश पर नौकरी कर ली। बाद में हो काॅमिन्टनर् के सिय सदस्य बन गए और लेनिन व अन्य नेताओं से मिले। यूरोप, थाइर्लैंड और चीन में 30 साल बिताने के बाद मइर् 1941 में वह वियतनाम लौट आए। 1943 में उन्होंने अपना नाम बदल कर हो ची मिन्ह ;पथप्रदशर्कद्ध रख लिया। जब वियतनाम लोक गणराज्य की स्थापना हुइर् तो उन्हें राष्ट्रपति चुना गया। 3 सितंबर1969 को हो ची मिन्ह की मृत्यु हो गइर्। उन्होंने वियतनाम की स्वाधीनता के लिए संघषर् करते हुए 40 साल से भी श्यादा समय तक पाटीर् का नेतृत्व किया। 6.2 यु( में अमेरिका का प्रवेश अमेरिका के भी यु( में कूद पड़ने से वियतनाम में एक नया दौर शुरू हुआ जो वियतनामियों के साथ - साथ अमेरिकीयों के लिए भी बहुत मँहगा साबित हुआ। 1965 से 1972 के बीच अमेरिका के 34, 03, 100 सैनिकों ने वियतनाम में काम किया जिनमें से 7, 484 महिलाएँ थीं। हालाँकि अमेरिका के पास एक से बढ़कर एक आधुनिक साधन और बेहतरीन चिकित्सा सेवाएँ उपलब्ध थीं पिफर भी उसके बहुत सारे सैनिक मारे गए। लगभग 47, 244 सैनिक मारे गए और 3, 03, 704 घायल हुए। ;घायलों में से 23, 014 को भूतपूवर् सैनिक प्रशासन ने स्थायी रूप से अपंग घोष्िात कर दिया।द्ध ़अमेरिका के साथ संघषर् का यह दौर कापफी यातनापूणर् और निमर्म रहा। इस यु( में बड़े - बड़े हथ्िायारों और टैंकों से लैस हशारों अमेरिकी सैनिक वियतनाम में झोंक दिए गए थे। उनके पास बी - 52 बमवषर्क विमान भी मौजूद थे जिन्हें उस़समय दुनिया का सबसे खतरनाक यु(क विमान माना जाता था। चैतरपफा हमलों और रासायनिक हथ्िायारों के बेतहाशा इस्तेमाल से असंख्य गाँव नष्ट हो गए और विशाल जंगल तहस - नहस कर दिए गए। अमेरिकी प़्ाफौजों ने नापाम, एजेंट आॅरेंज और प़्ाफास्प़्ाफोरस बम जैसे घातक रासायनिक हथ्िायारों का जमकर इस्तेमाल ॅकिया। इन हमलों में असंख्य साधारण नागरिक मारे गए। यु( का असर अमेरिका में भी साप़फ महसूस किया जा सकता था। वहाँ के बहुत सारे लोग इस बात के लिए सरकार का विरोध कर रहे थे कि उसने देश की प़्ाफौजों को एक ऐसे यु( में झोंक दिया है जिसे किसी भी हालत में जीता नहीं जा सकता। जब युवाओं को भी सेना में भतीर् किया जाने लगा तो लोगों का गुस्सा और बढ़ गया। पर विश्वविद्यालयी स्नातकों को अनिवायर् सैनिक सेवा से मुक्त रखा गया था। इसका अथर् है कि जिन्हें मोचेर् पर भेजा जा रहा था उनमें से बहुत सारे नौजवान समाज के अभ्िाजात्य वगर् के नहीं थे इसलिए सरकार को उनसे कोइर् हमददीर् नहीं थी। मोचेर् पर भेजे जाने वालों में ज्यादातर अल्पसंख्यक और गरीब मेहनतकशों के बच्चे थे। इस यु( के प्रति समथर्न और विरोध के स्वरों को बुलंद करने में अमेरिकी़मीडिया और पिफल्मों ने भी एक अहम भूमिका अदा की थी। हाॅलीवुड में यु(़के समथर्न में कइर् पिफल्में बनीं। 1968 में जाॅन वेन की प्ि़ाफल्म ग्रीन बेरेट्स इसी ़प्रकार की पिफल्म थी। बहुत सारे लोगों ने इस बात को रेखांकित किया है कि यह एक तकर्हीन प्रोपेगंडा यानी प्रचार - केंित पिफल्म थी जिसने बहुत सारे युवाओं को यु( में अपनी जाऩ़गँवाने के लिए उकसाया। कइर् पिफल्में इस यु( के बारे में सरकार की नीति का विरोध करती नजर आती थीं। उनमें इसयु( के कारणों की तफ्ऱतीश करने का प्रयास किया जाता था। अमेरिका में इस यु( से कितना भ्रम पैदा हुआ था इस बात को़जाॅन पफोडर् कपोला की पिफल्म एपोकैलिप्स नाऊ ;1979द्ध से अच्छी तरह समझा जा सकता है। यह यु( इसलिए शुरू हुआ था क्योंकि अमेरिकी नीति निमार्ता इस बात को लेकर चिंतित थे कि अगर हो ची मिन्ह बाॅक्स 4 एजेंट आॅरेंज: घातक शहर एजेंट आॅरेंज एक ऐसा शहर है जिसके छिड़काव से पेड़ों कीपिायाँ झड़ जाती हैं और पौधे मर जाते हैं। उसे यह नाम इसलिएदिया गया क्योंकि उसे जिन ड्रमों में रखा जाता था उन पर नारंगी;यानी आॅरेंजद्ध रंग की पटि्टयाँ बनी होती थीं। 1961 से 1971के बीच अमेरिकी प़्ाफौशों के मालवाही विमानों ने वियतनाम परलगभग 1.1 करोड़ गैलन एजेंट आॅरेंज का छिड़काव किया था।अमेरिकी जनरल वियतनाम के जंगलों और खेतों को तबाह करदेना चाहते थे ताकि वियतनामी सैनिक जंगलों में न छिप सकेंऔर उन्हें आसानी से खत्म किया जा सके। इस शहर के कारणदेश की 14 प्रतिशत से श्यादा खेतिहर शमीन पर बहुत बुरा असरपड़ा। वहाँ के लोग अभी भी इसके प्रभावों से पूरी तरह आशादनहीं हो पाए हैं। एजेंट आॅरेंज में इस्तेमाल होने वाला डायोक्सीननामक पदाथर् कैंसर को जन्म देता है और बच्चों के मस्ितष्क कोभारी नुकसान पहुँचाता है। एक अध्ययन के अनुसार, जिनइलाव़्ाफों में इसका छिड़काव किया गया था वहाँ जन्मजातविकलांगता की भारी समस्या के पीछे एजेंट आॅरेंज का ही हाथरहा है। वियतनाम में अमेरिकी हमले के दौरान जितने बमों और रासायनिकहथ्िायारों का इस्तेमाल किया गया उनकी मात्रा दूसरे विश्वयु( मेंइस्तेमाल किए गए हथ्िायारों की मात्रा से भी श्यादा थी। इन हथ्िायारोंको अिाकतर नागरिक आबादियों पर इस्तेमाल किया गया। की सरकार अपनी योजनाओं में कामयाब हो गइर् तो आसपास के दूसरे देशों में भी कम्युनिस्ट सरकारें स्थापित हो जाएँगी।पर उन्हें इस बात का अंदाशा ही नहीं था कि राष्ट्रवाद की शक्ित और ऊजार् से लैस लोग किस हद तक जा सकते हैं, अपने घर - बार को त्याग कर कैसी भयानक परिस्िथतियों में रह सकते हैं और अपनी आशादी के लिए लड़ाइर् लड़ सकते हैं। वे दुनिया के सबसे विकसित और आधुनिक तकनीक से सुसज्िजत नए शब्द नापाम: अग्िन बमों के लिए गैसोलीन को पुफलाने में इस्तेमाल होने वाला एक आॅगेर्निक कंपाउंड। यह मिश्रण धीरे - धीरे जलता है और मानव त्वचा जैसी किसी भी सतह के संपकर् में आने पर उससे चिपक जाता है और जलता रहता है। अमेरिका में विकसित किए गए इस रसायन का दूसरे विश्व यु( में प्रयोग किया गया था। भारी अंतरार्ष्ट्रीय विरोध के बावजूद इसका वियतनाम में भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। देश का मुव़्ाफाबला करने के लिए तैयार एक छोटे से देश की ताव़्ाफत को बहुत कम करके आँक रहे थे। 6.3 हो ची मिन्ह भूलभुलैया मागर् हो ची मिन्ह मागर् को देखने पर इस बात को अच्छी तरह समझा जा सकता है कि वियतनामियों ने अमेरिका के विरु( किस तरह लोहा लिया। इससे यह भी पता चलता है कि वियतनाम के लोग अपने सीमित संसाधनों का भी कितनी सूझबूझ से इस्तेमाल करना जानते थे। प़्ाुफटपाथों और सड़कों के इसविशाल नेटवकर् के शरिए देश के उत्तर से दक्ष्िाण की ओर सैनिक व रसद भेजी जाती थी। पचास के दशक के आख्िार में इस मागर् को काप़फी बेहतरबना दिया गया था और 1967 के बाद हर महीने लगभग 20, 000 उत्तरी वियतनामी सैनिक इसी रास्ते से होते हुए दक्ष्िाणी वियतनाम पहुँचने लगे थे। इस मागर् पर जगह - जगह छोटे - छोटे सैनिक अड्डे और अस्पताल बने हुए थे। कुछ इलाव़्ाफों में माल ढुलाइर् के लिए ट्रकों का इस्तेमाल भी किया जाता था लेकिन श्यादातर यह काम कुली करते थे जिनमें श्यादातर औरतें होती थीं। इस तरह के कुली औरत - मदर् लगभग 25 किलो सामान पीठ पर या लगभग 70 किलो सामान साइकिलों पर लेकर निकल जाते थे। इस मागर् का श्यादातर हिस्सा वियतनाम के बाहर लाओस और कंबोडिया में पड़ता था और उसके कइर् सिरे दक्ष्िाणी वियतनाम में पहुँच जाते थे। अमेरिकी टुकडि़यों ने वियतनामी सैनिकों के लिए रसद की आपूतिर् को बंद करने के लिए इस मागर् पर कइर् बार बम बरसाए। पर बेहिसाब बमबारी के बावजूद वे इस सप्लाइर् लाइन को ध्वस्त नहीं कर पाए। अमेरिकी इस मागर् को इसलिए नहीं तोड़ पाए क्योंकि वहाँ के लोग हर हमले के बाद उसकी प़फौरन मरम्मत कर लेते थे। बमबारी से ध्वस्त होने वाली सड़कों को पफटापफट दुरुस्त कर लिया जाता था। ड्डोत - ग सामाजिक आंदोलनों को देखने का एक पैमाना यह होता है कि उससे समाज के विभ्िान्न तबव़्ाफों पर क्या असर पड़ता है। आइए देखें कि वियतनाम के साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन में औरतों की क्या भूमिका रही और इससे राष्ट्रवादी विचारधारा के बारे में हमें क्या पता चलता है। 7.1 विद्रोही औरतें पारंपरिक रूप से चीन के मुव़्ाफाबले वियतनाम में औरतों को श्यादा बराबरी वाला दजार् मिलता था, खासतौर से निचले तबव़्ोफ में। पिफर भी औरतों की स्िथति पुरुषों के मुकाबले कमशोर तो थी ही। वे अपने भविष्य के बारे में अहम पफैसले नहीं ले सकती थीं। न ही सावर्जनिक जीवन में उनका कोइर् ख़ास दखल होता था। जैसे - जैसे वियतनाम में राष्ट्रवादी आंदोलन शोर पकड़ने लगा समाज में महिलाओं की हैसियत व स्िथति पर भी सवाल उठने लगे और स्त्राीत्व की एक नयी छवि सामने आने लगी। साहित्यकार और राजनीतिक विचारक विद्रोहों में हिस्सा लेने वाली महिलाओं को आदशर् के रूप में पेश करने लगे। 1930 में न्हात लिन्ह़द्वारा लिखे गए एक प्रसि( उपन्यास से वियतनाम में कापफी विवाद पैदा हो गया। इस उपन्यास की नायिका एक ऐसे व्यक्ित के साथ रहने से इनकार कर देती है जिसके साथ जबरन उसका विवाह कर दिया गया था। उसे छोड़ कर अपनी पसंद के किसी और व्यक्ित से विवाह कर लेती है। यह व्यक्ित राष्ट्रवादी आंदोलन में सिय है। यह सोच सामाजिक रीति - रिवाजों और परंपराओं के विरु( एक बग़्ाावत थी। यह इस बात का संकेत था कि वियतनामी समाज में औरत अब एक नयी सोच के साथ आगे बढ़ना चाहती है। 7.2 गुशरे शमाने के नायक पुराने जमाने की विद्रेही औरतों का भी महिमामंडन किया जाने लगा। 1913 मेंराष्ट्रवादी नेता पफान बोइर् चाऊ ने 39 - 43 इर्स्वी में चीनी व़्ाफब्शे के विरु( यु( छेड़ने वाली ट्रंग बहनों के जीवन पर एक नाटक लिखा। इस नाटक में उन्होंने दिखाया कि इन बहनों ने वियतनामी राष्ट्र को चीनियों से मुक्त कराने के लिए देशभक्ित के भाव से कैसे - कैसे कारनामे किए थे। उनकी बग़्ाावत की असली वजह क्या थी इस बारे में बहुत सारे विचारकों की राय भ्िान्न रही है लेकिन पफान के नाटक के बाद उनको आदशर् के रूप में पेश किया जाने लगा और उनका गुणगान किया जाने लगा। वियतनामियों की अपराजेय इच्छाशक्ित और गहन देशभक्ित के प्रतीक के रूप में पेंटिंग्स, नाटकों और उपन्यासों में उनका महिमामंडन होने लगा। बताया जाता है कि ट्रंग बहनों ने 30,000 सैनिकों की प़्ाफौज जुटा ली थी, उन्होंने चीनियों का दो साल तक मुव़्ाफाबला किया और अंत में जब उन्हें अपनी पराजय निश्िचत दिखाइर् देने लगी तो शत्राु के सामने आत्मसमपर्ण करने की बजाय उन्होंने खुदकुशी कर ली। अतीत की अन्य विद्रोहिण्िायाँ भी व्यापक राष्ट्रवादी आख्यान का हिस्सा थीं।इनमें त्रिायू अयू सबसे महत्त्वपूणर् और सम्मानित रही हैं। तीसरी सदी में पैदा होने वाली त्रिायू बचपन में ही यतीम हो गइर् थीं। माँ - बाप के मरने के बाद वह अपने भाइर् के साथ रहने लगीं। बड़ी होने पर उन्होंने अपना घर छोड़ दिया और जंगलों में चली गइर्ं। वहाँ रहकर उन्होंने एक विशाल सेना का गठन किया और चीनियों के वचर्स्व को चुनौती दी। इस संघषर् के अंत में जब उनकी सेना हार गइर् तो उन्होंने पानी में डूब कर अपनी जान दे दी थी। वियतनामियों के लिए वह देश के मान की रक्षा करते हुए जान देने वाली शहीद ही नहीं बल्िक एक देवी बन गइर् थीं। लोगों को साहसपूवर्क आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हुए राष्ट्रवादियों ने उनकी छवि का खूब प्रचार किया। 7.3 यो(ा औरतें 1960 के दशक के पत्रा - पत्रिाकाओं में दुश्मन से लोहा लेती यौ(ा औरतों की तसवीरें बड़ी संख्या में छपने लगीं। इन तसवीरों में स्थानीय प्रहरी दस्ते की औरतों को हवाइर् जहाशों को मार गिराते हुए दशार्या जाता था। उनको युवा, बहादुर और समपिर्त यो(ाओं के रूप में चित्रिात किया जाता था। इस बारे में कहानियाँ छपने लगीं कि सेना में शामिल होने और राइप़्ाफल उठाने का मौव़्ाफा मिलने से वे कितना खुश महसूस करती हैं। कुछ कहानियों में बताया जाता था कि किस अप्रतिम वीरता का परिचय देते हुए किसी महिला सैनिक ने अकेले ही शत्राुओं को मार गिराया। न्गूयेन थी शुआन नामक महिला के बारे में बताया जाता था कि उसके पास केवल 20 गोलियाँ थीं लेकिन इन्हीं के सहारे उसने एक जेट विमान को मार गिराया था। औरतों को सिप़र्फयो(ा के रूप में ही नहीं बल्िक कामगारों के रूप में भी पेश किया जा रहा था। बहुत सारी तसवीरों में औरतों को एक हाथ में राइप़्ाफल और दूसरे हाथ में हथौड़ा लिए दिखाया जाता था। चाहे बूढ़ी हों या जवान, औरतों को निस्वाथर् भाव से देश रक्षा के लिए समपिर्त नागरिकों के रूप में पेश किया जाने लगा था। जब साठ के दशक में बड़ी संख्या में सैनिक मारे जाने लगे तो औरतों से भी श्यादा से श्यादा तादाद में सेना में भतीर् होने का आह्वान किया गया। बहुत सारी औरतों ने इस आह्वान को गंभीरता से लिया और वे प्रतिरोध आंदोलन में शामिल हो गईं। वे घायलों की मरहम - पट्टी करने, भूमिगत कमरे व सुरंगें बनाने और दुश्मन से मोचार् लेने में बढ़ - चढ़ कर हिस्सा लेने लगीं। हो ची मिन्ह मागर् पर देशके युवा वाॅलंटियरों ने 2,195 किलोमीटर लंबी महत्त्वपूणर् सड़कों पर लगातार पहरा दिया और 2,500 ठिकानों की हिप़्ाफाशत की। उन्होंने छह हवाइर् पटि्टयाँ बनाईं, दसियों हशार बमों को बरबाद किया, हशारों किलोग्राम माल ढोया, हथ्िायार व गोला - बारूद की सप्लाइर् जारी रखी और पंद्रह जहाशों को मार गिराया था। 1965 से 1975 के बीच इस मागर् पर काम करने वाले युवाओं में से 70 - 80 प्रतिशत लड़कियाँ थीं। एक सैनिक इतिहासकार का कहना है कि वियतनाम की सेना, मिलीश्िाया ;नागरिक सेनाद्ध, स्थानीय दस्तों और पेशेवर टोलियों में 15 लाख औरतें काम करती थीं। 7.4 शंाति के समय औरतें सत्तर के दशक तक आते - आते शांति प्रिया शुरू हो चुकी थी। यु( समाप्त होने के आसार दिखाइर् देने लगे थे। इसके बाद औरतों को यो(ाओं के रूप में पेश करने का चलन खत्म होने लगा। अब औरतों को मशदूरों के रूप में ही श्यादापेश किया जाने लगा। उन्हें सैनिकों के रूप में नहीं बल्िक कृष्िा कोआॅपरेटिवों, कारखानों और उत्पादन इकाइयों में काम करते हुए दशार्या जाने लगा। औरतों के बारे में जिस तरह की कहानियाँ सुनने में आती थीं उनमें बताया जाता था कि औरतें भी सेना में भतीर् होने को बेताब हैं। ऐसी कहानियों में यह विवरण अकसर आता था: ‘गुलाबी गालों वाली मैं औरत भी तुम मदो± के साथ कंधे से कंधा मिला कर लड़ रही हूँ। जेल मेरी पाठशाला है, तलवार मेरा बच्चा है और बंदूक ही मेरा पति है।’ ़यु( के लंबा ख्िांचते जाने से अमेरिका में भी लोग सरकार के ख्िालापफ बोलने ़लगे थे। यह सापफ दिखाइर् दे रहा था कि अमेरिका अपने लक्ष्य को हासिल करने में विपफल रहा है। अमेरिका न तो वियतनामियों के प्रतिरोध को कुचल पाया था और न ही अमेरिकी कारर्वाइर् के लिए वियतनामी जनता का समथर्न प्राप्त कर पाया। इस दौरान हशारों नौजवान अमेरिकी सिपाही अपनी जान गँवा चुके थे और असंख्य वियतनामी नागरिक मारे जा चुके थे। इस यु( को पहला टेलिविशन यु( कहा जाता है। यु( के दृश्य हर रोश समाचार कायार्क्रमों में टेलीविशन के पदेर् पर प्रसारित किए जाते थे। अमेरिकी कुकृत्यों को देखकर बहुत सारे लोगों का अमेरिका से मोहभंग हो चुका था। मैरी मैक्काथीर् जैसे लेखक या जेन पफोंडा जैसेकलाकारों ने तो उत्तरी वियतनाम का दौरा भी किया और अपने देश की रक्षा के लिए वियतनामियों द्वारा दिए गए बलिदानों की भूरि - भूरि प्रशंसा की। राजनीतिक सि(ांतकार नोम चाॅम्स्की ने इस यु( को ‘शांति के लिए, राष्ट्रीय आत्मनिणर्य के अिाकार के लिए और अंतरार्ष्ट्रीय सहयोग के लिए भारी खतरा’ बताया। ़सरकारी नीति के ख्ि़ालापफ व्यापक प्रतिियाओं ने यु( खत्म करने के प्रयासों को और बल प्रदान किया। जनवरी 1974 में पेरिस में एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते से अमेरिका के साथ चला आ रहा टकराव तो खत्म हो गया लेकिन साइगाॅन शासन और एनएलएपफ के बीच टकराव जारी रहा। आख्िारकार 30 अप्रैल 1975 को एनएलएपफ ने राष्ट्रपति के महल पर व़्ाफब्शा कर लिया और वियतनाम के दोनों हिस्सों को मिला कर एक राष्ट्र की स्थापना कर दी गइर्। संक्षेप में लिखें चचार् करें परियोजना कायर्

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