Chapter 3 जैसा कि आप जानते हैं कि तीन-चौथाई धरातल जल से ढका हुआ है, परंतु इसमें प्रयोग में लाने योग्य अलवणीय जल का अनुपात बहुत कम है। यह अलवणीय जल हमें सतही अपवाह और भौमजल स्रोत से प्राप्त होता है। जिनका लगातार नवीकरण और पुनर्भरण जलीय चक्र द्वारा होता रहता है। सारा जल जलीय चक्र में गतिशील रहता है जिससे जल नवीकरण सुनिश्चित होता है। | आप को आश्चर्य हो रहा होगा कि जब पृथ्वी का तीन-चौथाई भाग जल से घिरा है और जल एक नवीकरण योग्य संसाधन है तब भी विश्व के अनेक देशों और क्षेत्रों में जल की कमी कैसे है? ऐसी भविष्यवाणी क्यों की जा रही है कि 2025 में 20 करोड़ लोग जल की नितांत कमी झेलेंगे? जल - कुछ तथ्य और आँकडे • विश्व में जल के कुल आयतन का 96.5 प्रतिशत भाग महासागरों में पाया जाता है और केवल 2.5 प्रतिशत अलवणीय जल है। विश्व में अलवणीय जल का लगभग 70 प्रतिशत भाग अंटार्कटिका, ग्रीनलैंड और पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ की चादरों और हिमनदों के रूप में मिलता है, जबकि 30 प्रतिशत से थोड़ा-सा कम भौमजल के जलभृत (aquifer) के रूप में पाया जाता है। भारत विश्व की वृष्टि का 4 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त करता है और प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष जल उपलब्धता के संदर्भ में विश्व में इसका 133 वाँ स्थान है। • भारत में कुल नवीकरण योग्य जल संसाधन 1,897 वर्ग किमी. प्रति वर्ष अनुमानित है। • भविष्यवाणी है कि 2025 तक भारत का एक बड़ा हिस्सा 2015-16(19/01/2015) विश्व के अन्य देशों और क्षेत्रों की तरह जल की नितान्त । वर्षा वाले क्षेत्रों या सूखाग्रस्त इलाकों का ध्यान आता है। कमी महसूस करेगा। हमारे मानस पटल पर तुरंत राजस्थान के मरुस्थल और स्रोत - संयुक्त राष्ट्र विश्व जल विकास रिपोर्ट, 2003 जल से भरे मटके संतुलित करती हुई और जल भरने के जल दुर्लभता और जल संरक्षण एवं प्रबंधन की लिए लंबा रास्ता तय करती पनिहारिनों के चित्र चित्रित हो जाते हैं। यह सच है कि वर्षा में वार्षिक और मौसमी आवश्यकता परिवर्तन के कारण जल संसाधनों की उपलब्धता में जल के विशाल भंडार और इसके नवीकरण योग्य गुणों समय और स्थान के अनुसार विभिन्नता है। परंतु अधिकतया के होते हुए यह सोचना भी मुश्किल है कि हमें जल जल की कमी इसके अतिशोषण, अत्यधिक प्रयोग और दुर्लभता का सामना करना पड़ सकता है। जैसे ही हम समाज के विभिन्न वर्गों में जल के असमान वितरण के जल की कमी की बात करते हैं तो हमें तत्काल ही कम कारण होती है। चित्र 3.1 - पानी की कमी/ दुर्लभता 26 समकालीन भारत-2 2015-16(19/01/2015) किए गए हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि शहरों में स्वीडेन के एक विशेषज्ञ, फाल्कनमार्क के अनुसार जल जल संसाधनों का अति शोषण हो रहा है और इनकी की कमी तब होती है जब प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिवर्ष 1000 से 1600 घन मीटर के बीच जल उपलब्ध होता है। कमी होती जा रही है। अब तक हमने जल दुर्लभता के मात्रात्मक पहलू क्या यह संभव है कि किसी क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में की ही बात की है। आओ, हम ऐसी स्थिति के बारे में जल संसाधन होने के बावजूद भी वहाँ जल की दुर्लभता विचार करें जहाँ लोगों की आवश्यकता के लिए काफ़ी हो? हमारे कई शहर इसके उदाहरण हैं। अतः जल जल संसाधन हैं, परंतु फिर भी इन क्षेत्रों में जल की दुर्लभता अत्यधिक और बढ़ती जनसंख्या और उसके दुर्लभता है। यह दुर्लभता जल की खराब गुणवत्ता के परिणामस्वरूप जल की बढ़ती माँग और उसके असमान कारण हो सकती है। पिछले कुछ वर्षों से यह चिंता का वितरण का परिणाम हो सकता है। जल, अधिक जनसंख्या विषय बनता जा रहा है कि लोगों की आवश्यकता के के लिए घरेलू उपयोग में ही नहीं बल्कि अधिक अनाज लिए प्रचुर मात्रा में जल उपलब्ध होने के बावजूद यह उगाने के लिए भी चाहिए। अतः अनाज का उत्पादन घरेलू और औद्योगिक अपशिष्टों, रसायनों, कीटनाशकों बढ़ाने के लिए जल संसाधनों का अतिशोषण करके ही और कृषि में प्रयुक्त उर्वरकों द्वारा प्रदूषित है और मानव सिंचित क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है और शुष्क ऋतु में भी उपयोग के लिए खतरनाक है। खेती की जा सकती है। | आपने टेलीविजन विज्ञापनों में देखा होगा कि बहुत से किसानों के खेतों पर अपने निजी कुएँ और नलकूप भारत की नदियाँ विशेषकर छोटी सरिताएँ, जहरीली धाराओं में परिवर्तित हो गई हैं और बड़ी नदियाँ जैसे गंगा और हैं जिनसे सिंचाई करके वे उत्पादन बढ़ा रहे हैं। परंतु यमुना कोई भी शुद्ध नहीं हैं। बढ़ती जनसंख्या, कृषि आपने सोचा है कि इसका परिणाम क्या हो सकता है? आधुनिकीकरण, नगरीकरण और औद्योगीकरण का भारत इसके कारण भौम जलस्तर नीचे गिर सकता है और की नदियों पर अत्यधिक दुष्प्रभाव है और हर दिन गहराता लोगों के लिए जल की उपलब्धता में कमी हो सकती है। जा रहा है... इससे संपूर्ण जीवन खतरे में है। और भोजन सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। स्रोत - द सिटीजन्स फिफ्थ रिपोर्ट, सी एस ई, 1999 स्वतंत्रता के बाद भारत में तेजी से औद्योगीकरण और शहरीकरण हुआ और विकास के अवसर प्राप्त हुए। आजकल हर जगह बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ (MNCs) बड़े | आपने अनुभव कर लिया होगा कि समय की माँग औद्योगिक घरानों के रूप में फैली हुई हैं। उद्योगों की है कि हम अपने जल संसाधनों का संरक्षण और प्रबंधन बढ़ती हुई संख्या के कारण अलवणीय जल संसाधनों पर करें, स्वयं को स्वास्थ्य संबंधी खतरों से बचाएँ, खाद्यान्न दबाव बढ़ रहा है। उद्योगों को अत्यधिक जल के अलावा । सुरक्षा, अपनी आजीविका और उत्पादक क्रियाओं की उनको चलाने के लिए ऊर्जा की भी आवश्यकता होती निरंतरता को सुनिश्चित करें, और हमारे प्राकृतिक है और इसकी काफी हद तक पूर्ति जल विद्युत से होती | पारितंत्रों को निम्नीकृत (degradation) होने से बचाएँ। है। वर्तमान समय में भारत में कुल विद्युत का लगभग जल संसाधनों के अतिशोषण और कुप्रबंधन से इन 22 प्रतिशत भाग जल विद्युत से प्राप्त होता है। इसके । संसाधनों का ह्रास हो सकता है और पारिस्थितिकी अलावा शहरों की बढ़ती संख्या और जनसंख्या तथा । संकट की समस्या पैदा हो सकती है जिसका हमारे शहरी जीवन शैली के कारण न केवल जल और ऊर्जा जीवन पर गंभीर प्रभाव हो सकता है। की आवश्यकता में बढ़ोतरी हुई है अपितु इनसे संबंधित समस्याएँ और भी गहरी हुई हैं। यदि आप शहरी आवास समितियों या कालोनियों पर नजर डालें तो आप पाएँगें । अपने दिन-प्रतिदिन के अनुभव के आधार पर जल संरक्षण कि उनके अंदर जल पूर्ति के लिए नलकूप स्थापित । के लिए एक संक्षिप्त प्रस्ताव लिखें। जल संसाधन 27 2015-16(19/01/2015) बहु-उद्देशीय नदी परियोजनाएँ और समन्वित बाँध क्या हैं और वे हमें जल संरक्षण और प्रबंधन जल संसाधन प्रबंधन में कैसे सहायक हैं? परम्परागत बाँध, नदियों और वर्षा जल को इकट्ठा करके बाद में उसे खेतों की सिंचाई के हम जल का संरक्षण और प्रबंधन कैसे करें? पुरातत्त्व लिए उपलब्ध करवाते थे। आज कल बाँध सिर्फ सिंचाई वैज्ञानिक और ऐतिहासिक अभिलेख/दस्तावेज (record) के लिए नहीं बनाए जाते अपितु उनका उद्देश्य विद्युत बताते हैं कि हमने प्राचीन काल से सिंचाई के लिए। उत्पादन, घरेलू और औद्योगिक उपयोग, जल आपूर्ति, पत्थरों और मलबे से बाँध, जलाशय अथवा झीलों के बाढ़ नियंत्रण, मनोरंजन, आंतरिक नौचालन और मछली तटबंध और नहरों जैसी उत्कृष्ट जलीय कृतियाँ बनाई हैं। | पालन भी है। इसलिए बाँधों को बहुउद्देशीय परियोजनाएँ इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि हमने यह परिपाटी आधुनिक । भी कहा जाता है जहाँ एकत्रित जल के अनेकों उपयोग भारत में भी जारी रखी है और अधिकतर नदियों के समन्वित होते हैं। उदाहरण के तौर पर सतलुज-ब्यास बेसिनों में बाँध बनाए हैं। बेसिन में भाखड़ा-नांगल परियोजना जल विद्युत उत्पादन और सिंचाई दोनों के काम में आती है। इसी प्रकार प्राचीन भारत में जलीय कृतियाँ महानदी बेसिन में हीराकुड परियोजना जलसंरक्षण और • ईसा से एक शताब्दी पहले इलाहाबाद के नजदीक श्रिगंवेरा बाढ़ नियंत्रण का समन्वय है। में गंगा नदी की बाढ़ के जल को संरक्षित करने के लिए एक उत्कृष्ट जल संग्रहण तंत्र बनाया गया था। • चन्द्रगुप्त मौर्य के समय बृहत् स्तर पर बाँध, झील और बाँध बहते जल को रोकने, दिशा देने या बहाव कम करने सिंचाई तंत्रों का निर्माण करवाया गया। के लिए खड़ी की गई बाधा है जो आमतौर पर जलाशय, • कलिंग (ओडिशा), नागार्जुनकोंडा (आंध्र प्रदेश) बेन्नूर झील अथवा जलभरण बनाती हैं। बाँध का अर्थ जलाशय (कर्नाटक) और कोल्हापुर (महाराष्ट्र) में उत्कृष्ट सिंचाई से लिया जाता है न कि इसके ढाँचे से। अधिकतर बाँधों तंत्र होने के सबूत मिलते हैं। में एक ढलवाँ हिस्सा होता है जिसके ऊपर से या अन्दर • अपने समय की सबसे बड़ी कृत्रिम झीलों में से एक, से जल रुक-रुक कर या लगातार बहता है। बाँधों का भोपाल झील, 11वीं शताब्दी में बनाई गई। वर्गीकरण उनकी संरचना और उद्देश्य या ऊँचाई के अनुसार किया जाता है। संरचना और उनमें प्रयुक्त पदार्थों के • 14वीं शताब्दी में इल्तुतमिश ने दिल्ली में सिरी फोर्ट क्षेत्र में जल की सप्लाई के लिए हौज खास (एक विशिष्ट आधार पर बाँधों को लकड़ी के बाँध, तटबंध बाँध या पक्का बाँध के अलावा कई उपवर्गों में बाँटा जा सकता है। तालाब) बनवाया। ऊँचाई के अनुसार बाँधों को बड़े बाँध और मुख्य बाँध या स्रोत - डाईंग विज़डम, सी एस ई, 1997 नीचे बाँध, मध्यम बाँध और उच्च बाँधों में वर्गीकृत किया जा सकता है। स्वतंत्रता के बाद शुरू की गई समन्वित जल संसाधन प्रबंधन उपागम पर आधारित बहुउद्देशीय परियोजनाओं को उपनिवेशन काल में बनी बाधाओं को पार करते हुए देश को विकास और समृद्धि के रास्ते पर ले जाने वाले वाहन के रूप में देखा गया। जवाहरलाल नेहरू गर्व से बाँधों को ‘आधुनिक भारत के मंदिर' कहा करते थे। उनका मानना था कि इन परियोजनाओं के चलते कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था, औद्योगीकरण और नगरीय अर्थव्यवस्था समन्वित रूप से विकास करेगी। चित्र 3.2 - हीराकुड बाँध 28 समकालीन भारत-2 2015-16(19/01/2015) परंपरागत तरीकों से बाँध बनाने की कलाविधि और सिंचाई कार्यों के बारे में अधिक पता लगाएँ। और कुछ नगरीय केंद्रों को। गाँव के भूमिहीनों को लीजिए, क्या वे वास्तव में ऐसी परियोजनाओं से लाभ उठाते हैं? हमने अषाढ़ में फसलें बोई हैं। नर्मदा बचाओ आंदोलन एक गैर सरकारी संगठन (एन जी ओ) हम भद्रा में भादु लाएँगे बाढ़ से दामोदर फैल गई है। है जो जनजातीय लोगों, किसानों, पर्यावरणविदों और नाव इसमें नहीं चलेंगी। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गुजरात में नर्मदा नदी पर ओह। दामोदर, हम आपके पैर पड़ते हैं। सरदार सरोवर बाँध के विरोध में लामबंद करता है। मूल बाढ़ का कहर कुछ कम करो रूप से शुरू में यहाँ आंदोलन जंगलों के बाँध के पानी में भादु एक साल बाद आएगा डूबने जैसे पर्यावरणीय मुद्दों पर केंद्रित था हाल ही में इस अपनी सतह पर नाव चलने दो। आंदोलन का लक्ष्य बाँध से विस्थापित गरीब लोगों को (यह लोकप्रिय भादु गीत दामोदर घाटी क्षेत्र में गाया जाता है। सरकार से संपूर्ण पुनर्वास सुविधाएँ दिलाना हो गया है। जो शोक की नदी कही जाने वाली दामोदर नदी में बाढ़ के । लोगों ने सोचा कि उनकी यातनाएँ व्यर्थ नहीं जाएगी... दौरान आने वाली समस्याओं का वर्णन करता है।) विस्थापन का शोक स्वीकार किया यह विश्वास करके पिछले कुछ वर्षों में बहुउद्देशीय परियोजनाएँ और की सिंचाई के प्रसार से वे मालामाल हो जाएँगे। प्रायः बड़े बाँध कई कारणों से परिनिरीक्षण और विरोध के रिहंद के उत्तरजीवियों ने हमें बताया कि उन्होंने अपने विषय बन गए हैं। नदियों पर बाँध बनाने और उनका कष्टों को देश के लिए कुर्बानी के रूप में स्वीकार किया। बहाव नियंत्रित करने से उनका प्राकृतिक बहाव अवरुद्ध परंतु अब तीस साल के कड़े अनुभव के बाद, जब उनकी आजीविका और अधिक जोखिमपूर्ण हो गई है, पूछते जा होता है, जिसके कारण तलछट बहाव कम हो जाता है। रहे हैं - "हमें ही देश के लिए कुर्बानी देने के लिए क्यों और अत्यधिक तलछट जलाशय की तली पर जमा होता चुना गया?" रहता है जिससे नदी का तल अधिक चट्टानी हो जाता है। और नदी जलीय जीव-आवासों में भोजन की कमी हो स्रोत - एस. शर्मा, बेली आफ द रिवर, ट्राईबल कनफ्लिक्ट्स जाती है। बाँध नदियों को टुकड़ों में बाँट देते हैं जिससे ओवर डेवलपमेंट इन नर्मदा वैली, ए. बावीस्कर, 1995 से विशेषकर अंडे देने की ऋतु में जलीय जीवों का नदियों उद्धृत। में स्थानांतरण अवरुद्ध हो जाता है। बाढ़ के मैदान में बनाए जाने वाले जलाशयों द्वारा वहाँ मौजूद वनस्पति और सिंचाई ने कई क्षेत्रों में फसल प्रारूप परिवर्तित कर मिट्टियाँ जल में डूब जाती हैं जो कालांतर में अपघटित दिया है जहाँ किसान जलगहन और वाणिज्य फसलों की हो जाती है। ओर आकर्षित हो रहे हैं। इससे मृदाओं के लवणीकरण | बहुउद्देशीय परियोजनाएँ और बड़े बाँध नए सामाजिक जैसे गंभीर पारिस्थितिकीय परिणाम हो सकते हैं। इसी आंदोलनों जैसे - 'नर्मदा बचाओ आंदोलन' और 'टिहरी दौरान इसने अमीर भूमि मालिकों और गरीब भूमिहीनों में बाँध आंदोलन' के कारण भी बन गए हैं। इन परियोजनाओं सामाजिक दूरी बढ़ाकर सामाजिक परिदृश्य बदल दिया का विरोध मुख्य रूप से स्थानीय समुदायों के वृहद स्तर है। जैसा कि हम देख सकते हैं कि बाँध उसी जल के पर विस्थापन के कारण है। आमतौर पर स्थानीय लोगों अलग-अलग उपयोग और लाभ चाहने वाले लोगों के को उनकी जमीन, आजीविका और संसाधनों से लगाव बीच संघर्ष पैदा करते हैं। गुजरात में साबरमती बेसिन में एवं नियंत्रण देश की बेहतरी के लिए कुर्बान करना सूखे के दौरान नगरीय क्षेत्रों में अधिक जल आपूर्ति देने पड़ता है। इसलिए, अगर स्थानीय लोगों को इन परियोजनाओं पर परेशान किसान उपद्रव पर उतारू हो गए। बहुद्देशीय का लाभ नहीं मिल रहा है तो किसको मिल रहा है? परियोजनाओं के लागत और लाभ के बँटवारे को लेकर शायद जमींदारों और बड़े किसानों को या उद्योगपतियों अंतर्राज्यीय झगड़े आम होते जा रहे हैं। जल संसाधन 29 2015-16(19/01/2015) भारत - मुख्य नदियाँ और बाँध 30 समकालीन भारत-2 2015-16(19/01/2015) भी कई बार बाढ़ नियंत्रण में असफल रहते हैं। आपने पढ़ा होगा कि वर्ष 2006 में महाराष्ट्र और गुजरात में भारी वर्षा क्या आप जानते हैं कि कृष्णा-गोदावरी विवाद की शुरुआत महाराष्ट्र सरकार द्वारा कोयना पर जल विद्युत परियोजना के के दौरान बाँधों से छोड़े गए जल की वजह से बाढ़ की लिए बाँध बनाकर जल की दिशा परिवर्तन कर कर्नाटक स्थिति और भी विकट हो गई। इन बाढों से न केवल जान और आंध्र प्रदेश सरकारों द्वारा आपत्ति जताए जाने से हुई। और माल का नुकसान हुआ अपितु बृहत् स्तर पर मृदा इससे इन राज्यों में पड़ने वाले नदी के निचले हिस्सों में अपरदन भी हुआ। बाँध के जलाशय पर तलछट जमा होने जल प्रवाह कम हो जाएगा और कृषि और उद्योग पर का अर्थ यह भी है कि यह तलछट जो कि एक प्राकतिक विपरीत असर पड़ेगा। उर्वरक है बाढ़ के मैदानों तक नहीं पहुँचती जिसके कारण भूमि निम्नीकरण की समस्याएँ बढ़ती हैं। यह भी माना जाता है कि बहुउद्देशीय योजनाओं के कारण भूकंप आने अंतर्राज्यीय जल विवादों की एक सूची तैयार करें। की संभावना भी बढ़ जाती है और अत्यधिक जल के नदी परियोजनाओं पर उठी अधिकतर आपत्तियाँ उनके । | उपयोग से जल-जनित बीमारियाँ, फसलों में कीटाणु-जनित उद्देश्यों में विफल हो जाने पर हैं। यह एक विडंबना ही है बीमारिया और प्रदूषण फलत है। कि जो बाँध बाढ़ नियंत्रण के लिए बनाए जाते हैं उनके वर्षा जल संग्रहण जलाशयों में तलछट जमा होने से वे बाढ़ आने का कारण बहुत से लोगों का मानना है कि बहुउद्देशीय परियोजनाओं बन जाते हैं। अत्यधिक वर्षा होने की दशा में तो बड़े बाँध के अलाभप्रद असर और उन पर उठे विवादों के चलते देश के बाढ़ संभावित क्षेत्रों के विषय में जानकारी इकट्ठा कीजिए जल संसाधन 31 2015-16(19/01/2015) वर्षाजल संग्रहण तंत्र इनके सामाजिक-आर्थिक और पारिस्थितिक तौर पर व्यवहार्थ विकल्प हो सकते हैं। प्राचीन भारत में उत्कृष्ट जलीय निर्माणों के साथ-साथ जल संग्रहण ढाँचे भी पाए जाते थे। लोगों को वर्षा पद्धति और मृदा के गुणों के बारे में गहरा ज्ञान था। उन्होंने स्थानीय पारिस्थितिकीय परिस्थितियों और उनकी जल आवश्यकतानुसार वर्षाजल, भौमजल, नदी जल और बाढ़ जल संग्रहण के अनेक तरीके विकसित कर लिए थे। पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में लोगों ने ‘गुल' अथवा ‘कुल' (पश्चिमी हिमालय) जैसी वाहिकाएँ, नदी की धारा का रास्ता बदलकर खेतों में सिंचाई के लिए बनाई हैं। पश्चिमी भारत, विशेषकर राजस्थान में पीने का जल एकत्रित करने के लिए छत वर्षा जल संग्रहण' का तरीका आम था। पश्चिम बंगाल में बाढ़ के मैदान में लोग अपने खेतों की सिंचाई के लिए बाढ़ जल वाहिकाएँ बनाते थे। शुष्क और अर्धशुष्क क्षेत्रों में खेतों में वर्षा जल एकत्रित करने के लिए गड्ढे बनाए जाते थे ताकि मृदा को सिंचित किया जा सके और संरक्षित जल को खेती के लिए उपयोग में लाया जा सके। राजस्थान के जिले जैसलमेर में ‘खादीन' और अन्य क्षेत्रों में ‘जोहड़' इसके उदाहरण हैं। (अ) हैंडपंप के माध्यम से पुनर्भरण (ब) बेकार पड़े कुएँ के माध्यम से पुनर्भरण चित्र 3.4 - छत वर्षाजल संग्रहण • पी वी सी पाइप का इस्तेमाल करके छत का वर्षाजल एकत्रित किया जाता है। • रेत और ईंट प्रयोग करके जल का छनन (filter) किया जाता है। भूमिगत पाइप के द्वारा जल हौज तक ले जाया जाता है जहाँ से | इसे तुरंत प्रयोग किया जा सकता है। • हौज से अतिरिक्त जल कुएँ तक ले जाया जाता है। • कुएँ का जल भूमिगत जल का पुनर्भरण करता है। • बाद में इस जल का उपयोग किया जा सकता है। चित्र 3.3 32 समकालीन भारत-2 2015-16(19/01/2015) शिलांग से 55 किलोमीटर की दूरी पर ही स्थित है और यह शहर पीने के जल की कमी की गंभीर समस्या का सामना करता है। शहर के लगभग हर घर में छत वर्षा जल संग्रहण की व्यवस्था है। घरेलू जल आवश्यकता की कुल माँग के लगभग 15-25 प्रतिशत हिस्से की पूर्ति छत जल संग्रहण व्यवस्था से ही होती है। एक कुल से वर्तुल ग्रामीण तालाब बनता है (काज़ा गाँव के चित्र के अनुसार), जिससे जरूरत पड़ने पर पानी छोड़ सकते हैं। अपने क्षेत्र में पाए जाने वाले अन्य वर्षाजल संग्रहण तंत्रों के बारे में पता लगाएँ। चित्र 3.5 - वर्षाजल संग्रहण की पारंपरिक विधि यह दुख की बात है कि आज पश्चिमी राजस्थान में राजस्थान के अर्ध-शुष्क और शुष्क क्षेत्रों विशेषकर । छत वर्षाजल संग्रहण की रीति इंदिरा गांधी नहर से | उपलब्ध बारहमासी पेयजल के कारण कम होती जा रही बीकानेर, फलोदी और बाड़मेर में, लगभग हर घर में पीने है। हालाँकि कुछ घरों में टाँकों की सुविधा अभी भी है। का पानी संग्रहित करने के लिए भूमिगत टैंक अथवा | क्योंकि उन्हें नल के पानी का स्वाद पसन्द नहीं है। ‘टाँका' हुआ करते थे। इसका आकार एक बड़े कमरे । कार एक बड़े कमर सौभाग्य से आज भी भारत के कई ग्रामीण और शहरी जितना हो सकता है। फलोदी में एक घर में 6.1 मीटर क्षेत्रों में जल संरक्षण और संग्रहण का यह तरीका प्रयोग गहरा. 4.27 मीटर लंबा और 2.44 मीटर चौड़ा टाँका था। में लाया जा रहा है। कर्नाटक के मैसरु जिले में स्थित टांका यहाँ सुविकसित छत वर्षाजल संग्रहण तंत्र का एक सूदुर गाँव गंडाथूर में ग्रामीणों ने अपने घर में जल अभिन्न हिस्सा होता है जिसे मुख्य घर या आँगन में बनाया आवश्यकता पूर्ति छत वर्षाजल संग्रहण की व्यवस्था की जाता था। वे घरों की ढलवाँ छतों से पाइप द्वारा जुड़े हुए हुई है। गाँव के लगभग 200 घरों में यह व्यवस्था है और थे। छत से वर्षा का पानी इन नलों से होकर भूमिगत टाँका तक पहुँचता था जहाँ इसे एकत्रित किया जाता था। वर्षा का पहला जल छत और नलों को साफ करने में प्रयोग होता था और उसे संग्रहित नहीं किया जाता था। इसके बाद होने वाली वर्षा का जल संग्रह किया जाता था। टाँका में वर्षा जल अगली वर्षा ऋतु तक संग्रहित किया जा सकता है। यह इसे जल की कमी वाली ग्रीष्म ऋतु तक पीने का जल उपलब्ध करवाने वाला जल स्रोत बनाता है। वर्षाजल अथवा ‘पालर पानी' जैसा कि इसे इन क्षेत्रों में पुकारा जाता है, प्राकृतिक जल का शुद्धतम रूप समझा जाता है। कुछ घरों में तो टाँको के साथ छतजल संग्रहण थार के सभी शहरों और ग्रामों में प्रचलित था। भूमिगत कमरे भी बनाए जाते हैं क्योंकि जल का यह वर्षा जल जो कि घरों की ढाल छतों पर गिरता है, उसे पाइप द्वारा स्रोत इन कमरों को भी ठंडा रखता था जिससे ग्रीष्म ऋतु भूमिगत टाँका के अंदर ले जाते हैं (भूमि में गोल छिद्र) जो मुख्य में गर्मी से राहत मिलती है। घर अथवा आँगन में बना होता है। ऊपर दिखाया गया चित्र दर्शाता है कि जल पड़ोसी की छत से एक लम्बे पाइप के द्वारा लाया जाता है। यहाँ पड़ोसी की छत का उपयोग वर्षा जल को एकत्र करने मेघालय की राजधानी शिलांग में छत वर्षाजल संग्रहण के लिए किया गया है। चित्र में एक छेद दिखाया गया है जिसके प्रचलित है। यह रोचक इसलिए है क्योंकि चेरापूँजी और द्वारा वर्षा जल भूमिगत टाँका में चला जाता है। मॉसिनराम जहाँ विश्व की सबसे अधिक वर्षा होती है, चित्र 3.6 जल संसाधन 33 2015-16(19/01/2015) बाँस ड्रिप सिंचाई प्रणाली मेघालय में नदियों व झरनों के जल को बाँस द्वारा बने पाइप द्वारा एकत्रित करके 200 वर्ष पुरानी विधि प्रचलित है। लगभग 18 से 20 लीटर सिंचाई पानी बाँस पाइप में आ जाता है तथा उसे सैकड़ों मीटर की दूरी तक ले जाया जाता है। अंत में पानी का बहाव 20 से 80 बूंद प्रति मिनट तक घटाकर पौधे पर छोड़ दिया जाता है। चित्र 1 - पहाड़ी शिखरों पर सदानीरा झरनों की दिशा परिवर्तित करने के लिए बाँस के पाइपों का उपयोग किया जाता है। इन पाइपों के माध्यम से गुरुत्वाकर्षण द्वारा जल पहाड़ के निचले स्थानों तक पहुँचाया जाता है। चित्र 2 तथा 3 - बाँस से निर्मित चैनल से पौधे के स्थान तक जल का बहाव न से पोध के स्थान तक जल का बहाव परिवर्तित किया जाता है। पौधे तक बाँस पाइप से बनाई व बिछाई गई विभिन्न जल न जल शाखाओं में जल वितरित किया जाता है। पाइपों में जल प्रवाह इनकी स्थितियों में परिवर्तन करके नियंत्रित किया जाता है। चित्र 4 - यदि पाइपों को सड़क पार ले जाना । हो तो उन्हें भूमि पर ऊँचाई से ले जाया जाता है। : चित्र 5 व 6 - संकुचित किये हुए चैनल सेक्शन और पथांतरण इकाई जल सिंचाई के अंतिम चरण में प्रयुक्त की जाती है। अंतिम चैनल सेक्शन से पौधे की जड़ों के निकट जल गिराया जाता है। चित्र 3.7 लगभग 1000,000 लीटर जल एकत्रित किया जाता है। इस गाँव ने वर्षा जल संपन्न गाँव की ख्याति अर्जित की है। यहाँ प्रयोग किए जा रहे वर्षा जल संग्रहण ढाँचों के बारे में अधिक जानकारी के लिए चित्र 3.4 को देखें। इस गाँव में हर वर्ष लगभग 1,000 मिलीमीटर वर्षा होती । है और 10 भराई के साथ यहाँ संग्रहण दक्षता 80 प्रतिशत है। यहाँ हर घर लगभग प्रत्येक वर्ष 50,000 मीटर जल का संग्रह और उपयोग कर सकता है। 20 घरों द्वारा हर वर्ष तमिलनाडु एक ऐसा राज्य है जहाँ पूरे राज्य में हर घर में छत वर्षाजल संग्रहण ढाँचों का बनाना आवश्यक कर दिया गया है। इस संदर्भ में दोषी व्यक्तियों पर कानूनी कार्यवाही हो सकती है। 34 समकालीन भारत-2 2015-16(19/01/2015) 1. सूचना एकत्रित करें कि उद्योग किस प्रकार हमारे जल संसाधनों को प्रदूषित कर रहे हैं? 2. अपने सहपाठियों के साथ मिलकर अपने मोहल्ले में जल विवाद पर एक नाटिका प्रस्तुत करें। अभ्यास अभ्यास अभ्यास अभ्यास अभ्यास 1. बहुवैकल्पिक प्रश्न (i) नीचे दी गई सूचना के आधार पर स्थितियों को 'जल की कमी से प्रभावित' या 'जल की कमी से अप्रभावित में वर्गीकृत कीजिए। (क) अधिक वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र (ख) अधिक वर्षा और अधिक जनसंख्या वाले क्षेत्र (ग) अधिक वर्षा वाले परंतु अत्यधिक प्रदूषित जल क्षेत्र (घ) कम वर्षा और कम जनसंख्या वाले क्षेत्र (ii) निम्नलिखित में से कौन-सा वक्तव्य बहुउद्देशीय नदी परियोजनाओं के पक्ष में दिया गया तर्क नहीं है? (क) बहुउद्देशीय परियोजनाएँ उन क्षेत्रों में जल लाती है जहाँ जल की कमी होती है। (ख) बहुउद्देशीय परियोजनाएँ जल बहाव की नियंत्रित करके बाढ़ पर काबू पाती है। (ग) बहुउद्देशीय परियोजनाओं से बृहत् स्तर पर विस्थापन होता है और आजीविका खत्म होती है। (घ) बहुउद्देशीय परियोजनाएँ हमारे उद्योग और घरों के लिए विद्युत पैदा करती हैं। (iii) यहाँ कुछ गलत वक्तव्य दिए गए हैं। इसमें गलती पहचाने और दोबारा लिखें। (क) शहरों की बढ़ती संख्या, उनकी विशालता और सघन जनसंख्या तथा शहरी जीवन शैली ने जल संसाधनों के सही उपयोग में मदद की है। (ख) नदियों पर बाँध बनाने और उनको नियंत्रित करने से उनका प्राकृतिक बहाव और तलछट बहाव प्रभावित नहीं होता। (ग) गुजरात में साबरमती बेसिन में सूखे के दौरान शहरी क्षेत्रों में अधिक जल आपूर्ति करने पर भी किसान नहीं भड़के। (घ) आज राजस्थान में इंदिरा गांधी नहर से उपलब्ध पेयजल के बावजूद छत वर्षा जल संग्रहण लोकप्रिय हो रहा है। 2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए। (i) व्याख्या करें कि जल किस प्रकार नवीकरण योग्य संसाधन है? (ii) जल दुर्लभता क्या है और इसके मुख्य कारण क्या हैं? (iii) बहुउद्देशीय परियोजनाओं से होने वाले लाभ और हानियों की तुलना करें। 3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 120 शब्दों में दीजिए। (i) राजस्थान के अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में वर्षा जल संग्रहण किस प्रकार किया जाता है? व्याख्या कीजिए। (ii) परंपरागत वर्षा जल संग्रहण की पद्धतियों को आधुनिक काल में अपना कर जल संरक्षण एवं भंडारण किस प्रकार किया जा रहा है। जल संसाधन 35 2015-16(19/01/2015)

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