Money and Credit Hindi अध्याय 3- मुद्रा और साख मुद्रा एक मनमोहक और कौतूहल से भरा विषय है। साख-व्यवस्थाओं के ज़रिए उन्हें इसके विभिन्न पहलुओं विद्यार्थियों के लिए इस तत्व को उभारना महत्त्वपूर्ण से अवगत कराया जाए। साख से जुड़ा एक अन्य है। मुद्रा का इतिहास और विभिन्न समयों में मुद्रा के महत्त्वपूर्ण मुद्दा है कि यह सभी के लिए उपलब्ध हो, अलग-अलग रूप अपने आप में एक रोचक कहानी खासतौर से गरीबों के लिए और यथोचित शर्तों पर। पेश करते हैं। इस स्तर पर उद्देश्य यह है कि विद्यार्थी हमें इस बात पर जोर देना होगा कि यह लोगों का अधि समझे और परखें कि किन सामाजिक परिस्थितियों में कार है और इसके बिना इस वर्ग का बड़ा हिस्सा विकास मुद्रा के कौन से रूप प्रयुक्त होते थे। मुद्रा के प्रक्रिया से बाहर रह जाएगा। बहुत से नवीन प्रयास, जैसे आधुनिक रूप बैंक प्रणाली से जुड़े हुए हैं। इस कि ग्रामीण बैंकों के हस्तक्षेप से विद्यार्थियों को अवगत अध्याय के पहले भाग में मुख्य विचार यही है। कराया जा सकता है लेकिन यह समझना जरूरी है कि | हमारे पास सभी सवालों के जवाब नहीं हैं। हमें नये तरीके | भारत की मौजूदा स्थिति में बैंकिंग प्रणाली के ढूँढ़ने की आवश्यकता है और यह विकासशील देशों के कम्प्यूटरीकरण से मुद्रा के नये रूपों का धीरे-धीरे सामने सामाजिक चुनौतियों में से एक है। विस्तार हो रहा है, इसके चलते विद्यार्थियों के पास इस विषय को अपने आप समझने के कई अवसर हैं। जानकारी के स्रोत हमें मुद्रा के कार्यों पर औपचारिक रूप से विचार इस अध्याय में औपचारिक और अनौपचारिक क्षेत्रक करने की ज़रूरत नहीं है लेकिन इसे सवालों के रूप में उभरने दीजिए। 'मुद्रा की उत्पत्ति' (मुद्रा गुणक) के साख संबंधी आँकड़े राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन द्वारा ग्रामीण कर्जा पर किए गए सर्वेक्षण से या आधुनिक प्रणाली का पृष्ठाघान जैसे विषयों को | लिये गए हैं (अखिल भारतीय ऋण तथा निवेश । अध्याय में नहीं रखा गया है, लेकिन अगर आप चाहें सर्वेक्षण, 70वाँ, 2013, एन. एस. एस. ओ. द्वारा तो इन पर चर्चा कर सकते हैं। संचालित)। ग्रामीण बैंक पर जानकारी और आँकड़े साख आर्थिक जीवन का एक महत्त्वपूर्ण तत्व है। अख़बारों और वेबसाइट से ली गई हैं। बैंक संबंधित और इसलिए इसे अवधारणात्मक स्तर पर समझना आँकडों की विस्तृत जानकारी या किसी विशिष्ट बैंक ज़रूरी है। अध्याय के दूसरे भाग में, इस पर नजर के बारे में जानने के लिए आप भारतीय रिज़र्व बैंक डाली गई है कि किसी भी साख व्यवस्था में किन (ubuD.rbi.org) और संबंधित बैंकों की वेबसाइट पहलुओं को देखा जाता है तथा इसका लोगों पर क्या पर जा सकते हैं। स्वयं सहायता समूहों पर आँकड़े असर होता है। हम अपने आसपास की दुनिया में राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण हज़ारों तरह की साख व्यवस्थाएँ देखते हैं। इसलिए, विकास बैंक की वेबसाइट पर उपलब्ध हैं। अच्छा होगा अगर विद्यार्थियों के परिवेश से जुड़ी (ubu.nabrd.org)। आर्थिक विकास की समस मुद्रा का इस्तेमाल हमारे रोज़ाना के जीवन का एक ज़रा सोचिए कि जूता निर्माता यदि बिना मुद्रा बहुत बड़ा हिस्सा है। अपने चारों तरफ देखिए, का इस्तेमाल किए जूते का सीधे गेहूँ से विनिमय आप किसी एक दिन में मुद्रा से जुड़े कई सौदों की करता तो उसे कितनी कठिनाई होती। उसे गेहूँ पहचान कर सकते हैं। क्या आप इनकी एक सूची उगाने वाले ऐसे किसान को खोजना पड़ता जो न | मुझे जूते नहीं बना सकते हैं? बहुत से लेन-देन में आप देखेंगे ... केवल गेहूं बेचना चाहता हो, बल्कि चाहिए। मेरे कपड़े कि मुद्रा के ज़रिए वस्तुएँ खरीदी और बेची जा * आपके गेहूँ के । आप गहू के साथ में जूते भी खरीदना चाहता लिए मैं आपको चाहिए। रही हैं। ऐसे कुछ लेन-देन में मुद्रा के बदले सेवाएँ जुते दंगा हो। अर्थात् दोनों पक्ष एक दूसरे से प्रदान की जा रही हैं। लेकिन कुछ मामलों में हो । | चीजे खरीदने और बेचने । सकता है कि लेन-देन होते वक्त मुद्रा का कोई पर सहमति रखते हों। इसे आदान-प्रदान न हो, केवल बाद में भुगतान आश्यकताओं का दोहरा करने का वादा हो। संयोग कहा जाता है। एक व्यक्ति जो वस्तु बेचने की इच्छा | क्या आपने कभी सोचा है कि खरीददारी मुद्रा के जरिए क्यों होती है? कारण बहुत रखता है, वही वस्तु दूसरा व्यक्ति ख़रीदने मुझे जूते चाहिए। की भी इच्छा रखता हो। वस्तु विनिमय लाकन मर पास गहू सरल है। जिस व्यक्ति के पास मुद्रा है, वह इसका नहीं है। प्रणाली में, जहाँ मुद्रा का उपयोग किये बिना विनिमय किसी भी वस्तु या सेवा खरीदने के लिए। वस्तुओं का विनिमय होता है, वहाँ आवश्यकताओं आसानी से कर सकता है। इसलिए हर कोई मुद्रा का दोहरा संयोग होना अनिवार्य विशिष्टता है। के रूप में भुगतान लेना पसंद करता है, फिर उस मुद्रा का इस्तेमाल अपनी ज़रूरत की चीजें खरीदने | इसकी तुलना में ऐसी अर्थव्यवस्था जहाँ मुद्रा के लिए करता है। एक जूता निर्माता का उदाहरण का प्रयोग होता है, मुद्रा महत्त्वपूर्ण मध्यवर्ती देखते हैं। वह बाजार में जूता बेचकर गेहूं खरीदना भूमिका प्रदान करके आवश्यकताओं के दोहरे चाहता है। जूता बनाने वाला पहले जूतों के बदले संयोग की ज़रूरत को खत्म कर देती है। फिर मुद्रा प्राप्त करेगा और फिर इस मुद्रा का इस्तेमाल जूता निर्माता के लिए जरूरी नहीं रह जाता कि वो गेहूं खरीदने के लिए करेगा। ऐसे किसान को ढूंढे, जो न केवल उसके जूते ख़रीदे बल्कि साथ-साथ उसको गेहूँ भी बेचे। उसे केवल अपने जूते के लिए खरीददार ढूँढना है। एक बार उसने जूते, मुद्रा में बदल लिए तो वह बाजार में गेहूँ या अन्य कोई वस्तु खरीद सकता है। चूँकि मुद्रा विनिमय प्रक्रिया में मध्यस्थता का काम करती है, इसे विनिमय का माध्यम कहा जाता है। 1. मुद्रा के प्रयोग से वस्तुओं के विनिमय में सहूलियत कैसे आती है? 2. क्या आप कुछ ऐसे उदाहरण सोच सकते हैं, जहाँ वस्तुओं तथा सेवाओं का विनिमय या मज़दूरी की अदायगी वस्तु विनिमय के ज़रिए हो रही है? प्रारम्भिक आहत सिक्के (लगभग 2500 वर्ष पुराने) हमने देखा है कि मुद्रा ऐसी चीज़ है जो लेन-देन कानून के अनुसार, किसी व्यक्ति या संस्था को में विनिमय का माध्यम बन सकती है। सिक्कों के मुद्रा जारी करने की इजाजत नहीं है। इसके चलन से पहले तरह-तरह की चीजें मुद्रा के रूप अलावा कानून विनिमय के माध्यम के रूप में में इस्तेमाल की जाती थीं। उदाहरण के लिए, रुपये का इस्तेमाल करने की वैधता प्रदान करता बहुत प्रारंभिक काल से ही भारतीय अनाज और है, जिसे भारत में, सौदों में अदायगी के लिए मना पशु का मुद्रा के रूप में इस्तेमाल करते थे। इसके नहीं किया जा सकता। भारत में कोई व्यक्ति बाद सोना, चाँदी और ताँबे जैसी धातुओं के कानूनी तौर पर रुपयों में अदायगी को अस्वीकार सिक्कों का चलन हुआ, जिसका चलन पिछली नहीं कर सकता। इसलिए, रुपया व्यापक स्तर पर सदी तक रहा। विनिमय का माध्यम स्वीकार किया गया है। बैंकों में निक्षेप गुप्तकालीन सिक्के करेंसी तुगलक के सिक्के 37000 अ की मोहर मुद्रा के आधुनिक रूपों में करेंसी-कागज के नोट लोग मुद्रा बैंकों में निक्षेप के रूप में भी रखते हैं। और सिक्के शामिल हैं। वे चीजें जो पहले मुद्रा के किसी समय पर, लोगों को रोज़मर्रा की रूप में प्रयोग की जाती थीं, उसके विपरीत आवश्यकताओं के लिए कुछ ही करेंसी की आधुनिक मुद्रा बहुमूल्य धातुओं जैसे सोना-चाँदी जरूरत होती है। उदाहरण के लिए, हर महीने और ताँबे के बने सिक्कों से नहीं बनी है। अनाज | के आखिर में वेतन वाले मजदूरों के अतिरिक्त और पशुओं की तरह वे रोजमर्रा की चीजें भी नहीं नकद होता है। लोग इस अतिरिक्त नकद का क्या करते हैं? वे इसे बैंकों में अपने नाम से खाता है। आधुनिक मुद्रा का इस प्रकार का अपना कोई खोलकर जमा कर देते हैं। बैंक ये जमा स्वीकार इस्तेमाल नहीं है। करते हैं और इस पर सूद भी देते हैं। इस तरह फिर, इसे विनिमय का माध्यम क्यों स्वीकार लोगों का धन बैंकों के पास सुरक्षित रहता है। किया जाता है? इसे विनिमय का माध्यम इसलिए और इस पर सूद भी मिलता है। लोगों को अपनी स्वीकार किया जाता है, क्योंकि किसी देश की आवश्यकता के अनुसार इसमें से धन निकालने सरकार इसे प्राधिकृत करती है। की सुविधा भी उपलब्ध होती है। चूंकि बैंक खातों में जमा धन को माँग के जरिए निकाला जा भारत में भारतीय रिज़र्व बैंक केंद्रीय सरकार सकता है, इसलिए इस जमा को माँग जमा कहा | की तरफ से करेंसी नोट जारी करता है। भारतीय जाता है। आर्थिक विकास की समझ आधुनिक सिक्का माँग जमा एक अन्य दिलचस्प सुविधा देता है। किसी बैंक में खाता है, एक निश्चित रकम के यह सुविधा इसे मुद्रा का (विनिमय का माध्यम) लिए चैक काटता है। चैक एक ऐसा कागज़ है, महत्त्वपूर्ण लक्षण प्रदान करती है। आपने नकद जो बैंक को किसी व्यक्ति के खाते से चैक पर की बजाय चैक से भुगतान के बारे में सुना होगा। लिखे नाम के किसी दूसरे व्यक्ति को एक ख़ास चैक से भुगतान के लिए भुगतानकर्ता, जिसका रकम का भुगतान करने का आदेश देता हैं। आइए, यह जानने की कोशिश करते हैं कि चैक द्वारा भुगतान कैसे होता है तथा इसे एक उदाहरण के द्वारा करते हैं। चैक द्वारा भुगतान जूता निर्माता एम. सलीम को चमड़ा आपूर्तिकर्ता को भुगतान करना है और इसके लिए वह एक विशेष रकम का चैक लिखता है। अर्थात्, जूता निर्माता अपने बैंक को चमड़ा आपूर्तिकर्ता को यह रकम देने का आदेश देता है। चमड़ा आपूर्तिकर्ता यह चैक ले जाकर अपने बैंक खाते में जमा कर देता है। धन एक बैंक खाते से दूसरे बैंक खाते में कुछ दिनों में अंतरित हो जाता है। यह लेन-देन बिना नकद की अदायगी के पूरा हो जाता है। खाता नंबर बैंक शाखा संख्या चैक नंबर बैंक द्वारा प्रयुक्त कोड इस तरह हम देखते हैं कि माँग जमा में आधुनिक अर्थव्यवस्था में इसे भी मुद्रा समझा मुद्रा के अनिवार्य लक्षण मिलते हैं। माँग जमा जाता है। के बदले चैक लिखने की सुविधा से बिना यहाँ आपको बैंक की भमिका को याद रखना नकद का इस्तेमाल किये सीधा भुगतान करना होगा। बैंकों के लिए इन जमा के बदले कोई भी संभव हो जाता है। चूंकि माँग जमाओं को माँग जमा एवं भुगतान नहीं होगा। मुद्रा के आधुनिक करेंसी के साथ-साथ व्यापक स्तर पर भुगतान रूप-करेंसी और जमा-आधुनिक बैंक प्रणाली की का माध्यम स्वीकार किया जाता है, इसलिए कार्यप्रणाली से बहुत करीब से जुड़े हुए हैं। मुद्रा और साख 1. एम. सलीम भुगतान के लिए 20, 000 रु. नकद निकालना चाहते हैं। इसके लिए वह चैक कैसे लिखेंगे? 2. सही उत्तर पर निशान लगाएँ - (अ) सलीम और प्रेम के बीच लेन-देन के बाद (क) सलीम के बैंक खाते में शेष बढ़ जाता है और प्रेम के बैंक खाते में शेष बढ़ जाता है। (ख) सलीम के बैंक खाते में शेष घट जाता है और प्रेम के बैंक खाते में शेष बढ़ जाता है। (ग) सलीम के बैंक खाते में शेष बढ़ जाता है और प्रेम के बैंक खाते में शेष घट जाता है। 3. माँग जमा को मुद्रा क्यों समझा जाता है? बैंकों की कहानी को आगे बढ़ाते हैं। बैंक जनता गतिविधियों के लिए ऋण की बहुत माँग रहती है। से जो धन जमा खातों में स्वीकार करते हैं, उसका हम इसके बारे में आगे आने वाले खण्डों में और क्या करते हैं? यहाँ एक दिलचस्प क्रियाविधि पढ़ेंगे। बैंक जमा राशि का लोगों की काम कर रही है। बैंक जमा रकम का एक छोटा ऋण-आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए इस्तेमाल हिस्सा अपने पास नकद के रूप में रखते हैं। करते हैं। इस तरह, बैंक जिनके पास अतिरिक्त उदाहरण के लिए, आजकल भारत में बैंक जमा राशि है (जमाकर्ता) एवं जिन्हें राशि की ज़रूरत का केवल 15 प्रतिशत हिस्सा नकद के रूप में है (कर्जदार) के बीच मध्यस्थता का काम करते अपने पास रखते हैं। इसे किसी एक दिन में हैं। बैंक जमा पर जो ब्याज देते हैं उससे ज्यादा जमाकर्ताओं द्वारा धन निकालने की संभावना को ब्याज ऋण पर लेते हैं। कर्जदारों से लिए गए देखते हुए यह प्रावधान किया जाता है। चूंकि ब्याज और जमाकर्ताओं को दिये गये ब्याज के किसी एक विशेष दिन में, केवल कुछ जमाकर्ता बीच का अंतर बैंकों की आय का प्रमुख स्रोत है। ही नकद निकालने के लिए आते हैं, इसलिए बैंक अगर सभी जमाकर्ता एक ही समय में का काम इतने नकद से आराम से चल जाता है। अपनी धन राशि की माँग करने बैंक पहुँच बैंक जमा राशि के एक बड़े भाग को ऋण देने जाएँ तो क्या होगा? के लिए इस्तेमाल करते हैं। विभिन्न आर्थिक जमाकर्ता । कीदार लोग जमा करते हैं। लोग ऋण लेते हैं लोग धन निकालते हैं। और ब्याज पाते हैं। बैंक की आय बढ़ती है । लोग ऋण लौटाते हैं। और ब्याज देते हैं। आर्थिक विकास की समझ हमारी रोजमर्रा की गतिविधियों में ऐसे बहुत से लेन-देन होते हैं, जहाँ किसी न किसी रूप में ऋण का प्रयोग होता है। ऋण (उधार) से हमारा तात्पर्य एक सहमति से है। जहाँ साहूकार कर्जदार को धन, वस्तुएँ या सेवाएँ मुहैया कराता है और बदले में भविष्य में कर्जदार से भुगतान करने का वादा लेता है। अब हम निम्नलिखित दो उदाहरणों के द्वारा देखते हैं कि ऋण की क्या भूमिका होती है? (1) त्यौहार का मौसम अब से दो महीने बाद त्यौहार का मौसम है और जूता प्रस्ताव रखता है और बाद में भुगतान करने का वादा निर्माता सलीम के पास शहर के एक बड़े व्यापारी से करता है। दूसरा, वह इस बड़े व्यापारी से 1000 जूतों के 3000 जोड़ी जूते की माँग आती है, जिसे उसे एक महीने लिए अग्रिम भुगतान के रूप में नकद कर्ज लेता है तथा के अन्दर पूरा करना है। उत्पादन के काम को समय पर महीना खत्म होने से पहले पूरा ऑर्डर पहुँचाने का वादा पूरा करने के लिए सलीम को सिलाई और चिपकाने के करता है। काम के लिए अतिरिक्त मज़दूर रखने की आवश्यकता महीने के आखिर में सलीम जूते पहुँचाने में कामयाब है। उसे कच्चा माल भी खरीदना है। इन सभी खर्चा को होता है। उसे अच्छा-खासा लाभ भी होता है और वह पूरा करने के लिए सलीम दो स्रोतों से ऋण लेता है। | उधार लिए धन की अदायगी भी कर देता है। पहला, वह चमड़ा व्यापारी को चमड़ा अभी देने का । सलीम उत्पादन के लिए कार्यशील पूँजी की जरूरत को ऋण के द्वारा पूरा करता है। ऋण उसे उत्पादन के कार्यशील खर्चा तथा उत्पादन को समय पर पूरा करने में मदद करता है और वह अपनी कमाई बढ़ा पाता है। इस प्रकार ऋण एक महत्त्वपूर्ण तथा सकारात्मक भूमिका अदा करता है। (2) स्वप्ना की समस्या एक छोटी किसान स्वप्ना अपनी 3 एकड़ जमीन पर मूंगफली उगाती है। वह इस उम्मीद पर कि फसल तैयार होने पर कर्ज को अदा कर देगी, खेती के खर्चे के लिए साहूकार से ऋण लेती है। फसल पर कीटनाशकों के हमले से फसल बर्बाद हो जाती है। हालाँकि स्वप्ना फसल पर महँगी कीटनाशक दवाइयाँ छिड़कती है, उससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। वह साहूकार का कर्ज लौटाने में असफल रहती है और साल के अंदर यह कर्ज बड़ी रकम बन जाता है। अगले साल, स्वप्ना खेती के लिए दुबारा उधार लेती है। इस साल फसल सामान्य रहती है, लेकिन इतनी कमाई नहीं होती कि वह अपना कर्ज वापस कर सके। वह कर्ज में फैंस जाती है। उसे कर्ज को चुकाने के लिए अपनी ज़मीन का कुछ हिस्सा बेचना पड़ता है। मुद्रा और साख ग्रामीण क्षेत्रों में साख की मुख्य माँग फसल स्वप्ना के मामले में फसल बर्बाद हो जाने से उगाने के लिए होती है। फसल उगाने में बीज, कर्ज की अदायगी असंभव हो गई। उसे कर्ज खाद, कीटनाशक दवाओं, पानी, बिजली, उपकरणों उतारने के लिए अपनी जमीन का कुछ हिस्सा की मरम्मत इत्यादि पर काफी खर्च होता है। इन बेचना पड़ा। ऋण ने स्वप्ना की कमाई को बढ़ाने आगतों को खरीदने और फसल की बिक्री होने के के बजाय उसकी स्थिति बदतर कर दी। इसे आम बीच कम से कम 3-4 महीने का अंतराल होता भाषा में कर्ज-ज़ाल कहा जाता है। इस मामले में है। आमतौर से किसान ऋतु के आरंभ में फसल ऋण कर्जदार को ऐसी परिस्थिति में धकेल उगाने के लिए उधार लेते हैं और फसल तैयार देता है, जहाँ से बाहर निकलना काफी होने के बाद वापस कर देते हैं। उधार की अदायगी कष्टदायक होता है। मुख्यतः फसल की कमाई पर निर्भर है। | एक स्थिति में ऋण आय बढ़ाने में सहयोग करता है, जिससे व्यक्ति की स्थिति पहले से बेहतर हो जाती है। दूसरी स्थिति में, फसल बर्बाद होने के कारण ऋण व्यक्ति को अपने जाल में 1. निम्नलिखित तालिका की पूर्ति कीजिए। फैंसा देता है। स्वप्ना को कर्ज Heile | स्वना स्वप्ना उतारने के लिए अपनी ज़मीन उन्हें ऋण की आवश्यकता क्यों पड़ी? का एक हिस्सा बेचना पड़ता है। जोखिम क्या था? स्पष्ट है कि उसकी स्थिति पहले परिणाम क्या हुए? की तुलना में बदतर हुई। ऋण उपयोगी होगा या नहीं, यह 2. मान लीजिए, सलीम को व्यापारियों से ऑर्डर मिलते रहते हैं। 6 साल बाद उसकी स्थिति क्या परिस्थिति के खतरों और हानि होगी? होने पर प्राप्त सहयोग की संभावना 3. कौन से कारण हैं, जो स्वप्ना की स्थिति को जोखिम भरा बनाते हैं? निम्नलिखित कारकों की पर निर्भर करता है। चर्चा कीजिए- कीटनाशक दवाइयाँ, साहूकारों की भूमिका, मौसम। हर ऋण समझौते में ब्याज दर निश्चित कर दी जाती है, जिसे कर्जदार महाजन को मूल रकम के साथ अदा करता है। इसके अलावा, उधारदाता कोई समर्थक ऋणाधार (गिरवी रखने के लिए) की माँग कर सकता है। समर्थक ऋणाधार ऐसी संपत्ति है, जिसका मालिक कर्जदार है (जैसे कि भूमि, इमारत, गाड़ी, पशु, बैंकों में पूँजी) और इसका इस्तेमाल वह उधारदाता को गारंटी देने के रूप में करता है, जब तक कि ऋण का भुगतान नहीं हो जाता। यदि कर्जदार उधार वापस नहीं कर पाता, तो उधारदाता को भुगतान प्राप्ति के लिए संपत्ति या समर्थक ऋणाधार बेचने का अधिकार होता है। संपत्ति - जैसे कि जमीन, बैंकों में जमा पूँजी, पशु इत्यादि समर्थक ऋणाधार के आम उदाहरण हैं, जिनका उपयोग कर्ज लेने के लिए किया जाता है। आवास ऋण मेघा ने घर खरीदने के लिए बैंक से 5 लाख रुपये का कर्ज लिया। इस कर्ज पर ब्याज की वार्षिक दर 12 प्रतिशत है और इस कर्ज को 10 साल में मासिक किश्तों में लौटाया जाना है। मेघा को बैंक से कर्ज लेने से पहले उसे अपनी नौकरी और वेतन संबंधी रिकार्ड दिखाने पड़ते हैं। बैंक नए घर के सभी कागज ऋणाधार के रूप में रख लेता है, जिन्हें मेघा द्वारा ब्याज समेत कर्ज लौटाने पर वापस किया जाएगा। मेघा के आवास ऋण के निम्नलिखित विवरणों की पूर्ति करें - g ऋण राशि (रुपये में) ऋण-अवधि आवश्यक कागजात ब्याज दर अदायगी का स्वरूप समर्थक ऋणाधार ब्याज दर, समर्थक ऋणाधार, आवश्यक कागजात और भुगतान के तरीकों को सम्मिलित रूप से ऋण की शर्ते कहा जाता है। ऋण की शर्तों में एक ऋण व्यवस्था से दूसरी ऋण व्यवस्था में काफी फर्क आ जाता है। कर्ज की शर्ते उधारदाता और कर्जदार की प्रकृति पर भी निर्भर करती है। अगले भाग में ऐसे उदाहरण दिए गए हैं, जहाँ विभिन्न ऋण व्यवस्थाओं में ऋण की शर्ते अलग-अलग हैं। 1. उधारदाता उधार देते समय समर्थक ऋणाधार की माँग क्यों करता है? 2. हमारे देश की एक बहुत बड़ी आबादी निर्धन है। क्या यह उनके कर्ज लेने की क्षमता को प्रभावित करती है? 3. कोष्ठक में दिए गए सही विकल्पों का चयन कर रिक्त स्थानों की पूर्ति करें - ऋण लेते समय कर्जदार आसान ऋण शर्तों को देखता है। इसका अर्थ है ••••••••••••• (निम्न/उच्च) ब्याज दर,••••••••••••••• (आसान /कठिन) अदायगी की शर्ते, ••••••••••••••• (कम/अधिक) समर्थक ऋणाधार एवं आवश्यक कागजात मुद्रा और साख विविध प्रकार के साख प्रबंध- एक गाँव का उदाहरण रोहित और रंजन ने कक्षा में ऋण की शर्तों के बारे में पढ़ना खत्म किया था। वे अपने इलाके में प्रचलित विविध प्रकार के ऋण प्रबंधों को जानने को उत्सुक थे – कौन लोग उधार देते थे? कर्जदार कौन थे? ऋण की क्या शर्ते थीं? उन्होंने अपने गाँव के कुछ लोगों से बात करने का फैसला किया। आगे आप उनका लेखा पढ़ सकते हैं। 15, नवम्बर 2006, हम सीधा उन खेतों में जाते हैं जहाँ दिन के इस समय अधिकतर किसान और मजदूर काम कर रहे होंगे। खेतों में आलू की फसल लगी हुई है। पहले हम सोनपुर, एक छोटा-सा गाँव, जहाँ सिंचाई की सुविधाएँ मौजूद हैं, के एक छोटे किसान श्यामल से मिलते हैं। श्यामल का कहना है कि उसे अपनी 1.5 एकड़ जमीन को जोतने के लिए हर मौसम में उधार लेने की ज़रूरत पड़ती है। कुछ साल पहले तक वह गाँव के महाजन से ऋण लेता था जिस पर उसे 5 प्रतिशत मासिक ब्याज देनी पड़ती थी (60 प्रतिशत वार्षिक)। पिछले कुछ वर्षों से श्यामल गाँव के एक कृषि व्यापारी से 3 प्रतिशत मासिक ब्याज की दर पर ऋण ले रहा है। जुताई के मौसम की शुरुआत होने पर व्यापारी ऋण पर कृषि संबंधित आगते (जरूरतें) मुहैया कराता है, जिसे फसल तैयार हो जाने पर वापस करना होता है। ऋण पर ब्याज के अलावा व्यापारी किसानों से वादा लेता है कि वह अपनी फसल उसी को बेचेगा। इस तरह व्यापारी निश्चित है कि ऋण की अदायगी समय से हो जायेगी। फसल की कीमतें फसल काटते समय कम होती है इसलिए वह किसानों से कम कीमत पर फसल खरीदकर और बाद में कीमत बढ़ने पर बेचकर भारी मुनाफा कमाता है। व्यापारी को उस समय फसल खरीदने से मुनाफ़ा होता है। वह फसल सस्ते में खरीदकर बाद में कीमतें बढ़ने पर बेचता है। अब हम अरुण से मिलते हैं जो एक किसान मजदूर के काम का निरीक्षण कर रहा है। अरूण के पास 7 एकड़ जमीन है। अरूण सोनपुर के उन कुछ लोगों में से है, जिसे खेती के लिए बैंक से ऋण मिला है। इस ऋण पर वार्षिक ब्याज दर 8.5 प्रतिशत है और इसे अगले तीन वर्षों में कभी भी लौटाया जा सकता है। अरूण की योजना है कि वे फसल तैयार होने पर अपनी उपज का कुछ हिस्सा बेचकर इस ऋण की अदाएगी कर देगा। वह बाकी आलू की फसल को शीत भंडार गृह में रखकर बैंक से इसके बदले नया ऋण लेने के लिए दरख्वास्त देना चाहता है। बैंक उन किसानों को ऐसी सुविधा देने के लिए तैयार है जो पहले भी खेती के लिए उससे ऋण ले चुके हैं। रमा निकट के खेत में कृषि मजदूर के रूप में काम करती है। साल में कई महीने रमा के पास कोई काम नहीं होता और उसे अपने रोजमर्रा के खर्चे के लिए कर्ज लेना पड़ता है। अचानक बीमार पड़ने पर या परिवार में किसी समारोह पर खर्च करने के लिए भी उसे कर्ज लेना पड़ता है। रमा कर्ज के लिए अपने मालिक पर, जो सोनपुर का मध्यवर्गीय भूस्वामी है, आश्रित है। भूस्वामी उसे 5 प्रतिशत मासिक ब्याज दर पर ऋण देता है। रमा उस कर्ज को भूस्वामी के यहाँ काम करके वापस करती है। अधिकांशतया, रमा को नया ऋण लेना पड़ जाता है, जबकि वह पुराना ऋण लौटा भी नहीं पाती है। वर्तमान में, उसे भूस्वामी के 5,000 रुपये देने हैं। यद्यपि भूस्वामी उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करता, फिर भी वह उसके लिए लगातार काम करती है ताकि आवश्यकता पड़ने पर उसे ऋण मिल सके। रमा हमें बताती हैं कि सोनपुर में भूमिहीन लोगों के लिए ऋण का एकमात्र स्रोत भूस्वामी-नियोक्ता ही हैं। सहकारी समितियों से ऋण बैकों के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में सस्ते ऋण का एक अन्य स्रोत सहकारी समितियाँ हैं। सहकारी समिति के सदस्य अपने संसाधनों को कुछ क्षेत्रों में सहयोग के लिए एकत्र करते हैं। कई प्रकार की सहकारी समितियाँ संभव है, जैसे किसानों, बुनकरों एवं औद्योगिक मजदूरों इत्यादि की सहकारी समितियाँ। कृषक सहकारी समिति सोनपुर के नजदीक एक गाँव में काम करती है। इसके 2300 किसान सदस्य हैं। यह अपने सदस्यों से जमा प्राप्त करती हैं। इस जमा पूँजी को ऋणाधार मानते हुए, इस सहकारी समिति ने बैंक से बड़ा ऋण प्राप्त किया है। इस पूंजी का इस्तेमाल सदस्यों को कर्ज देने के लिए किया जाता है। यह ऋण लौटाने के बाद कर्ज का दूसरा दौर शुरू किया जा सकता है। कृषक सहकारी समिति कृषि उपकरण खरीदने, खेती तथा कृषि व्यापार करने, मछली पकड़ने, घर बनाने और अन्य विभिन्न प्रकार के ख़र्चा के लिए ऋण मुहैया कराती है। 1. सोनपुर में ऋण के विभिन्न स्रोतों की सूची बनाइए। 2. ऊपर दिए हुए अनुच्छेदों में ऋण के विभिन्न प्रयोगों वाली पंक्तियों को रेखांकित कीजिए। 3. सोनपुर के छोटे किसान, मध्यम किसान और भूमिहीन कृषि मजदूर के लिए ऋण की शर्तों की तुलना कीजिए। 4. श्यामल की तुलना में अरुण को खेती से ज्यादा आय क्यों होगी? 5. क्या सोनपुर के सभी लोगों को सस्ती ब्याज दरों पर कर्ज मिल सकता है? किन लोगों को मिल सकता है? 6. सही उत्तर पर निशान लगाइए - (क) समय के साथरमा का ऋण • बढ़ जाएगा। • समान रहेगा • घट जाएगा (ख) अरूण सोनपुर के उन लोगों में से है जो बैंक से उधार लेते हैं क्योंकि - • गाँव के अन्य लोग साहूकारों से कर्ज लेना चाहते हैं। • बैंक समर्थक ऋणाधार की माँग करते हैं जो कि हर किसी के पास नहीं होती। • बैंक ऋण पर ब्याज दरें उतनी ही हैं जितना कि व्यापारी लेते हैं। 7. कुछ लोगों से बातचीत कीजिए, जिनसे आपको अपने क्षेत्र में ऋण प्रबंधों के बारे में कोई जानकारी मिले। अपनी बातचीत को रिकॉर्ड कीजिए। विभिन्न लोगों में ऋण की शर्तों में विभिन्नता को लिखिए। मुद्रा और साख 3TR4 सरकारी 1% 8% सहकारी समितियों 25% साहूकार 25% हमने ऊपर के उदाहरणों में देखा आलेख 1 - वर्ष 2012 में भारत में ग्रामीण परिवारों के है कि लोग विभिन्न स्रोतों से साख के स्रोत ऋण प्राप्त करते हैं। विभिन्न प्रकार के ऋणों को दो वर्गों में अनौपचारिक स्रोत बांटा जा सकता है - औपचारिक 2% तथा अनौपचारिक क्षेत्रक ऋण। रिश्तेदार एवं पहले वर्ग में बैंकों और सहकारी मित्र सहकारी समितियाँ/ समितियों से लिए कर्ज आते हैं। अनौपचारिक उधारदाता में साहूकार, व्यापारी, मालिक, 33% व्यावसायिक रिश्तेदार, दोस्त इत्यादि आते हैं। आलेख-1 में आप भारत के ग्रामीण परिवारों के लिए ऋण के विभिन्न जमींदार अन्य औपचारिक स्रोत स्रोतों को देख सकते हैं। क्या । 1% अधिक ऋण औपचारिक क्षेत्रक वाले व्यावसायियों और व्यापारियों को ही ऋण से आ रहा है या अनौपचारिक क्षेत्रक से? मुहैया नहीं करा रहे, बल्कि छोटे किसानों, छोटे भारतीय रिज़र्व बैंक ऋणों के औपचारिक उद्योगों, छोटे कर्जदारों इत्यादि को भी ऋण दे रहे स्रोतों की कार्यप्रणाली पर नज़र रखता है। उदाहरण हैं। समय-समय पर, बैंकों द्वारा आर.बी.आई. को के लिए, हमने देखा कि बैंक अपनी जमा का एक यह जानकारी देनी पड़ती है कि वे कितना और न्यूनतम नकद हिस्सा अपने पास रखते हैं। किनको ऋण दे रहे हैं और उसकी ब्याज की दरें आर. बी. आई. नजर रखता है कि बैंक वास्तव में क्या है? नकद शेष बनाए हुए हैं। आर.बी.आई. इस पर भी नजर रखता है कि बैंक केवल लाभ अर्जित करने अनौपचारिक क्षेत्रक में ऋणदाताओं की गतिविधियों की देखरेख करने वाली कोई संस्था नहीं है। वे ऐच्छिक दरों पर ऋण दे सकते हैं। लेकिन, बैंक हमारी उच्च उन्हें नाजायज़ तरीकों से अपने पैसे वापस लेने से आय क्यों चाहेगा? रोकने वाला कोई नहीं है। 1% 5% औपचारिक ऋणदाताओं की तुलना में औपचारिक और अनौपचारिक साख - अनौपचारिक क्षेत्रक के ज्यादातर ऋणदाता कहीं किसे क्या मिलता है? अधिक ब्याज वसूल करते हैं। इसलिए, अनौपचारिक रिक आलेख 2 में शहरी क्षेत्रों के लोगों के लिए ऋण ऋण कज़दाता का आधक महंगा पड़ता है। के औपचारिक और अनौपचारिक महत्व को ऋण की ऊँची लागत का अर्थ है कर्जदार की दिखाया गया है। आलेख में गरीब से अमीर लोगों आय का अधिकतर हिस्सा ऋण की अदाएगी में को चार भागों में बाँटा गया है। आप देख सकते ही खर्च हो जाता है। इसलिए, कर्जदारों के पास हैं कि शहरी क्षेत्रों के निर्धन परिवारों की कर्जी की अपने लिए कम आय बचती है (जैसा कि हम ने 85 प्रतिशत ज़रूरतें अनौपचारिक स्रोतों से पूरी सोनपुर के श्यामल के मामले में देखा)। कुछ होती हैं। इस की तुलना आप शहरी इलाकों के मामलों में ऋण की ऊँची ब्याज दरों के कारण अमीर परिवारों से कीजिए। आप क्या देखते हैं? कर्ज वापस करने की रकम कर्जदार की आय से उनके केवल 10 प्रतिशत कर्ज अनौपचारिक स्रोतों भी अधिक हो जाती है। इसके कारण ऋण का से जबकि 90 प्रतिशत औपचारिक स्रोतों से हैं। बोझ बढ़ जाता है (जैसा कि हमने सोनपुर की रमा इसी तरह की तस्वीर ग्रामीण क्षेत्रों में भी है। अमीर के मामले में देखा) और व्यक्ति ऋण-जाल में परिवार औपचारिक ऋणदाताओं से सस्ता ऋण ले फँस जाता है। ऐसा भी संभव है कि जो लोग कर्ज रहे हैं, जबकि गरीब परिवारों को कर्ज के लिए लेकर अपना उद्यम शुरू करना चाहते हैं, वे ऋण बहुत सारा पैसा देना पड़ता है। की अधिक लागत को देख कर पीछे हट जाएँ। | इस सबसे क्या पता चलता है? पहला, इन सभी कारणों को देखते हुए बैंकों और औपचारिक स्रोत अभी भी ग्रामीण परिवारों की सहकारी समितियों को ज्यादा कर्ज देना चाहिए। कुल ऋण जरूरतों का केवल 50 प्रतिशत पूरा इसके जरिए लोगों की आय बढ़ सकती है और कर पाता है। बाकी ज़रूरतें अनौपचारिक स्रोतों से बहुत से लोग अपनी विभिन्न ज़रूरतों के लिए पूरी होती हैं। अनौपचारिक ऋणदाताओं से लिए सस्ता कर्ज ले सकेंगे। वे फसल उगा सकते हैं, गये उधार पर आमतौर से ब्याज की दरें बहुत कोई कारोबार कर सकते हैं, छोटे उद्योग इत्यादि अधिक होती हैं और यह उधार कर्जदाताओं की लगा सकते हैं। वे नया उद्योग लगा सकते हैं या वस्तुओं का व्यापार कर आलेख 2 - शहरी परिवारों द्वारा लिए गए कुल ऋण का कितना प्रतिशत औपचारिक सकते हैं। सस्ता और सामर्थ्य के तथा कितना प्रतिशत अनौपचारिक था? अनुकूल कर्ज देश के विकास के लिए अति आवश्यक है। 15% 10% 28% 85% 72% 72% 90% 90% 53% 47% गरीब TIG परिवार कम संपत्ति वाले परिवार कम संपत्ति समृद्ध परिवार समृद्ध 3747 परिवार अमीर नीलाः अनौपचारिक स्रोत में ऋण की प्रतिशत बैंगनीः औपचारिक स्रोत में ऋण का प्रतिशत मुद्रा और साख आय बढ़ाने का काम कम ही कर पाता है। इसलिए, बैंकों और सहकारी समितियों को अपनी गतिविधियाँ विशेषकर ग्रामीण इलाकों में बढ़ाने की जरूरत है, ताकि कर्जदारों की अनौपचारिक स्रोत पर से निर्भरता घटे। दूसरा, यदि एक तरफ औपचारिक स्रोत के ऋणों का विस्तार होना चाहिए तो दूसरी ओर यह भी ज़रूरी है कि यह ऋण सभी लोगों को प्राप्त हो सके। वर्तमान समय में, अमीर परिवार ही औपचारिक स्रोतों से ऋण प्राप्त करते हैं जबकि गरीब परिवारों को अनौपचारिक स्रोतों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। यह ज़रूरी है कि औपचारिक ऋण का अधिक समान वितरण हो, ताकि गरीब परिवार भी सस्ते ऋण का फायदा उठा सकें। 1. ऋण के औपचारिक और अनौपचारिक स्रोतों में क्या अन्तर है? 2. सभी लोगों के लिए यथोचित दरों पर ऋण क्यों उपलब्ध होना चाहिए? 3. क्या भारतीय रिजर्व बैंक के जैसा कोई निरीक्षक होना चाहिए जो अनौपचारिक ऋणदाताओं की गतिविधियों पर नज़र रखे? उसका काम मुश्किल क्यों होगा? 4. आपकी समझ में गरीब परिवारों की तुलना में अमीर परिवारों के औपचारिक ऋणों का हिस्सा | अधिक क्यों होता है? रजाई की सिलाई करता | एक मजदूर क्या आप मानते हैं कि बैंक मुझे ऋण देगा? पिछले खंड में हमने देखा कि निर्धन परिवार ऋण है। ऋणाधार की अनुपलब्धता एक प्रमुख कारण के लिए अब भी अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भर है। है, जिससे गरीब बैंकों से ऋण नहीं ले पाते। दूसरी ऐसा क्यों है? भारत के सभी ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक ओर, अनौपचारिक ऋणदाता जैसे साहूकार इन मौजूद नहीं हैं। जहाँ कहीं मौजूद भी हैं, बैंक से कर्जदारों को व्यक्तिगत स्तर पर जानते हैं और इस कर्ज लेना अनौपचारिक स्रोत से कर्ज लेने की कारण अक्सर बिना ऋणाधार के भी ऋण देने के तलना में ज्यादा मश्किल है। जैसा कि हमने मेघा लिए तैयार हो जाते हैं। कर्जदार जरूरत पड़ने पर के मामले में देखा, बैंक से कर्ज लेने के लिए पुराना ऋण चुकाये बिना भी, नया कर्ज लेने के ऋणाधार और विशेष कागजातों की जरूरत पड़ती लिए साहूकार के पास जा सकते हैं। लेकिन, आर्थिक विकास की समझ महाजन ब्याज की दरें बहुत ऊँची रखते हैं, है। इस ऋण को लौटाने की ज़िम्मेदारी भी समूह लेन-देन की लिखा पढ़ी भी पूरी नहीं करते और की होती है। एक भी सदस्य अगर ऋण वापस निर्धन कर्जदारों को तंग करते हैं। नहीं लौटाता तो समूह के अन्य सदस्य इस मामले को गंभीरता से लेते हैं। इसी कारण, बैंक निर्धन हाल के वर्षों में, लोगों ने गरीबों को उधार देने महिलाओं को ऋण देने के लिए तैयार हो जाते हैं। के कुछ नए तरीके अपनाने की कोशिश की है। जब वे अपने को स्वयं सहायता समूहों में संगठित इन में से एक विचार ग्रामीण क्षेत्रों के गरीबों कर लेती हैं, यद्यपि उनके पास कोई ऋणाधार विशेषकर महिलाओं को छोटे-छोटे स्वयं सहायता नहीं होता। समूहों में संगठित करने और उनकी बचत पूँजी को एकत्रित करने पर आधारित है। एक विशेष स्वयं इस तरह, स्वयं सहायता समूह कर्जदारों को सहायता समूह में एक-दूसरे के पड़ोसी 15-20 ऋणाधार की कमी की समस्या से उबारने में मदद सदस्य होते हैं, जो नियमित रूप से मिलते हैं और करते हैं। उन्हें समयानुसार विभिन्न प्रकार की बचत करते हैं। प्रति व्यक्ति बचत 25 रुपए से आवश्यकताओं के लिए एक उचित ब्याज दर पर लेकर 100 रुपए या अधिक हो सकती है। यह ऋण मिल जाता है। इसके अतिरिक्त यह समूह परिवारों की बचत करने की क्षमता पर निर्भर करता ग्रामीण क्षेत्रों के गरीबों को संगठित करने में मदद है। सदस्य अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए करते हैं। इससे न केवल महिलाएँ आर्थिक रूप से छोटे कर्ज समूह से ही कर्ज ले सकते हैं। समूह स्वावलंबी हो जाती हैं, बल्कि समूह की नियमित इन कर्जा पर ब्याज लेता है लेकिन यह साहूकार बैठकों के जरिए लोगों को एक आम मंच मिलता द्वारा लिए जाने वाले ब्याज से कम होता है। एक है, जहाँ वह तरह-तरह के सामाजिक विषयों जैसे, या दो वर्षों के बाद, अगर समूह नियमित रूप से स्वास्थ्य, पोषण और घरेलू हिंसा इत्यादि पर बचत करता है, तो समूह बैंक से आपस में चर्चा कर पाती हैं। ऋण लेने के योग्य हो जाता है। ऋण समूह के नाम पर दिया जाता है और गुजरात में महिलाओं को स्वयं सहायता समूह की बैठक इसका मकसद सदस्यों के लिए स्वरोजगार के अवसरों का सृजन करना है। उदाहरण के लिए, सदस्यों को छोटे-छोटे कर्ज अपनी गिरवी जमीन छुड़वाने के लिए, कार्यशील पूँजी की ज़रूरतें (बीज, खाद, बाँस और कपड़े खरीदने के लिए), घर बनाने, सिलाई की मशीन, हथकरघा, पशु इत्यादि संपत्ति खरीदने के लिए दिए जाते हैं। | बचत और ऋण गतिविधियों से संबंधी ज्यादातर महत्त्वपूर्ण निर्णय समूह के सदस्य स्वयं लेते हैं। समूह दिए जाने वाले ऋण-उसका लक्ष्य, उसकी रकम, ब्याज दर, वापस लौटाने की अवधि आदि के बारे में निर्णय करता मुद्रा और साख बांग्लादेश का ग्रामीण बैंक बांग्लादेश ग्रामीण बैंक का उचित ब्याज दरों पर गरीबों की ऋण जरूरतों को पूरा करने का बड़ा सफल इतिहास रहा है। इसकी शुरुआत 1970 में एक छोटे पैमाने से हुई। वर्ष अक्तूबर 2014 में ग्रामीण बैंक के अब 8.63 लाख सदस्य हैं जो बांग्लादेश के 81,390 गाँवों में फैले हुए हैं। इससे ऋण लेने वाली ज्यादातर महिलाएँ हैं जिनका संबंध समाज के गरीब तबके से है। इन कर्जदारों ने दिखा दिया है कि न केवल गरीब महिलाएँ भरोसेमंद कर्जदार हैं, बल्कि वे विभिन्न तरह की छोटी आय वाली गतिविधियों को सफलतापूर्वक शुरू करने और चला सकने में सक्षम हैं। अगर गरीब लोगों को सही और उचित शर्तो पर ऋण उपलब्ध कराया जा सकता है, तो लाखों छोटे लोग अपनी लाखों छोटी-छोटी गतिविधियों के जरिए विकास का सबसे बड़ा चमत्कार कर सकते हैं।'' प्रो. मोहम्मद युनूस। ग्रामीण बैंक के संस्थापक एवं 2006 में शांति के लिए नोबेल पुस्स्कार से सम्मानित। इस अध्याय में हमने मुद्रा के आधुनिक रूपों ऋणदाताओं में ऋण की शर्तों में बहुत फर्क हो और बैंकिग प्रणाली से इसके संबंधों को देखा। सकता है। वर्तमान समय में, अमीर परिवार एक तरफ़ जमाकर्ता अपना धन बैंकों में रखते हैं, औपचारिक स्रोतों से ऋण लेते हैं जबकि गरीबों दूसरी तरफ़ कर्जदार बैंकों से ऋण लेते हैं। को अब भी अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भर रहना आर्थिक गतिविधियों के लिए ऋण की जरूरत पड़ता है। यह अनिवार्य है कि औपचारिक क्षेत्र होती है। जैसा कि हमने देखा, ऋण के सकारात्मक के कल ऋणों में वद्धि हो, ताकि प्रभाव हो सकते हैं या कुछ परिस्थितियों में वे अनौपचारिक ऋण पर से निर्भरता कम हो। साथ कर्जदार की स्थिति और बदतर कर सकते हैं। ही, बैंकों और सहकारी समितियों इत्यादि से ऋण विभिन्न स्रोतों से उपलब्ध होता है। ये गरीबों को मिलने वाले औपचारिक ऋण का औपचारिक और अनौपचारिक दोनों तरह के स्रोत हिस्सा बढ़ना चाहिए। ये दोनों कदम विकास के हो सकते हैं। औपचारिक और अनौपचारिक लिए जरूरी हैं। 1. जोखिम वाली परिस्थितियों में ऋण कर्जदार के लिए और समस्याएँ खड़ी कर सकता है। स्पष्ट कीजिए। 2. मुद्रा आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की समस्या को किस तरह सुलझाती है? अपनी ओर से उदाहरण देकर समझाइए। 3. अतिरिक्त मुद्रा वाले लोगों और जरूरतमंद लोगों के बीच बैंक किस तरह मध्यस्थता करते हैं? 4. 10 रुपये के नोट को देखिए। इसके ऊपर क्या लिखा है? क्या आप इस कथन की व्याख्या कर सकते हैं? 5. हमें भारत में ऋण के औपचारिक स्रोतों को बढ़ाने की क्यों ज़रूरत है? 6. गरीबों के लिए स्वयं सहायता समूहों के संगठनों के पीछे मूल विचार क्या हैं? अपने शब्दों में व्याख्या कीजिए। 7. क्या कारण हैं कि बैंक कुछ कर्जदारों को कर्ज देने के लिए तैयार नहीं होते? आर्थिक विकास की समझ 8. भारतीय रिज़र्व बैंक अन्य बैंकों की गतिविधियों पर किस तरह नज़र रखता है? यह ज़रूरी क्यों है? 9. विकास में ऋण की भूमिका का विश्लेषण कीजिए। 10. मानव को एक छोटा व्यवसाय करने के लिये ऋण की ज़रूरत है। मानव किस आधार पर यह निश्चित करेगा कि उसे यह ऋण बैंक से लेना चाहिये या साहूकार से? चर्चा कीजिए। 11. भारत में 80 प्रतिशत किसान छोटे किसान हैं, जिन्हें खेती करने के लिए ऋण की ज़रूरत होती है। | (क) बैंक छोटे किसानों को ऋण देने से क्यों हिचकिचा सकते हैं? (ख) वे दूसरे स्रोत कौन हैं, जिनसे छोटे किसान कर्ज ले सकते हैं। (ग) उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए कि किस तरह ऋण की शर्ते छोटे किसानों के प्रतिकूल हो सकती हैं। (घ) सुझाव दीजिए कि किस तरह छोटे किसानों को सस्ता ऋण उपलब्ध कराया जा सकता है। 12. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें - (7) ••••••••••• परिवारों की ऋण की अधिकांश ज़रूरतें अनौपचारिक स्रोतों से पूरी होती हैं। (a) •••••••••••• ऋण की लागत ऋण का बोझ बढाती है। •••••••••••• केन्द्रीय सरकार की ओर से करेंसी नोट जारी करता है। (घ) बैंक •••••••..... •••••••••••••••• पर देने वाले ब्याज से ऋण पर अधिक ब्याज लेते हैं। ••••••••••• सम्पत्ति है जिसका मालिक कर्जदार होता है जिसे वह ऋण लेने के लिए गारंटी के रूप में इस्तेमाल करता है, जब तक ऋण चुकता नहीं हो जाता। 13. सही उत्तर का चयन करें - (क) स्वयं सहायता समूह में बचत और ऋण संबंधित अधिकतर निर्णय लिए जाते हैं - • बैंक द्वारा। • सदस्यों द्वारा • गैर सरकारी संस्था द्वारा (ख) ऋण के औपचारिक स्रोतों में शामिल नहीं है - • बैंक • सहकारी समिति • नियोक्ता (ग) •••• (ङ) ••••••••• नीचे दी गई तालिका शहरी क्षेत्रों के विभिन्न लोगों के व्यवसाय दिखाती है। इन लोगों को किन उद्देश्यों के लिए ऋण की ज़रूरत हो सकती है? रिक्त स्तंभों को भरें। व्यवसाय ऋण लेने का कारण निर्माण मजदूर कंप्यूटर शिक्षित स्नातक छात्र सरकारी सेवा में नियोजित व्यक्ति दिल्ली में प्रवासी मजदूर घरेलू नौकरानी छोटा व्यापारी ऑटो रिक्सा चालक बंद फैक्ट्री का मज़दूर आगे, लोगों को दो वर्गों में विभाजित कीजिए, जिन्हें आप सोचते हैं कि बैंक से कर्ज मिल सकता है। और जिन्हें कर्ज मिलने की आशा नहीं है। आपने वर्गीकरण के लिए किन कारकों का उपयोग किया? मुद्रा और साख

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